बुधवार, 25 नवंबर 2020

कुम्भनगरी हरिद्वार - कुछ दर्शनीय स्थल

हिमालय के द्वार पर बसी धर्मनगरी - हरिद्वार 

धर्मनगरी के नाम से प्रख्यात हरिद्वार में शायद ही किसी व्यक्ति का वास्ता न पड़ता हो। 6 और 12 साल के अंतराल में महाकुंभ का आयोजन इसकी एक विशेषता है। फिर जीवन के अंतिम पड़ाव के बाद शरीर के अवसान की पूर्णाहुति अस्थि विसर्जन और श्राद्ध-तर्पण आदि के रुप में प्रायः हरिद्वार तीर्थ में ही सम्पन्न होती है। हिमालय में स्थित चारों धामों की यात्रा यहीं से आगे बढ़ती है, जिस कारण इसे हरद्वार या हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। निसंदेह रुप में भारतीय संस्कृति व इसके इतिहास की चिरन्तन धारा को समेटे यहाँ के तीर्थ स्थल स्वयं में अनुपम हैं, जिनकी विहंगम यात्रा यहाँ की जा रही है।

इनमें निसंदेह रुप में कनखल सबसे प्राचीन और पौराणिक स्थल है, जहाँ माता सती ने अपने पिता दक्षप्रजापति द्वारा अपने पति शिव के अपमान होने पर हवन कुण्ड में स्वयं को आहुत किया था और फिर शिव के गणों एवं वीरभद्र ने यज्ञ को ध्वंस कर दक्ष प्रजापति का सर कलम कर दिया था और फिर भगवान शिव ने इनके धड़ पर बकरे का सर लगा दिया था। सती माता के जले शरीर को कंधे पर लिए शिव विक्षिप्तावस्था में ताण्डव नर्तन करते हुए पृथ्वी में विचरण करते हैं, चारों ओर प्रलय की स्थिति आ जाती है। तब विष्णु भगवान सुदर्शन चक्र से सत्ती के शरीर को कई खण्डों में अलग करते हैं। जहाँ माता सती के ये अंग गिरते हैं, इन्हें शक्तिपीठ का दर्जा दिया गया। भारतीय परम्परा में ऐसे 51 या 52 शक्तिपीठों की मान्यता है। कनखल दक्षप्रजापति मंदिर गंगाजी की धारा के किनारे शक्तिपीठों के आदि उद्भव स्रोत के रुप में हमें पौराणिक इतिहास का स्मरण कराते हैं, जो हरिद्वार बस स्टैंड से लगभग 4 किमी की दूरी पर स्थित हैं।

कनखल में ही रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम पधारने योग्य स्थल है, जिसे स्वामी विवेकानन्द एवं अनके गुरु भाईयों ने साधु, अनाथ एवं गरीब जनता की सेवा-सुश्रुणा के लिए एक आश्रम और चिकित्सालय स्थापित किया था। आज यहाँ पूरा हॉस्पिटल है और साथ ही एक समृद्ध पुस्तकालय के साथ रामकृष्ण आश्रम का मंदिर एवं मठ भी। इससे जुड़े कई रोचक एवं रोमाँचक संस्मरणों को विवेकानन्द साहित्य में पढ़ा जा सकता है। कनखल में ही माँ आनन्दमयी का आश्रम भी स्थित है। माँ आनन्दमयी बंगाल में पैदा हुई एक महान संत थी, जो योग विभूतियों से सम्पन्न थी। देश भर में कई स्थानों पर इनके मंदिर हैं, लेकिन कनखल, हरिद्वार में इनकी समाधि है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

 इसके आगे सिंहद्वार से नीचे हरिद्वार-दिल्ली मार्ग पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय पड़ता है, जिसको आर्यसमाज के महान संत एवं सुधारक स्वामी श्रद्धानन्दजी ने स्थापित किया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तथा बाद में यह विश्वविद्यालय मूर्धन्य साहित्यकारों, पत्रकारों, विचारकों, शिक्षाविदों एवं समाजसेवियों को तैयार करने की उर्बर भूमि रहा है। इसके आगे बहादरावाद सड़क पर गंगनहर के किनारे नवोदित उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित है, जो संस्कृत एवं आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन, अध्यापन एवं शोध पर केंद्रित है।

सिंहद्वार के पास गंगनहर के उस पार श्रीअरविंद आश्रम स्थित है। यह इतने शाँत एकांत स्थल पर है कि बाहर सड़क के कोलाहल के बीच इसका अंदाजा नहीं लगता, जहाँ इसका छोटा सा पुस्तक विक्रय स्टाल लगा हुआ है। लेकिन अन्दर एक भव्य, बहुत ही सुंदर आश्रम है, जहाँ आश्रम के साधकों के सान्निध्य में बेहतरीन आध्यात्मिक सत्संग एवं मार्गदर्शन पाया जा सकता है।

यही मार्ग उत्तर की ओर सीधा बस स्टैंड तथा रेल्वे स्टेशन की ओर आता है, दोनों लगभग आमने-सामने पास-पास स्थित हैं। यहाँ से उत्तर की ओर 3 किमी की दूरी पर हर-की-पौड़ी पड़ती है, जहाँ तक ऑटो-रिक्शा से आया जा सकता है। यही श्राद्ध-तर्पण, अस्थि विसर्जन का मुख्य स्थल है। मान्यता है कि यहीं पर समुद्र मंथन के बाद अमृत की बूँदे छलकी थीं, जिसके आधार पर यहाँ क्रमशः छः और बारह वर्ष के अन्तराल में अर्ध-कुम्भ और महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है। वर्ष 2021 में यहाँ महाकुम्भ का आयोजन प्रस्तावित है। इसके घाट का निर्माण सर्वप्रथम 57 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अपने भाई भर्तृहरि की याद में किया गया माना जाता है, जिन्होंने यहाँ गंगा तट पर जीवन का उत्तरार्ध ध्यान-साधना में बिताया था।

हरकी पौड़ी की सांयकालीन गंगा आरती सुप्रसिद्ध है। शाम को सन्ध्या वेला के समय घंटे, घडियाल और शंख ध्वनियों के बीच प्रज्जवलित दीपों से सजे थालों की श्रृंखला दर्शनीय रहती है। इस भक्तिमय दृश्य के साक्षी बनने व इसमें भाग लेने के लिए नित्यप्रति श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। हरिद्वार पधारा शायद ही कोई दर्शनार्थी इसके दर्शनलाभ से वंचित रहता हो।

हर-की-पौड़ी के आसपास खाने पीने के कुछ बेहतरीन ठिकाने हैं, जिनका जिक्र करना उचित होगा। हर-की-पौड़ी के पास ही मोहन पूरी बाले की दुकान है, जो गर्मागर्म हल्वा, पूरी, कचौड़ी आदि के लिए प्रख्यात है। इसके अंदर मोती बाजार में प्रकाश लोक नाम से लाजवाब लस्सी की दुकान है, जिसका गर्मी के मौसम में विशेष रुप से लुत्फ उठाया जा सकता है। बस स्टैंड के पास त्रिमूर्ति के अंदर गली में गुजराती ढावा भी उल्लेखनीय है, जिसमें महज 50 रुपए में 15-20 व्यंजनों के साथ स्वादिष्ट एवं पौष्टिक गुजराती थाली परोसी जाती है। इसके आस-पास मोतीबाजार में तमाम दुकानें हैं, जहाँ से घर के लिए रुद्राक्ष, शंख, कंठी, मालाएं जैसी धार्मिक बस्तुएं प्रतीक एवं उपहार स्वरुप खरीदी जा सकती हैं।

हर-की-पौड़ी के दोनों और 2-3 किमी के फासले पर दो पहाड़ियाँ हैं, बीच में गंगाजी बहती हैं। दायीं ओर की पहाड़ी पर मनसा देवी का मंदिर है तो वायीं ओर की पहाड़ी पर चण्डी देवी का। दोनों मंदिरों तक उड़न खटोलों की सुविधा है। चण्डी देवी के प्रवेश द्वारा पर महाकाली का सिद्धपीठ है, जिसकी स्थापना महान तंत्र सम्राट कामराज महाराज ने की थी। इसी के आगे चण्डीघाट बना है, जो संभवतः हरिद्वार के भव्यतम घाटों में से एक है। यहीं पर कुष्ठाश्रम है, जो निष्काम सेवा का एक विरल उदाहरण है।

दोनों के मध्य पुलिस चौकी के पास मायादेवी का मंदिर है, जो यहाँ की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, इन्हीं के नाम से हरिद्वार का एक नाम मायापुरी भी है। इसकी गणना 52 शक्तिपीठों में भी होती है। मान्यता है कि सती माता का ह्दय एवं नाभी स्थल यहाँ गिरा था। यहीं से थोड़ी दूरी पर ललिताराव पुल के आगे शिवालिक बाईपास के दायीं ओर बिल्केश्वर महादेव एवं गौरी कुण्ड पड़ते हैं। मान्यता है कि माँ पार्वती ने इसी स्थल पर बेल के पत्ते खाकर शिव की आराधना की थी और गौरी कुण्ड में वे स्नान किया करती थीं। यहीं से होकर शिवालिक पहाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं।

यहाँ से उत्तर दिशा में सप्तसरोवर क्षेत्र के पास भारतमाता का सात मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यामित्रानन्दजी ने स्थापित किया था। इसमें भारत भर के हर प्राँत की संस्कृति, मातृशक्तियों, संतों-सुधारकों-यौद्धाओं, देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों एवं प्रस्तुतिओं को अलग-अलग मंजिलों में देखा जा सकता है। संक्षेप में भारतभूमि की युग-युगीन आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परम्परा के दिग्दर्शन यहाँ किए जा सकते हैं। इसकी सातवीं मंजिल से गंगाजी की धाराओं के विहंगम दर्शन किए जा सकते हैं, जो हरिद्वार में अन्यत्र दुर्लभ हैं।

इसके पास ही ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान है, जहाँ आद्यशक्ति गायत्री की 24 शक्तिधाराओं के भव्य मंदिर है, साथ ही विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करती प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय है।


यहाँ से थोड़ी आगे अजरअँध आश्रम पड़ता है, जिसमें अंधें बच्चों की निशुल्क शिक्षा व्यवस्था है। इसके थोड़ी आगे गोस्वामी गणेशदत्तजी द्वारा स्थापित सप्तसरोवर आश्रम और संस्कृत विद्यालय है। सप्तसरोवर क्षेत्र के वारे में मान्यता है कि जब गंगा मैया हिमालय से मैदानों की ओर प्रवाहित हो रही थी, तो इस क्षेत्र में सप्तऋषि तप कर रहे थे। इनकी तपस्या में विघ्न न पड़े, इसलिए गंगा मैया यहाँ सात भागों में विभक्त हुईं थी। इसके थोड़ी आगे शांतिकुंज आश्रम आता है, जिसे विश्वामित्र की तपःस्थली पर स्थापित माना जाता है। पं. श्रीरामशर्मा आचार्य द्वारा 1970 में गायत्री तीर्थ के रुप में स्थापित इस आश्रम में गायत्री-यज्ञ, संस्कार के अतिरिक्त कई तरह की रचनात्मक गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।

यहाँ नौ दिन के साधना सत्र चलते हैं, कोई भी गायत्री साधक इनमें शामिल हो सकता है। इसी तरह एक मासीय युग शिल्पी सत्र तथा तीन माह के परिव्राजक प्रशिक्षण सत्र चलते हैं। नैष्ठिक साधकों के लिए पाँच दिवसीय अंतःऊर्जा सत्र भी चलते हैं। यहाँ युगऋषि द्वारा 1926 से प्रज्जवलित अखण्ड दीपक के दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ देवात्मा हिमालय मंदिर भी है। 


आगंतुकों के लिए लंगर जैसी निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है। ऋषि परम्परा पर आधारित सप्तऋषि मंदिर एवं प्रदर्शनी भी है, जहाँ शांतिकुंज एवं युग निर्माण आंदोलन से सम्बन्धित गतिविधियों की जानकारी पाई जा सकती है। गेट नं. 4 से प्रवेश करते ही गाईड विभाग से सहज मार्गदर्शक उपलब्ध रहता है। श्राद्ध तर्पण, संस्कार और आदर्श विवाह संस्कार यहाँ की अन्य निःशुल्क सेवाएं हैं। यहाँ के बुक स्टॉल पर आचार्यजी द्वारा लिखित 3200 से अधिक पुस्तकों तथा अखण्ड ज्योति पत्रिका को अपनी रुचि एवं आवश्यकतानुसार खरीदा जा सकता है। साथ ही विभिन्न जड़ी-बूटियाँ व इनके उत्पाद भी यहाँ उपलब्ध रहते हैं।

इसी के सामने दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित ब्यास मंदिर है, तो गंगाजी के किनारे बने घाट नं. 20 के तट तक फैला है। यहाँ से नीचे गंगाजी के किनारे घाट नम्बर एक तक घाटों की श्रृंखला फैली है। ये घाट गंगाजी के किनारे बने तटबंधों पर स्थित हैं। गंगाजी का जल बरसात में बाढ़ के कारण उफनने पर किसी तरह की त्रास्दी का कारण न बने, इसके लिए गंगाजी के किनारे हर-की-पौड़ी तक तटबंध बने हुए हैं। इस बाँध पर लोगों को सुबह-शाम भ्रमण करते देखा जा सकता है और शाम को घाट के किनारे साधक यहाँ स्नान-ध्यान करते हैं। यहाँ के सात्विक, शाँत, एकाँत एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से चार्ज वातावरण से आगंतुक लाभान्वित होते हैं।

गंगाजी के उस पार प्राकृतिक रुप से टापू बने हुए हैं, जहाँ घने जंगल हैं। 


पहले यहाँ साधु-सन्यासी लोग कुटिया बनाकर रहते थे, लेकिन अब वन विभाग के नियमानुसार यहाँ किसी तरह का निर्माण अबैध ठहराया गया है, अतः यहाँ कोई स्थायी निवास नहीं है। लेकिन यात्रीगण गंगाजी की धाराओं को पार कर वहाँ पिकनिक मना सकते हैं, कुछ पल गंभीर चिंतन-मनन व ध्यान के बिता सकते हैं।

 कुम्भ के दौरान ये टापू आबाद रहते हैं, जब इसमें संत महात्मा अपनी शिष्य एवं भक्त मण्डली के साथ यहाँ डेरा जमा कर महीनों रहते हैं।

शांतिकुंज के आगे हरिद्वार के उत्तरी छोर पर है देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, जो 2002 में स्थापित हुआ था। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विजन पर आधारित यह विश्वविद्यालय शिक्षा के साथ विद्या के लिए समर्पित है। 


यहाँ पर मूल्य आधारित शिक्षा के अभिनव प्रयोग चल रहे हैं। छात्रों को स्वाबलम्बी बनाने के लिए तकनीकी कौशल एवं बौद्धिक ज्ञान देने के साथ ही जीवन जीने की विद्या का भी कुशल प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वे जीवन के हर क्षेत्र में एक जिम्मेदार नागरिक के रुप में समाज, राष्ट्र एवं विश्वमानव के कुछ काम आ सकें। संक्षेप में यहाँ उच्च शिक्षा के साथ संस्कार की उत्तम व्यवस्था है।

हरिद्वार के उत्तर में जहाँ देवसंस्कृति विश्वविद्यालय है तो दक्षिण में बाहरी छोर पर पातंजलि योग पीठ एवं विश्वविद्यालय, जिन्हें योगगुरु बाबा रामदेव के अभिनव प्रयोगों के लिए जाना जाता है। योग को टीवी माध्यम से घर-घर पहुँचाने में इनका योगदान स्तुत्य रहा है। आचार्य बालकृष्ण के साथ मिलकर इनका आयुर्वेद एवं दैनन्दिन उपयोग के देशी उत्पादों को घर-घर पहुँचाना एक बड़ा योगदान है। इनके साथ योग आयुर्वेद के क्षेत्र में हो रहे शोध अनुसन्धान, बच्चों के लिए वैदिक शिक्षा पर आधारित गुरुकुलम् की अभिनव पहल आदि के दर्शन यहाँ किए जा सकते हैं।

 उत्तरी छोर के उस पार रायवाला क्षेत्र में तथा हरिपुर कलाँ के आगे नदी के पार गंगा के निकट एक अद्भुत आश्रम है, जिसका शांति व अध्यात्म की तलाश में भटक रहे अभीप्सु एक बार अवश्य अवलोकन कर सकते हैं। हालाँकि यहाँ तक पहुँचने का कोई बोर्ड या विज्ञापन कहीं नहीं मिलेगा, लेकिन किसी को साथ लेकर एक बार इसके परिसर में जीवंत नीरव-शांति को अनुभव किया जा सकता है। स्वामी ब्रह्मदेव 1985 से यहाँ एक तरह से धुनी रमाकर बैठे हैं। श्रीअरविंद एवं श्रीमाँ की अध्यात्म विद्या के आधार पर यहाँ आश्रम की गतिविधियों को देखा जा सकता है। यहाँ बहुत समृद्ध पुस्तकालय है, ध्यान कक्ष है, भोजनालय है, एक गौशाला है, स्कूली बच्चों के लिए स्कूल है। साथ ही एक सर्वधर्म समभाव एवं विश्व एकता को लेकर विश्व मंदिर है। पूरा आश्रम आम के बाग तथा हरियाली से आच्छादित है। अभीप्सु यहाँ स्वामीजी के सान्निध्य में सत्संग लाभ ले सकते हैं।

इस तरह हरिद्वार में एक-दो दिन के प्रवास में इन स्थलों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी आध्यात्मिक सांस्कृतिक विरासत से परिचय के साथ अध्यात्म लाभ लेते हुए कुछ पल शांति, सुकून एवं आत्म-चिंतन मनन के बिताए जा सकते हैं। बस या आटो को किराए पर लेकर आसानी से ये दर्शन लाभ लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त और भी तमाम मंदिर, आश्रम एवं शिक्षा केंद्र यहाँ स्थित हैं, जिनका जिक्र यहाँ नहीं हो पाया है।