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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-7 (अंतिम किश्त)

बनतोली से गौंदार, राँसी और घर बापिसी


बनतोली में रात की नींद लेकर सुबह उठते हैं, उठने में काफी मश्क्कत करनी पड़ रही थी, लोअर बैक व पीठ में चोट का तीखा अहसास हो रहा था। लेकिन पूरा जोर लगाकर हम खुद ही किसी तरह उठ गए, यह बड़ी बात थी। तैयार होकर बाहर बरामदे में बैठते हैं, तो सामने घर के बग्ल से बह रही मधुगंगा की गर्जन-तर्जन का शोर सुनने लायक था, पास के हरे-भरे पहाड़ दर्शनीय लग रहे थे, जो सुबह की धूप में खिल रहे थे। यहाँ से गौंदार साइड का नज़ारा भी स्पष्ट था। कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में बसा यह गाँव जैसे पुनः आने का निमंत्रण दे रहा था।

यहाँ से विदा लेकर हम बनतोली संगम तक पहुंचते हैं। रास्ते में संगम व गौंदार साइड का नज़ारा देखने लायक था और दायीं ओर से बह रही मार्कण्डगंगा नदी की सांय-सांय ध्वनि। कुछ ही देर में लोअर बन्तोली से होकर संगम पहुँचते हैं। यहाँ कुछ पल रुकते हैं, सभी अपने-अपने ढंग से रिफ्रेश होते हैं। पुलिया को पार कर कुछ यादगार पल कैमरे में कैद करते हैं।

चढ़ाई को पार करना पहली चुनौती थी, जिसको दोनों साथियों की सहायता से पार करते हैं और ऊपर पहुँचकर झुला पुल के सामने विश्राम करते हैं तथा पीछे के रास्ते का अवलोकन करते हैं कि हम चोटिल अवस्था में ही कैसे 10-11 किमी पार कर चुके हैं। लगा कि ऐसे ही अगले 5-6 किमी भी पूरा कर लेंगे। थकान व चोटिल होने का अहसास गहन था, लेकिन आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। दमभर कर यहाँ से आगे बढ़ते हैं।

यहाँ से रास्ते में लैंडस्लाइड वाले चढ़ाईदार पैच के बाद सीधे रास्ते से गौंदार पहुँचते हैं, जहाँ हमारे बिछुडे सहचर डॉ. मुकेशजी मिलते हैं। नेटवर्क बाधित होने के कारण पिछले दो दिन इनसे संपर्क-संवाद नहीं हो पाया था। आँख मिचौली करते हुए हम लोग एक दूसरे से अलग चल रहे थे। अतः इस अनुभव के आधार पर यह सीख मिली कि टीम के सभी सदस्यों को साथ चलना चाहिए, क्योंकि नेटवर्क की समस्या के चलते कहीं भी एक दूसरे से बिछुड़ सकते हैं। इस रुट पर ट्रेक करने वाले पाठक हमारे इस अनुभव से यह सीख ले सकते हैं। वाकि सब बाबा भोलेनाथ की इच्छा, वो जो करे सो कम है।

गौंदार में हिमालयन होमस्टे के ढावे में पोहा चाय का आर्डर देकर नाश्ता करते हैं। यहीं पर लम्बी दाढ़ी, सर पर हैट, आँखों पर काला चश्मा और रोबिले अंदाज बाले एक बाबाजी से भेंट होती है, लगा भोलेनाथ ही इनसे मुलाकात करवा रहे हों। क्योंकि जीवन के कुछ अनमोल विचार मोती इनसे मिलने वाले थे। भारत की सुरक्षा सेवा से रिटार्य ये सज्जन हिमालय के हर ट्रेक, दर्रे व बुग्याल का चप्पा-चप्पा छान चुके हैं और मोटर वाईक में हिमालय में स्थित मुख्य देशों को सोलो बाइक राइडर के रुप में कवर कर चुके है, जिसका इनके नाम गिन्निज बुक रिकॉर्ड दर्ज है। पहले तो हम लोग औपचारिक बात ही करते रहे, लेकिन जब बातों-बातों में इनकी खूबियों से परिचित होते हैं, तो संवाद गहरा होता गया।

धीरे-धीरे हम इनसे खुलते हैं और चाय-नाश्ते पर गहन-गंभीर चर्चा होती है, इनके सात-साढ़े सात दशक के जीवन के मंथन से निकले अनुभूत सुत्र सीधा ह्दय को भेद रहे थे, अंतरात्मा को स्पर्श कर रहे थे। हमारे हिमालय, प्रकृति व अध्यात्म प्रेम को देखते हुए इन्होंने विश्व विख्यात योगी स्वामी राम की लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्ज पुस्तक का सुझाव दिया, जिसको ये कई बार पढ़ चुके थे। पढ़ने के वाद हम भी हिमालय प्रेमी जीवात्माओं को इस पुस्तक पढ़ने का सुझाव देते हैं। पुस्तक में हिमालय की गोद में साधु महात्माओं, सिद्धों व योगियों के दुर्लभ संस्मरण भरे हुए हैं, साथ में अध्यात्म पथ की अनुभूत सीख निहित है। साथ ही युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्य़जी की पुस्तक सुनसान के सहचर को भी पढ़ने का सुझाव देते हैं, जिसमें आचार्य़जी के दुर्गम हिमालय में बिताए पलों को बहुत ही रोचक, रोमांचक एवं प्रेरक यात्रा वृतांत उपलब्ध हैं, जो पाठकों को हिमालय की गोद में प्रकृति के हर घटक से कुछ सीखने की प्रेरणा देती है।

इनसे बिदा लेकर फिर हमारा चार लोगों का दल एक साथ राँसी के लिए निकल पड़ता है। रास्ते में लोहे की पुलिया के उस पार पहली चुनौती पर काम चल रहा था और इस बार हम ढलानदार निर्माणाधीन चौढ़े रास्ते से होकर ऊपर मुख्य मार्ग तक पहुँचते हैं। संभवतः खच्चरों के लिए यह रास्ता तैयार किया जा रहा था। पूरे दल के सहयोग व डॉ. सौरभजी के पीठ से सहारा लेते हुए चढाई पार होती है। इस पैच पर काम देखते हुए लगा कि अगले दिनों यह रास्ता यात्रियों के लिए सरल-सामान्य हो जाएगा।

आगे जिगजैग सड़क से होते हुए वही विरान गाँव, नीचे मधुगंगा, उस पार जंगल और झरने, रास्ते का वही चट्टान काटकर बना मार्ग और फिर पहाड़ी झरने पर बना वह छोटा सा तालाव। रास्ते में जिगजैग रास्ते से कुछ साहसी युवा शॉर्टकट मार चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जो किसी रुप में सुरक्षित नहीं था। इन पत्थरीले शॉर्टकट्स में पत्थरों के स्लाइड होने व स्वयं भी फिसल कर गिरने का खतरा किसी भी दुर्घटना का कारण बन सकता है। अतः यात्रियों को सुझाव दिया जाता है सीधे राजमार्ग से ही अपनी यात्रा भोलेनाथ को याद करते हुए कुशलतापूर्क पूरा करें।

रास्ते में प्यास कुछ इस कदर लग रही थी कि जहाँ भी जल का स्रोत दिखता, लगता कि इसे पूरा पी डालें। साथ में पहाड़ी चश्मे का जल व नींबूज हमारी इस प्यास का शमन कर रहे थे। झरने के पहले घाटी में किसी पेड़ में छिपे पपीहे पक्षी की आबाज़ का दर्द हम आज पहली बार इतनी गहराई से अनुभव कर रहे थे, जो माना जाता है कि वरसात के जल से पतों पर एकत्र होने वाली बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है।

रास्ते में एक पाइप से ऊंचे किसी चश्मे का जल सड़क तक आ रहा था, इससे अपनी बोटल भरते हैं। इसी के कुछ दूरी पर झरने से बना तलाव था। हमारे साथी इसमें डूबकी लगाने व स्नान का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हम भी इसका जल अपनी बोटल में भरना नहीं भूले। यहीं पास के स्टाल में पहाड़ी लूण (नमक) लगे खीरे की दो प्लैट लगाते हैं, जिसका स्वाद प्यासे मन को अलग ही अंदाज में तृप्त कर रहा था।

फिर चल पड़ते हैं चीढ़, बाँज व अन्य हरे-भरे वृक्षों के बीच अगतोलिधार की ओर, जो अब मुश्किल से दो-अढाई किमी रहा होगा। रास्ते में एक छोटा सा जलस्रोत, इससे झरती जल की सहस्र धाराएं मिलती हैं, लगा कि यह इस रुट का अंतिम झरना है। यहाँ बैठकर कुछ पल बिताते हैं, इसकी कल-कल बहती धार को जेहन में उतरते अनुभव कर शांति व शीतलता का गाढ़ा अहसास पाते हैं।


साथ ही इसकी यादगार क्लिप बनाते हैं, इन अनमोल पलों को पुनः स्मरण करने के लिए। इसके स्पर्श के साथ रिफ्रेश होकर कुछ ही मिनट में हम बेरिकेट के पास थे, जहाँ से आगे यात्रियों की मोटर बाइक्स और गाड़ियां खड़ी थीं। स्टेंड पर पहुंचकर एक जीप में बैठकर राँसी पहुँचते हैं। रास्ते में दूर से ही भगवती राकेश्वरी माता को प्रणाम करते हैं, क्योंकि अब बापिसी में वहाँ तक चलना हमारे लिए संभव नहीं था।

राँसी में खड़े वाहन में समान लादकर चल पड़ते हैं, बापिसी के सफर में। हमें आश्चर्य हो रहा था कि हम सही सलाम अपनी चोटिल अवस्था के साथ 16 किमी ट्रेक पूरा कर चुके थे। हमारा व साथियों का श्रम, सहयोग, शौर्य, पराक्रम व टीम भाव किसी भी रुप में महावीर चक्र विजेता से कम नहीं लग रहा था। बाकि भोले बाबा व भगवती की कृपा, गुरुसत्ता का संरक्षण सब मिलकर हमें यहाँ तक सकुशल पहुँचा रहे थे। बाकि शरीर की टुटफूट की मुरम्मत अब घर जाकर चिकित्सा मंदिर (हॉस्पिटल) में होनी थी।

रास्ते में उनियाना के सीढ़ीदार खेत को कैप्चर करना नहीं भूले। इसी तरह मधुगंगा का पुल, फिर मोनसुना मार्केट, रास्ते का झरना व फिर ऊखीमठ। यहीं रास्ते में एक ढावे में भोजन करते हैं, लस्सी के साथ पूर्णाहुति करते हैं, अब कुछ भूख खुल गई थी। यहाँ से अगस्तमुनि होते हुए रुद्रप्रयाग पहुंचते हैं इसके आगे भयंककर बारिश शुरु हो गई थी, पहाड़ से गिरते पत्थर ने रास्ते को थाम रखा था। रास्ता जाम था, वग्ल के होटल से चाय मंगाकर चाय की चुस्की का आनन्द लेते हैं। आधे घंटे बाद रुट खुलता है, पहाड़ से सरकते पत्थरों के बीच ही किसी तरह आगे बढ़ते हैं और श्रीनगर पहुंचते हैं। यहाँ आसमान में डूबते सूरज की लालिमा बादलों के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रही थी। आगे रास्ते में अंधेरा हो चुका था, अंधेरे के बीच सरपट दौड़ता वाहन कब तोता घाटी पार करता है, पता ही नहीं चला और हम ऋषिकेश पहुँच चुके थे। रास्ते में रायवाला में रात का भोजन और फिर रात ग्यारह बजे परिसर में पहुँचते हैं।

बाबा का बुलावा पूरा हो चुका था, उनके दिव्य प्रसाद के साथ, लगा हमारे किसी जटिल प्रारब्ध का हल्के में उपचार हो रहा था और अब इनकी सफाई धुलाई शेष थी। इस क्रम में चिकित्सकों से परामर्श, तन की आधि का निदान, फिर तीन दिन की अस्पताल भर्ती और बेड रेस्ट। इसी के बीच कुछ समय निकालकर यात्रा की स्मृतियों की जुगाली करते हुए यह यात्रा वृतांत तैयार होकर आप तक पहुँच रहा है। लगभग डेढ़ दो माह बाद आंशिक रुप से बाहर निकलना शुरु हो गया है।

अंत मैं इस यात्रा के सार सबक एक बार पुनः एक जगह उन सुधी पाठकों के लिए शेयर करना चाहूँगा, जो हमारी तरह महमहेश्वर या किसी अन्य लम्बे ट्रेक पर ट्रेकिंग या तीर्थाटन के लिए निकलने वाले हों –

  • 1.    कभी भी हमारी तरह उठकर यात्रा पर न निकलें, विशेषकर जहाँ ट्रेक लम्बा हो। इसके लिए तीन-चार सप्ताह पहले नित्य पाँच किमी चलने का अभ्यास करें। नित्य न्यूनतम दस हजार कदमों को चलने का अभ्यास तो सदा ही करते रहें। इतना करने पर यात्रा आनन्दपूरित रहेगी, अन्यथा यात्रा एक सजा देने वाला अनुभव बन सकती है।
  • 2.    अपने बजन पर अवश्य ध्यान रखें, अपनी ऊंचाई व उम्र के हिसाब से बजन को दुरुस्त रखें। आवश्यकता से अधिक शरीर का बज़न लम्बे ट्रेक पर एक बोझ बनता है औऱ गिरने पर अधिक चोटिल होने की संभावना रहती है।
  • 3.    पीठ के बैग को जितना हल्का हो सके रखें। अति आवश्यक कपड़े व अन्य समान ही साथ रखें। खास कर लम्बी दूरी के ट्रेक पर या ऊंचाई पर चढ़ते हुए जब शरीर को ढोना ही कठिन पड़ने लगता है, तो अनावश्यक सामान का बोझ यात्रा के आनन्द पर भारी पड़ने लगता है।
  • 4.    सभी एक साथ यात्रा करें, थोड़ा आगे पीछे भी होते हैं, तो नजरों से ओझल न हों, दलनायक की देखरेख में रहें व मिलकर सफर पूरा करें। एक दूसरे से बिछुड़ने पर कई रुपों में यात्रा के आनन्द में खलल पड़ सकता है।
  • 5.    आवश्यक फर्स्ट एड व दवाईयाँ साथ में रखें, एक व्यक्ति के पास इन्हें रख सकते हैं, लेकिन आवश्यक दवाइयों सभी अपने बैग में रखें, किसी कारणवश बिछुड़ने पर फिर ये काम आ सकेंगी।
  • 6.    नए रास्ते पर स्थानीय लोगों से मार्गदर्शन लें, आवश्यक हो तो गाइड भी ले सकते हैं। रात के सफर करने से बचें, अंधेरे में ट्रेक के जोखिम भरे बिंदुओं को पार करने में दिक्कत आ सकती है, दुर्घटना भी हो सकती है।
  • 7.    एक ही दिन में यात्रा पूरी करने की जिद्द न रखें। यात्रा में मंजिल पहूंचना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, रास्ते का पूरा आनन्द लेते हुए चलना ही श्रेष्ठ नीति रहती है, अतः एक-दो दिन का मार्जन अवश्य रखें।

इतना ध्यान रखेंगे, तो आप यात्रा या ट्रेकिंग या तीर्थाटन का पूरा आनन्द ले पाएंगे और उस मकसद को बखूवी पूर्ण कर पाएंगे, जिसको लेकर आप इस यात्रा पर कदम बढ़ाए थे।

महमहेश्वर यात्रा के पिछले 6 ब्लॉग नीचे दिए लिंक्स में पढ़ सकते हैं -

भाग-1,हरिद्वार से उखीम

भाग-2,उखीमठ से रांसी

भाग-3,रांसी से गौंदार

भाग-4,वनतौली से नानू चट्टी

भाग-5, नानू से मदमहेश्वर

भाग-6, महमहेश्वर से बनतोली


गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-4



बनतौली से नानू चट्टी

मालूम हो कि मार्कंडगंगा बुढ़ा केदार की ओर से नीचे प्रवाहित होती हैं, जबकि मधुगंगा मदमहेश्वर की ओर से। संगम पर कुछ पल मधुगंगा और मार्कंडगंगा का आलौकिक दृश्य निहारते हुए विश्राम करते हैं। और फिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर बसे बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे।

यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे। रांसी से गौंदार व संगम तक पिछले 6 किमी की उतराई के बाद अब चढ़ाई के संग यात्रा का पहला अनुभव मिल रहा था। साथ ही रास्ते से नीचे संगम व दूर गौंदार साइड के दर्शन हो रहे थे। हम नीचे लगभग 5000 फीट की ऊँचाई से चढना आरम्भ किए थे व हर दो किमी पर औसतन एक हजार फीट ऊंचाई चढ़ रहे थे। अगले 10 किमी में हम लोग लगभग 5000 फीट से अधिक ऊंचाई चढ़ने वाले थे। इसीलिए इस ट्रेक को केदारनाथ ट्रेक से अधिक टफ माना जाता है।

बनतौली-2 में भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं, जहाँ परौंठा, अचार, घर की दहीं और चाय के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं। संयोग से बापिसी में अगले दिन भी यही हमारे रात के रुकने का ठिकाना बनने वाला था। पेटभराऊ नाश्ते के बाद बनतौली से हमारा मदमहेश्वर की ओर का सफर शुरु होता है।

प्रारम्भ में ही बनतोली से दूसरी लम्बी जिगजैग सड़क के  किनारे स्थान-स्थान पर लोगों को खड़े देखा। शुरु में लोगों का यह जमाबड़ा समझ नहीं आया। लेकिन थोड़ी देर में पता चला कि यहाँ से नेटवर्क ठीक-ठाक चल रहा था। निश्चित ही सभी अपने घर-परिवार को अपनी यात्रा की कुशल-क्षेम का संदेश साझा कर रहे थे, क्योंकि आगे नेटवर्क बाधित होने वाला था। यहीं पर महमहेश्वर से आ रहे पर्यटकों से अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने की कवायद भी शुरु हो गई थी।

इस छोर पर एक बड़ी सी चट्टान के बीच से रास्ते आगे खुलता है। इससे ठीक आगे दायीं ओर एक बालक बुराँश व कोल्ड ड्रिंक्स का ठेला लगाए था। संयोग से ठीक इसके सामने सड़क के दूसरी ओर बुराँश का एक युवा पेड़ दिखा, हालांकि अभी इसमें फूल नहीं थे। फूलों का सीजन समाप्त हो चुका था, जो अमूनन अप्रैल अंत से मई तक रहता है। बुराँश के पहले पेड़ के दर्शन के साथ मैं रोमाँचित था, क्योंकि इसके गहरे हरे लम्बे पत्तों के गुच्छ इसको विशेष बनाते हैं और इसके फूलों के साथ बचपन की गई यादें जुड़ी हुई हैं, सो इसको देखकर उन सुखद स्मृतियों का उभरना स्वाभाविक था। यह भी मालूम हो कि बुराँश बर्फिली ऊँचाईयों में ही उगता है, जिसके सुर्ख लाल रंग के फूल देखते ही बनते हैं। इनसे चटनी से लेकर जूस तैयार होते हैं, जिन्हें औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।

यहाँ एक कुर्सी पर बैठकर बुराँश का एक गिलास पीते हैं, जो पूरी तरह से स्वाद में लाजबाव और तृप्तिदायक रहा। आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे कितने जिज्ञासु यात्रियों को भी बुरांश के लाभ व इसके पेय के लिए प्रेरित करता रहा, लगा कि बापिसी में यहाँ से बुराँश की एक बोटल खरीद लूंगा।


यहाँ से तरोताजा होकर आगे बढ़ते हैं। इसके आगे रिंगाल का जंगल शुरु होता है। सड़क के दोनों ओर इनका हराभरा जंगल व संगसाथ अगले दो जिगजैग रास्ते तक मिलता रहा। इसके वाएं छोर पर अब मार्कंड गंगा के दर्शन हो रहे थे। जो ऊंचे पहाड़ों के होकर संकरी घाटी के संग पूरी गर्जन-तर्जन करती हुई मधुगंगा से मिलने उतर रही थी। अगले दो-तीन जिगजैग रास्तों तक वाईं ओर इसके दूरदर्शन व नैसर्गिक सांय-सांय करता निनाद हमारी यात्रा का सहचर बना रहा।

अब हम एक ऐसे मोड़ पर थे, जहाँ मार्कंडगंगा के दर्शन नहीं हो रहे थे, बल्कि दायीं ओर से मधुगंगा की गर्जन-तर्जन सुनाई दे रही थी। यहाँ हम एक ऐसे बिंदु पर थे जहाँ एक साथ देवदार, बुराँश, चीड़, रिंगाल, बाँज के वृक्षों व कुछ पहाड़ी लतादार झाडियों के दर्शन हो रहे थे। पृष्ठभूमि में मार्कण्ड गंगा की ओर के बादल से ढके बर्फ से ढके पहाड़ झाँक रहे थे।

यहाँ पास के एक सरकारी टीन शेड़ में विश्राम के लिए रुकते हैं। कई यात्री यहाँ विश्राम कर रहे थे व हल्की रिफ्रेशमेंट ले रहे थे। यहाँ वाएं कौने पर बाहर एक बड़ा सा हरा-भरा छायादार पेड़ हवा में अपने बड़े व चौड़े पत्तों को फहरा रहा था, जो हमारे लिए नया था व इसका नाम पता नहीं चल पाया। रिफ्रेश होकर हमलोग यहाँ से आगे चल देते हैं।

आगे की चढ़ाई को पार करने के बाद अगला स्टेशन था खट्टरा चट्टी पहुँचते हैं, जिसे हम अनजाने में रास्ते भर खटारा बोल रहे थे। यहाँ समतल मैदान पर दो-चार भवन बने थे। हाँ रास्ते में पिछले मोड़ पर कुछ तम्बू सड़क के ऊपर-नीचे सजे थे, जो राहगीरों के विश्राम-भोजन एवं रात को रुकने की उचित व्यवस्था किए थे। खट्टरा के गेस्ट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी। यात्रियों के लिए बाहर आंगन में तम्बु भी सजे थे।

बाहर थोड़ा आगे पानी के सिलेंडर आकार की सिमेंट टंकी दिखी, जिसमें एक लकड़ी से छेद बन्द कर रखा था और इसके खोलने पर पानी की धार बह निकलती। यहीं से अपनी प्यास बुझाकर और फिर पानी की बोतल को भर आगे बढ़ चलते हैं। यहीं छायादार पेड़ के नीचे कुछ लोग विश्राम कर रहे थे। मालूम हो कि बनतोली से लेकर महमहेश्वर तक रास्ते में कोई पानी का चश्मा नहीं मिला। ऊँचाई में किसी चश्मे के प्राकृतिक जल स्रोत से पाइप के सहारे पूरी लाइन में जल का वितरण हो रहा था, ऐसा समझ में आया।

खट्टरा से लेंडस्केप में कुछ नयापन दिखता है। एक तो भवनों के नीचे मधुगंगा की ओर ढलान पर छोटे-छोटे खेत दिखे, संभवतः यहाँ आलू व अन्य सब्जियों को उगाते होंगे। दूसरा यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने मधुगंगा के प्रवाह की रेखा और पूरी घाटी के दर्शन होते हैं, जिसका नज़ारा फिर कून चट्टी से थोड़ा पहले तक अलग-अलग एंग्ल से पथिकों के मन को लुभाता रहता है।

मधुगंगा के उस पार संकरी घाटियों में नदी से बना एक बड़ा सा झरना मधुगंगा में प्रवाहित हो रहा था, जिसकी शोर करती वृहद दुधिया जलराशि के दर्शन इस पार से ही हो रहे थे। और थोड़ा आगे बढ़ने पर इनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियों के दर्शन आल्हादित करते हैं।


महमहेश्वर की ओर के दर्शन अभी नदारद थे। अभी हम अगले स्टेशन नानू चट्टी के दर्शन के लिए वेताब थे, जो अभी दृष्टि से ओझल थी।

खट्टरा से नानू चट्टी मात्र दो किमी आगे बतायी गयी थी, लेकिन खड़ी चढ़ाई के संग चढ़ते-चढ़ते लगा कि 2 किमी खत्म ही नहीं हो रहे। रास्ते में दो-तीन चाय-नाश्ते के ठिकाने भी मिले, लेकिन नानू चट्टी दृष्टि से ओझल ही रही। नानू चट्टी कितनी दूर है, तो ऊपर से नीचे आ रहे यात्रियों का एक ही उत्तर रहता कि बस आने वाली है, थोड़ी दूर है। लेकिन नानू चट्टी के दर्शन ही नहीं हो रहे थे। थकान कुछ इस कदर हावी हो रही थी कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने विश्रामस्थलों पर बैठ जाते। चट्टानी आसन पर बैठ नीचे मधुगंगा की सांय-सांय ध्वनि व उधर से इसमें गिरते झरनों को निहारते रहते।

अगले पडाव में एक बड़े से बाँज वृक्ष के नीचे आराम करते हैं, जिसकी सघन छाया में कई लोग विश्राम कर रहे थे। नीचे तो सीधी मधुगंगा की खाई थी, लेकिन उस पार के नजारे खुबसूरत थे। अगले मोड़ पर सड़क टूट गई थी, इस पर स्थानीय मिस्त्रियों द्वारा काम चल रहा था।

इसके अगला मोड़ पार कर एक समतल स्थान पर बैठते हैं, जहाँ से नीचे पास के जंगल का नजारा दर्शनीय लग रहा था। थकान के बीच इन दृश्यों को निहारते हुए नई ऊर्जा पाते रहे और अगले पड़ाव पर देवदार का छोटा सा जंगल दिखा, जिसे देख मन प्रमुदित हुआ, क्योंकि ऐसा नजारा अभी तक नहीं दिखा था। नीचे से कुछ साहसी लोग शॉर्टकट की खड़ी चढ़ाई से भी आ रहे थे, लेकिन इनमें से कुछ लोगों की हालात देखकर लग रहा था कि एक  कदम की चूक कितनी भयंकर दुर्घटना में बदल सकती थी।

ऊप से नीचे गुजर रहे यात्रियों से आश्वासन मिला कि बस 80 मीटर आगे नानू चट्टी आने वाली है। सही कहें खट्टरा से नानू की 2 किमी की चढ़ाई में नानी याद आ रही थी। हालाँकि हमें लगा कि दूरी 2 किमी से अधिक थी। 3 किमी रही होगी। चढाई में 3 किमी पीठ में लदे बड़े बेग औऱ कंधे में टंगे दूसरे बैग के साथ हमारी उम्र के यात्री के लिए यह एक कठिन परीक्षा बन गई थी।

लगा कि इस रुट की माँग अधिक फिटनेस की माँग कर रही थी। हम अचानक बने इस प्रोग्राम में उठकर चल दिए थे, सोचा था कि अब तक का ट्रेकिंग अनुभव काम आएगा। जबकि इस रुट के लिए तीन-चार सप्ताह पहले आवश्यक फिजिक्ल फिटनेस की तैयारी की जानी थी। खैर अब आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे, आगे का रास्ता भी इसी तरह पार करना था।

रास्ते में कुछ संगीत प्रेमी लोग अलग-अलग संगीत यंत्रों में भजन से लेकर मनपसंदीदा फिल्मी गीतों की धुन के साथ आगे बढ़ रहे थे। हालाँकि वन विभाग का नोटिस खट्टरा के आसपास चस्पा था कि आप वन अभियारण क्षेत्र से गुजर रहे हैं और यहाँ किसी तरह का संगीत या शोर करना मना है, पकड़े जाने पर जुर्माना भी लिखा हुआ था। क्योंकि वन्य जीवन इससे परेशान हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके बारे में सचेत भी किया, वे मान भी गए। लेकिन आगे लगा कि भोले के भक्तों को हम इंसान क्या व कितना समझा सकते हैं, वे स्वयं ही समझा देंगे।

एक वस्ती के दर्शन होते ही लगा कि चिरप्रतिक्षित नानू चट्टी आ गई। लेकिन अभी भी वह थोडा दूर थी। हल्की बारिश शुरु हो गई थी। रास्ता थोड़ा फिस्लनभरा हो रहा था। यहाँ जल स्रोत के पास खच्चरों का झुण्ड अपनी प्यास बुझा रहा था।


हम भी ऊपर बने छत्तदार भवन में रुकते हैं। लेकिन वहाँ की भीड़ को देखकर लगा कि यहाँ किसी तरह की रिफ्रेशमेंट लेना काफी समय ले सकता है।

हमारी टीम के युवा साथी डॉ. सौरभजी तब तक पास में खच्चर वालों से मोलभाव कर रहे थे। पता चला कि एक खच्चर की कीमत हमारे बजन के व्यक्ति के लिए 5000 रुपए रहेगी। जो हमारी यात्रा के पूरे बजट से अधिक थी। लगा इससे तो बेहतर धीरे-धीरे चलते रहेंगे। अब आगे 2-3 किमी दूर कून चट्टी है और फिर 2-3 किमी पर मदमहेश्वर। बीच में डेढ़ किमी बाद एक अन्य चट्टी आने वाली थी। बैग का सामान आपस में एडजेस्ट करते हुए हमारा पीठ का बैग थोड़ा हल्का हो गया था। और हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे। (जारी...शेष अगले भाग-5, नानू से महमहेश्वर में)

सोमवार, 6 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-3

रांसी से गौंदार

8जून2026, सोमवार - रांसी से 2 किमी आगे अगतोलीधार पड़ता है, जहाँ गाड़ियों की कतारें सड़क के साथ खड़ी थीं और उसके आगे बाइक्स की कतारें लगीं थी। सभी यात्री अपने बाहन यहीं छोड़कर मदमहेश्वर ट्रेक के लिए निकले थे। सुरक्षा की दृष्टि से हम अपना वाहन कोमल होमस्टे के पास खड़ा कर दिए थे।

अगतोलिधार से लगभग दो अढाई सौ मीटर के बाद बैरिकेट लगा मिला, जहाँ से आगे किसी भी प्रकार के वाहनों का प्रवेश निषिद्ध था। वैरिकेट को पार कर हम सभी पैदल चलते हैं। यहीं से सूर्योदय का दृश्य देखकर हम थोड़ा ठिठक जाते हैं और इसको कैप्चर करने का प्रय़ास करते हैं। लेकिन यहाँ का सूर्योदय समय ले रहा था, लगा कई पहाड़ियों के पीछे से जैसे उसका उदय हो रहा है, सो हम चलते रहे।

अगतोलीधार, सूर्योदय का अलौकिक दृश्य

फिर कुछ मिनट बाद रास्ते में सूर्य भगवान के दर्शन होते हैं, उनको प्रणाम कर अपना यात्रा अभियान जारी रखते हैं। बीच में दायीं ओर नीचे उतरता एक पैदल रास्ता दिखा, जो रांसी-मदमहेश्वर के पुराने रुट का एक लिंक रोड़ था।

रास्ते का प्राकृतिक परिवेश – हम हरे-भरे पहाड़ की गोद में आगे बढ़ रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों का दीदार हो रहा था, साथ में ऊतीश, जंगली झाडियां व हरे-भरे पेड़ सफर का खुशनुमा अहसास दे रहे थें। पक्षियों की चहचाहट इस अहसास में मस्ती और शांति का एक नया रंग घोल रही थी।

हरे भरे वृक्षों के संग निर्माणाधीन ट्रेक

रास्ते में छोटे झरने व जलस्रोत मार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। ट्रेकरों व तीर्थयात्रियों के समूह आगे-पीछे पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे थे। इस रुट पर युवाओं की संख्या अधिक देखकर सुखद आश्चर्य़ हुआ कि वे अपने समय का सार्थक नियोजन कर रहे हैं, क्योंकि ऐसी यात्राएं जीवन में वो अनुदान-वरदान दे जाती हैं, जो घर बैठे संभव नहीं। घर में व्यक्ति परिवार और समाज की मोह माया में ही उलझा रहता है, जबकि इससे बाहर निकलकर प्रकृति की गोद में विताए कुछ पल जीवन में सार्थकता का गहरा बोध देने वाले सावित होते हैं।
रास्ते के जल स्रोत

रास्ते में नीचे मधुगंगा के दर्शन बीच-बीच में हो रहे थे और उसके पार दूसरी ओर गगनचुम्वी हरे-भरे पर्वतों के साथ संकरी घाटियों से निकलते झरने ध्यान आकर्षित कर रहे थे। लगा जून में जब इतने झरने रास्ते में दिख रहे हैं, तो जुलाई-अगस्त के मोनसून सीजन में तो यहाँ इनकी भरमार रहती होगी। और इसके साथ भूस्खलन की कल्पना का भय भी आशंकित कर रहा था।

रांसी से गौंदार के शुरुआती पड़ाव पर गगनचुंबी चीड़ वृक्षों के संग

मार्ग में एक बड़ा नाला दूर से ही अपने कल-कल निनाद के साथ रोमांचित करता है, इसी पर एक छोटी सी झील बनी थी।

पहाड़ी झरने से बना शांत ताल

आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते के इस विशिष्ट आकर्षण के संग यात्रियों का जमाबड़ा इसके किनारे सेल्फी के साथ ग्रुप फोटो लेने में मश्गूल था। हम लोग भी इसका लोभ संवरण नहीं कर पाए और कुछ यादगार फोटो खींचते हैं। इसके साथ ही थोड़ी दूर पर चाय-नाश्ते का एक ढावा मिला, जहां कुछ यात्री विश्राम के साथ पेट-पूजा कर रहे थे।

यहाँ के हरे-भरे परिवेश के आगे का मार्ग चट्टान काट कर बना है,

गौंदार की ओर बढ़ता निर्माणाधीन चट्टानी ट्रेक

रास्ते में इन चट्टानों पर पहाड़ी छिपकली के दर्शन होते हैं, जो मटमेले या घूसर रंग की होती है, हम तो इसे स्थानीय भाषा में चपाड़ कहते हैं। छिपकली से अधिक इसे गोह परिवार का छुठभई सदस्य मान सकते हैं। स्वयं में मस्त-मगन यह जीव किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। यह सामान्य छिपकली की तरह घरों में नहीं पाया जाता। रास्ते भर चट्टानों पर, स्लेट वाले घर की छतों पर इसके दर्शन होते रहे। यह इन चट्टानी आवास में क्या खाता-पीता होगा, एक शोध का विषय लगा।

गौंदार की ओर की महमहेश्वर घाटी

चट्टानी रास्ते को पार कर सामने दूर गोंडार के दर्शन शुरु हो जाते हैं, साथ ही नीचे मधुगंगा के दर्शन व सांय-सांय निनाद बीच-बीच में सुनने को मिल रहा था।   और थोड़ी देर में पास ही ऊँचाई में विरान स्थल पर एक पहाड़ी गाँव दिखता है। कल्पना करता रहा कि यहाँ लोग प्रकृति की गोद में कितनी शांति-सुकून से रहते होंगे। रास्ते में सड़क के चौड़ीकरण का काम चल रहा था, कुछ सिविल इंजीनियर धागे व यंत्रों से नाप ले रहे थे।

गौंदार की ओर बढ़ते खच्चर सवार

जिगजैग सड़क के साथ हम आधे घंटे में ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ रास्ता काटने वाली जेसीबी मशीन खड़ी थी। अर्थात इसके आगे अभी रास्ता कटना शेष था।

यहीं से पतली पगडंडी के सहारे नीचे उतरते हैं। बीच में 20 मीटर का खड़ी ढलान वाला छोटी सीढ़ियाँ काटकर बनाया रास्ता मार्ग की पहली चुनौती लगा। यहाँ एक कदम की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती थी। दिन के उजाले में ही जब यह इतना चुनौतीपूर्ण लग रहा था, तो रात को तो किसी नौसिखिए या बिना गाइड़ के यात्री को इस रास्ते पर चलने की सलाह नहीं दी जा सकती। किसी तरह हम सब व शेष यात्री सही सलामत यहाँ से नीचे उतरते हैं। नीचे कुछ दूरी पर हमारी पगडंडी पुराने समतल रास्ते से मिलती है, जो रांसी-महमहेश्वर का पारम्परिक रास्ता भी रहा है। यहाँ से आगे का मार्ग चौड़ा व सीधा गौंडार की ओर बढ़ता है।

पहाड़ी झरने का खुबसूरत दृश्य

बीच में एक झरना व नाला पड़ता है, जिस पर लौहे का पुल बना है।

लोहे की पुलिया और गौंदार की ओर बढ़ता समतल ट्रेक

इसके दाएं किनारे पर एक ढावा कहें या चट्टी में यात्रियों के चाय-नाश्ते की उचित व्यवस्था दिखी। पानी के स्रोत के पास ऊतीश के हरे चमकीले पत्तों वाले पेड़ वहुतायत में दिखे, जो इसके लिए आदर्श स्थल रहते हैं। झरने के बाद थोडी देर में एक मोड़ पर भगवती का छोटा सा मंदिर पड़ता है, जहाँ माथा नवाकर हम आगे बढ़ते हैं। यहाँ से गौंडार अगले मोड़ के पार पड़ता है। नीचे मधुगंगा का दुधिया जल पूरी गर्जन-तर्जन के साथ आगे बढ़ रहा था। अगले मोड़ के पास पहुँचते ही गौंडार गांव सामने प्रत्यक्ष दिखता है।


थोड़ी देर में हम गौंडार गाँव में प्रवेश कर रहे थे। यहाँ पर्यटकों की पूरी चहल पहल थी। कुछ यहाँ से राँसी की ओर बापिस चल रहे थे और अधिकाँश महमहेश्वर की ओर, कुछ यहाँ के होम-स्टे व ढावों में नाश्ता के लिए रुके थे। हम भी यहीं सड़क के साथ लगे एक ढावे में विश्राम करते हैं, चाय-बिस्कुट की हल्की रिफ्रेशमेंट लेते हैं।

गौंडार में कुछ पल विश्राम के

यहीं के नल से बोटल में पहाड़ी चश्में का जल भरते हैं। और यहाँ पर एक पालतु सफेद कुतिया को बिस्कुट खिलाते हैं, जो अनजान लोगों के साथ घुलमिल कर अपना काम चलाने की अभ्यस्त दिखी। यहाँ आठ बज चुके थे। अर्थात दो घंटे में हम अगतोलीधार से, व अढ़ाई घंटे में रांसी से यहाँ पहुंच चुके थे। पांच किमी हम तय कर चुके थे और एक किमी आगे संगम तक शेष था। 7000 फीट से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई तक उतर चुके थे।

आगे का रास्ता पहले सीधा, फिर ढलानदार, फिर सीधा व अंत में झुले के पास सीधे नीचे उतरता है।
पहली ढलान वाला रास्ता संकरा और लैंडस्लाइड जोन में बना है। दाईं ओर गहरी खाई सीधे मधुगंगा तक जा रही थी। मार्ग के अंत में संगम के ठीक ऊपर झूला अभी नहीं चल रहा था, जो सीधे बनतोली से जोड़ता है। पहले यहाँ पुल था, जो पिछले वर्षों बाढ़ में बह गया। इसलिए अब संगम तक नीचे उतराई वाला रास्ता तय करना पड़ा, और इसका अंतिम छोर दो समांनांतर पत्थऱ सीमेंट की मेढ़ से होकर पुरा किया।

रास्ते की दूसरी चुनौती - पहले आसान मानकर इसके बीच के मिट्टी वाले रास्ते पर चल दिए, आगे पता चला कि ये तो खच्चरों का मार्ग है, जो उनकी लीद से भरा था। जिस पर चलना लीद की दुर्गंध के साथ जुत्तों को पूरा कीचड़ में डुबो रहा था। किसी तरह डंडे के सहारे सहयात्री का हाथ पकड़ ऊपर मेड़ पर चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं। यहां से निकलने के बाद फिर मिट्टी व पत्थरों में झटककर जुत्ता साफ करने की कवायद चलती रही।

यात्रियों को रात को व अंधेरे में इस रुट पर न चलने का सुझाव दिया जाता है। एक तो इसमें पहले ढलान वाले रास्ते व फिर रिज वाले बिंदु पर अंधेरे में फिसल कर चोटिल होने का खतरा है। इसी कारण अगले दिन मदमहेश्वर की ओर जा रहा एक दल रात को यहीं से गौंदार बापिस हो गया था। रांसी से बनतोली तक यह दूसरा चुनौतीपूर्ण बिंदु है, जो अंधेरे में अकेले चलने लायक नहीं है। आगे यदि यह दुरुस्त हो जाता है, तो बात दूसरी है।

पचास मीटर उतराई के बाद हम संगम से थोड़ा ऊपर बनी लकड़ी की पुलिया के पास थे, जहाँ मदमहेश्वर के दायीं ओर से आ रही मार्कंड गंगा अपने दुधिया जल राशि को लिए पूरे वेग के साथ जैसे हर-हर महादेव का गुंजार करती हुई नीचे मधुगंगा से मिलन के लिए आगे बढ़ रही थी।

मार्कण्ड गंगा का दुधिया जल

पुलिया से इसका दृश्य एक अलौकिक अनुभव दे रहा था, जो इस रूट का एक विलक्षण पल था। लगभग सभी यात्री यहाँ कुछ पल रुककर इस अद्भुत दृश्य व इसके दिव्य निनाद को आत्मसात करते हुए किसी दूसरे लोक में विचरण करते नज़र आ रहे थे। इसको पार कर कुछ साहसी लोग मधुगंगा के बर्फीले जल में डुबकी लगा रहे थे। निश्चित रुप से इसका ग्लेशियरों से निकला जल अपने हिमालयन टच के साथ उनको रिफ्रेश और रिचार्ज कर रहा था।
बनतोली संगम का दृश्य

यहाँ से गौंड़ार पीछे दिख रहा था और आगे सामने ऊँचा पर्वत जिसकी गोद में बनतौली गाँव बसे हैं, जिनको पार करते हुए हमें मदमहेश्वर की ओर बढ़ना था। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे। यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे, यहां भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं। यहाँ परौंठा, चाय, अचार और घर की दहीं के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं, संयोग से बापिसी में अगले दिन यहीं हमारे रात को रुकने का भी ठिकाना बनता है। (जारी, शेष अगले भाग-4, वनतौली से नानू चट्टी में)


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