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रविवार, 26 अप्रैल 2020

मेरा गाँव मेरा देश - बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-1

बीहड़ वन की गोद में विताए वो यादगार रोमाँचक पल
बचपन में जब से होश संभाला, पहाड़ हमेशा मन को रोमाँचित करते रहे और साथ ही गहरी जिज्ञासा के भाव भी जगाते रहे। हमारा घर दो पहाड़ों के बीच फैली 2 से 3 किमी हल्की ढलानदार घाटी में स्थित था। जब भी घर की खिड़कियों या आँगन से झांकते तो दोनों और से गगनचुंबी पर्वतों से घिरा पाते। साथ ही उत्तर और दक्षिण में दोनों ओर फैली 30-40 किमी लम्बी घाटी का आदि अंत भी पर्वतों में ही पाते।
कुल मिलाकर स्वयं को चारों ओर से कितनी ही पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा पाते, लेकिन सबसे प्रत्यक्ष थे घर के पूर्व और पश्चिम में खड़े समानान्तर दो आसमान छूते पहाड़, जहाँ से होकर क्रमशः सुबह सूर्य भगवान प्रकट होते और शाम को पर्वत के पीछे छिप जाते। दोनों पहाड़ों को ब्यास नदी की अविरल धारा विभाजित करती, जिसका कलकल निनाद ब्रह्ममुहूर्त में कानों में एक दिव्य अनुभूति के साथ गुंजार करता। हमारा गाँव ब्यास नदी के वायीं ओर मौजूद था, अतः इस साईड के पहाड़ गाँव के लोकजीवन से सीधे जुड़े हुए थे। नदी के उस पार के पहाड़ों से परिचय थोड़ा कम था, क्योंकि वहाँ जाना कम होता।
इन पहाड़ों के उपर क्या है, हमेशा ही बालमन के कौतुहल का विषय रहते। ये पहाड़ तो सीधा आसमाँ को छूते प्रतीत होते हैं, तो क्या वहाँ पहुँचकर सीढ़ियों के सहारे आसमान तक पहुँचा जा सकता है। और फिर बादल घिरने पर तो कितना सारा पानी आसमान से बरसता है, तो क्या वहाँ पर कोई बड़ी सी झील है, जो बरसात में फूट पड़ती है। जो भी हो बचपन की ये जिज्ञासाएं थोड़ा बड़ा होते-होते कुछ समाधान पाने लगीं, जब इन पहाड़ों से विचरण कर आए घर के बड़े-बुजुर्गों की कथा-किवदंतियाँ एवं रोमाँचक गाथाएं सुनने को मिलती। हर श्रवण के साथ इनको प्रत्यक्ष देखने की तमन्ना और बलवती हो जाती। अंततः ऐसा संयोग बना अपने गाँव के वरिष्ठ भाईयों के साथ घूमने का, जो पहले वहाँ अपने मवेशियों के साथ हो आए थे तथा रास्ते से भली भांति परिचित थे। मालूम हो कि हमारे यहाँ तब गैर-दूधारु पालतु मवेशियों को जंगल में ग्वालों की देखरेख में भेजने का चलन था, जो बर्फ पिघलने के बाद अप्रैल से ठण्ड बढ़ने के पहले सितम्बर-अक्टूबर माह तक वहाँ रहते थे।
संभवतः यह अक्टूबर का माह था, सन तो याद नहीं। 1980 के दशक का पूर्वार्ध रहा होगा।
इस यात्रा के साथ हम पहली बार इन पहाड़ों से प्रत्यक्ष परिचय पाने वाले थे. इनसे सीधा साक्षात्कार करने वाले थे, जिनको निहारते-निहारते हम बचपन से किशोरावस्था की दहलीज तक आ पहुँचे थे। घर वालों व गांववासियों का हमेशा ही सबाल रहता था कि इन पहाड़ों में रखा क्या है, जो हमेशा ही इनके बारे में इतने लालायित रहते हो। इनके प्रति अज्ञात से आकर्षण का जवाब तो हमारे पास भी नहीं था, लेकिन कुछ तो बात है इन पहाड़ों में, जो इनको देखने व सोचने भर से हमारा दिल धड़कता था। फिर वर्तमान से असंतुष्ट और सदा अज्ञात को जानने-अन्वेषण करने और नित नए शिखरों के आरोहण का नैसर्गिक जज्बा हिलोरें मार रहा था, जो हर जिज्ञासु इंंसान की फितरत रहती है।
खैर हम अपनी आवश्यक तैयारी के साथ प्रातः तड़के घर से कूच कर जाते हैं। साथ में देशी घी, मक्खन, गुड़, सत्तु, चाबल, दाल, आलू, तेल-मसाला, चाकू, लाठी आदि मार्ग के पाथेय रखते हैं। साथ ही कुछ अखरोट व घर के संग्रहित सेब आदि फल। रास्ते में नाश्ता के लिए परौंठा आदि की व्यवस्था भी नानी अम्मा ने कर रखी थीं। धीरे-धीरे हमारी टोली गाँव के ऊपर पहाड़ की ओर आरोहण शुरु करती है। गाँव की वस्तियाँ, खेत-बगीचे आदि पीछे छूटते जाते हैं। कझोरा नाले से हम शांभल (दारु हल्दी) झाड़ियों से भरे ढलानदार विरान ढलान से होकर उपर चढ़ते हैं, फिर कझोरा नाला पार कर हल्की चढ़ाई बाले रास्ते कोहू (जंगली जैतून) के घने जंगल के बीच सीधा कोहू री धारा स्थान पर पहुंचते हैं, जहाँ चट्टानी विश्राम स्थल पर कोहू का इक्लौता पुराना एवं वृहद पेड़ था। थके राहियों को इसकी शीतल छाया और प्राकृतिक हवा कुछ मिनटों में तरोताजा कर देती। यह एक ऐसा बिंदु था, जहाँ से नीचे घर-गाँव के विहंगम दृश्य़ प्रत्यक्ष थे।
यहां नीचे सीधी गहरी खाईयों में सेऊबाग नाला अदृश्य रुप में बह रहा था, जो नीचे झरने के पास प्रकट होता है। यहाँ पहाड़ के आर-पार इक्का-दुक्का घर ही दिख रहे थे। तरोताजा होकर यहाँ से बायीं ओर खेत की मेड़ के साथ आगे बढ़े, जहाँ जंगली कैक्टस के सफेद फूल हमारा स्वागत कर रहे थे। यहाँ के दायीं ओर नाले की साईड के ढलानदार बुग्याल घास के लिए प्रख्यात हैं। जिनमें कई फुट लम्बी घास उगी रहती। गाँव की महिलाएं इनको काटकर घर ले जाती। मवेशियों के लिए भी यह आदर्श चरागार रहती। लेकिन आगे गहरी खाई के कारण खतरनाक भी था, एक कदम की भी चूक सीधे खाई में समाधी लगा सकती थी।
इसको पार करते ही हम पत्थरों के बने दूसरे विश्राम स्थल थोड़ी पहुंचे। यहाँ से कुछ आगे नए गाँव एवं घाटी के दर्शन होते हैं।
  फाडमेह गाँव सामने था, जो हमारे गाँव से नहीं दिखता। यहाँ थान देवता का मंदिर है, जिनको माथा टेकते हुए हम यहाँ से कोई 1-1.5 किमी की ऊँचाई पर बनोगी गाँव पहुँचते है, जो गिरमल देवता का स्थल है। हमारे घर से यहाँ के प्रत्यक्ष दर्शन हर रोज सुबह-शाम होते, आज हम यहाँ से नीचे अपने घर-गाँव के दर्शन कर रहे थे और यहां से गुजरते हुए गिरमल देवता को रास्ते से ही माथा टेकते हुए आगे बढ़ जाते हैं। अपने बुआ के बेटे पुना भाई साहब के खेत एवं बगीचे में पूरे अधिकार के साथ कुछ भुट्टा और ताजा लाल सेब तोड़कर रास्ते के लिए रख लेते हैं। इस ऊँचाई में सेब अभी पेड़ों में बचे थे, जबकि हमारे गाँव की निचली ऊँचाईयों के पेड़ों में इनके दर्शन दुर्लभ थे। ज्ञात हो कि उस दौर में हमारे गाँव के निचले ईलाके में सेब का व्यवसायिक चलन अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था, बस शौकिया तौर पर घर के आस-पास लगाए पेड़ ही सेब से लदे होते थे, जबकि बनोगी गाँव की ऊँचाई में हमारे पुना भाई साहब एक प्रगतिशील बागवान के रुप में पूरा बगीचा तैयार कर चुके थे।
कुछ मिनटों में हम गाँव के ऊपर नरेयंडी स्थल पर पहुँचते हैं, जो देवताओं का पावन स्थल है। फागली (देवताओं का वार्षिक उत्सव) जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम यहीं सम्पन्न होते हैं। कुछ ही मिनटों में हम सब देवदार के गगनचूंबी वृक्षों के बीच विचरण कर रहे थे। नीचे पनाणी शिला की देवस्थली के दूरदर्शन हो रहे थे और आगे देवदार का घना जंगल। जहाँ थक जाते वहाँ विश्राम के लिए बने चट्टानी चबूतरों पर बैठ जाते और आराम करते।
 रास्ते में भूख काफी तेज लग रही थी, सो रास्ते में ही नाश्ता करते हैं और फिर घने जंगल के बीच आगे बढ़ते हैं। रास्ते में मातन छेत स्थान से गुजरते हैं, जहाँ देवदार के जंगलों के बीच कुछ मैदान सरीखे खेत दिखे, जिनमें बहुतायत में शैयण नाम की झाड़ियाँ लगीं थी, जिनकी मजबूती एवं लचक के कारण इनका प्रयोग रस्सी की भांति लकड़ी के लट्ठों को खींचने या घास को बाँधने में होता है।
इनकी झाड़ियों के बीच अचानक पक्षियों के झुंड की आवाजाही प्रतीत होती है, छोटे बच्चों के साथ पूरा झुंड तेजी से दौड़ता हुआ सामने से गुजरता है। इस फुर्तीले एवं शर्मिले पक्षी को हम पहली बार देख रहे थे, जो जंगल की इस ऊँचाई में ही विचरण करता है व यहाँ इसको कड़ेशा या जंगली मुर्गा (Kalij pheasant) कहते हैं। इसके बाद कुछ जंगल को पार करते ही हम अपने आज के गन्तव्य स्थल रेऊँश पहुँचते हैं, जहाँ वन विभाग का सरकारी विश्राम गृह बना है। यहीं से होकर नग्गर-बिजली महादेव कच्ची सड़क जाती है। विश्राम गृह में तो ताले लटके थे, लेकिन निर्जन होने के चलते इसका खुला बरामदा और स्टोर रुम हमारे लिए रात्रि विश्राम का कामचलाऊ ठिकाना बन गए। चौकीदार को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।
यहाँ से नीचे कूल्लू घाटी का विहंगम नजारा दिख रहा था। कुल्लू के पार दशहरे का ढालपुर ग्राऊंड सब यहाँ से दिख रहे थे। यहाँ पर फर-फर कर बहती ठण्डी हवा सफर की गर्मी और थकान को जैसे अपने साथ उड़ा ले रही थी।

इसके दायं, बाँए और पीछे देवदार के घने जंगल थे। साथ ही देवदार, कायल के साथ रई, तोष के जंगल भी यहाँ बहुतायत में दिखे, जिनके पेड़ों की रंगत, पत्तियों के आकार से इनको पहचाना जा सकता है। नए आगंतुक के लिए इन एक समाऩ दिखने वाले गगनचूम्बी वृक्षों में अंतर कर पाना काफी कठिन होता है।
यहाँ जल की धाराएं चारों और बह रही थीं, साथ ही पीछे नल की सुबिधा थी। कुछ पल विश्राम कर, कुछ फल-फूल खाकर हम आसपास सड़क के साथ आगे बढ़ते हैं और इसके दोनों ओर के निर्जन जंगलों को एक्सप्लोअर करते हैं। यहाँ वन विभाग की नर्सरी देखते हैं।
  बाढ़ लगे इसके संरक्षित क्षेत्र से परिचित होते हैं, जो कस्तुरी मृग एवं मोनाल पक्षी के लिए जाना जाता है, हालाँकि हमें इनके दर्शन नहीं हो पाए। गेस्ट हाउस के पीछे फुआल (गड़रिए) अपनी भेड़-बकरियों के साथ आज डेरा जमाए हुए थे। उनसे बकरी का दूध मिलता है और हम भी साथ लाए फल फूल उन्हें देते हैं। इनसे पता चलता है कि इन जंगलों में भालू रहते हैं। इंसान से वे प्रायः दूर ही रहते हैं, मवेशियों का रात में शिकार करते हैं। दिन में प्रायः निर्जन एकांत में विश्राम करते हैं। हमारे लिए यह राहत भरी बात थी।
आज की रात का भोजन साथ लाए सामान के साथ जंगली चूल्हे में तैयार करते हैं, साथ ही दिन भर की रोमाँचक यादों को ताजा करते हैं और कल की प्लानिंग करते हैं तथा भोजनोपरान्त कुछ गप्प-शप के बाद निद्रा देवी की गोद में चले जाते हैं।
अगले दिन बीहड़ वन में ट्रैकिंग के रोमाँचक सफर को अगले भाग में पढ़ सकते हैं, बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-2 में। (जारी)


रविवार, 22 मार्च 2020

मेरा गाँव मेरा देश – मौसम वसन्त का, भाग-2



सर्दी के बाद वसंत की वहार
  खेतों के कौने में नरगिस के पुष्पगुच्छ चांदी की थाल में सजी सोने की कटोरियों सा रुप लिए सबको मंत्रमुग्ध करते। इनके दर्शन जहाँ मन को एक नई ताजगी देते, वहीं उनकी मादक खुशबू मस्तिष्क में एक अद्भुत अनुभव का संचार करती। 
 नरगिस के साथ खेतों के बीचों बीच मदोहुला(ट्यूलिप) के फूल एक अलग ही रंगत बिखेर रहे होते। इनके लाल, पीले, गुलावी, सफेद रंगों के मिश्रण से सजी फूलों की वारात खेत में खुशनूमा रौनक लाती।


फलदार पेड़ों में सबसे पहले आलूबुखारा व प्लम आदि के पेड़ सफेद फूलों से लदना शुरु हो जाते। प्लम के सफेट फूल आकार में छोटे किंतु गुच्छों में एक अलग ही सात्विक आभा लिए होते। प्लम के बगीचे दूर से ऐसे लगते जैसे घाटी ने सफेद चादर ओढ़ ली हो। इसके साथ चैरी के फूल नए रंग घोलते। 

     घर के आस-पास खुमानी के पेड अपनी गुलाबी-स्वर्णिम आभा के साथ आँगन, खेत, गाँव एवं घाटी को नयनाभिराम सौंदर्य का अवदान देते। दूर से ही देखने पर, घाटी के आर-पार इनके दर्शन सुखद अनुभूति देते।
इनके साथ बादाम के पेड़ तो और भी मुखर रुप में अपनी बासन्ती आभा को प्रकट करते, जिन पर मधुमक्खियाँ मंडरा रही होती इनका मधुर गुंजार इनकी मस्ती भरी खुशी को प्रकट करता, जिसमें दर्शक एवं श्रोता भी शुमार होकर एक नए लोक में विचरण की अनुभूति पाता।


घरों की छत्त की दिवारों में लगे पारम्परिक मड़ाम या ढंढोर (मधुमक्खी के लिए बने लकड़ी के चौकोर घर) के छिद्रों में देशी मधुमक्खियों की सेना अंदर-बाहर निकलती, गुंजार के साथ वसन्त की घोषणा करती। मालूम हो कि मधुमक्खियाँ फूलों में प्राकृतिक रुप में पोलिनेटर का काम करती हैं, जिसके कारण बगीचों में फलों का उत्पादन निर्धारित होता है। 

यदि पोलीनेशन सही न हो तो, फलों की पैदायश एक दम गिर जाती है। इसका महत्व जानते हुए आजकल तो बगीचों में कृत्रिम मधुगृहों को तक सजाया जा रहा है तथा विदेशों से आयातित मधुमक्खियों की तक इस कार्य में सेवा ली जा रही है।

     हमारी स्कूल की परीक्षाएं ऐसे ही वातावरण में घर की स्लेट(पोट) से ढ़की हल्की ढ़लानदार छत्त पर बैठकर मुधमक्खी के बने मड़ाम (घर) के पास बैठ कर बीतती, जहाँ मधुमक्खियाँ छत के चारों ओर के खुमानी, बादाम, चैरी, प्लम, सेब आदि के फूलों से पराग लाकर यहाँ इकट्ठा करतीं। इनके पैरों में लगे परागण साफ दिखते, जिन्हें ये अपने छत्त में इकट्ठा कर शहद तैयार करती। ऐसे प्राकृतिक परिवेश में हवा में तैरती फूलों की खुशबू के बीच मन सहज रुप में एकाग्र होता।

     इसी क्रम में नाशपाती के पेड़ों पर सफेद रंग के फूल आते और सबसे अन्त में आते सेब के फूल, जिनकी रंगत, सौंदर्य शायद अब तक वर्णित सभी फूलों की विशेषता को समेटे  हुए रहते। लाल, गुलाबी तथा कुछ सफेद रंगत लिए इनके फूलों से सजे बगीचों की एक अलग ही आभा रहती, क्योंकि गाँव-घाटी में सबसे अधिक बाग सेव के ही थे, सो इनकी रंगत सबसे लम्बी एवं व्यापक रहती।

इनके साथ कुछ पेडों के फूल अपनी अलग ही पहचान रखते, जैसे गलगल। इसके पेड़ के छोटे किंतु सुंदर फूल विशिष्ट खुशबू लिए रहते। इनके साथ अखरोट के बौर कुछ आम जैसे होते, लेकिन इसके गुच्छे हरा-भूरा रंग लिए नीचे लटके हुए होते।
कोहू, बाँज, देवदार, रई तौस जैसे सदावहार पौधों में इस सीजन में फूलों की जगह पत्तियों की नई कौंपलें निकलती, जिनकी चमकदार एवं कोमल पत्तियों की एक अलग ही आभा होती। इसी तरह जंगली अंजीर(फागड़ा) एवं जापानी के फूल अपनी सौम्य उपस्थिति दर्ज करते। जापानी पेड़ के नीचे खेत के किनारे नीले रंग के खुशबूदार फूल शीतलता का आलौकिक अहसास देते।

इनके साथ पहाड़ की ऊँचाईयों पर फूलने वाले बुराँस के फूलों के बिना वसन्त की बात अधूरी रहेगी। पहाड़ की ऊँचाईयों में बुराँश के सुर्ख लाल फूल अपनी अलग ही आलौकिक रंगत लिए होते, जिन्हें पहाहों की शान कहा जा सकता है। हालाँकि हमरा घर घाटी की तलहटी में होने के कारण हमारी इन तक सीधी पहुँच नहीं थी, लेकिन जब कोई घर का बड़ा-बुजुर्ग जंगल से बुराँश के फूल तोड़कर लाता, तो बच्चों के लिए यह एक कौतुक का विषय रहता। क्योंकि इसके बड़े-बड़े लाल फूलों का गुच्छा और चमकदार मोटे हरे पत्तों के गुच्छे घाटी के बाकि फूलों से एकदम भिन्न रहते। 
साथ ही वसन्त के आगमन के साथ पहाड़ों की ऊँचाईयों में जमीं बर्फ पिघलना शुरु होती, जिससे गाँव के नाले रिचार्ज हो जाते व झरने अपने पूरे श्वाव पर रहते। नाले के किनारे बनी कृत्रिम झीलों में स्नान का अपना ही आनन्द रहता और गाँव का नाला दनदनाते हुए नदी तक बहता। 


शुक्रवार, 20 मार्च 2020

मेरा गाँव मेरा देश – मौसम वसन्त का, भाग-1


सर्दी के बाद वसंत की वहार

मैदानों में वसन्त का मौसम समाप्त हो चला, आम के बौर अपने चरम पर हैं, लेकिन चारों और पेडों में फूलों का अभाव थोड़ा खटकता है। गंगा तट पर खाली सेमल के विशाल वृक्षों में लाल फूलों को देखकर तसल्ली कर लेते हैं। वसन्त का वह फील नहीं आता, जिनसे बचपन की यादें डूबी हुई हैं, जब घाटी-गाँव में ठण्डी हवा के बीच तमाम पेड़ों की कौंपलें एक-एक कर फूट रही होती और रंग-बिरंगी सतरंगी छटा घाटी के माहौल में एक अद्भुत सौंदर्य एवं मोहकता की सृष्टि कर रही होती। आज इन्हीं यादों के सागर में डुबकी लगाकर बचपन से दूर गंगा तट से उन यादों को ताजा कर रहे हैं, जो वालपन के अनुभव का हिस्सा रही हैं।

मालूम हो कि ठण्ड में प्रकृति सुप्तावस्था में रहती है। हाड़कंपाती ठण्ड के बाद जब ऋतु करवट लेती है, तो वसन्त का मौसम दस्तक देता है। इसी के साथ जैसे ठंड़ में अकड़ी-जकड़ी प्रकृति अंगड़ाई लेती है। प्रकृति के हर घटक में एक नई चैतन्यता का संचार होता है। हमारे पहाड़ी गाँव-घाटी में वृक्षों में कौंपलें फूटना शुरु हो जाती, जिनसे एक-एक कर नाना प्रकार के पेड़ों से रंग-बिरंगे फूल खिलने शुरु हो जाते।
इसी के साथ हर गाँव के अपने देवता के लिए प्रख्यात इस देवभूमि में देवउत्सवों की श्रृंखला शुरु हो जाती, जिसमें बनोगी फागली, फाडमेह एवं गाहर फागली गाँव के प्रचलित देव उत्सव कुछ अन्तराल में मनाए जाते।

इनके साथ मेले-जात्रों की श्रृंखला वसन्त ऋतु के ही दौर में उल्लासपूर्वक मनाए जाते। गाँव का जबाड़ी मेला या स्यो-जाच, गाहर का बिरसु, काईस बिरसु एवं शाड़ी जाच आदि इसी दौर के सामूहिक लोक उत्सव रहते। इसी बीच में रंगों का उत्सव होली पड़ता।



यह समय बागवानी के हिसाब से भी विशिष्ट रहता। इसी बीच सेब व अन्य फलों के पौंधों के चारों ओर तौलिए बनाए जाते, उनमें खाद-पानी की व्यवस्था की जाती। इसके साथ यह ग्राफ्टिंग का सीजन रहता, जिसमें नयी कलमें लगाई जाती, क्योंकि इस वक्त पेड़ों की कोशिकाओं में सैप या जीवन रस अपने तीव्रतम गति में दौड़ रहा होता है।
मार्च-अप्रैल का माह गाँव की भेड़-बकरियों की देखभाल करने वाले पूर्णकालिक फुआलों के लिए विशेष रहता। आज इनकी संख्या बहुत घट चुकी है तथा हिमाचल के चम्बा क्षेत्र में इनका समुदाय गद्दी नाम से लोकप्रिय है।

वे पूरी तैयारी के साथ भेड़ बकरियाँ के झुण्डों के साथ पड़ोसी जिला लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते, जहाँ उनके चरने के लिए निर्धारित हरी घास से भरे बुग्याल इंतजार कर रहे होते तथा यहाँ कई दिनों की यात्रा के बाद नदी, पहाड़, दर्रों को पार करते हुए ये वहाँ पहुँचते और फिर अगले कुछ माह वहीं वास करते। प्रवास के इस काल के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री, राशन व अन्य सामान ये घोड़ों पर लादकर चलते। भेड़-बकरियों की रक्षा के लिए गद्दी, भोटिया या पहाड़ी कुत्तों का झुण्ड साथ में रहता।

मार्च माह की एक विशेषता बादलों की गड़गड़ाहट रहती, जिनके बीच गुच्छियाँ का सीजन भी शुरु हो जाता। यह मान्यता है कि बादलों के विस्फोट के बीच इनके बीज फूटते हैं व गुच्छी (मोरेल मशरुम) पनपना शुरु हो जाती हैं। खेत में निर्धारित स्थानों पर हम सुबह-सुबह इनको खोजने निकल पड़ते। कई बार इनके दर्शन गुच्छों में होते, तो कभी इक्का-दुक्का। 

इनके मिलने पर होने वाले विस्मय एवं खुशी के भाव देखते ही बनते। फिर घर में लाकर एक धागे में पिरोकर इनकी माला को सुखाने के लिए दिवारों पर रखते। बाजार में इनका अच्छा खासा दाम रहता। लेकिन बहुधा अधिक मात्रा में मिलने पर ताजा गुच्छी की सब्जी बनाकर खाते।

खेतों में गैंहूं, जौ की फसल पनप रही होती। साथ ही मटर, चना आदि दालों की फसलें लहलहाने लगती। सरसों के खेत तो अपनी वासन्ती आभा के साथ जैसे ऋतु दूत बनकर वसन्त के आगमन की दिगन्तव्यापी उद्घोषणा कर रहे होते। 

इसके साथ गैंहू के खेत के कौने में सजे जंगली फूल तथा पॉपी के काले धब्बे लिए सुर्ख लाल फूल हरे भरे खेतों के सौंदर्य में चार चाँद लगाते। ऐसे खेतों की गोद में बीते बालपन की अनगिन यादें सहज ही मन को प्रमुदित करती हैं, जैसे चित्त भाव समाधी की अवस्था में विचरण कर रहा हो।

यही दौर यहाँ सब्जी उत्पादन का भी होता। सब्जी की पनीरी बाजार से खरीद कर खेतों में रोपी जाती, जो अगले दो-तीन माह में कैश क्रोप के रुप में मेहनतकश किसानों का आर्थिक सम्बल बनती।(जारी)

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