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बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेरा गाँव मेरा देश – देवभूमि की एक भूली बिसरी विरासत

शेर-ए-कुल्लू, लाल चंद प्रार्थी, चाँद कुल्लवी

कुल्लू-मनाली लेफ्ट बैंक सड़क के मध्य में एक मनोरम पड़ाव पड़ता है नग्गर, जो कभी कुल्लू के राजघराने का निवास स्थान रहा है और कुल्लू की राजधानी भी, जिसके अवशेष नग्गर कैसल, हेरिटेज होटेल के रुप में आज भी मौजूद हैं। हम जब भी अपनी जन्म-भूमि पधारे, तो वहाँ से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित नग्गर जाने का मौका कई बार मिला, कभी सीधे नग्गर को एक्सप्लोअर करने के वहाने, तो कभी मानाली की ओर बढते हुए।

नग्गर बस स्टॉप से मुश्किल से 200 मीटर पहले सड़क के ऊपर दायीं ओर लालचंद प्रार्थीजी का पुश्तैनी बंगला पड़ता है। लोकजीवन में प्रार्थीजी की चर्चा बचपन में अपने बढ़े-बुजुर्गों से सुनते आए, लेकिन उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा तब जागी, जब उनका देहावसान (1982) हो चुका था। नग्गर में रोरिक गैलेरी जाते तो उनके संदर्भ में काफी सामग्री मिलती रही, लेकिन नग्गर में प्रार्थीजी की विरासत को संजोता कोई ठिकाना नहीं दिखा, न ही उनके नाम से प्रचलित साहित्य मिला।

हमारी खोज मूलतः उनकी कालजयी रचना कुल्लूत देश की कहानी को लेकर थी, जब इसका सार संदेश कहीं पढ़ने को मिला था। इस संदर्भ में चर्चा इस लेख के अंत में मिलेगी, पहले प्रार्थीजी के जीवन के मुख्य पहलुओं से परिचय करवाती कुछ बातें शेयर करना चाहूंगा, जो हमें उपलब्ध साहित्य के अवलोकन पर मिली।

लाल चंद प्रार्थी हिमाचल प्रदेश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, प्रख्यात लेखक, कलाकार, कवि और संस्कृति प्रेमी थे। लाल चंद प्रार्थी को उनकी बेहतरीन काव्य और साहित्यिक रचनाओं के कारण 'चांद कुल्लवी' के नाम से भी जाना जाता था और उनकी अद्भुत शायरी के लिए उन्हें हिमाचल का 'मिर्ज़ा ग़ालिब' भी कहा जाता है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन में उन्होंने राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की।

अपनी विशेषताओं एवं योगदान के लिए उन्हें हिमाचल के लाड़ले, कुल्लवी चाँद, शान-ए-कुल्लू, शेर-ए-कुल्लू जैसे नामों से संबोधित किया गया। हिमाचल प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री वीरभद्रजी के शब्दों में, प्रार्थी जी देशभक्त, लोक संगीत प्रेमी, लेखक तथा कवि थे। उन्होंने हिमांचल के सांस्कृतिक जीवन में नयी प्रेरणा जगाई तथा पहाड़ी भाषा और साहित्य के लिए अनथक कार्य किया। वह हिमाचल मन्त्रीमण्डल के सदस्य के रूप में जितने लोकप्रिय थे, साहित्यिक क्षेत्र में उससे कम लोकप्रिय नहीं थे।

जन्म एवं शिक्षा – प्रार्थीजी का जन्म 3 अप्रैल 1916 को कुल्लू जिले के नग्गर गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद में डिग्री प्राप्त की थी और स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। लाल चंद प्रार्थी को हिमाचल प्रदेश में 'भाषा विभाग' और 'कला संस्कृति अकादमी' की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। इस कारण उन्हें हिमाचल की कला-संस्कृति का जनक भी माना जाता है।

सामाजिक राजनैतिक जीवन - प्रार्थीजी एक आयुर्वेदाचार्य थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी। वे कुल्लू क्षेत्र से तीन बार (1952, 1962, और 1967) विधानसभा सदस्य चुने गए और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। इस तौर पर वे कुल्लू से हिमाचल विधान सभा में, भाषा संस्कृति एवं कला मंत्री के रुप में सुशोभित रहे। इसके साथ वे समाज सेवा में भी अग्रणी रहे।

साहित्य सृजन एवं सांस्कृतिक अवदान – प्रार्थीजी एक उम्दा साहित्यकार, उर्दू, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी में समान अधिकार रखते थे। प्रो. नारायण चन्द पराशर के शब्दों में, श्री लाल चन्द प्रार्थी का स्मरण आते ही पहाड़ी भाषा साहित्य तथा संस्कृति के प्रति जागरूक करने तथा अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले प्रेरक व्यक्तित्व की तस्वीर उभर कर सामने आती है। डॉ० यशवन्त सिंह परमार के साथ मिलकर उन्होंने जिस स्वप्न को साकार करने के लिए सफल प्रयत्न किए, वह हिमाचल के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। न केवल पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल हुए, अपितु प्रथम नवम्बर, 1966 से पहाड़ी भाषा, साहित्य तथा संस्कृति का युग भी आरम्भ हुआ।

प्रार्थीजी जीवन भर पहाड़ी भाषा-संस्कृति के विकास के लिए प्रयत्नशील रहे। आयुर्वेद की भी उन्होंने उल्लेखनीय सेवा की। प्रार्थीजी न केवल एक सफल राजनीतिज्ञ थे, अपितु लेखक, चिन्तक, कवि और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी थे। लाल चन्द प्रार्थी 'चान्द कुल्लवी' के नाम से पहाड़ी तथा उर्दू में लिखते रहे। "हिमत केरिया अपणे देसा री किस्मत बणाणी असा" उनकी यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। पत्रकारिता और सम्पादन के माध्यम से उन्होंने प्रदेश की भरपूर सेवा की। कुलूत देश की कहानी उनकी एक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें इतिहास और संस्कृति, धर्म तथा दर्शन का तथ्यपरक वर्णन है। इस प्रकार प्रार्थीजी पहाड़ी संस्कृति के प्रबल उद्घोषक थे और वे महाराजा संसार चन्द, पहाड़ी गान्धी बाबा कांशीराम तथा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के स्वप्नों को साकार करना चाहते थे। यही दायित्व आज हमारे ऊपर है कि हम उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए उनके संदेश को दोहराएं –

शबे गम के अन्धेरे से न घबरा ए-मुसाफिर।

तेरे लिए बेताब है आगोश सहर का।।

(प्रो० नारायण चन्द पराशर, शिक्षा, भाषा-संस्कृति मन्त्री एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, हिमाचल अकादमी, चैत्र १ शक सम्वत् १६१६)

कालजयी साहित्यिक रचना - "कुलूत देश की कहानी" लाल चंद प्रार्थी द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक एवं कालजयी पुस्तक है। वर्ष 1971 में प्रकाशित यह कृति आज के कुल्लू (प्राचीन नाम: कुलूत) क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास, लोक-संस्कृति, राजनीति और विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

कुलूत (कुल्लू) को भारत के प्राचीनतम गणराज्यों में से एक माना जाता है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत और रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। लेखक ने इस पुस्तक में ऋग्वेद के समय से लेकर आधुनिक युग तक के कुल्लू के इतिहास को संजोया है। पुस्तक में ऋग्वेद, महाभारत और प्राचीन पुराणों के संदर्भों के आधार पर कुलूत देश (कुल्लू) के उद्गम और इसकी कोल, दस्युराज शम्बर जैसी प्राचीन जातियों के इतिहास को रेखांकित किया गया है। साथ ही इसमें महाभारत काल, विभिन्न जातियों (कोल, किरात, नाग, खश आदि) के संघर्ष व फैलाव तथा प्राचीन राजवंशों और शासन प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक में कुल्लू के स्थानीय राजाओं के शासन, उनकी वंशावली, क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, पारंपरिक वेशभूषा, लोककथाओं, वहाँ के समाज और स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा से युक्त समृद्ध देव-संस्कृति का व्यापक और रोचक वर्णन है। यह पुस्तक सांस्कृतिक धरोहर के रुप में हिमाचल प्रदेश की लोक-संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।

इसके साथ वजूद-ओ-अदम उनका प्रसिद्ध उर्दू ग़ज़ल संग्रह है, जो उनकी दार्शनिक सोच और उत्कृष्ट काव्य कला को दर्शाता है।

प्रार्थीजी का अमर संदेश - इस पुस्तक का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना था। पुस्तक के समर्पण में प्रार्थी जी की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ शामिल हैं:

"निज गौरव का कुछ ज्ञान रहे।

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।

सब जाए अभी पर मान रहे।

मरणोत्तर गुंजित गान रहे॥"

प्रार्थीजी का यह सांस्कृतिक संदेश निश्चित रुप से पहाड़ी समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

विरासत - उनकी याद में और कुल्लू की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कुल्लू में एक प्रसिद्ध ओपन-एयर थिएटर का नाम लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र रखा गया है। यहाँ हर वर्ष प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। निसंदेह रुप में इस कला केन्द्र के निर्माण से संस्कृति तथा कला प्रेमियों को प्रोत्साहन मिला है।

कुल्लू के कलाकेंद्र एवं हिमाचल प्रदेश में भाषा, संस्कृति विभाग की स्थापना के अतिरिक्त कुल्लूत देश की कहानी जैसी एक शोध प्रधान कालजयी रचना उनकी एक अनुपम देन है, जिस पर कार्य अभी शेष है।

ठाकुर सत्यप्रकाशजी के शब्दों में, अपनी सशक्त लेखनी से प्रार्थीजी ने 'कुल्लूत देश की कहानी' पुस्तक रची, जिसमें यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया है कि कुल्लू से गढ़‌वाल तक के लोगों की भाषा एवं संस्कृति एक है, इसलिए यहां के लोगों का रहन-सहन, खान पान, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गीत की शैली एक सी है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोक-संस्कृति को जीवित बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वे स्वयं प्रसिद्ध लोकनर्तक, कलाकार, कवि, लेखक, तथा राजनीतिज्ञ थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणादायी था।

प्रार्थी जी भक्ति प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और अपना अधिकांश समय भगवान के ध्यान में लगाते थे। देवी-देवताओं में उनकी पूर्ण आस्था थी। वह कुल्लू को अठारह करडुओं का देश कहते थे। वे हिमाचल को पहाड़ी प्रदेश के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए भी हमेशा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के कन्धे से कंधा मिलाकर कार्य करते रहे। (सत्य प्रकाश ठाकुर, मुख्य संसदीय सचिव, 3 अप्रैल 1994)

समाज, संस्कृति व अपनी मातृभूमि की अथक सेवा साधना करते हुए 11 दिसम्बर 1982 को प्रार्थीजी का देहावसान होता है और भावी पीढ़ी के लिए एक अनमोल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत छोड़ जाते हैं।

हिमाचल के यशस्वी मनीषी-साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ट के शब्दों में, साहित्यकार समाज की अमूल्य निधि हुआ करती हैं। अपनी पूरी जीवन यात्रा के अनुभव सारांश वे रचनाओं के रूप में पीछे छोड़ जाते हैं। जीवन सत्य सार के रूप में कही गई उनकी बातें हमें भटकी राह दिखाती हैं। उनकी कृतियों को हम देर तक याद करते हैं।

कई बार ऐसा भी हुआ है कि ढेरों पृष्ठ सामग्री समाज को देने पर भी हम रचनाकार के विषय में कुछ नहीं जानते। महर्षि व्यास का उदाहरण हमारे सामने है। जिस व्यास ने वेदों का विस्तार किया, महाभारत जैसा पंचम वेद रच डाला। उस श्रीकृष्ण द्वैपायन के जीवन के विषय में हम बहुत कम जानते हैं। बहुत ढूंढने पर भी उनके जीवन के क्षण अज्ञात ही रह जाते हैं। ऐसे ही महाकवि कालिदास के विषय में आज इतिहास अटकलें लगाता है। हम अपने रचनाधर्मी युग पुरुषों को नहीं जानते, यह हमारा दुर्भाग्य है।

प्रार्थी जयन्ती 3 अप्रैल, 1994 के पावन अवसर पर, सुदर्शन वशिष्ठ, सचिव, हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के ऊपर कहे शब्द इतिहास का एक कटु सत्य है। हम स्वयं जब प्रार्थीजी की कालजयी रचना कुलूत देश की कहानी को पढ़ने के लिए प्रेरित हुए, तो हम चकित रह गए कि कुल्लू के किसी पुस्तक भंडार में यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। फिर हम जिला पुस्तकालय पहुँचे, इस आशा के साथ कि यहाँ तो यह अवश्य उपलब्ध मिलेगी। लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। हमारे कई बार के आग्रह पर कहीं से उपलब्ध इसकी पीडीएफ के आधार पर प्रिंट प्रति तैयार हुई, जो पुस्ताकलय के संदर्भ कक्ष में आज उपलब्ध है। प्रार्थी जी की कालजयी पुस्तक की मूल प्रति का उपलब्ध न होना हमारी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना की कुंद पड़ती दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का द्योतक है।

पुस्तक के अध्ययन उपरान्त हमें लगा कि इस पर कार्य़ शेष है। प्रार्थीजी अपने अथक प्रयास के साथ इस पुस्तक में बहुत ही अहम एवं महत्वपूर्ण सुत्र-संकेत दे गए हैं, लेकिन इन पर शोध करते हुए इनकी पुष्टि एवं इतिहास लेखन वाकि है, जिसे प्रबुद्ध एवं जागरुक भावी पीढ़ी को करना है। ईश्वर कृपा से मिली अंतःप्रेरणा के आधार पर इस संदर्भ में प्रय़ास जारी हैं, देखते हैं कि यह किस अंजाम तक पहुँचता है।

निष्कर्ष रुप में आवश्यकता प्रार्थीजी की अनमोल विरासत को संजोने व आगे बढ़ाने की है। कुलूत देश की कहानी में वर्णित देवसंस्कृति की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत जाग्रत एवं प्रतिष्ठित करने का कार्य अभी शेष है।

सोमवार, 18 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-2

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

इस यात्रा में आते-जाते लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के दर्शन हुए, बीच-बीच में घास के टापुओं और घाटी-मैदानों को भी देखे। लगा हमारे पूर्वज फुआल, यहीं कहीं भेड़ों को लेकर आते रहे होंगे। यहाँ के विकट जीवन को देखकर ताज्जुक किए कि कैसे वे अपने साथ महीनों का राश्न लेकर यहाँ पहुँचते रहे होंगे, जहाँ रुकने के लिए सही ढंग का ठिकाना भी नहीं है।

नानाजी कहा करते थे कि वहाँ पत्थरों को एक के ऊपर एक सटाकर दिवार व छत्त बनाकर रहने लायक गुफानुमा बसेरे तैयार होते, जिससे बारिश में उनकी कुछ रक्षा हो पाती। लेकिन भेड़-बकरियों के लिए ऐसी सुरक्षा व छत्त अधिकाँशतः उपलब्ध नहीं रह पाती और वे खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने के लिए विवश रहती। कल्पना करना कठिन है कि बारिश व ठंड में वे किस तरह यहाँ दिन व रात गुजारती रही होंगी। हालाँकि ईश्वर ने उन्हें गर्म ऊन का एक मोटा सा जैकेट अवश्य दिया है, जो इन विकट परिस्थितियों में ठंड से उनकी रक्षा करता है। यह ऊन फुआलों के लिए भी वरदान से कम नहीं  होती। वर्ष में अमूनन दो बार वे इसको काटकर इसको बेचते हैं और कुछ ऊन से अपने व परिवारजनों के लिए कोट से लेकर कम्बल तैयार करते हैं।

मालूम हो कि फुआल परम्परा से भेड़ की ऊन से मोटे कम्बल (दोहड़ू) तैयार करते रहे हैं, जो बारिश के बीच जंगलों में उनके क्वच का काम करते और बकरी के रेशेदार ऊन से बने ऑवरकोट (कुंठ) वाटरप्रूफ जैकेट का काम करते। साथ ही जंगल में इनसे मजबूत बिछावन (सेला) की व्यवस्था हो जाती। आज तो टैंट से लेकर आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था है, लेकिन हमारे पूर्वज फुआल इन सुविधाओं से वंचित थे। यहाँ भी कल्पना करना कठिन है कि किस तरह वे बिना तरपाल या तंबू के पेड़ के नीचे प्रकृति के विषम प्रहारों को झेलते रहे होंगे। आश्चर्य नहीं कि फुआलों को एक काठी जात (रफ-टफ) माना जाता है, जो फौलादी तन-मन व जीवनट के साथ हर तरह की परिस्थितियों में सरवाइव करना जानते हैं। उनके साथ होता है परम्परा एवं नैसर्ग से मिला आंतरिक जीवट और स्वतःस्फुर्त आत्म-विश्वास तथा साथ में प्रकृति की अधिष्ठात्री महाशक्ति और पशुपतिनाथ भोलेनाथ का भरोसा। जिसके चलते इनका चूल्हा भी धुनि का रुप लिए होता है।

लाहौल में तो नानाजी कहा करते थे कि खाना बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ियाँ भी मिलना कठिन हो जाती थी। इस ठंडे रेगिस्तान में कुछ इलाकों में बैठर (सुगंधित देवदार की छोटी प्रजाति, जिसकी सूखी पत्तियों को देवकार्यों में धूप-अग्रवती के रुप में उपयुक्त किया जाता है) की सूखी झाड़ियों से काम चलाते या भेड़ों की मिंगणियों को सुखाकर इनका इंधन के रुप में उपयोग करते। यदि कहीं दूरस्थ गाँव वासियों के मवेशी यहाँ चरते तो उनके गौवर के उपले ईंधन में काम आते।

वीहड़ वनों में आग सुलगाने की पारम्परिक व्यवस्था भी विशिष्ट रहती। हम स्वयं नानाजी को मुलायम बाचा घास से आग जलाते देखे हैं। जिसमें वे चकमक सफेद पत्थर के ऊपर लौहे की साज (छोटी हथोड़ी) का त्वरित प्रहार करते, जिसके घर्षण के साथ चिंगारियाँ निकलती और बाचा घास आग पकड़ लेती। इससे वे अपनी चिल्म जलाते थे और चूल्हे की आग भी प्रज्जवलित होती।

देवदार के जंगलों में तो आग जलाने के लिए शोली (विरोजायुक्त देवदार की लकड़ी, जो माचिस से तुरन्त आग पकड़ लेती है) भी रहती। आज तो लाइटर से लेकर तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। कह सकते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ फुआल लोगों के जीवन को थोड़ा राहत आवश्य मिली है। मोवाइल फोन आने से वे अपने घर-परिवार से संपर्क में भी रहते हैं, हालाँकि नेटवर्क हर जगह उपलब्ध नहीं रहता। कुछ विशेष ऊँचे स्थानों पर आकर ही वे संपर्क साध सकते हैं। जबकि पहले महीनों घर की कोई खबर नहीं रहती। जंगल में तो किसी तरह की डाक सुविधा भी नहीं थी। घर-परिवार के सुख-दुःख में भाग लेने के लिए उन्हें दिनों-सप्ताह लग जाते। कल्पना कर सकते हैं कि फुआल जीवन तब कितना त्याग, तप और कठिनाई भरा रहा होगा।

प्रायः डेरा जलस्रोत के पास ही रहता, सो यहाँ का जड़ी-बूटियों से युक्त (चार्ज्ड) प्राकृतिक जल किसी वरदान से कम नहीं होता। जो एक ओर जहाँ पाचन को दुरुस्त रखता, वहीं छोटे-मोटे रोगों की भी दवा का काम करता। हालाँकि ऊँचाइयों में तो ग्लेशियर से आता जल ही नसीव होता। इस जमाने वाले ठंडे जल में नित्य स्नान संभव नहीं था, सो इसका भी मुहुर्त निकलता। 

गर्मी व बारिश में नानाजी लोग लाहौल जाते, तो सर्दी में नीचे मंडी-सलापड़ की ओर कूच करते। बचपन में जब हम पुश्तैनी मकान की खिड़की के पास बैठते तो वहाँ से मंडी साइड के पहाड़ दिखाई देते। इसके साथ नानाजी के रोमाँचक किस्सों के संग हम कल्पना की उड़ान भर कर वहाँ की भाव यात्रा करते। मंडी साइड से ही वे तेजपत्र के जंगल की बात करते और घर में उनके लाए सूखे तेजपत्र मसाले के रुप में पर्व-त्यौहारों के व्यंजनों में उपयुक्त होते।

यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारे जंगलों में, राह में कुछ ऐसे विशेष स्थान भी हैं, जिन्हें रुआड़ (चट्टान से बनी प्राकृतिक गुफाएं) कहते हैं, जिनकी आड़ में भेड़-बकरियाँ बारिश व बर्फवारी में सुरक्षित-संरक्षित रहती हैं। फिर देवदार से लेकर रई-तौस व जंगली खनोर (चेस्टनट) के गगनचुम्बी वृक्षों के नीचे भी उनके लिए सिर छुपाने की जगह मिल जाती।

फिर जंगल में भालू से लेकर गुलदार एवं शंकू जैसे खुंखार जानवरों का भी खत्तरा रहता, जो रात को आकर कभी भी झुंड़ पर हमला कर नुकसान पहुँचा सकते हैं। ऐसे में हालाँकि रात को पहाड़ी कुत्ते सजग एवं नैष्ठिक पहरेदार की भाँति पहरा देते और स्वयं फुआल भी विशेष परिस्थितियों में रात भर नींद के बीच भी जागते हुए रखवाली करते। नानाजी ऐसी भिड़ंत के लोमहर्षक किस्से सुनाते, कैसे वे भालू आने पर पेड़ पर चढ़ गए थे, और भालू पीछा कर रहा था तो ऊपर से उसकी नाक पर लात मारकर और पेड़ को हिलाकर उसे भगा दिए थे।

यहाँ यह भी बता दें कि नानाजी बहुत ही निडर और दिलेर किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें कई मन्त्र सिद्ध थे और उन्होंने शमशान में साधना कर ये मंत्र सिद्ध किए थे। साँपों को चुटकी में वश करना उन्हें आता था और वे उसे पकड़ कर दूर निर्जन स्थान पर छोड़ देते। मंत्र सिद्धि की शर्त थी कि साँप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

जंगली पक्षियों से लेकर जीवों के शिकार के किस्से भी भी वे बड़े उत्साह और संजीदगी से सुनाते। हालाँकि आज हम इस तरह की हिंसक गतिविधियों के समर्थक नहीं है, लेकिन लोकजीवन में परम्परागत चलन अपनी जगह हैं, जो इतिहास का हिस्सा बने हुए हैं। आज भी घाटी के प्राचीन मंदिरों में ऐसे दुर्लभ जीव-जंतुओं के सींग और अवशेष टंगे मिलेंगे, जो कभी जंगलों में विचरण करते रहे होंगे और आज विलुप्त हैं।

किन परिस्थितियों में यह सब हुआ शोध का विषय है, लेकिन नानाजी के फुआल जीवन के संग हम उस समुदाय के जीवन के संघर्ष, रोमांच व कठोर यथार्थ को कुछ-कुछ समझते रहे। चम्बा साइड में यही समुदाय गद्दी के रुप में विशिष्ट पहचान रखता है, जिसकी अपनी संस्कृति है, परम्परा है और जो अमूनन फुआलों के उपरोक्त वताए किस्सों से मिलती-जुलती है। वे भी चम्बा से दुर्गम कुगती पास या काली छो दर्रे को पार कर लाहौल घाटी पहुँचते हैं और तप-त्याग एवं कठोर श्रम भरे भेड़ पालन के पेशे को निभाते हैं।

फुआलों के ऊपर बताए गए कठोर जीवन के साथ उनके प्रकृति की गोद में अलमस्त व एकांत शांत जीवन की कल्पना भी हमें रोमाँचित करती, कि काश एक वार हम भी कुछ दिन, सप्ताह या माह उनके साथ रहकर इसको अनुभव करें। आज भी यह अरमान बाकि हैं। देखते हैं किस तरह प्रकृति-परमेश्वर, आदिशक्ति-भोले बाबा इसकी व्यवस्था करते हैं और हम फुआल जीवन के फर्स्ट हैंड अनुभव को जी पाते हैं और बीहड़ वन के रफ-टफ एवं रोमाँचक जीवन को सुधी पाठकों तक पहुँचा पाते हैं।

शनिवार, 16 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-1

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

गाय-बैल के साथ भेड़-बकरियों का पालन पूरे गाँव का पुश्तैनी पेशा रहा। प्रारम्भ से पहाड़ों में अन्न, दाल व सब्जियों के सीमित विकल्प होने के कारण भेड़-बकरियों का पालन बुजुर्गों का मुख्य व्यवसाय रहा। सर्दियों में अधिक बर्फ के चलते अन्न व फल शाक के साधन सीमित रहते, सो पशु धन लोगों की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते। सर्द मौसम में ठंड से बचाव के लिए भेड़-बकरियों से ऊन मिल जाती और आपातकाल में इनसे दूध से लेकर माँस आदि की आवश्यकता पूर्ति हो जाती।

घर में एक व्यक्ति की ड्यूटी इनको चराने की रहती। सुबह आठ-नौ बजे क्लार (ब्रँच) के बाद घर का एक सदस्य इनके काफिले को लेकर जंगल में जाता। भेड़ के छोटे मेमणों व बकरियों के छोटे बच्चों (छेलूओं) को घर में ही एक विशिष्ट स्थान पर रखा जाता। सर्दियों में चूल्हे व तंदूर बाले कमरे में एक बाढ़ा लगाकर एक कौने में इनको रखा जाता, जिसमें फर्श पर नरम घास-पत्तियां बिछी रहती। बचपन इनके बाढ़े में घुसकर उनके साथ लाड़-प्यार करते, खेलते कैसे बीता, पता ही नहीं चला। अभी भी इनके साथ बिताए विशिष्ट पल याद करने पर गुदगुदाते हैं, एक सुखद सिहरन पैदा करते हैं। खुला छोड़ने पर इन नन्हें फरिश्तों की ऊछल-कूद देखने लायक रहती।

शाम को भेड़-बकरियाँ जंगल से घर आते ही अपने मेमनों व छेलुओं को याद करतीं। इनकी विशेष आबाजें सुनकर मेमने व छेलू भी मिलने के लिए जैसे मचल जाते और सीधा उनके पास पहुँचकर स्तनपान करते। जीव-जंतुओं के इस ममत्व भाव को देखकर ईश्वर की कलाकारिता पर विचार होता कि उसने अपनी सृष्टि को चलाने के लिए कैसे जीव-जंतुओं से लेकर इंसान को तक ममत्व एवं वात्सल्य की डोर में बाँध रखा है, जिसके चलते उसकी सृष्टि का पालन-पौषण एवं विस्तार सहज रुप से होता रहता है।

बचपन ननिहाल में बीता, सो हमारे मामू साहब भेड़ों-बकरियों को लेकर जंगल में जाते। हमारे बुजुर्ग नानाजी भी भेड़-बकरियों का पालन कर चुके थे, व कई बार इनके झुंडों के साथ फुआल की भूमिका में लाहौल-स्पिति जा व रह चुके थे। वे बड़ी रूचि के साथ वहाँ बिताए रोमाँचक पलों को याद करते और कथा-कहानियों व किवदंतियों के रुप में हम बच्चों को बड़े शौक और गर्व के साथ सुनाते। जो निश्चित रुप से हमारे बाल मन को रोमाँचित करती, कहीं गहरे छू जाती। और हमारा संकल्प बलवती होता कि एक बार हम भी इस यात्रा का हिस्सा अवश्य बनेंगे और कुछ दिन-सप्ताह या माह वहाँ रहकर जीवन की बीहड़ सच्चाई को नज़दीक से देखेंगे।

बारिश में लाहौल-स्पिति जाने से पहले भेड़-बकरियों का काफिला गाँव के ऊँचाई वाले जंगल में ही रहता, यहाँ रुकने के लिए रुआड़ थे व साथ ही देवदार से लेकर रई-तोश के आसमान छूते सदावहार हरे-भरे वृक्ष। जंगली खनोर (चेस्टनट) के पेड़ों से गिरने के सीजन में तो भेड़-बकरियों की डाइट प्लानिंग होती। एक दिन पनाणी शिला में खनोर के जंगलों में चरती और दो दिन ऊपर ठेली (जंगली घास के ढलानदार मैदान, बुग्याल) में। जंगली खनोर के गिरे काले रंग के गिरिदार बीजों को भेड़-बकरियाँ फोड़कर खातीं, जिनको बहुत पौष्टिक माना जाता है। अधिक खाने पर पेट फूलने का डर रहता, सो बाकि के दो दिन इनसे दूर रखा जाता।

जुलाई माह में हमारे इलाके में मौनसून की बारिश होती, सो फुआल मई-जून में लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते। मालूम हो कि लाहौल-स्पिति घाटी में मौनसून की बारिश नहीं होती। कुल्लू-मानाली के आगे पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला मौनसून के नम बादलों को आगे बढ़ने से रोकती है। इस तरह लाहौल-स्पिति घाटी भेड़ पालकों के लिए इस सीजन में आदर्श रहती।

सड़कें तो बाद में बनीं, हमारे पुरखों के समय तो आवागमन का मार्ग पहाड़ों की ऊँचाईयों में धार (रिज़) से ही रहता। काइस धार से आगे पटोउल, फुटा सोर, दोहरा नाला और फिर रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास और फिर आगे कई पर्वत शिखरों को पार करते हुए हामटा पास पहुँचते, वहाँ से आगे रोहतांग दर्रा पार करते हुए लाहौल-स्पीति घाटी में प्रवेश होते और वहाँ से चंद्रताल से लेकर बारालाचा, सूरजताल के बीच भेड़-बकरियों के काफिले को चराते हुए कुछ माह वहाँ रहते।

सड़क मार्ग बनने से फिर फुआलों की भेड़ें सीधे सड़कों से होते हुए आगे बढती हैं, हालाँकि ट्रैफिक के चलते काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आवादी के बीच बढ़ते हुए भेड़ चौरों का भी भय रहता है। इसलिए मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहीं जंगल से होते हुए भेड़ों को चरवाते हुए आगे बढ़ते हैं और कहीं सीधे सड़क मार्ग से लाहौल स्पीति की ओर कूच करते हैं। मालूम हो कि कुल्लू व लाहौल घाटी को जोड़ने वाली अटल टनल में भेड़-बकरियों के लिए वैकल्पिक मार्ग मुख्य मार्ग के नीचे बनाया गया है, यह कितना उपयोग में है, इसको तो सुधी लोग ही बता सकते हैं।

नानाजी लाहौल घाटी के नीरु घास का जिक्र खूब करते, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है। इसको खाने से भेड-बकरियों में चर्बी बढ़ती है और इसका अत्यधिक सेवन नुकसानदायक भी माना जाता है। यहाँ तक कि इसके अत्यधिक सेवन से भेड़-बकरियों की मौत भी हो सकती है। अतः इसका यथोचित ही सेवन हो, ये फुआल ध्यान रखते। इसके अतिरिक्त कोड़ु, पत्तीस व अन्य जड़ी-बूटी नुमा घास भी इस घाटी के उच्चर क्षेत्रों में होती, जिसके सेवन से भेड़-बकरियाँ विशेष पौषण पाती और इनके दूध में भी इसके स्वाद व पौष्टकता का समावेश होता। इस तरह फुआलों से लेकर कुत्तों को तक इनका दूध आवश्यक पौषण का काम देता।

नानाजी से भेड़ चरवाने के रोमाँचक किस्सों को सुनते-सुनते यह भाव बलवती होता गया कि गाँव के जंगल से लाहौल-स्पीति तक यात्रा एवं वहाँ पर रुकने के अनुभव का डॉक्यूमेंटेशन करेंगे, इसकी कथा-गाथा व रोमाँच को लिपिवद्ध करेंगे। हमारे बचपन का यह सपना, सपना ही रहा, लेकिन 22-23 वर्ष की आयु में हमें पर्वतारोहण करते हुए लाहौल-स्पिति घाटी में जाने का अवसर अवश्य मिला। हालाँकि तह तक नानाजी गुज़र चुके थे।  

मानाली में पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक प्रशिक्षण के दौरान हम पूरी टीम के साथ मानाली से अपने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में रोहताँग दर्रा पार करते हुए, खोखसर पहुँचे, फिर सिसू से होते हुए तांदी पुल पार करते हुए कैलाँग पहुंचे और फिर जिस्पा में पर्वतारोहण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र में रुके और आगे दारचा पार करते हुए, पटसेऊ और फिर जिंगजिंगवार में अपना बेसकैंप लगाए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-2, मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर

यहाँ की आइस फील्ड़ और बर्फ की ढलानों पर आठ-दस दिन का अभ्यास करते हुए फिर सूरजताल झील, बारालाचा दर्रा पहुँचे और वहाँ से लगभग 18,000 फीट ऊंची चोटी का आरोहण किए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-3, लाहौल घाटी में पर्वतारोहण और शिखर का आरोहण

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