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मंगलवार, 31 मार्च 2026

चरित्र निर्माण की प्रक्रिया

चरित्र निर्माण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता


चरित्र निर्माण के बिना हम अपने पुरुषार्थ, भाग्य या किसी समर्थ की कृपा-आशीर्वाद के फलस्वरुप तथाकथ सफलता या बुलन्दी के शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन वहां टिके रहें, यह सिर्फ और सिर्फ चरित्र बल के आधार पर ही संभव होता है। अतः जीवन में टिकाऊ सफलता के साथ शांति एवं सद्गति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग एवं गंभीर हो जाए, ताकि वह शिखर से रसातल की ओर लुढ़कने की त्रास्द बिडम्बना से बच सके।

इसके लिए चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के चरणों की तात्विक समझ आवश्यक है। महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के आधार पर इसके आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार - जैसा हम सोचते हैं, बैसा ही हमारा संकल्प बनता है, क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, क्रमशः आदतें बनती हैं और संस्कार पुष्ट होते हैं तथा चरित्र का निर्माण होता है, जो हमारे आचरण-व्यवहार को प्रभावित करता है। युगऋषि पं.श्री रामशर्मा आचार्यजी के शब्दों में जैसा हम सोचते व करते हैं, बैसे ही बनते जाते हैं। और इस तरह चरित्र ही हमारी नियति एवं भविष्य को तय करता है।

इस प्रक्रिया को समझते हुए चरित्र निर्माण के संदर्भ में निम्न चरणों को अपनाया जा सकता है –

स्वाध्याय-सत्संग – महापुरुषों का स्वाध्याय एवं सत्संग सबसे महत्वपूर्ण है, जिसके प्रकाश में चिंतन-मनन करते हुए आत्म-चिंतन संभव हो पाता है। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया गति पकड़ती है, आत्म-सुधार के साथ आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चरण आगे बढ़ते हैं और व्यक्तित्व विकास के साथ चरित्र गठन की महान प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

आध्यात्मिक आदर्श का वरण – जीवन में कैरियर एवं पेशेवर लक्ष्यों के अनुरुप अपने क्षेत्र से सम्बन्धित महानतम एवं श्रेष्ठतम आदर्शों का चयन किया जा सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण के संदर्भ में आध्यात्मिक आदर्शों का वरण आवश्यक है। लौकिक आदर्श सामाजिक सफलता के प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रुपाँतरण एवं चरित्र गठन की प्रेरणा, त्वरा एवं प्रकाश तो आध्यात्मिक आदर्श से ही प्राप्त हो पाते हैं। अतः आध्यात्मिक आदर्श का वरण पहला चरण है।

श्रेष्ठ संग-साथ एवं वातावरण – दिन भर हम किन व्यक्तियों, विचारों व संग-साथ के साथ विचरण कर रहे हैं, किस वातावरण में रह रहे हैं, यह चरित्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। कुसंग और दूषित वातावरण में हम किन्हीं श्रेष्ठ विचारणा एवं प्रेरणा की आशा नहीं कर सकते। ऐसे में बुरी संगत से अकेला भला की उक्ति को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यहाँ डिजिटल संयम के महत्व को भी समझा जा सकता है।

अनुशासित जीवनशैली – चरित्र गठन के संदर्भ में जीवनशैली का अनुशासित होना आवश्यक है। बिना खान-पान, दिनचर्या, विचार एवं व्यवहार को साधे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में संयमित आहार, कसी हुई दिनचर्या, सकारात्मक-श्रेष्ठ विचार एवं संतुलित-उदात वाणी-व्यवहार के माध्यम से चरित्र निर्माण की जड़ों का पोषण किया जा सकता है।


जीवन साधना – चरित्र निर्माण के लिए अन्ततः चित्त के स्तर पर उतर कर स्वयं पर कार्य करना पड़ता है। मात्र वाणी, व्यवहार एवं विचारों पर कार्य करने भर से चरित्र गठन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। दीर्घकाल से जड़जमा कर बैठी आदतों एवं हठीले कुसंस्कारों का परिष्कृत करने में समय लगता है। इसके लिए जप, ध्यान प्रार्थना से लेकर प्रायश्चित तप के आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। समूचे जीवन को साधनामय बनाना पड़ता है।

निसंदेह रुप में चरित्र निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है (Character building is a lifelong process) और युगनायक स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में हजारों ठोकरें खाने के साथ चरित्र का गठन होता है। (Character has to be established through a thousand stumbles.) इसकी दुरुहता, जटिलता, गंभीरता एवं महत्व को समझते हुए हम चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग हो जाएं, इसको जीवनचर्या का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही हमारे गौरव-गरिमा की रक्षक है, यही हमारे गुरुत्व की पौषक है, यही हमारे आत्मिक उत्थान की नींव है और यही हमारे जीवन की टिकाऊ सफलता, सुख-शांति, संतुष्टि एवं परिपूर्णता का आधार है।

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

खेल जन्म-जन्मांतर का है ये प्यारे

 

जब न मिले चित्त को शांति, सुकून, सहारा और समाधान

जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं, ऐसी घटनाएं घटती हैं, ऐसी समस्याओं से जूझना पड़ता है, जिनका तात्कालिक कोई कारण समझ नहीं आता और न ही त्वरित कोई समाधान भी उपलब्ध हो पाता। ऐसे में जहाँ अपना अस्तित्व दूसरों के लिए प्रश्नों के घेरे में रहता है, वहीं स्वयं के लिए भी यह किसी पहेली से कम नहीं लगता।

यदि आप भी कुछ ऐसे जीवन के अनुभवों से गुजर रहे हैं, या उलझे हुए हैं, तो मानकर चलें कि यह कोई बड़ी बात नहीं। यह इस धरती पर जीवन का एक सर्वप्रचलित स्वरुप है, माया के अधीन जगत का एक कड़ुआ सच है। वास्तव में येही प्रश्न, ये ही समस्याएं, येही बातें जीवन को ओर गहराई में उतरकर अनुसंधान के लिए प्रेरित करती हैं, समाधान के लिए विवश-वाधित करती हैं।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक व्यवहार में व्यक्तित्व की परिभाषा खोजने वाला आधुनिक मनोविज्ञान मन की पहेलियों के समाधान खोजते-खोजते फ्रायड महोदय के साथ वीसवीं सदी के प्रारम्भ में मनोविश्लेषण की विधा को जन्म देता है। फ्रायड की काम-केंद्रित व्याख्याओं से असंतुष्ट एडलर, जुंग जैसे शिष्य मनोविश्लेषण कि विधा में नया आयाम जोड़ते हैं। इनके उत्तरों में अपने समाधान न पाने वाले मैस्लो मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं (Hierarchy of Needs) की एक श्रृंखला परिभाषित कर जाते हैं, जिनमें अध्यात्म को भी स्थान मिल जाता है।

इससे भी आगे जीवन को समग्रता में समझने की कोशिश में मनोवैज्ञानिक आध्यात्मिक मनोविज्ञान पर शोध-अनुसंधान कर रहे हैं। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व योग-मनोविज्ञान के रुप में अष्टांग योग का एक व्यवहारिक एवं व्यवस्थित राजमार्ग उद्घाटित किया था, जिसका अनुसरण करते हुए व्यक्ति अपने जीवन की पहेली को सुलझा सके। क्योंकि यह कोई बौद्धिक तर्क-वितर्क तक सीमित विधा नहीं, बल्कि जीवन साधक बनकर अस्तित्व के साथ एक होने व जीने की पद्वति का नाम है।

यहाँ हर घटना कार्य-कारण के सिद्धान्त पर कार्य कर रही है। हम जो आज हैं, वो हमारे पिछले कर्मों का फल है और जो आज हम कर रहे हैं, उसकी परिणति हमारा भावी जीवन होने वाला है। वह अच्छा है या बुरा, उत्कृष्ट है या निकृष्ट, भव्य है या घृणित, असफल है या सफल, अशांत-क्लांत है या प्रसन्न-शांत – सब हमारे विचार-भाव व कर्मों के सम्मिलित स्वरुप पर निर्धारित होना तय है।

यही ऋषि प्रणीत कर्मफल का अकाट्य सिद्धान्त ईश्वरीय विधान के रुप में जीवन का संचालन कर रहा है। यदि हम पुण्य कर्म करते हैं, तो इनके सुफल हमें मिलने तय हैं और यदि हम पाप कर्म करते हैं, तो इनके कुफल से भी हम बच नहीं सकते। देर-सबेर पककर ये हमारे दरबाजे पर दस्तक देते मिलेंगे। इसी के अनुरुप स्वर्ग व नरक की कल्पना की गई है, जिसे दैनिक स्तर पर मानसिक रुप से भोगे जा रहे स्वर्गतुल्य या नारकीय अनुभवों के रुप में हर कोई अनुभव करता है। मरने के बाद शास्त्रों में वर्णित स्वर्ग-नरक का स्वरुप कितना सत्य है, कुछ कह नहीं सकते, लेकिन जीते-जी शरीर छोड़ने तक इसके स्वर्गोपम एवं मरणात्क अनुभवों से गुजरते देख स्वर्ग-नरक के प्रत्यक्ष दर्शन किए जा सकते हैं।

दैनिक जीवन की परिस्थितियों, घटनाओं व मनःस्थिति में भी इन्हीं कर्मों की गुंज को सुन सकते हैं और गहराई में उतरने पर इनके बीजों को खोज सकते हैं। नियमित रुप से अपनाई गई आत्मचिंतन एवं विश्लेषण की प्रक्रिया इनके स्वरुप को स्पष्ट करती है। कई बार तो ये स्वप्न में भी अपनी झलक-झांकी दे जाते हैं। दूसरों के व्यवहार, प्रतिक्रिया व जीवन के अवलोकन के आधार पर भी इनका अनुमान लगाया जा सकता है। एक साधक व सत्य-अन्वेषक हर व्यक्ति व घटना के मध्य अपने अंतर सत्य को समझने-जानने व खोजने की कोशिश करता है।

जब कोई तत्कालिक कारण नहीं मिलते तो इसे पूर्व जन्मों के कर्मों से जोड़कर देखता है औऱ जन्म-जन्मांतर की कड़ियों को सुलझाने की कोशिश करता है। यह प्रक्रिया सरल-सहज भी हो सकती है औऱ कष्ट-साध्य, दुस्साध्य भी। यह जीवन के प्रति सजगता व बेहोशी पर निर्भर करता है। माया-मोह व अज्ञानता में डूबे व्यक्ति के जीवन में ऐसे अनुभव प्रायः भुकम्प बन कर आते हैं, शॉकिंग अनुभवों के आँधी-तुफां तथा सुनामी की तरह आते हैं तथा अस्तित्व को झकझोर कर जीवन व जगत के तत्व-बोध का उपहार दे जाते हैं।

इन्हीं के मध्य सजग साधक समाधान के बीजों को पाता है, जबकि लापरवाह व्यक्ति दूसरों पर या नियति या भगवान को दोषारोपण करता हुआ, इन समाधान से वंचित रह जाता है। वस्तुतः इसमें स्वाध्याय-सतसंग से प्राप्त जीवन दृष्टि व आत्म-श्रद्धा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। और इनके साथ गुरुकृपा व ईश्वर कृपा का अपना स्थान रहता है। अतः आत्म-निष्ठ, ईश्वर परायण व सत्य-उपासक साधक कभी निराश नहीं होते। गहन अंधकार के बीच भी वे भौर के प्रकाश की आश लिए आस्थावान ह्दय के साथ दैवीय कृपा के प्रसाद का इंतजार करते हैं और देर-सबेर उसे पा भी जाते हैं।

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