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मेरा गाँव मेरा देश – यादें बचपन की

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ब्यास नदी का तट और वन विहाल(विहार) -1 बचपन क े कई या दगार पल ब्यास नदी के वाएं तट पर वस े को उ श ( अतीश) के वृक्षों की छाया में फैले क ाईस विहाली के चरागाह से जुड़ े हु ए हैं। छुट्टियों में जब भी घर जाते हैं, 1-2 किमी लम्बे और आधे से एक किमी चौड़ े इस भूखण्ड को देखते ही बचपन की अनगिन स्मृतियों सहज ही कौंध उठती हैं। बालपन में कितने मासूम गुनाह इसके तट पर हम खेल - खेल में किए हैं , कितन ी सारी खटी - मीठी यादें इससे जुड़ी हैं , फुर्सत के पलों में ये मन को गुदगुदाती हैं , आल्हादित करती हैं , मीठा सा दर्द का अहसास कराकर कभी - कभी भावुक बना देती हैं। सर्दी में पतझड़ का मौसम और कोउश (अतीश) के सूखे पत्ते – ठण्ड के मौसम माँ के साथ पीठ में किल्टा (जालीदार लकड़ी से बना लम्बा टोकरा) लेकर यहाँ जाते थे। पतझड़ में को उश ( अतीश) के पत्ते झड़ रहे होते थे। रोज वहाँ रेतीले तल पर इनकी ढेर लग जाती। गाँव की अधिकाँश महिलाएं व बच्चे इऩ्हें बटोरने के लिए शाम-सवेरे घर से निकल पड़ते। रेत के विस्तर पर गिरे इन सूखे पत्तों को बटोरकर किल्टों में भरकर या चादर में ल पेटकर घर लाते।