रविवार, 24 अगस्त 2014

सावन में देवभूमि कुल्लू की स्वर्गोपम छटा

            यात्रा का आवाह्न देती कुल्लू की मनोरम वादियाँ


 (सावन के माह में यात्रा का यह संक्षिप्त वृतांत कुल्लु घाटी में प्रवेश से लेकर जाणा-नगर की यात्रा पर आधारित है, जिसका अनुभव इस मौसम में किसी भी पर्वतीय क्षेत्र पर न्यूनाधिक रुप में एक आस्थावान प्रकृति प्रेमी कर सकता है)


सावन माह के चरम पर जहाँ समूची धरती हरयाली की मखमली चादर ओढ लेती है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में हरी-भरी वादियाँ, झरते झरने, फलों से लदे बागान और अपनी वृहद जलराशी से गर्जन-तर्जन करती हिमनदियाँ घाटी के सौंदर्य में चार-चाँद लगा देती हैं। ऐसे में अगस्त माह में इन घाटियों में यात्रा का आनन्द एवं रोमाँच शब्दों में वर्णन करना कठिन हो जाता है। इसे कोई घुम्मकड़ स्वामी ही इन वादियों के आगोश में खोकर अनुभव कर सकता है।


हालाँकि वर्षा के कारण यह समय खतरों से खाली नहीं रहता। बादल फटने से लेकर, हिमनदियों में बाढ़, भूस्खलन की घटनाएं आम होती हैं। लेकिन रोमाँचप्रेमी घुम्मकड़ों के मचलते पगों को अपनी तय मंजिल की ओर बढ़ने से ये खतरे भला कब रोक पाए हैं। अपने अंतर के अद्मय एडवेंचर प्रेम व अढिग आस्था के चलते सावन में भी कुछ जाबाँज घाटी के आवाहन को ठुकरा नहीं पाते।

एक आस्थावान यात्री के लिए इस माह की यात्रा किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं होती। हरीभरी वादियों के बीच सफर का आनन्द कोई रोमाँचप्रेमी ही बता सकता है। मौसन में न अधिक गर्मी होती है न ठण्ड। तापमान के सम-स्थिर बिंदु पर हवा का झोंका यात्रा के सफर को और सुहाना बना देता है। घाटियों में इधर से उधर तैरते आवारा बादलों की मस्ती देखते ही बनती है। पर्वतशिखरों को अपनी आगोश में लेते काले-सफेद बादल एक मनोरम दृश्य खड़ा करते हैं।

 
आस्थापूरित अंतःकरण के साथ पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा, एक आध्यात्मिक अनुभव से पूरित हो जाती है। प्रकृति के अलौकिक सौंदर्य के बीच चित्त सहज ही ध्यानस्थ हो जाता है। सहजानन्द की इस अवस्था में यात्री आत्मस्थ हो जाता है। जीवन का उच्चस्तरीय दर्शन चिदाकाश पर सूर्य की भाँति आलोकित हो उठता है। जीवन इन पलों में जैसे समाधि सुख ले रहा होता है। जीवन के सारे द्वन्द-विक्षोभ शांत हो जाते हैं। कल तक भौतिक एवं मानसिक संताप में झुलसता जीवन, आज स्वर्गीय सुख की अनुभूति से सराबोर हो जाता है।

कल तक जो पहाड़ी नाले सूखे पड़े थे वे आज दूधिया धार के साथ पग-पग पर झरते हुए, यात्रियों का स्वागत करते नजर आते हैं। इन झरनों व पहाड़ी नालों से पोषित हिम नदियाँ अपने पूरे यौवन में इठलाती हुई सागर की ओर बहती हैं व उनका उत्साह देखते ही बनता है। राह का शायद की कोई अवरोध, बाधा उनकी त्वरा, उनके उद्दाम वेग को रोकने की सोच सके, इनका सामना करने का दुस्साहस कर सके।


पहाड़ी के शिखर पर स्थित देवालय इस यात्रा को नए मायने दे जाते हैं। पिरामिड नुमा शिखर के दोनों ओर से बह रही हिम नदियाँ, ठीक शिखर के नीचे दिव्य संगम की सृष्टि करती हैं। कुल्लू में स्थित शिखर पर विराजमान बिजलेश्वर महादेव और उनके चरणों को पखारती व्यास एवं पार्वती नदियों का संगम कुछ ऐसा ही नजारा पेश करता है। ऐसे संगम स्थल लोक आस्था में एक तीर्थ का रुप लिए हुए होते हैं।

घाटी में फलों के बागान सफर के आनन्द को बहुगुणित कर देते हैं। राह से सटे फलों से लदे ये बगीचे दावत के लिए यात्रियों को खुला आमंत्रण दे रहे होते हैं। नाना प्रकार के फलों से लदे बागानों को देखकर लगता है कि जैसे प्रकृति ने दोनों हाथों से अपनी संपदा इन घाटियों पर लूटा दी हो। शायद ही ऐसा कोई घर हो जिसका अपना फल का वृक्ष न हो। खुमानी, प्लम, नाशपाती, चेरी, अखरोट, जापानी फल व सेब जैसे स्वादिष्ट फल इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। सेब के लिए तो यह क्षेत्र विशेषरुप से प्रख्यात है। 


गगनचुम्बी देवदार वृक्षों का उल्लेख किए बिना इस क्षेत्र का वर्णन अधूरा ही माना जाएगा। घाटी में प्रवेश करते ही दशहरा मैदान (ढालपुर) से ही देवदार आगंतुकों का स्वागत करते हैं। आगे जैसे-जैसे घाटी का आरोहण करते हैं, इनके सघन वन यात्रियों को दिव्यलोक में विचरण की अनुभूति देते हैं। ऊँचाई पर बांज, बुराँस के जंगल भी पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। शिखर से घाटी का विहंगम दृश्य दर्शनीय रहता है। घाटी के बीच में बहती व्यास नदी पतली चाँदी की धार सी प्रतीत होती है।


ऋषियों की तपःस्थली होने के कारण इस भूमि को ऋषि भूमि के नाम से भी जाना जाता है। बशिष्ट, व्यास, मनु, भृगु, जमदग्नि जैसे ऋषियों की तपःस्थलियों से जुड़े इस क्षेत्र का इतिहास आज भी पुरातन युग की ओर ले जाता है। यहाँ हर गाँव का अपना देवता है, जिनकी आज्ञा-आदेश व मार्गदर्शन की छत्रछाया में ही यहाँ का लोकजीवन संचालित होता है। भगवान श्रीराम जिन्हें यहाँ ठाकुर कहा जाता है, इस क्षेत्र के प्रमुख आराध्य हैं, जिन्हें विश्व प्रख्यात दशहरा मेला के अवसर पर श्रद्धाँजलि देने सभी देवगण ढालपुर मैदान पधारते हैं। इसके साथ यह क्षेत्र शिव-शक्ति की विहार भूमि रही है। नाथ गुरुओं के यहाँ से कई स्थल जुडे हैं। सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी का भी यहाँ के मणिकर्ण क्षेत्र से जुड़ाव प्रख्यात है। कालांतर में यहाँ स्थापित गोंंपा (बौद्ध मंदिर) भी यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं।


कुल्लू मनाली के बीच में स्थित नग्गर (कुल्लु की प्राचीन राजधानी) की चर्चा किए बिना यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। नग्गर में रूस के विश्व विख्यात चित्रकार, पुरातत्वविद, यायावर, विचारक, भविष्यद्रष्टा एवं शांतिदूत निकोलस रोरिक की समाधि व शोध केंद्र स्थित है। सन् 1928 में रूस से यहाँ पधारे रोरिक ने जीवन के अंतिम 20 वर्ष गंभीर सृजन साधना में बिताए थे। इनको जानने वाले भावनाशीलो के लिए इनकी समाधि तीर्थ से कम नहीं है। नगर के इर्द-गिर्द कई दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें जाणा फाल लोकप्रिय है। इसी की राह में देवदार के सघन वनों के बीच यात्रा व नीचे सुंदर घाटियों का अवलोकन बेजोड़ अनुभव साबित होता है।


अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य़ के साथ स्नो लाइन मनाली के समीप होने के कारण कुल्लू घाटी आज पर्यटन के एक प्रमुख हिल स्टेशन के रुप में लोकप्रिय है, जिसके कारण विदेशी मेहमानों का भी यहाँ आगमन बढ़ रहा है। कुछ काल का प्रवाह तो कुछ आधुनिकता का असर परम्पराओं पर साफ नजर आ रहा है। देववाद के साथ जुड़ी बलिप्रथा एवं शराब का बढ़ता चलन तथा युवाओं की अपनी संस्कृति के प्रति उपेक्षा चिंता का विषय है। लेकिन अपनी समृद्ध प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के साथ यह क्षेत्र सांस्कृतिक-सामाजिक उत्थान का सबल आधार लिए हुए है। इसे किस तरह से परिमार्जित किया जाए, सुरक्षित रखा जाए व नई पीढ़ी तक हस्तांतरित किया जाए, यह विचारणीय है। इसी में इस देवभूमि के संतुलित एवं समग्र विकास का मर्म छिपा है।