शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-2

मानाली रोहतांग की बर्फीली वादियों में

मानाली के पर्वतारोहण संस्थान में शुरुआती प्रशिक्षण का जिक्र पिछले ब्लॉग में हो चुका, जिसमें रॉक क्लाइंविंग, रिवर क्रोसिंग, बुश क्राफ्ट से लेकर नाइट स्फारी और सर्वाइवल कोर्स का रोमाँच कवर कर चुके हैं। इससे आगे का एडवेंचर गुलाबा फोरेस्ट के पास की बर्फीली वादियों में शेष था, जिसमें स्नोक्राफ्ट और स्कीइंग का बेसिक प्रशिक्षण मिलने वाला था।

सोलाँग से हम अपना पिट्ठू बैग टाँगे संस्थान के बाहन में बैठते हैं और रास्ते में पलचान, कोठी जैसे गाँवों को पार करते हुए सर्पीली सड़कों के साथ गुलाबा मोड़ पर पहुँचते हैं। बीच का रास्ता अद्भुत दृश्यावलियों से भरा हुआ है। लगता है कि जैसे हम किसी दूसरे लोक में आ गए हैं। गहरी खाईयाँ, आसमाँ को छूते पर्वत और पहाड़ों से गिरते झरने, रास्ते भर यात्री इन दृश्यों को सांस थामे देखते रहते हैं। बीच में देवदार, मैपल और अन्य पेड़ों के साथ हिमालयन झाडियों से घिरी सडकें सफर को बहुत ही शांति और सुकूनदायी बनाती हैं।

गुलाबा मोड़ पर गाड़ी रुकती है, इसके थोडा ऊपर एक समतल स्थान पर अपना तम्बू गाढ़ते हैं। हमारे इंस्ट्रक्टर पास के तम्बू में थे। इस बीहड़ बन में रुकने के कोई भवन आदि की व्यवस्था नहीं थी, जैसा कि अब तक हम रात को रुकते आए थे। पिछला नाइट सफारी का अनुभव अब हमारे काम आ रहा था। समझ आ रहा था कि अब तक के प्रशिक्षण किस तरह से क्रमिक रुप में हमें आज के दिन के लिए तैयार कर चुके थे।

यहाँ ठण्ड पहले से अधिक लग रही थी, लेकिन स्लीपिंग बैग में सिमट कर इससे निजात पाते हैं। सुबह चाय-नाश्ते के बाद हमें पीछे स्नो फील्डज में ले जाया गया।

इतनी सारी बर्फ को पहली वार देख रहे युवकों का रोमाँचित होना स्वाभाविक था, वह ही पूरी ढ़लान के आर-पार, ऊपर-नीचे, हर तरफ। इस पर पड़ रही धूप के चलते इसे सीधा निहारना खतरनाक था, जो आँखों को चौंधिया कर अस्थायी रुप से अंधा कर सकती थी, जिसे स्नो ब्लाइंडनेस कहा जाता है। इसके लिए स्नो गोग्ल्ज की व्यवस्था हो रखी थी। हाथ में आईस एक्स और पैरों में क्लैंप्स के साथ हम लोग बर्फ पर चल रहे थे, जिनको पहनने का प्रशिक्षण भी हमको मिल चुका था।

चलने के तौर-तरीके हमारे कुशल इंस्ट्रक्टर खुद चल कर सिखा रहे थे। कम स्लोप में बतख की तरह पैरों को फैला कर चला जाता है, जबकि खड़ी चढाई में जिग-जैग हल्की चढ़ाई के साथ आर-पार चलते हुए ऊँचाई को नापा जाता है। आइस एक्स का स्पोर्ट इसमें लाठी का काम करता है। स्नो क्राफ्ट का पहला सबक आज हमें मिल गया था, जिसका अभ्यास चलता रहा। फिर दिन का भोजन होता है, कुछ विश्राम के बाद फिर हम स्नो फील्ड में आज के सीखे पाठ का अभ्यास करते हैं।

अगले दिन हम और ऊँचाई में पहुँचते हैं, जहाँ से बर्फ के संग स्कीइंग, फिसलने के प्राथमिक गुर हमें सिखाए जाते हैं। और यदि कहीँ रुकना हो तो कैसे आइस एक्स का सहारा लिया जा सकता है, या कहीं बर्फ में गिर गए या फिसल गए तो कैसे आइस एक्स को बर्फ में फंसाकर स्वयं का बचाव किया जा सकता है। इस तरह आज हम बर्फ पर फिसलने का अभ्यास करते रहे। इसमें नौसिखियों के अनाढ़ीपन का खामियाजा भी बीच-बीच में भुगतना पड़ रहा था। लेकिन आईस एक्स के सहारे बचाव के तौर तरीके हम सीख रहे थे। कुल मिलाकर इसके साथ हमारा एडवेंचर कोर्स पूरे श्बाव पर था।

कोर्स की अवधि पूरा होने को थी, दिन का अभ्यास पूरा हो चुका है, फुर्सत के पलों में तम्बू के आसपास के जंगलों व बुग्यालों को एक्सप्लोअर करते हैं। यहाँ से घाटी के उस पार सोलाँग व मानाली के बीच के क्षेत्र के पीछे की पर्वत श्रृंखलाएं स्पष्ट दिख रहीं थीं, जिनमें हनुमान टिब्बा विशेष रुप से पर्वतारोहियों के बीच खास लोकप्रिय रहता है। इन बर्फ से ढकी चोटियों को देखकर सहज ही मन में भाव उमड़ रहे थे कि ये पर्वत तपस्वियों की तरह अपनी धुनी रमाकर न जाने कब से ध्यान में मग्न हैं। इनका सान्निध्य व्यक्ति को इनकी ध्वलता, विराटता, दृढ़ता, पावनता, तप, विरक्तता एकांतिकता, शाँति जैसे अनगिन विशेषताओं से रुबरु कराता है और प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमी घुमक्कड़ अपनी पात्रता सिद्ध करते हुए हिमालय के इस दिव्य स्पर्श को पाकर धन्य अनुभव करते हैं। लेकिन अभी हम इनका दूरदर्शन कर संतोष पा रहे थे, हालाँकि इतने दिन हिमालय की गोद में हिमक्रीडा का आनन्द लेकर हम भी धन्य अनुभव कर रहे थे।

कोर्स पूरा कर हम संस्थान के वाहन में बापिस मानाली आते हैं।

यहाँ पर ग्रुप लीड़र के नाते फाइनल रिपोर्ट बनाने व पढ़ने की जिम्मेदारी निभाते हैं और बेस्ट स्टुडेंट का तग्मा भी हमारे हिस्से में आता है। छोटे से ग्रुप में यह उपलब्धि अंधों में काना राजा की उक्ति जैसी थी, लेकिन हमारे जुनून व मेहनत की हौंसला बधाई तो इसके साथ अवश्य हो रही थी। एडवेंचर कोर्स के अनुभव हमें अगले पड़ाव के लिए तैयार कर रहे थे, जिसका पूरा अंदाजा अभी हमें भी नहीं था, क्योंकि अचानक अगले ही माह हमारे बेसिक कोर्स में प्रवेश का भी संयोग बन जाता है, जो लगभग एक मासीय अवधि का था।

माह जुलाई का था। सामान्यतया मई-जून में बेसिक कोर्स के तहत मानाली के सामने सोलंग वैली के पीछे की पीर पंजाल हिमालयन पर्वत श्रृंखलाओं की किसी चोटी का आरोहण किया जाता है, जो औसतन 20 हजार फीट के आसपास की रहती हैं। लेकिन जुलाई माह में बरसात के कारण यहाँ पर्वतारोहण संभव नहीं होता। अतः हमारे हिस्से में लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के सूखे पहाड़ थे, जिसका बैस कैंप मानाली-लेह सड़क के बीच सूरजताल सरोवर के पास जिंगजिंगवार घाटी में लगने वाला था। पर्वतारोहण के बेसिक कोर्स के प्रशिक्षण व यात्रा का रोमाँचक वर्णन आप अगली ब्लॉग पोस्ट - मानाली की वादियों में प्रशिक्षण के पहले नौ दिन में पढ़ सकते हैं।

बुधवार, 29 जुलाई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-1

एडवेंचर कोर्स के वो रोमाँचक दिन

1991 के मई माह में किसी विज्ञापन से पता चलता है कि मानाली स्थित माउंटेनीयरिंग इंस्टीच्यूट में पंद्रह दिवसीय एडवेंचर कोर्स के लिए सीटें निकली हैं। इसमें एप्लाई करते हैं और प्रवेश भी मिल जाता है। पता चला कि इसके अलावा यहाँ पर्वतारोहण के एक-एक मासीय बेसिक और एडवांस कोर्स भी चलते हैं।

हमने शुरुआत एडवेंचर कोर्स से करनी उचित समझी, जो लगभग 15 दिन का था। इसमें लगभग 15 प्रवेशार्थी थे। मैं सबसे बड़ा 22 साल का, बाकि सब अंडर 17 थे। मैं अभी-अभी पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना से अपनी बीटेक की पढ़ाई पूरी कर बाहर निकला था।

मेरी पहाड़ों में रुचि बचपन से थी, जब से होश संभाला था। अब तक अपने पहाड़ों में घूमने के शौक को अपने ढंग से अंजाम देता रहा था। कभी ग्वाला बनकर गाय-बैल, भेड़-बकरियों के साथ, तो कभी जंगल से घास-पत्ति व सूखी लकड़ियों को लाने के वहाने, कभी अपने मवेशियों को जंगल में छोड़ने व वहाँ रात को रुकने के साथ, तो कभी देवताओं के साथ पहाड़ों के उस पार देवयात्रा का हिस्सा बनकर, तो कभी भादों की बीस में पावन जल स्नान हेतु पहाड़ी चश्में की सैर और कभी एक धार से दूसरी धार तक मित्रों के साथ ट्रेकिंग करते हुए।

लेकिन ये सब फ्री स्टाइल में हो रहा था। विधिवत प्रशिक्षण अभी तक हमें कहीं से नहीं मिला था। पर्वतारोहण संस्थान में यह काम पूरा होने वाला था। मालूम हो कि दिल्ली में इंडियन माउंटेनियरिंग फेडरेशन (आईएमएफ) ऑफ इंडिया भारत में पर्वतारोहण का मुख्य सरकारी कार्यालय है, जो माउंड एवरेस्ट से लेकर अन्य बड़े हिमशिखरों के अभियानों का नियोजन करता है।

इसके भारत में तीन प्रशिक्षण संस्थान हैं – 1.दार्जिलिंग, प.बंगाल, 2.उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड और 3.मानाली, हि.प्र.। मानाली स्थित पर्वतारोहण और एडवेंचर गतिविधियों से जुड़ा संस्थान अपनी तरह का भारत का सबसे बड़ा और विश्व के सबसे बड़े संस्थानों में अपना गरिमापूर्ण नाम रखता है।

मानाली का पर्वतारोहण संस्थान मुख्य शहर से हटकर व्यास नदी के लेफ्ट बैंक पर स्थित है। मानाली से लगभग दो किमी नीचे मानाली से कुल्लू लैफ्ट बैंक पर अलेउ नामक स्थान से दाएं लगभग आधा किमी नीचे देवदार के घने जंगलों के बीच इसका मनोरम कैंपस बसा हुआ है। इसकी थोड़ी दूरी पर ब्यास नदी बहती है।

इसके चारों ओर देवदार का घना जंगल पिछले कुछ दशकों में ही तैयार हुआ है, जो दूर से देखने पर बहुत सुंदर लगता है। ब्यास नदी की ओर यह बन इतना घना है कि संस्थान से ब्यास नदी व उस पार मुख्य मार्ग के दर्शन नहीं हो पाते। संस्थान के निर्देशक प्रायः आर्मी के कर्नल रैंक के अधिकारी रहते हैं, जिसकी पर्वतारोहण में उच्चस्तरीय उपलब्धियों होती हैं। साथ ही योग्य इंस्ट्रक्टरों की पूरी टीम प्रशिक्षुओं को ट्रैनिंग देती है, जिनमें कुछ तो एवरेस्ट शिखर का आरोहण तक किए हुए हैं।

यहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था ब्यास होस्टल में की गई थी, जहाँ हमें डोर्मेटरी में स्थान मिला था।

मोर्निंग टी के साथ हमारी दिनचर्या शुरु होती। फिर आस-पास के मैदान व जंगलों में वार्म-अप ट्रेनिंग और मॉर्निंग ड्रिल होता, पसीना बहाने के बाद फिर स्नान और ब्रेकफास्ट होता। फिर कुछ विश्राम के बाद दिनचर्या आगे बढ़ती। शुरु के दिनों में पास के गाँव अलेउ के बन क्षेत्र में खड़ी चट्टानों के बीच रॉक क्लाइंविंग का अभ्यास होता रहा। क्नॉट प्रैक्टिस, रॉक-क्लाइंबिंग से लेकर रैप्लिंग आदि के बेसिक गुर हमने यहां सीखे। इसके बाद अगले एक-दो दिन पास की नदी में रिवर क्रासिंग का अभ्यास किया। तेज धार के साथ बहती पहाड़ी नदियों को पार करना कठिन होता है, लेकिन कुछ तकनीकों के सहारे यह काफी आसान हो जाता है। इसका विधिवत प्रशिक्षण हमने पाया। एक-दो दिन ब्यास नदी के किनारे कंटीली जंगली झाड़ियों के बीच बुश क्राफ्ट सीखा, कि कैसे इन झाड़ियों को पार किया जाता है।

इस तरह लगभग दस दिन के रॉक क्लाइंबिंग, रिवर क्रासिंग, बुश क्राफ्ट आदि के अभ्यास के बाद हम अगले अभियान के लिए तैयार थे, जिसके लिए हम मानाली से आगे सोलाँग वैली के लिए कूच करते हैं, जो यहाँ से लगभग 25 किमी आगे सर्दियों की प्रख्यात स्कीईंग स्लोप लिए हुए है।

यहाँ पर पर्वतारोहण संस्थान की बिल्डिंग भी है, जिसमें हम दो-तीन रात रुके। यहाँ हमारे सर्वाइवल कोर्स और नाईट सफारी के रोमाँचक पल इंतजार कर रहे थे।

सर्वाइवल कोर्स में हमें टीम में बाँटकर जंगल में भेजा गया, साथ में फ्राई पैन, चीनी, चाय पत्ती और बिस्कुट आदि थे। स्थानीय पालक आदि की जानकारी हमें दी गयी थी, जिनसे हम कुछ-कुछ पहले से ही परिचित थे। इस तरह न्यूनतम संसाधनों के साथ जंगल में कैसे सर्वाइव करते हैं, इसका अभ्यास किया जाना था। इसके तहत जंगल से लकडियाँ बीनना, चूल्हा बनाना, पानी की व्यवस्था करना, चाय बनाना, जंगली पालक को उबालकर अपना कामचलाऊ भोजन तैयार करना, चाय-बिस्कुट आदि के साथ दिन गुजारना इस सबका अभ्यास करते रहे। हमारे लिए इसमें कुछ अधिक नया नहीं था, लेकिन जो अपने शहरी घरों से पहली बार जंगल में निकले थे, उनके लिए ये यह सब एक नया अनुभव था।

नाईट सफारी के रोमाँच का शिखर अभी शेष था, जिसमें पूरी रात हमें टीम के साथ बीहड़ बन के घने अंधेरे के बीच गुजारनी थी। खिचड़ी का समान, कूकर आदि पाथेय साथ दिए गए थे। हमें शाम को ही वहाँ छोड़ दिया गया था। रात होने से पहले हम तम्बू गाढ़ चुके थे। पास बह रहे पहाड़ी नाले से पानी की व्यवस्था करते हैं। कुछ लोग लकड़ी इकटठा करते हैं, चुल्हा जलता है और रात की खिचडी तैयार होती है। दिन में सर्वाइवल कोर्स का अभ्यास यहाँ काम आ रहा था। फिर चूल्हे के ईर्द-गिर्द बैठकर कैंप फायर होती है, कुछ गीत-संगीत और गप्पबाजी के साथ रात आगे बढ़ती है। और फिर रात को जागने की पारियाँ निर्धारित होती हैं, जिसमें दो-दो घण्टे की शिफ्ट सबके हिस्से में थी। एक समय दो लोगों का जागना तय होता है।

अभी हम निद्रा देवी की गोद में प्रवेश किए ही थे कि हमारे पहरा दे रहे साथियों की आवाज हमें जगा देती है। आवाज में सहमापन था, कुछ भय था। सुनने में आया कि पास ही हमारे तम्बू के थोड़ी दूर किसी के घुंघरु की आबाजें आ रही हैं और दो काले साए भी नजर आ रहे हैं। एक बारगी तो हम सबका घबरा जाना स्वाभाविक था, कि इस बीहड़ बन में ये कौन से भूत-प्रेत या चुड़ैल जैसे साए आ गए, जो हमारा पीछा कर रहे हैं।

ग्रुप में सबसे सीनियर होने की बजह से अपना भय दबाकर अपनी बहादुरी का प्रदर्शन उचित समझा, जिससे ग्रुप में पैनिक न फैले। फिर थोड़ा साहस बटोरकर हम लाठी लेकर टोर्च के साथ आगे बढ़े। थोडी ही देर में सारा माजरा साफ था। गुज्जरों की दो अवारा भैंसें पास के मैदान में चर रही थी, उनके गले में बंधी घंटियाँ घुंघरु की आबाज जैसी ध्वनि कर रही थी।

इसके बाद जाग चुके सारे ग्रुप के हंसने व मस्ती की बारी थी। पहरा दे रहे हमारे दोस्तों का खूब मजाक बनता रहा और साथ ही सब राहत की साँस लेकर आग को और प्रदीप्त किए, होट ड्रिंक की व्यवस्था हुई और फिर निश्चिंत होकर अपनी अपनी पारी में सो गए। इस तरह से सुबह होती है और हम अपना तम्बू समेट कर सोलाँग वैली के होस्टल में पहुँच जाते हैं। अपने इंस्ट्रक्टर को पूरी कहानी सुनाते हैं। जिसको सुनकर उन्हें अच्छा लगा कि यही तो इस ट्रेनिंग का मकसद था। अनुभव के साथ जीवन के भय, गलतफहमियों पर विजय और विषम परिस्थियों में जीवट के साथ जीने की कला। जीवन की अनिश्चितताओं का साहस के साथ सामना करना और उसका आनन्द मनाना, यही तो एडवेंचर है।

एडवेंचर कोर्स का अगला रोमाँच सामने गुलाबा फोरेस्ट की बर्फ से ढकी ढलानों पर हमारा इंतजार कर रहा था। जिसे आप अगले भाग - गुलाबा फोरेस्ट की बर्फिली वादियों में पढ़ सकते हैं।


शनिवार, 18 जुलाई 2020

मेरी पौलेंड यात्रा – 9, बिडगोश (पौलेंड) से दिल्ली वाया फ्रेंक्फर्ट(जर्मनी)

घर बापसी एवं यादों को समेटता पहला विदेश का सफर

26मई, 2019, रविवार, अंतिन दिन था। पैकिंग हो चुकी थी। मैडेम जोएना काल्का स्वयं गाड़ी लेकर हमें एयरपोर्ट छोड़ने आती हैं। यहाँ करेंसी एक्सचेंज होता है, क्योंकि पौलेंड का जलोटी अब हमारे ट्रांजिट एयरपोर्ट, फ्रेंक्फर्ट (जर्मनी) में नहीं चलने वाला था, वहाँ का करेंसी यूरो है। अतः जलोटी को यूरो में चेंज करते हैं और बाहर एयरपोर्ट पर बोर्डिंग काउंटर खुलने का इंतजार करते हैं।

खाली समय में कोल्ड ड्रिंक्स, जूस आदि के संग प्यास बुझाने का निष्फल प्रयास करते हैं। क्योंकि इतने दिन पी रहे यहाँ के शुद्ध एल्कालीन (क्षारीय) पानी से प्यास नहीं बुझ पा रही थी। लेकिन ये सभी पेय भी प्यास को नहीं बुझा पा रहे थे।

फ्लाईट में जाने से पूर्व बोर्डिंग पास लेते हैं, सेक्यूरिटी चैक से होकर गुजरते हैं, फिर वेटिंग रुम में बैठते हैं। बग्ल में ही यहाँ पीछे वोदका से सजी दुकानों में जाकर पता चला कि यह मूलतः पौलेंड का पेय है, जिसको हम बचपन से रुस से जुड़ी कहानियों में यहाँ का एक लोकप्रिय पेय मानते आए थे। और यहाँ इसकी दर्जनों वेरायटीज दिखीं। हमारे लिए इनका कोई मायने नहीं था, लेकिन जिज्ञासावश इनका अवलोकन करते रहे।

यहाँ हवाई अड्डे पर इंतजार के पलों में काजिमीर विल्की यूनिवर्सिटी में विताए पलों को याद करते हुए अनुभव हुआ कि हम जैसे एक परिवार का हिस्सा हो गए हैं। यूनिवर्सिटी के बड़े अधिकारियों से लेकर प्रोफेसर एवं अन्य कर्मचारियों के साथ बातचीत में पता चला तथा अनुभव हुआ कि उनमें जो भी देवसंस्कृति विवि एवं शांतिकुंज पधारे हैं, सब यहाँ की यादों को लेकर भावविभोर थे। उनका एकमत था कि उनके दूसरी युनिवर्सिटीज के साथ प्रोफेशनल सम्बन्ध हो सकते हैं, लेकिन देवसंस्कृति विवि के साथ उनका पारिवारिक सम्बन्ध है। इस सबमें विश्वविद्याल के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी के पिछले वर्षों के अथक श्रम स्पष्ट झलक रहा था, जो आत्मीयता का ऐसा बीज यहाँ के उच्च शिक्षा केंद्र में बो कर आए हैं। आशा है ये आगे चलकर और बेहतरीन अकादमिक एवं सांस्कृतिक एक्सचेंज के रुप में परमपूज्य गुरुदेव के विजन के अनुरुप फलित होंगे।

हमारी फ्लाईट का समय हो चुका था। आते समय बिडगोश को अंतिम विदाई देते हैं। लगा कि मेहनतकश और भावनाशील पौलेंडवासी भौतिक विकास के साथ कुछ अधिक के हकदार हैं, जिसे यहाँ के सम्यक विकास के लिए दर्करार है। अपने हार्दिक भाव अपनी जगह, बाकि तो उस परमसत्ता की इच्छा है। इन्हीं भावों के साथ स्थानीय लुफ्तांसा हवाई जहाज में चढ़ते हैं व बिडगोस्ट से फ्रेंकफर्ट की ओऱ हवाई यात्रा शुरु होती है।

बिडगोश से उडान भरते ही हवाई जहाज से बिडगोश हवाई अड्डे के पास के हरे-भरे जंगल और शहर का सुन्दर नजारा जैसे हमें विदाई दे रहा था। जल्द ही हम बादलों के बीच पहुँच चुके थे। कभी बाँदलों के ऊपर तो कभी नीचे, आँख-मिचोली का खेल चलता रहा। नीचे पीछे छूटते गाँव, खेत, कस्वे, नदियां विदाई के स्वर में कुछ कह रहे थे। हवा से दिख रहे सुदूर नीले सागर का नजारा रास्तेभर रोमाँचित करता रहा।

बीच में ही चीज-ब्रेड और कॉफी का नाश्ता मिलता है। रास्ते में खिड़की से बाहर के दिलकश नजारों को मोबाईल से कैप्चर करते रहे। अंततः दो घंटे के बाद फ्रेंकफर्ट पहुँचते हैं, जिसका नजारा रास्ते में आसमाँ से बहुत दिलचस्पी से निहारते रहे। बलखाती सर्पिली मैन नदी के किनारे बसा फ्रेंकफर्ट महानगर व इसकी गगनचूम्बी ईमारतें आसमान से लुभाती रही। फिर हरे भरे जंगल के उपर से नीचे उतरते हुए जहाज फ्रेंकफर्ट हवाई पट्टी पर लैंड करता है, जो कि विश्व के सबसे बडे एयरपोर्ट में अपना स्थान रखता है।

फीड़र बस से हम हवाई अड्डे तक पहुँचते हैं और अंदर 3-4 किमी चलते हुए हम अपने वेटिंग कक्ष तक पहुँचते हैं। अगली फ्लाइट में अभी छः-सात घण्टे बाकि थे, अतः यहाँ एयर इंडिया के वेटिंग कक्ष में इंतजार करते हैं। यहाँ भारतीयों का जमाबड़ा देख अच्छा लगा। अधिकाँश यात्री दक्षिण भारत के दिखे, फिर एशियन। विदेशी यहाँ कम ही थे। यहाँ पर हिंदी में घोषणा होते देख अच्छा लगा। वेटिंग रुम में फोन चार्ज करने के स्थान को देखा। इंतजार की घडियों में अब तक की यात्रा की जुगाली चलती रही। खाली समय का सदुपयोग करते हुए यहाँ पर बने डेस्कनुमा प्लेटफार्म पर लेप्टॉप रखकर यात्रा के अपने अनुभवों को कलमबद्ध करते रहे। बीच में बोअर हुए, तो एक अखबार की बडी सी दुकान पर गए, जहाँ खाने-पीने की चीजें भी मिल रही थीं। यहाँ सारा आदान-प्रदान यूरो में था। यहाँ पर ब्रेड सैंडविच और कॉफी का नाश्ता करते हैं, जिसका दाम ठीक ठाक था, जो भारतीय स्टैंडर्ड से काफी मंहगा था। कुल मिलाकर जर्मनी, पौलेंड से मंहगा प्रतीत हुआ।

कई दिनों बाद पहली बार अंग्रेजी में अखबार दिखे, इनमें न्यूयोर्क टाइम्स अखबार के फ्रंट पेज की एक हेडिंग को देखकर माथा ठनका। अखबार को खरीद कर पूरा पढ़ा तो सीधे बेंडर से पूछा कि इस अखबार का यहाँ रेप्यूटेशन कैसा है। जबाव था कि हम अखबार बेचते हैं और यह खूब बिकता है, बाकि हम नहीं जानते। अखबार के फ्रंट पेज में पीएम मोदीजी के खिलाफ तथ्यहीन एवं भ्रामक दुष्प्रचार से भरी सामग्री भरी हुई थी। आश्चर्य यह कि इसका लेखक एनआर भारतीय था, जिसकी अगले दिनों भारत में सोशल मीडिया पर जमकर खिंचाई होती रही।

इंतजार की घड़ियाँ पूरा होती हैं और हम देर रात को (27मई, 2019, सोमवार) फ्रेंकफर्ट से एयर इंडिया के हवाई जहाज में चढ़ते हैं। बापसी का अनुभव जाते समय के लुफ्तांसा के एकदम विपरीत रहा। एक तो सीट बीच की पंक्ति में मिली, जिसके कारण खिड़की से नीचे के नजारों से वंचित रहे। दूसरा यहाँ के किचन में बन रहे मांसाहारी डिश की बर्दाश्त से बाहर हो रही बू रास्तेभर परेशान करती रही। इसी के बीच किसी तरह से अपना डिन्नर पूरा किए।


जहाज लुफ्तांसा की तरह स्थिर भी नहीं था, बीच-बीच में बादलों के बीच कुछ लड़खड़ाता रहा। रास्ते में ही सुबह होती है, लेकिन बाहर के नजारे बीच की सीट से नदारद थे। इन्हें देखने के लिए खड़ा होना शिष्टाचार के खिलाफ लग रहा था। एयर होस्टेस के व्यवहार का स्तर भी अपटू मार्क नहीं था। लगभग आठ घंटे के सफर के बाद दिन के उजाले में दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं।

यहाँ बाहर निकलने पर बुद्ध भगवान की आशीर्वाद देती मुद्रा देखकर दिव्य भाव जगा, लेकिन आगे मुड़ते ही दारू एवं शराब की बोतलों से सजा रास्ता एवं स्टेचुनुमा इनका महिमामण्डन करती महंगी दारू की बोतलें इन भावों पर तुषारापात करती अनुभव हुई। इन्हें देख भारत की छवि दारुवाज, पिय्यकड़ों की जैसी दिखी।

अभी तक किसी भी एयरपोर्ट पर ऐसी बेहुदगी का प्रदर्शन नहीं देखा था। लगा एयरपोर्ट ऑथोरिटी क्या दारुवाजों के हाथों बिक चुकी है, जिसे अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, पहचान एवं गौरव की तक कोई सुध नहीं है। इनका गरिमापूर्ण विज्ञापन भी हो सकता था, जिस ओर एअर पोर्ट ऑथोरिटी को ध्यान देने की जरुरत है।

खैर दिल्ली एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही हम सबसे पहले रास्ते में एक ढावे से बिस्लेरी की दो बोटल खरीदते हैं और पिछले आठ-दस दिन से प्यास से सुखे पड़े गले को तर करते हैं। लगा कि आज असल जल पी रहे हैं। रास्ते में झाल ढावे में देसी भोजन के साथ पेट भराऊ नाश्ता करते हैं और हरिद्वार में प्रवेश करते ही गंगाजी एवं हिमालय के दर्शन के साथ लगा कि अब घर पहुँच गए।

यात्रा के पिछले भाग आप नीचे दिए लिंक्स में पढ़ सकते हैं -

पोलैंड यात्रा, भाग-8, अकादमिक एक्सचेंज, भ्रमण एवं शाकाहारी व्यंजन 

पोलैंड यात्रा, भाग-7. विद्यार्थियों से संवाद एवं पारंपरिक कॉफी का स्वाद

पोलैंड यात्रा, भाग-6, तोरुण के मध्यकालीन ऐतिहासिक शहर में

पोलैंड यात्रा, भाग-5,काजिमीर विल्की यूनिवर्सिटी में पहला दिन

पोलैंड यात्रा, भाग-4, विदेशी धरती में देशी जायके से रुबरु