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बुधवार, 30 जून 2021

कुल्लू घाटी की देव परम्परा

आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत का भी रहे ध्यान

कुल्लू-मानाली हिमाचल का वह हिस्सा है, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक विशिष्ट स्थान रखता है। क्षेत्र की युवा पीढ़ी को शायद इसका सही-सही बोध भी नहीं है, लेकिन यदि एक बार उसे इसकी सही झलक मिल जाए, तो वह देवभूमि की देवसंस्कृति का संवाहक बनकर अपनी भूमिका निभाने के लिए  सचेष्ट हो जाए। और बाहर से यहाँ पधार रहे यात्री और पर्यटक भी इसमें स्नात होकर इसके रंग में रंग जाएं।

कुल्लू-मानाली हिमाचल की सबसे सुंदर घाटियों में से है, जिसके कारण मानाली सहित यहाँ के कई स्थल हिल स्टेशन के रुप में प्रकृति प्रेमी यात्रियों के बीच लोकप्रिय स्थान पा चुके हैं। हालाँकि बढ़ती आवादी और भीड़ के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी सुंदर घाटियाँ, दिलकश वादियाँ अपने अप्रतिम सौंदर्य के साथ प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियोँ तथा आस्थावानों का स्वागत करने के लिए सदा तत्पर रहती हैं।

60-70 किमी लम्बी और 2 से 4 किमी चौड़ी घाटी के बीचों-बीच में बहती ब्यास नदी की निर्मल धार, इसे विशिष्ट बनाती है। साथ ही भूमि की उर्बरता और जल की प्रचुरता इस घाटी के लिए प्रकृति का एक विशिष्ट उपहार है। इसी के आधार पर घाटी फल एवं सब्जी उत्पादन में अग्रणी स्थान रखती है। यहाँ सेब, नाशपाती, प्लम जैसे फल बहुतायत में उगाए जा रहे हैं। अंग्रेजों के समय में सेब उत्पादन के प्राथमिक प्रयोग की यह घाटी साक्षी रही है। इस संदर्भ में मंद्रोल, मानाली, सेऊबाग जैसे स्थान अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।

स्नो लाईन पास होने के कारण यहाँ का मौसम पहाड़ी प्राँतों के इसी ऊँचाई के क्षेत्रों की तुलना में अधिक ठण्डा रहता है। घाटी में बर्फ से ढ़की पहाडियाँ साल के अधिकाँश समय हिमालय टच का सुखद अहसास दिलाती रहती हैं, हालाँकि सर्दियों में तापमान के माइनस में जाने पर स्थिति थोड़ी विकट हो जाती है, लेकिन प्रकृति ने इसकी भी व्यवस्था कर रखी है। घाटी में गर्म जल के कई स्रोत हैं। शायद ही इतने गर्म चश्में हिमाचल के किसी और जिला या भारत के किसी पहाड़ी प्राँतों के हिस्से में हों। मणीकर्ण, क्लाथ, वशिष्ट, खीरगंगा, रामशिला जैसे स्थानों में ये सर्दियों में यात्रियों एवं क्षेत्रीय लोगों के लिए वरदान स्वरुप गर्मी का सुखद अहसास दिलाते हैं और इनमें से अधिकाँश तीर्थ का दर्जा प्राप्त हैं, जिनमें स्नान बहुत पावन एवं पापनाशक माना जाता है।

यह घाटी शिव-शक्ति की भी क्रीडा स्थली रही है। मणिकर्ण तीर्थ की कहानी इसी से जुड़ी हुई है। खीरगंगा को शिव-पार्वती पुत्र कार्तिकेय के साथ जोड़कर देखा जाता है। पहाड़ी की चोटी पर बिजलेश्वर महादेव इसकी बानगी पेश करते हैं, जिसके चरणों में पार्वती एवं ब्यास नदियाँ जैसे चरण पखारती प्रतीत होती हैं व इनके संगम को भी तीर्थ का दर्जा प्राप्त है, जहाँ स्थानीय देवी-देवता विशेष अवसरों पर पुण्य स्नान करते हैं। बिजलेश्वर महादेव से व्यास कुण्ड एवं मानतलाई के बीच एक दिव्य त्रिकोण बनता है, जिसका अपना महत्व है। अठारह करड़ु देवताओं की लीलाभूमि चंद्रखणी पास इसी के बीच में शिखर पर पड़ता है। इंद्रकील पर्वत का इस क्षेत्र में अपना विशिष्ट महत्व है।

यह भूमि महाभारत के यौद्धा अर्जुन की तपःस्थली भी रही है, जहाँ इन्हें दिव्य अस्त्र मिले थे। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर शवर रुप में भगवान शिव प्रकट हुए थे व युद्ध में परीक्षा के बाद प्रसन्न होकर वरदान दिए थे। मानाली के समीप लेफ्ट बैंक में जगतसुख के पास अर्जुन गुफा और शवरी माता का मंदिर आज भी इसकी गवाही देते हैं।

मानाली में हिडिम्बा माता का मंदिर महाभारत काल की याद दिलाता है, जब महाबली भीम नें राक्षस हिडिम्ब को मारकर हिडिम्बा से विवाह किया था। इनके पुत्र घटोत्कच का मंदिर भी पास में ही है। इसके आगे पुरानी मानाली में ऋषि मनु का मंदिर है, जिनके नाम पर इस स्थल का नाम मानाली पड़ा। मनु ऋषि से जुड़ा विश्व में संभवतः यह एक मात्र मंदिर है। इस आधार पर मानव सभ्यता की शुरुआत से इस स्थल का सम्बन्ध देखा जा सकता है, जिस पर और शोध-अनुसंधान की आवश्यकता है। सप्तऋषियों में अधिकाँश के तार इस घाटी से जुड़े मिलते हैं। व्यास, वशिष्ट, जमदग्नि, पराशर, गौतम, अत्रि, नारद जैसे ऋषि-मुनियों का इस घाटी में विशेष सम्बन्ध रहा है।

इस घाटी में हर गाँव का अपना देवता है, जो ठारा करड़ू के साथ अठारह नारायण, आठारह रुद्र, उठारह नाग आदि देवताओं ये युग्म के रुप में इस घाटी को देवभूमि के रुप में सार्थक करते हैं। विश्व विख्यात कुल्लू के दशहरे में ये सभी देवी-देवता अपने गाँवों से निकलकर भगवान रघुनाथ को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। कुल्लू के ढालपुर मैदान (ठारा करड़ू की सोह) में देवमिलन का यह पर्व अद्भुत नजारा पेश करता है।

इन सब विशेषताओं के साथ विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र मलाना इसी घाटी की दुर्गम वादियों में स्थित है, जहाँ आज भी इनके देवता जमलु का शासन चलता है। विश्व विजय का सपने लिए सम्राट सिकन्दर से लेकर बादशाह अकबर की कथा-गाथाएं इस गाँव से जुड़ी हुई हैं।

कुल्लू मानाली के ठीक बीचों-बीच लेफ्ट बैंक पर स्थित नग्गर एक विशिष्ट स्थल है, जो कभी कुल्लू की राजधानी रहा है। आज भी नग्गर में 500 वर्ष पुराने राजमहल को नग्गर कैसल के रुप में देखा जा सकता है। यहाँ का जगती पोट देवताओं की दिव्य-शक्तियों की गवाही देता है। रशियन चित्रकार, यायावर, पुरातत्ववेता, विचारक, दार्शनिक, कवि, भविष्यद्रष्टा और हिमालय के चितेरे निकोलाई रोरिक की समाधी के कारण भी घाटी अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर अपना विशेष स्थान रखती है। विश्व के ये महानतम कलाकार एवं शांतिदूत 1928 में आकर यहाँ बस गए थे, जो इनके अंतिम 20 वर्षों की सृजन स्थली रही। 

नग्गर शेरे कुल्लू के नाम से प्रख्यात लालचंद्र प्रार्थी की भी जन्मभूमि रही है। मानाली के समीप प्रीणी गाँव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी का लोकप्रिय आशियाना रहा, जिनके नाम से जुड़े पर्वतारोहण संस्थान और अटल टनल इस क्षेत्र से उनके आत्मिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। मानाली के आगे नेहरु कुण्ड जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा स्थल था, जहाँ के जल का वे यहाँ आने पर पान करते। आज भी कई हस्तियाँ इस घाटी से जुड़कर अपना गौरव अनुभव करती हैं।

एडवेंचर प्रेमी घुमक्कड़ों के बीच भी घाटी खासी लोकप्रिय है, जिसमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान, सर्दी में स्कीइंग से लेकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता है, जो पर्वतारोहण एवं एडवेंचर स्पोर्टस के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान रखता है। सोलाँग घाटी में स्कीईंग के साथ अन्य एडवेंचर स्पोर्टस होते रहते हैं। इसके आगे कुल्लू घाटी को लाहौल घाटी के दुर्गम क्षेत्र से जोड़ती अटल टनल भी एक नया आकर्षण है, जिसका पिछले ही वर्ष उद्घाटन हुआ है।

इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के युग में घाटी की सांस्कृतिक विरासत एवं कला संगीत आदि के प्रति युवाओं व जनता में एक नया रुझान पैदा हुआ है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती एक सुखद घटना है। लेकिन नाच गाने व मनोरंजन तक ही सांस्कृतिक विरासत को सीमित मानना एक भूल होगी। फिर देवपरम्परा में बलि प्रथा से लेकर लोक जीवन में शराब व नशे का बढ़ता चलन चिंता का विषय है। इन विकृतियों के परिमार्जन के साथ समय देवसंस्कृति की उस आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरुक होने का है, जिसके आधार पर संस्कृति व्यक्ति के मन, बुद्धि एवं चित्त का परिष्कार करती है, जीवन के समग्र उत्थान का रास्ता खोलती है। और परिवार में श्रेष्ठ संस्कारों का रोपण करते हुए समाज, राष्ट्र तथा पूरे विश्व को एक सुत्र में बाँधने का मानवीय आधार देती है। समृद्ध आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को संजोए इस देवभूमि से इस आधार पर कुछ विशेष आशाएं तो की ही जा सकती हैं। 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

Indian Institute of Advanced Study (IIAS Shimla)


शिमला की पहाडियों की चोटी पर बसा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला का एक विशेष आकर्षण है, जो शोध-अध्ययन प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। उच्चस्तरीय शोध केंद्र के रुप में इसकी स्थापना 1964 में तत्काकलीन राष्ट्रपति डॉ.एस राधाकृष्णन ने की थी। इससे पूर्व यह राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता था और वर्ष में एक या दो बार पधारने वाले राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति का विश्रामगृह रहता था, साल के बाकि महीने यह मंत्रियों और बड़े अधिकारियों की आरामगाह रहता। डॉ. राधाकृष्णन का इसे शोध-अध्ययन केंद्र में तबदील करने का निर्णय उनकी दूरदर्शिता एवं महान शिक्षक होने का सूचक था।

 

आजादी से पहले यह संस्थान देश पर राज करने वाली अंग्रेजी हुकूमत की समर केपिटलका मुख्यालय था। सर्दी में कलकत्ता या दिल्लीतो गर्मिंयों में अंग्रेज यहाँ से राज करते थे और इसे वायसराय लॉज के नाम से जाना जाता था। अतः यह मूलतः अंग्रेजी वायसरायों की निवासभूमि के रुप में 1888 में तैयार होता है, जिसमें स्कॉटिश वास्तुशिल्प शैली को देखा जा सकता है। इसे शिमला की सात पहाड़ियों में से एक ऑबजरवेटरी हिल पर बसाया गया है।


मालूम हो कि शिमला में ऐसी सात प्रमुख पहाड़ियाँ हैं, जिन पर यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल बसे हैं। पश्चिमी शिमला का प्रोस्पेक्ट हिल, जिस पर कामना देवी मंदिर स्थित है। सम्मर हिल, जहाँ हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का कैंपस पड़ता है। ऑबजर्वेटरी हिल, जहाँ इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी स्थित है। इन्वेरार्रम हिल, जहाँ स्टेट म्यूजियम स्थित है। मध्य शिमला काबेंटोनी हिल जहाँ ग्राँड होटलपड़ता है। मध्य शिमला की जाखू हिल, जहाँ हनुमानजी का मंदिर स्थित है। यह शिमला की सबसे ऊँची पहाड़ी है, जहाँ हनुमानजी की 108 फीट ऊँची प्रतिमा लगी है, जिसके दर्शन शिमला के किसी भी कौने से किए जा सकते हैं, यहाँ तक कि रास्ते में सोलन से ही इसके दर्शन शुरु हो जाते हैं। और उत्तर-पश्चिम दिशा का इलायजियम हिल, जहाँ ऑकलैंड हाउस और लौंगवुड़ स्थित हैं।

शिमला की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक विशेषता, फ्लोरा-फोनासब मिलाकर इसको विशिष्ट हिल स्टेशन का दर्जा देते हैं। एडवांस्ड स्टडी के संरक्षित परिसर में इनके विशेष दिग्दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ देवदार के घने जंगल हैं। इनके बीच में बुराँश के सघन पेड़ लगे हैं, जो अप्रैल-मईके माह में सुर्ख लाल फूलों के साथ यहाँ के वातावरण की खुबसूरती में एक नया रंग घोलते हैं। इसके साथ जंगली चेस्टनेट के पेड़ बहुतायत में मिलेंगे, जिनके फूलों के गुच्छेसीजन में यात्रियों का स्वागत करते हैं। इनके बीच बाँज के वन तो यहाँ आम हैं। इन वृक्षों पर उछल-कूद करते बंदर लंगूरों के झुण्ड भी इस परिसर की विशेषता है। बंदर हालाँकि थोड़े खुराफाती जीव हैं, खाने पीने की चीजें देख छीना झपटी करना अपना अधिकार मानते हैं, जबकि लंगूर बहुत शर्मीला और शांत जीव है। जो झुँड में रहता है और किसी को अधिक परेशान नहीं करता। लम्बी पूँछ लिए इस जीव को एक पेड़ से दूसरे पेड़ में लम्बी छलाँग लगाते यहाँ देखा जा सकता है।

संस्थान प्रायः सर्दियों में दिसम्बर से फरवरी तक शोधार्थियों के लिए बन्द रहता है। बाकि समय इसके यहाँ कई तरह के शोध अध्ययन से जुड़े कार्यक्रम चलते रहते हैं। जिनमें एक माह का एशोसिएटशिप कार्यक्रम पीएचडी स्कोलर्ज के बीच लोकप्रिय है। इसके बाद एक से दो वर्ष का फैलोशिप प्रोग्राम, जिसमें यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्ज एवं अपने क्षेत्र के विद्वान लोग आते हैं। इसके साथ बौद्धिक गोष्ठियां, सेमीनार आदि यहाँ चलते रहते हैं, जिसमें अपनेक्षेत्र के चुडान्त विद्वान एवं विषय विशेषज्ञ यहाँ पधारते हैं, बौद्धिक विमर्श होते हैं और विचार मंथन के साथ समाज राष्ट्र को दिशा देने वाली नीतियाँ तय होती हैं।

यहाँ का पुस्तकालय संस्थान की शान है, जो प्रातः नौ बजे से रात्रि सात बजे तक शोधार्थियों केलिए खुला रहता है। इसमें लगभग दो लाख पुस्तकें हैं औरइसके साथ समृद्ध ई-लाइब्रेरी, जिसमें विश्वभर की पुस्तकों एवं शोधपत्रों को एक्सेस किया जा सकता है। जब पढ़ते-पढ़ते थक जाएं तो तरोताजा होने के लिए पास ही एक कैंटीन और एककैफिटेरिया की भी व्यवस्था है। प्रकृति की गोद में बसा परिसर स्वयं में ही एक प्रशांतक ऊर्जा लिए रहता है, जिसमें टहलने मात्र से व्यक्ति तरोताजा अनुभव करता है। संस्थान की अपनी शोध पत्रिका सम्मर हिल रिव्यू है। यहाँ का अपना प्रकाशन भी है, जिसके प्रकाशनों का किसी भी बड़े पुस्तक मेले में अवलोकन किया जा सकता है।



परिसर में लाइब्रेरी के पीछे विशाल बाँज का पेड़ लगा है, जहाँ कभी कामना देवी का मंदिर था, जिसे अब पास की पहाड़ी में विस्थापित किया गया है। इसी के साथ दो भव्यमैपल पेड़ हैं, जो शिमला में रिज पर एक कौने में भी स्थित हैं। मौसम साफ होने पर इसके पास ही एक स्थान से दूर हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का अवलोकन किया जा सकता है, जहाँ इनकी ऊँचाई व नाम भी अंकित है। इसी के नीचे बहुत बड़ा बगीचा और पार्क है।उसके पार खेलने का बंदोवस्त है, जहाँ एक इंडोर स्टेडियम है। उसके आगेअंडरग्राउण्ड जेल है, जहाँ गाँधीजी को कुछ दिन नजरबंद किया गया था।

इसके साथ यहाँ का अपना समृद्धबोटेनिक्ल गार्डन है, जिसमें तैयार किए जा रहे फूलों के गमलों से पूरा परिसर शोभायमान और सुवासित रहता है। संस्थान में जल संरक्षण की बेहतरीन व्यवस्था है। मुख्य भवन की छत से गिरता बारिश का पानी सीधे छनकर लॉन के नीचे बने स्टोरेज टैंक में जाता है और इसका उपयोग फूलों, पौधों व लॉन की सिंचाई में किया जाता है।


रहने के लिए यहाँ परिसर में भव्य भवन हैं, जिनमें वेहतरीन कमरों की व्यवस्था है। भोजन के लिए पहाड़ी पर मेस है, जिसमें उम्दा नाश्ता, लंच और डिन्नर परोसा जाता है। यहीं आगंतुकों के लिए अतिथि गृह भी है। फिल्म देखने के लिए छोटा सा ऑडिटोरियम भी है। जरुरत का सामान खरीदने के लिए परिसर के नीचे बालुगंज में तमाम दुकानें हैं। यहाँ का कृष्णा स्वीट्सदूध-जलेबी के लिए प्रख्यात है। थोड़ी ही दूरी पर शिमला यूनिवर्सिटी है, जहाँ बस व पैदल मार्ग दोनों तरीकों से जाया जा सकता है। दोनों मार्ग घने देवदार, बुराँश व बाँज के जंगल से होकर गुजरते हैं।

यहाँ पर रुकने व अध्ययन के इच्छुक शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन प्रवेश की सुविधा है। एक माह से लेकर दो साल तक इस सुंदर परिसर में गहन अध्ययन, चिंतन-मनन एवं सृजन के यादगार पल बिताए जा सकते हैं। हमें सौभाग्य मिला 2010,11 और 2013 में तीन वार एक-एक माह यहाँ रुकने का और अपने एसोशिएटशिप कार्य़क्रम पूरा करने का, जिसमें हमने अपने पीएचडी के विषय को गंभीरता एवं व्यापकता में एक्सप्लोअर किया। भारत भर से आए विद्वानों से चर्चा होती रही, फैलोज के साप्ताहिक सेमीनार में खुलकर भाग लिया और कई सारी नई चीजें सीखने को मिलीं। उस बक्त यहाँ के निर्देशक थे, प्रो. पीटर रोनाल्ड डसूजा, जिनके सज्जन एवं भव्य व्यक्तित्व, प्रखर विद्वता, बौद्धिक ईमानदारी, शोधधर्मिता एवं भावपूर्ण संवाद से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, जिसे समरण करने पर मन आज भी पुलकित हो उठता है।


रविवार, 24 जनवरी 2021

शिमला के ट्रेकिंग ट्रेल्ज एवं दर्शनीय स्थल

 


हिमाचल प्रदेश की राजधानी के साथ शिमला का हिल स्टेशन के रुप में सदा से एक विशेष स्थान रहा है। हालाँकि बढ़ती आबादी, मौसम की पलटवार और गर्मियों में पानी की कमी के चलते यहाँ नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियों के लिए इस हिल स्टेशन में बहुत कुछ है, जो इसके भीड़ भरे बाजारों से दूर एक अलग दुनियाँ की सैर साबित होता है। यहाँ पर ऐसे ही कम प्रचलित ऑफ-बीट किंतु दर्शनीय स्थलों की चर्चा की जा रही है।

        जब अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर इस इलाके से 1815 के आसपास गुजरे थे, तो देवदार से घिरे इस स्थल को देखकर उन्हें इँग्लैंड-स्कॉटलैंड के अपनी ठण्डी आवोहवा वाले क्षेत्रीय पहाड़ों की याद आई थी। और इसे अपने आवास स्थल के रुप में विकसित करने की योजना बनी। तब यहाँ चोटी पर मात्र जाखू मंदिर था और आस पास कुछ बस्तियाँ।सन 1830 तक यहाँ 50 घर आबाद हो चुके थे और आबादी मुश्किल से 600 से 800 की थी।धीरे-धीरे यह एक हिल स्टेशन और गर्मियों में समर केपिटल के नाम से प्रख्यात हुई। उस समय श्यामला माता (काली माता) के मंदिर के रुप में इस इलाके का नाम शिमला पड़ा। आज काली बाड़ी के रुप में इसके दर्शन रिज से थोड़ा नीचे किए जा सकते हैं, जहाँ से शिमला की घाटियों व सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं का विहंगावलोकन किया जा सकता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा भी दर्शनीय रहता है।


ब्रिटिश काल में वायसराय के रहने के लिए शिमला की एक पहाड़ी पर वायसराय लॉज का निर्माण हआ, जिसमें सबसे पहले पानी व बिजली की व्यवस्था 1888 तक हो जाती है। इसे बाद में राष्ट्रपति भवन और आज भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS-इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी) के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उस समय के स्थापित प्रख्यात समारक भवन हैं– कैनेडी हाउस,(ओवरोय) सेसिल होटल,विधान सभा भवन, शिमला रेल्वे बोर्ड बिल्डिंगआदि। रिज के पास चर्च, गेयटी थिएटर, स्केंडल प्वाइंट, टाउन हॉल,जनरल पोस्ट ऑफिस आदि भवन एवं स्थल अंग्रेजों की विरासत की याद दिलाते हैं। राह में नीचे घाटी की तली में अन्नाडेल ग्राउण्ड भी इसका एक समारक है, जिसकी देखभाल अभी सेना कर रही है। इसी दौर मेंसन 1898 में 102 सुरंगों तथा 18 स्टेशनों के साथ भारत का ऐतिहासिक पहाडी नेरो गेज रेल्वे ट्रेक बनता है, जो आज सांस्कृतिक धरोहर के रुप में यूनेस्को हेरिटेज साइट में शामिल है।काल्का से शिमला तक पहाडियों के बीच लुका छिपी करता इसका सफर बेहद रोमाँचक और यादगार रहता है।

शिमला के दर्शनीय स्थलों में सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी पर जाखू मंदिर स्थित है, जिसके दर्शन शिमला के लगभग हर कौने से किए जा सकते हैं। रिज व माल रोड़ से तो इसके दर्शन एक दम प्रत्यक्ष ही रहते हैं। देवदार के गंगनचूम्बी वृक्षों से भी उँचे108 फीट ऊँचे हनुमानजी जैसे अपनी विराट उपस्थिति के साथ सबको अनुग्रहित करते प्रतीत होते हैं।



रिज से यहाँ तक पैदल भी जाया जा सकता है और टेक्सी से भी। शिमला के प्रवेश द्वार पर दायीं ओर संकटमोचन मंदिर है, जिसे उत्तर भारत के प्रख्यात हनुमान भक्त एवं महान संत नीम करौरी बाबा के आशीर्वाद स्वरुप बनाया गया था। शिमला के उस पार तारा देवी हिल्ज पर माता तारा देवी मंदिर भी अपनी उपस्थिति से श्रद्धालुओं को श्रद्धानत करता है, जिसका नजारा रात को टिमटिमाती रोशनी में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है।

बस से सीधा इसके प्राँगण तक शोघी से होकर जाया जा सकता है, लेकिन तारा देवी तक सीधे संकटमोचन मंदिर के पास से पैदल ट्रेकिंग मार्ग भी है। तारा देवी मंदिर से सामने अलग अलग दिशाओं में कसौली, चैयल तथा शिमला की पहाडियों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। हर रविवार को यहाँ वृहद भण्डारा लगता है, जिसमें स्वादिष्ट भोजन-प्रसाद का आनन्द लिया जा सकता है। प्रायः लोग तारा देवी से बापसी में नीचे उतर कर प्राचीन शिव मंदिर आते हैं, जो तारा देवी से महज 1-2 किमी नीचे बाँज के घने जंगल में एकाँत-शांत जगह पर स्थित है। यहाँशीतल जल का चश्मा इसके परिसर में है तथा साथ ही पास अखण्ड धुनी जलती रहती है, जहाँ कुछ पल गहन चिंतन-मनन एवं आंतरिक शांति-सुकून के बिताए जा सकते हैं। यहां से सीधे जंगल से होकर 4-5 किमी लम्बा ट्रेकिंग मार्ग सीधा संकट मोचन के पास मुख्य मार्ग तक आता है। रास्ता घने बांज, देवदार, चीड़ के वनों से होकर गुजरता है। बीहड़ रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है, अतः ग्रुप में ही इस मार्ग की ट्रेकिंग उचित रहती है।

शिमला विश्वविद्यालय का परिसर भी एक पहाड़ी के ऊपर बसा है, जहाँ बस अड्डे से बसें चलती रहती हैं। एडवांस्ड स्टडी से होकर भी यहाँ तक पैदल आया जा सकता है। इसका पक्का रास्ता देवदार, बाँज और बुराँश के घने जंगल से होकर गुजरता है, जिसमें पैदल या वाहन में सफर काफी रोमाँचक रहता है। सड़क के नीचे समानान्तर रेल्वे ट्रैक है, जिसमें छुकछुक करपहाड़ी की ओट में लुकाछिपी करती रेल का नजारा दर्शनीय रहता है, जो कभी जंगल के बीच सुरंग में गायब हो जाती है, तो कभी अगली सुरंग में प्रकट हो जाती है। विश्वविद्याल के आगे एक छोर पर पीटर हिल्ज पड़ती है। इस एकांत स्थल पर एक रेस्टोरेंट भी है, यहाँ ट्रेकिंग व नाइट हाल्ट आदि की व्यवस्था है। इस छोर से नीचे घाटी के दर्शन भी अवलोकनीय रहते हैं।

यूनिवर्सिटी के नीचे सम्मर हिल रेल्वे स्टेशन है। जहाँ से पैदल ट्रेकिंग करते हुए बालुगंज पहुँचा जा सकता है। देवदार की छाया में बने पैदल रास्तों में शीतल जल की बाबडियाँ पड़ती हैं, जिनके साथ एक दो जगह शिव व शक्ति के मंदिर भी हैं। गर्मियों के जल संकट में शिमला के वन्यप्रदेश में फैली ऐसी बाबड़ियाँ निवासियों के लिए पर्याप्त राहत देती हैं। मुख्य मार्ग पर बालुगंज में जलेबी व पकौड़े का लुत्फ उठाया जा सकता है। यहीं से सीधे ऊपर कामना देवी मंदिर का रास्ता जाता है। लगभग 2 किमी पैदल ट्रेकिंग करते हुए यहाँ पहुंचा जा सकता है। रास्ते में कुछ सरकारी मकान हैं, तो कुछएडवांस्ड स्टडी के क्वार्टर भी। लेकिन पहाड़ी के ऊपर सिर्फ मंदिर पड़ता है, जहाँ से एक ओर शिमला का नजारा तो दूसरी ओर सोलन साइड की घाटियाँ व पहाड़ियों का अवलोकन किया जा सकता है।

बालुगंज से पुराना बस अड्डा होते हुए शिमला के दूसरे छोर पर पडती है पंथा घाटी, जो शिमला का ही विस्तार है। यहाँ से नीचे 4-5 किमी की दूरी पर एपीजी शिमला युनिवर्सिटी का कैंप्स है, जिसके बारे में यहाँ से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। यहीं से सड़क तारा देवी हिल की परिक्रमा करते हुए शोघी पहुँचती है, जिसे वाइपास रोड के रुप  में विकसित किया गया है। फलों के सीजन में अप्पर शिमला के फलों से लदे ट्रक प्रायः इसी रुट से चण्डीगढ़ व दिल्ली की सब्जी मंडियों तक जाते हैं।

पंथा घाटी से ही पहाड़ी के दक्षिण ओर साइँ मंदिर (पुजारली) का रास्ता जाता है, जिसे शिमला का छिपा हुआ नगीना कहा जा सकता है। एकाँत स्थल पर बसे इस पाँच मंजिले मंदिर के सामने बहुत बड़ा मैदान है, जहाँ से उस पार कुफरी, जुन्गा व चैयल की पहाडियों के दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ पर भी सनसेट का नजारा अलौकिक सौंदर्य़ लिए रहता है, जिसके प्रकाश में तारा देवी की पहाड़ियां विशेष रुप से आलोकित दिखती हैं।

फिर शिमला में खरीददारी के शौकीनों के लिए मालरोड़ और लक्कड़ बाजार में बेहतरीन व्यवस्था है। यहाँ हर तरह के सामान, पहाड़ी गिफ्ट मिलते हैं। साथ ही शिमला के आसपास उगने वाले मौसमी फल भी एक छोर पर सजे मिलेंगे। यहाँ का कॉफी हाउस मशहूर है। रिज पर आशियाना रेस्टोरेंट कैंडल लाइट डिन्नर के लिए सर्वथा उपयुक्त रहता है। बाकि रिज व लक्कड़ बाजार के आसपास स्ट्रीट फुड़ का स्वाद भी लिया जा सकता है। ड्राई फ्रूट्स व स्थानीय हैंडिक्राफ्ट की बेहतरीन दुकानें यहाँ मिल जाएंगी, जहाँ से कुछ यादगार गिफ्ट खरीदे जा सकते हैं। भुट्टिको बुनकरों के केंद्र सेअपने मनमाफिक पहाड़ी शाल, टोपी, मफ्फलर आदि उत्पाद देखे जा सकते हैं। लक्कड़ बाजार के नीचे देश का एकमात्र ऑपन-एअरस्केटिंग रिंक स्थित है, जहाँ सर्दियों में जमीं बर्फ पर कुछ शुल्क के साथआइस-स्केटिंग का आनन्द लिया जा सकता है।


रिज के मैदान को शिमला में शाम की चहल-पहल का केंद्र माना जा सकता है, जो पर्यटकों के बीच भी खासा लोकप्रिय रहता है। यहाँ बच्चों-बुढ़ों की घुड़सवारी, ऐतिहासिक समारकों की पृष्ठभूमि में यादगार फोटोग्राफी के नजारे सर्वसुलभ रहते हैं। रिज के पूर्व में ऊँचाई पर स्टेज है, जो ऐतिहासिक संबोधनों का साक्षी रहा है और प्राँत के बड़े आयोजन इसी रिज पर होते हैं। रिज के एक और इंदिरा गाँधी की प्रतिमा है तो दूसरी ओर डॉ. यशवन्त सिंह परमार की। मालूम हो कि डॉ. यशवन्त परमार हिंप्र के पहले मुख्यमंत्री रहे, जिनके कुशल एवं दूरदर्शी नेतृत्व के कारण उन्हें हिमाचल का निर्माता माना जाता है। हिमाचल को एक विकसित पहाड़ी राज्य के रुप में खड़ा करने में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

रिज के नीचे ही पानी के वृहद टैंक मौजूद हैं, जिनसे शिमला शहर के लिए पानी सप्लाई होता है। रिज के नीचे गेयटी थिएटर के सामने ही यहाँ का लेटेस्ट  पुस्तकों से समृद्ध मिनेरवा बुक हाऊस है, जहाँ पर पुस्तक प्रेमी अपने पसंद की पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं। इसी तरह लोअर बाजार में बंसल बुक डिपो, ज्ञान भण्डार तथा लक्कड़ बाजार में स्टुडेंट स्टोर आदि पुस्तक केंद्र हैं। पुस्तक प्रेमियों के लिए रिज पर चर्च के सामने स्टेट लाइब्रेरी की भी व्यवस्था है।

माल रोड़ से नीचे लोअर बाजार से होते हुए एक दम नीचे पुराना बस अड्डा पड़ता है, जहाँ से नए बस अड्डा आईएसबीटी टुटी कण्डी लिए कुछ मिनट परबसें चलती रहती हैं।


यहाँ से अपने गन्तव्य के लिए ऑर्डिनरी से लेकर डिलक्स, ऐसी, एवं वोल्बो बसें ली जा सकती हैं। हिमाचल परिवहन की ऑनलाइन बुकिंग  की सुबिधा का भी घर बैठे लाभ लिया जा सकता है। रेल्वे सफर के लिए सम्मर हिल या पुराने बस अड्डे के पास के मुख्य रेल्वे स्टेशन से चढ़कर काल्का तक रेल यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा जुब्बड़हट्टी में है, जो शिमला से 22 किमी की दूरी पर है।

इस तरह दो-तीन दिनों में शिमला के मुख्य स्थलों की सैर की जा सकती है। सामान्य यात्रियों के लिए मार्च से जून तथा सितम्बर से नवम्बर माह उपयुक्त माने जाते हैं। गर्मियों में हालाँकि भीड़ अधिक रहती है, लेकिन शिमला का असली आनन्द तो बरसात में रहता है। अगस्त के माह में जब आसमान बादलों से घिरे रहते हैं, तो एक पहाड़ी से दूसरी पहाडी की ओर इसके फाहों के बीच सफर मनमोहक रहता है। कभी ये बादल पूरी तरह से यात्रियों को अपने आगोश में ले लेते हैं तो कभी पूरी घाटी इनसे पट जाती है। पहाडों की चोटी से इनका नजारा पैसा बसूल ट्रिप साबित होता है। हालाँकि बर्फ के शौकीनों के लिए सर्दी भी कम रोमाँचक नहीं रहती।लेखकों, विचारकों एवं कवियों के लिए शिमला सृजन की ऊर्बर भूमि साबित होती है और कई लेखक तो यहाँ इसी उद्देश्य से डेरा जमाए रहते हैं।

यदि समय हो तो शिमला के आसपास घूमने के कई दर्शनीय स्थल हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश के साथ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक विशेषताओं से भी रुबरु हुआ जा सकता है। इसके लिए आप पढ़ सकते हैं, शिमला के आस-पास के दर्शनीय स्थल।

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

शिमला के आसपास के दर्शनीय स्थल

                                 शिमला से कुफरी, चैयल, नारकण्डा, मशोवरा और सराहन

शिमला के बाहर आस-पास घूमने के कुछ बेहतरीन स्थल हैं, जहाँ हिमालय की वादियों में भ्रमण का आनन्द लिया जा सकता है। एडवांस्ड स्टडी में रहते हुए प्रायः एक माह का स्पैल पूरा होने पर हम अपने साथियों के साथ एक टैक्सी हायर कर इनका अवलोकन करते रहे। इसमें कुफरी, चैयल, मशोबरा, नारकण्डा, हाटू पीक, सराहन भीमाकाली मंदिर आदि उल्लेखनीय हैं, जो एक-दो दिन में आसानी से कवर हो जाते हैं। यहाँ शिमला के ग्रामीण आँचल में हो रहे खेती एवं बागवानी के प्रयोगों की एक झलक उठा सकते हैं। प्रकृति के वैभव को समेटे यहाँ की हिमालयन वादियों के बीच यात्रा सदैव रोमाँचक अनुभव रहता है और ज्ञानबर्धक भी।

ग्रामीण शिमला की ओर शिमला शहर से बाहर निकलने के दो रास्ते हैं। एक लक्कड़ बाजार से होकर। विक्टरी टन्नल को पार करते ही थोड़ी देर में लक्कड़ बाजार बस स्टैंड आता है, इसके आगे कुछ ही समय में सफर एक पुल के नीचे से होकर गुजरता है। आगे आता है शिमला का इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल। यहाँ तक व इसके थोड़ा आगे संजोली तक राजधानी की बढ़ती आबादी के दबाब को अनुभव किया जा सकता है। बेतरतीव भवन निर्माण, ढलान में भी बिल्डिंग के ऊपर बिल्डिंग खड़ी करने का चलन, सबकुछ शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य पर तुषारापात करता प्रतीत होता है। भवन निर्माण और शहर की प्लानिंग के संदर्भ में सरकार एवं जनता के बीच किसी मानक रोड़मैप का न होना कचोटता है।

दूसरा मार्ग पुराने बस स्टैंड से होकर आगे सचिवालय भवन से होकर शिमला के सघन बनप्रदेश से गुजरता है। बन विभाग द्वारा संरक्षित इस क्षेत्र से सफर में शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य की झलक मिलती है, कुछ पल शांति-सुकून के गुजरते हैं। इस दूरदर्शिता के लिए बन विभाग एवं सरकार के प्रति आभार के भाव फूटते हैं। इसी राह पर प्रतिष्ठित लेडीज सेंट बीड कालेज पड़ता है और इसके वायीं ओर से मोटर मार्ग जाखू मंदिर के लिए जाता है।

इसको पार करते ही संजोली क्षेत्र में प्रवेश होता है और फिर होते हैं ढलान के ऊपर कंक्रीट के जंगल के दर्शन, जो प्रकृति प्रेमी को व्यथित करते हैं। कई संजौली को शिमला का दिल कहते हैं, लेकिन बिना हरियाली, स्वस्थ आवोहवा के यह दिल कितने दिन धड़केगा और शिमला को स्वस्थ रखेगा, विचारणीय है। विषय गंभीर है, इस पर अधिक चर्चा न करते हुए आगे बढ़ते हैं। संजोली को पार करते ही आगे मानवीय हस्तक्षेप कम हो जाता है। दायीं ओर ग्रीन वैली के दर्शन होते हैं, जिसे एशिया का सबसे घना देवदार का जंगल माना जाता है। निश्चित ही इसमें जंगली जानवर बहुतायत में विचरण करते होंगे। सड़क पर भी हम कई बार बाघ के दर्शन कर चुके हैं। यहाँ हिरण, चकोर, जंगली मुर्गा, मोनाल आदि के दर्शन तो सामान्य घटना है। यहाँ कुछ पल रुककर कुछ यादगार फोटो के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। 

इसके बाद आता है कुफरी, जो शिमला के समीपस्थ एक लोकप्रिय स्थल है, क्योंकि अधिक ऊँचाई (8924 फीट) पर होने के कारण यहाँ शिमला से अधिक बर्फ गिरती है तथा ठण्ड भी अधिक रहती है। यहाँ पर सीढ़ीदार खेतों में घूमना, स्लोप में फिसलना पर्यटकों को प्रकृति की गोद में कुछ पल खोने का मौका देता है।


इसके साथ यहाँ घोडे या खच्चर पर बैठकर यहाँ की यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। ऊपर पहाड़ी पर एक चिडियाघर भी है, जिसमें बाघ, तेंदुआ, काला भालू, ब्राउन बीयर, जंगली बकरी तथा अन्य पक्षी पर्याप्त प्राकृतिक परिवेश में रखे गए हैं। यहाँ पर ऊँचाई के बाँज बृक्षों के दर्शन किए जा सकते हैं, जिनके पत्ते मोटे, चमकीले, डार्क ग्रीन तथा कंटीले होते हैं। ऊँचाई के साथ बाँज के वृक्षों में कैसे परिवर्तन होता है, यहाँ देखा जा सकता है। अंदर चाय-नाश्ता के भी ठिकाने हैं। कुल मिलाकर कुफरी का टूर परिवार के साथ पैसा बसूल टूर साबित होता है। यदा-कदा यहाँ फिल्म शूटिंग के सीन भी देखे जा सकते हैं। बाहर गिफ्ट शॉप्स से कुछ यादगार चीजें खरीदीं जा सकती हैं।

कुफरी से नीचे उतरकर दायीं ओर शिमला के समानान्तर रास्ता चैयल की ओऱ जाता है। जहाँ कई दर्शनीय स्थल हैं। रास्ता देवदार के घने जंगलों से होकर गुजरता है। बीच-बीच में रास्ता धार (रिज) से होकर गुजरता है, ऐसे में दायीं ओर शिमला के दर्शन होते हैं और वायीं ओर जंगल विरल होने पर नीचे गाँव और दूर की घाटियोँ के दर्शन होते हैं। इस राह में चाय-नाश्ते के भी कुछ बेहतरीन ठिकाने मिलते हैं, जहाँ पर आवश्यकता पड़ने पर तरोजाजा हुआ जा सकता है।

बीच में चैयल की पहाड़ियाँ दिखना शुरु हो जाती हैं। नीचे ढलान में सेब के बाग मिलते हैं। कुछ ही देर में घने बुराँश-देवदार के जंगल के बीच मुख्यमार्ग से रास्ता वाएं मुड़कर चैयल पैलेस की ओर बढ़ता है। थोड़ी ही देर में चैयल पैलेस आता है, जो अंग्रेजों के समय पटियाला के राजघराने का गर्मी का विश्रामगृह हुआ करता था। आज इसे एक हेरिटेज होटल में कन्वर्ट किया गया है। इसके अंदर सुंदर म्यूजियम है तो बाहर मैदान में चहलकदमी के लिए बेहतरीन लॉन और रुकने के ठिकाने। निसंदेह रुप में यहाँ परिवार के साथ कुछ समय अन्दर-बाहर शाही शानो-शौकत का अवलोकन व बजट के हिसाब से खर्च करते हुए विताए जा सकते हैं।

इसके आगे सिद्ध बाबा का मंदिर पड़ता है। माना जाता है कि बाबा महाराजा भूपिन्द्र सिंह के सपने में आते हैं और निर्देश देते हैं कि इस स्थान पर मैंने ध्यान किया था। महाराजा यहाँ पर मंदिर बनाते हैं। हमें इस मंदिर में एक औघड़ बाबाजी मिले थे। काफी पहुँचे हुए लग रहे थे। धुनी रमा कर बैठे थे। हमें चाय पिलाते हैं, कुशल-क्षेम पूछते हैं और कुछ व्यवहारिक ज्ञान की बातें बताकर विदा करते हैं। यहाँ से थोड़ा आगे क्रिकेट स्टेडियम पड़ता है, जिसे विश्व का सबसे अधिक ऊँचाई (7380 फीट) पर बना स्टेडियम माना जाता है। इसे पटियाला के महाराजा ने 1893 में बनाया था। आज इस मैदान का उपयोग चैयल मिलिट्री स्कूल के बच्चों के खेल के मैदान के रुप में होता है तथा सेना द्वारा इसका रख रखाब किया जाता है।

इसके थोड़ी दूरी पर काली का टिबा या काली मंदिर आता है, जो पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक शांत-एकाँत स्थल है। चीड़, देवदार और बाँज के घने जंगल से होकर यहाँ का रास्ता जाता है, पहाड़ी के कौने पर सबसे ऊँचे स्थान पर बने इस मंदिर से चारों ओऱ का विहंगम नजारा देखते ही बनता है। साफ मौसम में यहाँ से चूड़ चांदनी और शिवालिक श्रृंखलाओं का नजारा दर्शनीय रहता है। यहाँ से हम बापस शाम तक 44 किमी दूरी तय करते हुए शिमला आते हैं। चैयल से दूसरा रास्ता सोलन की ओऱ जाता है, जो यहाँ से 45 किमी पड़ता है। यदि घूम कर आना हो तो इस रास्ते से भी शिमला आया जा सकता है।

कुफरी के पहले ही नीचे से एक रास्ता मशोबरा के लिए जाता है, जो आगे नालदेरा से होते हुए तता पानी तक पहुँचता है। इस रूट पर एक दिन का टूर प्लान हो सकता है। ततापानी में सतलुज नदी के बर्फिले जल के किनारे गर्म पानी के स्रोत थे, जो अब सतलुज नदी पर डैम बनने के कारण जल मग्न हो गए हैं, लेकिन इसके रुके पानी में बोटिंग से लेकर वार्टर स्पोर्टस का आनन्द लिया जा सकता है। साथ ही नदी के उपर रास्ते में बने तप्त जलकुण्डों में स्नान का लुत्फ उठाया जा सकता है। नालदेरा में पहाड़ों का सबसे पुराना और बेहतरीन गोल्फ कोर्स है। इसके अतिरिक्त यहाँ देवदार के घने वृक्षों के बीच पार्क बना हुआ है, जहाँ परिवार के साथ कुछ पल मौज-मस्ती के बिताए जा सकते हैं। राह में पड़ते स्थल मशोवरा में बागवानी से सम्बन्धित शोध संस्थान हैं। शिमला शहर के लिए फल एवं सब्जी का यह मुख्य आपूर्तिकर्ता है। इसके आसपास वाइल्ड़ फलावर हाउस, महासू देवता मंदिर तथा रिजर्व वन अभ्यारण्य पधार सकते हैं और समय हो तो यहाँ एडवेंचर एक्टिविटीज में भाग लिया जा सकता है। ततापानी जहाँ शिमला से लगभग 50 किमी की दूरी पर है, नालदेरा 23 किमी तथा मशोवरा 10 किमी की दूरी पर स्थित है।

कुफरी से आगे नारकण्डा की ओर रास्ता जाता है, जो मार्ग में ठियोग, मतियाना आदि कस्बों से होकर गुजरता है। यह रास्ता भी देवदार के घने जंगलों के बीच लुकाछिपी करते हुए पार होता है। एक मोड़ के बाद जंगल कम हो जाते हैं और सामने दिखती हैं कई घाटियाँ, जिनमें सेब के बगानों को बहुतायत में देखा जा सकता है। इन पर लगे सफेद और हरे रंग के नेट नए पर्यटकों में कौतुक जगाते हैं। वास्तव में ये सेब के फल को औलों से बचाने के लिए बगीचों के ऊपर ओढ़ा गया आच्छादन है। जिस इलाके में औलावृष्टि अधिक होती है, वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। अन्यथा बागवानों की साल भर की मेहनत पर कुछ ही मिनटों में पानी फिर सकता है।

इस राह पर मतियाना में प्रायः हम भोजन के लिए रुकते रहे हैं। यह इलाका फल व सब्जि उत्पादन का एक मुख्य केंद्र है। इनके साथ इलाके की आर्थिकी में सुधार हुआ है, लेकिन साथ ही रसायनिक खाद एवं विषैले कीटनाशकों के बहुतायत में प्रयोग के साथ फल एवं सब्जियों के साथ जमीं पर भी इसके दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। इसमें मेहनत करते किसानों पर भी इसकी घातक मार के समाचार आ चुके हैं। यह सब देखते हुए निसंदेह रुप में ऑर्गेनिक खेती औऱ बागवानी की ओर गंभीरता से बिचार करने का समय आ गया है। यह एक इलाके का नहीं पूरे प्रदेश एवं देश यहाँ तक कि पूरे विश्व पर लागू होता है, जहाँ जाने अनजाने ऐसे प्रयोग धड्ड़ले से चल रहे हैं।

यहाँ से आगे नारकण्डा का रास्ता एक और पहाड़ों की गोद तो दूसरी ओर सेब, चैरी के बगीचों के बीच आगे बढ़ता है। मई माह में हम यहाँ पर पेड़ों में पीली और सुर्ख लाल चैरी के फलों का अवलोकन कर चुके हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं हालाँकि सेब तब कच्चे ही थे। सड़कों पर छोटे बक्सों में सजाकर किसानों को इनका विक्रय करते देखा। ऐसे दृश्यों के बीच हम नारकण्डा पहुँचते हैं। बीच में पानी की किल्लत की मार इस इलाके में दिखी। इसके लिए दूर-दूर से पाईपों से अपने खेत तथा बगीचों तक जल की व्यवस्था करते तथा बूंद-बूंद पानी का नियोजन करते किसानों को देखा। कितने पाईपों के जाल इस रास्ते में बिछे मिले।

नारकण्डा में फिर देवदार के सघन बन शुरु हो जाते हैं। यहाँ पर दायीं ओऱ से रास्ता हाटू पीक की ओर जाता है, जो स्वयं में एक बहुत ही रोमाँचक तथा नयनाभिराम यात्रा का अहसास देता है। रास्ते भर देवदार बुराँश के घने जंगल मिलते हैं और ऊपर हाईट के समीप ऊँचाई के बाँज वन। एक दम शिखर पर पेड़ कम हो जाते हैं, तथा बुग्याल अधिक। इन्हीं के बीच नवनिर्मित हाटू मंदिर के दर्शन किए, जो काली माता को समर्पित है। यहाँ पहाड़ी शैली में बना यह सुंदर मंदिर बहुत बारीक लकड़ी की नक्काशी लिए है, रामायण-महाभारत कालीन दृश्यों के साथ विविध देवी देवताओं के चित्र उत्कीर्ण हैं।

मालूम हो कि हाटू पीक शिमला के आसपास 11,152 फीट की ऊँचाई पर सबसे ऊँचा बिंदु है। यहाँ पास के टीले पर चढ़कर चारों और घाटियों, दूर गाँव, खेत बगानों और बर्फ की चोटियों के नयनाभिराम दर्शन किए जा सकते हैं। नारकण्डा से ही एक रास्ता वायीं ओर नीचे उतरता है, जो आगे किन्नौर की ओर बढ़ता है। इसकी राह में चार-पाँच घण्टे बाद रामपुर शहर पड़ता है, जिसके थोड़ा आगे रास्ता जेओरी से सराहन गाँव की ओर मुड़ता है, जिसके एक छोर पर पड़ता है भीमाकाली मंदिर का भव्य परिसर।

नारकण्डा से रास्ता घने देवदार के जंगल के बीच ऩीचे उतरता है, रास्ते में फलों के बगीचे शुरु हो जाते हैं। इनके आगे दायीं ओर नीले रंग के फूलों से आच्छादित कई पेड़ कतारबद्ध मिले। काफी देर तक इनका सान्निध्य सफर में एक शीतल अहसास घोलता रहा। संभवतः ये मिल्ट्री के जवानों द्वारा रोपे गए लगे, जिनका कैंप आगे रास्ते में मिला। इसके बाद फिर इनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। इसी रास्ते में नीचे सतलुज नदी की घुमावदार रेखा के दर्शन होते हैं, जो कुछ ही देर में नीचे पास हो जाती हैं। रास्ता इसके किनारे आगे बढता है। इसका मटमेला रंग और इसका तेज बहाव पीछे ग्लेशियरों से इसके पिघल कर तैयार होते रुप को दर्शाता है। निसंदेह रुप में यह बहुत ठण्डा होगा, ऐसा हम अनुमान लगाते रहे, जैसा कि हमारे इलाके में ब्यास नदी के साथ होता है।

इसी तरह हम रामपुर शहर पहुँचते हैं। यहाँ रात को सतलुज नदी के किनारे एक धर्मशाला में रुकते हैं। सुबह सतलुज के गर्जन तर्जन करते तेज बहाव को देखते रहे, उस पार चट्टानीं टीले पर लोगों के घर को देखकर आश्चर्य करते रहे कि लोग कहाँ-कहाँ बस सकते हैं। यहाँ से चाय नाश्ता कर सराहन की ओर चल पड़े। बस रामपुर-सराहन वाया ज्यूरी थी। आगे का रास्ता चट्टानों को काटकर बनाया गया था, जो पहाड़ों के खालिस चट्टानी सत्य से हमें रुबरु करा रहा था। ज्यूरी से बस दायं मुड़ जाती है। आगे का रास्ता हरा भरा और पर्याप्त उर्बर लगा। रास्ते में ही आर्मी का कैंप मिला, इसकी व्यवस्थित संरचना, अनुशासन सदैव से ही मन में श्रद्धा का भाव जगाता है। कुछ ही देर में हम सराहन बस स्टैंड पहुँच चुके थे।

यहाँ सामने बर्फ से ढके किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शन होते हैं। थोड़ा पैदल चलने के बाद हम भीमाकाली मंदिर के परिसर में थे। अंदर के प्रवेश द्वार पर हाथ पैर धोकर प्रसाद भेंट लेकर माता के द्वार में प्रवेश करते हैं। तीन-चार मंजिला यह मंदिर अद्भुत नक्काशी और बास्तुशिल्प का नमूना है, जो स्वयं में अद्वितीय प्रतीत होता है। भीमाकाली राजपरिवार की कुलदेवी भी हैं। इस क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे हिमाचल में शक्ति उपासकों के बीच इनकी विशिष्ट मान्यता है। असुरों के संहार के लिए इनका अवतरण काली रुप में हुआ था। दुर्गासप्तशती में भगवती का आश्वासन है कि हर युग में देवताओं अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा असुरों अर्थात दुष्टों के संहार के लिए मैं देवताओं की सम्वेत पुकार पर अवतरित होउँगी।

मंदिर के बहुमंजिले भवन में तीसरी मंजिल से अंदर प्रवेश हुआ, भीमाकाली के दर्शन होते हैं, अपना भाव निवेदन के साथ यहाँ बाहर परिसर में आते हैं। यहाँ गुलाब के सुंदर फूलों के दर्शन होते हैं, साफ सुथरे परिसर में भवनों का अवलोकन करते हैं। यहाँ की कैंटीन में पेट पूजा करते हैं बाहर निकल कर परिक्रमा पथ पर सराहन गाँव के दर्शन करते हैं। रास्ते में सेब के नए बगान दिखे, कुछ घरों के बाहर जापानी फल के पेड़ लगे मिले। यहाँ से पीछे हरे-भरे देवदार-बाँज के जंगल शीतल अनुभव दे रहे थे। परिक्रमा पूरा कर हम बापिसी में मंदिर परिसर के बाहर मैदान में चल रहे भण्डारे में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं और बापिसी की बस में बैठकर अपने गन्तव्य शिमला की ओर उसी रास्ते से घर आते हैं।

इस तरह शिमला में रहते हुए 1-2 दिन में आसपास के इन स्थलों का भ्रमण और अवलोकन किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त और भी कई स्थल हैं, जिनको इस सूचि में जोड़ा जा सकता है।

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

यात्रा वृतांत – हमारी पहली त्रिलोकनाथ यात्रा, भाग-2

 लाहौल घाटी के विहंगम दर्शन

लाहौल घाटी, अक्टूवर 2020 का नजारा

अगले दिन केलाँग से लोकल बस में त्रिलोकनाथ धाम की यात्रा करते हैं, जो यहाँ से 45 किमी की दूरी पर दक्षिण की ओर स्थित है। रास्ते में तांदी के संगम को दायीं ओर से पार करते हैं, जहाँ चंद्रा और भागा नदियाँ मिलकर चंद्रभागा नदी के रुप में आगे बढ़ती हैं, जो आगे चलकर चनाव नदी कहलाती है। यहाँ  रास्ते में ठोलंग, शांशां आदि स्टेशन पड़ते हैं। मालूम हो कि ठोलंग ऐसा गाँव है जहाँ हर घर से अफसर, डॉक्टर और आईएएस अधिकारी मिलेंगे और यहाँ पर सबसे अधिक आईएएस अफसर होने का रिकॉर्ड है। 

लाहौल घाटी का एक गाँव

इनके आगे एक स्थान पर बस से उतर कर पुल से चंद्रभागा नदी (चनाव) को पार करते हैं। साथ में उस पार गाँव के लोकल लोग भी हमारे साथ थे। चंद्रभागा का पुल पार कर गाँव से होकर गुजरते हैं, इनके खेतों में एक विशेष प्रकार की फूल वाली लताओं से खेतों को भरा पाते हैं। पता करने पर इनका नाम हॉफ्स निकला, जो खेतों व गाँव के सौंदर्य़ में चार चाँद लगा रही थी। इनसे बेहतरीन किस्म की वीयर तैयार की जाती है और किसानों को इस फसल के अच्छे दाम भी मिलते हैं।

लगभग आधा घण्टा बाद हम त्रिलोकीनाथ मंदिर पहुँचते हैं। अपना बाहन होता तो सीधा मंदिर परिसर तक आ सकते थे, लेकिन रास्ते के खेत-खलिहान व गाँव के नजारों से वंचित रह जाते। मंदिर बौद्ध-हिंदु परम्परा का मिश्रण लगा, जो है तो शिव को समर्पित लेकिन इसके बाहर कालचक्र लगे हैं, जिनकी ओम मणि पद्मेहुम का मंत्र बोलते हुए और कालचक्र को हाथ से घुमाते हुए परिक्रमा लगाई जाती है। 

त्रिलोकनाथ परिसर में दर्शनार्थियों की कतार

संभवतः यह विश्व का एकमात्र मंदिर है, जहाँ दो धर्मों के लोग एक ही ईष्ट की पूजा अपनी श्रद्धानुसार करते हैं। हिंदु धर्म वाले यहाँ शिव की उपासना करते हैं, तो बौद्ध आर्य अवलोकितेश्वर के रुप में पूजा करते हैं। लोकमान्यता में इस मंदिर को कैलास और मानसरोवर के बाद सबसे पवित्र तीर्थ माना जाता है। हिंदु धर्म के लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने किया था, वहीं बौद्ध धर्माबलम्बियों का मानना है कि पद्मसम्भव यहाँ 8वीं शताब्दी में आए थे और यहाँ पूजा किए थे।

यहाँ से हम आगे बढ़ते हुए दूसरी ओर से नीचे उतरते हैं, और उस पार उदयपुर शहर की ओर बढ़ते हैं, जो त्रिलोकनाथ से 9 किमी की दूरी पर स्थित है। 

लाहौल घाटी का विहंगम दृश्य

ढलानदार खेतों से होकर हम ऩीचे उतर रहे थे। हॉप्स की लताओं से भरे खेत बहुत सुंदर लग रहे थे। खेतों के बीच मेंढ़ से बनी राह से पानी की धाराएं मधुर स्वर में कलकल निनाद करते हुए बह रही थी। इसकी मेढ़ पर खड़े विलो के हरे-भरे पेड़ दिन की गर्मीं के बीच शीतल अहसास दिला रहे थे। इनको पार करते हुए हम नीचे भागा नदी तक पहुँचते हैं और पुल को पार कर मुख्य मार्ग से उदयपुर की ओर बढ़ते हैं। रास्तेभर हमें कोई बस नहीं मिल पायी और हम लगभग 4-5 किमी उदयपुर तक नदी के किनारे पैदल ही चलते रहे। रास्ते भर देवदार के पेड़ और चारों ओर की हरियाली कुछ राहत देती रही।

उदयपुर पहुँचकर भगवती मृकुला देवी के दर्शन करते हैं, जिसके मंदिर का अपना इतिहास है। इन्हें दुर्गा माता का अवतार माना जाता है और इसे चम्बा के राजा उदयसिंह द्वारा निर्मित किया गया था। मान्यता है कि मंदिर 6000 साल पुराना है, जिसे स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था, लेकिन बाद में समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा। 

मृकुला माता, उदयपुर

इसके अंदर लकड़ी की सुन्दर नक्काशी की गई है, जिसमें महाभारत, रामायण और सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं को उकेरा गया है। मान्यता है कि दुर्गा माता ने यहीं पर महिषासुर का बध किया था।

उदयपुर कैंपिंग साईट के रुप में भी लोकप्रिय है। लाहौल के रेगिस्तानी पहाड़ों के उल्ट इस ओर की हरियाली व प्राकृतिक सौंदर्य यात्रियों को इसके लिए प्रेरित करता है। उदयपुर से हम बस में चढ़कर केलाँग तक आते हैं, जो यहाँ से 53 किमी की दूरी पर स्थित है। रास्ते में कई गाँव पार किए और कुछ नदी के उस पार दिखे। सेब की खेती का चलन भी इस क्षेत्र में दिखा। मालूम हो कि पहले जहाँ लाहौल में मात्र आलू उगाया जाता था, जो अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के कारण निर्यात होता रहा है। 

कैलांग-उदयपुर के बीच राह में

फिर यहाँ आलू के साथ मटर व अन्य इग्जोटिक सब्जियाँ उगाई जाती हैं। इसके बाद हॉफ्स की बेलों का चलन शुरु होता है। अब यहाँ सेब की उमदा फसल भी तैयार हो रही है, जो देर अक्टूबर या नवम्बर के शुरुआत में तैयार होती है और जब शिमला-कुल्लू का सेब मार्केट में खत्म हो जाता है, तब यह तैयार होता है। साइज छोटा किंतु स्वाद में मीठा और रसीला होता है। इसकी सेल्फ लाइफ भी अच्छी होती है, जिस कारण यह देर तक टिकता है।

कैलाँग में घर आकर हम भोजन ग्रहण करते हैं और पिताजी से लाहौल घाटी की कुछ विशेषताओं से परिचित होते हैं। यहाँ के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में लामा का उँचा स्थान रहता है और हर घर से एक संतान का लामा बनना अच्छा माना जाता है। सर्दियों में यहाँ जनजीवन घरों की चार दिवारी में सिमट जाता है, खाने पीने की व्यवस्था पहले से की जाती है। आलू से लेकर अनाज सब्जी व सुखा माँस सुरक्षित और संरक्षित रखे जाते हैं। यहाँ पर दोंग्मों में दूध, घी और नमक को मंथकर विशिष्ट नमकीन चाय तैयार की जाती है। इसके साथ सत्तु को खाने का चलन है, जो एक पौष्टिक एवं स्वादिष्ट स्वल्पाहार रहता है।

विलो के पतझड़ी वृक्षों के संग

अब यहाँ के अधिकाँश लोग कुल्लू मानाली के इलाकों में बस चुके हैं। यहाँ के लोगों को बहुत मेहनती माना जाता है। इनके श्रम के साथ ट्राइबल एरिया का दर्जा मिला होने के कारण यहाँ के लोग सामाजिक-आर्थिक रुप से विकास की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं तथा सुदृढ़ स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।

हमारा कैलांग प्रवास का समय पूरा हो रहा था, अंतिम दिन हमारा सफर कैलाँग से जिस्पा, दारचा व इसके आगे के एक गाँव तक का रहा, जिस मार्ग का वर्णन पर्वतारोहण के लिए यहाँ से गुजरे लेख (मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर) में कर चुके हैं। मालूम हो कि दारचा (11020 फीट) लाहौल घाटी में मानाली-लेह सड़क पर अंतिम मानवीय बस्ती है। इस यात्रा का उद्देश्य पर्वतारोहण के दिनों की यादों को ताजा करना था। अपनी सहधर्मिणी को हम अपनी रोमाँचक यात्रा के रुट को बताते रहे और पुरानी यादों को ताजा कर बापसी की बस से केलाँग आए। और अगले दिन यहाँ की रोमाँचक यादों को समेटते हुए कैलाँग बस से 116 किमी का सफर तय करते हुए बापिस मानाली पहुँचे। फ्लाईट से यह दूरी महज 40 किमी पड़ती है, क्योंकि इसमें सीधे पहाड़ को पार कर रास्ता आता है। बस से लगभग 6-7 घण्टे लगते हैं। 

चंद्रभागा नदी (चनाव) केसंग

अटल टनल बनने से अब यह यात्रा महज 4 घण्टे में पूरा हो रही है, साथ ही अब सालभर इस घाटी का सम्पर्क बाहर की दुनियाँ के साथ संभव हो चुका है, जो पहले साल के छः माह बाहरी दुनियाँ से कटी रहती थी। इसके साथ बर्फ के बीच यहाँ पर्यटन एवं रोमाँच की असीम संभावनाएं इंतजार कर रही हैं, वहीं घाटी की आर्थिक स्थिति एवं विकास में भी नए अध्याय जुड़ने तय है। पर्य़टकों की भीड़ के बीच यहाँ के नाजुक परिस्थितिकी तंत्र एवं प्रकृति-पर्यावरण तथा लोकजीवन पर क्या प्रभाव पडेंगे, यह विचारणीय है, साथ ही कुछ चिंता का भी विषय है।

लाहौल का एक गाँव

यात्रा का पहला भाग यदि न पढ़ा हो तो नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं –

लाहौल घाटी के बाबा त्रिलोकनाथ, हमारी पहलीयात्रा, भाग-1

लाहौल घाटी में पर्वतारोहण के अनुभवों को नीचे दिए लिंक्स पर पढ़ सकते हैं –

लाहौल घाटी में पर्वतारोहण के रोमाँचक अनुभव, भाग-2

लाहौल घाटी में पर्वतारोहण के रोमाँचक अनुभव, भाग-3