संदेश

दिसंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वर्ष 2019 स्वागत के लिए खड़ा तैयार

चित्र
 बढ़ना धीरे-धीरे , उर में धीरज अनन्त, आशा अपार खड़े जहाँ तुम, बढ़ो वहीं से आगे, वर्ष 2019 स्वागत के लिए खड़ा तैयार। बस ध्यान रहे आदर्श अपना, हिमालय सा उत्तुंग, ध्वल, लक्ष्य मौलिक, अद्वितीय, सत्य, शिव, सुंदर। बहते रहना हिमनद सा अविरल, राह का लेना आनन्द भरपूर, पथ की हर चुनौती, बिघ्न-बाधा रहे सहर्ष स्वीकार, वर्ष 2019 स्वागत के लिए खड़ा तैयार। कहीं गिरोगे पथ में, राह फिसलन भरी, उठना, संभलना, दुगुने वेग से आगे बढ़ना, कदम बढ़ते रहे, तो मंजिल मिलकर रहेगी, धीरे-धीरे बढ़ना, रख धीरज अनन्त, आशा अपार, वर्ष 2019 स्वागत के लिए खड़ा तैयार। क्रमशः निखार आएगा जीवन में, देना गति सबको, जो बढ़ने को तैयार, मिलेंगे बिघ्नसंतोषी भी राह में, मिले सबको सद्बुद्धि, सद्गति ये प्रार्थना, उर में धारण किए स्नेह, सद्भाव और प्यार, वर्ष 2019 स्वागत के लिए खड़ा तैयार।

सेब उत्पादन में क्रांतिकारी पहल के अग्रदूत

चित्र
अब मैदानी इलाकों में सेब की महक सेब का नाम लेते ही शिमला , कश्मीर और कुल्लू जैसे पहाड़ी क्षेत्रों के नाम जेहन में कौंध जाते हैं जहां इसकी उम्दा फसल स्वाभाविक तौर पर बहुतायत में उगाई जाती है। गर्म मैदानी इलाकों में सेब की फसल की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कुछ ऐसे ही जैसे ठंडे पहाड़ों में आम की फसल की कोई सोच भी नहीं सकता। इनकी गुठली से पौध अंकुरित हो भी जाएं तो सर्दी में पाला मार जाए। ऐसे ही मैदानों में सेब का बीज पौध बन भी जाए तो गर्मी में झुलस जाए या उसके फूल व फल सही ढंग से विकसित नहीं हो पाएं। लेकिन हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला के पनियाला गांव के प्रयोगधर्मी किसान हरिमन शर्मा ने अपनी सूझबूझ से सेब की एक ऐसी वैरायटी तैयार की है , जो गर्म मैदानी इलाकों में भी उम्दा सेब की फसल दे रही है। 1800 फीट पर बसी इनकी नर्सरी देशभर के किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुकी है , जिसके चलते गर्म मैदानी इलाकों में भी सेब उत्पादन की संभावनाएं साकार हो रही हैं। हिमाचल के बिलासपुर , कांगड़ा , हमीरपुर , ऊना , सोलन , मंडी जैसे जिलों में उसके सफल प्रयोग बगीचों का रूप ले चुके

जंगलीजी का मिश्रित वन – एक अद्भुत प्रयोग, एक अनुकरणीय मिसाल

चित्र
जंगल में मंगल रचाने की प्रेरक मुहिम जंगल तो आपने बहुत देखे होंगे , एक खास तरह की प्रजाति के वृक्षों के या फिर बेतरतीब उगे वृक्षों से भरे बीहड़ वन। लेकिन उत्तराखण्ड के कोटमल्ला , रुद्रप्रयाग में स्थित जंगलीजी का मिश्रित वन इनसे हटकर जंगल की एक अलग ही दुनिया है , जहां लगभग साठ किस्म के डेढ़ लाख वृक्ष लगभग चार हैक्टेयर भूमि में फैले हैं। यह सब जंगलीजी के पिछले लगभग चालीस वर्षों से चल रहे भगीरथी प्रयास का फल है। चार दशक पूर्व बंजर भूमि का टुकड़ा आज मिश्रित वन की एक ऐसी अनुपम मिसाल बनकर सामने खड़ा है , जिसमें आज के पर्यावरण संकट से जुड़े तमाम सवालों के जवाब निहित हैं। यहां पर हर ऊंचाई के वृक्ष उगाए जा रहे हैं। जिन्हें सीधे धूप की जरूरत होती है , वे भी हैं , इनकी छाया में पनप रहे छायादार पेड़ भी। और जमीं की गोद में या जमीं के अंदर पनपने वाले पौधे भी इस वन में शुमार हैं। इनमें 25 प्रकार की सदाबहार झाड़ियां व पेड़ , 25 प्रकार की जड़ी-बूटियां व अन्य कैश क्रोप्स हैं। मिश्रित वन के इस प्रयोग ने जंगल में ऐसा वायुमंडल तैयार कर रखा है कि यहां 4500 फीट की ऊंचाई पर 7000 से 9000 फीट व