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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

जीवन गीत - नही यह राह फूलों की, होंगी अग्निपरीक्षाएं बारंवार


नहीं धीरज जब, न ही विश्वास

अपने मद की आँधी पर हो सवार,

कोई दिक्कत नहीं इसमें भी,

लेकिन, क्या इसकी कीमत चुकाने को हो तैयार ।1

 

स्वाभिमान और अहंकार में है अन्तर न्यून,

जब रज के उवाल में चित्त मार रहा हो हुंकार,

अपनी गलती न सूझे तनिक भी, प्रतिपक्ष ही गलती में शुमार ।2

 

स्वाभिमान के पीछे छिपे होते हैं सत्य, संवेदना, औचित्य,

अहंकार के पीछे भावशून्य हठधर्मिता, अहं का दर्प दंभ हुंकार,

सत्य से दृष्टि औझल, अपने दुराग्रह को मनवाने की टंकार ।3


औचित्य में होती है, लचक, संभावना सृजन की,

सत्य को स्वीकारने की, अपनी गलती को सुधारने की,

दृष्टि सुधार की, नहीं दंडित करने का भाव प्रधान ।4

 

जब सामने वाला हो अपनी गलती मानने को तैयार,

सुधार की संभावना जहाँ दिख रही हो कुछ साकार,

क्यों न दें मौका सुधरने-संवरने का, जब हर कोई यहाँ गलती का शिकार ।5

 

राह यह अनन्त धैर्य की, नहीं यहाँ हो तत्काल कुछ चमत्कार,

उदारता-सहिष्णुता के चरम पर मिले फल मीठे,

वहे अन्त में फिर परिवर्तन की व्यार ।6


यही युगऋषि के सतयुग की बापसी का आधार,

भावसंवेदना की गंगोत्री से ही बहेगी समाधान की शीतल रसधार,

जहाँ तप और योग के शिखर पर होंगे सतयुगी स्वप्न साकार ।7

 

त्याग, बलिदान से भरी यह राह प्रकाश पथ की

शूरवीरों को देनी पड़ी हैं, अग्नि परीक्षाएं अनगिन वार,

नहीं यह राह फूलों की, होंगे असुरता के पग-पग पर प्रहार ।8

 

तमस से ज्योति का, असत्य से सत्य का,

मृत्यु से अमरता की यह राह विरल,

पंगडंडियों में नहीं, राजमार्ग से होगा, यहाँ मंजिल का संधान ।9

 

झूठ, असत्य, अधर्म कितना भी हो प्रबल, मायावी,

सत्य, धर्म, इंसानियत की तय अंतिम विजय महान्,

धर्म की आभासित हार के पीछे महाकाल की चेतना विकराल ।10

सब कुछ वर्दाश्त कर सकती है यह पराचेतना,

नहीं इसे अपने भक्तों से अन्याय, अत्याचार, ज्यादती स्वीकार,

होते हैं हर युग में इसीलिए महाशक्ति संग परमपुरख के अवतार ।11

 

अतः बनें विनीत, सरल, धर्मनिष्ठ, तज क्षुद्र स्वार्थ-अहंकार,

 बनें युगसाधक सृजन पथ के, युगऋषि की दर्शायी राह से हो प्यार,

रहे सत्य, धर्म, औचित्य, आत्म-सुधार, परिमार्जन के लिए सदा तैयार ।12


रविवार, 11 अक्टूबर 2026

जीवन गीत – छोटा सा जीवन इस धरा पर नश्वर

धुन में सम्यक-बोध संग बढ़ते रहना चाहिए

जहाँ खड़े हो, वहीं से आगे बढ़ते रहो,

हाँ, इसके लिए अपनी यथास्थिति का अहसास होना चाहिए ।1

नहीं यह संभव, बिना कुछ पल स्वयं संग बिताए,

आत्म-विश्लेषण, चिंतन-मनन, जीवन मंथन करते रहना चाहिए ।2

फिर, जीवन दृष्टि, समझ की सीमा अपनी,

स्वाध्याय - साधु संग इसका दायरा बढ़ाते रहना चाहिए ।3


इनसे मिला ज्ञान न रहे अधूरा, अपच,

इसको अमली जामा पहनाते रहना चाहिए ।4

बढ़े कदम नहीं जरुरी, छोटे कदम काफी,

गति धीमी सही, अनवरत बढ़ते रहना चाहिए ।5

राह में मिलेंगे एकतरफा सरपट दौड़ते वाहन भी बहुत,

तुम्हें अपनी धुन में, सम्यक बोध संग बढ़ते रहना चाहिए ।6 

मंजिल का नहीं महत्व कुछ अधिक,

राह के एडवेंचर का आनन्द भरपूर लेते रहना चाहिए ।7

अपने लिए तो जी लेते हैं, मरते हैं सभी,

परहित सेवा का सुकून भी कुछ अनुभव होना चाहिए ।8

है छोटी सी यह जिंदगी, इस धरा पर नश्वर,

शाश्वत संग, जीवन के स्रोत से जुड़े रहना चाहिए ।9

सोमवार, 24 अगस्त 2026

जीवन गीत - काल की नज़ाकत समझने की समझदारी

 


मोहभंग का दर्द मीठा, बढ़ चल मोहमाया के उस पार 

एक घरोंदे में दशकों से रहने की आदत,

वहाँ से मोह का पलना है स्वाभाविक।1

लेकिन परिवर्तन का शाश्वत चक्र, प्रकृति का अपना विधान,

अपनी संतान के विकास का, जिसको है पूरा ध्यान।2

वर्तमान में ही अटके रहोगे, तो आगे कैसे बढ़ोगे,

फिर ऐसे में प्रकृति क्यों न रचे अपना कठोर सरंजाम।3

संकेत स्पष्ट उसके, एक-दो नहीं, समय-समय पर अनगिन वार,

लेकिन मोह की प्रकृति कुछ ऐसी, सहज छोड़ने को इसे कौन कहाँ तैयार।4

कई माह चोटिल रखा, शायद, मोह त्याग दोगे, संकेत समझकर अबकी वार,

ठीक होते ही फिर घरोंदा सजाने की कवायद, नहीं छूट रहा मोहविकार।5

देखो फिर प्रकृति की गहन शॉक थेरेपी, लगे जो पीड़ादायक प्रहार,

हो चला मोहग्रस्त जीवात्मा के मर्ज का जड़ से उपचार।6

होंगे तुम्हारे अनगिन परिवार से अधिक किसी कुनवे पर उपकार,

लेकिन प्रकृति प्रेरित एक गलती पर होंगे सारे उपकार कुर्वान।7


फिर नित रंग बदलती इस दुनियाँ में कौन चाहता है दिल से विचार, विमर्श, संवाद,

अगर होता हो इससे  उनका रौव-दौव, रुत्वा वर्चस्व तनिक भी निराकार।8

संभलकर विचरना बदल चुकी फिजाओं में, नहीं जहाँ औचित्य का अधिक सत्कार,

नज़रंदाज कर नादानियाँ मासूमों की, बढ़ चल मोहमाया की सीमा के उस पार।9


समझना मोहभंग का यह आत्यांतिक प्रहार, माँ प्रकृति का अजस्र कृपा विधान,

रहना सजग अढिग अपने स्वधर्म पर, प्रकृति-परमेश्वर खोल रहे नए वितान।10

सबकी अपनी नियति, अपने कर्म, होंगे जो फलित पौध बनकर समय पर कटु तिक्त-मधुर क्रमवार,

तुम तो बढ़ चलो मंजिल की ओर पथिक , समेट मोह-माया सकल, ले मुट्ठी में जीवन का सवक-सार।11


मंगलवार, 30 जून 2026

जीवन दर्शन

 


कृपा उसकी परम मंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास

अल्पज्ञ मनुष्य  नासमझ मूढ़, सर्वज्ञ होने का भ्रम पाल बैठा,

लेकिन प्रकृति की विराटता विकरालता के समक्ष बौना हो बैठा।


माना ईश्वर का अंश, ईशतुल्य, जीव अविनाशी,

लेकिन अपनी मानवीय सीमाओं का भी तो बोध होना चाहिए।


मदहोशी में, अपने सम्यक बोध के अभाव में हो जाती हैं गलतियाँ,

कोई बड़ी बात नहीं, समझ आने पर भूल सुधारने में क्या देरी।

वह सर्वज्ञ सर्वसमर्थ, तुम्हारा सब जाने, अतीत वर्त और भविष्य,

उसकी कालजयी योजना का तुम क्या पार पाओगे।


उसकी दुर्भेद्य प्रकृति का एक झटका लगे कठिन परीक्षा,

जन्मों के संचित कर्म, प्रारब्ध चटकेंगे पल भर में कुछ ऐसे।

तत्काल प्रकृति का क्रूर विधान, अत्याचार, अन्याय लगेगा,

समय के साथ इसके पीछे का करुणा विधान समझ आएगा।


जो नहीं कर पा रहे जन्मों से, वह इसी जन्म में हो जाएगा,

चटांक बुद्धि से न लगाओ तड़का परिस्थितियों के चक्रव्यूह पर।


वह है सत्य शिव सुन्दर, अणु विभू सौम्य, अखण्ड प्रचण्ड विकराल,

उसकी कृपा है परममंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास।


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले नहीं जब कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर।12।

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