अध्यात्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अध्यात्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 31 मार्च 2026

चरित्र निर्माण की प्रक्रिया

चरित्र निर्माण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता


चरित्र निर्माण के बिना हम अपने पुरुषार्थ, भाग्य या किसी समर्थ की कृपा-आशीर्वाद के फलस्वरुप तथाकथ सफलता या बुलन्दी के शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन वहां टिके रहें, यह सिर्फ और सिर्फ चरित्र बल के आधार पर ही संभव होता है। अतः जीवन में टिकाऊ सफलता के साथ शांति एवं सद्गति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग एवं गंभीर हो जाए, ताकि वह शिखर से रसातल की ओर लुढ़कने की त्रास्द बिडम्बना से बच सके।

इसके लिए चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के चरणों की तात्विक समझ आवश्यक है। महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के आधार पर इसके आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार - जैसा हम सोचते हैं, बैसा ही हमारा संकल्प बनता है, क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, क्रमशः आदतें बनती हैं और संस्कार पुष्ट होते हैं तथा चरित्र का निर्माण होता है, जो हमारे आचरण-व्यवहार को प्रभावित करता है। युगऋषि पं.श्री रामशर्मा आचार्यजी के शब्दों में जैसा हम सोचते व करते हैं, बैसे ही बनते जाते हैं। और इस तरह चरित्र ही हमारी नियति एवं भविष्य को तय करता है।

इस प्रक्रिया को समझते हुए चरित्र निर्माण के संदर्भ में निम्न चरणों को अपनाया जा सकता है –

स्वाध्याय-सत्संग – महापुरुषों का स्वाध्याय एवं सत्संग सबसे महत्वपूर्ण है, जिसके प्रकाश में चिंतन-मनन करते हुए आत्म-चिंतन संभव हो पाता है। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया गति पकड़ती है, आत्म-सुधार के साथ आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चरण आगे बढ़ते हैं और व्यक्तित्व विकास के साथ चरित्र गठन की महान प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

आध्यात्मिक आदर्श का वरण – जीवन में कैरियर एवं पेशेवर लक्ष्यों के अनुरुप अपने क्षेत्र से सम्बन्धित महानतम एवं श्रेष्ठतम आदर्शों का चयन किया जा सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण के संदर्भ में आध्यात्मिक आदर्शों का वरण आवश्यक है। लौकिक आदर्श सामाजिक सफलता के प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रुपाँतरण एवं चरित्र गठन की प्रेरणा, त्वरा एवं प्रकाश तो आध्यात्मिक आदर्श से ही प्राप्त हो पाते हैं। अतः आध्यात्मिक आदर्श का वरण पहला चरण है।

श्रेष्ठ संग-साथ एवं वातावरण – दिन भर हम किन व्यक्तियों, विचारों व संग-साथ के साथ विचरण कर रहे हैं, किस वातावरण में रह रहे हैं, यह चरित्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। कुसंग और दूषित वातावरण में हम किन्हीं श्रेष्ठ विचारणा एवं प्रेरणा की आशा नहीं कर सकते। ऐसे में बुरी संगत से अकेला भला की उक्ति को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यहाँ डिजिटल संयम के महत्व को भी समझा जा सकता है।

अनुशासित जीवनशैली – चरित्र गठन के संदर्भ में जीवनशैली का अनुशासित होना आवश्यक है। बिना खान-पान, दिनचर्या, विचार एवं व्यवहार को साधे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में संयमित आहार, कसी हुई दिनचर्या, सकारात्मक-श्रेष्ठ विचार एवं संतुलित-उदात वाणी-व्यवहार के माध्यम से चरित्र निर्माण की जड़ों का पोषण किया जा सकता है।


जीवन साधना – चरित्र निर्माण के लिए अन्ततः चित्त के स्तर पर उतर कर स्वयं पर कार्य करना पड़ता है। मात्र वाणी, व्यवहार एवं विचारों पर कार्य करने भर से चरित्र गठन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। दीर्घकाल से जड़जमा कर बैठी आदतों एवं हठीले कुसंस्कारों का परिष्कृत करने में समय लगता है। इसके लिए जप, ध्यान प्रार्थना से लेकर प्रायश्चित तप के आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। समूचे जीवन को साधनामय बनाना पड़ता है।

निसंदेह रुप में चरित्र निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है (Character building is a lifelong process) और युगनायक स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में हजारों ठोकरें खाने के साथ चरित्र का गठन होता है। (Character has to be established through a thousand stumbles.) इसकी दुरुहता, जटिलता, गंभीरता एवं महत्व को समझते हुए हम चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग हो जाएं, इसको जीवनचर्या का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही हमारे गौरव-गरिमा की रक्षक है, यही हमारे गुरुत्व की पौषक है, यही हमारे आत्मिक उत्थान की नींव है और यही हमारे जीवन की टिकाऊ सफलता, सुख-शांति, संतुष्टि एवं परिपूर्णता का आधार है।

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

दैनिक जीवन में अध्यात्म, भाग-3

दैनिक जीवन में अध्यात्म

अध्यात्म का सामान्य अर्थ कुछ इस रुप में लिया जाता है, जिसके लिए घर-परिवार, व्यवसाय, ऑफिस आदि छोड़ने पड़ते हैं व ये मुख्यतः साधु सन्यासियों व बाबाओं या बुढ़े-बुजुर्गों के लिए है। जबकि अध्यात्म जीवन से घुला अन्तरतम पहलु है, अस्तित्व की पहेली का समाधान करता जीवन दर्शन एवं जीवन शैली है, जिसका दैनिक जीवन में जितना जल्दी समावेश किया जाए, उतना उत्तम है, श्रेयस्कारी है, कल्याणकारी है।

गायत्री के सिद्ध साधक, इस युग के विश्वामित्र, युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य व्यवहारिक अध्यात्म के प्रणेता रहे हैं, वैज्ञानिक अध्यात्म के जनक रहे हैं। उनके द्वारा दिए गए दैनिक जीवन में अध्यात्म के सुत्र सरल किंतु प्रभावशाली हैं, जिन्हें अपना पारिवारिक-सामाजिक जीवन जीते हुए सहज सरल रुप में अपनाया जा सकता है।

वे अध्यात्म को जीवन साधना के रुप में परिभाषित करते हैं, जिसके तीन चरण हैं उपासना, साधना और अराधना। इन्हें अन्यत्र वे संयम, स्वाध्याय, सेवा, साधना के रुप में भी समेटते हैं।

उपासना भगवान की, साधना मन की और अऱाधना समाज की। इस तरह इनके दायरे में पूरा जीवन, पूरा अस्तित्व समा जाता है। इनको भक्ति योग  - ज्ञान योग, ध्यान योग तथा कर्म योग के रुप में भी समझा जा सकता है, जिनकी फलश्रुतियाँ श्रद्धा, प्रज्ञा एवं निष्ठा रहती हैं।

दैनिक जीवन में अध्यात्म का समावेश प्रातः आत्म बोध से शुरु होता है, जिसमें ईश्वर का स्मरण करते हुए, ईश्वर प्रदत्त इस मानव जीवन की गरिमा, महिमा का अहसास करते हुए, आज के दिन के श्रेष्ठतम उपयोग की रुपरेखा बनाई जाती है। इसके लिए अपने डायरी व स्लिप पैड (प़ॉकेट डायरी) में दिन के कार्यों की प्राथमिकता के आधार पर सूची बनाई जाती है, यह  To do List दिन के हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग सुनिश्चित करती है। बीच-बीच में इनको झांक कर देखने पर याद रहता कि आज क्या-क्या काम पूरे करने थे। आज के डिजिटल युग में मोबाइल डायरी का भी उपयोग किया जा सकता है।

दिन भर अपनी व्यस्त दिनचर्या के बाद फिर रात को तत्वबोध का क्रम आता है, जिसके अन्तर्गत दिन भर के कार्यों का लेखा-जोखा किया जाता है। जो विधिवत रुप में डायरी लेखन के रुप में सम्पन्न होता है। इस तरह आत्मबोध से शुरु दिनचर्या तत्वबोध में समाप्त होती है।

दिन भर में प्रातः Morning Walk, योगाभ्यास, व्यायाम आदि के साथ अपनी क्षमता, आयु एवं समय के अनुरुप शारीरिक फिटनेस का कार्य़क्रम निर्धारित किया जा सकता है। अपने प्रातःकालीन आवश्यक कार्यों के बाद स्नान एवं इसके बाद उपासना के अन्तर्गत जप-ध्यान का न्यूनतम कार्यक्रम पूरा किया जा सकता है। जो अपनी क्षमता, स्थिति के अनुरुप कुछ मिनट से लेकर कुछ घंटे का हो सकता है। इसमें माला की संख्या से अधिक अपने ईष्ट-अऱाध्य-भगवान से भावनात्मक प्रगाढता मायने रखती है।

उपासना के बाद साधना का क्रम आता है, जो दिन भर चलता है। जिसके अन्तर्गत आचार्यश्री इंद्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम की बात करते हैं। इंद्रिय संयम में स्वाद, दृष्टि-स्पर्श-जननेंद्री एवं वाणी प्रमुख हैं। अपने शरीर के अनुकूल हल्का-फुल्का, सात्विक एवं पौष्टिक भोजन लिया जाता है, शास्त्रों में बताए गए ऋतभुख्-मितभुख्-हितभुख् का सुत्र अनुकरणीय रहता है।

स्वाद का सीधा सम्बन्ध जननेंद्रि से रहता है, जितना सात्विक व हल्का आहार रहेगा, इस इंद्रिय का संयम उतना सरल रहेगा। फिर मन को उत्तेजित करने वाले बाहर के दृश्यों के प्रति सजगता एवं सावधानी आती है। आज के इंटरनेट एवं मोबाइल युग में प्रलोभनों की भरमार रहती है, समाज का वातारण भी विषाक्त रहता है, ऐसे में इस तरह के उत्तेजक उत्प्रेरकों से निपटना किसी चुनौती से कम नहीं रहता, लेकिन यही तो साधना का एडवेंचर है। साधक अपने ढंग से इस साधना समर में जूझता है और अपनी विजय को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।  

वाणीव्यवहार की साधना में मित-मधुर-कल्याणी के सुत्र का अनुसरण करें। कम बोलें, जितना आवश्यक हो। शिष्ट-शालीनता रहें, हितकर ही बोलें। साधना काल में अवांछनीय तत्वों से दूर ही रहें व उनके भड़काउ व्यवहार के प्रति मौन व उपेक्षा का भाव रखें। अपने मन की शांति व स्थिरता को बनाए रखना ही इस साधना का उद्देश्य रहता है।

संयम संयम – Time Management साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसने काल को साध लिया, समझो उसकी महाकाल की उपासना हो चली। इसके लिए दिनचर्या में महत्वपूर्ण व तातकालिक (Important and Urgent) कार्यों की समझ आवश्यक होती है। इसमें खण्ड 1 में ड्यूटी, परीक्षा, एसाइन्मेंट, आपातकालीन परिस्थिति जैसे Impt/Urgnt कार्य आते हैं, जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाना होता है। दूसरे खण्ड में स्वाध्याय, डायरी, व्यायाम, उपासना, सेवा जैसे  Impt/Not Urgnt कार्य़ आते हैं, जिनको दिनचर्या में शामिल करना होता है।

तीसरे खण्ड में  फोन कॉल, शादी-विवाह, दोस्त की पार्टी जैसे Not Impt/Urgnt कार्य आते हैं, जिन्हें टाला जा सकता है या दूसरों को सौंपा जा सकता है। और अंततः खण्ड 4 के Neither Impt/ Nor Urgnt कार्य आते हैं, जो मन के बहलावे या टाइमपास के लिए किए जाते हैं, या जैसे फिल्म, मोबाइल, दुर्व्यसन (शराब, नशा आदि)। येही समय, ऊर्जा व फोक्स की बर्वादी का कारण बनते हैं। खण्ड 3 व 4 के कार्यों को यदि सही ढंग से मैनेज कर लिया तो खण्ड 1 व 2 के उपयोगी कार्य संभव होंगे तथा व्यवहारिक जीवन में साधना का मकसद पुरा होगा।

अर्थ संयम में जितनी आमदनी है उसके हिसाब से खर्च की बात आती है, और जो अतिरिक्त अर्जन होता है, उसका उचित बचत के साथ जरुरतमंदों की सहायता में लगाया जा सकता है। सादा जीवन उच्च विचार इसका स्वर्णिम सुत्र है। विचार संयम, श्रेष्ठ विचारों में रमण करने व अपने लक्ष्य के प्रति फोक्स्ड रहने पर सधता है। इसें स्वाध्याय, सत्संग के साथ आत्म-चिंतन व मनन का विशेष महत्व रहता है।

इसके साथ अपने रिलेश्नशिप्स में, रिश्ते नातों व मित्रों से न्यूनतम आशा-अपेक्षा से भरा कर्तव्य पालन तथा सेवा का भाव उचित रहता है, जो अराधना के अंतर्गत आता है। हर इंसान व जीव में ईश्वर के दर्शन करते हुए उससे व्यवहार, इंटरएक्शन इसका हिस्सा है। दूसरों से व्यवहार में व्यक्तित्व की न्यूनतम गरिमा एवं गुरुत्व इसका हिस्सा हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि दैनिक जीवन में अध्यात्म के लिए जीवन का आध्यात्मिक लक्ष्य होना अभीष्ट है, साथ ही अपना आध्यात्मिक ईष्ट- अऱाध्य – आदर्श  जितना स्पष्ट होगा, उतना ही श्रेष्ठ रहेगा। इतना करते हुए जीवन में संयम, स्वाध्याय, सेवा व साधना का क्रम बन पडेगा, जीवन में अध्यात्म का समावेश हो चलेगा।

रात को सोने से पहले तत्व बोध में डायरी लेखन के अंतर्गत स्व मूल्याँकन के साथ दिनचर्या पूर्ण होगी। दिन भर जो भूल-चूक हो गई, उसके लिए भगवान से क्षमाप्रार्थना करते हुए अगले दिन की और पुख्ता रण्नीति बनाते हुए, आज के जीवन को ईश्वर को अर्पित करते हुए निद्रा देवी की गोद में चले जाएं। इस तरह हर रोज सुबह नया जन्म और सोते समय रात को नित्य मौत का अभ्यास जीवन को अध्यात्म से ओतप्रोत करेगा।

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

साधु संगत, भाग-3, अध्यात्म पथ

मार्ग कठिन, लेकिन सत्य की विजय सुनिश्चित

 

मनुष्यमात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य - आत्मज्ञान

महापुरुषों के जीवन को फूल के समान खिला हुआ, सिंह की तरह अभय, सद्गुणों से ओत-प्रोत देखते हैं, तो स्वयं भी वैसा होने की आकांक्षा जागती है। आत्मा की यह आध्यात्मिक माँग है, उसे अपनी विशेषतायें प्राप्त किये बिना सुख नहीं होता। लौकिक कामनाओं में डूबे रह कर हम इस मूल आकाँक्षा पर पर्दा डाले हुए पड़े रहते हैं, इससे किसी भी तरह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।

श्रेष्ठता मनुष्य की आत्मा है। इसलिए जहाँ कहीं भी उसे श्रेष्ठता के दर्शन मिलते हैं, वहीं आकुलता पैदा होती है।...यह अभिलाषायें जागती तो हैं किन्तु यह विचार नहीं करते कि यह आकांक्षा आ कहाँ से रही है। आत्म-केन्द्र की ओर आपकी रुचि जागृत हो तो आपको भी अपनी महानता जगाने का श्रेय मिल सकता है, क्योंकि लौकिक पदार्थों में जो आकर्षण दिखाई देता है, वह आत्मा के प्रभाव के कारण ही है। आत्मा की समीपता प्राप्त कर लेने पर वह सारी विशेषताएं स्वतः मिल जाती हैं, जिनके लिये मनुष्य जीवन में इतनी सारी तड़पन मची रहती है। सत्य, प्रेम, धर्म, न्याय, शील, साहस, स्नेह, दृढ़ता-उत्साह, स्फूर्ति, विद्वता, योग्यता, त्याग, तप और अन्य नैतिक सद्गुणों की चारित्रिक विशेषताओं के समाचार और दृश्य हमें रोमाँचित करते हैं क्योंकि ये अपनी मूल-भूत आवश्यकताएं हैं। इन्हीं का अभ्यास डालने से आत्म-तत्व की अनुभूति होती है।

आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म-केंद्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र विकास से मिलता है। अपनी बुराईयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीवमात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ, तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

...................................................................

तुम्हारी एक मात्र संरक्षिका - सत्यनिष्ठा

सत्यनिष्ठ बनो। दिव्य शांति की ओर जाने का यह प्रथम और अपरिहार्य पग है।...पूर्ण सत्यनिष्ठा का तात्पर्य है – जीवन में पूर्णता की उपलब्धि, निरंतर अधिकाधिक पूर्णता की उपलब्धि करते जाना। पूर्णता की उपलब्धि का दावा कभी नहीं करना चाहिए, बल्कि स्वाभाविक गति से उसे प्राप्त करते रहना चाहि। यही है सत्यनिष्ठा।

सच्चाई प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है, पर यह सब चीजों से अधिक अमोघ भी है। अगर तुममें सच्चाई है, तो तुम्हारी विजय सुनिश्चित है। ...

सबसे पहले तुम्हें इस बात पर ध्यान रखना होगा कि तुम्हारे जीवन में एक भी दिन, एक भी घंटा, यहाँ तक कि एक भी मिनट ऐसा नहीं है, जब कि तुम्हें अपनी सच्चाई को सुधारने या तीव्र बनाने की आवश्यकता न हो। मैं यह नहीं कहती कि तुम भगवान को धोखा देते हो, कोई भी आदमी भगवान को धोखा नहीं दे सकता, यहाँ तक कि बडे-से-बडे असुर भी नहीं दे सकते। जब तुम यह समझ गए हो तब भी तुम अपने दैनंदिन जीवन में ऐसे क्षण बराबर पाओगे, जब कि तुम अपने-आपको धोखा देने की कोशिश करते हो। प्रायः स्वाभाविक रुप में ही तुम जो कुछ करते हो, उसके पक्ष में युक्तियाँ पेश करते हो।

सच्चाई की सच्ची कसौटी, यथार्थ सच्चाई की एकदम कम-से-कम मात्रा बस यही है, एक दी हुई परिस्थिति में होने वाली तुम्हारी प्रतिक्रिया के अंदर, तुम सहज भाव से यथार्थ मनोभाव ग्रहण करते हो या नहीं, और जो कार्य करना है, ठीक उसी कार्य को करते हो या नहीं। उदाहरणार्थ, जब कोई क्रोध में तुमसे बोलता है, तब क्या तुम्हें भी उसकी छूत लग जाती है और तुम भी क्रोधित हो जाते हो या तुम एक अटल शांति और पवित्रता बनाए रखने, दूसरे व्यक्ति की युक्ति को देखने या समुचित रुप में आचरण करने में समर्थ होते हो?

बस, यही है, मेरी राय में, सच्चाई का एकदम आरम्भ, उसका प्राथमिक तत्व। अगर तुम अधिक पैनी आँखों से अपने अंदर ताको, तो तुम वहाँ हजारों अ-सच्चाईयों को पाओगे, जो अधिक सूक्ष्म हैं, पर जो इसी कारण पकड़ी जाने योग्य न हों ऐसी बात नही। सच्चे बनने की कोशिश करो और ऐसे अवसर बढ़ते ही जायेंगे, जब तुम अपने को सच्चा नहीं पाओगे, जब तुम समझ जाओगे की सच्चा बनना कितना कठिन कार्य है।

सच्चाई दिव्य द्वारों की चाबी है। सच्चाई में ही है विजय की सुनिश्चितता। पूर्ण रुप से सच्चे बनो, फिर ऐसी कोई विजय नहीं जो तुम्हें न दी जाए।...सत्यनिष्ठा ही तुम्हारी एक मात्र संरक्षिका है।

-    श्रीमाँ, आत्म-परिपूर्णता

...............................................................................

चरित्र निर्माण अर्थात् सत्य का समना और ज्ञान को अपना बनाना

संसार के दुःख सीधे इच्छाओं के अनुपात में ही हैं। इसलिए अंध आसक्ति न रखो। स्वयं को किसी से बाँध न लो। परिग्रह की इच्छा न करो, वरन् स्वयं में अवस्थित होने की दृढ़ इच्छा करो। क्या कोई भी संग्रह तुम्हारे सत्यस्वरुप को संतुष्ट कर सकेगा? क्या तुम वस्तुओं से बद्ध हो जाओगे? नग्न हो इस संसार में तुम आते हो तथा जब मृत्यु का बुलावा आता हो, जब नग्न हो चले जाते हो। तब फिर तुम किस बात का मिथ्या अभिमान करते हो? उन वस्तुओं का संग्रह करो, जिनका कभी नाश नहीं होता। अन्तर्दृष्टि का विकास अपने आप में एक उपलब्धि है। अपने चरित्र को तुम जितना अधिक पूर्ण करोगे, उतना ही अधिक तुम उन शाश्वत वस्तुओं का संग्रह कर पाओगे, जिनके द्वारा यथासमय तुम आत्मा के राज्य के अधिकारी हो जाओगे।

अतः जाओ, इसी क्षण से आंतरिक विकास में लगो, बाह्य नहीं। अनुभूति के क्रम को अन्तर्मुखी करो। इन्द्रियासक्त जीवन से विरत होओ। प्रत्येक वस्तु का आध्यात्मीकरण करो। शरीर को आत्मा का मंदिर बना लो तथा आत्मा को दिन-दिन अधिकाधिक अभिव्यक्त होने दो। और तब अज्ञानरुपी अंधकार धीरे-धीरे दूर हो जाएगा तथा आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे फैल उठेगा। यदि तुम सत्य का सामना करो, तो विश्व की सारी शक्तियाँ तुम्हारे पीछे रहेंगी तथा समन्वित रुप से तुम्हारे विकास के लिए कार्य करेंगी। शिक्षक केवल ज्ञान दे सकते हैं। शिष्य को उसे आत्मसात करना होगा और इस आत्मसात करने का तात्पर्य है – चरित्र निर्माण, ज्ञान को अपना बना लेना है। स्वयं अपने द्वारा ही अपना उद्धार होना है, दूसरे किसी के द्वारा नहीं।

उपनिषदों के आदेश की तर्ज में, उठो, सचेष्ट हो जाओ। और जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो, तब तक न रुको।

-    एफजे अलेक्जेंडर, समाधि के सोपान

..........................................................................

कमर कसकर धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढे चलो

उद्बुद्ध होओ, जाग उठो, जीवन के महत्तम दायित्व, श्रेष्ठतम कर्तव्य साधन के लिए दृढ़संकल्पबद्ध होओ। सर्वप्रकार के क्लैव्य-दौर्वल्य का विसर्जन दे कर, मलिनता और पंकिलता का परित्याग कर, मोह और आत्मविस्मृति को दूर हटा कर वीर के समान खड़े हो जाओ। जीवन का पथ बड़ा ही कंटकों से परिपूर्ण, बड़ा ही विपदा से पूर्ण, घात संघात, अवस्था विपर्य्यय इस पथ के नित्य साथी एवं दुःख-दैन्य, असुख-अशांति, विषाद-अवसाद इस पथ के नित्य सहचर हैं। बाधा-विघ्न पथ को रोके खड़े रहते हैं। संशय, सन्देह, अविश्वास और आदर्श के प्रति अनास्था उत्पन्न हो कर साधन की नींव का चूरमार कर देती है। कुत्सित कामना, वासना एवं विषय-भोग की आकांक्षा आकर शक्ति-सामर्थ्य बलवीर्य का अपहरण करती है। और मनुष्य की निर्जीव बना डालती है, विभ्रम-विभ्राँति एवं विस्मृति आकर उसे आदर्शभ्रष्ट और लक्ष्यच्युत करके विपथ पर भुला ले जाती हैं। जीवन के इस द्वन्द-संघर्षमय कठिन दुर्योग तथा आत्मविस्मृति एवं आदर्श विभ्राट् के इस विषमय संकट के समय, हे मुमुक्षु साधक। तुम अपने प्रज्ञाबल के द्वारा आत्मबोध और आत्मशक्ति को जाग्रत कर नवीन उत्साह से कमर कस कर धैर्य के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होओ। नैराश्य और निश्चेष्टता को दूर हटाकर पुरुषार्थ का अवलम्बन लो।

आत्मन। दुर्दिन की घन घोर विभीषिका से भयभीत न होना। संग्राम के भय से भाग न जाना। चरम श्रेयः पथ में अभियान कर शान्ति लाभ करो और उत्कर्ण होकर सुनो, श्रुति की वही बज्र गम्भीर चिर जागरण वाणीउत्तिष्ठ, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत्।

स्वामी आत्मानन्द, जीवन साधना के पथ पर

.................................................................

साधक की परिभाषा

साधक वस्तुतः एक एकाकी पक्षी की तरह होता है।

एकाकी पक्षी की स्थिति पाँच प्रकार से परिभाषित होती है।

§  पहली कि वह अधिकतम ऊँचाई तक उड़ता है।

§  दूसरी यह कि वह किसी साहचर्य और साथ के बिना व्यथित नहीं होता।

§  तीसरी स्थिति यह कि अपनी चंचु का लक्ष्यबिंदु आकाश की ओर ही रहता है।

§  चौथी यह कि उसका कोई निश्चित रंग नहीं होता।

§  पाँचवी स्थिति यह कि वह बहुत मृदु स्वर में गाता है।

 

-    श्रीमाँ, साधक सावधान।।

साधु सगत के पूर्व संकलन

साधु संगत के भाग -2, चित्त् का भ्रम-बन्धन और अपना विशुद्ध आत्म स्वरुप

साधु सगत भाग -1 आत्म कल्याण की भी चिंता की जाए

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

आध्यात्मिक पथ के प्राथमिक सोपान




अध्यात्म क्या? अपनी खोज में निकल पड़े मुसाफिर की राह, मंजिल है अध्यात्म। जब लक्ष्य अपनी चेतना का स्रोत समझ आ जाए तो अपने उत्स, केंद्र की यात्रा है अध्यात्म। थोड़ा एडवेंचर के भाव से कहें तो यह अपनी चेतना के शिखर का आरोहण है। अध्यात्म स्वयं को समग्र रुप से जानने की प्रक्रिया है। विज्ञजनों की बात मानें तो यह जीवन पहेली की मास्टर-की है। आश्चर्य़ नहीं कि सभी विचारकों-दार्शनिकों-मनीषियों ने चाहे वे पूर्व के रहे हों या पश्चिम के, जीवन के निचोड़ रुप में एक ही बात कही आत्मानम् विद्, नो दाईसेल्फ, अर्थात पहले, खुद को जानो, स्वयं को पहचानो।
इस तरह अध्यात्म आत्मानुसंधान का पथ है, एक अंतर्यात्रा है। अध्यात्म उस आस्था का नाम है जो जीवन का केंद्र अपने अंदर मानती है और जीवन की हर समस्या का समाधान अपने अस्तित्व के केंद्र में खोजते का प्रयास करती है।
अध्यात्म की आवश्यकता – अध्यात्म मानवीय जीवन में अंतर्निहित दिव्य विशेषता है, इसका केंद्रीय तत्व है और जीवन की मूलभूत आश्यकता है। सभी सांसारिक जरुरतें पूरी होने के बाद, सभी तरह का लौकिक ज्ञान पाने के बाद, सभी तरह की भौतिक सुख-समृद्धि-उपलब्धि के बाद भी जो खालीस्थान बना रहता है, अध्यात्म उस खालीस्थान की पूर्ति है। अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस रुप में इसे जीवन की मेटानीड, जीवन की महा-आवश्यकता बता रहे हैं। चेतनात्मक संकट से गुजर रहे आधुनिक इंसान की आंतरिक त्रास्दी को समेटे मॉड्रन मेन इन सर्च ऑफ गॉड, सप्रिचुअल क्राइसिस ऑफ मॉड्रन मैन जैसी पश्चमी विचारकों कार्ल जुंग एवं पॉल ब्रंटन की शोधपूर्ण रचनाएं भी इसी सत्य को उद्घाटित करती हैं।

अध्यात्म का महत्व अध्यात्म जीवन की समग्र समझ देता है। यह जीवन के एकतरफा भौतिक विकास का संतुलक है। आंतिरक विकास के साथ वाह्य जीवन की प्रगति को संतुलित करता है। यह आंतरिक शक्तियों के जागरण की स्वाभाविक प्रक्रिया है, यह व्यक्ति के समग्र विकास को सुनिश्चित करता है। यह जीवन के दव्न्दों के पार जाने की सूझ व शक्ति देता है। खुद से रुबरु कर, विराट से जोड़ता है और चरम संभावनाओं के विकास का द्वार खोलता है। यह जीवन को गुणवता देता है और व्यक्तित्व में विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता को पैदा करने वाला तत्व है। आश्चर्य नहीं कि यह चरित्र निर्माण की धूरी है, श्रेष्ठ नागरिक को तैयार करने की प्रयोगशाला है। यह स्व-अनुशासित जीवन का नाम है। एक अच्छा इंसान बनने की जरुरत यहीं कहीं सही मायने में पूर्ण होती है। शांति, स्वतंत्रता, आनन्द की खोज यहीं पूर्णता पाती है। जीवन के चरम एवं परम विकास की संभावनाएं इसी के आधार पर शक्य-संभव बनती हैं। मनुष्य अपने भाग्य विधाता होने का भाव यहीं कहीं पाता है। आश्चर्य नहीं कि जिन भी महापुरुषों, महामानवों एवं देवमानवों को हम आदर्श के रुप में श्रद्धानत होकर सुमरण-अनुकरण करते हैं, अध्यात्म किसी न किसी रुप में उनके जीवन का केंद्रीय तत्व रहा है। 
अध्यात्म पथ के अनिवार्य सोपान
जीवन जिज्ञासा, आंतरिक खोज, आत्मानुसंधान – अपनी खोज में निकला पथिक जाने अनजाने में अध्यात्म पथ का राही होता है। यह जिज्ञासा जीवन के किसी न किसी मोड़ पर जोर अवश्य पकड़ती है। कुछ जन्मजात यह अभीप्सा लिए होते हैं। किंतु अधिकाँश जीवन के टेड़े मेड़े रास्ते में राह की ठोकरें खाने के बाद, बाह्य जीवन के मायावी रुप से मोहभंग होते ही या जीवन के विषम प्रहार के साथ सचेत हो जाते हैं और जीवन के वास्तविक सत्य की खोज में जीवन के स्रोत्र की ओर मुड़ जाते हैं। जीवन के नश्वर स्वरुप का बोध एवं जीवन में सच्चे सुख व शांति की खोज व्यक्ति को देर सबेर अध्यात्म मार्ग पर आरुढ़ कर देती है। जीवन की वर्तमान स्थिति से गहन असंतुष्टी का भाव और मुमुक्षुत्व, अध्यात्म जीवन का प्रारम्भिक सोपान है।

आध्यात्मिक जीवन दृष्टि – इसी के साथ अपनी खोज की प्रक्रिया शुरु होती है और जीवन के प्रति एक नई अंतर्दृष्टि का विकास होता है। इस सानन्त बजूद में अनन्त की खोज आगे बढ़ती है। शरीर व मन से बने स्वार्थ-अहं केंद्रित संकीर्ण जीवन के परे एक विराट अस्तित्व का महत्व समझ आता है, यह अध्यात्म का दूसरा सोपान है। अब समाधान की तलाश अपने अंदर होती है। किसी से अधिक आशा अपेक्षा नहीं रहती। भीड़ के बीच भी एकाकीपन का भाव प्रगाढ़ रहता है और अपने तमाम शुभचिंतकों के बावजूद यह एक एकाकी यात्रा होती है। पथिक का एकला यात्रा पर विश्वास प्रगाढ़ रहता है। वह यथासंभव दूसरों की मदद करता है और समस्याओं से भरे संसार में समाधान का एक हिस्सा बनकर जीने का प्रयास करता है।

आध्यात्मिक जीवन शैली – आध्यात्मिक जीवन दृष्टि का स्वाभाविक परिणाम होता है आध्यात्मिक जीवन शैली, जो संयमित एवं अनुशासित दिनचर्या का पर्याय है। शील-सदाचारपूर्ण व्यवहार इसके अनिवार्य आधार हैं। अपनी मेहनत की ईमानदार कमाई इसका स्वाभाविक अंग है। इसके तहत वह शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक सभी पहलुओं के सम्यक विकास के प्रति जागरुक रहता है और एक कर्तव्यपरायण जीवन जीता है।

कर्तव्य परायण जीवन – आध्यात्मिक जीवन कर्तव्यपरायण होता है। अपने कर्तव्य के प्रति सजग एवं कर्मठ। श्रमशील जीवन अध्यात्मिक जीवन की निशानी है। घर परिवार हों या संसार व्यापार, अपने कर्तव्यों का होशोहवास में बिना किसी अधिक राग-द्वेष या आसक्ति के निर्वाह करता है। जीवन के निर्धारित रणक्षेत्र में एक यौद्धा की भांति अपनी भूमिका निभाता है और धर्म मार्ग पर आरुढ़ रहता है। अपने कर्तव्यकर्मों से पलायन, आलसी-विलासी जीवन से अध्यात्म का दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता।

आदर्शनिष्ठ, आत्म-परायण जीवन – अपने परमलक्ष्य की ओर बढ़ रहे आध्यात्मिक जिज्ञासु का जीवन आदर्श के प्रति समर्पित होता है। आदर्श एक व्यक्ति भी हो सकता है, कोई विचार या भाव भी। आदर्श के उच्चतम मानदण्डों की कसौटी पर खुद के चिंतन-व्यवहार को सतत कसते हुए, पथिक अपनी महायात्रा पर अग्रसर रहता है। अपने मन एवं विचारों को उच्चतम भावों में निमग्न रखने के लिए स्वाध्याय-सतसंग का सहारा लेता है।

स्वाध्याय-सतसंग – आध्यात्मिक आदर्श एवं महापुरुषों का संग-साथ अध्यात्म का महत्वपूर्ण सोपान है। आंतरिक संघर्ष के पलों में इनसे आवश्यक प्रेरणा एवं मार्गदर्शन पाता है। खाली समय में उच्च आदर्श एवं सद्विचारों में निमग्न रहता है। आध्यात्मिक ग्रंथों एवं सत्साहित्य का अध्ययन जीवन का अभिन्न अंग होता है। इस प्रकार सद्विचारों का महायज्ञ उसके चितकुण्ड में सदा ही चलता रहता है, जो क्रमशः उसे ध्यान की उच्चस्तरीय कक्षा के लिए तैयार करता है।


आत्म चिंतन – ध्यान परायण जीवन – निसंदेह अपने आत्म रुप का चिंतन, जीवन लक्ष्य पर विचार, आदर्श का सुमरण-वरण इसके अनिवार्य सोपान हैं। इसके लिए अभीप्सु ध्यान के लिए कुछ समय अवश्य निकालता है। अपने अचेतन मन को सचेतन करने की प्रक्रिया को अपने ढंग से अंजाम देता है। आत्म तत्व का चिंतन उसे परम तत्व की ओर प्रवृत करता है और ईश्वरीय आस्था जीवन का सबल आधार बनती है।

आत्म श्रद्धा, ईश्वर विश्वास –अपनी आत्म सत्ता पर श्रद्धा जहाँ एक छोर होता है वहीं ईश्वरीय आस्था इसका दूसरा छोर। अध्यात्मवादी अपनी आध्यात्मिक नियति पर दृढ़ विश्वास रखता है और अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने सत्कर्मों के आधार पर अपने मनवाँछित भाग्य निर्माण का प्रयास करता है। साथ ही वह ईश्वरीय न्याय व्यवस्था को मानता है। दूसरे जो भी व्यवहार करें, अपने स्तर को गिरने नहीं देता। व्यक्तित्व की न्यूनतम गरिमा एवं गुरुता अवश्य बनाए रखता है। अपनी पूरी जिम्मेदारी आप लेता है, अंदर ईमान तथा उपर भगवान को साथ जीवन के रणक्षेत्र में प्रवृत रहता है। 

प्रार्थना – प्रार्थना आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। अध्यात्मपरायण व्यक्ति अपनी औकात, अपनी मानवीय सीमाओं को जानता है, इससे ऊपर उठने के लिए, इनको पार करने के लिए ईश्वरीय अबलम्बन में संकोच नहीं करता। वह प्रार्थना की अमोघ शक्ति को जानता है और अपनी ईमानदार कोशिश के बाद भी जो कसर रह जाती है उसे प्रार्थना के बल पर पूरी करते का प्रयास करता है। 

निष्काम सेवा – सेवा अध्यात्म पथ का एक महत्वपूर्ण सोपान है। सेवा को आत्मकल्याण का एक सशक्त माध्यम मानता है। जिस आत्म-तत्व की खोज अपने अंदर करता है वही तत्व बाहर पूरी सृष्टि में निहारने का प्रयास करते हुए यथासंभव सबके साथ सद्भावपूर्ण बर्ताव करता है। अपनी क्षमता एवं योग्यतानुरुप जरुरतमंद, दुखी-पीड़ीत इंसाव एवं प्राणियों की सेवा सत्कार के लिए सचेष्ट रहता है और निष्काम सेवा को अध्यात्म पथ का महत्वपूर्ण सोपान मानता है।

सृजनधर्मी सकारात्मक जीवन- अध्यात्म से उपजा आस्तिकता का भाव व्यक्ति में अपने अस्तित्व के प्रति आशा का भाव जगाता है, अध्यात्म से उपजी कर्तव्यपरायणता उसे सृजनपथ पर आरुढ़ करती है और अपने स्रोत की ओर बढ़ता उसका हर ढग उसे सकारात्मक उत्साह से भरता है। अतः अध्यात्म नेगेटिविटी को जीवन में प्रश्रय नहीं देता। वह जिस भी क्षेत्र में काम करता है, एक सकारात्मक परिवर्तन के संवाहक के रुप में अपनी अकिंचन सी ही सही किंतु निर्णायक भूमिका निभाता है। हमेशा सकारात्मकता एवं सृजन के प्रति समर्पित जीवन आध्यात्मिकता का परिचय, पहचान है।


चुनींदी पोस्ट

Travelogue - In the lap of Surkunda Hill via Dhanaulti-Dehradun

A blessed trip for the seekers of Himalayan touch Surkunda is the highest peak in Garwal Himalayan region near Mussoorie Hills wi...