सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

दशहरे का आध्यात्मिक संदेश

 

रावण के दस मुख और जीवन सवक

रावण एक प्रकाण्ड पंडित, उद्भट विद्वान, चारों वेदों और षडदर्शन के ज्ञाता, भगवान शिव के परमभक्त, शिव-ताण्डव स्रोत के रचियेता थे और साथ ही ज्योतिष और आयुर्वेद के महापंडित, कुशल वीणा वादक जैसी विशेषताओं से सम्पन्न थे। लेकिन कुछ विकृतियाँ उनके विनाश का कारण बनीं, जिसके कारण दस सिर वाला रावण का पुतला उनके भाई कुंभकरण और वेटे मेघनाथ के साथ दशहरे के दिन जलाया जाता है, जिसे बुराई पर अच्छाई की तथा अधर्म पर धर्म की जीत के रुप में देखा जाता है।

रावण त्रेता युग में सीता माता के हरण के कारण अधर्म, अन्याय और अहंकार-दंभ के प्रतीक एक व्यक्ति के रुप में असुरता के प्रतिनिधि माने जाते हैं, लेकिन आज रावण से जुड़ी ये बुराईयों मनुष्य के स्वभाव में इस कदर घुलमिल चुकी हैं कि जैसे रावण से जुड़े दुर्गुण यथा - क्रोध, दर्प दंभ, अहंकार, हठधर्मिता, वासना आदि विकार जैसे इंसान के जीवन में स्थान पा चुके हैं।

इस रुप में दशहरे के दिन रावण का दहन, तात्विक रुप में हमारे अंदर की अशुभता, असुरता, पशुता एवं अवांछनीय विकृतियों के दहन का भी आध्यात्मिक संदेश देता है, जो कि हमें एक मनुष्य जीवन की गरिमा के अनुरुप जीने से वंचित रखता है और परिवार से लेकर समाज में एक सतयुगी समाज की रचना में बाधक बनता है। इस तरह दशहरा आत्मावलोकन का पावन पर्व भी है, कि हम अपना ईमानदार मूल्याँकन करें, कि कौन सी बुराई का हमें अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में दहन करना है व इनके स्थान पर किस सद्गुण को धारण करना है।

वासना विकार, विकार, जो व्यक्ति को कामान्ध बनाकर उसके विवेक का हरण करता है, उसको असंयमित भोग के पाश में जकड़कर उसकी जीवनी शक्ति को निचोड़ देता है, उसे दुर्बल-रुगण बनाता है। जिसके चलते व्यक्ति गृहस्थ धर्म का सही ढंग से पालन नहीं कर पाता, संतानों को श्रेष्ठ संस्कार नहीं दे पाता। आजकल तलाक से लेकर घरेलु हिंसा के बढ़े-चढे मामले इसी से जुड़े हुए हैं, तो भयावह घटनाओं को जन्म दे रहे हैं। इंद्रिय असंयम के चलते व्यक्ति का चरित्र भी सामाजिक रुप से संदिग्ध बना रहता है और ऐसे में जीवन की संभावनाएं पूर्ण रुप से नहीं खिल पाती।

क्रोध, का विनाशकारी आवेश दूसरा दुर्गुण है, जो विवेक को कुंद कर देता है, इसके आगोश में व्यक्ति कुछ ऐसा कह व कर बैठता है, जिससे फिर बाद में पश्चाताप ही हाथ लगता है। कई बार क्रोध के आवेश में भयंकर दुर्घटनाएं हो जाती हैं, जिनकी फिर भरपाई नहीं की जा सकती। आपसी सम्बन्धों को क्रोध हर हमेशा के लिए बिगाड़ देता है और व्यक्ति स्वयं भी इसकी आग में अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। एक गुस्सैल व्यक्ति कभी भी पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में शांति-समाधान का हिस्सा नहीं बन पाता।

लोभ-मोह, आवश्यकता के अधिक चीजों को संग्रहित करने की वृत्ति, एक ऐसा अवगुण है जिसका कोई अन्त नहीं। इसके चलते एक सामान्य व्यक्ति लखपति बनना चाहता है, एक लखपति करोड़पति बनने का सपना देखता है और इससे आगे फिर एक अरबपति। और आवश्यकता से अधिक संग्रह अन्ततः अशांति, क्लह एवं विग्रह का ही कारण बनता है तथा जीवन का सदुपयोग नहीं हो पाता। इसके साथ मोह विकार व्यक्ति या वस्तु के प्रति अनावश्यक आसक्ति को जन्म देता है, जिनका वियोग फिर असह्य दुःख पीड़ा एवं संताप का कारण बनता है। आशा-अपेक्षाओं से भरे ह्दय से फिर कर्तव्य कर्म भी अनासक्त भाव से नहीं हो पाते।

अहंकार, अपने वास्तविक स्वरुप के बोध का अभाव, स्वयं को सर्वशक्तिमान मान बैठने के दंभ को जन्म देता है। अपनी शक्ति, सत्ता, धन, वैभव, ज्ञान व गुणों का दंभ, देर-सवेर व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। इस अहंकार-दंभ के चलते व्यक्ति को अपने हित की बातें समझ नहीं आती और ऐसे में वह अपने शुभचिंतकों को अपना शत्रु मान बैठता है, जबकि चापलुसी करने वाले जालसाजों को अपना परमहितेषी, जिनकी झूठी प्रशंसा के चलते अहंकारी अपना वास्तविक हित नहीं समझ पाता, न ही जीवन के उद्देश्य को साध पाता। अपनी सत्ता, धन, वैभव, बल के नष्ट होते ही उसे अपनी वास्तविकता का कटु बोध होता है, तब तक प्रायः देर हो चुकी होती है।

संकीर्ण स्वार्थपरता, अपने ही हित की सोच, दूसरों से कोई मतलब नहीं। व्यापक जनहित या मानवता के हित के विपरीत सिर्फ अपने तक सीमित संकीर्ण सोच। संकीर्ण स्वार्थपरता जीवन की असीम संभावनाओं को समेट कर इनको व्यापक बनने से रोकती है। मनुष्य जन्म का उद्देश्य नरपशु से नरमानव, महामानव, देवमानव की श्रेणियों को पार करते हुए अपने प्रसुप्त देवत्व एवं असीम संभावनाओं को साकार करना है, जबकी संकीर्ण स्वार्थपरता के कारण वह नरपशु की श्रेणी में ही अटका रहता है और इसमें क्षुद्र अहंकार और वासना के घुलने से तो इससे भी नीचे गिरकर नर-पिशाच, असुरता की श्रेणी में जा गिरता है।

छल-कपट व अन्याय, छल-कपट में अनाधिकार चेष्टा के तहत दूसरे की सम्पदा का हरण, प्रकृति की लूट-खसोट शामिल है। ऐसे में दूसरों के प्रति अन्याय के चलते, औचित्य, न्याय और नैतिकता का पक्ष तार-तार हो जाता है। तत्काल कुछ लाभ एवं उपलब्धि का भ्रम हो सकता है, लेकिन जब ये कर्म लौटकर बापिस आते हैं, तो अपनी भयंकर भूल का अहसास होता है। समाज में ऐसे लोगों का भयवश सम्मान हो सकता है, लेकिन दिल से कोई इनका सम्मान नहीं करता। इन पर व्यापक स्तर पर तिरस्कार ही बरसता है।

अनादर, दूसरों का उपहास एवं अपमान करना। इससे दूसरे के ह्दय में विद्रोह का भाव घर कर जाता है, शत्रुता का भाव पैदा होता है, जो देर-सबेर विध्वंस के रुप में प्रकट होता है। इसके स्थान पर दूसरों के प्रति सम्मान का भाव, आत्मीय सम्बन्धों को पुष्ट करता है, परिवार और समाज में एक शांति-सौहार्द्रयपूर्ण बेहतरीन वातावरण तैयार करता है, जिससे स्वयं को भी शांति एवं सुकून का अनुभव मिलता है।

भय, एक ऐसा अवगुण है, जो हमारी क्षमताओं को कुंद कर देता है। खतरों का सामना होने पर भयभीत होना स्वाभाविक है, लेकिन बिना वास्तविक भय के कारण के मात्र कल्पना के आधार पर भयभीत होना, जीवन की सभावनाओं को प्रकट होने से रोकता है। यदि हम सत्य, न्याय और प्रेम के पथ पर चलेंगे, तो भय कम हो जाता है। गलत आचरण, भ्रष्ट व्यवहार के चलते हम कभी भी निर्भय होकर नहीं जी सकते। अतः सरलता, सत्यता, ईमानदारी के साथ जीवन यापन ही निर्भय जीवन को सुनिश्चित करता है। गलत आचऱण करने वाला कितना भी निर्भय दिखे, लेकिन भीतर ही भीतर वह बहुत भयभीत रहता है।

ईर्ष्या-द्वेष, दूसरे की खुशियों या उपलब्धियों के प्रति असंतोष एवं जलन का भाव हमारे व्यक्तित्व को संकुचित बनाता है, बौनेपन का अहसास देता है। और ऐसे में व्यक्ति अंदर से जलता रहता है, जो भीतर ही भीतर उसको खोखला करती रहती है। इसके साथ ईर्ष्या-द्वेष वश यदि कोई दूसरे को नीचे दिखाने की दुर्भिसंधि रचता है, तो इसका परिणाम अशांति, असंतोष एवं तनाव के रुप में प्रकट होता है। इसके विपरीत उदारता-सहिष्णुता भरा जीवन शांति, संतोष एवं प्रसन्नता का जनक सावित होता है।

क्रूरता-अमानवता, दया, करुणा, संवेदना का अभाव है, जो अपने कर्म को बिगाड़ने वाला अवगुण है, जो पुण्य का तीव्रता से क्षय करता है और अन्ततः व्यक्ति के समूल विनाश का कारण बनता है। ऐसे कर्म बहुत भयंकर रुप में व्यैक्तिक एवं सामूहिक स्तर पर बापिस आते हैं। आजकल स्वाद के लिए निरीह पशुओं-जीवों की हत्या, धर्मांधता के नाम पर पशु बलि इसी क्रूरता, अमानवता के कुत्सित प्रचलन हैं, जिन्हें त्यागकर ही हम सच्चे अर्थों में इंसान होने का परिचय दे सकते हैं।

दशहरा अपने अंतःकरण में स्थान बनाए इन दुर्गुणों को चिन्हिंत करने का विशेष दिन है और इन्हें जानने के साथ इन्हें जीतने के लिए संकल्पित होने का पावन दिन है, जिससे कि हम आंतरिक शांति के साथ जीवन की बाहरी सिद्धी एवं सफलता को प्राप्त कर सकें तथा हमारा मनुष्य जीवन अपनी संपूर्ण संभावनाओं के साथ धरती पर जन्म लेने के महान उद्देश्य को पूर्ण कर सके।

इस लिंक पर पढ़ सकते हैं, दशहरा कुल्लू का

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

जीवन गीत - नही यह राह फूलों की, होंगी अग्निपरीक्षाएं बारंवार


नहीं धीरज जब, न ही विश्वास

अपने मद की आँधी पर हो सवार,

कोई दिक्कत नहीं इसमें भी,

लेकिन, क्या इसकी कीमत चुकाने को हो तैयार ।1

 

स्वाभिमान और अहंकार में है अन्तर न्यून,

जब रज के उवाल में चित्त मार रहा हो हुंकार,

अपनी गलती न सूझे तनिक भी, प्रतिपक्ष ही गलती में शुमार ।2

 

स्वाभिमान के पीछे छिपे होते हैं सत्य, संवेदना, औचित्य,

अहंकार के पीछे भावशून्य हठधर्मिता, अहं का दर्प दंभ हुंकार,

सत्य से दृष्टि औझल, अपने दुराग्रह को मनवाने की टंकार ।3


औचित्य में होती है, लचक, संभावना सृजन की,

सत्य को स्वीकारने की, अपनी गलती को सुधारने की,

दृष्टि सुधार की, नहीं दंडित करने का भाव प्रधान ।4

 

जब सामने वाला हो अपनी गलती मानने को तैयार,

सुधार की संभावना जहाँ दिख रही हो कुछ साकार,

क्यों न दें मौका सुधरने-संवरने का, जब हर कोई यहाँ गलती का शिकार ।5

 

राह यह अनन्त धैर्य की, नहीं यहाँ होता तत्काल कुछ चमत्कार,

उदारता-सहिष्णुता के चरम पर मिले फल मीठे,

वहे अन्त में फिर परिवर्तन की व्यार ।6


यही युगऋषि द्वारा वर्णित सतयुग की बापसी का आधार,

भावसंवेदना की गंगोत्री से ही बहेगी समाधान की शीतल रसधार,

जहाँ तप और योग के शिखर पर होंगे सतयुगी स्वप्न साकार ।7

 

त्याग, बलिदान से भरी यह राह प्रकाश पथ की

शूरवीरों को देनी पड़ी हैं, अग्नि परीक्षाएं अनगिन वार,

नहीं यह राह फूलों की, होंगे असुरता के पग-पग पर प्रहार ।8

 

तमस से ज्योति की, असत्य से सत्य की,

मृत्यु से अमरता की यह राह विरल,

पंगडंडियों में नहीं, राजमार्ग से होगा, मंजिल का संधान ।9

 

झूठ, असत्य, अधर्म कितना भी हो प्रचंड, मायावी,

सत्य, धर्म, इंसानियत की तय अंतिम विजय महान्,

धर्म की आभासित हार के पीछे महाकाल की चेतना विकराल ।10

सब कुछ वर्दाश्त कर सकती है यह पराचेतना,

नहीं इसे अपने भक्तों से अन्याय, अत्याचार, ज्यादती स्वीकार,

होते हैं हर युग में इसीलिए महाशक्ति संग परमपुरख के अवतार ।11

 

अतः बनें विनीत, सरल, धर्मनिष्ठ, तज दर्प-दंभ, क्षुद्र स्वार्थ-अहंकार,

 बनें युगसाधक सृजन पथ के, युगऋषि की दर्शायी राह से हो प्यार,

रहे सत्य, धर्म, औचित्य, आत्म-सुधार, परिमार्जन के लिए सदा तैयार ।12

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

जीवन गीत – छोटा सा जीवन इस धरा पर नश्वर

धुन में सम्यक-बोध संग बढ़ते रहना चाहिए

जहाँ खड़े हो, वहीं से आगे बढ़ते रहो,

हाँ, इसके लिए अपनी यथास्थिति का अहसास होना चाहिए ।1

नहीं यह संभव, बिना कुछ पल स्वयं संग बिताए,

आत्म-विश्लेषण, चिंतन-मनन, जीवन मंथन करते रहना चाहिए ।2

फिर, जीवन दृष्टि, समझ की सीमा अपनी,

स्वाध्याय - साधु संग इसका दायरा बढ़ाते रहना चाहिए ।3


इनसे मिला ज्ञान न रहे अधूरा, अपच,

इसको अमली जामा पहनाते रहना चाहिए ।4

बढ़े कदम नहीं जरुरी, छोटे कदम काफी,

गति धीमी सही, अनवरत बढ़ते रहना चाहिए ।5

राह में मिलेंगे एकतरफा सरपट दौड़ते वाहन भी बहुत,

तुम्हें अपनी धुन में, सम्यक बोध संग बढ़ते रहना चाहिए ।6 

मंजिल का नहीं महत्व कुछ अधिक,

राह के एडवेंचर का आनन्द भरपूर लेते रहना चाहिए ।7

अपने लिए तो जी लेते हैं, मरते हैं सभी,

परहित सेवा का सुकून भी कुछ अनुभव होना चाहिए ।8

है छोटी सी यह जिंदगी, इस धरा पर नश्वर,

शाश्वत संग, जीवन के स्रोत से जुड़े रहना चाहिए ।9

शनिवार, 19 सितंबर 2026

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-5 (अंतिम किश्त)

                                                                     श्राद्धकर्म का तत्वदर्शन

पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता की अभिव्यक्ति

भारतीय संस्कृति ने यह तथ्य घोषित किया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता। अनन्त जीवन श्रृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है। इसलिए संस्कारों के क्रम में 'जीव' की उस स्थिति को भी बाँधा गया है, जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है। कामना की जाती है कि सम्बन्धित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किए जाते हैं, उनके लाभ जीवात्मा की क्रिया-कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलते हैं। इसीलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है।

इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वालों को जिस इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मों से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति अनुभव करता है। उनकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सानिध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं। श्रद्धा ही उनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। 

मुक्त आत्माओं और पितरों के प्रति मनुष्यों को वैसा ही श्रद्धाभाव दृढ़ रखना चाहिए, जैसा देवों-प्रजापतियों तथा परमात्म-सत्ता के प्रति। मुक्तों, देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु पितरों को ऐसी आवश्यकता होती है। उन्हें ऐसी सहायता दी जा सके, इसीलिए मनीषी-पूर्वजों ने पितर-पूजन, श्राद्ध-कर्म की परम्परायें प्रचलित की थीं। उनकी सही विधि और उनमें सन्निहित प्रेरणा को जानकर पितरों को सच्ची भावना श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने पर वे प्रसन्न पितर बदले में प्रकाश, प्रेरणा, शक्ति और सहयोग देते हैं। पितरों को स्थूल सहायता की नहीं, सूक्ष्म भावात्मक सहायता की ही आवश्यकता होती है। क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में ही अवस्थित होते हैं। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात् पितृपक्ष में, मृत्यु की तिथि के दिन अथवा पर्व-समारोहों पर श्राद्ध कर्म करने का विधान देव-संस्कृति में है।

श्राद्ध किस तत्त्व पर टिका है? शरीर के नष्ट हो जाने पर भी जीव का अस्तित्व नहीं मिटता। वह सूक्ष्म रूप में हमारे चारों ओर वातावरण में घूमते रहते हैं। जीव का फिर भी अपने परिवार के प्रति कुछ-न-कुछ ममत्व रह जाता है। सूक्ष्म आत्मायें आसानी से सब लोकों से आकर हमारे चारों ओर चक्कर लगाया करती हैं। हमारे विचार और भावनायें इस सूक्ष्म वातावरण में फैलते हैं। इन्हें हम जिस तेजी से बाहर के वातावरण में फेंकते हैं, ये उसी गति से दूर-दूर फैल जाते हैं। अतः श्राद्ध में किए गए पूर्वजों के प्रति हमारे आत्मीय, स‌द्भावना, कृतज्ञता के भाव उन आत्माओं के पास पहुँच जाते हैं। उसे उनसे सुख शान्ति, प्रसन्नता और स्वस्थता मिलती है।

श्राद्ध में हविष्यान्न पिण्डों के द्वारा श्रद्धाभिव्यक्ति की जाती है। ये पिण्ड साधन-दान के प्रतीक होते हैं। स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। जल की एक अञ्जलि भरकर कृतज्ञता के भाव से भरकर हम स्वर्गीय पितृ-देवताओं के चरणों में उसे अर्पित कर देते हैं। इस प्रकार श्रद्धा, प्रेम, कृतज्ञता, अभिनन्दन सभी का मिश्रित रूप श्राद्ध है।

योगवासिष्ठ के अनुसार मरने के समय प्रत्येक जीव मूर्छा का अनुभव करता है। वह मुर्छा महाप्रलय की रात्रि के समान होती है। उसके उपरान्त प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही अपने स्वप्न और संकल्प के अनुसार अपने परलोक की सृष्टि करता है, यह बात इन श्लोकों में कही गयी है-

मरणादिमयी मूर्च्छा प्रत्येकेनानुभूयते। यैषा तां विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम्।। तदन्ते तनुते सर्ग सर्व एव पृथक् पृथक्। सहज स्वप्नसंकल्पान्संभ्रमाचल नृत्यवत्।। - योगवासिष्ठ ३।४०।३१ व ३२

इसी सन्दर्भ में आगे बताया गया है कि- स्ववासनानुसारेण प्रेता एतां व्यवस्थितम्। मूर्छान्तेऽनुभवन्त्यन्तः क्रमेणैवाक्रमेण च।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२६

अर्थात्, प्रेत अपनी-अपनी वासना के अनुसार ही भावनात्मक उतार-चढ़ावों का अनुभव करते हैं। मरे हुए व्यक्ति की प्रेतावस्था में जिन लोगों से आसक्ति जुड़ी रहती है, उनकी भाव संवेदनायें और उनकी परिस्थितियाँ-मनःस्थितियाँ प्रेतों को तीव्रता से प्रभावित करती हैं। पिण्डदान और श्राद्ध कर्म का महत्त्व यही है कि उन क्रियाओं के साथ-साथ जो भावनायें जुड़ी होती हैं, वे प्रेतों-पितरों को स्पर्श करती हैं। इसी प्रकार पितरों के संस्कारों के अनुभव अपने प्रियपात्रों की स्थितियाँ उन्हें आन्दोलित करती हैं।

योगवासिष्ठ में बताया गया है कि मृत्यु के उपरान्त प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बन्धु बान्धवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं-

आदौ मृता वयमिति बुध्यन्ते तदनुक्रमात्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२७

अर्थात्, प्रेत अपनी स्थिति इस प्रकार अनुभव करते हैं कि हम मर गये हैं और अब बन्धुओं के पिण्डदान से हमारा नया शरीर बना है।

स्पष्ट है कि यह अनुभूति भावनात्मक ही होती है। अतः पिण्डदान का वास्तविक महत्त्व उससे जुड़ी भावनाओं के कारण होता है। जिसके प्रति आत्मीयता होती है, उसके भावनात्मक अनुदान से प्रेत प्रभावित होता है। क्योंकि मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियाँ वासना और संस्कारों के प्रभाव की ही प्रतिच्छाया होती हैं। इसलिए जिससे आत्मीयता का संस्कार अंकित हो, उसकी भावनायें परलोकस्थ जीव को प्रभावित करती हैं।

गीता के ८ वें अध्याय में कहा गया है- हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है।

संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा दिए जाते हैं, कि उसकी कोई भी आकांक्षा आसक्ति सूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे।

मरे हुए व्यक्तियों का श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है, जिसमें जलकणों की भाँति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है, तो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हों, तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाडे और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्यगन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी स‌द्भावना की लहरें पहुँचाता हैं। यह सूक्ष्म भाव तरंगे तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित मृत सभी को तृप्त करती हैं, परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुँचता है, जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।

शास्त्रों की तर्पण व्यवस्था -

श्राद्ध प्रक्रिया में देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मानव तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण, मनुष्य पितृ तर्पण नाम से ६ तर्पण कृत्य किये जाते हैं। इन सबके पीछे भिन्न-भिन्न दार्शनिक पृष्ठभूमि है।

देव तर्पण अर्थात् ईश्वर की उन सभी महान् विभूतियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जो मानव कल्याण हेतु निःस्वार्थ भाव से प्रयत्नरत हैं। वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् एवं अवतारी ईश्वर अंशों की मुक्त आत्माएँ इसके अन्तर्गत आती हैं।

ऋषि तर्पण व्यास, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, जमदग्नि, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनि, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।

दिव्य मानव तर्पण अर्थात् उनके प्रति अपनी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, जो लोकमंगल के प्रति समर्पित हो, त्यागी जीवन जिए एवं विश्वमानव के लिये प्राणोत्सर्ग कर गए। 

दिव्य पितृ तर्पण, दिव्य पितर वे, जो कोई बड़ी लोकसेवा तो न कर सके, पर व्यक्तिगत रूप से आदर्शवादी जीवन जी कर अनुकरणीय पवित्र सम्पत्ति अपने पीछे छोड़ गए।

यम तर्पण, यम अर्थात् जन्म मरण का नियंत्रण करने वाली शक्ति। कुमार्ग पर चलने से रोक लगाने वाली विवेक शक्ति ही यम है। इसकी निरन्तर पुष्टि होती रहे, मुत्यु का भाव बना रहे, इसलिये यमतर्पण किया जाता है।

अन्त में मनुष्य पितृ तर्पण की व्यवस्था है। इससे परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारी, पिता, बाबा-परबाबा, माता, दादी, परदादी, पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा, नाना, परनाना, भाई, बुआ, मौसी, सास-ससुर एवं अन्त में गुरु-पत्नी, शिष्य एवं मित्रगण आते हैं।

इस प्रकार श्राद्ध तर्पण की सार्वभौम व्यवस्था में सारे समुदाय के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति समाहित है। यह मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरे, वसुधा एक विराट् परिवार है, इस भावना के रूप में साकार हो, उदार दानशीलता के रूप में लोकमंगल के कार्य बन पड़ें, तो ही इनकी सार्थकता है।

पितृपक्ष का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में विशेष माहात्म्य है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी, सच्चा देव संस्कृति का अनुयायी नहीं माना जा सकता। शास्त्र मान्यतानुसार मृत्यु होने पर मनुष्य की जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती व ऊपर उठकर पितृलोक में पहुँचती हैं। उन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुँचने की शक्ति प्रदान करने-शान्ति देने के निमित्त ही पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान किया गया है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। हमारे अदृश्य सहायक पितर गण गुरुजनों एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के निमित्त मात्र श्राद्ध-तर्पण के रूप में ही बन पड़ता है। मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता के उन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति के अनुयाइयों ने वर्ष में पंद्रह दिन का समय पृथक् निकाल लिया है। पितृभक्ति का इससे उज्ज्वल उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।

यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि पितरों को सच्ची श्रद्धा दी जाएगी. उन्हें तृप्त रखा जाएगा तो वे निश्चय ही शक्ति, प्रकाश, प्रेरणा मार्गदर्शन सहयोग व भावनात्मक अनुदान देंगे। पितरों के प्रति व्यक्त की गयी कृतज्ञता उलटे लौटकर बहुगुणित होकर स्वयं पर बरसती है। अपनी मोटी बुद्धि को तार्किक बनाते हुए हमें परोक्ष जगत् के अस्तित्व को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए तथा वहाँ विद्यमान सहायक आत्माओं से सम्पर्क स्थापित कर उनके अनुदानों से लाभान्वित होना चाहिए। (अंतिम किश्त)

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