हरिद्वार से उखीमठ
उत्तराखण्ड में गढ़वाल हिमालय के रुद्रप्रयाग जिले में
केदारनाथ के समानान्तर घाटी में स्थित महमहेश्वर प्रख्यात पंचकेदार में से एक है व
यात्रा के क्रम में द्वितीय केदार के नाम से भी जाने जाते हैं। यहाँ का अवलोकन अब
तक स्थानीय यू-ट्यूबर्ज के विडियोज में न जाने कितनी बार कर चुका था। लेकिन इसकी
जमीनी सच्चाई से अधिक परिचित नहीं था। जून के पहले सप्ताह में अचानक मित्र मंडली
के साथ यहाँ जाने की योजना बन गई, लगा बाबा का बुलावा आ गया।
लेकिन अपनी तैयारी को लेकर थोड़ा संशय भी था, कि 16 किमी की ट्रेकिंग
एक दिन में हो पाएगी या नहीं, वह भी 5,000 से 12,500 फीट की ऊंचाई तक। मदमहेश्वर
से जुड़े तमाम ब्लॉग्ज व विडियोज खंगाले, लगा कि उतना कठिन भी नहीं है। फिर
साथियों का उत्साह व जीवट देख लगा कि अपना अब तक का ट्रेकिंग अनुभव बटोरते हुए इसे
डेयर करते हैं, बाबा के धाम में जहाँ तक पहुँच पाए ठीक है, बाकि बाबा की इच्छा।
आवश्यक तैयारी – टॉफी चॉकलेट, बिस्कुट-नमकीन, मेवे, दवाईयाँ आदि
रास्ते के आवश्यक पाथेय जुटने शुरु हो गए। साथ में ट्रेकिंग शूज, पावर बैंक,
चार्जर आदि। ऊंचाई के हिसाब से अंतिम दिन के लिए गर्म कपड़े, टोपी, मफलर,
जुराबें, इन्नर वार्मर आदि। सबको अपने बैग में समेटते हुए एक पिट्ठू बैग तैयार हो
गया और कुछ आवश्यक सामान एवं तात्कालिक उपयोग की सामग्री के साथ एक साइड बैग।
हरिद्वार से यात्रा का शुभारम्भ होता है। 7 जून रविवार की प्रातः
छः बजे दे.सं. विश्वविद्यालय परिसर से निकल पड़ते हैं। आज की मंजिल थी मदमहेश्वर
की राह में पड़ने वाला अंतिम मोटरेवल सुंदर सा पहाड़ी गाँव रांसी, जो 7000 फीट की
ऊँचाई पर बसा है, जहाँ पर रुकने की उचित व्यवस्था है और यह महमहेश्वर यात्रा का एक
महत्वपूर्ण पड़ाव भी है, जो माता राकेश्वरी देवी के पौराणिक मंदिर के लिए प्रख्यात
है। रविवार के चलते ऋषिकेश से जाम शुरु हो जाता है, जो तपोवन से कुछ आगे तक यात्रा
में थोड़ा ब्रेक लगाता है। इसमें चार धाम यात्रियों के साथ राफ्टिंग वालों का भी योगदान
रहता है, जो जीप पर रॉफ्ट को लादे इस राह पर वहुतायत में मिलते हैं।
फिर आगे ब्यासी के प्रख्यात चौहान ढावे में नाश्ता करते हैं।
आलू-परांठा-दाल-दही, चाय के साथ पर्फेक्ट नाश्ता होता है, जो आगे की यात्रा के लिए
दल की बेट्री को चार्ज करता है। रास्ते में कोडियाला सदैव की तरह ध्यान
आकर्षित करता है, जो ठीक गंगाजी के किनारे बसा है और उस पार के उलट त्रिशंकु के
रुप में विराजमान हरे-भरे पर्वत को निहारने के लिए मजबूर करता है, जो किसी
ध्यानस्थ तपस्वी से प्रतीत होते हैं। इसी क्रम में शिवपुरी, ब्रह्मपुरी आदि
आते हैं। रास्ते में बजी जंपिंग के तामझाम भी ध्यान आकर्षित करते हैं और गंगा मैया
अपनी शांत नीली धारा के साथ कुछ दूर तक अपने पावन एवं शीतल स्पर्श का दिव्य अहसास
कराती रहती हैं।
रास्ते में हेमकुंड साहिब के श्रद्धालुओं का अलग ही नज़ारा दिखता है। कतार में बाइक के
आगे डंडे में फहराती धर्म-ध्वजा और श्रद्धालुओं का उत्साह नई ऊर्जा का संचार करता
है। पंजाब के मैदानों इलाकों से आए इन श्रद्धालुओं के लिए पहाड़ों में ड्राइविंग
अवश्य ही थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहती होगी, लेकिन उत्साह व आस्था के आगे ऐसी बाधाएं
नतमस्तक हो जाती हैं।
इसी रास्ते में पड़ती है तोता घाटी, जिसका अपना इतिहास है। यह
लैंडस्लाइड जोन के रुप में प्रख्यात है व यहाँ इसे रोकने के तमाम प्रयास देखे जा
सकते हैं। यहीं से आगे गढ़वाल हिमालय की पहाड़ियों की अंतहीन श्रृंखला के दर्शन भी
किए जा सकते हैं औऱ नीचे गहराई में गंगाजी का धीमी गति से बहता अविरल प्रवाह। सड़क
के किनारे तमाम ढावे और उनके बाहर सजे स्थानीय दाल, सब्जी, अदरक, बुराँश, मालटा
जैसे उत्पाद ध्यान आकर्षित करते हैं।
इसी क्रम में आता है देवप्रयाग का संगम, जहाँ अलकनंदा और
भगीरथी नदियाँ मिलकर गंगाजी का रुप लेती हैं। इससे थोड़ा पहले भारत की सबसे
ऊंची बज्जी जंपिंग का सेटअप भी देखने को मिलता है, जिसमें जावांज लोग इसके
दुस्साहसिक खेल का आनन्द लेते देखे जा सकते हैं। हमारे विचार में यह खेल सिर्फ अल्ट्राफिट
लोगों के लिए है, नहीं तो इसके झटके के साथ शरीर के अंग-अवयव व अस्थि-पंजर ढीले
पड़ सकते हैं, छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। ऐसी कुछ दुर्घटनाएं हाल ही में समाचारों
की सुर्खियाँ भी बनी हैं।
देवप्रयाग से मार्ग श्रीनगर की ओर बढ़ता है। रास्ते भर हेंमकुंड
साहिब जा रहे सिक्ख श्रद्धालुओं के झंडे लगे बाइक्स आते-जाते मिले। बापिसी में
झंड़े नदारद थे। कुछ लोग गाड़ियों में परिवारजनों व मित्रमंडली के संग जा रहे थे।
रास्ते में सड़क के किनारे लंगर की भी विशेष व्यवस्था दिखती है, जहाँ तीर्थ यात्री
भोजन-प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। रास्ते में कुछ यात्री बाइक में तिरंगा फहराए हुए भी
दिखे, जो प्राय़ः सोलो ट्रैव्लर ही अधिक मिले।
रास्ते में कीर्तिनगर से पहले मलेथा में रेलरूट का
कार्य जोरों-शोरों से चल रहा दिखा। इसके बाद आता है श्रीनगर शहर, जिसे माना
जाता है कि आदि शंकराचार्यजी ने स्वयं श्रीयंत्र के ऊपर स्थापित किया था। प्रवेश
करते ही गंगाजी का विस्तार एवं अविरल प्रवाह मन को बहुत सुकून देता है। रास्ते में
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय और थोड़ी आगे नदी के उस पार इसका चौरास कैंपस
चर्चा का विषय बनते हैं।
श्रीनगर के बाद जलप्रयोजना के चलते झील या डैम का रुका पानी दिखता है,
जिसके किनारे बढ़ते हुए माता धारीदेवी का सिद्ध मंदिर आता है। यहाँ काफी
भीड़ लगी थी, हम लोग दूर से ही प्रणाम करते हैं। रुद्रप्रयाग से थोड़ा पहले झील के
बैक वाटर में रेतीले किनारों पर लोगों को स्नान व जलक्रीडा का आनन्द लेते देखा,
निश्चित रुप से अलकनंदा का हिमालय टच वाला जल डुबकी लगाने वालों को तरोताजा कर रहा
होगा।
आगे से बायीं ओर मुड़ कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में
थोड़ी दूरी पर दायीं ओर पड़ता है रुद्रप्रयाग संगम, जहाँ अलकनंदा और
मंदाकिनी नदी का संगम होता है। यहाँ तक चार धाम यात्रियों की भीड़ मिलती है। अब हम
आगे मंदाकिनी नदी के मंद-मंद प्रवाह के साथ आगे बढ़ रहे थे। आगे अगस्तमुनि
कस्बा आता है। माना जाता है कि अगस्त मुनि ने यहाँ तप किया था। मालूम हो कि अगस्त
मुनि रामायण काल के एक मूर्धन्य ऋषि थे, जो अध्यात्म विद्या के ज्ञान औऱ विज्ञान
दोनों पक्षों में पारंगत थे। इनकी सिद्धियों के भय से रावण व उसकी राक्षस मंडली
इनके आश्रम की ओर झांकने का तक दुस्साहस नहीं कर पाती थी।
वनवास के दौरान श्रीराम और महर्षि अगस्त्य का मिलन रामायण की
एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी घटना है। जिसमें उन्होंने श्रीराम को
देवताओं के राजा इंद्र द्वारा दिए गए कई दिव्य अस्त्र शस्त्र भेंट किए। इनमें एक
दिव्य धनुष, कभी न खाली होने वाला अभेद्य तरकस शामिल थे। महर्षि अगस्त ने ही
श्रीराम को सुंदर एवं रमणीय स्थल पंचवटी जाने की सलाह दी थी। महर्षि अगस्त्य ने
श्रीराम को स्मरण दिलाया था कि वे राक्षसों को खत्म करने औऱ दुनियाँ में धर्म की
रक्षा करने के लिए ही इस धरती पर आए हैं। इस मिलने ने श्रीराम को और अधिक
शक्तिशाली बना दिया और उन्हें अपनी आगे की यात्रा के लिए सही दिशा दिखाई।
अगस्तमुनि के थोड़ा आगे मंदाकिनी नदी के किनारे एक एकांतिक ढाबे में दोपहर
का भोजन करते हैं। यहाँ से तरोताजा होकर मंजिल की ओर बढ़ते हैं, जिसके रास्ते में
आता है कुंड, यहाँ से वायीं ओर पुल पार करते ही रास्ता केदारनाथ की ओर
बढ़ता है। हम दायीं ओर के मार्ग से आगे बढ़ते हैं। अब तक बाहर मौसम गर्मी का अहसास
करा रहा था, हिमालय टच बाली आवोहवा नदारद थी। यहाँ से अभिसिंचन भी शुरु हो जाता
है, जिसे हम एक शुभ लक्षण मान रहे थे।














