गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

पार्वती नदी के तट पर बसा पावन मणिकर्ण तीर्थ

सर्दी में भी गर्म अहसास देता यह पावन धाम

गर्म पानी के प्राकृतिक स्रोत तो कई जगह हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में, पार्वती घाटी में बसे मणीकर्ण स्थान पर गर्म पानी के स्रोतों का जो नज़ारा है, वह स्वयं में अद्भुत है। पार्वती नदी के किनारे बसे और समुद्र तल से लगभग 6000 फुट की ऊँचाई पर स्थित इस तीर्थ में गर्म पानी के इतने स्रोत हैं कि किसी घर को पानी गर्म करने की जरुरत नहीं पड़ती। यहां तक कि खाना भी इसी में पकाया जा सकता है।


सर्दी के मौसम में यदि कोई यहाँ जाने का साहस कर सके तो, यात्रा एक यादगार अनुभव साबित हो सकती है। मणीकर्ण पावनतम् तीर्थ स्थलों में एक है। आश्चर्य नहीं कि घाटी के देवी-देवता नियत समय पर यहाँ दर्शन-स्नान करने आते रहते हैं। और आस्थावान तीर्थयात्री भी यहाँ स्नान-डुबकी के साथ अपने पाप-ताप एवं संताप से हल्का होने का गहरा अहसास लेकर जाते हैं।

कुल्लू से लगभग 10 कि.मी. पहले भुंतर नामक स्थान से मोटर मार्ग पार्वती घाटी में प्रवेश करता है। नीचे से घाटी बहुत संकरी प्रतीत होती है, लेकिन पीछे मुख्य मार्ग से जुड़ी सड़कें खुली एवं मनोरम घाटियों में ले जाती हैं। ये घाटियां अपने बेहतरीन सेब के बगीचों के लिए प्रख्यात हैं। शाट नाले से ऊपर चौंग व धारा गाँव आते हैं तो आगे जरी से ऊपर क्षाधा और बराधा गाँव। इनकी विरल घाटियों का प्राकृतिक सौंदर्य मनोरम और स्वर्गोपम है।


रास्ते में जरी पहुँचते ही देवदार के घने बन शुरु हो जाते हैं। जरी के सामने ही मलाना नाला पार्वती नदी में मिलता है। इसके पीछे पहाड़ों की गोद में मलाना गाँव बसा है, जिसे विश्व का सबसे प्राचीन लोकतन्त्र होने का गौरव प्राप्त है। माना जाता है कि सिकन्दर महान के कुछ सिपाही जो भारत में छूट गए थे, वे इस दुर्गम इलाके में बस गए थे। इनके पहरावे और भाषा की बारीकियों को देखकर कुछ हद तक ये बातें पुष्ट होती प्रतीत होती हैं।

जरी के आगे कसोल घाटी से मणीकर्ण तक का नजारा देवदार के घने जंगलों के बीच सही मायने में हिमालय की गोद में विचरण की दिव्य अनुभूति देता है। कसोल विदेशी पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। शुद्ध आबोहवा, शांत प्रदेश, सीधे-सादे लोग, गर्म पानी के स्रोत, सस्ते संसाधन और भांग की प्रचुरता इस क्षेत्र को विदेशी पर्यटकों के लिए लुभावना बनाती है। इसका आर्थिक महत्व एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान जहाँ अपनी जगह है, इसके साथ युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृति और अपसंस्कृति के संक्रमण की मार एक चिंता का विषय है।

इसके आगे दो चट्टानों के बीच से प्रकट होती पार्वती नदी को पार करते ही मणिकर्ण तीर्थ के दर्शन होते हैं। वातावरण में गर्म पानी से उठती भाप दूर से ही इसकी प्रतीती देती है। चारों ओर गगनचूम्बी पर्वतों के बीच बसा यह तीर्थ भौगोलिक रुप में भी एक अलग ही संसार दिखता है। एक ओर देवदार से जड़े घने जंगल और दूसरी ओर हिमाच्छादित चट्टानी पहाड़ियाँ और बीच में तीव्र वेग के साथ बहती पार्वती नदी, जिसके तटों पर गर्म पानी की भाप उड़ती देखी जा सकती है। बस स्टैंड के आगे पुल पार करते ही लोक्ल गिफ्ट की दुकानें आती हैं, इनको पार करते ही दायीं ओर रघुनाथजी का भव्य मंदिर आता है, जिसके परिसर में अंदर गर्म जल के कुण्ड हैं, स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग।

 भगवान राम के साथ हनुमानजी, भगवान शिव की स्थापना मंदिर परिसर में हैं। मंदिर के पीछे परिक्रमा पथ में ही पावन जलकुण्ड है, जहाँ से पूजा के लिए जल संग्रहित किया जाता है। यहाँ रुकने व भोजनादि की निशुल्क एवं बेहतरीन व्यवस्था भी है।

यहाँ से बाहर निकलते ही लकड़ी का रथ मिलेगा, जो कुल्लू के ढालपुर मैदान जैसा है। बताया जाता है कि भगवान राम की प्रतिमा सबसे पहले यहीं रखी गईं थी। मालूम हो कि 1651 में भगवान रघुनाथ, सीता माता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास लाए थे। इन्हें राजा के आदेश पर मणिकर्ण में रखा गया था। दशहरे की शुरुआत राजा जगत सिंह ने 1653 में मणिकर्ण में की थी। तब से यहाँ दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है। राजा के स्वस्थ होने पर कालांतर में यह परम्परा कुल्लु में बड़े स्तर पर आरम्भ होती है और कुल्लू का दशहरा अंतर्ऱाष्टीय स्तर पर मनाया जाता है।


रथ के थोडी आगे नयनादेवी का मंदिर है, जिसे शिव के तृतीय नेत्र से अद्भूत शक्ति या उनकी सहचरी माँ पार्वती का रुप माना जा सकता है। मंदिर के सामने खौलते जल का कुण्ड है, जहाँ लोग आलू, चाबल आदि पोटली में बाँधकर रखते हैं और पकने पर प्रसाद रुप में साथ ले जाते हैं। यहाँ भी बग्ल में गर्म पानी के कुण्ड बने हुए हैं। बिना धार्मिक उद्देश्य के आए लोग प्रायः यहाँ स्नान करते हैं।

इसके आगे बाजार से होते हुए मार्ग गुरुद्वारे तक जाता है। वास्तव में मणिकर्ण हिंदु और सिक्ख दोनों का पावन तीर्थ स्थल है। हिंदु मान्यता के अनुसार यह शिव-शक्ति की क्रीड़ा भूमि और शिव की तपःस्थली माना जाता है। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार भगवान शिव ने यहाँ 11,000 वर्ष तप किया था। सिक्ख मान्यता के अनुसार प्रथम गुरु नानक देव यहां अपने शिष्य मरदाना के साथ आए थे। अतः यह उनका भी दिव्य स्पर्श लिए सिक्खो का एक पावन तीर्थ माना जाता है। 

गुरुद्वारे परिसर में प्रवेश करते ही पुनः खोलते पानी के कुण्ड हैं, जिनमें पोटलियों में आटे के सिड्डू से लेकर चाबल-आलू आदि पकाकर प्रसाद के रुप में लिए जाते हैं तथा साथ ही यहाँ चाय भी तैयार की जाती है, जिसे अन्दर दर्शनार्थियों को पिलाया जाता है। यहाँ सामने शिवमंदिर है तो इसके वायीं ओर गुरुद्वारा के स्नान कुण्ड तथा लंगर स्थल। साथ ही यहाँ भी ठहरने की समुचित व्यवस्था है। गुरुद्वारा साईड से पुल को पार करते हुए उस पार बाहर निकला जा सकता है।

इस तरह यहाँ ठहरने व भोजनादि की निःशुल्क व्यवस्था मंदिर और गुरुद्वारे में उपलब्ध है। यदि कोई चाहे तो होटलों में भी ठहर सकता है, जिनकी यहाँ समुचित व्यवस्था है। घरों की तरह होटलों में भी गर्म पानी की व्यवस्था देखी जा सकती है। पाइपों से पूरे गांव में गर्म पानी की सप्लाई होती है।

यहाँ बारह महीनों स्नान का लुत्फ लिया जा सकता है, लेकिन सर्दी का अलग ही आनन्द है। इस समय पर्यटकों की भीड़ बहुत कम होती है। इस शांत वातावरण में गर्म कुण्डों में डुबकी लगाना और इनके बीच ध्यानस्थ होकर बैठना एक आलौकिक अनुभव रहता है। आस्था से पूरित श्रद्धालु अपने ईष्ट का सुमरण करते हुए, तीर्थ स्नान के साथ आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तापों से मुक्ति का लाभ सहज ही उठा सकते हैं। इस पावन तीर्थ के बारे में धार्मिक मान्यता तो यहाँ तक है कि इसमें स्नान के बाद काशी जाने की भी जरुरत नहीं रहती।

यदि समय हो तो मणिकर्ण घाटी में आगे कुछ दर्शनीय स्थलों की यात्रा भी की जा सकती है। आगे लगभग 11 किमी की दूरी पर बरशेणी स्थल आता है, जहाँ पुल पार करते हुए आगे लगभग 10-12 किमी पैदल ट्रेक करते हुए खीरगंगा की यात्रा की जा सकती है, जहाँ खुले आसमान के नीचे गर्म पानी का कुण्ड है।


इस स्थल को कार्तिकेय की तपःस्थली माना जाता है, पीछे पहाड़ी के नीचे जिनकी गुफा एवं मंदिर है तथा कुण्ड के पास ही शिव मंदिर है, जहाँ साईड से दुधिया जल सीधे बहते हुए खुले स्नान कुण्ड में गिरता है। बाहरी पर्यटकों के बीच खीरगंगा का ट्रैक काफी लोकप्रिय है, जो हिमालय की गोदी में विचरण का रोमाँचक अनुभव सावित होता है।

यहाँ से आगे 40 किमी की दूरी पर पार्वती नदी का उद्गम स्थल मानतलाई सरोवर (13500 फीट) पड़ता है, जो 2-3 दिन का ट्रैकिंग मार्ग है। लेकिन यह मात्र स्वस्थ, रफ-टफ व जीवट वाले लोगों के लिए ही उचित रहता है। इसे एक पावन तीर्थ माना जाता है। बरशेणी के पार 3 किमी की दूरी पर तोश गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य़ व एकाँत-शांत वातावरण के कारण पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। समय हो तो बापसी में इसका भी अवलोकन किया जा सकता है।