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मंगलवार, 28 मार्च 2017

चरित्र निर्माण – कुछ बातें बुनियादी

चरित्र निर्माण के मूलभूत आधार
चरित्र निर्माण के बिना अधूरी शिक्षा – चरित्र निर्माण की बातें, आज परिवारों में उपेक्षित हैं, शैक्षणिक संस्थानों में नादारद हैं, समाज में लुप्तप्रायः है। शायद ही इसको लेकर कहीं गंभीर चर्चा होती हो। जबकि घर-परिवार एवं शिक्षा के साथ व्यक्ति निर्माण, समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण का जो रिश्ता जोड़ा जाता है, वह चरित्र निर्माण की धूरी पर ही टिका हुआ है। आश्चर्य नहीं कि हर युग के विचारक, समाज सुधारक चरित्र निर्माण पर बल देते रहे हैं। चरित्र निर्माण के बिना अविभावकों की चिंता, शिक्षा के प्रयोग, समाज का निर्माण अधूरा है। 

प्रस्तुत है इस संदर्भ में कुछ बुनियादी बातें, जो इस दिशा में प्रयासरत लोगों के लिए कुछ सोचने व करने की दिशा में उपयोगी हो सकती हैं।



चरित्र, व्यक्तित्व का सार – चरित्र, व्यक्तित्व का सार है, रुह की खुशबू है, जीवन की महक है, जिसे हर कोई महसूस करता है। चरित्र बल के आधार पर ही व्यक्ति सम्मान-श्रद्धा का पात्र बनता है। विरोधी भी चरित्रवान की प्रशंसा करने के लिए बाध्य होते हैं। चरित्रवान के लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता। तमाम प्रतिकूलताओं के बीच चरित्रवान व्यक्ति के लिए जमाना राह छोड़ देता है। ऐसा व्यक्ति अंततः काल के भाल पर अपने कालजयी व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ जाता है। युगों तक पीढियाँ चरिवान व्यक्ति के स्मरण मात्र से धन्य अनुभव करती हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों में जूझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा शक्ति पाती है।



चरित्र निर्माण की फलश्रृतियाँ - चरित्र ही व्यक्ति की संपूर्ण सफलता को सुनिश्चित करता है। हालांकि इसमें समय लग सकता है, क्योंकि चरित्र निर्माण एक क्रमिक प्रक्रिया है, जो जीवन पर्यन्त चलती रहती है। हो सकता है, संसार-समाज की अपेक्षा के अनुकूल इसके तुरंत फल न दिख रहे हों लेकिन अंततः इसकी शक्ति अचूक और प्रभाव अमोघ है, जो सफलता के साथ गहन आत्मसंतोष लिए होती है। 

 चरित्र के अभाव में व्यक्ति की सफलता लम्बे समय तक बनी रहे, टिकी रहे, संदिग्ध है। श्रम एवं भाग्य सफलता के द्वार तो खोल सकते हैं, लेकिन इसे हर हमेशा के लिए खुले रखना चरित्रबल के आधार पर ही सम्भव होता है। चरित्र के अभाव में शिखर से नीचे रसातल में लुढ़कते देर नहीं लगती। कहने की जरुरत नहीं कि चरित्र व्यक्ति को सहज ही सामाजिक सम्मान व सहयोग दिलाता है, जनता के आशीर्वाद और दैवी अनुग्रह का अधिकारी पात्र बनाता है।


विश्वसनीयता और प्रामाणिकता चरित्र निर्माण की दो फलश्रृतियाँ हैं, जो निम्न आधार पर फलित होती हैं।

चरित्र निर्माण के मूल घटक
1.संयम सदाचार – संयम व सदाचार, चरित्र निर्माण का पहला आधार है। जबकि असंयम औऱ दुराचार, चरित्र की जड़ों पर कुठाराघात करते आत्मघाती विषैले प्रहार हैं, जो आत्म सम्मान के भाव को क्षीण करते हैं और व्यक्ति को दुर्बल बनाते हैं। चरित्र का क्षय करते हैं और आपसी रिश्तों में विश्वास को कमजोर करते हैं। जबकि संयम-सदाचार आपसी रिश्तों में वफादारी का चौखा रंग घोलते हैं, इन्हें मजबूत बनाते हैं। कहना न होगा कि संयम-सदाचार चरित्र निर्माण का पहला ठोस आधार है।
2.सादा जीवन उच्च विचार – जब आमदनी सीमित हो, लेकिन खर्चे बेशुमार। तो अपव्ययी, विलासी और फिजूलख्रर्ची का भ्रष्टाचारी होना तय है। ऐसे में चरित्र संदिग्ध बनता है, व्यक्ति की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इसी लिए सादा जीवन उच्च विचार को बुजुर्गों ने सदैव से ही सचरित्र एवं सुखी जीवन का एक स्वर्ण सुत्र घोषित किया है। जो अपनी आमदनी के अंदर जीवन निर्वाह की कला जानता है, उन्हीं का चरित्र आर्थिक आधार पर सुरक्षित व अक्षुण्ण बना रह सकता है। 

3.श्रमशील एवं कर्तव्यनिष्ठ जीवन – चरित्र का महत्वपूर्ण घटक है। और यह उदात एवं व्यवहारिक जीवन लक्ष्य की स्पष्टता के बिना संभव नहीं होता, जिसके अभाव में जीवन पेंडुलम की भाँति इधर-उधर हिलता-डुलता भर रहता है, पहुँचता कहीं नहीं। अव्यवस्थित जीवन व्यक्ति को लक्ष्य सिद्धि से वंचित रखता है। काम में रूचि न होने पर व्यक्ति टालमटोल करता है, कामचोर बनाता है। ऐसे में असफलता जीवन की नियति बन जाती है और नकारात्मक तथा कुंठित भावदशा चरित्र को दुर्बल बनाती है। श्रमशील और कर्तव्यनिष्ठा व्यक्ति को इस कुचक्र से बाहर उबारती है।


4.सकारात्मक चिंतन एवं उदार भाव – कर्मठता जहाँ आत्म गौरव के भाव को जगाती है तथा व्यैक्तिक सफलता को सुनिश्चित करती है, वहीं संकीर्ण स्वार्थ और क्षुद्र अहंकार इन उपलब्धियों को बौना और चरित्र को संिग्ध बना देते हैं। अपने साथ दूसरे जरुरतमंदों के उत्कर्ष का पारमार्थिक भाव चरित्र का अभिन्न घटक है। सिर्फ अपने ही स्वार्थ का चिंतन करने र मैं-मैं की रट लगाए रखने वाले व्यक्ति के पास कोई भी अधिक देर तक बैठना-सुनना पसंद नहीं करता। हर व्यक्ति सृजन-समाधान, आशा-उत्साह से भरा संग-साथ चाहता है, जो एक संवेदनशील एवं उदार व्यक्ति के लिए ही संभव होता है। कहना न होगा कि बिना किसी अधिक आशा-अपेक्षा के दूसरों की सेवा का भाव-चिंतन चरित्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।
सार रुप में चरित्र निर्माण के दो आधार भूत घटक हैं - अपने प्रति ईमानदारी और अपने कर्तव्य के प्रति नैष्ठिक जिम्मेदारी का भाव। इसी के आधार पर चरित्र निखरता है और सेवा का महत्तर कार्य संभव हो पाता है। अपने प्रति वेईमानी चरित्र विघटन का मुख्य कारण बनती है, जो कि व्यक्ति को अपनी ही नजरों में गिराता है। अपनी कर्तव्यों के प्रति वेईमानी इंसान की अंतर्निहित क्षमताओं को प्रकट होने से रोकती है, जो एक असफल एवं कुंठित जीवन का कारण बनती है। जबकि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया इस त्रास्दी से पार ले जाती है और व्यक्ति को जीवन की समग्र सफलता की ओर आगे बढ़ाती है।
 
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शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

चरित्र निर्माण, कालजयी व्यक्तित्व का आधार


"Character has to be established trough a thousand stumbles. Swami Vivekananda" 

चरित्र, अर्थात्, काल के भाल पर व्यक्तित्व की अमिट छाप
 
   चरित्र, सबसे मूल्यवान सम्पदा -
   कहावत प्रसिद्ध है कि, यदि धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया, यदि स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और यदि चरित्र गया, तो समझो सब कुछ गया। निसंदेह चरित्र, व्यक्तित्व क सबसे मूल्यवान पूँजी है, जो जीवन की दशा दिशा- और नियति को तय करत है। व्यक्ति की सफलता कितनी टिकाऊ है, बाह्य पहचान के साथ आंतरिक शांति-सुकून भी मिल पा रहे हैं या नहीं, सब चरित्र निर्माण के आधार पर निर्धारित होते हैं। व्यवहार तो व्यक्तित्व का मुखौटा भर है, जो एक पहचान देता है, जिससे एक छवि बनती है, लेकिन यदि व्यक्ति का चरित्र दुर्बल है तो यह छवि, पहचान दूर तक नहीं बनीं रह सकती। प्रलोभन और विषमताओं के प्रहार के सामने व्यवहार की कलई उतरते देर नही लगती, असली चेहरा सामने आ जाता है। चरित्र निर्माण इस संकट से व्यक्ति को उबारता है, उसकी पहचान, छवि को  बनाए रखने में मदद करता है, सुख के साथ आनन्द का मार्ग प्रशस्त करता है।
  
   चिंतन, चरित्र और व्यवहार -
   हम जैसा चिंतन करते हैं बैसा ही हमारा चरित्र बनता जाता है और वैसा ही व्यवहार निर्धारित होता है। कहावत प्रसिद्ध है, चिंतन, चरित्र और व्यवहार। वास्तव में चिंतन और व्यवहार मिलकर जो छाप, इंप्रिंट चित्त पर डालते हैं, उनके अनुरुप हमारा चरित्र रुपाकार लेता है। बार बार जो हम सोचते हैं, वही करते हैं और वैसा ही चित्त पर संस्कारों के रुप में च्छाई-बुराई का जखीरा इकट्ठा होता जाता है। इन्हीं पॉजिटीव और नेगेटिव संस्कारों का सम्मिलित परिणाम ही हमारे चरित्र को परिभाषित करता है और वैसा ही हमारा स्वभाव बनता जाता है। यह संस्कार, स्वभाव ही हमारे चरित्र के रुप में हमारे व्यक्तित्व की विशिष्ट छवि निर्धारित करत हैं, पहचान बनात हैं और व्यावहारिक जीवन की सफलता, असफलता को निर्धारित करत हैं।

   पशुता से इंसानियत और देवत्व की महायात्रा का हमसफर - 
   इन्हीं संस्कारों के अनुरुप इंसान विरोधाभासी तत्वों की एक विचित्र सृष्टि है। मनुष्य के अंदर एक पशु भी छिपा है, एक इंसान भी और एक देवता भी। यदि पशु की नकेल न कसी जाए, मन-इंद्रियों को संयमित अनुशासित नहीं किया गया तो उसे पिशाच, राक्षस बनते देर नहीं लगती। आज जो पाश्विक, अमानवीय, पैशाचिक घटनाएं समाज में भ्रष्टाचार, दुराचार, अपराध, हिंसा, आतंक के रुप में ताण्डब नर्तन कर रही हैं, इनमें ऐसे ही कलुषित चित्त, विकृत मानसिकता बाले तत्व सक्रिय हैं। चरित्र निर्माण की प्रक्रिया ही मनुष्य को पशुता से उपर उठाकर इंसान बनाती है, मानव से महामानव बनने की ओर प्रवृत करती है, देवत्व जिसकी स्वाभाविक परिणति होती है। सार रुप में कहें तो इंसान के पतन और उत्थान दोनों की कोई सीमा नहीं है, सारा खेल चरित्र के उत्थान पतन के ईर्द-गिर्द घूमता है। 
  
   चरित्र - स्थायी व टिकाऊ सफलता का आधार -
   प्रतिभा या योग्यता व्यक्ति को समाज में पहचान व स्थान दे सकती है, एक रेप्यूटेशन दे सकती है, लेकिन उसको टिकाऊ व स्थायी चरित्र ही बनाता है। हर कसौटी पर खरा उतरने की सामर्थ्य चरित्र देता है। चरित्र के अनुरुप ही व्यक्ति के कुछ असूल, मानदण्ड, जीवन मूल्य तय होते हैं, जिनका पालन व्यक्ति हर परिस्थिति में करता है। ये आचरण-व्यवहार की स्वनिर्धारित लक्ष्मणरेखाएं हैं जिसका वह हर हालत में पालन करता है, जिनका उल्लंघन वह होशोहवाश में नहीं कर सकता। यदि परिस्थितिवश भूल-चूक हो भी गई तो इनका प्रायश्चित परिमार्जन किए बिन चैन से नहीं बैठ सकता। यह संवेदनशीलता, यह इमानदारी ही चरित्र निर्माण का आधार है, जो व्यक्ति को विशिष्ट पहचान देती है, उसकी यूएसपी बनती है, अघोषित ब्राँड तय करती है। यह व्यक्तित्व को वह विश्वसनीयता, प्रामाणिकता देती है, जो काल के कपाट पर अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ती है।
  
   आदर्श का सही चयन महत्वपूर्ण
   जीवन में उच्च आदर्श के अनुरुप हम चित्त के संस्कारों का प्रक्षालन, परिमार्जन कर व्यक्तित्व को मनमाफिक रुपाकार दे सकते हैं। जीवन को दशा व दिशा का मनचाहा निर्धारण कर सकते हैं। अंतर की पाश्विक वृतियों को परिष्कृत कर जीवन की उच्चतर संभावनाओं को साकार कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में आदर्श का निर्धारण चरित्र निर्माण का एक निर्णायक तत्व है। आदर्श का सही निर्धारण डाकू बाल्मीकि को संत बना सकता है, वेश्या आम्रपाली को साध्वी बना सकता है, काम लोलुप तुलसी और सूरदास को एक संत बना सकता है, नास्तिक भगतसिंह को युवाओं का आदर्श बना सकता है, संशयग्रस्त नरेंद्र को कालजयी युगपुरुष बना सकता है, पश्चिमी शिक्षा में शिक्षित अरविंद को क्राँतिकारी महायोगी बना सकता है। और यही आदर्श एक आम इंसान को क्रमशः उत्थान की सीढियों पर आगे बढ़ाते हुए जीवन के चरमोत्कर्ष तक ले जा सकता है।

   चरित्र का व्यवहारिक मापदण्ड
   वस्तुतः चरित्र हमारे जीवन की सफलता, बुलंदी, चरमोत्कर्ष की सीमा का निर्धारक तत्व भी है। हम जीवन में किन ऊँचाइयों को छू पाएंगे, इसका निर्धारण चरित्र ही करता है। क्योंकि चरित्र हमारे व्यक्तित्व की जडे हैं, यह कितनी गहरी हैं या उथली, कितनी मजबूत हैं या नाजुक – ये जीवन की संभावनाओं को तय करती हैं। वास्तव में चरित्र हमारे व्यक्तित्व रुपी जंजीर की सबसे कमजोर कडी से तय होता है। हम किस बिदुं पर आकर वहक, बिखर, फिसल व टूट जाते हैं, यही हमारे चरित्र का व्यवहारिक मापदण्ड हैं, जिसके आइने में हम रोज अपनी समीक्षा कर सकते हैं। और चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को जीवन का एक अभिन्न अंग बनाते हुए, रोज खुद को तराशते हुए, अपनी संकल्प सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं।
 
   चरित्र निर्माण से सम्बन्धित अन्य लेख नीचे देख सकते हैं -
 
 

मंगलवार, 31 मार्च 2015

विद्यार्थी जीवन का आदर्श




1. जिज्ञासा, ज्ञान पिपासा, एक सच्चे विद्यार्थी का परिचय, पहचान है। वह प्रश्न भरी निगाह से जमाने को देखता है, जीवन को समझने की कोशिश करता है, उसके जबाव खोजता है और अपने विषय में पारंगत बनता है। 

2. लक्ष्य केंद्रित, फोक्स – हमेशा लक्ष्य पर फोक्सड रहता है। अर्जुन की तरह मछली की आँख पर उसकी नजर रहती है। लक्ष्य भेदन किए बिन उसे कहाँ चैन- कहाँ विश्राम। 

3. अनुशासित – लक्ष्य स्पष्ट होने के कारण, उसकी प्राथमिकताएं बहुत कुछ स्पष्ट रहती हैं। आहार विहार, विश्राम, श्रम, नींद, अध्ययन, व्यवहार सबके लिए समय निर्धारित रहता है। एक संयमित एवं अनुशासित जीवन उसकी पहचान है। 

4. आज्ञाकारी – शिक्षकों का सम्मान करता है, उनकी आज्ञा का पालन करता है। विषय में गहन जानकार होने के बावजूद शिक्षक का ताउम्र सम्मान करता है। शिक्षक हमेशा उसके लिए शिक्षक रहता है।  

5. बिनम्र – अपने ज्ञान, विशेषज्ञता, प्रतिभा का अहंकार, घमण्ड उसे छू भी नहीं पाते हैं। ज्ञान के अथाह सागर के वीच वह खुद को एक अकिंचन सा अन्वेषक पाता है और परिपूर्ण ज्ञान के लिए सतत् सचेष्ट एवं प्रयत्नशील रहता है। 

6. सहकार-सहयोग – कमजोर सहपाठियों व जरुरतमंदो की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। लेकिन, साथ ही वह अपने विद्यार्थी धर्म को जानता है और व्यवहारिक गुणों को अपनाता हुआ अति सेवा जैसी भावुकता से दूर ही रहता है। 

7. अपडेट – वह क्लास रुम की पढ़ाई तक ही सीमित नहीं रहता, अपने विषय से जुड़े देश दुनियाँ भर के घटनाक्रमों से रुबरु रहता है और विषय की नवीनतम जानकारियों से अपडेट रहता है।  

8. नियमित – वह समय की कीमत जानता है। अपनी कक्षा में पंक्चुअल रहता है, समय पर पहुँचता है। अपने साथ दूसरों के समय की भी कीमत जानता है। अतः किसी के समय को वर्वाद नहीं करता। समय का कद्रदान होता है।

9. व्यसन-फैशन आदि से दूर ही रहता है। उसका जीवन सादगी से भरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह जीवन का मजा लेना नहीं जानता। सार रुप में, वह अपने समय, संसाधन व ऊर्जा के अनावश्यक क्षय एवं बर्बादी से बचता है। 

10. मिताहारी – निश्चित रुप से वह मिताहारी होता है। स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक आहार लेता है। लेकिन अपने लक्ष्य में बाधक अहितकर या अति आहार से बचता है।

11. प्रेरक संग-साथ, बुरी संगत से अकेला भला, उसका मार्गदर्शक वाक्य होता है। यदि सही दोस्त नहीं मिल सके तो वह महापुरुषों की जीवनी व साहित्य के संग इस कमी को पूरा करता है। कहना न होगा वह स्वाध्यायप्रेमी होता है। 

12. प्रपंच से दूर – पर चर्चा, पर निंदा से दूर ही रहता है। अपने ध्येय के प्रति समर्पित उसका जीवन खुद में इतना मस्त मग्न होता है कि उसके पास दूसरों की निंदा चुग्ली व परदोषारोपण के लिए समय व ऊर्जा बच पाते हों।  

13. स्वस्थ मनोरंजन – खाली समय में स्वस्थ मनोरंजन का सहारा लेता है। प्रेरक गीत, संगीत, फिल्म आदि देखता-सुनता है। प्रकृति की गोद में जीवन के तनाव और अवसाद को दूर करना बखूवी जानता है। 

14. अंतर्वाणी का अनुसरण – सबकी सुनता है, लेकिन अपनी अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करता है। और अपने परिवेश के साथ एक सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहता है।

इस तरह एक आदर्श विद्यार्थी एक अनुशासित एवं विद्यानुरागी जीवन का नाम है, जो एक 
15. स्वतंत्र सोच एवं मौलिक चिंतन का स्वामी होता है। वह एक सृजनात्मक, आशावादी और आत्म विश्वासी जीवन जीता है और समाज व जमाने को कुछ नया देने की क्षमता रखता है और भविष्य में एक आदर्श शिक्षक व नागरिक साबित होता है।

चुनींदी पोस्ट

प्रबुद्ध शिक्षक, जाग्रत आचार्य

            लोकतंत्र के सजग प्रहरी – भविष्य की आस सुनहरी    आज हम ऐसे विषम दौर से गुजर रहे हैं, जब लोकतंत्र के सभी स्तम्...