मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

पर्यावरण प्रदूषण - प्लास्टिक क्लचर के लिए कौन जिम्मेदार?


सम्मिलित प्रयास से ही होगा समाधान


पिछले लगभग अढाई दशकों से हरिद्वार में रह रहा हूँ। गंगा नदी के तट पर शहर का बसा होना ही इसे विशेष बनाता है। इसके वशिष्ट स्थलों पर स्नान-डुबकी पर जीवन के पाप-ताप से मुक्त होने व परलोक सुधार का भाव रहता है। श्रद्धालुओं का सदा ही यहाँ रेला लगा रहता है, वशिष्ट पर्व-त्यौहारों में इनकी संख्या लाखों में हो जाती है और कुंभ के दौरान तो करोड़ों में।
हर बर्ष साल में एक बार गंगा क्लोजर होता है, सामूहिक सफाई अभियान चलते हैं। तब समझ आता है कि गंगाजी के साथ इसके भक्तों ने क्या बर्ताव किया है। तमाम तरह के कचरे से लेकर पॉलिथीन इसमें बहुतायत में मिलता है। जब गंगाजी के किनारे ही यह धड़ड्ले से बिक रहा हो तो फिर क्या कहने। इस पर नियंत्रण के लिए, सरकार हमारे संज्ञान में अब तक तीन-चार बार पॉलिथीन बंदी का ऐलान कर चुकी है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात दिखते हैं। ( अभी हाल ही में 1 फरवरी 2021 से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशानसुर पहले चरण में गोमुख से हरिद्वार तक प्लास्टिक के किसी तरह के उपयोग पर पाबन्दी का आदेश आया है, जिसमें नियम का उल्लंघन करने वाले पर पांच हजार तक के जुर्माने की बात कही गई है।)
हालांकि चार धाम यात्रा के शुरु होने के पूर्व सरकार पुनः पॉलिथीन की बंदी को लेकर संजीदा दिखी है(थी)। अखबार के समाचारों के अनुसार, इसके खिलाफ उपयुक्त दंड़ का भी भय दिखाया जा रहा है। केदारनाथ में गौरीकुंड़ से आगे बरसाती व अन्य पालीथीन ले जाने की मनाही घोषित हो चुकी है। प्रशासन द्वारा गौरिकुँड से पॉलिथीन के बरसाती दिए जाएंगे, जिन्हें बापिसी में लौटाना होगा। इसी तरह यमुनोत्री तीर्थ में पालिथीन में पैक अग्रवती एवं प्रसाद आदि पर बंदी के समाचार मिल रहे हैं। ऐसा ही कुछ बाकि धामों में भी सुनने को मिल सकता है, जो स्वागत योग्य कदम हैं।
लेकिन प्लास्टिक बैन का यह मुद्दा हमें काफी पेचीदा लगता है, जिसके अपने कारण हैं। पिछले कुछ बर्षों से हम व्यैक्तिगत स्तर पर इसके खिलाफ एक्ला अभियान चलाए हुए हैं। अपना थैला लेकर दुकान जाते हैं। शांतिकुंज आश्रम और देवसंस्कृति विवि की बात छोड़ें (दोनों परिसर प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र बन चुके हैं) तो बाहर दुकानों, ठेलों, हाटों व बाजार में पालिथीन बैन को लेकर जो स्थिति है, वह इस पोस्ट में शेयर कर रहा हूँ। ये लगभग हमारी लम्बी व्यवहारिक शोध के अनुभूत परिणाम हैं, जो लगभग हर पर्चेजिंग के बक्त प्लास्टिक उपयोग कर रहे दुकानदारों व ग्राहकों से पूछे गए सबालों के रिस्पोंस पर आधारित है।
जहाँ पालिथीन में ही समान दिया जाते हैं, पूछने पर जबाब रहता है कि हम क्या करें, ग्राहक ही इसकी माँग करते हैं। अपना थैला तो लाते नहीं, उल्टा पालीथीन पैकेट के लिए झगड़ते हैं। जब वहाँ ऐसी माँग करने वालो ग्राहकों से पूछा जाता है, तो प्रायः जबाव रहता है कि कुछ होने वाला नहीं। जब तक सरकार पीछे से ही पालिथीन बैन नहीं करती, ऐसे ही चलता रहेगा। दुकानदार भी जोर से सहमति जताते हुए अपना आक्रोश व्यक्त करता है, कि सरकार ऐसी फेक्ट्रियों को बंद क्यों नहीं करती।
पूछने पर कि यदि प्रशासन आकर जुर्माना लगाए तो। जबाब रहता है कि देख लेंगे जब ऐसा होगा तो। आए दिन प्रशासन के शहर के हरकी पौड़ी साईड या कुछ अन्य स्थानों पर छापे व सजा की खबरे आती रहती हैं, लेकिन दुनाकदारों के बीच इन छुट पुट घटनाओं का कोई भय नहीं है।
मूल प्रश्न भय का नहीं है, अपनी जिम्मेदारी का है, जिसका लगता है न अधिकाँश दुकानदारों को, न अधिकाँश ग्राहकों को अहसास है और सरकार के ढुलमुल रवैये पर भी सवाल तो उठता ही है। कुल मिलाकर, यदि पालिथीन बैन पर राजनैतिक इच्छा शक्ति में दम होता, प्रशासन कड़क होता, थोड़ा सा ग्राहक अपनी जिम्मेदारी समझता (अपना बैग ही तो साथ रखना है) और थोड़ा सा दुकानदार खर्च करता या प्लास्टिक की माँग बाले ग्राहकों को वायकोट करने का साहस रखता। उसी पल समाधान हो जाता।
हमें याद है पिछले दो दशकों की, हम जब भी हिमाचल में शिमला जाते हैं या कुल्लू-मानाली, हमें प्लाटिक क्लचर का ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया नहीं दिखता, जैसा हरिद्वार धर्मनगरी में है। शायद वहाँ प्रशासन, ग्राहक एवं दुकानदार – तीनों स्तर पर न्यूनतम जिम्मेदारी के सम्मिलित प्रयास हुए हैं, जिसका सुखद परिणाम प्लास्टिक मुक्त क्लचर के रुप में सामने है।
हमारी हमसे जुड़े मित्रों, छात्रों, बुजुर्गों, गृहणियों एवं जिम्मेदार नागरिकों से एक ही गुजारिश है कि प्लास्टिक बैन को सफल बनाने में अपने न्यूनतम दायित्व का निर्वाह करने का प्रयास करें। इसमें अधिक कुछ नहीं करना है, बस खरीददारी के वक्त अपने साथ अपना थैला भर साथ रखना है। प्लास्टिक के प्रति गैरजागरुक दुकानदार एवं ग्राहक को एक बार, नहीं बार-बार प्यार से अगाह जरुर करते रहें। हम तो अपना एक्ला अभियान जारी रखे हैं, आप भी रखें। न जाने कब इसका सम्मिलित प्रभाव प्लास्टिक क्लचर से मुक्ति का आधार बनेगा। फिर न गंगाजी या अन्य किसी नदी का दम प्लास्टिक के कचरे से चोक होगा। न कोई गाय व अन्य पशु प्लास्टिक के कारण दम तोड़ने को विवश होंगे। और शायद सरकार व प्रशासन के ढुलमुल रबैये के कारण चल रही फैक्ट्रियों भी खुद-व-खुद बंद हो जाए।

मेरा गाँव, मेरा देश – महाप्रकृति का कृपा कटाक्ष


प्रकृति की सच्चे पुत्र बनकर जीने में ही समझदारी
पिछले दशकों में प्राकृतिक जल स्रोत्र जिस तरह से सूखे हैं, वह चिंता का विषय रहा है। अपना जन्म स्थान भी इसका अपवाद नहीं रहा। मेरा गाँव मेरे देश के तहत हम पिछले चार-पाँच वर्षों से इस विषय पर कुछ न कुछ प्रकाश डाल रहे हैं। साथ ही इससे जुड़ी विसंगतियों एवं संभावित समाधान की चर्चा करते रहे हैं।
गाँव का पुरातन जल स्रोत - नाला रहा, जिसकी गोद में हमारा बचपन बीता। इसका जल हमारे बचपने के पीने के पानी का अहं स्रोत था, फिर गाँव में नल के जल की व्यवस्था होती है। साथ ही गाँव के छोर पर चश्में का शुद्ध जल (लोक्ल भाषा में जायरु) हमेशा ही आपात का साथी रहा है। नाले पर बना सेऊबाग झरना गाँव का एक अहम् आकर्षण रहा, जिसके संग प्रवाहमान जीवन की चर्चा होती रही है। लेकिन पिछले दशकों में इस झरने को वर्ष के अधिकाँश समय सूखा देखकर चिंता एवं दुख होता रहा और पिछले दो साल से इसके रिचार्ज हेतु कार्य योजना पर प्रयास चल रहा है।
हालाँकि अभी समस्या इतना गंभीर भी नहीं थी, क्योंकि यह प्राकृतिक से अधिक मानव निर्मित रही। क्योंकि खेतों की सिंचाई को लेकर जिस तरह से पाईपों का जाल बिछा और नाले के जल को खेतों तक पहुँचाया जा रहा है, दूसरा पारंपरिक रुप से जल अभाव से ग्रस्त पड़ोस की फाटी की जल आपूर्ति के लिए पीछे से ही जल का बंटवारा हो रहा है, तो ऐसे में नाले का सूखना स्वाभाविक था। लेकिन दो वर्ष से हम इसके मूल स्रोत्र का मुआइना किए, तो दोनों बार, मूल झरने के जल को न्यूनतम अवस्था में देखकर दुःख हुआ, जिसके कारण नीचे की ओर दोनों जल धाराएं सूखी मिलीं। जो थोड़ा बहुत जल था वह अंडरग्राऊँड होकर नीचे नाले में प्रकट होता था और पाईपों के माध्यम से खेतों में जा रहा था। और नीचे का सेऊबाग झरना नाममात्र की नमी के साथ सूखा ही मिला।
इस बार जुलाई में जिस तरह की बरसात हुई, तो गाँव के नाले व झरनों को पूरे श्बाव पर देखा।
इसके बाद सर्दियों में जिस तरह की रिकार्डतोड़ बारिश और बर्फवारी हुई, उसने जैसे जल स्रोत्रों को पूरी तरह से रिचार्ज कर दिया। अप्रैल माह में हुई हमारी संक्षिप्त यात्रा के दौरान नाले के पानी को नीचे व्यास नदी तक दनदनाते हुए बहते हुए देख अत्यन्त हर्ष हुआ। सेऊबाग झरना लगातार पिछले छः माह से पूरे श्बाब पर झर रहा है, जैसे इसको पुनर्जीवन मिला हो, खोया जीवन बापिस आ गया हो। नाले के ईर्द-गिर्द निर्भर जीव-जंतुओं, वनस्पतियों से लेकर इंसान के जीवन में जैसे एक नया प्राण लहलहा उठा हो।
इसके मूल में पीछे प्रवाहित हो रहे झरने व जलधाराओं को देखने के लिए जब गए तो पनाणी शिला के मूल झरने को भी पूरे श्बाब के साथ झरते हुए देखकर हर्ष हुआ। नीचे जल की दोनों धाराएं बहती हुई दिखी, जो पिछले दो वर्षों से नादारद थीं। पूरा नाला दनदनाते हुए बह रहा था। लगा जैसे महाप्रकृति कितनी समर्थ है, एक ही झटके में कैसे वह अपने अनुदानों से त्रस्त इंसान एवं जीवों की व्यथा का निवारण कर सकती है। उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं।
लेकिन यहाँ मात्र प्रकृति के भरोसे बैठे रहने और अपने कर्तव्य से मूँह मोड़ने से भी काम चलने वाला नहीं। प्रकृति के वरदान एक तरफा नहीं हो सकते। मनुष्य ने पहले ही प्रकृति के साथ पर्याप्त खिलवाड़ कर इसे कुपित कर रखा है, इसका संतुलन बिगाड़ दिया है, और दूषित करने से बाज नहीं आ रहा, इसका दोहन शौषण करने पर उतारू है। ऐसे में वह इसके कोप से नहीं बच सकता। कितने रुपों में इसके प्रहार हो रहे हैं और आगे भी होंगे, इसके लिए तैयार रहना होगा।
जो अभी अपने गाँव-घाटी में समाधान की उज्जली किरण दिखी है, वह प्रकृति की कृपा स्वरुप है। लेकिन यह सामयिक ही है। सिकुड़ते बनों और सूखते जल स्रोत्रों की समस्या यथावत है। गर्मियों में इसके अस्ली स्वरुप के दर्शन होने बाकि हैं। सारतः इस दिशा में लगातार प्रयास की जरुरत है। जब प्रकृति इस वर्ष की तरह अनुकूल न हो, उस स्थिति के लिए भी तैयार रहना होगा। उस विषमतम परिस्थिति में अधिक से अधिक किया गया वृक्षारोपण, जल संरक्षण के लिए किए गए प्रयोग ही काम आएंगे। इस दिशा में हर क्षेत्र के जागरुक व्यक्तियों को आगे आकर दूरदर्शिता भरे कदम उठाने होंगे, जिससे कि संभावित संकट से निपटने की पूर्व तैयारी हो सके।
सार रुप में प्रकृति के सामयिक उपहार अपनी जगह, समस्या की जीर्णता को देखते हुए समाधान के मानवीय प्रयास अपनी जगह, जो रुकने नहीं चाहिए। इसमें लापरवाही और चूक भारी पड़ सकती है। कुल मिलाकर प्रकृति से जुड़कर, इसकी सच्ची संतान बनकर जीने में ही हमारी भलाई है, समझदारी है।

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