शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-2

मानाली रोहतांग की बर्फीली वादियों में

मानाली के पर्वतारोहण संस्थान में शुरुआती प्रशिक्षण का जिक्र पिछले ब्लॉग में हो चुका, जिसमें रॉक क्लाइंविंग, रिवर क्रोसिंग, बुश क्राफ्ट से लेकर नाइट स्फारी और सर्वाइवल कोर्स का रोमाँच कवर कर चुके हैं। इससे आगे का एडवेंचर गुलाबा फोरेस्ट के पास की बर्फीली वादियों में शेष था, जिसमें स्नोक्राफ्ट और स्कीइंग का बेसिक प्रशिक्षण मिलने वाला था।

सोलाँग से हम अपना पिट्ठू बैग टाँगे संस्थान के बाहन में बैठते हैं और रास्ते में पलचान, कोठी जैसे गाँवों को पार करते हुए सर्पीली सड़कों के साथ गुलाबा मोड़ पर पहुँचते हैं। बीच का रास्ता अद्भुत दृश्यावलियों से भरा हुआ है। लगता है कि जैसे हम किसी दूसरे लोक में आ गए हैं। गहरी खाईयाँ, आसमाँ को छूते पर्वत और पहाड़ों से गिरते झरने, रास्ते भर यात्री इन दृश्यों को सांस थामे देखते रहते हैं। बीच में देवदार, मैपल और अन्य पेड़ों के साथ हिमालयन झाडियों से घिरी सडकें सफर को बहुत ही शांति और सुकूनदायी बनाती हैं।

गुलाबा मोड़ पर गाड़ी रुकती है, इसके थोडा ऊपर एक समतल स्थान पर अपना तम्बू गाढ़ते हैं। हमारे इंस्ट्रक्टर पास के तम्बू में थे। इस बीहड़ बन में रुकने के कोई भवन आदि की व्यवस्था नहीं थी, जैसा कि अब तक हम रात को रुकते आए थे। पिछला नाइट सफारी का अनुभव अब हमारे काम आ रहा था। समझ आ रहा था कि अब तक के प्रशिक्षण किस तरह से क्रमिक रुप में हमें आज के दिन के लिए तैयार कर चुके थे।

यहाँ ठण्ड पहले से अधिक लग रही थी, लेकिन स्लीपिंग बैग में सिमट कर इससे निजात पाते हैं। सुबह चाय-नाश्ते के बाद हमें पीछे स्नो फील्डज में ले जाया गया।

इतनी सारी बर्फ को पहली वार देख रहे युवकों का रोमाँचित होना स्वाभाविक था, वह ही पूरी ढ़लान के आर-पार, ऊपर-नीचे, हर तरफ। इस पर पड़ रही धूप के चलते इसे सीधा निहारना खतरनाक था, जो आँखों को चौंधिया कर अस्थायी रुप से अंधा कर सकती थी, जिसे स्नो ब्लाइंडनेस कहा जाता है। इसके लिए स्नो गोग्ल्ज की व्यवस्था हो रखी थी। हाथ में आईस एक्स और पैरों में क्लैंप्स के साथ हम लोग बर्फ पर चल रहे थे, जिनको पहनने का प्रशिक्षण भी हमको मिल चुका था।

चलने के तौर-तरीके हमारे कुशल इंस्ट्रक्टर खुद चल कर सिखा रहे थे। कम स्लोप में बतख की तरह पैरों को फैला कर चला जाता है, जबकि खड़ी चढाई में जिग-जैग हल्की चढ़ाई के साथ आर-पार चलते हुए ऊँचाई को नापा जाता है। आइस एक्स का स्पोर्ट इसमें लाठी का काम करता है। स्नो क्राफ्ट का पहला सबक आज हमें मिल गया था, जिसका अभ्यास चलता रहा। फिर दिन का भोजन होता है, कुछ विश्राम के बाद फिर हम स्नो फील्ड में आज के सीखे पाठ का अभ्यास करते हैं।

अगले दिन हम और ऊँचाई में पहुँचते हैं, जहाँ से बर्फ के संग स्कीइंग, फिसलने के प्राथमिक गुर हमें सिखाए जाते हैं। और यदि कहीँ रुकना हो तो कैसे आइस एक्स का सहारा लिया जा सकता है, या कहीं बर्फ में गिर गए या फिसल गए तो कैसे आइस एक्स को बर्फ में फंसाकर स्वयं का बचाव किया जा सकता है। इस तरह आज हम बर्फ पर फिसलने का अभ्यास करते रहे। इसमें नौसिखियों के अनाढ़ीपन का खामियाजा भी बीच-बीच में भुगतना पड़ रहा था। लेकिन आईस एक्स के सहारे बचाव के तौर तरीके हम सीख रहे थे। कुल मिलाकर इसके साथ हमारा एडवेंचर कोर्स पूरे श्बाव पर था।

कोर्स की अवधि पूरा होने को थी, दिन का अभ्यास पूरा हो चुका है, फुर्सत के पलों में तम्बू के आसपास के जंगलों व बुग्यालों को एक्सप्लोअर करते हैं। यहाँ से घाटी के उस पार सोलाँग व मानाली के बीच के क्षेत्र के पीछे की पर्वत श्रृंखलाएं स्पष्ट दिख रहीं थीं, जिनमें हनुमान टिब्बा विशेष रुप से पर्वतारोहियों के बीच खास लोकप्रिय रहता है। इन बर्फ से ढकी चोटियों को देखकर सहज ही मन में भाव उमड़ रहे थे कि ये पर्वत तपस्वियों की तरह अपनी धुनी रमाकर न जाने कब से ध्यान में मग्न हैं। इनका सान्निध्य व्यक्ति को इनकी ध्वलता, विराटता, दृढ़ता, पावनता, तप, विरक्तता एकांतिकता, शाँति जैसे अनगिन विशेषताओं से रुबरु कराता है और प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमी घुमक्कड़ अपनी पात्रता सिद्ध करते हुए हिमालय के इस दिव्य स्पर्श को पाकर धन्य अनुभव करते हैं। लेकिन अभी हम इनका दूरदर्शन कर संतोष पा रहे थे, हालाँकि इतने दिन हिमालय की गोद में हिमक्रीडा का आनन्द लेकर हम भी धन्य अनुभव कर रहे थे।

कोर्स पूरा कर हम संस्थान के वाहन में बापिस मानाली आते हैं।

यहाँ पर ग्रुप लीड़र के नाते फाइनल रिपोर्ट बनाने व पढ़ने की जिम्मेदारी निभाते हैं और बेस्ट स्टुडेंट का तग्मा भी हमारे हिस्से में आता है। छोटे से ग्रुप में यह उपलब्धि अंधों में काना राजा की उक्ति जैसी थी, लेकिन हमारे जुनून व मेहनत की हौंसला बधाई तो इसके साथ अवश्य हो रही थी। एडवेंचर कोर्स के अनुभव हमें अगले पड़ाव के लिए तैयार कर रहे थे, जिसका पूरा अंदाजा अभी हमें भी नहीं था, क्योंकि अचानक अगले ही माह हमारे बेसिक कोर्स में प्रवेश का भी संयोग बन जाता है, जो लगभग एक मासीय अवधि का था।

माह जुलाई का था। सामान्यतया मई-जून में बेसिक कोर्स के तहत मानाली के सामने सोलंग वैली के पीछे की पीर पंजाल हिमालयन पर्वत श्रृंखलाओं की किसी चोटी का आरोहण किया जाता है, जो औसतन 20 हजार फीट के आसपास की रहती हैं। लेकिन जुलाई माह में बरसात के कारण यहाँ पर्वतारोहण संभव नहीं होता। अतः हमारे हिस्से में लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के सूखे पहाड़ थे, जिसका बैस कैंप मानाली-लेह सड़क के बीच सूरजताल सरोवर के पास जिंगजिंगवार घाटी में लगने वाला था। पर्वतारोहण के बेसिक कोर्स के प्रशिक्षण व यात्रा का रोमाँचक वर्णन आप अगली ब्लॉग पोस्ट - मानाली की वादियों में प्रशिक्षण के पहले नौ दिन में पढ़ सकते हैं।