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रविवार, 31 दिसंबर 2023

मेरी चौथी झारखण्ड यात्रा, भाग-2

 

सुवर्णरेखा के संग टाटानगर से राँची का सफर

कुछ घंटे जमशेदपुर में नींद पूरा करके तरोताजा होने के बाद प्रातः 7 बजे हम टाटानगर से राँची की ओर चल पड़ते हैं। यात्रा में एक नया अनुभव जुड़ने वाला था, साथ ही आवश्यक कार्य की पूर्णाहुति भी होने वाली थी। बस स्टैंड तक पहुँचते-पहुँचते राह में जमशेदपुर में टाटा उद्योग का विस्तार देखा और समझ आया कि इसे टाटानगरी क्यों कहते हैं, अगले 3-4 दिनों यहीं प्रवास का संयोग बन रहा था, जिसमें थोड़ा और विस्तार से इसके अवलोकन का संयोग बन रहा था, जिसकी चर्चा एक अलग ब्लॉग में की जाएगी।

बस स्टैंड से हम बस में चढ़ जाते हैं और रास्ते में दायीं ओर एक शांत-स्थिर नदी के किनारे आगे बढ़ते हैं।

सुवर्णरेखा नदी को पार करते हुए, टाटानगर से राँची

देखकर सुखद आश्चर्य़ हो रहा था कि शहर इतनी सुंदर नदी के किनारे बसा है। नदी के साथ शहर के मायने बदल जाते हैं। जिन शहरों में नदी का अभाव रहता है, वहाँ कुछ मौलिक कमी खटकती रहती है, यथा चण्डीगढ़, नोएडा, दिल्ली, शिमला, मसूरी जैसे शहर तमाम खूबियों के वावजूद बिना नदी के कुछ अधूरे से लगते हैं।
सुवर्णरेखा नदी के बारे में स्थानीय लोगों से चर्चा व कुछ सर्च करने पर पता चला की यह नदी 395 किमी लम्बी है, जो राँची के पास छोटा नागपुर क्षेत्र के एक गाँव से निस्सृत होती है और झारखण्ड, पश्चिमी बंगाल औऱ उड़ीसा को पार करती हुई आखिर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के रेतीय तटों में स्वर्ण के कण मिलने के कारण इसका नाम स्वर्णरेखा नदी पड़ा। हालाँकि इसके किनारे अत्यधिक खनिजों के उत्खनन तथा शहरी प्रदूषण के कारण इसकी निर्मल धार मैली हो चली है, लेकिन स्वर्ण रेखा के रुप में इसकी पहचान इसको विशिष्ट बनाती है, जिसकी निर्मलता पर ध्यान देने की जनता व सरकारी हर स्तर पर आवश्यकता है।
नीचे के वीडियो में चलती बस से लिए गए दृश्य के संग स्वर्णरेखा नदी की झलक ले सकते हैं -

कुछ मिनट के बाद पुल से इस नदी को पारकर बस शीघ्र ही शहर के बाहर हो जाती है, आगे हरे-भरे पहाड़ों के बीच हम बढ़ रहे थे। बाद में पता चला की यह शांत नदी यहाँ की ऐतिहासिक स्वर्ण रेखा नदी है, जिसमें स्वर्ण की प्रचुरता के कारण इसका यह नाम पड़ा। संभवतः यहाँ के आदिवासी नायक बिरसा मुण्डा को समर्पित चौराहे से हम वांय मुड़ते हैं।


दायां मार्ग संभवतः डिम्णा झील की ओर जा रहा था, जो यहाँ की एक मानव निर्मित झील है और पर्यटन का एक प्रमुख आकर्षण भी, जिसकी चर्चा हम दूसरे ब्लॉग में करेंगे।

अब हम टाटानगर-राँची एक्सप्रेस हाइवे पर आगे बढ़ रहे थे। फोर लेन के स्पाट, सुव्यस्थित एवं सुंदर सड़क पर बस सरपट दौड़ रही थी। स्वर्णरेखा नदी की हल्की झलक बायीं और पुनः राह में मिलती है। फिर संकड़ी पहाड़ियों के बीच बस आगे घाटी में प्रवेश करती है। अब हम कोडरमा वन्य अभयारण्य के बीच से गुजर रहे थे, जिसका प्रवेश द्वारा भी रास्ते में दायीं और दिखा, जो अन्दर 2 किमी दर्शा रहा था। इसमें अन्दर क्या है, यह अगली यात्राओं के लिए छोड़कर हम आगे बढ़ रहे थे।

बीच-बीच में टोल-प्लाजा के दर्शन हो रहे थे, जो नवनिर्मित एक्सप्रेस हाइवे की यादें ताजा कर रहे थे। यही स्थिति हरिद्वार से देहरादून, हरिद्वार से अम्बाला-चण्डीगढ़ एक्सप्रैस वे पर देखने को मिलती है। मालूम हो कि राँची-टाटानगर एक्सप्रेस वे तीन वर्ष पहले ही बनकर तैयार हुआ है। पहले इस रास्ते में 4-5 घंटे लगते थे, आज मात्र 2 घंटे में हमारी यात्रा पूरी हो रही थी। निश्चित रुप से अपने भव्य सड़क निर्माण के लिए सरकार का राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण साधुवाद का पात्र है, जो देशभर में विकास की नई पटकथा लिख रहा है।

रास्ते में जंगल के साथ तलहटी में खेतों से पटी घाटियों के दर्शन होते रहे, जिसमें प्रातः कुछ-कुछ किसान सक्रिय थे, लेकिन दोपहर की बापिसी तक इसमें बच्चों, महिलाओं व युवाओं के समूह भी जुड़ चुके थे, जिनके समूहों में दर्शन हो रहे थे। कुछ खेत में काम कर रहे थे, कुछ भेड़-बकरियों व गाय को चरा रहे थे, कुछ धान की फसल काट रहे थे, तो कहीं-कहीं फसल की थ्रेशिंग हो रही थी, बोरों में धान पैक हो रहा था तथा कहीं-कहीं खेत के किनारे ही बोरियों में धान लोड़ हो रहा था, कुछ सड़कों के किनारे संभवतः आगे मार्केट के लिए बोरियों के ढेर जमा कर रहे थे। पहली यात्रा के दौरान धनवाद-राँची के बीच जितने जल स्रोत मिले थे, इतने तो इस सीजन में इस मार्ग में नहीं दिखे, लेकिन रास्ते में दो मध्यम आकार की नदियों के दर्शन अवश्य हुए।


ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के दर्शन, बीच-बीच में मन को रोमाँचित करते रहे, सहज ही गृह प्रदेश के गगनचुंबी पहाडों से इनकी तुलना होती रही। नजदीक जाकर इनको देखने का मन था कि इसमें लोग कैसे रहते होंगे। निश्चित रुप से इनमें आदिवासियों की गाँव-बस्तियाँ बसी होंगी, जो इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। रास्ते में चट्टानी पहाड़ जगह-जगह ध्यान आकर्षित करते रहे।



खनिज भंडार से सम्पन्न झारखण्ड के पहाड़ों में यह कोई नई बात नहीं थी। इनमें कौन से खनिज होंगे, ये तो क्षेत्रीय लोग व विशेषज्ञ ही बेहतर बता सकते हैं। हम तो अनुमान भर ही लगाते रहे।

रास्ते में राँची के समीप (लगभग 30 किमी दूर) नवनिर्मित हनुमानजी व काली माता के मंदिरों का युग्म ध्यान आकर्षित किया, जो सामान्य से हटकर प्रतीत हो रहा था।


बाद में पता चला कि यह घाटी सोशल मीडिया में चर्चा का विषय रहती है, यहाँ टाइम जोन बदल जाता है। कुछ यहाँ भूतों की कहानियां जोड़ते हैं, जहाँ भयंकर दुर्घटनाएं होती रही हैं। वैज्ञानिक का मानना है कि यहाँ संभवतः धातु के पहाडों के कारण कई तरह की अजूबी घटनाएं व दुर्घटनाएं होती होंगी। जो भी हो मंदिर बनने के बाद से मान्यता है कि ऐसी दुर्घटनाओं में कमी आई है।

दो घंटे में हम राँची के समीप पहुँच रहे थे, रास्ते में दशम जल प्रपात का बोर्ड़ मिला। समय अभाव के कारण अभी इसके दर्शन नहीं कर सकते थे, जिसे अगली यात्रा की सूचि में डाल देते हैं। अपने गन्तव्य पर बस से उतरकर ऑटो कर ग्रामीण आंचल में स्थित अकादमिक संस्थान तक पहुँचते हैं। रास्ते में स्थानीय ढावे में पत्ते के ढोने में जलेवी को परोसने का इको-फ्रेंडली अंदाज सराहनीय लगा।


यहाँ के विश्वविद्यालय के नए परिसर को बनते देख प्रसन्नता हुई। नौ वर्ष पूर्व जो विश्वविद्यालय किसी किराए के भवन से चल रहा था, आज वह स्वतंत्र रुपाकार ले रहा था। साथ ही यहाँ एनईपी (नई शिक्षा नीति) को चरणवद्ध रुप से लागू होते देख अच्छा लगा।

बापिसी में रास्ते में चाय-नाश्ते के लिए एक ढावे पर बस रुकती है। बाहर एक क्षेत्रिय महिला ने ताजा सब्जियों व दालों के पैकेटों से भरी दुकान सजा रखी थी, जिसमें क्षेत्रीय उत्पादों का बहुत सुंदर प्रदर्शन किया हुआ था।


यहीं पर एक क्षेत्रीय परिजन से चर्चा करने पर पता चला कि यहाँ इस समय धान की फसल तैयार हो चुकी है व इसकी खेती हो रही है। थोड़ी ही दूरी पर एक नदी भी यहाँ बहती है। फलों का चलन यहाँ कम दिखा, सब्जियों का उत्पादन आवश्यकता के अनुरुप होता है। शहर की आवश्यकता को पूरा करने के हिसाब से शहरों के बास के गाँव में अधिकाँशतः सब्जि उत्पादन होता है।


बापिसी में रांची से लेकर टाटानगर को दायीं ओऱ से देखने का मौका मिला, जिसमें सुंदर पहाड़ों, छोटी-बड़ी घाटियों, खेल-खलिहानों व गाँवों के सुन्दर नजारों को देखता रहा और यथासंभव मोबाइल से कैप्चर करता रहा। 

रास्ते में क्षेत्रीय परिजन, स्कूल के छात्र-छात्राएं बसों में चढ़ रहे थे। एक सज्जन टाटानगर आ रहे थे, इनसे चर्चा के साथ यहाँ की मोटी-मोटी जानकारियां मिलती रहीं और हम अपनी जिज्ञासाऔं को शांत करते रहे।

इस राह के प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ी सुखद स्मृतियों गहरे अंकित हो रही थीं। हालाँकि सरकारी या प्राइवेट बाहनों में सफर की अपनी सीमा रहती है, इनमें बैठे आप एक सीमा तक ही अपनी खिड़की की साइड से ही नजारों को देख सकते हैं या कैप्चर कर सकते हैं। अपने स्वतंत्र वाहन में रास्ते का अलग आनन्द रहता है, जिसमें आप दृश्यों का पूरा अवलोकन कर सकते हैं तथा जहाँ आवश्यकता हो वहाँ रुककर मनभावन दृश्यों के फोटो या विडियोज बना सकते हैं।


शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

यात्रा वृतांत – मेरी दूसरी झारखण्ड यात्रा


सब दिन होत न एक समान


दिसम्बर 2014 के पहले सप्ताह में सम्पन्न मेरी पहली झारखण्ड यात्रा कई मायनों में यादगार रही, ऐतिहासिक रही। सहज स्फुर्त रुप में उमड़े भावों को अभिव्यक्ति करता मेरी पहली झारखण्ड यात्रा की ब्लॉग पोस्ट हिमवीरु ब्लॉग की सबसे लोकप्रिय पोस्ट निकली, जिसे आज भी यात्रा वृतांत सर्च करने पर गूगल सर्च इंजन के पहले पृष्ठ में देखा जा सकता है।
लगभग 5 वर्ष बाद पिछले दिनों (16-20जुलाई2018) सम्पन्न हमारी दूसरी यात्रा पहली यात्रा का एक तरह से फोलो अप था। लेकिन समय की धारा कहाँ कब एक समान रहती है, इस बार के अनुभव एकदम अलग रहे। अकादमिक उद्देश्य से सम्पन्न यह यात्रा थर्ड ऐसी में रिजर्वेशन का संयोग न होने के कारण स्लीपर क्लास में रही, जो तप एवं योगमयी अनुभवों के साथ फलित हुई, लगा हमारे किन्हीं प्रारब्धों के काटने की व्यवस्था इसमें थी। काफी समय बाद रेल में सफर का संयोग बन रहा था, जो हमें हमेशा की तरह रोमाँचित कर रहा था। इस बार हमारे साथ Where is my train ऐप्प की अतिरिक्त सुबिधा थी, जिसमें हमें ट्रेन का स्टैंडर्ड समय, उसका हर स्टेशन व उसकी लेट-लतीफी की सटीक जानकारी उपलब्ध हो रही थी।

रात 10 बजे हरिद्वार से दून एक्सप्रेस में चढ़ते हैं। साइड अपर बर्थ में सीट मिलने के कारण चैन से रात का सफर कट गया, सुबह नित्यकर्म से निपटने के बाद चाय व नाश्ता के साथ दिनचर्या आगे बढ़ती है। ट्रेन भी कहीं छुकछुक तो कहीं फटड़-फटड़ कर अपनी मंजिल की ओर सरपट दौड़ रही थी। पठन सामग्री और मोबाईल साथ होने के कारण हम यात्रा के अधिकाँश समय अपने अध्ययन, चिंतन-मनन व विचारों की दुनियाँ में मश्गूल रहे। रास्ते में जहाँ लेटे-लेटे व पढ़ते-लिखते बोअर हो जाते, चाय की चुस्की के साथ तरोताजा होते। जहाँ थक जाते, वहाँ करबट पलट कर छपकी लेते।


पता ही नहीं चला कि कब हम बनारस पहुँच चुके थे। यहां गंगामैया व बनारस शहर के दर्शन की उत्कट जिज्ञासा एवं इच्छा के चलते हम नीचे सीट पर उतरे व गंगाजी के किनारे बसे बनारस शहर को पुल से निहारते रहे। यहाँ गंगाजी काफी बिस्तार लिए दिखी, जिस पर नावें चल रहीं थी व कुछ किनारे पर खड़ी थी। पुल को पार करने के कुछ मिनट बाद हम काशी नगर से गुजर रहे थे। यहाँ ट्रेन किन्हीं कारणवश रुक जाती है। ट्रेन ऐसी जगह खड़ी थी कि यदि हम पीछे पानी लेने जाते तो ट्रेन छुटने का ड़र था और आगे दूर-दूर तक पानी का काई स्रोत नजर नहीं आ रहा था। 


ट्रेन के समानान्तर दूसरी ट्रेन रुकती है, जिसकी पेंट्रीकार से पानी की गुजारिश करते हैं, लेकिन कोई व्यवस्था नहीं हो पाती। पानी के कारण गला सूख रहा था। उपलब्ध पानी गर्म होने के कारण प्यासे कंठ को तर नहीं कर पा रहा था। चिल्लड़ पानी ही ऐसे में एक मात्र समाधान था। ठंडे पानी की खोज इस कदर विफल रही कि अंततः थकहार कर बैठ गए और काशीबाबा को याद किए, कि तेरी नगरी में पीने के पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं, यह कैसे हो सकता है। पुकार गहराई से एकांतिक रुप ले चुकी थी व बाहर पानी की खोज बंद हो चुकी थी।
ट्रेन भी आगे सरकना शुरु हो गई थी। इसी बीच पानी-पानी की आवाज आती है। एक लम्बा सा नौजवान ठंडे पानी की बोतल के साथ हमारे ढब्बे में प्रवेश करता है। यह पल हमारी मुराद पुरा होने जैसे लग रहे थे। इनसे हम एक नहीं दो बोटल पानी की लेते हैं और पानी इतना मीठा निकला, लगा जैसे गंगाजल पी रहे हैं। तहेदिल से धन्यवाद की पुकार उठी। पूछने पर कि इतना मीठा पानी कहाँ से लाए, नौजवान का बिनम्र सा जबाब था कि साहब हम क्या जाने, हम तो पानी बेचते हैं। उसके जबाब का लेहजा, बिनम्र स्वभाव, चेहरे का सरल किंतु तेजस्वी स्वरुप व स्वाभिमानी व्यक्तित्व, हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई पानी बेचने वाला आम व्यक्ति सामने खड़ा है। ह्दय के भावों में हम कहीं गहरा उतर चुके थे, संवाद जैसे काशीबाबा से परा-पश्यंती स्तर पर चल रहे थे।


ऐसा ही अनुभव हमारा बापसी में कानपुर शहर के पास का रहा। यहाँ भी ट्रेन काफी देर रुकी रही। हालांकि इस बार हम पानी की उचित व्यवस्था कर रखे थे। किंतु गर्मी से तप रही ट्रेन की छत पूरे डिब्बे को तपा रही थी। गर्मी और नमी के बीच ठहरी गाड़ी ने डिब्बे को तपा रखा था। सहज ही स्मरण आ रहे थे इन पलों में अलीपुर जेल की तंग कोठरी में बैठे श्रीअऱविंद, आसनसोल जेल की कालकोठरी में कैद आचार्य़ श्रीराम, जिन्होंने जेल को ही तपस्थली में बदलकर जीवन के गहन सत्य को पा लिया था। याद आ रहे थे तिलक, गांधीजी व नेहरु जिन्होंने जेल को ही अपनी सृजन स्थली में रुपांतरित कर कालजयी रचनाओं को सृजित किया था। हम भी इन पलों को स्वाध्याय-तप व योगमय बनाने का प्रयास कर रहे थे और मन को समझा रहे थे कि ये पल कुछ देर के हैं, ये भी बीत जाएंगे। और थोड़ी ही देर में आश्चर्य तब हुआ जब बादल उमड़ पड़े, कुछ बरस गए और साथ ही ट्रेन भी चल पड़ी। फिर हवा के ठंडे झौंकों के साथ विकट समय पार हो चुका था। 
खेर, धनवाद की ओर बढ़ रही रेल यात्रा में आगे कुछ देर तक हम बाहर के नजारों को निहारते रहे। राह में हरे-भरे खेत आँखों को ठंडक तो मन को सकून देते रहे।


बीच में ही हमें शाम होती है, रात भर के सफर के बाद हम सुबह 4 बजे धनवाद पहुँच चुके थे, जहाँ से हमें दूसरी ट्रेन, वनांचल एक्सप्रेस अगले चार घंटे में राँची पहुंचाने वाली थी। मार्ग में सुबह हो रही थी। रास्ते में कटराजगढ़ और फुलवर्तन स्थलों में पत्थर व कोयले के पहाड़ों को पार करते हुए हम आगे बढ़े, जो स्वयं में एक नया एवं अनूठा अनुभव था।
रास्ते में कुछ स्थानों पर फाटक को पार करती ट्रैन के साथ इंतजार करती अनुशासित जनता के दृश्य सुखद लगे। इससे भी अधिक खुशी हो रही थी चलती ट्रेन से तड़ातड़ शॉट लेते हुए ऐसे नजारों को कैप्चर करना व इनमें से अपने अनुकूल एक सही व सटीक शॉट को पाना। इस ब्लॉग के अधिकाँश शॉट इसी तरह चलती ट्रेन से लिए गए, आखिर ट्रेन हमारी पसंद के नजारों के लिए रुकने के लिए बाधित कहाँ थी।



 इसी तरह रास्ते में पलाश के पेड़ और बाँस के झुरमुटों के शॉट लिए गए, जो यहाँ बहुतायत में पाए जाते हैं।



 रास्ते में कई नालों के साथ कुछ छोटी-मोटी नदियां दिखीं, जो पता चला कि सब मिलकर दामोदर नदी में समा जाती हैं। रास्ते में चंद्रपुरा जंक्शन पर सूर्याेदय का स्वर्णिम नजारा पेश होता है। राह में बोकारो स्टील प्लांट के दूरदर्शन होते रहे, जहाँ से कोयले को माल गाड़ियों के डब्बों में आगे सरकाया जा रहा था। 


इस बार यात्रा का समय अलग था, सो अनुभव भी कुछ अलग रहे। इस बार मोबाईल कैमरा साथ होने के कारण डिब्बे के दरबाजे पर खड़े होकर बाहर के नजारों को निहारते रहे व उचित दृश्य् को केप्चर करते रहे। रास्ते में किसानों को बहुतायत में बेलों की जोड़ी के संग खेतों को जोतते पाया। यहाँ धान की पनीरी भी विशेष ढंग से खेतों के बीचों-बीच उगायी जाती है।

खेतों में अधिकांशतः महिलाओं को भी धान की रोपाई करते पाया। हमारी जानकारी में यह धान की रोपाई का प्रचलित चलन है, पुरुष बैलों को जोतते हैं, तो महिलाएं धान की रोपाई करती हैं। ऐसे ही खेतों की पृष्ठभूमि में रास्ते में दूर एक गुम्बदाकार चट्टानी पहाड़ मिला। ऐसा पहाड़ हम जिंदगी में पहली बार देख रहे थे व यह हमारे मन में कई जिज्ञासाओं व कौतुक को जगा रहा था। हम आश्चर्य कर रहे थे कि ऐसे चट्टानी पहाड़ पर चढ़ाई कितनी कठिन होती होगी, इसके शिखर तक लोग कैसे पहुँचते होंगे। पूछने पर कोई हमें इस पहाड़ के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं दे पाया। इस पहाड़ को हम ट्रेन से निहारते रहे, जब तक कि यह दृष्टि से औझल न हुआ।


खेतों के साथ जंगल तो रास्ते भर मिलें, लेकिन गंगाघाट के बाद जंगल का नजारा अलग ही था। पाँच वर्ष पूर्व हम इस क्षेत्र में जो छोटी पौध देखे थे, वे अब बड़े हो चुके हैं, लगा वन विभाग ने इनमें और इजाफा किया है। 
निसंदेह रुप में किसी भी रेल्वे ट्रेक या मोटर मार्ग के दोनों और वृक्षारोपण व वनों की बहुतायत सफर को कितना सुंदर, सुकूनदायी एवं शीतल बनाती है, यह यहाँ देखकर अनुभव हो रहा था।



इस तरह हम राँची पहुँचते हैं, पाँच साल पहले के स्टेशन से आज का स्टेशन अलग नजर आ रहा था। लगा प्रधानमंत्री मोदीजी ने जो सफाई अभियान चला रखा है, उसका असर हो रहा है। स्टेशन पर ही मशीनें खड़ी थी। सामने ही इनको पूरे प्लेटफॉर्म की सफाई करते देखा। सफाई को लेकर विकसित हो रही यह सजगता एक शुभ संकेत है, देश की प्रगति का आशादायी मानक है। 

स्टेशन से बाहर निकलते ही बारिश की हल्की फुआर भी शुरु हो गई थी, जिसे हम प्रकृति द्वारा यहाँ अपना स्वागत अभिसिंचन मान रहे थे। अपना अकादमिक कार्य पूरा होने के बाद हम पुनः स्टेशन की ओर आते हैं, जहाँ पर वॉकिंग डिस्टेंस पर मौजूद विश्वविख्यात आध्यात्मिक संस्थान, योगदा सोसायटी के मुख्यालय जाने का पावन संयोग बनता है। 



पिछली वार समय अभाव के कारण यहाँ नहीं पधार पाए थे, जबकि यह रेल्वे स्टेशन से एकदम पास है। जिस आध्यात्मिक पत्रिका को हम मुद्दतों से खोज रहे थे, आज हमें वह उपलब्ध हो रही थी। साथ ही कुछ दुर्लभ साहित्य भी हमें यहाँ उपलब्ध हुआ, जो स्वाध्याय एवं शोध की दृष्टि से उपयोगी था। यहाँ महायोगी परमहंस योगानन्द के कक्ष में ध्यान के कुछ पल विताए। पूरा परिसर प्रकृति की सुरम्य गोद में बसा है, इसका हरा-भरा, साफ-सुथरा, शांत-एकांत परिसर दिव्यता से ओतप्रोत है, जिसे यहाँ आकर अनुभव किया जा सकता है।

रात को बापसी का सफर तय होता है। दिन में पुनः कानपुर के पास तपोमय पलों का जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं। कानपुर से आगे बरसात की फुआर ने सफर को खुशनुमा कर दिया था। सुबह दिल्ली आईएसबीटी पर पहुँचते हैं। इस समय काँबड़ मेला चल रहा था, सो कांबड़ियों की भीड़ के बीच सीधे हरिद्वार के लिए बस कठिन थी, देहरादून से डायवर्टिड रुट ही हमें उचित लगा। 


यहाँ शुरु में पसीने से तर-बतर होने का अभ्यास एवं मनोभूमि काम आयी, लेकिन जैसे ही बस आगे बढ़ी, ठंडी हवा रास्ते भर स्वागत करती रही। साथ ही यह रास्ता हरे-भरे खेतों, आम-अमरुद के बगीचों व साल के जंगलों से भरा अधिकाँशतः सुकूनदायी रहा। देहरादून से हरिद्वार बस हमें सीधे देसंविवि के गेट पर उतारती है। इस तरह कुछ नयी यादों, जीवन के अनुभवों व सीख के साथ झारखण्ड की दूसरी यात्रा सम्पन्न होती है। जो पहली यात्रा से तुलना करने पर संदेश दे रही थी कि जीवन चलने का नाम है, समय कब किसके लिए ठहरता है। और फिर किसी ने सच ही कहा है कि, सब दिन होत न एक समान।
 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

यात्रा वृतांत - मेरी पहली झारखण्ड यात्रा


धनबाद से राँची का ट्रेन सफर



यह मेरी पहली यात्रा थी, झारखण्ड की। हरिद्वार से दून एक्सप्रेस से अपने भाई के संग चल पड़ा, एक रक्सेक पीठ पर लादे, जिसमें पहनने-ओढने, खाने-पीने, पढ़ने-लिखने व पूजा-पाठ की आवश्यक सामग्री साथ में थी। ट्रेन की स्टेशनवार समय सारिणी साथ होने के चलते, ट्रेन की लेट-लतीफी की हर जानकारी मिलती रही। आधा रास्ता पार करते-करते ट्रेन 4 घंटे लेट थी। उम्मीद थी कि, ट्रेन आगे सुबह तक इस गैप को पूरा कर लेगी, लेकिन आशा के विपरीत ट्रेन क्रमशः लेट होती गयी। और धनबाद पहुंचते-पहुंचते ट्रेन पूरा छः घंटे लेट थी।

रास्ते में भोर पारसनाथ स्टेशन पर हो चुकी थी। सामने खडी पहाड़ियों को देख सुखद आश्चर्य़ हुआ। क्योंकि अब तक पिछले दिन भर मैदान, खेत और धरती-आकाश को मिलाते अनन्त क्षितिज को देखते-देखते मन भर गया था। ऐसे में, सुबह-सुबह पहाड़ियों का दर्शन एक ताजगी देने वाला अनुभव रहा। एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा पहाड़ देखकर रुखा मन आह्लादित हो उठा। हालांकि यह बाद में पता चला की यहाँ पहाड़ी के शिखर पर जैन धर्म का पावन तीर्थ है।


धनबाद पहुंचते ही ट्रेन रांची के लिए तुरंत मिल गयी थी। 11 बजे धनबाद से राँची के लिए चल पड़े। धनबाद से राँची तक का वन प्रांतर, खेत, झरनों, नदियों, कोयला खदानों व पर्वत शिखरों के संग ट्रेन सफर एक चिरस्मरणीय अनुभव के रुप में स्मृति पटल पर अंकित हुआ।

रास्ते में स्टेशनों के नाम तो याद नहीं, हाँ साथ में सफर करते क्षेत्रीय ज्वैलर बब्लू और पॉलिटेक्निक छात्र अमर सिंह का संग-साथ व संवाद याद रहेगा। इनके साथ आटा, गुड़, घी से बना यहाँ का लोकप्रिय ठेकुआ, आदिवासी अम्मा द्वारा खिलाए ताजे अमरुद और कच्चे मीठे आलू का स्वाद आज भी ताजा हैं। स्टेशन पर इडली और झाल मुईं यहाँ का प्रचलित नाश्ता दिखा। साथ ही यहाँ राह में ठेलों पर कमर्शियल सेब खूब बिक रहा था, जिसे हमारे प्रांत में पेड़ से तोड़कर शायद ही कोई खाता हो। (क्योंकि यह बहुत कड़ा होता है, पकाने पर कई दिनों बाद ही यह खाने योग्य होता है)


रास्ते में तीन स्टेशन बंगाल प्रांत से जुड़े मिले। यहाँ जेट्रोफा के खेत दिखे, जिनसे  पेट्रोलियम तैयार किया जाता है। पता चला कि झारखँड में देश की 45 फीसदी कोयला खदाने हैं और यह यूरेनियम का एकमात्र स्रोत वाला प्रांत है। इसके बावजूद राजनैतिक अस्थिरता का दंश झेलती जनता का दर्द साफ दिखा। 2000 में अस्तित्व में आए इस प्रांत में अब तक 15 वर्षों में 9 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं। हाल ही में पिछले सप्ताह हुए चुनाव में भागीदार जनता का कहना था कि इस बार मिली जुली सरकार के आसार ज्यादा हैं। अखबारों से पता चला कि आज रांची में प्रधानमंत्री मोदी जी की रैली है। (हालाँकि मोदी लहर के चलते परिणाम दूसरे रहे और आज वहाँ एक स्थिर सरकार है।)
रास्ते में हर आधे किमी पर एक नाला, छोटी नदी व रास्ते भर जल स्रोत के दर्शन अपने लिए एक बहुत ही सुखद और रोमाँचक अनुभव रहा। इनमें उछलकूद करते बच्चे, कपड़े धोती महिलाएं औऱ स्नान करते लोगों को देख प्रवाहमान लोकजीवन की एक जीवंत अनुभूति हुई। खेतों में पक्षी राज मोर व तालावों में माइग्रेटरी पक्षियों के दर्शन राह में होते रहे। साथ ही तालाब में लाल रंग के खिलते लिली फूल इसमें चार चाँद लगा रहे थे।

इस क्षेत्र की बड़ी विशेषता इसकी अपनी खेती-बाड़ी से जुड़ी जड़ें लगी। धान की कटाई का सीजन चल रहा था। कहीं खेत कटे दिखे, तो कहीं फसल कट रही थी।  कहीं-कहीं ट्रेक्टरों में फसल लद रही थी। धान के खेतों में ठहरा पानी जल की प्रचुरता को दर्शा रहा था। अभी सब्जी और फल उत्पादन व अन्य आधुनिक तौर-तरीकों से दूर पारम्परिक खेती को देख अपने बचपन की यादें ताजा हो गयी, जब अपने पहाड़ी गाँवों में खालिस खेती होती थी।(आज वहाँ कृषि की जगह सब्जी, फल और नकदी फसलों (कैश क्रोप) ने ले ली है। जबकि यहाँ की प्रख्यात पारम्परिक जाटू चाबल, राजमा दाल जैसी फसलें दुर्लभ हो गई हैं।) लेकिन यहाँ के ग्रामीण आंचल में अभी भी वह पारंपरिक भाव जीवंत दिखा। फिर हरे-भरे पेड़ों से अटे ऊँचे पर्वतों व शिखरों को देखकर मन अपने घर पहुँच गया। अंतर इतना था कि वहाँ देवदार और बाँज के पेड़ होते हैं तो यहाँ साल और पलाश के पेड़ थे। ट्रेन सघन बनों के बीच गुजर रही थी, हवा में ठंड़क का स्पर्श सुखद अहसास दे रहा था। स्थानीय लोगों से पता चला कि रात को यहाँ कड़ाके की ठंड पड़ती है। रास्ते में बोकारो स्टील प्लांट के दूरदर्शन भी हुए। पता चला कि बोकारो का जल बहुत मीठा होता है।

रास्ते में साल के पनपते वन को देख बहुत अच्छा लगा। यहाँ के वन विभाग का यह प्रयास साधुवाद का पात्र लगा। ट्रेन में गेट पर खड़ा होकर वनों, पर्वत शिखरों का अवलोकन का आनन्द लेता रहा। साथ ही मोड़ पर ट्रेन के सर और पूँछ दोनों को एक साथ देखने का नजारा, हमें शिमला की ट्वाय ट्रेन की याद दिलाता रहा। हालाँकि यहाँ के वनों में बंदर-लंगूर का अभाव अवश्य चौंकाने वाला लगा।

राँची से कुछ कि.मी. पहले बड़े-बड़े टॉवर दिखने शुरु हो गए। बढ़ती आबादी को समेटे फूलते शहर का नजारा राह की सुखद-सुकूनदायी अनुभूतियों पर तुषारापात करता प्रतीत हुआ। बढ़ती आबादी के साथ पनपती गंदगी, अव्यवस्था और स्थानीय आबादी में बिलुप्त होती सरलता-तरलता मन को कचोट रही थी।

यहाँ का लोकप्रिय अखबार प्रभात खबर हाथ में लगा, जिसके ऑप-एड पेज में आधुनिक टेक्नोलॉजी के संग पनपते एकांकी जीवन के दंश को झेलते पश्चिमी जगत पर विचारोत्तेजक लेख पढ़ा। पढ़कर लगा कि यह तो पांव पसारता यहां का भी सच है। सच ही किसी ने कहा है – जितना हम प्रकृति के करीब रहते हैं, उतना ही संस्कृति से, अपनी जड़ों से जुड़े होते हैं औऱ जितना हम प्रकृति से कटते हैं, उतना ही हम खुद से और अपनी संस्कृति से भी दूर होते जाते हैं। रास्ते का यह विचार भाव रांची पहुंचते-पहुंचते सघन हो चुका था और स्टेशन से उतर कर महानागर की भीड़ के बीच मार्ग की सुखद अनुभूतियाँ धुंधली हो चुकीं थीं।

रास्ते भर मोबाइल की बैटरी डिस्चार्ज होने के कारण रास्ते के वर्णित सौंदर्य को कैमरे में कैद न कर पाने का मलाल अवश्य रहा। भारतीय रेल्वे की इस बेरुखी पर कष्ट अवश्य हुआ। लेकिन आभारी भी महसूस करता हूँ कि इसके चलते मैं रास्ते भर के दिलकश नजारों को अपनी आंखों से निहारता हुआ, स्मृति पटल पर गहराई से अंकित करता रहा, जो आज भी स्मरण करने पर एक ताजगी भरा अहसास देते हैं।
(28-29 नवम्बर, 2014)

पाँच साल बाद सम्पन्न यहां की यात्रा को आप नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं -
मेरी दूसरी झारखण्ड यात्रा, हर दिन होत न एक समान।

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