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सोमवार, 24 अगस्त 2026

जीवन गीत - काल की नज़ाकत समझने की समझदारी

 


मोहभंग का दर्द मीठा, बढ़ चल मोहमाया के उस पार 

एक घरोंदे में दशकों से रहने की आदत,

वहाँ से मोह का पलना है स्वाभाविक।1

लेकिन परिवर्तन का शाश्वत चक्र, प्रकृति का अपना विधान,

अपनी संतान के विकास का, जिसको है पूरा ध्यान।2

वर्तमान में ही अटके रहोगे, तो आगे कैसे बढ़ोगे,

फिर ऐसे में प्रकृति क्यों न रचे अपना कठोर सरंजाम।3

संकेत स्पष्ट उसके, एक-दो नहीं, समय-समय पर अनगिन वार,

लेकिन मोह की प्रकृति कुछ ऐसी, सहज छोड़ने को इसे कौन कहाँ तैयार।4

कई माह चोटिल रखा, शायद, मोह त्याग दोगे, संकेत समझकर अबकी वार,

ठीक होते ही फिर घरोंदा सजाने की कवायद, नहीं छूट रहा मोहविकार।5

देखो फिर प्रकृति की गहन शॉक थेरेपी, लगे जो पीड़ादायक प्रहार,

हो चला मोहग्रस्त जीवात्मा के मर्ज का जड़ से उपचार।6

होंगे तुम्हारे अनगिन परिवार से अधिक किसी कुनवे पर उपकार,

लेकिन प्रकृति प्रेरित एक गलती पर होंगे सारे उपकार कुर्वान।7


फिर नित रंग बदलती इस दुनियाँ में कौन चाहता है दिल से विचार, विमर्श, संवाद,

अगर होता हो इससे  नका रौव-दौव, रुत्वा वर्चस्व तनिक भी निराकार।8

संभलकर विचरना बदल चुकी फिजाओं में, नहीं जहाँ औचित्य का अधिक सत्कार,

नज़रंदाज कर नादानियाँ मासूमों की, बढ़ चल मोहमाया की सीमा के उस पार।9


समझना मोहभंग का यह आत्यांतिक प्रहार, माँ प्रकृति का अजस्र कृपा विधान,

रहना सजग अढिग अपने स्वधर्म पर, प्रकृति-परमेश्वर खोल रहे नए वितान।10

सबकी अपनी नियति, अपने कर्म, होंगे जो फलित पौध बनकर समय पर कटु तिक्त-मधुर क्रमवार,

तुम तो बढ़ चलो मंजिल की ओर पथिक , समेट मोह-माया सकल, ले मुट्ठी में जीवन का सवक-सार।11


मंगलवार, 30 जून 2026

जीवन दर्शन

 


कृपा उसकी परम मंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास

अल्पज्ञ मनुष्य  नासमझ मूढ़, सर्वज्ञ होने का भ्रम पाल बैठा,

लेकिन प्रकृति की विराटता विकरालता के समक्ष बौना हो बैठा।


माना ईश्वर का अंश, ईशतुल्य, जीव अविनाशी,

लेकिन अपनी मानवीय सीमाओं का भी तो बोध होना चाहिए।


मदहोशी में, अपने सम्यक बोध के अभाव में हो जाती हैं गलतियाँ,

कोई बड़ी बात नहीं, समझ आने पर भूल सुधारने में क्या देरी।

वह सर्वज्ञ सर्वसमर्थ, तुम्हारा सब जाने, अतीत वर्त और भविष्य,

उसकी कालजयी योजना का तुम क्या पार पाओगे।


उसकी दुर्भेद्य प्रकृति का एक झटका लगे कठिन परीक्षा,

जन्मों के संचित कर्म, प्रारब्ध चटकेंगे पल भर में कुछ ऐसे।

तत्काल प्रकृति का क्रूर विधान, अत्याचार, अन्याय लगेगा,

समय के साथ इसके पीछे का करुणा विधान समझ आएगा।


जो नहीं कर पा रहे जन्मों से, वह इसी जन्म में हो जाएगा,

चटांक बुद्धि से न लगाओ तड़का परिस्थितियों के चक्रव्यूह पर।


वह है सत्य शिव सुन्दर, अणु विभू सौम्य, अखण्ड प्रचण्ड विकराल,

उसकी कृपा है परममंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास।


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले नहीं जब कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर हर पल।12।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जीवन गीत

हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए

 


हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए,

धर्म-मर्यादा संग इंसानियत को स्थान मिलना चाहिए।1

आदर्श सिद्धान्तों की बातें अच्छी,

व्यवहारिक धरातल का भी अहसास होना चाहिए।2

 

काम बनें या बिगड़े, या थोड़ी देर में होते हैं पूरे,

आपसी प्यार-सद्भाव-भाईचारा बना रहना चाहिए।3

नहीं कोई परमहंस इस रंग बदलती दुनियाँ में,

मानवीय दुर्बलताओं के प्रति उदार भाव रहना चाहिए।4

 



       नहीं संत बनता यहाँ कोई एक दिन में इस धरा पर,

सुधरने का मौका सबको मिलता रहना चाहिए।5

अपनी मूढ़ता की आँधी में हो सवार कोई अगर,

तो उस लाइलाज मर्ज़ का उपचार होना चाहिए।6

 

नहीं समाधान मर्ज का अपने हाथ में को,

 इस सृष्टि के मालिक पर छोड़ देना चाहिए।7

हर व्यक्ति जिम्मेदार है अपने चिंतन व कर्म के लिए,

अपने कर्तव्य के प्रति सबको ईमानदार-जिम्मेदार रहना चाहिए।8

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

जीवन गीत - अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना

 

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा

 


अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना,

सोए बुझे अरमानों में जैसे नए पंख का लग जाना,

घनघोर रात के बाद जैसे भौर का उजाला छा जाना,

रेगिस्तान में भटक रहे प्यासे को जल का स्रोत मिल जाना।

 

लेकिन अभी तो क्षितिज के पार बहुत दूर है मंजिल,

अग्नि परीक्षा के कई दौर हैं अभी बाकि,

बाहरी छल-छद्म के खेलों का भी होगा राह में सामना,

थक जाओगे राह में पथिक, लेकिन तुम्हें है बस चलते जाना।

 


सबसे बड़ी चुनौती हो स्वयं, चित्त् शुद्धि का विकट कार्य,

बिगड़ैल मन की कुचालों को भी है पग-पग पर साधना,

बार-बार गिरोगे, फिसलोगे, लेकिन लक्ष्य सिद्धि तक

अनन्त काल तक बिना हारे तुम्हें है बस चलते जाना।

 

जहाँ अपनी शक्ति चूक जाए, हाथ खड़े हो जाएं,

वहाँ दैवीय शक्ति, गुरु अवलम्बन में क्या उदासीनता,

दो कदम बढ़ो उस ओर, वह दस कदम पास मिलेगा,

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा।

रविवार, 31 अगस्त 2025

मत भूलना समय की गति, काल की चाल...

 

रख धैर्य अनन्त, आशा अपार...

मत भूलना, याद रखना,

समय की गति, काल की चाल,

सब महाकाल की इच्छा, नहीं कोई इसका अपवाद ।1।


जब समय ठहरा सा लगे, काल पक्ष में न दिखे,

बिरोधियों की दुरभिसंधियाँ सफल होती दिखे,

और मंजिल दृष्टि से ओझल दूर होती दिखे ।2।


सही समय यह अपने गहनतम मूल्याँकन का,

अपनी दुर्बलता को सशक्त करने का,

उड़ान भरने के लिए इंधन एकत्र करने का ।3।


बाकि इतराने दो अपने दर्प-दंभ अहंकार में इनको,

औचित्य को हाशिए में ले जाकर, चैन के गीत गाने दो इन्हें ,

नहीं अधिक लम्बा खेल माया का, बस कर लें थोड़ा इंतजार ।4।


यहाँ कुछ भी नहीं रहता हरदम,

हर चीज के उतार-चढ़ाव का समय तय यहाँ,

और हर घटना, जीत-हार सब सामयिक यहाँ ।5।


कितने तीस मार खान आए यहाँ, कितने गए,

अर्श से फर्श पर गिरकर, शिखरों से भूलुंठित होकर,

काल के गर्त में हर हमेशा के लिए समा गए ।6।


यहाँ भी कुछ ऐसा हो जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं,

रख धैर्य अनन्त, आशा अपार,

अपने स्वधर्म पर अढिग, कर सही समय का इंतजार ।7।


प्रकृति को अपना खेल खेलने दो, कर्मों को अपना चक्रव्यूह रचने दो,

संचित कर्म, प्रारब्ध के विस्फोट से नहीं बच सकता कोई,

बाकि इच्छा महाकाल की, तुम तो औचित्य का दामन थामे रहो ।8



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