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सोमवार, 29 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-2

 

उखीमठ से रांसी

7 जून रविवार, 2026 - उखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर (4301 फुट) फीट की ऊँचाई पर बसा कस्बा है व यह सर्दियों के दौरान जब ऊंचाईयों में भारी बर्फवारी पड़ती है, तो उस दौरान भगवान केदारनाथ और भगवान मदम्हेश्वर के शीतकालीन प्रवास और पूजा स्थान के रुप में जाना जाता है। उखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर इसीलिए जाना जाता है। उखीमठ पौराणिक महत्व का स्थान भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। इसी कारण इस स्थान का नाम उषामठ पड़ा। मालूम हो कि उखीमठ ही चोपता, तुंगनाथ और देवरियाताल जैसे ट्रेकिंग, पर्यटन और तीर्थ स्थलों का मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

उखीमठ से आगे बढ़ते ही बाहर हवा में हिमालय टच वाला शीतल अहसास मिलना प्रारम्भ हो जाता है। हरी-भरी वादियों में प्रवेश के साथ लग रहा था कि हम एक नए परिवेश में आ गए हैं। रास्ते में गिरिया, मोनसुना मार्केट आते हैं। इस राह पर प्राकृतिक झरने स्वागत करते हैं।


रास्ते का प्राकृतिक दृश्य धीरे-धीरे अपने पूरे शबाव की ओर बढ़ता जा रहा था। सीढ़ीदार खेत, झरने, नाले और दूर पर्वतों की अंतहीन श्रृंखलाएं रास्ते को खुशनुमा बना रही थीं। मोनसुना मार्केट से बारिश से बचने के लिए एक रेनकोट खरीदते हैं।

आगे नीचे उतरते हुए एक पहाड़ी नदी पार करते हैं।


रास्ते में विराने में एक क्रिकेट मैदान ध्यान आकर्षित करता है। रांसी की ओर बढ़ता सफर एक नए प्रदेश में प्रवेश की सघन अनुभूति दे रहा था। सीढ़ीदार खेतों की अंतहीन श्रृंखला, घने जंगल, प्रकृति की गोद में बसे घर, आसमान छूते हरे-भरे पर्वत और सबसे ऊपर शहर के शौर-शराबे, किच-किच व प्रदूषण से रहित गाँव की शुद्ध आवोहवा और शांत एकांत परिवेश में स्वय को पाकर ऐसे लग रहा था कि कुछ दिन यहीं रुकें। एकांतिक रिट्रीट के लिए यह क्षेत्र एक आदर्श स्थल प्रतीत हो रहा था।

रास्ते में पहाड़ी कस्बे उनियाणा से होकर गुजरते हैं, जहाँ होमस्टे की बहुतायत दिखी। आगे खड़े पहाड़ को काटकर बनाए गई सड़क के साथ हम साढ़े चार बजे राँसी पहुंचते हैं।


यहां हल्के अभिसिंचन के साथ हमारा स्वागत होता है। पहले भवन पर ही हमारा वाहन खड़ा होता है, पास के ढावे के मालिक भट्ट साहब की सज्जनता और ईमानदारी को देखकर पहाड़ी मानुष का अक्स जेहन में कहीं गहरे छू जाता है। और यहीं चाय नाश्ते के लिए रुकते हैं।

थकान के चलते इसी ढावे में मैगी और चाय के लिए कहा, जिसका लाजबाव स्वाद देख हम लोग कायल हो गए। इनका पूरा परिवार इस कार्य़ में सहयोग दे रहा था। यहीं पर सामने कोमल टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग प्वाइंट में रुकने की भी व्यवस्था हो जाती है और यहीं रात के भोजन की भी बात पक्की कर लेते हैं।


साथ ही राँसी के बार में मोटा-मोटी जानकारी बटोर लेते हैं। पता चला कि राँसी की अधिष्ठाक्षी माता राकेशवरी देवी के दर्शन से आगे की यात्रा शुभ मानी जाती है। इन्हीं के दर्शन के बाद बाबा मदमहेश्वर के दर्शन फलित होते हैं। हो भी क्यों न, आखिर शिव-शक्ति के युग्ल से ही सृष्टि संचालित है और उन्हीं की कृपा से जीवन की पूर्णता सुनिश्चित होती है।

सो हम कमरे में सामान रखकर, फ्रेश होकर मंदिर में माता के दर्शन करने निकल पड़ते हैं। मुख्य मार्ग से मुश्किल से 300 मीटर ऊपर मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर के बाहर जूत्ता स्टैंड पर जुत्ते उतारते हैं, अंदर कौने में लगे वाश-वेसिन से हाथ धोकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।


मंदिर के पूजारी भट्ट साहब का सज्जनोचित्त एवं नेक व्यवहार प्रभावित करता है। मंदिर में विभिन्न विग्रहों से परिचय होता है। राकेश्वरी माता के साथ विष्णु भगवान, सत्यनारायण भगवान, मन्नणी माता, हनुमानजी, गणेशजी आदि के दर्शन होते हैं। पता चला कि मन्नणी माता का मूल स्थान यहाँ से 30 किमी ऊपर है, जो कठिन ट्रेक के बाद ही पूरा होता है। इसी स्थान पर भगवती ने महिषासुर का बध किया था।

राकेशवरी माता की पौराणिक कथा भी कम रोचक नहीं है। पता चला कि चंद्रदेव ने अपने दुराचार के पाप का प्रायश्चित यहीं पर किया था और माता की कृपा से अमृत तत्व की प्राप्ति हुई थी। इस तरह से प्रायश्चित तप की पौराणिक स्थली के रुप में इस मंदिर का महत्व स्वयं में महत्वपूर्ण है। नैष्ठिक साधक नौरात्रि में विशेषरुप से यहाँ आकर साधन-अनुष्ठान करते हैं।

राकेश्वरी माता के दर्शन के बाद हम बाहर परिसर में कुछ यादगार पलों को कैप्चर करते हैं। छोटे बच्चे परिसर में उछलकूद कर रहे थे। यहाँ से गाँव का नजारा देखने लायक था। प्रकृति की गोद में बसा एक पारंपरिक पहाड़ी गाँव स्वयं में परिपूर्ण प्रतीत हो रहा था। लोकल लोगों से बातचीत करने पर उनकी चिंता का अहसास भी हुआ। उनका मानना था कि गाँव का प्राकृतिक एवं पारम्परिक स्वरुप धीरे-धीरे खो रहा है। जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, व्यापार बढ रहा है, पारंपरिक सरलता तरलता धीरे-धीरे कम हो रही है।

रास्ते से मदमहेश्वर साइड का नज़ारा देखने लायक था। बर्फ से ढकी चोटियाँ, कुछ बादलों से ढकी व कुछ स्पष्ट।


जानकारों के अनुसार उन्हीं की गोद में नंदी कुंड है। मदहेश्वर बाबा यहाँ से नहीं दिखते। इनका क्षेत्र यहाँ से वाईं ओर पहाड़ों के पीछे पड़ता है। नीचे गहराई में पुष्पगंगा नदी और सीढ़ीदार खेत, सामने जंगलों से लदे पहाड़। लगा जैसे प्रकृति अपने सारे रुप दिखाने के लिए तत्पर थी।

पहले साफ मौसम, फिर अचानक नीचे घाटी से बादलों का उमड़ना गुब्बार और पूरा कस्बा इसमें समाहित। बादलों का गुब्बार हम सबको छूते हुए, आलिंग्न करते हुए पार हो जाता है। कुछ ही देर में उस पार पहाड़ी के शिखर से इंद्रधनुष के दर्शन। लगा जैसे प्रकृति अपनी सतरंगी छटा के साथ सारे रुपों का दर्शन करवाकर हमें कृतार्थ कर रही हो।  

अंत में यहां की मार्केट का अवलोकन करते हैं। रास्ते में बारिश से बचने के लिए जुत्तों की खोज करते हैं, लेकिन साइज के जुत्ते नहीं मिलते, सो मज़बूरी में प्लास्टिक की चप्पल खरीद लेते हैं, कि आपात में काम जाएगी। नहीं मालूम था कि यही आगे यात्रा का पासा पलटने वाली थी। यहीं से रिंगाल की मजबूत लाठी 50 रुपए में खरीदते हैं। फिर शहर के उस छोर पर आगे झरने तक जाते हैं।


बीच में टैंट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी।

खच्चरों पर रस्द सामग्री आगे जा रही थी। कुछ मिलाकर इस छोटे से पहाड़ी कसवे में यात्रियों की चहल-पहल देखने योग्य थी। जिनमें बंगाली ट्रेक्करों की बहुतायत दिखी। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर-प्रदेश, मध्य्-प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड व हिमाचल से भी यात्री दिखे। लोक्ल लोगों से बातचीत पर सुनने में आ रहा था कि अबकी बार मदमहेश्वर के लिए काफी पर्यटक व तीर्थयात्री आ रहे हैं। अगले साल से यह कहीं दूसरा केदार न बन जाए।

अपने होटल में आकर रात का भोजन करते हैं। रोटी, आलू की सब्जी, दाल और चाबल, साथ में आचार और पहाड़ी खीरे का सलाद।


भोजन से तृप्त होकर कमरे में रात को सो जाते हैं, सुबह तड़के जो आगे चलना था। रात को पुष्पगंगा के जल की सांय-सांय की ध्वनि नादयोग का अहसास दिला रही थी।

सुबह ब्रह्ममुहुर्त के अंधेरे में ही नींद खुल गई थीं। बाहर आकर देखते हैं कि अंधेरे में दूर व नीचे गाँव में रोशनी टिमटिमा रही थी।


सड़क में नीचे चहल-पहल थी। यात्री आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे। सुबह चार बजे ही जागरुक यात्री बढ़ निकलते हैं। हम भी टीम के साथ साढ़े पाँच बजे तक नहा धोकर, सन्ध्या वंदन कर टीम के साथ चल पड़ते हैं।

एक जीप प्रति व्यक्ति 30 रुपए के हिसाब से अगतोलिधार छोड़ती है, जो राँसी के आगे 2 किमी दूरी पर है। यही वाहनों का अंतिम पड़ाव है, यहाँ से आगे पैदल चलना पड़ता है। हाथ में छड़ी और पीठ में रक्सैक व कंधे पर बैग लिए कदम बढ़ रहे थे मदमहेश्वर की ओर। आज का पहला प़डाव था यहाँ से छः किमी दूर गौंडार गाँव। हम राँसी के 7000 फीट की ऊँचाई से गौंदार के 5000 फीट ऊंचाई तक उतरने वाले थे। और फिर यहाँ से 12,500 फीट की ऊँचाई तक 10 किमी चढ़ाई करने वाले थे। (जारी...शेष अगले खण्ड-3 में)

शुक्रवार, 30 मई 2025

देवप्रयाग की एक यादगार और रोमाँचक यात्रा

 

शिक्षा, संस्कार और उत्कृष्टता की त्रिवेणी

आज बहुत समय बाद देवप्रयाग तक जाने का संयोग बन रहा था। संयोग कहें, या की संगम का बुलावा। जॉलिग्रांट अस्तपताल में पारिवारिक उपचार के लिए गया था, ऑनलाइन संगोष्ठी में प्रतिभाग की योजना थी, लेकिन गोष्ठी के संयोजक डॉ. स्नेहीजी से संवाद के बाद परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि लगा ऑफलाइन ही इसमें प्रतिभाग करना बेहतर रहेगा और परिस्थितियाँ भी अनुकूल बनती गई। यह सब दैव कृपा व संगम तीर्थ का आवाह्न मान हम दोपहरी में सफर पर निकल पड़ते हैं।

साथ में युवा शिक्षक डॉ. दिलीप सराह थे। हरिद्वार से देवप्रय़ाग तक काफी अर्से बाद जा रहे थे, सो रास्ते में सड़कों पर हुए कार्य को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सड़कें काफी चौड़ी हो चुकी हैं, फोरलेन पर कार्य जोरों से चल रहा है। ऋषिकेश के पास वीकेंड के कारण थोड़ा जाम रहा, लेकिन आगे का सफर एक दम सपाट एवं सुखद रहा। एक-दो स्थान पर भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों पर चल रहे कार्य के कारण थोड़ा अबरोध अवश्य मिला। कुल मिलाकर हम सवा तीन घंटे में, साढ़े पाँच बजे तक देवप्रयाग पहुँच जाते हैं।

रास्ते में व्यासी, कोडियाला जैसे चिरपरिचित स्टेशन आते हैं, जहाँ यात्री चाय-नाश्ता के लिए रुकते हैं। फिर शिवपुरी आता है, जहाँ चम्बा की ओर से सुरकुंडा पहाड़ियों से निस्सृत हेम्वल नदी गुजरती है और गंगाजी में समा जाती है। इन्हीं के बीच बजी जंपिंग के कुछ प्रयोग चलते हैं, जो शाम की चमचमाती रोशनियों में एक अलग ही नज़ारा पेश करते हैं। यहीं से रिवर केंपिंग साइट्स तथा राफ्टिग की भी शुरुआत होती, जो बाहर से आए पर्यटकों के बीच साहसिक रोमाँच का एक लोकप्रिय शग्ल रहता है।

रास्ते में तीन पानी स्थान भी उल्लेखनीय हैं, जहाँ कभी जल के तीन स्रोत थे। हम भी एक स्रोत से जल भरते हैं, जल एकदम ठण्डा व स्वाद में भी बेहतरीन निकला। आगे रास्ते में रेलमार्ग के कार्य का भी दर्शन होता है, जहाँ स्टेशन के लिए वृहद संरचना जुटाई जा रही है और गंगाजी के पार सुरंग से रास्ता बनने की तैयारी दिखी।

रास्ते भर पहाड़ों के शिखर व आंचल में बसे घर-गाँव हमेशा की तरह हमे रोमाँचित करते रहे। प्रश्न एक ही उठता रहा कि बिमार होने पर यहाँ के लोग किस तरह अस्तपाल पहुँचते होंगे। और बच्चों के पढ़ाई की व्यवस्था कैसे होती होगी। हालाँकि अधिकांश गाँव तक सड़कों का जाल बिछा दिख रहा था, कुछ ही घर सड़कों से काफी दूर दिख रहे थे।

देवप्रयाग पहुँचते ही संगम के दूरदर्शन होते हैं, देवप्रयाग बस स्टेंड से पहले ही हमारा वाहन दायीं ओर मुड़ जाता है, सामने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का विहंगम परिसर ध्यान आकर्षित कर रहा था। हर यात्री यहाँ से गुजरते हुए इस नवनिर्मित विश्वविद्यालय के भव्य परिसर को देखते ही कुछ पल के लिए आश्चर्यचकित होकर स्तम्भित हुए बिना नहीं रह सकता।

थोड़ी देर में नीचे गंगा नदी पर पुल पार कर हम कुछ मिनट में विश्वविद्याल के गेस्ट हाउस के सामने पहुँचते हैं, जो संभवतः परिसर का पहला भवन भी है। यहाँ फ्रेश होकर हम बाहर कैंपस के दर्शन के लिए निकलते हैं। शहर के प्रदूषण से दूर यहाँ के एकांतिक परिसर की शुद्ध आवोहवा किसी वरदान से कम नहीं लग रही थी। कैंपस की लोकेशन ऐसी जगह है, जहाँ हर पल हवा के तेज झौंके बहते रहते हैं। इस गर्मी के मौसम में तो यह बहुत सुकूनदायी लग रहा था लेकिन हम कल्पना सर्दी के मौसम की कर रहे थे, जब यहाँ विचरण करना काफी चुनौतीपूर्ण रहता होगा।

सड़क के नीचे अकादमिक ब्लॉक के भव्य भवन दिखे, सड़क के ऊपर पहाड़ी के आंचल में हॉस्टल के दर्शनीय भवनों की श्रृंखला तथा बीच में खेल का चौड़ा मैदान। साईड़ में नीचे दक्षिण की ओर स्टाफ क्वार्टर। शाम हो चुकी थी, कैंपस की कैंटीन व स्टोर बंद हो चुके थे। सो हम कैंपस के बाहर निकल कर थोड़ा नीचे मार्केट में पहुँचते हैं। साबुन सर्फ आदि दैनिक आवश्यकताओं के कुछ सामान खरीदते हैं। थोड़ा नीचे अलकनंदा नदी पर एक पुराना पुल दिख रहा था, उस तक पहुँचने का भी दुस्साहस कर बैठते हैं, लेकिन पुल के बीच से नीचे संगम काफी दूर लगा, सो दूर से ही प्रणाम कर उलटे पाँव बापिस होते हैं और राह की खड़ी चढ़ाई के संग कैंपस तक पहुँचते हैं।

ऐसे में कपड़े पसीने से तर हो चुके थे। फ्रेश होकर गर्मागर्म चाय पीते हैं। गेस्ट हाउस में किचन, दूध, चाय पत्ती, व चीनी आदि की उम्दा व्यस्था थी। साथ में आए डॉ. दिलीपजी की चाय बनाने की विशेषज्ञता से आज परिचित हुए। एकाउटेंसी से जुड़े होने के कारण वे चाय के अभ्यस्त हैं और चाय बनाने में भी एक्सपर्ट। थके होने पर उम्दा चाय की प्याली निसंदेह रुप से सदैव एक तरोताजा करने वाला अनुभव रहती है। सो दो दिन इसका भरपूर लाभ लेते रहे। हम यहाँ चाय की वकालत नहीं कर रहे, इसके अन्य स्वस्थ विकल्प भी आजमाए जा सकते हैं, लेकिन देश, काल परिस्थिति के अनुरुप अपने यथार्थ का यहाँ वर्णन कर रहे हैं।

सांय एक सत्र फेकल्टी डेवेल्पमेंट पर होता है, विषय था – शिक्षकों का सर्वांगीण विकास एवं गुणवत्तापरक शिक्षा। लेक्चर से अधिक यह अपने अनुभवों को साझा करने का उपक्रम था, जिसे लगा सभी प्रतिभागियों ने बेहतरीन ढंग से ह्दयंगम किया।

रात को भोजनोपरान्त गेस्ट हाउस में शयन का क्रम बनता है। गेस्ट हाउस की वाल्कनी से नीचे वालगंगा के दर्शन प्रत्यक्ष थे। थोड़ी ही दूरी में भगीरथी और अलकनन्दा के संगम होता है, जो हॉस्टल से दृश्य नहीं था, लेकिन यहाँ गंगा मैया का बालरुप हमारे सामने से कुछ दूरी पर प्रत्यक्ष प्रवाहमान था। हम वाल्कनी में इसका दर्शन कर धन्य अनुभव कर रहे थे। और संगम की तीर्थ चेतना की ऊर्जा यहाँ तक जैसे हमारी रुह को स्पर्श कर रही थी। सामने पहाड़ों में बसे गाँवों की टिमटिमाती रोशनी हमें अपने गृह प्रदेश में बचपन की यादों को ताजा कर रही थी। ऐसा ही दृश्य पिछले वर्ष गंगोत्री धाम यात्रा के दौरान धराली (कल्प केदार) से सामने मुखबा गाँव के हुए थे।

इन्हीं भावों के सागर में गोते लगाते हुए रात बीती। कल की तैयारियाँ भी चल रही थी, सो रात को शयन में थोड़ा विलम्ब हो जाता है, लेकिन नींद में उपरोक्त भाव हॉवी रहे। औऱ प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में ही उठने का क्रम बनता है। स्नान, ध्यान व अपनी अकादमिक तैयारी के साथ फिर थोड़ा विश्राम करते हैं। छः बजे चाय की चुस्की के साथ बाहर मोर्निंग वाक होती है। पहाड़ियों से घिरे विश्वविद्याल के कैंपस और नीचे देवप्रयाग के संगम, उस पार तमाम पहाड़ी गाँव, सबका मनोरम दृश्य निहारते हुए आज की प्रातः हमारे लिए एक अद्वितीय एवं यादगार अनुभव थी, जो चिरकाल तक अंकित रहेगी।

इसी क्रम में नाश्ता के बाद दिन की बाकि प्रस्तुतियाँ होती हैं। एक एनईपी-2020 के अनुरुप पाठ्यक्रम निर्माण और आउटकम आधारित शिक्षा पर तथा दूसरी मूल्यपर शिक्षा, स्व-नेतृत्व व अकादमिक-प्रशासनिक उत्कृष्टता पर थी। ब्लॉग लेखन पर भी एक रोचक सत्र चला, जिसमें लगभग सभी प्रतिभागियों के ब्लॉग तैयार हो गए थे। सत्र समाप्ति के बाद सबसे विदा लेते हुए हम हॉस्टल आते हैं। लगा कि परिसर में जैसे हम शिक्षा, संस्कार और उत्कृष्टता की त्रिवेणीं में डुबकी लगा रहे हैं। हालाँकि ये एक बीजारोपण जैसा संयोग लगा, जिसकी सुखद परिणतियाँ तो काल के गर्भ में छिपी हुई हैं।

यहाँ पिछले आगमन का भी संक्षिप्त चर्चा करना चाहूँगा, जब हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रविंद्र बर्तवालजी के निमन्त्रण पर भारतीय संदर्भ में शोध-अनुसंधान एवं भाषाई विमर्श (हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी एवं लोक भाषा के संदर्भ में) विषय पर एक गोष्ठी के अंतर्गत 30 जनवरी, 2017 के दिन यहाँ आए थे। हालाँकि तब यह परिसर निर्माणाधीन था और उस पार ही सड़क के किनारे एक होटल में कार्यक्रम हुआ था।

शाम को ही आज बापिसी का क्रम था। सो अपने वाहन से नीचे पुल से होते हुए गंगा नदी के किनारे इसे रोकते हैं। दो पुल पार कर संगम तक पहुँचते हैं। राह के परिक्रमा पथ का वीडियो आप नीचे देख सकते हैं और रास्ते के मनोरम दृश्य को अनुभव कर सकते हैं, जहाँ एक ओर श्रीनगर की ओर से आ रही अलकन्दा नदी को पार करते हुए नीचे देवप्रयाग संगम का विहंगम दृश्य दर्शनीय है तो ऊपर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का भव्य परिसर।

संगम का दृश्य को स्वयं में मनोहारी था, तीर्थ चेतना की ऊर्जा से आवेशित। इसमें डुबकी लगा कर लोग धन्य अनुभव कर रहे थे। हम तीर्थ का पावन जल साथ लाते हैं। यहाँ सूर्य और चंद्र गुफा के भी दर्शन किए और बापिस वाहन में आते हैं। रास्ते में ही भगवान राम का मंदिर पड़ता है। मान्यता है कि रावण के बध के पश्चात प्रायश्चित स्वरुप वे यहाँ रुक कर प्रायश्चित तप किए थे। देवप्रयाग और ऋषिकेश के मध्य वशिष्ट गुफा पड़ती है। लक्ष्मण झूला के पास लक्ष्मण तथा ऋषिकेश में भरत व शत्रुधन की तपःस्थली मानी जाती है।  

बापिसी में पुल को पार करते हुए केंदीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर के विहंगम दर्शन होते हैं। इसको विदा करते हुए, यादगार स्मृतियों के साथ अपने गन्तव्य की ओर कूच करते हैं। रास्ते भर गढ़वाल हिमालय की पहाडियों के मध्य सफर का रोमाँचक अनुभव लेते रहे। आप भी नीचे के वीडियो को देखकर इसमें भागीदार बन सकते हैं। कहीं नीचे घाटी में गंगाजी के दर्शन होते हैं, तो कहीं लंगूर सड़क के किनारे दिन भर की थकान मिटा रहे थे।

रास्ते में हमारे चालक रवि राह में पड़ने वाले पर्यटक स्थलों के प्रति हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करते रहे, जिनका जिक्र हम यात्रा के प्रारम्भ में भी कर चुके हैं। इस तरह शिवपुरी के पास के बजी जंपिग साइट, राफ्टिंग जोन, कोडियाला-ब्यासी, दुगढ़ा (नीरझरना) आदि से होकर ऋषिकेश पहुँचते हैं, जहाँ शहर की टिमटिमाती रोशनियाँ गंगाजी में एक अद्भुत दृश्य पेश कर रही थी। ऋषिकेश के ट्रेफिक को पार कर हम रात सवा नौ तक विश्वविद्याल परिसर पहुंचते हैं।

सफर का सार यह रहा कि सरकार जिस तरह से सड़कों पर कार्य कर रही है वह सराहनीय है। इससे सफर का समय कम हो रहा है और अधिक सुकूनदायी भी बन रहा है, बस ध्यान साबधानी पूर्वक ड्राइविंग का है। रेल्वे ट्रेक खुलने से पर्यटन का नया अध्याय शुरु होने वाला है। गंगा में राफ्टिंग व अन्य पर्यटन को थोड़ा इकोफ्रेंडली बनाने की आवश्यकता है। जिम्मेदार पर्यटन समय की माँग है। बाकि अकादमिक कार्यक्रम एवं आदान-प्रदान होते रहने चाहिए, जिससे हमारे शिक्षक श्रेष्ठतम शिक्षा के साथ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्टता की ओर बढ़ते हुए एक सशक्त भारत, समृद्ध प्रदेश एवं संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण की परिकल्पना को साकार कर सके। पूरा विश्व आशाभरी निगाहों से भारत की ओऱ देख रहा है।

देवप्रयाग से ऋषिकेश तक का वीडियो नीचे देख सकते हैं -

शनिवार, 30 नवंबर 2024

मेरी पहली गंगोत्री धाम यात्रा, भाग-4

 

उत्तराखण्ड का स्विटजरलैंड हर्षिल और बगोरी गाँव


गंगोत्री धाम से आने के बाद हम सभी कल्प-केदार होटल में विश्राम करते हैं और फ्रेश होकर दोपहर बाद हर्षिल के लिए निकल पड़ते हैं। इस रास्ते में झरने व नाले बहुतायत में मिले। कारण पीछे चोटियों में ग्लेशियर की मौजूदगी, जो पिघल कर इस क्षेत्र को जलराशि की प्रचुरता का वरदान दे जाती हैं। इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य में इनका अपना महत्व है और सेब की उत्कृष्ट फसल का भी यह एक कारण है।

दो-तीन किमी बाद बस मुख्य मार्ग से दायीं ओर मुडती है, एक बड़ा सा सुसज्जित प्रवेश द्वार आपका स्वागत करता है। लगा कि हम कुछ दूर तक किसी मिलिट्री क्षेत्र से गुजर रहे हैं। इसके बाद भगीरथी नदी पर बने एक पुल को पार कर हम हर्षिल कस्बे में प्रवेश करते हैं, जो 9006 फीट (2745 मीटर) ऊँचाई पर बसा हिल स्टेशन है। हर्षिल मार्केट में पर्यटकों की वहुतायत के चलते ट्रैफिक से गाडी को निकालने में थोड़ा समय लगा।

यहाँ के छोटे-छोटे पहाड़ी घर व होटल यहाँ की पहचान करवा रहे थे। मार्केट की अगली साइड पार्किंग में गाड़ी को खड़ा कह हम पैदल चलते हैं। मोड के बाद एक पुलिया पर चढ़ते हैं। दायीं ओर से एक सड़क मुखबा गाँव (गंगा मैया का शीतकालीन आवास) की ओर जा रही थी। ऊपर पुल पर तेज हवा वह रही थी। पहाड़ी नाला कहें या छोटी नदी में जल बहुत तेज गति से बह रहा था। पुल पर फोटोशूट करने वालों का तांता लगा हुआ था, हर कोई गगनचूंबी देवदार, संग बह रहे झरनों व पहाड़ों की पृष्ठभूमि के सुंदर दश्य को कैप्चर करना चाह रहा था। मालूम पड़ा कि राम तेरी गंगा मैली फिल्म की शूटिंग यहीं की लोकेशन्ज में हुई थी।

इस पुल से आगे दायीं ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। कुछ दुकानें, कुछ होटल व बगीचे पार करते हुए रास्ते में वाइं ओर लक्ष्मी नारायण मंदिर का बोर्ड मिला, जिसे हम बापिसी के लिए छोड़ देते हैं। रास्ते में ही दायीं और एक मैदान में बिल्सन की कोठी मिली, जिसे अब एक होटल में कन्वर्ट किया गया है। माना जाता है कि हर्षिल को हिल स्टेशन का रुप देने में इन ब्रिटिश सैन्य अधिकारी का विशेष योगदान रहा है। कुछ इन्हें नायक तो कुछ खलनायक का दर्जा देते हैं।

थोड़ी देर बाद दुबारा एक पुल आता है, जिसके नीचे से बहुत तीव्र वेग से एक नदी का निर्मल जल बह रहा था, लगा पीछे किसी घाटी से यह नदी आ रही है। यहाँ पर भी पुल के ऊपर लोगों को फोटोशूट में मश्गूल देखा। हमारे दल के युवा फनकार भी इसमें शामिल हो जाते हैं। यहाँ से पार होते ही हम थोड़ी ढलान के साथ नीचे उतर रहे थे। नीचे खुली घाटी से तेज हवा जैसे हमारी गति को थाम रही थी।

और एक बड़े गेट के साथ बगोरी गाँव में प्रवेश होता है, जिसमें यहाँ का संक्षिप्त परिचय, इतिहास व विशेषताएं लिखी थीं। प्रवेश करते ही दाइँ ओर इनके कुलदेवी-देवता के मंदिर दिखे। और आगे सड़क के दोनों ओर घर में ही दुकानें सजी दिखीं। कुछ ने घरों को होम स्टे के रुप में सुसज्जित कर रखा था औऱ कुछ ने होटल के रुप में।

घर आँगन रंग-बिरंगे फूलों से सज्जे थे। छोटे-छोटे लकड़ी के पारम्परिक घर बहुतायत में दिखे, कुछ एक ही सीमेंट लेंटर के दिखे। घर के बाहर काली व सफेद ऊन को सुखाते देखा। कुछ बुजुर्ग इनको कात रहे थे, तो कुछ इन से बुनाई कर रहे थे। इनकी दुकानों पर इनसे तैयार स्वाटर, टोपे, मफलर, जुराबें, गलब्ज आदि बिक्री के लिए रखे गए थे। अधिकाँश पुरुष व महिलाएं इन उत्पादों को तैयार करने में व्यस्त दिखे।

कुल मिलाकर गाँव के मेहनतकश लोगों को स्वरोजगार के संसाधनों को तैयार करते देखा। जो हर ठंडे इलाके के लोगों की फितरत रहती है। ठंड में एक तो यह सक्रियता कुछ गर्माहट देती है और कुटीर उद्योग के ये छोटे-बड़े प्रयोग रोजगार एवं आर्थिक स्बाबलम्वन का साधन बनते हैं।

घरों के बाहर सेब की पेटियाँ भी बिक्री के लिए दिखीं, जो घर के साथ जुड़े बगीचों से तोड़े गए थे। बगीचों में जाकर फार्म फ्रेश सेवों की भी व्यवस्था थी। कुछ केफिटेरिया भी सेब के बगीचों में सजे दिख रहे थे।

गंगोत्री की राह का यह क्षेत्र सेब के साथ राजमाह की फसल के लिए प्रख्यात है। यहाँ भी गाँव के घर आंगनों व खेतों में राजमाह की फसल को पकते व सूखते देखा। जो ऑर्गेनिक होने के कारण स्वाद व पौष्टिकता के हिसाब से लाजबाव माने जाते हैं।

रास्ते में गाय बैल व बछड़े मिले, जो काफी छोटे आकार के थे। मानकर चल रहे थे कि इनका दूध बहुत पौष्टिक, सात्विक व स्वादिष्ट होगा, जैसा कि इस क्षेत्र में विचरण किए कई साधकों व योगियों से सुन रखा है।

गाँव में छोटा सा बौद्ध गोंपा भी मिला, जो आजक रविवार के चलते बंद था। गांव के छोर पर पहुँचकर हम बाहर एक मैदान में पहुँच जाते हैं, जहाँ नीचे मैदान के पार तट पर भगीरथी नदी बह रही थी। सभी यहाँ के किनारे कुछ यादगार पल बिताते हैं।

छात्र-छात्राएं अपने मन माफिक फोटो खींचते हैं, क्योंकि पृष्ठभूमि में घाटी व पर्वतों का विहंगम दृश्य देखते ही बन रहा था। चारों और उत्तर औऱ दक्षिण में आसमान छूते बर्फीले शिखर दिख रहे थे और सामने गंगोत्री से हर्षिल की ओर जा रहा मोटर मार्ग। सामने ही देवदार के जंगल के बीच सेब से लदे बगीचे व स्थानीय ग्रामीण परिवेश भी मन को मोहित कर रहा था।

इस पृष्ठभूमि में ग्रुप फोटो भी होता है। और छात्र-छात्राओं के साथ यहाँ के विकास पत्रकारिता से जुड़े प्रश्नों व मुद्दों पर भी कुछ चर्चा होती है।

बापिसी में एक होम स्टे में नूडल व चाय का आनन्द लेते हैं और यहाँ की भाव भरी मेहमानवाजी (हॉस्पिटेलिटी) को अनुभव करते हैं। समूह के कुछ छात्र-छात्राएं इनके किचन में हाथ बंटाते हैं। स्वभाव से यहाँ के लोग ईमानदार, मेहनतकश और भावनाशील लगे।

बापिसी में सड़क मार्ग से लगभग 200 मीटर नीचे लक्ष्मी नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं औऱ साथ ही थोड़ी दूरी पर बहती भगीरथी मैया को भी प्रणाम कर आते हैं। ध्यान साधना के लिए यहाँ का एकांतिक वातावरण आदर्श लगा, जिसका वर्णन हम यू-ट्यूब में भी किसी बाबाजी के वीडियों में कभी देख चुके थे।

इस तरह हमारी आज की हर्षिल का विहंगावलोकन करती संक्षिप्त यात्रा पूरी होती है। तीन-चार घंटों में ही उत्तरकाशी से 78 किमी और गंगोत्री धाम से 26 किमी दूर हर्षिल की वादियाँ जेहन में एक अमिट छाप छोड़ जाती हैं। यहाँ भगीरथी और जालंधरी नदीं के संगम पर बसे उस घाटी में प्राकृतिक सौंदर्य़, आध्यात्मिक प्रवाह, शाँति एवं रोमाँच का अद्भूत स्पर्श मिलता है।

बस तक पहुँचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका था और सभी बस में बैठकर बापिस धराली आते हैं। और रात्रि भोजन के बाद 9 बजे तक कल की तैयारी के साथ निद्रा देवी की गोद में चले जाते हैं, क्योंकि कल सुबह 6 बजे बापिस हरिद्वार के लिए कूच करना था।

मेरी पहली गंगोत्री धाम यात्रा, भाग-3


गंगोत्री धाम के दिव्य लोक में


यात्रा का दूसरा दिन हमारे गंगोत्री दर्शन के लिए समर्पित था। सो सुबह जल्दी ही धराली से निकल पड़ते हैं, जो गंगोत्री से 20 किमी की दूरी पर पड़ता है। भौर में जब हम बाहर निकलते हैं, तो उत्तर दिशा में गंगोत्री की ओर हिमशिखरों मध्य टिमटिमाते तारों से सजे नीले आकाश में बीचों-बीच स्थित अर्दचंद्र की शोभा देखते ही बन रही थी। लग रहा था कि वे ध्यानस्थ भगवान शिव के सर पर सुशोभित हों। गंगोत्री धाम की यात्रा व दर्शन का उत्साह सबके चेहरे पर स्पष्ट था, जिनमें अधिकाँश वहाँ पहली वार पधार रहे थे।

धराली से गंगोत्री की 20 किमी की यात्रा देवदार के घने जंगलों के बीच होती है। शुरु में वायीं ओर साथ में भगीरथी नदी प्रवाहमान थी। चौड़ी घाटी क्रमिक रुप से संकरी हो रही थी। रास्ते भर देवदार के जंगल और भगीरथी नदी के विस्तार को निहारते हुए यहाँ की सुंदर वादियों के बीच एक नई घाटी में प्रवेश होता है। गगनचुम्बी चट्टानी पहाड़ दोनों ओर एक दम पास दिख रहे थे।

पुल को पार कर अब भगीरथी हमारे दायीं ओर थी और चट्टानी रास्ते से चढ़ाई पार करते हुए कुछ ही पलों में हम भैरों घाटी पहुँचते हैं, जहाँ पर गहरी घाटी में एक नदी नेलाँग की ओर से आती है और यहाँ की चट्टानी दिवारों के संग गार्दांग गली का प्राचीन ट्रैकिंग रुट प्रख्यात है। बापिसी में इसके दर्शन की योजना थी। भैरों घाटी के पुल को पार हम गंगोत्री धाम की ओर बढ़ते हैं। राह में हिमाच्छादित शिवलिंग पर्वत के दर्शन प्रारम्भ हो गए थे।

देवदार से अटे गगनचुंबी पहाड़ दोनों ओर जैसे हमारा स्वागत कर रहे थे। रास्ते में आईटीवीपी कैंप से गुजरते हैं। पहाड़ों से गिरी चट्टानों के बीच बसा यह कैंप इन ऊंचाईयों के चट्टानी सत्य का दिग्दर्शन करा रहे थे, जहाँ जीवन कितना रिस्क से भरा हो सकता है। रास्ते भर तीखे मोड़ और देवदार के जंगल एक नए प्रदेश एवं परिवेश में प्रवेश का सुखद अहसास जगा रहे थे, साथ ही राह में आंख मिचौली करते हिमाच्छादित शिवलिंग पर्वत गंगोत्री धाम के समीप होने का तीखा अहसास दिला रहे थे और मन में गंगोत्री धाम के पहले दर्शन-दीदार के जिज्ञासा और रोमाँच से भरे भाव हिलोरें मार रहे थे।

राह में ही भैरों मंदिर आता है, जहाँ से आगे सड़क मार्ग वायीं ओर से नेलांग की ओर जाता है, जिसे चीन की सीमा से अटा अंतिम स्टेशन माना जाता है, जो यहाँ से 22 किमी था। लो, कुछ ही मिनट में हम गंगोत्री में प्रवेश करते हैं, गाडियों का जमघट और पर्यटकों की भीड़ इसका अहसास दिला रही थी। हमारी गाड़ी भी बाहर सड़क के किनारे निर्देशित स्थान पर पार्क होती है।

सड़क के साथ पहाड़ों को छूते चट्टानी शिखर भय मिश्रित श्रद्धा का भाव जगा रहे थे। मन में एक ही प्रश्न कौंध रहा था कि इन चट्टानी पहाड़ों से चट्टान टूटकर नीचे आती होंगी, तो क्या होता होगा। बाद में लोगों से बातचीत करने पर समाधान मिला कि ये चट्टानें स्थिर हैं, आए दिन गिरने की कोई ऐसी घटना यहाँ नहीं होती।

लगभग 2 किमी पैदल यात्रा, जिसमें गंगोत्री धाम की मार्केट, आश्रम, होटल, होम-स्टे आदि के दर्शन करते हुए अंततः एक बड़ा सा द्वार पार करते हुए गंगोत्री मंदिर में प्रवेश होता है। यहाँ के दिव्य प्रांगण में जुत्ते उतार कर दर्शनार्थियों की पंक्ति में खड़ा होकर मंदिर में गंगा मैया के दर्शन करते हैं। और बाहर निकल कल समूह फोटो लेते हैं।

गंगोत्री मंदिर की लोकेशन स्वयं में अद्भुत है, चारों और गंगनचुम्बी चट्टानी पहाड़ों के बीच में स्थित धाम, एक नए लोक में विचरण का दिव्य अहसास दिला रहा था। लग रहा था कि हम एकदम नए संसार में पहुँच गए हैं। यहाँ से प्रसाद ग्रहण कर नीचे स्नान घाट पहुँचते हैं। भगीरथी नदी के ग्लेशियर से निकले बर्फीले जल से आचमन कर अपने पात्र में गंगाजल भरते हैं। बापिसी में भगीरथी शिला के दर्शन करते हैं, जहाँ भगीरथ ने भगीरथी तप कर गंगा अवतरण को संभव किया था और सगरसुतों के उद्धार के साथ जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया था।

परमपूज्य गुरुदेव युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य़जी के हिमालय प्रवास के दौरान गंगोत्री धाम में रुकने व आगे तपोवन में साधना करने के प्रसंगों को यहाँ प्रत्यक्ष देखने का मन था। तीर्थ की सूक्ष्म चेतना ने जैसा इसका भी इंतजाम कर रखा था। यहाँ के साठ वर्षीय कुलपुरोहित से अचानक परिचय होता है औऱ वे आचार्यजी से जुड़े रोचक प्रसंगों का भाव भरा वर्णन करते हैं। और भगीरथी के उस पार सामने के आश्रमों - ईशावास्य, कृष्णानन्द आश्रम, तपोवन आश्रम आदि से भी परिचय करवाते हैं, जहाँ गुरुदेव का प्रवास रहा।

परिसर में ही जाह्नवी माता के दर्शन होते हैं, लगा कि जैसे गंगा मैया के ही मूर्तिमान अंश से मुलाकात हो रही है। इन्हीं के सान्निध्य में यहाँ कृष्णानन्द आश्रम के वयोवृद्ध शिष्य स्वामी जी के दर्शन होते हैं, जो अपने आश्रम में आने का नेह भरा आमंत्रण दे जाते हैं। इस तरह मंदिर से नीचे उतरते हुए एक पुलिया को पार कर हम कृष्णानन्द आश्रम पहुँचते हैं। रास्ते में पुल से शिवलिंग एवं भागीरथी पर्वत के दिव्य दर्शन होते हैं। कृष्णानन्द आश्रम में गुरुदेव की साधना स्थली गुफा के दर्शन करते हैं। बाबाजी का स्वागत सत्कार और भक्ति भाव हम सबको भाव विभोर करता है। उनके द्वारा खिलाए गए छेने के रस्गुल्ले और सुर्ख लाल सेब यदा रहेंगे।

फिर जाह्नवी माता के आश्रम में पधार कर यहां के दिव्य भाव को ग्रहण करते हैं। माताजी पिछले तीन दशकों से साधनारत हैं और तपोवन में भी प्रवास कर चुकी हैं। यहाँ देवस्थापना कर हम, ब्रह्मकल का प्रसाद लेकर बापिस आते हैं। समय कम होने के कारण तपोवन आश्रम, सूर्य कुण्ड व अन्य स्थानों के दर्शन नहीं कर पाते और इनको अगले विजिट के लिए छोड़कर पुलिया को पार कर नीचे उतरते हैं।

बापिसी में एक आश्रम के भंडारे में भोजन-प्रसाद का संयोग बनता है। यहाँ अध्यात्मिक कंटेट को प्रसारित करने वाले यू-ट्यूबर युवा सन्यासी स्वामी अद्वैतानन्दजी से भेट होती है। संवाद के कुछ संक्षिप्त और यादगार पल इनके साथ बिताते हैं और बापिस गाड़ी तक आते हैं।

राह में चार शाखा वाले देवदार के वृक्ष के सामने सेल्फी लेते हैं। यह वृक्ष हमें जीवन के चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूर्तिमान प्रतीक लग रहा था, जो गंगोत्री धाम पधार रहे जागरुक तीर्थ यात्रियों को सतत एक मूक संदेश दे रहा हो।

दिन में सीधी धूप औऱ लगातार पिछले 3-4 घंटों से चलते रहने के कारण काफी गर्मी का अहसास हो रहा था, साथ ही भोजन उपरान्त की सुस्ती भी छा रही थी। अतः बापिसी में कार्दांग गली का प्लान छोड़ देते हैं, क्योंकि वहाँ सीधे धूप पड़ रही थी और नीचे सीधे खाई में नदी बहती हैं। किसी तरह का रिस्क लेने की स्थिति में नहीं थे और न ही समूह की मनःस्थिति अभी इसको कवर करने की थी और इसे भी अगली यात्रा के लिए छोड़ आते हैं।

पाठकों को बता दें कि यह भारत तिब्बत के बीच व्यापार का पुरातन रुट था, जब किसी तरह की सड़क व्यवस्था नहीं थी। आज तो नेलाँग तक सड़क मार्ग बन चुका है, जो उत्तराखण्ड का इस इलाके का अंतिम गाँव है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद वहाँ के लोग हर्षिल में बगोरी गाँव में विस्थापित होकर रह रहे हैं। आज शाम हो हम वहीं पधारने जा रहे थे।

बस से हम बापिस धराली पहुँचते हैं औऱ होटल में कुछ देर रुककर तरोताजा होते हैं और दोपहर वाद आज के गन्तव्य हर्षिल और बगोरी गाँव के लिए निकल पड़ते हैं। (जारी, भाग-4)

सोमवार, 29 नवंबर 2021

हरिद्वार दर्शन - गंगा तट पर घाट-घाट का पानी

 

घाट 1 से 20 तक गंगा मैया के संग

गंगा तीरे, उत्तरीय हरिद्वार

हर-की-पौड़ी के आगे स्वामी सर्वानंद घाट के पुल को पार करते ही, हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे से दायीं ओर का लिंक रोड़ घाट न. 1 की ओर जाता है। पीपल के बड़े से पेड़ के नीचे शिव मंदिर और फिर आम, आँबला व अन्य पेड़ों के समूहों का हरा-भरा झुरमुट। इसके आगे नीचे गंगा नदी का विस्तार, जो नीचे भीमगौड़ा बैराज तक, तो सामने राजाजी नेशनल पार्क तक फैला है। गंगाजी यहाँ एक दम शांत दिखती हैं, गहराई भी काफी रहती है और जल भी निर्मल। लगता है जैसे पहाड़ों की उछल-कूद के बाद गंगा मैया कुछ पल विश्राम के, विश्राँति भरी चैन के यहाँ बिता रही हैं – आगे तो फिर एक ओर हर-की-पौड़ी, गंग नहर और दूसरी ओर मैदानों के शहरों व महानगरों का नरक...।

यहीं से गंगाजी की एक धारा थोड़ा आगे दायीं ओर मोडी गई है, जो खड़खड़ी शमशान घाट से होकर हर-की-पौड़ी की ओर बढ़ती हैं।

यह घाट नम्बर-1 2010 के पिछले महाकुंभ मेले में ही तैयार हुआ है, जहाँ रात व दिन को बाबाओँ व साधुओं के जमावड़े को विश्राम करते देखा जा सकता है। और यह घाट पुण्य स्नान के लिए आए तीर्थयात्री व पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। बाँध के दूसरी ओर पार्किंग की सुविधा है, जहाँ वाहन खड़ा कर पूरा दलवल यहाँ स्नान कर सकता है। विशेष अवसरों पर तो यहाँ सामूहिक हवन व पूजा आदि भी होते देखे जा सकते हैं। साथ में गाय-बछड़ों के झुण्ड आदि भी यहाँ सहज रुप में चरते व भ्रमण करते मिलेंगे।

घाट न.1 से जब आगे बढ़ते हैं, तो बीच में थोड़ी दूरी पर 2,3,4,5,6,7,8,9 घाट पड़ते हैं। जो सार्वजनिक न होकर थोड़े अलग-थलग हैं। यहाँ प्रायः शात एकांत स्थल की तलाश में घूम रहे यात्री, साधु व स्थानीय लोग जाते हैं, गंगाजी का सान्निध्य लाभ लेते हैं और ध्यान के कुछ पल बिताते हैं। घाट नं 6,7 से नील धारा की ओर से बहकर आती गंगाजी की वृहद निर्मल धारा के भव्य दर्शन होते हैं, जहाँ गंगाजी बहुत सुंदर नजारा पेश करती हैं। वसन्त के मौसम में यहाँ विदेशों से आए माइग्रेटरी पक्षियों के झुण्डों को जल क्रीड़ा करते देखा जा सकता है। इनके झुण्डों का नजारा वेहदर खूवसूरत व दर्शनीय रहता है।

गंगा तीरे, उत्तरीय हरिद्वार
 

घाट 10 – बाबाओं की जल समाधि के लिए बना है, जिसमें अब जन-जागरुकता एवं पर्यावरणीय संवेदना के चलते धीरे-धीरे यह चलन कम हो रहा है। यहाँ से सामने नीलधारा का दृश्य प्रत्यक्ष रहता है और इसके ऊपर घाट 11 – 12 पड़ते हैं, जहाँ साधु-बाबाओं की कुटियाएं सजी हैं। बंधे के पार भूमा निकेतन आश्रम है, जिसके संरक्षण में घाट के मार्ग में बनी कुटियानुमा विश्राम स्थल व नदी के तट पर कलात्मक दृश्यों का अवलोकन किया जा सकता है। यहाँ भी शाम को दर्शनार्थियों की काफी भीड़ रहती है। इसके आगे घाट 13 निर्जन स्थान पर पड़ता है। बहुत कम ही लोग यहाँ तक आ पाते हैं।

फिर घाट 14 – धर्मगंगा घाट के रुप से जाना जाता है, जो तीर्थयात्रिंयों के बीच खासा लोकप्रिय है। यहाँ की एक विशेषता है सामने आ रही गंगा की निर्मल धार, जिसका नजारा देखने लायक रहता है व इसमें पक्षियों का क्रीडा क्लोल बहुत सुंदर नजारा पेश करता है। यह लोकेशन फोटोग्राफी के लिए भी बहुत उपयुक्त रहती है। आश्चर्य नहीं कि दिनभर यहाँ यात्रियों का जमावड़ा लगा रहता है, जिसमें जल का स्तर स्वल्प होने के कारण यह गंगा स्नान के लिए सर्वथा उचित रहता है। पानी का जल स्तर बढ़ने पर यहाँ स्नान के दौरान सावधानी अपेक्षित रहती है। इसमें  परमार्थ आश्रम द्वारा संचालित इस घाट में शाम को गंगा आरती होती है, जिसमें पर्याप्त लोगों की भीड़ रहती है।

घाट 15 – संत पथिक घाट के रुप में जाना जाता है। इसके मार्ग में संत पथिक की समाधि मंदिर है। यह भी साधु भक्तों व साधकों के लिए विश्राम व ध्यान का लोकप्रिय ठिकाना है। भारतमाता मंदिर और शांतिकुंज का ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी इसी की सीध में पड़ता है। इसी के आगे है घाट 16, जो बालाजी घाट के नाम से जाना जाता है। इसमें हनुमानजी एवं शिवपरिवार के विग्रह गंगा स्नान के लिए आए दर्शनार्थियों के लिए वंदनीय रहते हैं। यहाँ भी शाम को लोगों को ध्यान विश्राम से लेकर स्नान करते देखा जा सकता है। यहाँ भी गाय-बछडों व पक्षियों का जमावड़ा देखा जा सकता है, जिन्हें श्रद्धालु कुछ न कुछ खिलाते रहते हैं।

इसके आगे आता है, घाट 17 – पाण्डव घाट, जहाँ पंचमुखी हनुमानजी एवं सप्तऋषियों की प्रतिमाएं स्थापित है। पाण्डवों के स्वर्गारोहण के भी यहाँ पार्क में विग्रह स्थापित हैं। इसे सप्तसरोवर घाट के नाम से भी जाना जाता है। यह भी दर्शनार्थियों के बीच लोकप्रिय घाट है, जिसमें आरती पूजा से लेकर धार्मिक कार्यक्रम पास के शिवमंदिर में चलते रहते हैं। यहाँ के प्रशिक्षित पुजारी से विधि विधान से पूजापाठ व कर्मकाण्ड की सेवा उपलब्ध रहती है।

इसके आगे घाट 18 – गंगा कुटीर घाट है, इसके सामने का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है। यह स्नान-विश्राम का एक लोकप्रिय स्थल है। इसके आगे आता है घाट 19 - विरला घाट। जिसके सामने थोड़ी आगे गंगाजी की धारा में लोगों को खेलते देखा जा सकता है और यहीं से वे उस पार टापूओं में भी आगे बढ़ते हैं। और अंत में इसके आगे आता है, घाट 20 जिसे व्यास मंदिर घाट के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत की शैली में बने व्यास मंदिर का निकास यहाँ होता है। इसके किनारे गंगाजी की पतली धारा बहती है, जिसमें यात्रियों को पूजा पाठ से लेकर स्नान करने की सुविधा है। घाट की कुर्सियों व बेंचों पर बैठकर सामने के टापू का सुन्दर नजारा निहारा जा सकता है। दूर पहाड़ व इनकी गोद में बसे गाँवों का विहंगम दर्शन भी यहाँ सुलभ रहता है।

इस तरह गंगा किनारे 1 से लेकर 20 नम्बर तक के घाट यात्रियों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों व स्थानीय नागरिकों के दैनिक जीवन का अहं हिस्सा हैं। सुबह-शाम इनके किनारे बनें बाँध पर टहलने का आनन्द लिया जा सकता है और इनके किनारे गंगातट पर कुछ पल ध्यान, आत्म चिंतन व मनन के बिताए जा सकते हैं। प्रकृति की मनोरम गोद में बसे ये घाट व इनके किनारे बाँध का रुट भ्रमण के लिए आदर्श है। इन घाटों के किनारे गंगाजी के सात्विक प्रवाह के साथ दिव्य वातावरण में कुछ पल बिताकर पुण्य लाभ से लेकर आत्म-शांति सहज रुप में पायी जा सकती है।

गंगा किनारे बाँध के ऊपर भ्रमण-टहल पथ, उत्तरी हरिद्वार

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