रविवार, 28 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-1

हरिद्वार से उखीमठ

उत्तराखण्ड में गढ़वाल हिमालय के रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ के समानान्तर घाटी में स्थित महमहेश्वर प्रख्यात पंचकेदार में से एक है व यात्रा के क्रम में द्वितीय केदार के नाम से भी जाने जाते हैं। यहाँ का अवलोकन अब तक स्थानीय यू-ट्यूबर्ज के विडियोज में न जाने कितनी बार कर चुका था। लेकिन इसकी जमीनी सच्चाई से अधिक परिचित नहीं था। जून के पहले सप्ताह में अचानक मित्र मंडली के साथ यहाँ जाने की योजना बन गई, लगा बाबा का बुलावा आ गया।

लेकिन अपनी तैयारी को लेकर थोड़ा संशय भी था, कि 16 किमी की ट्रेकिंग एक दिन में हो पाएगी या नहीं, वह भी 5,000 से 12,500 फीट की ऊंचाई तक। मदमहेश्वर से जुड़े तमाम ब्लॉग्ज व विडियोज खंगाले, लगा कि उतना कठिन भी नहीं है। फिर साथियों का उत्साह व जीवट देख लगा कि अपना अब तक का ट्रेकिंग अनुभव बटोरते हुए इसे डेयर करते हैं, बाबा के धाम में जहाँ तक पहुँच पाए ठीक है, बाकि बाबा की इच्छा।

आवश्यक तैयारी – टॉफी चॉकलेट, बिस्कुट-नमकीन, मेवे, दवाईयाँ आदि रास्ते के आवश्यक पाथेय जुटने शुरु हो गए। साथ में ट्रेकिंग शूज, पावर बैंक, चार्जर आदि। ऊंचाई के हिसाब से अंतिम दिन के लिए गर्म कपड़े, टोपी, मफलर, जुराबें, इन्नर वार्मर आदि। सबको अपने बैग में समेटते हुए एक पिट्ठू बैग तैयार हो गया और कुछ आवश्यक सामान एवं तात्कालिक उपयोग की सामग्री के साथ एक साइड बैग।

हरिद्वार से यात्रा का शुभारम्भ होता है। 7 जून रविवार की प्रातः छः बजे दे.सं. विश्वविद्यालय परिसर से निकल पड़ते हैं। आज की मंजिल थी मदमहेश्वर की राह में पड़ने वाला अंतिम मोटरेवल सुंदर सा पहाड़ी गाँव रांसी, जो 7000 फीट की ऊँचाई पर बसा है, जहाँ पर रुकने की उचित व्यवस्था है और यह महमहेश्वर यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है, जो माता राकेश्वरी देवी के पौराणिक मंदिर के लिए प्रख्यात है। रविवार के चलते ऋषिकेश से जाम शुरु हो जाता है, जो तपोवन से कुछ आगे तक यात्रा में थोड़ा ब्रेक लगाता है। इसमें चार धाम यात्रियों के साथ राफ्टिंग वालों का भी योगदान रहता है, जो जीप पर रॉफ्ट को लादे इस राह पर वहुतायत में मिलते हैं।

फिर आगे ब्यासी के प्रख्यात चौहान ढावे में नाश्ता करते हैं। आलू-परांठा-दाल-दही, चाय के साथ पर्फेक्ट नाश्ता होता है, जो आगे की यात्रा के लिए दल की बेट्री को चार्ज करता है। रास्ते में कोडियाला सदैव की तरह ध्यान आकर्षित करता है, जो ठीक गंगाजी के किनारे बसा है और उस पार के उलट त्रिशंकु के रुप में विराजमान हरे-भरे पर्वत को निहारने के लिए मजबूर करता है, जो किसी ध्यानस्थ तपस्वी से प्रतीत होते हैं। इसी क्रम में शिवपुरी, ब्रह्मपुरी आदि आते हैं। रास्ते में बजी जंपिंग के तामझाम भी ध्यान आकर्षित करते हैं और गंगा मैया अपनी शांत नीली धारा के साथ कुछ दूर तक अपने पावन एवं शीतल स्पर्श का दिव्य अहसास कराती रहती हैं।

रास्ते में हेमकुंड साहिब के श्रद्धालुओं का अलग ही नज़ारा दिखता है। कतार में बाइक के आगे डंडे में फहराती धर्म-ध्वजा और श्रद्धालुओं का उत्साह नई ऊर्जा का संचार करता है। पंजाब के मैदानों इलाकों से आए इन श्रद्धालुओं के लिए पहाड़ों में ड्राइविंग अवश्य ही थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहती होगी, लेकिन उत्साह व आस्था के आगे ऐसी बाधाएं नतमस्तक हो जाती हैं।

इसी रास्ते में पड़ती है तोता घाटी, जिसका अपना इतिहास है। यह लैंडस्लाइड जोन के रुप में प्रख्यात है व यहाँ इसे रोकने के तमाम प्रयास देखे जा सकते हैं। यहीं से आगे गढ़वाल हिमालय की पहाड़ियों की अंतहीन श्रृंखला के दर्शन भी किए जा सकते हैं औऱ नीचे गहराई में गंगाजी का धीमी गति से बहता अविरल प्रवाह। सड़क के किनारे तमाम ढावे और उनके बाहर सजे स्थानीय दाल, सब्जी, अदरक, बुराँश, मालटा जैसे उत्पाद ध्यान आकर्षित करते हैं।

इसी क्रम में आता है देवप्रयाग का संगम, जहाँ अलकनंदा और भगीरथी नदियाँ मिलकर गंगाजी का रुप लेती हैं। इससे थोड़ा पहले भारत की सबसे ऊंची बज्जी जंपिंग का सेटअप भी देखने को मिलता है, जिसमें जावांज लोग इसके दुस्साहसिक खेल का आनन्द लेते देखे जा सकते हैं। हमारे विचार में यह खेल सिर्फ अल्ट्राफिट लोगों के लिए है, नहीं तो इसके झटके के साथ शरीर के अंग-अवयव व अस्थि-पंजर ढीले पड़ सकते हैं, छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। ऐसी कुछ दुर्घटनाएं हाल ही में समाचारों की सुर्खियाँ भी बनी हैं।

देवप्रयाग से मार्ग श्रीनगर की ओर बढ़ता है। रास्ते भर हेंमकुंड साहिब जा रहे सिक्ख श्रद्धालुओं के झंडे लगे बाइक्स आते-जाते मिले। बापिसी में झंड़े नदारद थे। कुछ लोग गाड़ियों में परिवारजनों व मित्रमंडली के संग जा रहे थे। रास्ते में सड़क के किनारे लंगर की भी विशेष व्यवस्था दिखती है, जहाँ तीर्थ यात्री भोजन-प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। रास्ते में कुछ यात्री बाइक में तिरंगा फहराए हुए भी दिखे, जो प्राय़ः सोलो ट्रैव्लर ही अधिक मिले।

रास्ते में कीर्तिनगर से पहले मलेथा में रेलरूट का कार्य जोरों-शोरों से चल रहा दिखा। इसके बाद आता है श्रीनगर शहर, जिसे माना जाता है कि आदि शंकराचार्यजी ने स्वयं श्रीयंत्र के ऊपर स्थापित किया था। प्रवेश करते ही गंगाजी का विस्तार एवं अविरल प्रवाह मन को बहुत सुकून देता है। रास्ते में गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय और थोड़ी आगे नदी के उस पार इसका चौरास कैंपस चर्चा का विषय बनते हैं।

श्रीनगर के बाद जलप्रयोजना के चलते झील या डैम का रुका पानी दिखता है, जिसके किनारे बढ़ते हुए माता धारीदेवी का सिद्ध मंदिर आता है। यहाँ काफी भीड़ लगी थी, हम लोग दूर से ही प्रणाम करते हैं। रुद्रप्रयाग से थोड़ा पहले झील के बैक वाटर में रेतीले किनारों पर लोगों को स्नान व जलक्रीडा का आनन्द लेते देखा, निश्चित रुप से अलकनंदा का हिमालय टच वाला जल डुबकी लगाने वालों को तरोताजा कर रहा होगा।

आगे से बायीं ओर मुड़ कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में थोड़ी दूरी पर दायीं ओर पड़ता है रुद्रप्रयाग संगम, जहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का संगम होता है। यहाँ तक चार धाम यात्रियों की भीड़ मिलती है। अब हम आगे मंदाकिनी नदी के मंद-मंद प्रवाह के साथ आगे बढ़ रहे थे। आगे अगस्तमुनि कस्बा आता है। माना जाता है कि अगस्त मुनि ने यहाँ तप किया था। मालूम हो कि अगस्त मुनि रामायण काल के एक मूर्धन्य ऋषि थे, जो अध्यात्म विद्या के ज्ञान औऱ विज्ञान दोनों पक्षों में पारंगत थे। इनकी सिद्धियों के भय से रावण व उसकी राक्षस मंडली इनके आश्रम की ओर झांकने का तक दुस्साहस नहीं कर पाती थी।

वनवास के दौरान श्रीराम और महर्षि अगस्त्य का मिलन रामायण की एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी घटना है। जिसमें उन्होंने श्रीराम को देवताओं के राजा इंद्र द्वारा दिए गए कई दिव्य अस्त्र शस्त्र भेंट किए। इनमें एक दिव्य धनुष, कभी न खाली होने वाला अभेद्य तरकस शामिल थे। महर्षि अगस्त ने ही श्रीराम को सुंदर एवं रमणीय स्थल पंचवटी जाने की सलाह दी थी। महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को स्मरण दिलाया था कि वे राक्षसों को खत्म करने औऱ दुनियाँ में धर्म की रक्षा करने के लिए ही इस धरती पर आए हैं। इस मिलने ने श्रीराम को और अधिक शक्तिशाली बना दिया और उन्हें अपनी आगे की यात्रा के लिए सही दिशा दिखाई।

अगस्तमुनि के थोड़ा आगे मंदाकिनी नदी के किनारे एक एकांतिक ढाबे में दोपहर का भोजन करते हैं। यहाँ से तरोताजा होकर मंजिल की ओर बढ़ते हैं, जिसके रास्ते में आता है कुंड, यहाँ से वायीं ओर पुल पार करते ही रास्ता केदारनाथ की ओर बढ़ता है। हम दायीं ओर के मार्ग से आगे बढ़ते हैं। अब तक बाहर मौसम गर्मी का अहसास करा रहा था, हिमालय टच बाली आवोहवा नदारद थी। यहाँ से अभिसिंचन भी शुरु हो जाता है, जिसे हम एक शुभ लक्षण मान रहे थे।

कुंड से संकरी सड़क के साथ ऊखीमठ की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में एक झरना दायीं ओर ध्यान आकर्षित करता है। सामने वायीं ओर गुप्तकाशी कस्बा दर्शनीय लग रहा था, जो पारम्परिक बसावट की वजाए अपने आधुनिक भवनों के कारण हमें किसी दूसरे औद्यौगिक शहर का भ्रम दे रहा था, लेकिन बापिसी में आते समय पता चला कि यही गुप्तकाशी है। रास्ते में वायीं ओर एक मार्ग काली मठ की ओर जाता है। हम दाएं मार्ग पर चोपता की ओर बढ़ रहे थे, जो थोड़ी देर में वायीं ओर उखीमठ की ओर मुढ़ता है। इससे थोड़ा पहले ओंकारेश्वर मंदिर पड़ता है, जो बाबा केदारनाथ एवं बाबा मदमहेश्वर का शीतकालीन आवास स्थल है। उखीमठ में प्रवेश करते ही शीतल आवोहवा वाला हिमालयन टच प्रारम्भ हो चुका था।

शनिवार, 20 जून 2026

जीवन बोध

समझें इस सुरदुर्लभ मानव जीवन का महत्व

मनुष्य जीवन कितना बेशकीमती है, इसका सामान्यतया अहसास नहीं हो पाता, क्योंकि यदि अहसास होता तो यह वहुमूल्य उपहार यूँ ही व्यर्थ नष्ट नहीं होता। दुर्व्यसन से लेकर नशा एवं आत्मघाती कृत्यों के साथ जीवन लीला को अपने हाथों से नष्ट करते समाचार नित्य समाचारों की सुर्खी बनते हैं। इसके साथ भ्रष्टाचार से लेकर आतंक एवं अपराधिक गतिविधियों के समाचारों के साथ देवत्व एवं ईश्वरत्व की संभावनाओं से युक्त मनुष्य जीवन को पतन-पराभव के गर्त में गिरते देखा जा सकता है। बिना सार्थकता की अनूभूति के जीवन की ऐसी दुर्गति को एक त्रास्द दुर्भाग्य ही माना जाएगा।

जबकि मनुष्य जीवन में सुख-शांति व सृजन के अभूतपूर्व रोमाँच की अनन्त संभावनाएं हैं। हर इंसान इनकी कल्पना भी करता है, नाना रुपों में पाने की चेष्टा करता है, लेकिन जीवन की सही समझ के अभाव में वह दिशा भटक जाता है और ये संभावनाएं अधूरी ही रह जाती हैं। जिस संतुष्टि, स्वतंत्रता व आनन्द की कल्पना मनुष्य बाहरी सम्पदा, मोह ममता और सत्ता सुख में करता है, वे भी अंततः मृग मारिचिका बनकर पहुँच से दूर हो जाती हैं और जीवन के अंतिम पलों में हाथ कुछ लगता नहीं। बिना किसी सार्थक निष्कर्ष के मानव जीवन के इस अवसान को एक दुर्घटना ही कहा जाएगा।

भारतीय परम्परा में मनुष्य जीवन को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उपहार गया है और इसे सुलदुर्लभ कहा गया है। देवता भी मनुष्य शरीर को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं, क्योंकि इसी में वे संभावनाएं मौजूद हैं, जो आत्मतत्व को जाग्रत करते हुए सकल मानवीय सीमाओं एवं दुःख को तिरोहत कर सके और जीव से शिव, नर से नारायण की यात्रा सम्पन्न करते हुए अंततः परमात्मा के प्रतिरुप आत्म-स्वरुप को प्राप्त कर सके।

भारतीय परम्परा में जीवन का मूल्य बाहरी उपलब्धियों, धन-दौलत व पद प्रतिष्ठा आदि में कभी नहीं रहा है, ये सेवा के लिए जीवन के सहज अवलम्बन हो सकते हैं, जीवन उद्देश्य नहीं। क्योंकि यदि इनके रहते भी व्यक्ति अशांत, असंतुष्ट, हैरान-परेशान और जीवन के आनन्द से वंचित है, तो यह घाटे का सौदा माना जाएगा। आश्चर्य नहीं कि बुद्ध भगवान से लेकर महावीर, नानक, कवीर एवं महर्षि रमण जैसे ऋषितुल्य शिखर पुरुष शांति, आनन्द व धन्यता की खोज में  किसी बाहरी सुख, सुविधा व सत्ता आदि के मोहताज नहीं रहे, बल्कि इन सबका त्याग करते हुए जीवन के परमलाभ को प्राप्त हुए और आज भी प्रेरणा के प्रकाशपुंज बनकर जीवन जीने का कालजयी संदेश दे रहे हैं।

इन सबका एक ही संदेश रहा कि जीवन की असली सम्पदा इंसान के अंदर कस्तुरी मृग की भाँति छिपी पड़ी है। भ्रम की मारीचिका के कारण वह इसे बाहर ढूंढता फिर रहा है। वासना, त्रिष्णा और अहंता के नागपाश में बंधकर वह जीवन की सुख-संतुष्टि की तलाश बाहर खोजने के लिए प्रेरित हो रहा है, लेकिन उसका हर प्रय़ास चूक जाता है और अंततः जब समय आता है तो काफी देर हो चुकी होती है। समय रहते इसकी समझ व अंतर्दृष्टि विकसित की होती, तो हाथ में कुछ सार्थक लगता, जिसकी वह चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहा था।

लकड़हारे की कहानी प्रख्यात है कि उसे राजा द्वारा उसके उपकार के लिए उपहार के रुप में एक चंदन का जंगल भेंट में मिलता है। राजा को आशा थी कि अब उसकी गरीबी दूर हो जाएगी और वह एक खुशहाल जीवन जीएगा। लकड़हारा इस वन से पेड़ काटकर, इसका कोयला बनाता और पास के शहर में जाकर बेच आता। यह सिलसिला कई माह वर्ष तक चलता रहा। और वह अपनी झोंपड़ी में इससे मिलने बाली धनराशि से गुजर बसर करता रहा।

जब एक दिन राजा जंगल में शिकार करते हुए वहाँ से गुजरता है तो आश्चर्यचकित होता है कि लकड़हारा उसी झोंपड़ी में रह रहा है, जबकि उसे उम्मीद थी कि वह अब तक सम्पन्न हो गया होगा। अब वहाँ कुछ पेड़ बचे थे। राजा ने पूरा हाल-चाल पूछा तो माथा थोककर रह गया। और लकड़हारे को समझाया कि यह चंदन का पेड़ है, जिसका एक पेड़ भी इसकी दरिद्रता को दूर करने के लिए पर्याप्त था। लकड़हारा अपनी मूर्खता पर पछताता है और बचे वृक्षों का सदुपयोग करते हुए शेष जीवन को सम्पन्नता एवं धन्यता के साथ गुजारता है।

यही कहानी हर इंसान की है, जिसे ईश्वर ने वे सारी क्षमताएं, विभूतियाँ बीज रुप में प्रदान की हैं - एक स्वस्थ-सबल काया, कम्प्यूटर से भी तेज चलने बाला मस्तिष्क, वायु से भी तीव्र मन, किसी भी समस्या को भेदने में सक्षम बुद्धि, प्रेरणा की अजस्र स्रोत भावनाएं, अस्तित्व के हर रहस्य को भेदने में सक्षम अंतर्प्रज्ञा, किसी भी कल्पना को मूर्त करने में सक्षम इच्छा शक्ति। औऱ साथ में समय के रुप में सबको चौबीस घंटे, जिनका सदुपयोग करते हुए वह अपनी मनचाही सृष्टि का सृजन कर सकता है। और अपने देवत्व, ईश्वरत्व को चैतन्य करते हुए इस जीवन को धन्य एवं सफल सार्थक कर सकता है।

देर इनके प्रति जागने भर की है, नित्य अपने अंतर मन में झांकने की है, आत्मनिरीक्षण करते हुए इसमें बाधक आंतरिक एवं बाह्य तत्वों को पहचान कर दूर करने भर की है। नित्य स्वाध्याय सतसंग एवं आत्मचिंतन-मनन के प्रकाश में प्राप्त अंतर्दृष्टि के आधार पर वह इसे सहजता से कर सकता है और जीवन शैली में आवश्यक परिवर्तन करते हुए, व्यक्तित्व में अभीष्ट पात्रता विकास के साथ जीवन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है और इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को सफल सार्थक बना सकता है।

 

शुक्रवार, 29 मई 2026

जीवनबोध

बिना मूल्य चुकाए, कुछ बड़ा हासिल न कर पाने की हताशा

जीवन में नीचे गिरना सहज-स्वाभाविक है, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। चारों ओर का प्रवाह भी इसमें सहायक है, लेकिन ऊपर उठना कठिन है, समय साध्य, कष्ट साध्य है। इसलिए आश्चर्य़ नहीं कि कम ही लोग ऊपर उठ पाते हैं, श्रेय पथ पर चल पाते हैं। अधिकांश लोग पगडंडियों का सहारा लेते हैं, शॉर्टकट से बिना अधिक श्रम किए, बिना मूल्य चुकाए सस्ते में, हो सके तो मुफ्त में ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, जो अन्त में एक भूल निकलती है और हाथ में हताशा-निराशा के अलावा कुछ लगता नहीं।

माना कि ऊपर उठना सहज नहीं, यह अनुशासन की माँग करता है, तप की तपन से गुजरना माँगता है, श्रम एवं पुरुषार्थ के श्वेत बिंदुंओं का श्रृंगार करना पड़ता है। लेकिन यही यही जीवन निर्माण का राजमार्ग है, चरित्र गठन की प्रक्रिया है, यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाला शाश्वत मार्ग है और यही पूर्णता की ओर ले जाता मुक्ति पथ भी। इसलिए समझदार लोग इसका सहर्ष वरण करते हैं और इसके लिए आवश्यक मूल्य चुकाने के लिए सदा तैयार रहते हैं।

नैतिकता का वरण क्यों करें

अच्छे क्यों बनें, नैतिक क्यों बनें, प्रश्न सहज ही मन में उठ सकता है, जीवन के पड़ाव पर कई बार कौंधता है। इसके कई उत्तर हो सकते हैं। लेकिन इसका सीधा सपाट उत्तर तो एक ही है कि जीवन की जो संभावनाएं बीज रुप में जीवात्मा में विद्यमान हैं, जो परामात्मा का अंश होने के नाते ईश्वरतुल्य हैं, नैतिकता इनके साकार होने का प्रवेश बिंदु है।

नैतिकता का वरण करते हुए मनुष्य नर पिशाच की असुरता से नर पशु की ओर ऊपर उठता है। फिर मानवीय संवेदना को धारण करता हुआ नर मानव की गरिमा को प्राप्त होता है। और फिर अपनी मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करते हुए महामानव की श्रेणी में खड़ा होता है और फिर अपनी क्षुद्रताओं का तिरोधान करते हुए, अंतर्निहित देवत्व के जागरण के साथ देवमानव बनता है। इस तरह नर से नारायण, जीव से शिव बनने की प्रक्रिया नैतिकता, चरित्र निर्माण के आधार पर घटित होती है और जीवन की चरम संभावनाओं का द्वार खुलता है।

बिना नैतिकता के इंसान को पशु बनते देर नहीं लगती, इससे भी नीचे गिरते हुए आसुरी एवं पैशाचिक कृत्यों के साथ उच्चतर संभावनाओं के सत्यनाश की आत्मघाती दुर्घटना के साथ घटित हो सकती है। इस तरह नैतिकता को अपनाना किसी दूसरे पर उपकार या कोई अहसान नहीं, बल्कि यह स्वयं के प्रति ही उपकार है, स्वयं के जीवन की सुख, शांति और सद्गति का आधार है।

भाग्य एवं पुण्य का खेल

पुरुषार्थ अपनी जगह, लेकिन भाग्य एवं पुण्य की भूमिका को नकार नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, तो समझो कि यह उसके वर्तमान कर्मों का फल नहीं है, वह अपने पूर्व के संचित शुभ कर्मों या पुण्यों का फल है अर्थात वह अपने भाग्य का फल भोग रहा है। अतः जब तक यह पुण्य प्रबल रहता है, तब तक नाम यश, धन, सुख, लोक सम्मान, मानवीय प्यार आदि सर्वसुलभ एवं सहज प्रतीत होते हैं। लगता है कि ये तो जैसे अपने जन्मसिद्ध अधिकार हैं और व्यक्ति तप एव पुण्य के प्रति उदासीन हो जाता है।

ऐसे में आश्चर्य नही कि व्यक्ति भोगों की आँधी और अहं की मदहोशी में भूल-चूकों के साथ पाप वृत्तियों में मश्गूल हो जाता है। क्रमशः पुण्य क्षीण होने लगते हैं और इसी के साथ अर्जित नाम, यश, स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य भी सब क्षीण पड़ने लगते हैं और इसके साथ तथाकथ सब अपने भी छिटकने लगते हैं। जैसे कंगाल व्यक्ति फिर बाजार से कुछ खरीद नहीं सकता, यही स्थिति पुण्यहीन व्यक्ति की होती है। संसार में फिर कुछ हाथ नहीं लगता, सब बेगाना सा हो जाता है। जो पहले दुआ-सलाम करते थे, आगे पीछे घूमते थे, वे अब पूछते तक नहीं, राह में मिलते हैं, तो मुंह फेर लेते हैं।

यदि व्यक्ति समझदार है, तो जगत के ऐसे तत्वबोध के साथ आत्म-बोध के पथ पर अग्रसर हो जाता है और अध्यात्म मार्ग का पथिक बन जाता है। जीवन के प्रति सजग हो जाता है और ईश्वर का अवलम्बन लेकर निर्बल के बल प्रभुश्रीराम (समर्थ ईष्ट-आदर्श) की शरण में जाता है और जीवन के नवनिर्माण की नूतन पटकथा लिखता है।

जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा का औचित्य

जीवन में दुःख, कष्ट, पीड़ा क्यों मिलते हैं, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में बुरे, धूर्त एवं दुष्ट लोग क्यों हैं। ये प्रश्न यदा-कदा कौंध सकते हैं, जब इनके अवांछनीय प्रवाह के बीच अनावश्यक पीड़ा, कष्ट एवं दुःख से गुजरना पड़ता है।

मानकर चलें कि ईश्वर की कर्मप्रधान सृष्टि में यह अनायास नहीं होता। यदि कोई इन परिस्थितियों से गुजरने के लिए विवश-बाध्य अनुभव कर रहा है तो शांत मनःस्थिति में स्पष्ट होगा कि ये सब प्रकृति माँ कहो या परमपिता परमेश्वर के उपहार हैं। हालाँकि तत्काल इनके औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इनके लाभ एवं निहितार्थ को जानना-पहचानना कठिन होता है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट होता है कि जीवन यदि इन अग्नि परीक्षाओं से न गुजरा होता तो, वह तप कर कुंदन नहीं बनता।

और यह भी स्पष्ट होता है कि स्वर्ग का रास्ता नरक से होकर गुजरता है, शांति का मार्ग अशाँति के विप्लवी दौर से होकर ही पूर्णता को पाता है। असत से सत, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमृत अर्थात शाश्वत जीवन की यात्रा इसी आधार पर घटित होती है। अनन्त धैर्य, अपार श्रद्धा और अनवरत प्रयास ही इस मार्ग के पाथेय हैं। न ही यहाँ कोई शॉर्ट कट हैं और न ही किसी दूसरे के कंधे पर सवार होकर इसे पार किया जा सकता है।

सोमवार, 18 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-2

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

इस यात्रा में आते-जाते लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के दर्शन हुए, बीच-बीच में घास के टापुओं और घाटी-मैदानों को भी देखे। लगा हमारे पूर्वज फुआल, यहीं कहीं भेड़ों को लेकर आते रहे होंगे। यहाँ के विकट जीवन को देखकर ताज्जुक किए कि कैसे वे अपने साथ महीनों का राश्न लेकर यहाँ पहुँचते रहे होंगे, जहाँ रुकने के लिए सही ढंग का ठिकाना भी नहीं है।

नानाजी कहा करते थे कि वहाँ पत्थरों को एक के ऊपर एक सटाकर दिवार व छत्त बनाकर रहने लायक गुफानुमा बसेरे तैयार होते, जिससे बारिश में उनकी कुछ रक्षा हो पाती। लेकिन भेड़-बकरियों के लिए ऐसी सुरक्षा व छत्त अधिकाँशतः उपलब्ध नहीं रह पाती और वे खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने के लिए विवश रहती। कल्पना करना कठिन है कि बारिश व ठंड में वे किस तरह यहाँ दिन व रात गुजारती रही होंगी। हालाँकि ईश्वर ने उन्हें गर्म ऊन का एक मोटा सा जैकेट अवश्य दिया है, जो इन विकट परिस्थितियों में ठंड से उनकी रक्षा करता है। यह ऊन फुआलों के लिए भी वरदान से कम नहीं  होती। वर्ष में अमूनन दो बार वे इसको काटकर इसको बेचते हैं और कुछ ऊन से अपने व परिवारजनों के लिए कोट से लेकर कम्बल तैयार करते हैं।

मालूम हो कि फुआल परम्परा से भेड़ की ऊन से मोटे कम्बल (दोहड़ू) तैयार करते रहे हैं, जो बारिश के बीच जंगलों में उनके क्वच का काम करते और बकरी के रेशेदार ऊन से बने ऑवरकोट (कुंठ) वाटरप्रूफ जैकेट का काम करते। साथ ही जंगल में इनसे मजबूत बिछावन (सेला) की व्यवस्था हो जाती। आज तो टैंट से लेकर आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था है, लेकिन हमारे पूर्वज फुआल इन सुविधाओं से वंचित थे। यहाँ भी कल्पना करना कठिन है कि किस तरह वे बिना तरपाल या तंबू के पेड़ के नीचे प्रकृति के विषम प्रहारों को झेलते रहे होंगे। आश्चर्य नहीं कि फुआलों को एक काठी जात (रफ-टफ) माना जाता है, जो फौलादी तन-मन व जीवनट के साथ हर तरह की परिस्थितियों में सरवाइव करना जानते हैं। उनके साथ होता है परम्परा एवं नैसर्ग से मिला आंतरिक जीवट और स्वतःस्फुर्त आत्म-विश्वास तथा साथ में प्रकृति की अधिष्ठात्री महाशक्ति और पशुपतिनाथ भोलेनाथ का भरोसा। जिसके चलते इनका चूल्हा भी धुनि का रुप लिए होता है।

लाहौल में तो नानाजी कहा करते थे कि खाना बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ियाँ भी मिलना कठिन हो जाती थी। इस ठंडे रेगिस्तान में कुछ इलाकों में बैठर (सुगंधित देवदार की छोटी प्रजाति, जिसकी सूखी पत्तियों को देवकार्यों में धूप-अग्रवती के रुप में उपयुक्त किया जाता है) की सूखी झाड़ियों से काम चलाते या भेड़ों की मिंगणियों को सुखाकर इनका इंधन के रुप में उपयोग करते। यदि कहीं दूरस्थ गाँव वासियों के मवेशी यहाँ चरते तो उनके गौवर के उपले ईंधन में काम आते।

वीहड़ वनों में आग सुलगाने की पारम्परिक व्यवस्था भी विशिष्ट रहती। हम स्वयं नानाजी को मुलायम बाचा घास से आग जलाते देखे हैं। जिसमें वे चकमक सफेद पत्थर के ऊपर लौहे की साज (छोटी हथोड़ी) का त्वरित प्रहार करते, जिसके घर्षण के साथ चिंगारियाँ निकलती और बाचा घास आग पकड़ लेती। इससे वे अपनी चिल्म जलाते थे और चूल्हे की आग भी प्रज्जवलित होती।

देवदार के जंगलों में तो आग जलाने के लिए शोली (विरोजायुक्त देवदार की लकड़ी, जो माचिस से तुरन्त आग पकड़ लेती है) भी रहती। आज तो लाइटर से लेकर तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। कह सकते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ फुआल लोगों के जीवन को थोड़ा राहत आवश्य मिली है। मोवाइल फोन आने से वे अपने घर-परिवार से संपर्क में भी रहते हैं, हालाँकि नेटवर्क हर जगह उपलब्ध नहीं रहता। कुछ विशेष ऊँचे स्थानों पर आकर ही वे संपर्क साध सकते हैं। जबकि पहले महीनों घर की कोई खबर नहीं रहती। जंगल में तो किसी तरह की डाक सुविधा भी नहीं थी। घर-परिवार के सुख-दुःख में भाग लेने के लिए उन्हें दिनों-सप्ताह लग जाते। कल्पना कर सकते हैं कि फुआल जीवन तब कितना त्याग, तप और कठिनाई भरा रहा होगा।

प्रायः डेरा जलस्रोत के पास ही रहता, सो यहाँ का जड़ी-बूटियों से युक्त (चार्ज्ड) प्राकृतिक जल किसी वरदान से कम नहीं होता। जो एक ओर जहाँ पाचन को दुरुस्त रखता, वहीं छोटे-मोटे रोगों की भी दवा का काम करता। हालाँकि ऊँचाइयों में तो ग्लेशियर से आता जल ही नसीव होता। इस जमाने वाले ठंडे जल में नित्य स्नान संभव नहीं था, सो इसका भी मुहुर्त निकलता। 

गर्मी व बारिश में नानाजी लोग लाहौल जाते, तो सर्दी में नीचे मंडी-सलापड़ की ओर कूच करते। बचपन में जब हम पुश्तैनी मकान की खिड़की के पास बैठते तो वहाँ से मंडी साइड के पहाड़ दिखाई देते। इसके साथ नानाजी के रोमाँचक किस्सों के संग हम कल्पना की उड़ान भर कर वहाँ की भाव यात्रा करते। मंडी साइड से ही वे तेजपत्र के जंगल की बात करते और घर में उनके लाए सूखे तेजपत्र मसाले के रुप में पर्व-त्यौहारों के व्यंजनों में उपयुक्त होते।

यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारे जंगलों में, राह में कुछ ऐसे विशेष स्थान भी हैं, जिन्हें रुआड़ (चट्टान से बनी प्राकृतिक गुफाएं) कहते हैं, जिनकी आड़ में भेड़-बकरियाँ बारिश व बर्फवारी में सुरक्षित-संरक्षित रहती हैं। फिर देवदार से लेकर रई-तौस व जंगली खनोर (चेस्टनट) के गगनचुम्बी वृक्षों के नीचे भी उनके लिए सिर छुपाने की जगह मिल जाती।

फिर जंगल में भालू से लेकर गुलदार एवं शंकू जैसे खुंखार जानवरों का भी खत्तरा रहता, जो रात को आकर कभी भी झुंड़ पर हमला कर नुकसान पहुँचा सकते हैं। ऐसे में हालाँकि रात को पहाड़ी कुत्ते सजग एवं नैष्ठिक पहरेदार की भाँति पहरा देते और स्वयं फुआल भी विशेष परिस्थितियों में रात भर नींद के बीच भी जागते हुए रखवाली करते। नानाजी ऐसी भिड़ंत के लोमहर्षक किस्से सुनाते, कैसे वे भालू आने पर पेड़ पर चढ़ गए थे, और भालू पीछा कर रहा था तो ऊपर से उसकी नाक पर लात मारकर और पेड़ को हिलाकर उसे भगा दिए थे।

यहाँ यह भी बता दें कि नानाजी बहुत ही निडर और दिलेर किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें कई मन्त्र सिद्ध थे और उन्होंने शमशान में साधना कर ये मंत्र सिद्ध किए थे। साँपों को चुटकी में वश करना उन्हें आता था और वे उसे पकड़ कर दूर निर्जन स्थान पर छोड़ देते। मंत्र सिद्धि की शर्त थी कि साँप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

जंगली पक्षियों से लेकर जीवों के शिकार के किस्से भी भी वे बड़े उत्साह और संजीदगी से सुनाते। हालाँकि आज हम इस तरह की हिंसक गतिविधियों के समर्थक नहीं है, लेकिन लोकजीवन में परम्परागत चलन अपनी जगह हैं, जो इतिहास का हिस्सा बने हुए हैं। आज भी घाटी के प्राचीन मंदिरों में ऐसे दुर्लभ जीव-जंतुओं के सींग और अवशेष टंगे मिलेंगे, जो कभी जंगलों में विचरण करते रहे होंगे और आज विलुप्त हैं।

किन परिस्थितियों में यह सब हुआ शोध का विषय है, लेकिन नानाजी के फुआल जीवन के संग हम उस समुदाय के जीवन के संघर्ष, रोमांच व कठोर यथार्थ को कुछ-कुछ समझते रहे। चम्बा साइड में यही समुदाय गद्दी के रुप में विशिष्ट पहचान रखता है, जिसकी अपनी संस्कृति है, परम्परा है और जो अमूनन फुआलों के उपरोक्त वताए किस्सों से मिलती-जुलती है। वे भी चम्बा से दुर्गम कुगती पास या काली छो दर्रे को पार कर लाहौल घाटी पहुँचते हैं और तप-त्याग एवं कठोर श्रम भरे भेड़ पालन के पेशे को निभाते हैं।

फुआलों के ऊपर बताए गए कठोर जीवन के साथ उनके प्रकृति की गोद में अलमस्त व एकांत शांत जीवन की कल्पना भी हमें रोमाँचित करती, कि काश एक वार हम भी कुछ दिन, सप्ताह या माह उनके साथ रहकर इसको अनुभव करें। आज भी यह अरमान बाकि हैं। देखते हैं किस तरह प्रकृति-परमेश्वर, आदिशक्ति-भोले बाबा इसकी व्यवस्था करते हैं और हम फुआल जीवन के फर्स्ट हैंड अनुभव को जी पाते हैं और बीहड़ वन के रफ-टफ एवं रोमाँचक जीवन को सुधी पाठकों तक पहुँचा पाते हैं।

शनिवार, 16 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-1

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

गाय-बैल के साथ भेड़-बकरियों का पालन पूरे गाँव का पुश्तैनी पेशा रहा। प्रारम्भ से पहाड़ों में अन्न, दाल व सब्जियों के सीमित विकल्प होने के कारण भेड़-बकरियों का पालन बुजुर्गों का मुख्य व्यवसाय रहा। सर्दियों में अधिक बर्फ के चलते अन्न व फल शाक के साधन सीमित रहते, सो पशु धन लोगों की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते। सर्द मौसम में ठंड से बचाव के लिए भेड़-बकरियों से ऊन मिल जाती और आपातकाल में इनसे दूध से लेकर माँस आदि की आवश्यकता पूर्ति हो जाती।

घर में एक व्यक्ति की ड्यूटी इनको चराने की रहती। सुबह आठ-नौ बजे क्लार (ब्रँच) के बाद घर का एक सदस्य इनके काफिले को लेकर जंगल में जाता। भेड़ के छोटे मेमणों व बकरियों के छोटे बच्चों (छेलूओं) को घर में ही एक विशिष्ट स्थान पर रखा जाता। सर्दियों में चूल्हे व तंदूर बाले कमरे में एक बाढ़ा लगाकर एक कौने में इनको रखा जाता, जिसमें फर्श पर नरम घास-पत्तियां बिछी रहती। बचपन इनके बाढ़े में घुसकर उनके साथ लाड़-प्यार करते, खेलते कैसे बीता, पता ही नहीं चला। अभी भी इनके साथ बिताए विशिष्ट पल याद करने पर गुदगुदाते हैं, एक सुखद सिहरन पैदा करते हैं। खुला छोड़ने पर इन नन्हें फरिश्तों की ऊछल-कूद देखने लायक रहती।

शाम को भेड़-बकरियाँ जंगल से घर आते ही अपने मेमनों व छेलुओं को याद करतीं। इनकी विशेष आबाजें सुनकर मेमने व छेलू भी मिलने के लिए जैसे मचल जाते और सीधा उनके पास पहुँचकर स्तनपान करते। जीव-जंतुओं के इस ममत्व भाव को देखकर ईश्वर की कलाकारिता पर विचार होता कि उसने अपनी सृष्टि को चलाने के लिए कैसे जीव-जंतुओं से लेकर इंसान को तक ममत्व एवं वात्सल्य की डोर में बाँध रखा है, जिसके चलते उसकी सृष्टि का पालन-पौषण एवं विस्तार सहज रुप से होता रहता है।

बचपन ननिहाल में बीता, सो हमारे मामू साहब भेड़ों-बकरियों को लेकर जंगल में जाते। हमारे बुजुर्ग नानाजी भी भेड़-बकरियों का पालन कर चुके थे, व कई बार इनके झुंडों के साथ फुआल की भूमिका में लाहौल-स्पिति जा व रह चुके थे। वे बड़ी रूचि के साथ वहाँ बिताए रोमाँचक पलों को याद करते और कथा-कहानियों व किवदंतियों के रुप में हम बच्चों को बड़े शौक और गर्व के साथ सुनाते। जो निश्चित रुप से हमारे बाल मन को रोमाँचित करती, कहीं गहरे छू जाती। और हमारा संकल्प बलवती होता कि एक बार हम भी इस यात्रा का हिस्सा अवश्य बनेंगे और कुछ दिन-सप्ताह या माह वहाँ रहकर जीवन की बीहड़ सच्चाई को नज़दीक से देखेंगे।

बारिश में लाहौल-स्पिति जाने से पहले भेड़-बकरियों का काफिला गाँव के ऊँचाई वाले जंगल में ही रहता, यहाँ रुकने के लिए रुआड़ थे व साथ ही देवदार से लेकर रई-तोश के आसमान छूते सदावहार हरे-भरे वृक्ष। जंगली खनोर (चेस्टनट) के पेड़ों से गिरने के सीजन में तो भेड़-बकरियों की डाइट प्लानिंग होती। एक दिन पनाणी शिला में खनोर के जंगलों में चरती और दो दिन ऊपर ठेली (जंगली घास के ढलानदार मैदान, बुग्याल) में। जंगली खनोर के गिरे काले रंग के गिरिदार बीजों को भेड़-बकरियाँ फोड़कर खातीं, जिनको बहुत पौष्टिक माना जाता है। अधिक खाने पर पेट फूलने का डर रहता, सो बाकि के दो दिन इनसे दूर रखा जाता।

जुलाई माह में हमारे इलाके में मौनसून की बारिश होती, सो फुआल मई-जून में लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते। मालूम हो कि लाहौल-स्पिति घाटी में मौनसून की बारिश नहीं होती। कुल्लू-मानाली के आगे पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला मौनसून के नम बादलों को आगे बढ़ने से रोकती है। इस तरह लाहौल-स्पिति घाटी भेड़ पालकों के लिए इस सीजन में आदर्श रहती।

सड़कें तो बाद में बनीं, हमारे पुरखों के समय तो आवागमन का मार्ग पहाड़ों की ऊँचाईयों में धार (रिज़) से ही रहता। काइस धार से आगे पटोउल, फुटा सोर, दोहरा नाला और फिर रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास और फिर आगे कई पर्वत शिखरों को पार करते हुए हामटा पास पहुँचते, वहाँ से आगे रोहतांग दर्रा पार करते हुए लाहौल-स्पीति घाटी में प्रवेश होते और वहाँ से चंद्रताल से लेकर बारालाचा, सूरजताल के बीच भेड़-बकरियों के काफिले को चराते हुए कुछ माह वहाँ रहते।

सड़क मार्ग बनने से फिर फुआलों की भेड़ें सीधे सड़कों से होते हुए आगे बढती हैं, हालाँकि ट्रैफिक के चलते काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आवादी के बीच बढ़ते हुए भेड़ चौरों का भी भय रहता है। इसलिए मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहीं जंगल से होते हुए भेड़ों को चरवाते हुए आगे बढ़ते हैं और कहीं सीधे सड़क मार्ग से लाहौल स्पीति की ओर कूच करते हैं। मालूम हो कि कुल्लू व लाहौल घाटी को जोड़ने वाली अटल टनल में भेड़-बकरियों के लिए वैकल्पिक मार्ग मुख्य मार्ग के नीचे बनाया गया है, यह कितना उपयोग में है, इसको तो सुधी लोग ही बता सकते हैं।

नानाजी लाहौल घाटी के नीरु घास का जिक्र खूब करते, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है। इसको खाने से भेड-बकरियों में चर्बी बढ़ती है और इसका अत्यधिक सेवन नुकसानदायक भी माना जाता है। यहाँ तक कि इसके अत्यधिक सेवन से भेड़-बकरियों की मौत भी हो सकती है। अतः इसका यथोचित ही सेवन हो, ये फुआल ध्यान रखते। इसके अतिरिक्त कोड़ु, पत्तीस व अन्य जड़ी-बूटी नुमा घास भी इस घाटी के उच्चर क्षेत्रों में होती, जिसके सेवन से भेड़-बकरियाँ विशेष पौषण पाती और इनके दूध में भी इसके स्वाद व पौष्टकता का समावेश होता। इस तरह फुआलों से लेकर कुत्तों को तक इनका दूध आवश्यक पौषण का काम देता।

नानाजी से भेड़ चरवाने के रोमाँचक किस्सों को सुनते-सुनते यह भाव बलवती होता गया कि गाँव के जंगल से लाहौल-स्पीति तक यात्रा एवं वहाँ पर रुकने के अनुभव का डॉक्यूमेंटेशन करेंगे, इसकी कथा-गाथा व रोमाँच को लिपिवद्ध करेंगे। हमारे बचपन का यह सपना, सपना ही रहा, लेकिन 22-23 वर्ष की आयु में हमें पर्वतारोहण करते हुए लाहौल-स्पिति घाटी में जाने का अवसर अवश्य मिला। हालाँकि तह तक नानाजी गुज़र चुके थे।  

मानाली में पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक प्रशिक्षण के दौरान हम पूरी टीम के साथ मानाली से अपने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में रोहताँग दर्रा पार करते हुए, खोखसर पहुँचे, फिर सिसू से होते हुए तांदी पुल पार करते हुए कैलाँग पहुंचे और फिर जिस्पा में पर्वतारोहण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र में रुके और आगे दारचा पार करते हुए, पटसेऊ और फिर जिंगजिंगवार में अपना बेसकैंप लगाए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-2, मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर

यहाँ की आइस फील्ड़ और बर्फ की ढलानों पर आठ-दस दिन का अभ्यास करते हुए फिर सूरजताल झील, बारालाचा दर्रा पहुँचे और वहाँ से लगभग 18,000 फीट ऊंची चोटी का आरोहण किए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-3, लाहौल घाटी में पर्वतारोहण और शिखर का आरोहण

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले नहीं जब कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर हर पल।12।

चुनींदी पोस्ट

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Stick to your heartfelt CONVICTION, rest assured!                   1.      Be aware of your Divine essence & Love yourse...