शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-7 (अंतिम किश्त)

बनतोली से गौंदार, राँसी और घर बापिसी


बनतोली में रात की नींद लेकर सुबह उठते हैं, उठने में काफी मश्क्कत करनी पड़ रही थी, लोअर बैक व पीठ में चोट का तीखा अहसास हो रहा था। लेकिन पूरा जोर लगाकर हम खुद ही किसी तरह उठ गए, यह बड़ी बात थी। तैयार होकर बाहर बरामदे में बैठते हैं, तो सामने घर के बग्ल से बह रही मधुगंगा की गर्जन-तर्जन का शोर सुनने लायक था, पास के हरे-भरे पहाड़ दर्शनीय लग रहे थे, जो सुबह की धूप में खिल रहे थे। यहाँ से गौंदार साइड का नज़ारा भी स्पष्ट था। कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में बसा यह गाँव जैसे पुनः आने का निमंत्रण दे रहा था।

यहाँ से विदा लेकर हम बनतोली संगम तक पहुंचते हैं। रास्ते में संगम व गौंदार साइड का नज़ारा देखने लायक था और दायीं ओर से बह रही मार्कण्डगंगा नदी की सांय-सांय ध्वनि। कुछ ही देर में लोअर बन्तोली से होकर संगम पहुँचते हैं। यहाँ कुछ पल रुकते हैं, सभी अपने-अपने ढंग से रिफ्रेश होते हैं। पुलिया को पार कर कुछ यादगार पल कैमरे में कैद करते हैं।

चढ़ाई को पार करना पहली चुनौती थी, जिसको दोनों साथियों की सहायता से पार करते हैं और ऊपर पहुँचकर झुला पुल के सामने विश्राम करते हैं तथा पीछे के रास्ते का अवलोकन करते हैं कि हम चोटिल अवस्था में ही कैसे 10-11 किमी पार कर चुके हैं। लगा कि ऐसे ही अगले 5-6 किमी भी पूरा कर लेंगे। थकान व चोटिल होने का अहसास गहन था, लेकिन आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। दमभर कर यहाँ से आगे बढ़ते हैं।

यहाँ से रास्ते में लैंडस्लाइड वाले चढ़ाईदार पैच के बाद सीधे रास्ते से गौंदार पहुँचते हैं, जहाँ हमारे बिछुडे सहचर डॉ. मुकेशजी मिलते हैं। नेटवर्क बाधित होने के कारण पिछले दो दिन इनसे संपर्क-संवाद नहीं हो पाया था। आँख मिचौली करते हुए हम लोग एक दूसरे से अलग चल रहे थे। अतः इस अनुभव के आधार पर यह सीख मिली कि टीम के सभी सदस्यों को साथ चलना चाहिए, क्योंकि नेटवर्क की समस्या के चलते कहीं भी एक दूसरे से बिछुड़ सकते हैं। इस रुट पर ट्रेक करने वाले पाठक हमारे इस अनुभव से यह सीख ले सकते हैं। वाकि सब बाबा भोलेनाथ की इच्छा, वो जो करे सो कम है।

गौंदार में हिमालयन होमस्टे के ढावे में पोहा चाय का आर्डर देकर नाश्ता करते हैं। यहीं पर लम्बी दाढ़ी, सर पर हैट, आँखों पर काला चश्मा और रोबिले अंदाज बाले एक बाबाजी से भेंट होती है, लगा भोलेनाथ ही इनसे मुलाकात करवा रहे हों। क्योंकि जीवन के कुछ अनमोल विचार मोती इनसे मिलने वाले थे। भारत की सुरक्षा सेवा से रिटार्य ये सज्जन हिमालय के हर ट्रेक, दर्रे व बुग्याल का चप्पा-चप्पा छान चुके हैं और मोटर वाईक में हिमालय में स्थित मुख्य देशों को सोलो बाइक राइडर के रुप में कवर कर चुके है, जिसका इनके नाम गिन्निज बुक रिकॉर्ड दर्ज है। पहले तो हम लोग औपचारिक बात ही करते रहे, लेकिन जब बातों-बातों में इनकी खूबियों से परिचित होते हैं, तो संवाद गहरा होता गया।

धीरे-धीरे हम इनसे खुलते हैं और चाय-नाश्ते पर गहन-गंभीर चर्चा होती है, इनके सात-साढ़े सात दशक के जीवन के मंथन से निकले अनुभूत सुत्र सीधा ह्दय को भेद रहे थे, अंतरात्मा को स्पर्श कर रहे थे। हमारे हिमालय, प्रकृति व अध्यात्म प्रेम को देखते हुए इन्होंने विश्व विख्यात योगी स्वामी राम की लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्ज पुस्तक का सुझाव दिया, जिसको ये कई बार पढ़ चुके थे। पढ़ने के वाद हम भी हिमालय प्रेमी जीवात्माओं को इस पुस्तक पढ़ने का सुझाव देते हैं। पुस्तक में हिमालय की गोद में साधु महात्माओं, सिद्धों व योगियों के दुर्लभ संस्मरण भरे हुए हैं, साथ में अध्यात्म पथ की अनुभूत सीख निहित है। साथ ही युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्य़जी की पुस्तक सुनसान के सहचर को भी पढ़ने का सुझाव देते हैं, जिसमें आचार्य़जी के दुर्गम हिमालय में बिताए पलों को बहुत ही रोचक, रोमांचक एवं प्रेरक यात्रा वृतांत उपलब्ध हैं, जो पाठकों को हिमालय की गोद में प्रकृति के हर घटक से कुछ सीखने की प्रेरणा देती है।

इनसे बिदा लेकर फिर हमारा चार लोगों का दल एक साथ राँसी के लिए निकल पड़ता है। रास्ते में लोहे की पुलिया के उस पार पहली चुनौती पर काम चल रहा था और इस बार हम ढलानदार निर्माणाधीन चौढ़े रास्ते से होकर ऊपर मुख्य मार्ग तक पहुँचते हैं। संभवतः खच्चरों के लिए यह रास्ता तैयार किया जा रहा था। पूरे दल के सहयोग व डॉ. सौरभजी के पीठ से सहारा लेते हुए चढाई पार होती है। इस पैच पर काम देखते हुए लगा कि अगले दिनों यह रास्ता यात्रियों के लिए सरल-सामान्य हो जाएगा।

आगे जिगजैग सड़क से होते हुए वही विरान गाँव, नीचे मधुगंगा, उस पार जंगल और झरने, रास्ते का वही चट्टान काटकर बना मार्ग और फिर पहाड़ी झरने पर बना वह छोटा सा तालाव। रास्ते में जिगजैग रास्ते से कुछ साहसी युवा शॉर्टकट मार चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जो किसी रुप में सुरक्षित नहीं था। इन पत्थरीले शॉर्टकट्स में पत्थरों के स्लाइड होने व स्वयं भी फिसल कर गिरने का खतरा किसी भी दुर्घटना का कारण बन सकता है। अतः यात्रियों को सुझाव दिया जाता है सीधे राजमार्ग से ही अपनी यात्रा भोलेनाथ को याद करते हुए कुशलतापूर्क पूरा करें।

रास्ते में प्यास कुछ इस कदर लग रही थी कि जहाँ भी जल का स्रोत दिखता, लगता कि इसे पूरा पी डालें। साथ में पहाड़ी चश्मे का जल व नींबूज हमारी इस प्यास का शमन कर रहे थे। झरने के पहले घाटी में किसी पेड़ में छिपे पपीहे पक्षी की आबाज़ का दर्द हम आज पहली बार इतनी गहराई से अनुभव कर रहे थे, जो माना जाता है कि वरसात के जल से पतों पर एकत्र होने वाली बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है।

रास्ते में एक पाइप से ऊंचे किसी चश्मे का जल सड़क तक आ रहा था, इससे अपनी बोटल भरते हैं। इसी के कुछ दूरी पर झरने से बना तलाव था। हमारे साथी इसमें डूबकी लगाने व स्नान का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हम भी इसका जल अपनी बोटल में भरना नहीं भूले। यहीं पास के स्टाल में पहाड़ी लूण (नमक) लगे खीरे की दो प्लैट लगाते हैं, जिसका स्वाद प्यासे मन को अलग ही अंदाज में तृप्त कर रहा था।

फिर चल पड़ते हैं चीढ़, बाँज व अन्य हरे-भरे वृक्षों के बीच अगतोलिधार की ओर, जो अब मुश्किल से दो-अढाई किमी रहा होगा। रास्ते में एक छोटा सा जलस्रोत, इससे झरती जल की सहस्र धाराएं मिलती हैं, लगा कि यह इस रुट का अंतिम झरना है। यहाँ बैठकर कुछ पल बिताते हैं, इसकी कल-कल बहती धार को जेहन में उतरते अनुभव कर शांति व शीतलता का गाढ़ा अहसास पाते हैं।


साथ ही इसकी यादगार क्लिप बनाते हैं, इन अनमोल पलों को पुनः स्मरण करने के लिए। इसके स्पर्श के साथ रिफ्रेश होकर कुछ ही मिनट में हम बेरिकेट के पास थे, जहाँ से आगे यात्रियों की मोटर बाइक्स और गाड़ियां खड़ी थीं। स्टेंड पर पहुंचकर एक जीप में बैठकर राँसी पहुँचते हैं। रास्ते में दूर से ही भगवती राकेश्वरी माता को प्रणाम करते हैं, क्योंकि अब बापिसी में वहाँ तक चलना हमारे लिए संभव नहीं था।

राँसी में खड़े वाहन में समान लादकर चल पड़ते हैं, बापिसी के सफर में। हमें आश्चर्य हो रहा था कि हम सही सलाम अपनी चोटिल अवस्था के साथ 16 किमी ट्रेक पूरा कर चुके थे। हमारा व साथियों का श्रम, सहयोग, शौर्य, पराक्रम व टीम भाव किसी भी रुप में महावीर चक्र विजेता से कम नहीं लग रहा था। बाकि भोले बाबा व भगवती की कृपा, गुरुसत्ता का संरक्षण सब मिलकर हमें यहाँ तक सकुशल पहुँचा रहे थे। बाकि शरीर की टुटफूट की मुरम्मत अब घर जाकर चिकित्सा मंदिर (हॉस्पिटल) में होनी थी।

रास्ते में उनियाना के सीढ़ीदार खेत को कैप्चर करना नहीं भूले। इसी तरह मधुगंगा का पुल, फिर मोनसुना मार्केट, रास्ते का झरना व फिर ऊखीमठ। यहीं रास्ते में एक ढावे में भोजन करते हैं, लस्सी के साथ पूर्णाहुति करते हैं, अब कुछ भूख खुल गई थी। यहाँ से अगस्तमुनि होते हुए रुद्रप्रयाग पहुंचते हैं इसके आगे भयंककर बारिश शुरु हो गई थी, पहाड़ से गिरते पत्थर ने रास्ते को थाम रखा था। रास्ता जाम था, वग्ल के होटल से चाय मंगाकर चाय की चुस्की का आनन्द लेते हैं। आधे घंटे बाद रुट खुलता है, पहाड़ से सरकते पत्थरों के बीच ही किसी तरह आगे बढ़ते हैं और श्रीनगर पहुंचते हैं। यहाँ आसमान में डूबते सूरज की लालिमा बादलों के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रही थी। आगे रास्ते में अंधेरा हो चुका था, अंधेरे के बीच सरपट दौड़ता वाहन कब तोता घाटी पार करता है, पता ही नहीं चला और हम ऋषिकेश पहुँच चुके थे। रास्ते में रायवाला में रात का भोजन और फिर रात ग्यारह बजे परिसर में पहुँचते हैं।

बाबा का बुलावा पूरा हो चुका था, उनके दिव्य प्रसाद के साथ, लगा हमारे किसी जटिल प्रारब्ध का हल्के में उपचार हो रहा था और अब इनकी सफाई धुलाई शेष थी। इस क्रम में चिकित्सकों से परामर्श, तन की आधि का निदान, फिर तीन दिन की अस्पताल भर्ती और बेड रेस्ट। इसी के बीच कुछ समय निकालकर यात्रा की स्मृतियों की जुगाली करते हुए यह यात्रा वृतांत तैयार होकर आप तक पहुँच रहा है। लगभग डेढ़ दो माह बाद आंशिक रुप से बाहर निकलना शुरु हो गया है।

अंत मैं इस यात्रा के सार सबक एक बार पुनः एक जगह उन सुधी पाठकों के लिए शेयर करना चाहूँगा, जो हमारी तरह महमहेश्वर या किसी अन्य लम्बे ट्रेक पर ट्रेकिंग या तीर्थाटन के लिए निकलने वाले हों –

  • 1.    कभी भी हमारी तरह उठकर यात्रा पर न निकलें, विशेषकर जहाँ ट्रेक लम्बा हो। इसके लिए तीन-चार सप्ताह पहले नित्य पाँच किमी चलने का अभ्यास करें। नित्य न्यूनतम दस हजार कदमों को चलने का अभ्यास तो सदा ही करते रहें। इतना करने पर यात्रा आनन्दपूरित रहेगी, अन्यथा यात्रा एक सजा देने वाला अनुभव बन सकती है।
  • 2.    अपने बजन पर अवश्य ध्यान रखें, अपनी ऊंचाई व उम्र के हिसाब से बजन को दुरुस्त रखें। आवश्यकता से अधिक शरीर का बज़न लम्बे ट्रेक पर एक बोझ बनता है औऱ गिरने पर अधिक चोटिल होने की संभावना रहती है।
  • 3.    पीठ के बैग को जितना हल्का हो सके रखें। अति आवश्यक कपड़े व अन्य समान ही साथ रखें। खास कर लम्बी दूरी के ट्रेक पर या ऊंचाई पर चढ़ते हुए जब शरीर को ढोना ही कठिन पड़ने लगता है, तो अनावश्यक सामान का बोझ यात्रा के आनन्द पर भारी पड़ने लगता है।
  • 4.    सभी एक साथ यात्रा करें, थोड़ा आगे पीछे भी होते हैं, तो नजरों से ओझल न हों, दलनायक की देखरेख में रहें व मिलकर सफर पूरा करें। एक दूसरे से बिछुड़ने पर कई रुपों में यात्रा के आनन्द में खलल पड़ सकता है।
  • 5.    आवश्यक फर्स्ट एड व दवाईयाँ साथ में रखें, एक व्यक्ति के पास इन्हें रख सकते हैं, लेकिन आवश्यक दवाइयों सभी अपने बैग में रखें, किसी कारणवश बिछुड़ने पर फिर ये काम आ सकेंगी।
  • 6.    नए रास्ते पर स्थानीय लोगों से मार्गदर्शन लें, आवश्यक हो तो गाइड भी ले सकते हैं। रात के सफर करने से बचें, अंधेरे में ट्रेक के जोखिम भरे बिंदुओं को पार करने में दिक्कत आ सकती है, दुर्घटना भी हो सकती है।
  • 7.    एक ही दिन में यात्रा पूरी करने की जिद्द न रखें। यात्रा में मंजिल पहूंचना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, रास्ते का पूरा आनन्द लेते हुए चलना ही श्रेष्ठ नीति रहती है, अतः एक-दो दिन का मार्जन अवश्य रखें।

इतना ध्यान रखेंगे, तो आप यात्रा या ट्रेकिंग या तीर्थाटन का पूरा आनन्द ले पाएंगे और उस मकसद को बखूवी पूर्ण कर पाएंगे, जिसको लेकर आप इस यात्रा पर कदम बढ़ाए थे।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-6

बापिसी यात्रा - मदमहेश्वर से बनतौली

महमहेश्वर की सुबह – रात को सोते-सोते 12 बज गए थे। ठंड व थकान इतनी थी कि मोटे कम्बलों के बीच घुसकर कब नींद आई पता ही नहीं चला। सुबह 6 बजे नींद खुल गई थी। तम्बू की चैन खोलकर देखते हैं, तो बाहर खोरशू के बड़े-बड़े पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे और मैदान का कौना जंगली पालक घास से अटा पड़ा था।

तम्बू से बाहर निकलकर एक वार पूरा नज़ारा निहारने का मन हुआ। डॉ. सौरभजी जुत्ता पहनने के लिए कह रहे थे, लेकिन हम ट्रेकिंग शूज पहनने की जटिलता से बचने के लिए राँसी से खरीदी नई चप्पल को आधा पैर में फंसाकर बाहर निकल पड़ते हैं। हमारा तम्बू खेत के कौने में था और वाकि तम्बू कतार में सजे थे। पीछे दायीं ओर बाबा का मंदिर और चारों ओऱ का विहंगम दृश्य देखकर आल्हादित था। रात भर सांय-सांय करती नदीं प्रवाहित होने की ध्वनि आ रही थी, वो मधुगंगा थी।

एक हाथ में डंडा व एक हाथ में मोबाइल लिए हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे, कि सामने वाले तम्बू के पीछे जल निकास के लिए बनी छोटी सी नाली की चिकनी मिट्टी में हम अचानक फिसल गए। मोबाइल व डंडा हाथ से छूट चुका था और पीठ में बिजली कौंधने के साथ एक चट्टाका सा हुआ। और गिरने के बाद उठने में बहुत दर्द हो रहा था। हमारे दोनों साथी और नीचे आ रहे एक दूसरे तम्बू के सज्जन मिलकर हमें उठाते हैं और तम्बू के अंदर लिटाते हैं। हम पीठ के बल लेट कर विश्राम करते हैं। लगा कि हम तम्बू में विश्राम करें तो वेहतर रहेगा, दो किमी ऊपर बुढ़ा केदार जाना हमारे लिए ऐसे में ठीक नहीं होगा। बाकि विश्राम के बाद ठीक होने पर मंदिर दर्शन कर लेंगे।

हमारे साथी लोग मंदिर दर्शन कर ऊपर बुढ़ा केदार के लिए निकल पड़ते हैं। हम तम्बू में लेटे विश्राम करते हैं। हम पीठ के बल लेट पा रहे थे, जबकि थोड़ी मेहनत के साथ दायीं ओर वांए भी करवट ले पा रहे थे, लेकिन उठ नहीं पा रहे थे, जिससे कि पालथी मार कर बैठ सकें। हमें लग रहा था कि लोअर बैक में चोट आयी है। ऐसे में लग रहा था कि चलना तो दूर, खच्चर की पीठ पर भी चढ़ नहीं पाएंगे, क्योंकि उसमें कदम पर सीधे झटके लगते हैं। कई बार कोशिश कर पाने के वावजूद उठ न पाने के कारण व हो रहे दर्द के चलते हम हेल्थ एंग्जाइटी के दौरे में उलझ चुके थे व एक ही विकल्प सूझ रहा था कि किसी तरह एयर लिफ्ट किया जाए। लेकिन इस दूर दराज इलाकें में यह कैसे संभव होगा। लगा कि उत्तराखण्ड तो हेली सेवा की बहुत चर्चित है, इसकी व्यवस्था कर लेंगे।

इस दृष्टि से अपने पॉकेट डायरी में मुख्य नाम व फोन लिख देते हैं, ताकि आपात सेवा में जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इन दो-तीन घंटों में जीवन की पूरी पिक्चर रील की तरह आँखों के सामने तैर जाती है। लगा कि महादेव द्वारा हमारे प्रारब्ध कर्मों की गहन चिकित्सा हो रही है। उनके धाम में, उनके द्वार पर, उनके चरणों में आकर ऐसी घटना बिना कारण तो हो नहीं सकती। कोई बड़ी घटना छोटे में टल रही है। इसका आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए मन को समझा रहे थे, लेकिन यक्ष प्रश्न एक ही था कि हम बापिस 16 किमी ट्रेक कर वाहन तक कैसे पहुँचेंगे।

तम्बू बंद था, धीरे-धीरे धूप निकल रही थी, तम्बू गर्म हो रहा था। और बड़े-बड़े मच्छर तम्बू में विचरण कर रहे थे, लेकिन वो काट नहीं रहे थे। किसी तरह पैर से जुराब उतारकर अंगूठे से तंबू के अंदर के फाटक की जंजीर खेंचते हैं। तम्बू में रोशनी के साथ हवा का शीतल झौंका आता है, कुछ राहत मिलती है। लाठी के सहारे उठने की तमाम कोशिश की, लेकिन नहीं उठ पा रहा था। ऐसे थक-हार कर आंखें बंद कर भोले बाबा व गुरुसत्ता को याद करता हूँ व अपने अस्तित्व का पूरा मंथन चलता है।

हमारे साथियों को भी जब वे गए थे तो इसका अनुमान नहीं था। वो सोचे थे कि कुछ चोट आई है, विश्राम करेंगे तो बापिस जाने के लायक हो जाएंगे। जब वे दो-तीन घंटे बाद आते हैं तो उनसे अपनी स्थिति को स्पष्ट करता हूँ और एयर लिफ्ट का विचार सामने रखता हूँ। बिना किसी हेलीपेड के यह कैसे संभव है, यह बात सामने आई। फिर इस विकल्प के हटते ही दूसरा विकल्प आया कि स्ट्रेचर के सहारे बापिस जा सकता हूँ। लेकिन यहाँ इसकी आपात व्यवस्था है भी कि नहीं, यह प्रश्न उठा।

हमारी स्थिति का आंकलन करते हुए दोनों साथी हमको दोनों हाथ व कंधों से पकड़कर खड़ा करते हैं, जिसमें हमें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई। मैं दो डण्डों के सहार खड़ा हो पा रहा हूँ, देखकर मैं अचंभित था। दोनों लाठी के साथ हमें चलने में कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही थी, हाँ सीढ़ी व खाई में काफी संभलकर चलना पड़ रहा था। लेकिन गिरने व चोटिल होने का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य साथ में था। ईश्वरीय कृपा से व साथियों के सहयोग से हम धीरे-धीरे एक-एक साइकोलॉजिक्ल बैरियर टूट रहे थे।

जुत्ता पहन, दोनों हाथों में डंडे लेकर साथियों की सहायता से हम थोड़ा ऊपर आते हैं। एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं, ऊंची कुर्सी में भी बैठ पा रहा हूँ, देखकर राहत मिलती है। तम्बू का बाकि समान भी पैक होकर आता है। स्वतः ही सीट पर बैठने व चलने के विश्वास के साथ हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए, मुख्य मार्ग पर आते हैं, वहीं से बाबा को प्रणाम कर पीछे मुख्य ऑफिस तक आते हैं, वहाँ किसी तरह फ्रेश होते हैं, चाय नाश्ता करते हैं। भूख मर चुकी थी, अपनी पसंदीदा मैगी खाने का कोई मन नहीं कर रहा था, किसी तरह से कुछ चम्मच लेते हैं, चाय-विस्कुट उदरस्थ करते हैं, क्योंकि साथियों द्वारा मंदिर के पास के डॉक्टर से लाई गई पेन किल्लर लेनी थी।

कल रात को दिल्ली से आई ट्रैकर, जिसको हम लोग अंधेरे में सहायता किए थे, वह भी रास्ते में मिली, सही सलामत बापिस जा रही थी। रात के सहयोग का आभार व्यक्त करती हुई वह हमें एक स्प्रे गिफ्ट करती हैं, जो मस्ल पैन से राहत देने के लिए थी। लगा कि कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही रहता है। इस तरह बाबा को दूर से ही प्रणाम कर हम लोग बापिस रांसी की ओर चल पड़ते हैं।

शुरु के सीधे रास्ते चलने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। फिर जहाँ सीढ़ी आती, वहाँ लाठी के सहारे इसको भी संभलकर पार करते गए। हम चल पा रहे हैं, हमें विश्वास नहीं हो रहा था। हम अपनी स्थिति देखकर प्रमुदित थे, कहाँ एयर लिफ्ट और स्ट्रेचर से चलने की बात और कहाँ हम दो लाठियों के सहारे चल रहे थे। लगा जैसे बाबा व गुरुसत्ता की कृपादृष्टि प्रत्यक्ष हमें चला रही है और इस तरह अढाई किमी नीचे कूनचट्टी तक पहुँच चुके थे।

कून चट्टी के नीचे बारिश शुरु हो गई थी। सो रेन कोट को ओढ़कर चलते हैं। कुछ लोग खड़ी चढ़ाई में शॉर्टकट मार रहे थे, वह भी पीठ मे समान लादे, जो हमें बहुत खतरनाक प्रयोग लग रहा था। क्योंकि बैग के साथ एक कदम भी पैर फिसलने के परिणाम बहुत घातक हो सकते थे। उन्हें इसके बार में सचेत भी करते हैं। स्थानीय लोग इन शॉर्ट कट में चलने के आदी होते हैं, उनकी नकल नहीं की जा सकती। बीच में बारिश थमती है, तो आगे नीचे घाटी का रास्ता स्पष्ट दिख रहा था।

जहाँ विश्राम करते, वहाँ से नीचे का दृश्य कैप्चर करना नहीं भूलते। क्योंकि थकने पर कुछ पल का विश्राम और प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों के देखकर नई ऊर्जा पाते। दूसरा चढ़ाई में नीचे के दृश्यों पर उतना ध्यान नहीं था, क्योंकि दृष्टि सीधा आगे व ऊपर मंजिल की ओर थी। लेकिन उतराई में नीचे घाटी और दूर पर्वत श्रृंखलाओं के नजारे बहुत स्पष्ट रुप में दिख रहे थे। सो यथासंभव इनको कैप्चर करते रहे।

इस तरह हम नानू चट्टी के पहले की दुकान तक पहुँचते हैं, जहाँ चढ़ते समय मैगी खाई थी। आज यहाँ पराँठा आर्डर करते हैं। लेकिन परांठा खाने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह एक तिहाई खाते हैं। हमारी भूख ही मर गई थी। इसी बीच पाँच युवा आते हैं और सीधे दस पराँठा आर्डर देते हैं। हम सोचते ही रह गए की ये कौन हैं, जो इतना पराँठा खाने का कांफिडेंस लिए हैं। 

बात करने पर पता चला कि ये छत्तीसगढ़, राजनंदगाँव से आए हैं। फिर तो उनसे चर्चा होती है तथा परिचय ओर सघन होता है। ये सुपर फिट युवा थे अपने बीस-पच्चीस की वय में। ये सुबह राँसी से चले थे, और आज ही बुढ़ा केदार से होकर नीचे बापिस हो रहे थे। यह अपवाद श्रेणी के वो ट्रेकर थे, जो लम्बे ट्रेक के अभ्यस्थ रहते हैं तथा इनकी संख्या पाँच-सात प्रतिशत रहती होगी।

यहाँ से नीचे उतरते हैं, तो बारिश और तेज हो जाती है। अब बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।


लग रहा था कि चढ़ाई में तो बाबा ने हमको वख्श दिया था, लेकिन उतराई में हमारे सारे प्रारब्ध कर्मों को धोने जा रहे थे। इसी बारिश में हम लोग खट्टरा पहुँचते हैं, यहीं रास्ते में चंडीगढ़ से आए सज्जन मिले, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को श्रवण की भाँति तीर्थाटन के लिए लाए थे। माताजी का जीवट अभी उताराई में भी बैसे ही बर्करार था।

खट्टरा तक अंधेरा हो चुका था, हम अपने मोबाइल टॉर्च के सहारे नीचे उतर रहे थे। घुटने की नीचे की पिंडलियाँ जोर पकड़ रहीं थी और पैर शरीर का भार उठाने में असक्षमता जाहिर कर रहे थे। इसी तरह हम कल सुबह के टीन शैड़ वाले उस बिंदु को पार करते हैं। रात को यह बंद हो चुका था। सौरभजी हमें सहारा देकर नीचे उतरने में मदद कर रहे थे। रजतजी रोशनी के साथ रास्ता स्पष्ट कर हमारा सफर सरल बना रहे थे।

इस तरह तेज बारिश के बीच हम कल के रिंगाल जंगल व बुराँश पेड़ इलाके को भी पार करते हैं। इसके बाद अंतिम दो जिगजैग ट्रेक रात के इतना लम्बे लग रहे थे कि खत्म होने का ही नाम नहीं ले रहे थे। अंत में कौने पर पहुँचने पर बनलौती के  भवनों की रोशनी टिमटिमाती दिखती है, तो कुछ राहत मिलती है। लेकिन गांव में प्रवेश तक के कुछ सौ मीटर भी कई किमी जैसे लग रहे थे। पैर जैसे जबाब दे चुके थे।

इस रुट पर बिना तैयारी, हमारी तरह चल चुके यात्री इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहे होंगे। लो वह ठिकाना आ गया, जहाँ हम कल सुबह नाश्ता किए थे, यहाँ लोगों की चहल-पहल थी, भोजन पानी चल रहा था, पता चला कि यहाँ रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ अंदर सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते हुए कमरे तक पहुँचते हैं। और गर्म पानी में हाथ पैर धोकर, सरसों के तेल की मालिश कर सोते हैं। चाबल रोटी, आलू-सोया बडी, दाल का बेहतरीन एवं पसंदीदा भोजन आता है, लेकिन हमारी भूख मर चुकी थी। भोलेनाथ की कृपा का आभार व्यक्त करते हुए बिस्तर मे जाते हैं कि आज की 10 किमी की यात्रा इस अवस्था में पूरी हो गयी थी। (जारी, अंतिम किश्त, अगला भाग-7 बनतौली से रांसी वाया गौंदार और घर बापिसी)

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-5


नानू से मदमहेश्वर

अब बारिश थम चुकी थी। नानू चट्टी से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद अब ऊपर का जिगजैग मार्ग दूर तक दिख रहा था, जिसमें यात्रियों का आवागमन चल रहा था। ऊपर से बापिस आ रहे यात्रियों में कुछ ही चुस्त-दुरुस्त अंदाज में नीचे उतर रहे थे। अधिकाँश की चाल में थकान व ठहराव दिख रहा था। कुछ तो नंगे पैर ही धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, स्पष्टया पैर में छाले पड़ने के कारण उनको चलने में दिक्कत हो रही थी। कुछ किसी तरह स्वयं को नीचे घसीट रहे थे।

स्पष्ट है कि यह ट्रैक यात्रियों से पूरी तैयारी की माँग करता है। उत्साह में उठकर किसी के कहने पर चल देने वालों के लिए यह ट्रेक नहीं है। जो पहले से ही लम्बी यात्रा के अभ्यस्त हों या इसके लिए पर्य़ाप्त तैयारी करके आए हों, उनके यह ट्रेक पूरे एडवेचर एवं आनन्द से भरा हुआ है। क्योंकि इसकी खूबी इसकी प्राकृतिक समृद्धता है, जो अभी अपने नैसर्गिक रुप में बर्करार है। लेकिन ट्रैक की चढ़ाई अपनी जगह चुनौतियों के पहाड़ की तरह यात्रियों की कदम-कदम पर परीक्षा लेने के लिए तैयार दिखती है। ऐसे ट्रेक में सही जुत्तों का भी अपना महत्व रहता है। यदि जुत्ते सही न हों तो येही रास्ते का एक बड़ा व्यवधान बन जाते हैं, जो इस रुट पर दिखा रहा था। कुछ लोग जुत्ता उतारकर नंगे पैर ही नीचे उतर रहे थे।

हर-हर महादेव की गुंजार आते-जाते यात्रियों के उत्साह में बर्धन कर रहा था। थोड़ी ही देर में हम एक ऐसी जगह पहुंचते हैं, जहाँ सड़क के ऊपर नीचे दो-चार दुकानें सजीं थी। यहाँ रिफ्रेशमेंट के लिए यात्रियों की भीड़ लगी थी। हम नीचे वाले ढावे में प्रवेश करते हैं। यहाँ मैगी और चाय का आनन्द लेते हैं। हालाँकि स्वाद में राँसी वाला स्वाद नहीं था, लेकिन इस ऊंचाई व विरान इलाके में पेट भरने की यह कामचलाऊ व्यवस्था भी कम नहीं थी। यहाँ भी पूरा परिवार इस कार्य में लगा दिखा।

यहाँ से आगे का जिगजैग रास्ता काफी दूर तक स्पष्ट दिख रहा था। और बीच में काफी सीधा भी। रास्ते में खड़ी चट्टानें व गहरी खाइयाँ स्वागत कर रही थीं, जो कई हजार फीट नीचे सीधे नीचे मधुगंगा की ओर ईशारा कर रही थीं। लेकिन रास्ते का प्राकृतिक सौंदर्य़ इन खतरों पर भारी था, अतः ध्यान अपने रास्ते पर रहता है, जहाँ थोड़ा दम भरते, वहाँ से सामने व चारों ओर के नजारों पर भी एख नज़र डालते, जो काफी सुकूनदायी व ऊर्जा भरने वाला रहता।

बता दें कि इस रुट में खड़ी चढ़ाई के बाद, जहाँ भी थोडा सा सीधा रास्ता मिलता, वहीं कुछ राहत का भाव जागता, क्योंकि सीधी खड़ी चढ़ाई में सांस फूल रही थी। ऊंचाई 9000 फीट से अधिक बढ़ने के साथ ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा था, फैफड़े को अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरुरत महसूस हो रही थी, जिस कारण दिल की धड़कनें बढ़ जाती और इस पर दबाव स्पष्ट अनुभव हो रहा था। और कुछ पल विश्राम करने पर वह सामान्य हो जाता है। और शरीर उस ऊँचाई के प्रति अभ्यस्त (acclimatize) हो जाता और फिर हम आगे बढ़ चलते। सीधे रास्ते में यह चुनौती हट रही थी। अतः सीधा मार्ग हर चढ़ाई के बाद राहत का सबब बनकर यात्रा को कुछ सरल बना रहा था।

रास्ते में अब जिगजैग मार्ग लगभग समाप्त हो रहे थे, व आगे मोड़ से वाएं मुड़ते हुए हम नए परिवेश में प्रवेश करने वाले थे। अहसास जग रहा था कि हम महमहेश्वर के समीप पहुँच रहे हैं। हालांकि वहां के दर्शन अभी नदारद थे। यहां मैखम्ब नाम की एक छोटी सी चट्टी नजर आई, जहाँ सड़क से थोड़ा हटकर एक लम्बे से भवन में दुकानें दिखीं और सड़क के किनारे पानी की टंकी व नल थे। यहाँ से पानी पीकर व बोटल में भरकर आगे ब़ढ़ते हैं।

रास्ते में साठ से ऊपर के एक बुजुर्ग दम्पति के दर्शन हुए, जो महमहेश्वर जा रहे थे। इनमें माताजी का जीवट देखते ही बन रहा था। वे इस ऊँचाई में भी सधे कदमों के साथ एकचित्त होकर आगे बढ़ रही थी।


रास्ते में इनके सुपुत्र से मुलाकात होने पर पता चला कि माताजी तन से दुबली पतली दिखने पर भी मन की बहुत मज़बूत हैं। बाबा के प्रति प्रगाढ़ आस्था के चलते ये आत्मबल की धनी हैं। निसंदेह रुप में इस रुट पर आस्था का महत्व अपनी जगह भूमिका निभाता है।

पास में ऊपर दाईँ ओऱ के वन्यक्षेत्र में पेड-पौधों का रंग व स्वरुप बदल रहा था। पास के स्थानीय लडके से पूछा कि ये किसके जंगल हैं, उत्तर संतोषजनक नहीं मिला। जबकि हमारा अनुभव कह रहा था कि ये भूरे वृक्षों के जंगल कुछ न कुछ विशेष व वेशकीमती वनसंपदा हैं, क्योंकि इस ऊंचाई पर उगने वाले सभी पेड़-पौधे व झाड़ियाँ विशिष्ट गुण लिए होते हैं। हम अपनी अज्ञानतावश इनके गुण व महत्व को न समझ पाए, वह बात दूसरी है।

आगे से हम इस राह के अंतिम जिगजैग मोड़ से मुड़ चुके थे। और कून चट्टी के समीप पहुँचने वाले थे। यहीं हमें एक गाइड मिलते हैं, जो उम्रदराज व अनुभवी प्रतीत हो रहे थे। पता चला कि वो यहीं के स्थानीय वासी हैं, पिछले कई वर्षों से गाइड का काम कर रहे हैं और आज भी एक ग्रुप के साथ गाइड की भूमिका में थे। उनसे पूछने पर पता चला की ये खोरसू के जंगल हैं, जो हिमालयन इकॉलोजी का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं।


इन्हें बाँज की ही ऊंचाइयों में उगने वाली एक प्रजाति माना जाता है, जिनके (बाँज) दर्शन हमे बनतौली के ऊपर से होना प्रारम्भ हुए थे व नानू चट्टी के ऊपर तक होते रहे।

रास्ते में इनके जंगलों के बीच यात्रा आगे बढ़ती रही। एक बिंदु पर विश्राम के दौरान नीचे घाटी से बादलों का सैलाव ऊपर उठता दिखा, जो कुछ ही पल में पूरी घाटी को ढक लता है, हम लोगों को छूता हुआ यह ऊपर बढ़ता है। निश्चित रुप से इस ट्रेक का यह एक यादगार अनुभव था, लगा जैसे बादल भी हमारा स्वागत कर रहे हों।

इस तरह हम कून चट्टी पहुँचते हैं, जो अब मदमहेश्वर से पहले इस मार्ग की अंतिम मानवीय बस्ती है। इसके प्रवेश द्वार पर ही एक बड़ी सी चट्टान के नीचे रुकने के लिए दो-तीन तम्बुओ की व्यवस्था दिखी, चाय नाश्ते का भी अस्थ्यी इंतजाम वग्ल में दिखा। हमारे पीछे आ रही दो युवतियां तो यहीं रुक गई थीं। थोड़ी आगे एक मोड़ पार कर ऊपर कून चट्टी का भवन व स्टाल मिला, शाम होने के कारण हलचल नहीं थी, अभी यहाँ का शटर बंद था, वग्ल में बस एक चूल्हा जला था। बस यात्री बेंच पर विश्राम के लिए रुके थे। यहाँ नीचे खाली स्थान में तम्बू लगे थे। यहाँ भी रुकने की व्यवस्था थी। पौने सात बज चुके थे, शाम का धुंधलका छा रहा था, हम तो अपनी गिरी हालत के चलते यहाँ भी रुकने की सोच रहे थे, लेकिन साथियों का भाव था कि दो-तीन किमी ही तो शेष बचे हैं, वहीं पहुँचकर विश्राम करते हैं। यहाँ पर स्पष्ट चेतावनी थी कि आगे के 2 किमी तक जल का कोई स्रोत नहीं है। अतः यहाँ के नल से बोटल में जल भरते हैं, और यहाँ के सुन्दर दृश्य को कैप्चर करते हुए आगे बढ़ चलते हैं।

आगे रास्ते में फिर उम्रदराज गाइड से मुलाकात होती है, जो हमें आगे मदमहेश्वर के रास्ते की स्टीक जानकारी भी मिली कि थोड़ा आगे तक तो दो तीन मोड तक कुछ चढ़ाई है, फिर अंत में सीधा रास्ता मदमहेश्वर तक जाता है। इनकी बातों को सुनकर बहुत राहत मिली। वाकि अब तक रास्ते भर बापिस लौट रहे अधिकाँश यात्रियों के निराशाजनक व हतोत्साहित करने वाले ही उत्तर मिलते रहे। खट्टरा व नानू के बीच में एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब तक तो वार्म अप ट्रेक था, असली चढ़ाई तो अब आने होने वाली है।

किसी तरह से अपने पूरे जीवट और साहस को वटोर कर सफर कर रहे थके पथिकों के लिए यह परामर्श उसके विश्वास की ढोर को तोड़ने वाला सिद्ध हो रहा था। कूनचटी से ऊपर एक व्यक्ति ने तो ओर भी खतरनाक परामर्श दे डाला था कि मदमहेश्वर से पहले दो-तीन सौ मीटर पानी से भरी फिसलन भरी चढ़ाई है, वहाँ संभल कर चलाना। अंधेरे में सफर कर रहे पथिकों के लिए यह एक खतरनाक चुनौती प्रतीत हो रही थी, पता नहीं अंधेरे में इसे कैसे पार करेंगे, यही पेच मन में पड़ चुका था। जबकि वहाँ से गुजरते हुए ऐसा कुछ भी नहीं निकला। रास्ते में नाले का कुछ पानी सड़क पर फैला हुआ था, जिसकी इतनी खतरनाक व्याख्या की जा रही थी।

अतः हमारा तो सुझाव है कि अपरिवक्व व नौसिखिया यात्रियों से आगे के रास्ते का परामर्श न लेंकोई अनुभवी, परिपक्व या स्थानीय व्यक्ति से ही रास्ते का हिसाब किताब पूछें, जो सही सटीक व आशावादी परामर्श के साथ आपके कदमों का सहारा बनें। वाकि अपनी अंतःप्रेरणा के हिसाब से, अपने होमवर्क के आधार पर अनुमान के सहारे चलते रहने में भी कौन सी बुराई है। रास्ता तो इन्हीं कदमों के सहारे पुरा होना है, सो धीमे-धीमे आगे बढ़ाते रहें।

कून चट्टी से बढ़ते हुए रास्ते में अंधेरा छा रहा था। आगे का रास्ता कहीं चढ़ाई भरा मिला, फिर सीधे रास्ते की राहत और फिर चढ़ाई। अंधेरा बढ़ने के कारण मोबाइल टॉर्च जलाते हैं। रास्ते में दिल्ली की दो ट्रेक्कर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करती दिखीं। इनमें से बजनदार ट्रेकर को चढ़ने में दिक्कत हो रही थी। साथी ट्रेक्कर हौंसला बधाई कर चलने का दबाब बना रही थी।

मैं भी इसी कैटेगरी में आगे बढ़ रहा था और बच्ची की तकलीफ को अनुभव कर पा रहा था। यहाँ मात्र हौंसला फजाई या दबाव से काम चलने वाला नहीं था। यात्री की वास्तविक स्थिति को समझने की आवश्यकता थी। थोड़ा दूर चलने, जहाँ धड़कन अधिक बढ़ने लगे, वहाँ थोड़ा रुकने, श्वांस को सामान्य करने व फिर चलने का रुटीन ऐसे में काम आ रहा था, वही उसको बताया। इस तरह धीरे-धीरे अंधेरे को चीरते हुए हम लोग मोबाइल टॉर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे।

अंधेरे में चढ़ाई वाला रास्ता समाप्त ही नहीं हो रहा था, लग रहा था कि इस अंतहीन यात्रा की अंतिम मंजिल के दर्शन कब होंगे। अंधेरे में हमारा दल इन बच्ची के सहचर सहयोगी की भूमिका में इसको आगे बढ़ाता रहा। अब मदमहेश्वर मुश्किल से एक-डेढ़ किमी रहा होगा। इनके ग्रुप का गाइड टोर्च लाइट के साथ इनको खोजते हुए आ चुका था व धीरे-धीरे हम अंतिम चढ़ाई पार करते हैं और फिर समतल रास्ता और सामने मंदिर की टिमटिमाती रोशनी मंजिल तक पहुँचने का आश्वासन दे रही थी और कुछ ही देर में हम लोग मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं। रात के साढ़े दस बज चुके थे। शुरु में तम्बुओं की कतार स्वागत करती नज़र आ रही थी, जिसमें यात्री रुके थे, कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे।

जल्दी महदमहेश्वर पहुँचकर कमरा बुक करने के चक्कर में हमारे एक साथी कुछ घंटे पहले की यहाँ पहुँच चुके थे, लेकिन नेटवर्क बाधित होने के कारण हम लोगों का संपर्क कट चुका था। यहाँ भी मुख्य मंदिर ऑफिस से पता करने व तम्बुओं के पास आवाज देने पर भी कोई सुराग नहीं मिल पाया। लगा कि देर रात तक इंतजार करते-करते थककर सो न गया हो।

अतः एक भवन के सामने लगी कुर्सी मेज पर समान रखकर, हमारे साथी रुकने की व्यवस्था खोजते हैं। बाहर खुले में ठंड इस कदर थी, कि हवा के झौंकों के साथ वह वदन के आर-पार हो रही थी। लेकिन यहाँ इसको झेलने व इंतजार के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। रुकने की वातचीत होने पर हमारे साथी आते हैं और ऊपर मुख्य ऑफिस के बाहर लगे कुर्सी-मेज पर रात का दाल-चाबल खाते हैं। अंदर चूल्हा जल रहा था, लेकिन जुत्ता पहने अंदर प्रवेश संभव नहीं था। बाहर से ही बीरबल की आग की तरह दूरदर्शन से ही इसका ताप लेते रहे। भोजन के उपरान्त यहाँ से उपलब्ध गाइड के साथ समान लेकर नीचे एक खेत में लगे तम्बूओं की कतार की ओर बढ़ते हैं। जंगली घास और ढलानदार खेत के बीच होते हुए नीचे उतरते हैं।

इसी क्रम में हमारा एक साथी ढलान की गिली मिट्टी पर फिसल जाता है, लगा कहीं चोट ज्यादा तो नहीं आ गई। पता चला कि कंधे पर हल्की चोट आई है, बाकि सब ठीक है। फिर हम सब संभल कर आगे बढ़ते हैं और कौने पर एक खाली तम्बू में प्रवेश करते हैं। जूत्ते तम्बू के बाहर गैलरी में रखकर, अपना समान तम्बू के कौने में समेट कर मैट पर बिछे गद्दे पर लेटते हैं, मोटे-मोटे दो कम्बल ओढ़कर मदमहेश्वर बाबा का धन्यवाद ज्ञापन करते हैं कि सही सलामत उनके प्राँगण में पहुँच गए और बाबा को याद करते हुए सो जाते हैं। (जारी, शेष अगले भाग-6 में, मदमहेश्वर से बनतोली)

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