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सोमवार, 18 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-2

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

इस यात्रा में आते-जाते लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के दर्शन हुए, बीच-बीच में घास के टापुओं और घाटी-मैदानों को भी देखे। लगा हमारे पूर्वज फुआल, यहीं कहीं भेड़ों को लेकर आते रहे होंगे। यहाँ के विकट जीवन को देखकर ताज्जुक किए कि कैसे वे अपने साथ महीनों का राश्न लेकर यहाँ पहुँचते रहे होंगे, जहाँ रुकने के लिए सही ढंग का ठिकाना भी नहीं है।

नानाजी कहा करते थे कि वहाँ पत्थरों को एक के ऊपर एक सटाकर दिवार व छत्त बनाकर रहने लायक गुफानुमा बसेरे तैयार होते, जिससे बारिश में उनकी कुछ रक्षा हो पाती। लेकिन भेड़-बकरियों के लिए ऐसी सुरक्षा व छत्त अधिकाँशतः उपलब्ध नहीं रह पाती और वे खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने के लिए विवश रहती। कल्पना करना कठिन है कि बारिश व ठंड में वे किस तरह यहाँ दिन व रात गुजारती रही होंगी। हालाँकि ईश्वर ने उन्हें गर्म ऊन का एक मोटा सा जैकेट अवश्य दिया है, जो इन विकट परिस्थितियों में ठंड से उनकी रक्षा करता है। यह ऊन फुआलों के लिए भी वरदान से कम नहीं  होती। वर्ष में अमूनन दो बार वे इसको काटकर इसको बेचते हैं और कुछ ऊन से अपने व परिवारजनों के लिए कोट से लेकर कम्बल तैयार करते हैं।

मालूम हो कि फुआल परम्परा से भेड़ की ऊन से मोटे कम्बल (दोहड़ू) तैयार करते रहे हैं, जो बारिश के बीच जंगलों में उनके क्वच का काम करते और बकरी के रेशेदार ऊन से बने ऑवरकोट (कुंठ) वाटरप्रूफ जैकेट का काम करते। साथ ही जंगल में इनसे मजबूत बिछावन (सेला) की व्यवस्था हो जाती। आज तो टैंट से लेकर आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था है, लेकिन हमारे पूर्वज फुआल इन सुविधाओं से वंचित थे। यहाँ भी कल्पना करना कठिन है कि किस तरह वे बिना तरपाल या तंबू के पेड़ के नीचे प्रकृति के विषम प्रहारों को झेलते रहे होंगे। आश्चर्य नहीं कि फुआलों को एक काठी जात (रफ-टफ) माना जाता है, जो फौलादी तन-मन व जीवनट के साथ हर तरह की परिस्थितियों में सरवाइव करना जानते हैं। उनके साथ होता है परम्परा एवं नैसर्ग से मिला आंतरिक जीवट और स्वतःस्फुर्त आत्म-विश्वास तथा साथ में प्रकृति की अधिष्ठात्री महाशक्ति और पशुपतिनाथ भोलेनाथ का भरोसा। जिसके चलते इनका चूल्हा भी धुनि का रुप लिए होता है।

लाहौल में तो नानाजी कहा करते थे कि खाना बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ियाँ भी मिलना कठिन हो जाती थी। इस ठंडे रेगिस्तान में कुछ इलाकों में बैठर (सुगंधित देवदार की छोटी प्रजाति, जिसकी सूखी पत्तियों को देवकार्यों में धूप-अग्रवती के रुप में उपयुक्त किया जाता है) की सूखी झाड़ियों से काम चलाते या भेड़ों की मिंगणियों को सुखाकर इनका इंधन के रुप में उपयोग करते। यदि कहीं दूरस्थ गाँव वासियों के मवेशी यहाँ चरते तो उनके गौवर के उपले ईंधन में काम आते।

वीहड़ वनों में आग सुलगाने की पारम्परिक व्यवस्था भी विशिष्ट रहती। हम स्वयं नानाजी को मुलायम बाचा घास से आग जलाते देखे हैं। जिसमें वे चकमक सफेद पत्थर के ऊपर लौहे की साज (छोटी हथोड़ी) का त्वरित प्रहार करते, जिसके घर्षण के साथ चिंगारियाँ निकलती और बाचा घास आग पकड़ लेती। इससे वे अपनी चिल्म जलाते थे और चूल्हे की आग भी प्रज्जवलित होती।

देवदार के जंगलों में तो आग जलाने के लिए शोली (विरोजायुक्त देवदार की लकड़ी, जो माचिस से तुरन्त आग पकड़ लेती है) भी रहती। आज तो लाइटर से लेकर तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। कह सकते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ फुआल लोगों के जीवन को थोड़ा राहत आवश्य मिली है। मोवाइल फोन आने से वे अपने घर-परिवार से संपर्क में भी रहते हैं, हालाँकि नेटवर्क हर जगह उपलब्ध नहीं रहता। कुछ विशेष ऊँचे स्थानों पर आकर ही वे संपर्क साध सकते हैं। जबकि पहले महीनों घर की कोई खबर नहीं रहती। जंगल में तो किसी तरह की डाक सुविधा भी नहीं थी। घर-परिवार के सुख-दुःख में भाग लेने के लिए उन्हें दिनों-सप्ताह लग जाते। कल्पना कर सकते हैं कि फुआल जीवन तब कितना त्याग, तप और कठिनाई भरा रहा होगा।

प्रायः डेरा जलस्रोत के पास ही रहता, सो यहाँ का जड़ी-बूटियों से युक्त (चार्ज्ड) प्राकृतिक जल किसी वरदान से कम नहीं होता। जो एक ओर जहाँ पाचन को दुरुस्त रखता, वहीं छोटे-मोटे रोगों की भी दवा का काम करता। हालाँकि ऊँचाइयों में तो ग्लेशियर से आता जल ही नसीव होता। इस जमाने वाले ठंडे जल में नित्य स्नान संभव नहीं था, सो इसका भी मुहुर्त निकलता। 

गर्मी व बारिश में नानाजी लोग लाहौल जाते, तो सर्दी में नीचे मंडी-सलापड़ की ओर कूच करते। बचपन में जब हम पुश्तैनी मकान की खिड़की के पास बैठते तो वहाँ से मंडी साइड के पहाड़ दिखाई देते। इसके साथ नानाजी के रोमाँचक किस्सों के संग हम कल्पना की उड़ान भर कर वहाँ की भाव यात्रा करते। मंडी साइड से ही वे तेजपत्र के जंगल की बात करते और घर में उनके लाए सूखे तेजपत्र मसाले के रुप में पर्व-त्यौहारों के व्यंजनों में उपयुक्त होते।

यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारे जंगलों में, राह में कुछ ऐसे विशेष स्थान भी हैं, जिन्हें रुआड़ (चट्टान से बनी प्राकृतिक गुफाएं) कहते हैं, जिनकी आड़ में भेड़-बकरियाँ बारिश व बर्फवारी में सुरक्षित-संरक्षित रहती हैं। फिर देवदार से लेकर रई-तौस व जंगली खनोर (चेस्टनट) के गगनचुम्बी वृक्षों के नीचे भी उनके लिए सिर छुपाने की जगह मिल जाती।

फिर जंगल में भालू से लेकर गुलदार एवं शंकू जैसे खुंखार जानवरों का भी खत्तरा रहता, जो रात को आकर कभी भी झुंड़ पर हमला कर नुकसान पहुँचा सकते हैं। ऐसे में हालाँकि रात को पहाड़ी कुत्ते सजग एवं नैष्ठिक पहरेदार की भाँति पहरा देते और स्वयं फुआल भी विशेष परिस्थितियों में रात भर नींद के बीच भी जागते हुए रखवाली करते। नानाजी ऐसी भिड़ंत के लोमहर्षक किस्से सुनाते, कैसे वे भालू आने पर पेड़ पर चढ़ गए थे, और भालू पीछा कर रहा था तो ऊपर से उसकी नाक पर लात मारकर और पेड़ को हिलाकर उसे भगा दिए थे।

यहाँ यह भी बता दें कि नानाजी बहुत ही निडर और दिलेर किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें कई मन्त्र सिद्ध थे और उन्होंने शमशान में साधना कर ये मंत्र सिद्ध किए थे। साँपों को चुटकी में वश करना उन्हें आता था और वे उसे पकड़ कर दूर निर्जन स्थान पर छोड़ देते। मंत्र सिद्धि की शर्त थी कि साँप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

जंगली पक्षियों से लेकर जीवों के शिकार के किस्से भी भी वे बड़े उत्साह और संजीदगी से सुनाते। हालाँकि आज हम इस तरह की हिंसक गतिविधियों के समर्थक नहीं है, लेकिन लोकजीवन में परम्परागत चलन अपनी जगह हैं, जो इतिहास का हिस्सा बने हुए हैं। आज भी घाटी के प्राचीन मंदिरों में ऐसे दुर्लभ जीव-जंतुओं के सींग और अवशेष टंगे मिलेंगे, जो कभी जंगलों में विचरण करते रहे होंगे और आज विलुप्त हैं।

किन परिस्थितियों में यह सब हुआ शोध का विषय है, लेकिन नानाजी के फुआल जीवन के संग हम उस समुदाय के जीवन के संघर्ष, रोमांच व कठोर यथार्थ को कुछ-कुछ समझते रहे। चम्बा साइड में यही समुदाय गद्दी के रुप में विशिष्ट पहचान रखता है, जिसकी अपनी संस्कृति है, परम्परा है और जो अमूनन फुआलों के उपरोक्त वताए किस्सों से मिलती-जुलती है। वे भी चम्बा से दुर्गम कुगती पास या काली छो दर्रे को पार कर लाहौल घाटी पहुँचते हैं और तप-त्याग एवं कठोर श्रम भरे भेड़ पालन के पेशे को निभाते हैं।

फुआलों के ऊपर बताए गए कठोर जीवन के साथ उनके प्रकृति की गोद में अलमस्त व एकांत शांत जीवन की कल्पना भी हमें रोमाँचित करती, कि काश एक वार हम भी कुछ दिन, सप्ताह या माह उनके साथ रहकर इसको अनुभव करें। आज भी यह अरमान बाकि हैं। देखते हैं किस तरह प्रकृति-परमेश्वर, आदिशक्ति-भोले बाबा इसकी व्यवस्था करते हैं और हम फुआल जीवन के फर्स्ट हैंड अनुभव को जी पाते हैं और बीहड़ वन के रफ-टफ एवं रोमाँचक जीवन को सुधी पाठकों तक पहुँचा पाते हैं।

शनिवार, 16 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-1

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

गाय-बैल के साथ भेड़-बकरियों का पालन पूरे गाँव का पुश्तैनी पेशा रहा। प्रारम्भ से पहाड़ों में अन्न, दाल व सब्जियों के सीमित विकल्प होने के कारण भेड़-बकरियों का पालन बुजुर्गों का मुख्य व्यवसाय रहा। सर्दियों में अधिक बर्फ के चलते अन्न व फल शाक के साधन सीमित रहते, सो पशु धन लोगों की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते। सर्द मौसम में ठंड से बचाव के लिए भेड़-बकरियों से ऊन मिल जाती और आपातकाल में इनसे दूध से लेकर माँस आदि की आवश्यकता पूर्ति हो जाती।

घर में एक व्यक्ति की ड्यूटी इनको चराने की रहती। सुबह आठ-नौ बजे क्लार (ब्रँच) के बाद घर का एक सदस्य इनके काफिले को लेकर जंगल में जाता। भेड़ के छोटे मेमणों व बकरियों के छोटे बच्चों (छेलूओं) को घर में ही एक विशिष्ट स्थान पर रखा जाता। सर्दियों में चूल्हे व तंदूर बाले कमरे में एक बाढ़ा लगाकर एक कौने में इनको रखा जाता, जिसमें फर्श पर नरम घास-पत्तियां बिछी रहती। बचपन इनके बाढ़े में घुसकर उनके साथ लाड़-प्यार करते, खेलते कैसे बीता, पता ही नहीं चला। अभी भी इनके साथ बिताए विशिष्ट पल याद करने पर गुदगुदाते हैं, एक सुखद सिहरन पैदा करते हैं। खुला छोड़ने पर इन नन्हें फरिश्तों की ऊछल-कूद देखने लायक रहती।

शाम को भेड़-बकरियाँ जंगल से घर आते ही अपने मेमनों व छेलुओं को याद करतीं। इनकी विशेष आबाजें सुनकर मेमने व छेलू भी मिलने के लिए जैसे मचल जाते और सीधा उनके पास पहुँचकर स्तनपान करते। जीव-जंतुओं के इस ममत्व भाव को देखकर ईश्वर की कलाकारिता पर विचार होता कि उसने अपनी सृष्टि को चलाने के लिए कैसे जीव-जंतुओं से लेकर इंसान को तक ममत्व एवं वात्सल्य की डोर में बाँध रखा है, जिसके चलते उसकी सृष्टि का पालन-पौषण एवं विस्तार सहज रुप से होता रहता है।

बचपन ननिहाल में बीता, सो हमारे मामू साहब भेड़ों-बकरियों को लेकर जंगल में जाते। हमारे बुजुर्ग नानाजी भी भेड़-बकरियों का पालन कर चुके थे, व कई बार इनके झुंडों के साथ फुआल की भूमिका में लाहौल-स्पिति जा व रह चुके थे। वे बड़ी रूचि के साथ वहाँ बिताए रोमाँचक पलों को याद करते और कथा-कहानियों व किवदंतियों के रुप में हम बच्चों को बड़े शौक और गर्व के साथ सुनाते। जो निश्चित रुप से हमारे बाल मन को रोमाँचित करती, कहीं गहरे छू जाती। और हमारा संकल्प बलवती होता कि एक बार हम भी इस यात्रा का हिस्सा अवश्य बनेंगे और कुछ दिन-सप्ताह या माह वहाँ रहकर जीवन की बीहड़ सच्चाई को नज़दीक से देखेंगे।

बारिश में लाहौल-स्पिति जाने से पहले भेड़-बकरियों का काफिला गाँव के ऊँचाई वाले जंगल में ही रहता, यहाँ रुकने के लिए रुआड़ थे व साथ ही देवदार से लेकर रई-तोश के आसमान छूते सदावहार हरे-भरे वृक्ष। जंगली खनोर (चेस्टनट) के पेड़ों से गिरने के सीजन में तो भेड़-बकरियों की डाइट प्लानिंग होती। एक दिन पनाणी शिला में खनोर के जंगलों में चरती और दो दिन ऊपर ठेली (जंगली घास के ढलानदार मैदान, बुग्याल) में। जंगली खनोर के गिरे काले रंग के गिरिदार बीजों को भेड़-बकरियाँ फोड़कर खातीं, जिनको बहुत पौष्टिक माना जाता है। अधिक खाने पर पेट फूलने का डर रहता, सो बाकि के दो दिन इनसे दूर रखा जाता।

जुलाई माह में हमारे इलाके में मौनसून की बारिश होती, सो फुआल मई-जून में लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते। मालूम हो कि लाहौल-स्पिति घाटी में मौनसून की बारिश नहीं होती। कुल्लू-मानाली के आगे पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला मौनसून के नम बादलों को आगे बढ़ने से रोकती है। इस तरह लाहौल-स्पिति घाटी भेड़ पालकों के लिए इस सीजन में आदर्श रहती।

सड़कें तो बाद में बनीं, हमारे पुरखों के समय तो आवागमन का मार्ग पहाड़ों की ऊँचाईयों में धार (रिज़) से ही रहता। काइस धार से आगे पटोउल, फुटा सोर, दोहरा नाला और फिर रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास और फिर आगे कई पर्वत शिखरों को पार करते हुए हामटा पास पहुँचते, वहाँ से आगे रोहतांग दर्रा पार करते हुए लाहौल-स्पीति घाटी में प्रवेश होते और वहाँ से चंद्रताल से लेकर बारालाचा, सूरजताल के बीच भेड़-बकरियों के काफिले को चराते हुए कुछ माह वहाँ रहते।

सड़क मार्ग बनने से फिर फुआलों की भेड़ें सीधे सड़कों से होते हुए आगे बढती हैं, हालाँकि ट्रैफिक के चलते काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आवादी के बीच बढ़ते हुए भेड़ चौरों का भी भय रहता है। इसलिए मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहीं जंगल से होते हुए भेड़ों को चरवाते हुए आगे बढ़ते हैं और कहीं सीधे सड़क मार्ग से लाहौल स्पीति की ओर कूच करते हैं। मालूम हो कि कुल्लू व लाहौल घाटी को जोड़ने वाली अटल टनल में भेड़-बकरियों के लिए वैकल्पिक मार्ग मुख्य मार्ग के नीचे बनाया गया है, यह कितना उपयोग में है, इसको तो सुधी लोग ही बता सकते हैं।

नानाजी लाहौल घाटी के नीरु घास का जिक्र खूब करते, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है। इसको खाने से भेड-बकरियों में चर्बी बढ़ती है और इसका अत्यधिक सेवन नुकसानदायक भी माना जाता है। यहाँ तक कि इसके अत्यधिक सेवन से भेड़-बकरियों की मौत भी हो सकती है। अतः इसका यथोचित ही सेवन हो, ये फुआल ध्यान रखते। इसके अतिरिक्त कोड़ु, पत्तीस व अन्य जड़ी-बूटी नुमा घास भी इस घाटी के उच्चर क्षेत्रों में होती, जिसके सेवन से भेड़-बकरियाँ विशेष पौषण पाती और इनके दूध में भी इसके स्वाद व पौष्टकता का समावेश होता। इस तरह फुआलों से लेकर कुत्तों को तक इनका दूध आवश्यक पौषण का काम देता।

नानाजी से भेड़ चरवाने के रोमाँचक किस्सों को सुनते-सुनते यह भाव बलवती होता गया कि गाँव के जंगल से लाहौल-स्पीति तक यात्रा एवं वहाँ पर रुकने के अनुभव का डॉक्यूमेंटेशन करेंगे, इसकी कथा-गाथा व रोमाँच को लिपिवद्ध करेंगे। हमारे बचपन का यह सपना, सपना ही रहा, लेकिन 22-23 वर्ष की आयु में हमें पर्वतारोहण करते हुए लाहौल-स्पिति घाटी में जाने का अवसर अवश्य मिला। हालाँकि तह तक नानाजी गुज़र चुके थे।  

मानाली में पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक प्रशिक्षण के दौरान हम पूरी टीम के साथ मानाली से अपने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में रोहताँग दर्रा पार करते हुए, खोखसर पहुँचे, फिर सिसू से होते हुए तांदी पुल पार करते हुए कैलाँग पहुंचे और फिर जिस्पा में पर्वतारोहण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र में रुके और आगे दारचा पार करते हुए, पटसेऊ और फिर जिंगजिंगवार में अपना बेसकैंप लगाए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-2, मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर

यहाँ की आइस फील्ड़ और बर्फ की ढलानों पर आठ-दस दिन का अभ्यास करते हुए फिर सूरजताल झील, बारालाचा दर्रा पहुँचे और वहाँ से लगभग 18,000 फीट ऊंची चोटी का आरोहण किए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-3, लाहौल घाटी में पर्वतारोहण और शिखर का आरोहण

मंगलवार, 31 मार्च 2026

मेरा गाँव और मेरा देश - मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026)


धरती के लिए किसी वरदान से कम नहीं

जन्म स्थल पर यह वर्ष 2026 का पहला प्रवास था। सेमेस्टर ब्रेक दिसम्बर 2025 में जाने की योजना थी, जो कार्य की अति व्यस्तता के चलते टलते-टलते मार्च में ही संभव हो पायी। इसके पीछे भी कोई दैवीय विधान था, यह अंत में स्पष्ट होता है। पिछले तीन माह से बारिश नहीं हो रही थी, गर्मी का मौसम जैसे शुरु हो चुका था। फोन से पता चला कि घरों में तंदूर जलने बंद हो चुके थे, इसलिए ह्ल्की-फुल्की तैयारी के साथ घर जाता हूँ। मुख्य उद्देश्य अपने बुजुर्ग माता-पिता के दर्शन थे और साथ ही पारिवारिक मिलन भी।

हरिद्वार से हिमाचल पथ परिवहन निगम की अंतिम बस हरिद्वार बस स्टैंड से रात्रि आठ बजकर दस मिनट पर जाती है, इसी में चढ़ता हूँ। यह वाया देहरादून जाती है, जो आगे पौंटा साहिब, नाहन, काला अम्ब होती हुई पंचकुला, चण्डीगढ़ पहुँचती है। सफर सदैव की तरह खशनुमा रहा। बस में अधिक भीड़ नहीं थी। देहरादून में चाय आदि के लिए आधा घंटा रुकती है। फिर काला अम्ब में रात को पौने एक रात्रि भोजन के लिए बस रुकती है।

रात को तीन बजे चण्डीगढ़ बस पहुँचती है, सबारियों को बिठाते हुए फिर आगे पंजाब के मोहाली, रोपड़, कीरतपुर साहिब जैसे शहरों को पार करती है और हिमाचल में प्रवेश करती है। टनल से नया रुट बना होने के कारण स्वारघाट का पुराना व लम्बा रूट नहीं आता। सुरंग के पार बिलासपुर जिला आता है, इसमें सतलुज नदी को पार करते हुए सुबह छः बजे सुंदरनगर बस रुकती है, फिर नैरचौक से होते हुए सात बजे मंडी पहुँचती है।

यहाँ से आगे पंडोह डैम के आगे कई सुरंगों को पार करते हुए हम आउट पहुँचते हैं, फिर कुल्लू घाटी में प्रवेश होता है। पनारसा, बजौरा, भूंतर, शमसी, ढालपुर होते हुए सुबह नौ दस तक सरवरी कुल्लू बस अड्डा पहुँचता हूँ।


यहीं से लेफ्ट बैंक की बस पकड़कर दस बजे तक अपने गाँव-घर पहूंचता हूँ। इस तरह रात को सात बजे देसंविवि, हरिद्वार से शुरु हुआ सफर सुबह दस बजे पूरा होता है। कुल पंद्रह घंटे में घर पहुँचता हूँ।

हालाँकि मौसम विभाग ने अगले सप्ताह बारिश की चेतावनी दे रखी थी, इसी के अनुरुप अभिसिंचन के साथ हमारा गाँव में प्रवेश होता है। यहाँ की शीतल शुद्ध आवोहवा, खुशनुमा माहौल, चिरपरिचित खेत-खलिहान, बगीचे, आसमान छूते पहाड़, फिर घर, गांववासी और परिवारजन, सब बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे।  

आज ही गांव के मेले स्यो जाच का अंतिम दिन भी था। बारिश के कारण यहाँ दिन के खेल व रात के सांस्कृतिक कार्यक्रम बाधित ही रहे, लेकिन देवकार्य यथासमय संपन्न होते रहे। मेले में पधारी भगवती दशमी वारदा एवं जुआणी महादेव के दुर्लभ दर्शन करते हुए उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दिन भर और रात को बारिश होती रही। ऊंचे पहाड़ों पर बर्फवारी का क्रम चल रहा था। रात्रि तापमान शून्य से नीचे था।

ऐसे लग रहा था कि हमारी सर्दी में यहाँ के मौसम को फील करने की दबी इच्छा जैसे प्रकृति माँ पूरा कर रही थी। घर में बंद पड़े तंदूर एक्टिवेट हो चुके थे, जिसके किनारे बैठने का अलग ही आनन्द रहता है। वास्तव में वहाँ बैठते ही बचपन से अब तक की अनगिन यादें झंकृत हो उठती हैं, जिसमें नानाजी, नानीजी, मामाजी सहित दादीजी, ताउजी एवं अनगिन परिवारजनों से हुए मिलन, संवाद आदि सहज ही चिकादाश में उमड़ पड़ते हैं।

फिर इस बार भतीजे सोहम की अपेंडिक्स सर्जरी के चलते गाँव भर से लोग मिलने के लिए आ रहे थे, सो कई परिचित लोगों से मिलन व नए चेहरों से परिचय का क्रम चलता रहा। क्षेत्रीय लोकजीवन, यहाँ के चल रहे घटनाक्रम, गाँव-घाटी के ज्वलंत मुददे, देव-संस्कृति से जुड़ी बातें सब चर्चा के विषय थे।

अगले पाँच दिनों लगातार बारिश होती रही, ऊँचे पर्वतों में तो बर्फवारी शुरु हो गई थी, चारों ओर पर्वत घाटी ने जैसे सफेद बर्फ का श्रृंगार कर लिया था।


लगा जैसे प्रकृति माँ की विशिष्ट उपहार अपनी आकुल संतानों के लिए दिल खोल कर लूटा रही हों। एक दिन तो घर-गाँव में भी बर्फ का आगाज होता है, लेकिन मात्रा कम होने के चलते यह टिक नहीं पाती। चारों ओर हिमशिखरों में बर्फ जमने के कारण घाटी में रात का तापमान माइनस में जाता रहा। दिन का तापमान 3-5 डिग्री सेल्सियस तक रहा। सो घर में एक्टिव तंदूर के चलते तंदूर से गर्म कमरे में पारिवारिक मिलन व संवाद का क्रम चलता रहा।

मालूम हो कि तंदूर कक्ष हिमालच के पहाड़ी इलाकों में सर्दी का एक बहुत बड़ा आश्रय-स्थल रहता है, जहाँ का गर्माहट भरा कोजी वातावरण एक अलग ही भावलोक में विचरण की अनुभूति देता है। सर्दी में ठिठुरते जीवन को एक अलग ही सुख व आनन्दमयी संसार में विचरण का आलौकिक अहसास दिलाता है।

इसी बीच बारिश कम होने के कारण एक दिन जिला पुस्तकालय, कुल्लू भी चले गए, जहाँ पर क्षेत्रीय जीवन एवं साहित्य पर लिखी पुस्तकों का अवलोक किया। हमारी खोज कुल्लूत देश की कहानी थी, जिसकी एक ही प्रति संदर्भ कक्ष में थी और आज छुट्टी होने के नाते हमें यह उपलब्ध न हो सकी। इसी के साथ हमने देव भारथा और कुल्लू के शान लालचंद्र प्रार्थीजी पर एक (मात्र) पुस्तक इश्यू की। पुस्तकालय में पाठकों का तांता लगा था, अधिकाँश लगा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष कक्ष में अध्ययनरत थे। कुछ समाचार कक्ष में अखबार एवं पत्रिकाओं को बाँच रहे थे। कुछ बाहर कैफिटेरिया में यार-दोस्तों के साथ रिलेक्स हो रहे थे।

पुस्तकालय में विषय की तमाम पूस्तकें उपलब्ध हैं, हमारी खोज क्षेत्र के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अतीत की थी, जिस पर अधिक शोधपरक सामग्री नहीं मिली। इस विषय पर लालचंद प्रार्थीजी के ऐतिहासिक कार्य़ (कुल्लूत देश की कहानी) की तक एक प्रति काफी आग्रह के बाद संदर्भ कक्ष में उपलब्ध हो पायी है। ऐसे में युवा पीढ़ी अपने इतिहास व संस्कृति से कैसे परिचित होंगे, सोचने का विषय है। हमारा अपनी रुचि के अनुरुप इस विषय पर अपने ढंग से शोध-अनुसंधान जारी है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों के इतिहास के संदर्भ में हम अधिक दूर नहीं जा पाते, अपने घरों में ही पारिवारिक इतिहास पर चर्चा करें, तो चार-पाँच पीढी से पीछे नाम नहीं बता सकते। उनका विस्तार तो और भी नहीं। इस संदर्भ में इस बार हम अपनी वंदनीया माताजी का सहज-स्फुर्त प्रयास देखकर चकित हो गए। वे परिवार की सात पीढियों का पूरा हिसाब-किताब कागज पर लिख कर बैठी हैं। इसी क्रम में घाटी में सेब व फलों के प्रवेश की गाथा पिताजी से चर्चा करने पर स्पष्ट हुई, जिसको अगले किसी ब्लॉग में प्रस्तुत करुँगा।

दो घंटे में पुस्तकालय से बाहर निकलने पर देखा ह्ल्की-हल्की बारिश हो रही है, जो हमें देव अभिसिंचन जैसे फील दे रहा था। ढालपुर मैदान को बैसे भी ठारा करड़ू की सोह कहा जाता है। लगा जैसे हमारे नेक इरादों को देव आशीष मिल रहा है।


पूरी घाटी ईधऱ-ऊधर उड़ते अवारा बादलों के फाहों से साथ ढकी हुई थी, दायीं ओर सूदूर बिजली महादेव तो मानाली की ओर सेऊबाग-गाहर साइड के पहाड़ और सामने खराहल घाटी सभी बादलों के सघन आच्छादन से ढके हए बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। आज दोपहर तक बारिश से कुछ राहत रही थी, लेकिन शाम से फिर इसका अनवरत क्रम प्रारम्भ होता है।

इस बार की चार-पाँच दिनों की बारिश-बर्फवारी फसल व फलों के हिसाब से किसी वरदान से कम नहीं थी। ऊँचे पहाड़ों में बर्फ की मोटी परत जमने से घाटी के नाले दनदनाते हुए व्यास नदी की जलराशि को समृद्ध कर रहे थे। निसंदेह रुप में गर्मी के आने वाले मौसम में घाटी के घर-गाँव में इससे जल की उचित व्यवस्था हो सकेगी, जो हर गर्मी में एक विकट समस्या रहती है।

19 मार्च के दिन नव संवत्सर का पर्व था। इसमें कुल पुरोहित घर-घऱ जाकर नए वर्ष की पत्री वाँचते हैं, इसी क्रम में युवा पंडित जोगिंद्रजी से मुलाकात हुई। पता चला कि नए संवत का नाम रौद्र है, इसके राजा गुरु, मंत्री मंगल हैं आदि। विभिन्न राशियों का लेना-देना व धर्म-अधर्म की स्थिति तथा विभिन्न घटनाओं के प्रतिशत आदि से परिचित हुए। साथ ही घाटी की देवपरम्परा पर कुछ सार्थक चर्चा भी हुई।

इस तरह मार्च 2026 में एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास कई सुखद स्मृतियों को बटोरने का संयोग रहा। दीर्घकालीन संयम व प्रतिक्षा का मीठा फल जैसे इन सुखद अनुभूतियों के रुप में मिल रहा था। बारिश, बर्फवारी के बीच ठंड व तंदूर के आसपास लोकजीवन की बचपन की यादें सब जीवंत हो रहीं थीं व गहन-गंभीर मंथन के साथ इस शेष बचे नश्वर जीवन के सार्थक नियोजन की रुपरेखा ओर स्पष्ट हो रही थी। 

इसी प्रवास के दौरान सम्पन्न कुल्लू-मानाली घाटी के यात्रा वृतांत को पढ़ सकते हैं आगे दिए लिंक पर। (मानाली से कुल्लू वाया लेफ्ट बैंक)

शनिवार, 31 जनवरी 2026

मेरा गाँव मेरा देश: प्राकृतिक फ्लोरा-फोना संग यादें बचपन की

                                                   गाँव का फ्लोरा-फोना और जैव-विविधता

यहाँ चर्चा हो रही है गाँव के फ्लोरा-फोना की, अर्थात् वनस्पति, जीव-जंतु आदि की, जो बचपन में हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे। जिनसे बचपन की कई यादें जुड़ी हुई हैं और बदलते समय के साथ इनके भौतिक स्वरुप व अस्तित्व में आए परिवर्तन के साथ इन भावों का झंकृत होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत है इसी का लेखा-जोखा, जिससे उस दौर से गुजरे लोग भली-भाँति स्वयं को जोड़ सकते हैं और हिमालय की जैव-विवधता रुचि रखने वाले सुधी पाठक भी इस परिवर्तन में निहित शाश्वत तत्व को ह्दयंगम कर अपना ज्ञानबर्धन कर सकते हैं।

गाँव व इलाके के प्राकृतिक फल व सब्जियाँ - बचपन के दौर में घर-गाँव में सबकुछ प्राकृतिक रुप में उपलब्ध होता था, अपने खेत व क्यारियों में आवश्यकता की सब्जी-भाजी व तरकारियाँ उग आती थीं। भिंडी, टमाटर, खीरा, कद्दु, लौकी, घिया, करेला, वैंगन आदि सब घर की ही क्यारियों, आंगन व छत पर उगते थे। मौसमी सरसों का साज सीजन में सहज ही खेतों में उपलब्ध रहता। ये सब अपने साथ दूसरों के भी काम आते थे। जरुरत से अधिक हुए तो पड़ोसी, रिश्तेदारों के साथ इनका आदान-प्रदान चलता था। बाज़ार से इनको खरीदने का तब कोई चलन नहीं था।

कभी घर के बड़े-बुजुर्ग बाज़ार गए तो कुछ विशेष सब्जियाँ व फल ही वहाँ से खरीदते, जो घरों में नहीं उगते थे। जैसे आलू, प्याज आदि से लेकर केला, आम, पपीता जैसे फल।

जंगल व वनक्षेत्र भी कुछ विशिष्ट सब्जियों व वनस्पतियों के उर्बर स्रोत रहते। लिंगड़ी इसमें प्रचलित थी, जो आज भी जंगल में नमी व छायादार स्थानों पर बहुतायत में मिल जाती है। 


इससे सब्जी से लेकर आचार बनता। खेत के मेढ़ों में देसी आढू व विदाना के पेड़ों से तोड़े फलों से आढ़ू-विदाना का आचार बनता, जिसका कोई सानी नहीं रहता। इनके साथ बिच्छू बूटी की मुलायम पत्तियों की सब्जी व चटनी भी नाश्ते का हिस्सा बनती। 
 

यहाँ गुच्छी का नाम लिए बिना चर्चा अधूरी रहेगी। फरवरी-मार्च माह में खेतों के किसी कौने में या जंगल में गुच्छी के झुंड मिलते। इसे विश्व की सबसे पौष्टिक और मंहगी सब्जी माना जाता है। यह कैसे व कब जंगल में उगती है, यह लम्बे समय तक एक पहेली रही है, हालाँकि अब कुछ वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला में तैयार करने की बात करने लगे हैं। 


सुबह-सुबह पुराने सेब-जापानी के पेड़ के नीचे ओंस भरी घास से झांकते गुच्छी के दर्शन रोमाँचित करते। फिर थोड़ा बड़ा होने पर ही इनको तोड़ते।

खेतों में ही मेढ़ों पर उगे शहतूत, अंजीर जैसे फलदार पेड़ बच्चों के लिए मौसम का फल सावित होते। इसके साथ काली और लाल रंग की आंछा (झाडियों में उगने वाली जंगली बैरी), शांभल (किल्मोड़ा) के खट्टे-मीठे बेंगनी दानेदार फल व जंगली दाडू (अनार) भी दोपहर को भूख लगने पर नाश्ता बनते, जब गाय व भेड़ों के साथ हम ग्वाल धर्म निभाते जंगल जाते। शेगल के पके काले फल भी चीकू से कम स्वादिष्ट नहीं रहते थे। जंगल में ये बंदर, लंगूर व भालू का प्रिय आहार रहते। 

घर में जैविक रुप से परम्परागत गैंहू, धान, मक्का, जौ आदि अन्न उगाए जाते। गाय का गौबर उर्बरक के रुप में काम आता। हालांकि धीरे-धीरे रसायन खाद का चलन भी हमने बढ़ते देखा। दाल में अपने ही खेत में माष, राजमाष, सोयावीन, चना, मूँग, मसूर, रोंगी जैसी फसलें घर की आवश्यकता को पूरा करती।

तिल की फसल भी बचपन में होती, जिसका तेल तैयार होता। खिचडी के साथ इसका बहुत जायकेदार कम्बिनेशन रहता। तिल की चटनी का उपयोग भटूरे व सिड्डू में होता। इसके सूखे लट्ठों को जलाकर दिवाली की सर्द रातों में जलाते, जिसका आनन्द दीपपर्व के उत्सव में एक नया ही रंग घोलता था। सरसों की खेती के संग पीले रंग से अटे खेत एक अलग ही नज़ारा पेश करते। बागवानी के बढ़ते चलन के कारण अब ऐसे दृश्य कम ही रह गए हैं।   

मोटे अनाज में कोदरा, चीणी, काउणी, टाक, सरयारा (रामदाणा) की फसलें हमने घर में ही उगती देखी। सरयारा से तैयार होने वाली धाणा व फैंबड़ा (नकमीन खीर) का स्वाद नहीं भूल सकते। पूर्वजों द्वारा उगाए जाने वाले ये मोटे अनाज धीरे-धीरे लुप्त होते गए। जैसे-जैसे बागवानी का चलन बढता गया, सब्जियों में केश क्रॉप का चलन शुरु हुआ, किसानों का ध्यान अर्थ उपार्जन में अधिक हो चला व पारंपारिक विरासत का संरक्षण-संवर्धन कहीं पीछे छूटता गया।

इसी क्रम में ब्रौकली, सेलरी, पक्चोई, जुग्नी, स्कवैश जैसी एग्जोटिक सब्जियों का चलन बढ़ता चला। 


इसी के साथ टमाटर, फूलगोभी, बंद गोभी आदि का उत्पादन अपनी आवश्यकता तक सीमित न होकर, नकदी फसल (केश क्रोप) के रुप में होने लगा। यह किसानों के आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से आवश्यक भी था, लेकिन इनके साथ सब्जियों से जुड़ा प्राकृतिक एवं जैविक स्वाद पीछे छूटता गया। रसायन से लेकर कीटनाशकों को बहुतायत में छिड़काव होने लगा।

आज बचपन की यादों का वह प्राकृतिक जीवन स्मृतियों की गोद में दबा पड़ा है और थोड़ा कुरेदने पर भावुक एवं रोमांचित करता है और दुबारा उसे जीने का भाव जगाता है। हालाँकि किचन गार्डनिंग के रुप में उस चलन को दुवारा शुरु किया जा सकता है। लेकिन समय का प्रभाव तो घटनाओं व परिस्थितियों पर स्पष्ट है। 

गाँव व इलाके के जीव-जंतु - गाँव व इलाके के जीव-जंतुओं की चर्चा किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। घर में पाले गए कुत्ते, बिल्ली, भेड-बकरियाँ व गाय-बैल तो परिवार का अनिवार्य हिस्सा रहते। कुछ समय मुर्गियों के पालन को भी देखा। धीरे-धीरे भेड़-बकरियों का चलन कम होता गया। फिर टिल्लर मशीन आने से बैल भी दुर्लभ होते हुए। अब गाय पालन शेष बचा है। उससे भी कई लोग अब गुरेज करने लगे हैं व दूध खरीद कर आवश्यकता पूरा कर रहे हैं।

घर-आंगन में सबसे रोचक पक्षियों में गौरेया व मैना रहते। 


गौरेया झुंडों में फुदकते व चहचहाते हुए वातावरण में एक रौनक लाए रहती। खास कर धान के टूहके के पास ये झुंडों में दाना चुगती और हम इनको पकड़ने का असफल प्रय़ास करते। आज गौरेया के दर्शन दुर्लभ हो चले हैं ऊँचाई वाले गाँवों में ही इनके दर्शन किए जा सकते हैं, वहीं मैना आज भी बैसे ही घर की शोभा बढ़ा रही हैं।

कौआ तो सदावहार पक्षी रहा है। सर पर कल्गी धारी पिक्लटूरु भी अपना दर्शन देते थे। उपउपड़े अपनी मधुर हुपहुप ध्वनि के कारण एक नई मिठास घोलते, जिनके दर्शन अब दुर्लभ हो चले हैं। इसी तरह वसंत में पहाड़ी कोयल कुप्पू चिडिया अपनी मीठी व सुरीली आवाज से एक मंगलमयी रस बिखेरती। जो आज भी जारी है। घूघती का अपना ही जल्बा रहता, जो बिजली की तार पर जोड़ें में शोभायमान रहती। फलों के सीजन में तोतों की मौज रहती, जो झुंडों में एक बगीचे से दूसरे बगीचे में उड़ान भरते रहते। उल्टा कौआ (चमगादड़) भी बाल मन के लिए एक कौतुक का विषय रहते, क्योंकि दिन में इनके दर्शन नहीं होते थे और रात को खाली हवा में उड़ते दिखते और बगीचों में फलों का भक्षण करते। 

खेत के कौनों में तीतर की तिरक-तिरक-तितरी आवाज भी सभी का ध्यान आकर्षित करती। कड़ेशे (जंगली मुर्गे) जंगल व खेतों में जहाँ-तहाँ मिलते, जो आज भी बहुतायत में पाए जाते हैं। जंगल की शान मोनाल पक्षी के बारे में सुनते थे, लेकिन उसकी सुंदर एवं सतरंगी कलगी के लिए शिकार के चलते आज उसका अस्तित्व संकट में है तथा उसके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। ऐसे ही चकोर पक्षी भी शिकार के कारण दुर्लभ हो गए हैं। सफाई करने वाले गडिल्ण (गिद्ध) पक्षी भी आज दुर्लभ श्रेणी में आ गए हैं। 

जंगलों में गीदड़, तेंदुआ, बाघ, भालू आदि की चर्चा बचपन में होती, जिनके प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ थे। रात को गीदड़ों के चिल्लाने की आवाजें गाँव के कुत्तों को चौकन्ना कर देती। तेंदुए व बाघ के दर्शन तो दुर्लभ ही रहे। हाँ भालूओं से जुड़ी घटनाओं को किवदंतियों के रुप में अपने बुजुर्गों से सुनते। जंगल में जाने पर भालुओं द्वारा खोदी जमीं के दर्शन प्रायः होते रहे। बर्फ में उनके पंजों के निशान भी दिखते रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष इंसान पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो चिंता का विषय है। हालाँकि जंगली जानवरों के संदर्भ में प्रचलित है कि वे बिना कारण हमला नहीं करते। जब अचानक किसी से सामना होता है, तो वे आत्मरक्षा में हमला करते हैं। जब मादा भालू अपने शाबकों के साथ होती है, तो वह आक्रमक होती है।

पिछले कुछ वर्षों से वन्य विभाग द्वारा जंगलों में तेंदुए छोड़े जाने से इनकी संख्या में वृदिध हो रही है, दूसरा जंगलों के घटते दायरे से उनके भोजन का अभाव हो चला है, जिससे ये इंसानी वस्तियों की ओर आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अतः आए दिन पालतू कुत्तों व मवेशियों पर इनके हमले बढ़ रहे हैं।

जंगलों में बंदर, लंगूर आदि के दर्शन होते है तथा उंचाई के गाँव में फसलों व फलों को ये नुकसान पहुँचाते है। नीचे हमारे घर के आसपास इनके दर्शन दुर्लभ ही रहे। जंगल में तो गडीहण (उड़न गिलहरी) के दर्शन भी होते रहते।

इसके साथ मधुमक्खियों का पालन भी पुश्तों से बुजुर्गों का एक शग्ल रहता। हर घर में इनके छत्ते (मडाम) मिलते। आज इनकी संख्या कम हो चुकी है। हालाँकि कुछ शौकिया तौर पर, तो कुछ बागवानी के चलते फ्रेम जड़े बक्सों में मधुमक्खियों का पालन करन लगे हैं।

गांव व इलाके के वृक्ष-वनस्पति – में भेखल, शांभल, टिम्बर आदि लोकप्रिय़ थे, जिनसे कई तरह की यादें जुड़ी हुई हैं। भेखल की खाली पाइप को हम बंदूक की तरह इस्तेमाल करते। शांभल के छोटे-छोटे खट्टे-मीठे जांमुनी फल खाते और बाद में पता चला कि दारु हल्दी के रुप में इससे कैंसर की दबा बनती है। टिम्बर (तिरमिरा) का उपयोग हम माउथ फ्रेशनर के रुप में करते।

कोउश (अतीश) के पेड़ गाँव के नाले व ब्यास नदी के किनारे कतार में दर्शन देते तथा शीतलता व छाया देते। शेगल व बाँज के सदावहार पेड़ चारे के रुप में काम आते। इसके जंगल गाँव वासियों के लिए सर्दी में चारा का एक मह्त्वपूर्ण विकल्प रहते। मोहरु का इकलौता हराभरा पेड़ खेत के कौने में शौभा देता। ऊँचाइयों में काईल, रई, तोश, देवदार के गगनचूंबी पेड़ों की तो बात ही कुछ ओर रहती। जिनके दर्शन हमें एक दूसरी ही दुनियाँ में विचरण की अनुभूति देते। 

इस तरह अपने गाँव व क्षेत्र में जीव-जंतुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों का यह पिछले साढ़े पाँच दशक का मुआइना स्पष्ट करता है कि चीजें काफी बदल गई हैं। कुछ ग्लौबल वार्मिंग के चलते जलवायु परिवर्तन, तो कुछ जीवन में मशीनों के हस्तक्षेप व अधिक धन कमाने की दौड़ तथा प्रकृति के साथ इंसान का बढ़ता हस्तक्षेप, सब मिलाकर हिमालय के इस सुंदर क्षेत्र की जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है। जिसका संरक्षण हर स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है। पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक सौंदर्य, स्वास्थ्यबर्धक आवोहवा व सुख-शांतिपूर्ण जीवन बहुत कुछ इससे जुड़ा हुआ है। 

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