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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-7 (अंतिम किश्त)

बनतोली से गौंदार, राँसी और घर बापिसी


बनतोली में रात की नींद लेकर सुबह उठते हैं, उठने में काफी मश्क्कत करनी पड़ रही थी, लोअर बैक व पीठ में चोट का तीखा अहसास हो रहा था। लेकिन पूरा जोर लगाकर हम खुद ही किसी तरह उठ गए, यह बड़ी बात थी। तैयार होकर बाहर बरामदे में बैठते हैं, तो सामने घर के बग्ल से बह रही मधुगंगा की गर्जन-तर्जन का शोर सुनने लायक था, पास के हरे-भरे पहाड़ दर्शनीय लग रहे थे, जो सुबह की धूप में खिल रहे थे। यहाँ से गौंदार साइड का नज़ारा भी स्पष्ट था। कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में बसा यह गाँव जैसे पुनः आने का निमंत्रण दे रहा था।

यहाँ से विदा लेकर हम बनतोली संगम तक पहुंचते हैं। रास्ते में संगम व गौंदार साइड का नज़ारा देखने लायक था और दायीं ओर से बह रही मार्कण्डगंगा नदी की सांय-सांय ध्वनि। कुछ ही देर में लोअर बन्तोली से होकर संगम पहुँचते हैं। यहाँ कुछ पल रुकते हैं, सभी अपने-अपने ढंग से रिफ्रेश होते हैं। पुलिया को पार कर कुछ यादगार पल कैमरे में कैद करते हैं।

चढ़ाई को पार करना पहली चुनौती थी, जिसको दोनों साथियों की सहायता से पार करते हैं और ऊपर पहुँचकर झुला पुल के सामने विश्राम करते हैं तथा पीछे के रास्ते का अवलोकन करते हैं कि हम चोटिल अवस्था में ही कैसे 10-11 किमी पार कर चुके हैं। लगा कि ऐसे ही अगले 5-6 किमी भी पूरा कर लेंगे। थकान व चोटिल होने का अहसास गहन था, लेकिन आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। दमभर कर यहाँ से आगे बढ़ते हैं।

यहाँ से रास्ते में लैंडस्लाइड वाले चढ़ाईदार पैच के बाद सीधे रास्ते से गौंदार पहुँचते हैं, जहाँ हमारे बिछुडे सहचर डॉ. मुकेशजी मिलते हैं। नेटवर्क बाधित होने के कारण पिछले दो दिन इनसे संपर्क-संवाद नहीं हो पाया था। आँख मिचौली करते हुए हम लोग एक दूसरे से अलग चल रहे थे। अतः इस अनुभव के आधार पर यह सीख मिली कि टीम के सभी सदस्यों को साथ चलना चाहिए, क्योंकि नेटवर्क की समस्या के चलते कहीं भी एक दूसरे से बिछुड़ सकते हैं। इस रुट पर ट्रेक करने वाले पाठक हमारे इस अनुभव से यह सीख ले सकते हैं। वाकि सब बाबा भोलेनाथ की इच्छा, वो जो करे सो कम है।

गौंदार में हिमालयन होमस्टे के ढावे में पोहा चाय का आर्डर देकर नाश्ता करते हैं। यहीं पर लम्बी दाढ़ी, सर पर हैट, आँखों पर काला चश्मा और रोबिले अंदाज बाले एक बाबाजी से भेंट होती है, लगा भोलेनाथ ही इनसे मुलाकात करवा रहे हों। क्योंकि जीवन के कुछ अनमोल विचार मोती इनसे मिलने वाले थे। भारत की सुरक्षा सेवा से रिटार्य ये सज्जन हिमालय के हर ट्रेक, दर्रे व बुग्याल का चप्पा-चप्पा छान चुके हैं और मोटर वाईक में हिमालय में स्थित मुख्य देशों को सोलो बाइक राइडर के रुप में कवर कर चुके है, जिसका इनके नाम गिन्निज बुक रिकॉर्ड दर्ज है। पहले तो हम लोग औपचारिक बात ही करते रहे, लेकिन जब बातों-बातों में इनकी खूबियों से परिचित होते हैं, तो संवाद गहरा होता गया।

धीरे-धीरे हम इनसे खुलते हैं और चाय-नाश्ते पर गहन-गंभीर चर्चा होती है, इनके सात-साढ़े सात दशक के जीवन के मंथन से निकले अनुभूत सुत्र सीधा ह्दय को भेद रहे थे, अंतरात्मा को स्पर्श कर रहे थे। हमारे हिमालय, प्रकृति व अध्यात्म प्रेम को देखते हुए इन्होंने विश्व विख्यात योगी स्वामी राम की लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्ज पुस्तक का सुझाव दिया, जिसको ये कई बार पढ़ चुके थे। पढ़ने के वाद हम भी हिमालय प्रेमी जीवात्माओं को इस पुस्तक पढ़ने का सुझाव देते हैं। पुस्तक में हिमालय की गोद में साधु महात्माओं, सिद्धों व योगियों के दुर्लभ संस्मरण भरे हुए हैं, साथ में अध्यात्म पथ की अनुभूत सीख निहित है। साथ ही युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्य़जी की पुस्तक सुनसान के सहचर को भी पढ़ने का सुझाव देते हैं, जिसमें आचार्य़जी के दुर्गम हिमालय में बिताए पलों को बहुत ही रोचक, रोमांचक एवं प्रेरक यात्रा वृतांत उपलब्ध हैं, जो पाठकों को हिमालय की गोद में प्रकृति के हर घटक से कुछ सीखने की प्रेरणा देती है।

इनसे बिदा लेकर फिर हमारा चार लोगों का दल एक साथ राँसी के लिए निकल पड़ता है। रास्ते में लोहे की पुलिया के उस पार पहली चुनौती पर काम चल रहा था और इस बार हम ढलानदार निर्माणाधीन चौढ़े रास्ते से होकर ऊपर मुख्य मार्ग तक पहुँचते हैं। संभवतः खच्चरों के लिए यह रास्ता तैयार किया जा रहा था। पूरे दल के सहयोग व डॉ. सौरभजी के पीठ से सहारा लेते हुए चढाई पार होती है। इस पैच पर काम देखते हुए लगा कि अगले दिनों यह रास्ता यात्रियों के लिए सरल-सामान्य हो जाएगा।

आगे जिगजैग सड़क से होते हुए वही विरान गाँव, नीचे मधुगंगा, उस पार जंगल और झरने, रास्ते का वही चट्टान काटकर बना मार्ग और फिर पहाड़ी झरने पर बना वह छोटा सा तालाव। रास्ते में जिगजैग रास्ते से कुछ साहसी युवा शॉर्टकट मार चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जो किसी रुप में सुरक्षित नहीं था। इन पत्थरीले शॉर्टकट्स में पत्थरों के स्लाइड होने व स्वयं भी फिसल कर गिरने का खतरा किसी भी दुर्घटना का कारण बन सकता है। अतः यात्रियों को सुझाव दिया जाता है सीधे राजमार्ग से ही अपनी यात्रा भोलेनाथ को याद करते हुए कुशलतापूर्क पूरा करें।

रास्ते में प्यास कुछ इस कदर लग रही थी कि जहाँ भी जल का स्रोत दिखता, लगता कि इसे पूरा पी डालें। साथ में पहाड़ी चश्मे का जल व नींबूज हमारी इस प्यास का शमन कर रहे थे। झरने के पहले घाटी में किसी पेड़ में छिपे पपीहे पक्षी की आबाज़ का दर्द हम आज पहली बार इतनी गहराई से अनुभव कर रहे थे, जो माना जाता है कि वरसात के जल से पतों पर एकत्र होने वाली बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है।

रास्ते में एक पाइप से ऊंचे किसी चश्मे का जल सड़क तक आ रहा था, इससे अपनी बोटल भरते हैं। इसी के कुछ दूरी पर झरने से बना तलाव था। हमारे साथी इसमें डूबकी लगाने व स्नान का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हम भी इसका जल अपनी बोटल में भरना नहीं भूले। यहीं पास के स्टाल में पहाड़ी लूण (नमक) लगे खीरे की दो प्लैट लगाते हैं, जिसका स्वाद प्यासे मन को अलग ही अंदाज में तृप्त कर रहा था।

फिर चल पड़ते हैं चीढ़, बाँज व अन्य हरे-भरे वृक्षों के बीच अगतोलिधार की ओर, जो अब मुश्किल से दो-अढाई किमी रहा होगा। रास्ते में एक छोटा सा जलस्रोत, इससे झरती जल की सहस्र धाराएं मिलती हैं, लगा कि यह इस रुट का अंतिम झरना है। यहाँ बैठकर कुछ पल बिताते हैं, इसकी कल-कल बहती धार को जेहन में उतरते अनुभव कर शांति व शीतलता का गाढ़ा अहसास पाते हैं।


साथ ही इसकी यादगार क्लिप बनाते हैं, इन अनमोल पलों को पुनः स्मरण करने के लिए। इसके स्पर्श के साथ रिफ्रेश होकर कुछ ही मिनट में हम बेरिकेट के पास थे, जहाँ से आगे यात्रियों की मोटर बाइक्स और गाड़ियां खड़ी थीं। स्टेंड पर पहुंचकर एक जीप में बैठकर राँसी पहुँचते हैं। रास्ते में दूर से ही भगवती राकेश्वरी माता को प्रणाम करते हैं, क्योंकि अब बापिसी में वहाँ तक चलना हमारे लिए संभव नहीं था।

राँसी में खड़े वाहन में समान लादकर चल पड़ते हैं, बापिसी के सफर में। हमें आश्चर्य हो रहा था कि हम सही सलाम अपनी चोटिल अवस्था के साथ 16 किमी ट्रेक पूरा कर चुके थे। हमारा व साथियों का श्रम, सहयोग, शौर्य, पराक्रम व टीम भाव किसी भी रुप में महावीर चक्र विजेता से कम नहीं लग रहा था। बाकि भोले बाबा व भगवती की कृपा, गुरुसत्ता का संरक्षण सब मिलकर हमें यहाँ तक सकुशल पहुँचा रहे थे। बाकि शरीर की टुटफूट की मुरम्मत अब घर जाकर चिकित्सा मंदिर (हॉस्पिटल) में होनी थी।

रास्ते में उनियाना के सीढ़ीदार खेत को कैप्चर करना नहीं भूले। इसी तरह मधुगंगा का पुल, फिर मोनसुना मार्केट, रास्ते का झरना व फिर ऊखीमठ। यहीं रास्ते में एक ढावे में भोजन करते हैं, लस्सी के साथ पूर्णाहुति करते हैं, अब कुछ भूख खुल गई थी। यहाँ से अगस्तमुनि होते हुए रुद्रप्रयाग पहुंचते हैं इसके आगे भयंककर बारिश शुरु हो गई थी, पहाड़ से गिरते पत्थर ने रास्ते को थाम रखा था। रास्ता जाम था, वग्ल के होटल से चाय मंगाकर चाय की चुस्की का आनन्द लेते हैं। आधे घंटे बाद रुट खुलता है, पहाड़ से सरकते पत्थरों के बीच ही किसी तरह आगे बढ़ते हैं और श्रीनगर पहुंचते हैं। यहाँ आसमान में डूबते सूरज की लालिमा बादलों के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रही थी। आगे रास्ते में अंधेरा हो चुका था, अंधेरे के बीच सरपट दौड़ता वाहन कब तोता घाटी पार करता है, पता ही नहीं चला और हम ऋषिकेश पहुँच चुके थे। रास्ते में रायवाला में रात का भोजन और फिर रात ग्यारह बजे परिसर में पहुँचते हैं।

बाबा का बुलावा पूरा हो चुका था, उनके दिव्य प्रसाद के साथ, लगा हमारे किसी जटिल प्रारब्ध का हल्के में उपचार हो रहा था और अब इनकी सफाई धुलाई शेष थी। इस क्रम में चिकित्सकों से परामर्श, तन की आधि का निदान, फिर तीन दिन की अस्पताल भर्ती और बेड रेस्ट। इसी के बीच कुछ समय निकालकर यात्रा की स्मृतियों की जुगाली करते हुए यह यात्रा वृतांत तैयार होकर आप तक पहुँच रहा है। लगभग डेढ़ दो माह बाद आंशिक रुप से बाहर निकलना शुरु हो गया है।

अंत मैं इस यात्रा के सार सबक एक बार पुनः एक जगह उन सुधी पाठकों के लिए शेयर करना चाहूँगा, जो हमारी तरह महमहेश्वर या किसी अन्य लम्बे ट्रेक पर ट्रेकिंग या तीर्थाटन के लिए निकलने वाले हों –

  • 1.    कभी भी हमारी तरह उठकर यात्रा पर न निकलें, विशेषकर जहाँ ट्रेक लम्बा हो। इसके लिए तीन-चार सप्ताह पहले नित्य पाँच किमी चलने का अभ्यास करें। नित्य न्यूनतम दस हजार कदमों को चलने का अभ्यास तो सदा ही करते रहें। इतना करने पर यात्रा आनन्दपूरित रहेगी, अन्यथा यात्रा एक सजा देने वाला अनुभव बन सकती है।
  • 2.    अपने बजन पर अवश्य ध्यान रखें, अपनी ऊंचाई व उम्र के हिसाब से बजन को दुरुस्त रखें। आवश्यकता से अधिक शरीर का बज़न लम्बे ट्रेक पर एक बोझ बनता है औऱ गिरने पर अधिक चोटिल होने की संभावना रहती है।
  • 3.    पीठ के बैग को जितना हल्का हो सके रखें। अति आवश्यक कपड़े व अन्य समान ही साथ रखें। खास कर लम्बी दूरी के ट्रेक पर या ऊंचाई पर चढ़ते हुए जब शरीर को ढोना ही कठिन पड़ने लगता है, तो अनावश्यक सामान का बोझ यात्रा के आनन्द पर भारी पड़ने लगता है।
  • 4.    सभी एक साथ यात्रा करें, थोड़ा आगे पीछे भी होते हैं, तो नजरों से ओझल न हों, दलनायक की देखरेख में रहें व मिलकर सफर पूरा करें। एक दूसरे से बिछुड़ने पर कई रुपों में यात्रा के आनन्द में खलल पड़ सकता है।
  • 5.    आवश्यक फर्स्ट एड व दवाईयाँ साथ में रखें, एक व्यक्ति के पास इन्हें रख सकते हैं, लेकिन आवश्यक दवाइयों सभी अपने बैग में रखें, किसी कारणवश बिछुड़ने पर फिर ये काम आ सकेंगी।
  • 6.    नए रास्ते पर स्थानीय लोगों से मार्गदर्शन लें, आवश्यक हो तो गाइड भी ले सकते हैं। रात के सफर करने से बचें, अंधेरे में ट्रेक के जोखिम भरे बिंदुओं को पार करने में दिक्कत आ सकती है, दुर्घटना भी हो सकती है।
  • 7.    एक ही दिन में यात्रा पूरी करने की जिद्द न रखें। यात्रा में मंजिल पहूंचना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, रास्ते का पूरा आनन्द लेते हुए चलना ही श्रेष्ठ नीति रहती है, अतः एक-दो दिन का मार्जन अवश्य रखें।

इतना ध्यान रखेंगे, तो आप यात्रा या ट्रेकिंग या तीर्थाटन का पूरा आनन्द ले पाएंगे और उस मकसद को बखूवी पूर्ण कर पाएंगे, जिसको लेकर आप इस यात्रा पर कदम बढ़ाए थे।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-6

बापिसी यात्रा - मदमहेश्वर से बनतौली

महमहेश्वर की सुबह – रात को सोते-सोते 12 बज गए थे। ठंड व थकान इतनी थी कि मोटे कम्बलों के बीच घुसकर कब नींद आई पता ही नहीं चला। सुबह 6 बजे नींद खुल गई थी। तम्बू की चैन खोलकर देखते हैं, तो बाहर खोरशू के बड़े-बड़े पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे और मैदान का कौना जंगली पालक घास से अटा पड़ा था।

तम्बू से बाहर निकलकर एक वार पूरा नज़ारा निहारने का मन हुआ। डॉ. सौरभजी जुत्ता पहनने के लिए कह रहे थे, लेकिन हम ट्रेकिंग शूज पहनने की जटिलता से बचने के लिए राँसी से खरीदी नई चप्पल को आधा पैर में फंसाकर बाहर निकल पड़ते हैं। हमारा तम्बू खेत के कौने में था और वाकि तम्बू कतार में सजे थे। पीछे दायीं ओर बाबा का मंदिर और चारों ओऱ का विहंगम दृश्य देखकर आल्हादित था। रात भर सांय-सांय करती नदीं प्रवाहित होने की ध्वनि आ रही थी, वो मधुगंगा थी।

एक हाथ में डंडा व एक हाथ में मोबाइल लिए हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे, कि सामने वाले तम्बू के पीछे जल निकास के लिए बनी छोटी सी नाली की चिकनी मिट्टी में हम अचानक फिसल गए। मोबाइल व डंडा हाथ से छूट चुका था और पीठ में बिजली कौंधने के साथ एक चट्टाका सा हुआ। और गिरने के बाद उठने में बहुत दर्द हो रहा था। हमारे दोनों साथी और नीचे आ रहे एक दूसरे तम्बू के सज्जन मिलकर हमें उठाते हैं और तम्बू के अंदर लिटाते हैं। हम पीठ के बल लेट कर विश्राम करते हैं। लगा कि हम तम्बू में विश्राम करें तो वेहतर रहेगा, दो किमी ऊपर बुढ़ा केदार जाना हमारे लिए ऐसे में ठीक नहीं होगा। बाकि विश्राम के बाद ठीक होने पर मंदिर दर्शन कर लेंगे।

हमारे साथी लोग मंदिर दर्शन कर ऊपर बुढ़ा केदार के लिए निकल पड़ते हैं। हम तम्बू में लेटे विश्राम करते हैं। हम पीठ के बल लेट पा रहे थे, जबकि थोड़ी मेहनत के साथ दायीं ओर वांए भी करवट ले पा रहे थे, लेकिन उठ नहीं पा रहे थे, जिससे कि पालथी मार कर बैठ सकें। हमें लग रहा था कि लोअर बैक में चोट आयी है। ऐसे में लग रहा था कि चलना तो दूर, खच्चर की पीठ पर भी चढ़ नहीं पाएंगे, क्योंकि उसमें कदम पर सीधे झटके लगते हैं। कई बार कोशिश कर पाने के वावजूद उठ न पाने के कारण व हो रहे दर्द के चलते हम हेल्थ एंग्जाइटी के दौरे में उलझ चुके थे व एक ही विकल्प सूझ रहा था कि किसी तरह एयर लिफ्ट किया जाए। लेकिन इस दूर दराज इलाकें में यह कैसे संभव होगा। लगा कि उत्तराखण्ड तो हेली सेवा की बहुत चर्चित है, इसकी व्यवस्था कर लेंगे।

इस दृष्टि से अपने पॉकेट डायरी में मुख्य नाम व फोन लिख देते हैं, ताकि आपात सेवा में जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इन दो-तीन घंटों में जीवन की पूरी पिक्चर रील की तरह आँखों के सामने तैर जाती है। लगा कि महादेव द्वारा हमारे प्रारब्ध कर्मों की गहन चिकित्सा हो रही है। उनके धाम में, उनके द्वार पर, उनके चरणों में आकर ऐसी घटना बिना कारण तो हो नहीं सकती। कोई बड़ी घटना छोटे में टल रही है। इसका आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए मन को समझा रहे थे, लेकिन यक्ष प्रश्न एक ही था कि हम बापिस 16 किमी ट्रेक कर वाहन तक कैसे पहुँचेंगे।

तम्बू बंद था, धीरे-धीरे धूप निकल रही थी, तम्बू गर्म हो रहा था। और बड़े-बड़े मच्छर तम्बू में विचरण कर रहे थे, लेकिन वो काट नहीं रहे थे। किसी तरह पैर से जुराब उतारकर अंगूठे से तंबू के अंदर के फाटक की जंजीर खेंचते हैं। तम्बू में रोशनी के साथ हवा का शीतल झौंका आता है, कुछ राहत मिलती है। लाठी के सहारे उठने की तमाम कोशिश की, लेकिन नहीं उठ पा रहा था। ऐसे थक-हार कर आंखें बंद कर भोले बाबा व गुरुसत्ता को याद करता हूँ व अपने अस्तित्व का पूरा मंथन चलता है।

हमारे साथियों को भी जब वे गए थे तो इसका अनुमान नहीं था। वो सोचे थे कि कुछ चोट आई है, विश्राम करेंगे तो बापिस जाने के लायक हो जाएंगे। जब वे दो-तीन घंटे बाद आते हैं तो उनसे अपनी स्थिति को स्पष्ट करता हूँ और एयर लिफ्ट का विचार सामने रखता हूँ। बिना किसी हेलीपेड के यह कैसे संभव है, यह बात सामने आई। फिर इस विकल्प के हटते ही दूसरा विकल्प आया कि स्ट्रेचर के सहारे बापिस जा सकता हूँ। लेकिन यहाँ इसकी आपात व्यवस्था है भी कि नहीं, यह प्रश्न उठा।

हमारी स्थिति का आंकलन करते हुए दोनों साथी हमको दोनों हाथ व कंधों से पकड़कर खड़ा करते हैं, जिसमें हमें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई। मैं दो डण्डों के सहार खड़ा हो पा रहा हूँ, देखकर मैं अचंभित था। दोनों लाठी के साथ हमें चलने में कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही थी, हाँ सीढ़ी व खाई में काफी संभलकर चलना पड़ रहा था। लेकिन गिरने व चोटिल होने का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य साथ में था। ईश्वरीय कृपा से व साथियों के सहयोग से हम धीरे-धीरे एक-एक साइकोलॉजिक्ल बैरियर टूट रहे थे।

जुत्ता पहन, दोनों हाथों में डंडे लेकर साथियों की सहायता से हम थोड़ा ऊपर आते हैं। एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं, ऊंची कुर्सी में भी बैठ पा रहा हूँ, देखकर राहत मिलती है। तम्बू का बाकि समान भी पैक होकर आता है। स्वतः ही सीट पर बैठने व चलने के विश्वास के साथ हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए, मुख्य मार्ग पर आते हैं, वहीं से बाबा को प्रणाम कर पीछे मुख्य ऑफिस तक आते हैं, वहाँ किसी तरह फ्रेश होते हैं, चाय नाश्ता करते हैं। भूख मर चुकी थी, अपनी पसंदीदा मैगी खाने का कोई मन नहीं कर रहा था, किसी तरह से कुछ चम्मच लेते हैं, चाय-विस्कुट उदरस्थ करते हैं, क्योंकि साथियों द्वारा मंदिर के पास के डॉक्टर से लाई गई पेन किल्लर लेनी थी।

कल रात को दिल्ली से आई ट्रैकर, जिसको हम लोग अंधेरे में सहायता किए थे, वह भी रास्ते में मिली, सही सलामत बापिस जा रही थी। रात के सहयोग का आभार व्यक्त करती हुई वह हमें एक स्प्रे गिफ्ट करती हैं, जो मस्ल पैन से राहत देने के लिए थी। लगा कि कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही रहता है। इस तरह बाबा को दूर से ही प्रणाम कर हम लोग बापिस रांसी की ओर चल पड़ते हैं।

शुरु के सीधे रास्ते चलने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। फिर जहाँ सीढ़ी आती, वहाँ लाठी के सहारे इसको भी संभलकर पार करते गए। हम चल पा रहे हैं, हमें विश्वास नहीं हो रहा था। हम अपनी स्थिति देखकर प्रमुदित थे, कहाँ एयर लिफ्ट और स्ट्रेचर से चलने की बात और कहाँ हम दो लाठियों के सहारे चल रहे थे। लगा जैसे बाबा व गुरुसत्ता की कृपादृष्टि प्रत्यक्ष हमें चला रही है और इस तरह अढाई किमी नीचे कूनचट्टी तक पहुँच चुके थे।

कून चट्टी के नीचे बारिश शुरु हो गई थी। सो रेन कोट को ओढ़कर चलते हैं। कुछ लोग खड़ी चढ़ाई में शॉर्टकट मार रहे थे, वह भी पीठ मे समान लादे, जो हमें बहुत खतरनाक प्रयोग लग रहा था। क्योंकि बैग के साथ एक कदम भी पैर फिसलने के परिणाम बहुत घातक हो सकते थे। उन्हें इसके बार में सचेत भी करते हैं। स्थानीय लोग इन शॉर्ट कट में चलने के आदी होते हैं, उनकी नकल नहीं की जा सकती। बीच में बारिश थमती है, तो आगे नीचे घाटी का रास्ता स्पष्ट दिख रहा था।

जहाँ विश्राम करते, वहाँ से नीचे का दृश्य कैप्चर करना नहीं भूलते। क्योंकि थकने पर कुछ पल का विश्राम और प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों के देखकर नई ऊर्जा पाते। दूसरा चढ़ाई में नीचे के दृश्यों पर उतना ध्यान नहीं था, क्योंकि दृष्टि सीधा आगे व ऊपर मंजिल की ओर थी। लेकिन उतराई में नीचे घाटी और दूर पर्वत श्रृंखलाओं के नजारे बहुत स्पष्ट रुप में दिख रहे थे। सो यथासंभव इनको कैप्चर करते रहे।

इस तरह हम नानू चट्टी के पहले की दुकान तक पहुँचते हैं, जहाँ चढ़ते समय मैगी खाई थी। आज यहाँ पराँठा आर्डर करते हैं। लेकिन परांठा खाने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह एक तिहाई खाते हैं। हमारी भूख ही मर गई थी। इसी बीच पाँच युवा आते हैं और सीधे दस पराँठा आर्डर देते हैं। हम सोचते ही रह गए की ये कौन हैं, जो इतना पराँठा खाने का कांफिडेंस लिए हैं। 

बात करने पर पता चला कि ये छत्तीसगढ़, राजनंदगाँव से आए हैं। फिर तो उनसे चर्चा होती है तथा परिचय ओर सघन होता है। ये सुपर फिट युवा थे अपने बीस-पच्चीस की वय में। ये सुबह राँसी से चले थे, और आज ही बुढ़ा केदार से होकर नीचे बापिस हो रहे थे। यह अपवाद श्रेणी के वो ट्रेकर थे, जो लम्बे ट्रेक के अभ्यस्थ रहते हैं तथा इनकी संख्या पाँच-सात प्रतिशत रहती होगी।

यहाँ से नीचे उतरते हैं, तो बारिश और तेज हो जाती है। अब बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।


लग रहा था कि चढ़ाई में तो बाबा ने हमको वख्श दिया था, लेकिन उतराई में हमारे सारे प्रारब्ध कर्मों को धोने जा रहे थे। इसी बारिश में हम लोग खट्टरा पहुँचते हैं, यहीं रास्ते में चंडीगढ़ से आए सज्जन मिले, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को श्रवण की भाँति तीर्थाटन के लिए लाए थे। माताजी का जीवट अभी उताराई में भी बैसे ही बर्करार था।

खट्टरा तक अंधेरा हो चुका था, हम अपने मोबाइल टॉर्च के सहारे नीचे उतर रहे थे। घुटने की नीचे की पिंडलियाँ जोर पकड़ रहीं थी और पैर शरीर का भार उठाने में असक्षमता जाहिर कर रहे थे। इसी तरह हम कल सुबह के टीन शैड़ वाले उस बिंदु को पार करते हैं। रात को यह बंद हो चुका था। सौरभजी हमें सहारा देकर नीचे उतरने में मदद कर रहे थे। रजतजी रोशनी के साथ रास्ता स्पष्ट कर हमारा सफर सरल बना रहे थे।

इस तरह तेज बारिश के बीच हम कल के रिंगाल जंगल व बुराँश पेड़ इलाके को भी पार करते हैं। इसके बाद अंतिम दो जिगजैग ट्रेक रात के इतना लम्बे लग रहे थे कि खत्म होने का ही नाम नहीं ले रहे थे। अंत में कौने पर पहुँचने पर बनलौती के  भवनों की रोशनी टिमटिमाती दिखती है, तो कुछ राहत मिलती है। लेकिन गांव में प्रवेश तक के कुछ सौ मीटर भी कई किमी जैसे लग रहे थे। पैर जैसे जबाब दे चुके थे।

इस रुट पर बिना तैयारी, हमारी तरह चल चुके यात्री इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहे होंगे। लो वह ठिकाना आ गया, जहाँ हम कल सुबह नाश्ता किए थे, यहाँ लोगों की चहल-पहल थी, भोजन पानी चल रहा था, पता चला कि यहाँ रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ अंदर सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते हुए कमरे तक पहुँचते हैं। और गर्म पानी में हाथ पैर धोकर, सरसों के तेल की मालिश कर सोते हैं। चाबल रोटी, आलू-सोया बडी, दाल का बेहतरीन एवं पसंदीदा भोजन आता है, लेकिन हमारी भूख मर चुकी थी। भोलेनाथ की कृपा का आभार व्यक्त करते हुए बिस्तर मे जाते हैं कि आज की 10 किमी की यात्रा इस अवस्था में पूरी हो गयी थी। (जारी, अंतिम किश्त, अगला भाग-7 बनतौली से रांसी वाया गौंदार और घर बापिसी)

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

मेरी पहली गंगोत्री धाम यात्रा, भाग-5

मुखबा गाँव के दर्शन और घर बापिसी

रोज रात को और सुबह होटल की वाल्कनी से भगीरथी नदी के पार मुखबा गाँव  की टिमटिमाती रोशनी ध्यान आकर्षित करती रही। अपने गृह प्रदेश में ठीक कुछ ऐसा ही दृश्य घर के सामने गाँव पेश करता। बैसे ही गगनचूम्बी पर्वतों की गोद में बसे यह गाँव दिखता। लेकिन शैक्षणिक भ्रमण के व्यस्त कार्य़क्रम के चलते मुखबा गाँव छूटता दिख रहा था, लगा कि अगली बार ही यहाँ के दर्शन संभव होंगे।

टूर के अंतिम दिन प्रातः 6 बजे हरिद्वार के लिए कूच करना था, सो पिछली रात को नौ बजे ही निद्रा देवी की गोद में सो गए थे और प्रातः स्नान-ध्यान के पश्चात पौने छः बजे ही नीचे बस की ओर निकल देते हैं। लेकिन दल के सदस्यों की तैयारी देखकर लगा कि आधा-पौन घंटा अभी इनको तैयार होने में लगेगा, तब तक हम कल्प-केदार मंदिर के समीप स्थित तपोवनी माता की तपःस्थली के दर्शन कर आते हैं। यह मंदिर तो हमें नहीं मिला, लेकिन भटकते-भटकते 10 मिनट में नीचे भगीरथी पुल तक पहुँच गए।

राह में सेब से लदे बगीचों के सुंदर नजारों को यथासंभव मोबाईल में कैप्चर करते रहे और पुल से भगीरथी का दृश्य देखते ही बन रहा था। इसको पार कर एक स्थान पर आसन जमाकर धराली साइड के दृश्य का अवलोकन करते हैं। यहाँ से सामने गाँव, पहाड़ और पीछे हिमशिखर का दृश्य देखते ही बन रहा था और उत्तर की ओर मार्कण्डेय ऋषि का मंदिर, भगीरथी नदी का विस्तार, देवदार के जंगल और पीछे गंगोत्री साइड की चोटियाँ – ध्यान के लिए एक आदर्श लोकेशन प्रतीत हो रही थी। कुछ मिनट सड़क किनारे चबूतरे पर यहाँ पालथी मार कर इसी दृश्य में खोए रहे।

स्थानीय लोगों से पता चला कि यहाँ से मुखबा मंदिर महज 1 किमी सीधी चढ़ाई के बाद पड़ता है, सो दल के शेष सदस्यों को फोन से बुलाकर वहाँ दर्शन की योजना बनती है। लगा कि दो दिन से चल रही ह्दय की उहापोह और गंगा मैया की कृपा के चलते संयोग घटित हो रहा था और जैसे बुलावा आ गया है।

कुछ ही मिनट में दल यहाँ पहुंचता है और मुख्य द्वार से प्रवेश करते हुए खेत-बगीचों के बीच ऊपर चढ़ते हैं। रास्ते में नए दर्शकों को राजमाँ, बागुकोशा, खुमानी, गोल्डन व रॉयल एप्पल, अखरोट आदि के वृक्षों, फलों व खेती से परिचय करवाते हैं। साथ ही जंगली पालक, बिच्छु बूटी व अन्य स्थानीय जंगली जड़ी बूटियों की भी जानकारी देते हैं।

आधे-पौन घंटे में हम सीधी चढ़ाई पार करते हुए ऊपर मोटर मार्ग तक पहुँच गए थे, जहाँ से बाईं ओर आगे का रास्ता हर्षिल की ओर जा रहा था। हम यहाँ से दाईं ओर ऊपर चढ़ते हैं और सौ मीटर ऊपर मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं।

मुखबा के मंदिर को मुखीमठ बोलते हैं, जो गंगाजी का शीतकालीन आवास है, जहाँ नबम्वर से अप्रैल तक छः माह इनका वास रहता है औऱ फिर गंगोत्री धाम के कपाट खुलने पर इनका प्रस्थान होता है और गंगोत्री में विधिवत पूजा शुरु होती है।

इस शांत एकांत गाँव में स्थित मंदिर का स्थापत्य देखते ही बनता है। लकड़ी के मंदिर में बहुत सुंदर नक्काशी हुई है। संयोग से पुरोहित जी मंदिर में हाजिर होते हैं, इसके बाद ये मार्कण्डेय ऋषि के मंदिर में प्रस्थान करने वाले थे। लगा हमारी टाइमिंग गंगा मैया ने निर्धारित कर रखी थी। विधिवत पूजन के बाद पंडित जी से यहाँ का संक्षिप्त व सारगर्भित परिचय प्राप्त होता है।

दर्शन के बाद मंदिर प्रांगण में सामूहिक फोटोग्राफी होती है। मंदिर के ठीक सामने दूसरी पहाड़ी से झांकते हिमाच्छादित श्रीखण्ड शिखर के दर्शन देखते ही बन रहे थे। नीचे उतरते हुए सामने धराली साइड के दर्शन करते रहे। उगते हुए सूरज की रोशनी में घाटी जगमगा रही थी। बापिसी में पेड़ से गिरे सेब, बागूकोश आदि फलों को प्रसाद रुप में एकत्र करते हैं। और आधे घंटे में धराली पहुँचते हैं।

समूह का एक दल जो छूट गया था, उसे भी दर्शन के लिए भेजते हैं। और धराली में बाजिव दाम पर यहाँ से सेब खरीदते हैं। यहाँ की एक दुकान में परांठा चाय का नाश्ता होता है। कस्बा कहें या गाँव, धरारी मार्केट का शांत माहौल भीड-भाड से भरे हिल स्टेशन के अशांत वातावरण के एकदम विपरीत शांति-सुकून भरा लग रहा था, यहाँ का जीवन ठहरा हुआ सा दिखा। जीवन जैसे प्रकृति की गति से धीरे-धीरे अनन्त धैर्य के साथ प्रवाहमान है।

इसी बीच समय निकाल कर हम यहाँ माँ सुभद्रा (तपावनी माता) की तपःस्थली के भी दर्शन किए, जो कल्प-केदार होटल के एकदम पास में निकला, जिसकी खोज में सुबह हम भगीरथी नदी तक पहुँच गए थे। यहाँ उनके शिष्य बाबा कालू से मुलाकात हुई, इस तपःस्थली के बारे में अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पाया। कालू बाबाजी इस समय मंदिर की देखभाल कर रहे हैं और नैष्ठिक तीर्थयात्रियों के लिए अखण्ड भण्डारे व ठहरने की व्यवस्था देखते हैं।

अब तक पूरा दल बस में बैठ चुका था। और हमारी बापिसी का सफर आगे बढ़ता है। रास्ते में हर्षिल के दर्शन होते हैं, बगोरी गाँव को दूर से विदा करते हैं। और रास्ते में जो रुट तीन दिन पहले आते समय अंधेरे में कवर किए थे, उसे दिन के उजाले में देखने की तमन्ना पूरी होती है। इसी क्रम में झाला से लेकर सुक्खु टॉप तक पहुँचते हैं।

रास्ते भर सड़क के दोनों ओऱ सेब से लदे बगान, देवदार के जंगल, छोटे-छोटे कस्बे, होटल, होम-स्टे और सेब की पैकिंग के दृश्य। पहले ऊपर चढाई, फिर सीधे आगे दो-तीन किमी लम्बा मार्ग औऱ फिर सुक्खु टॉप से नीचे की जिगजैग उतराई। रास्ते भर छोड़े बड़े झरने व नालों के दर्शन होते रहे। उस पार बर्फ से ढके पहाड़ों से नीचे दनदनाते नाले भी दर्शनीय रहे। जिनको देखकर सहज ही परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक सुनसान के सहचर पुस्तक के संस्मरण याद आ रहे थे।

सुक्खु टॉप से नीचे घाटी में पहुँचने पर वायीं ओर गर्जन-तर्जन करती रौद्र रुप लिए भगीरथी के संग आगे बढ़ते हैं तथा पुल पार कर लेफ्ट बैंक में गंगनानी के दर्शन और राइट बैंक में भटवारी, गंगोरी और फिर वाईपास से होते हुए उत्तरकाशी पहुँचते हैं। रास्ते में दिन के ऊजाले में उत्तरकाशी शहर के दर्शन होते हैं और भूस्खलन के कारण समाचार में अक्सर सुर्खी बनते वर्णावत पर्वत को भी देखते हैं। यहाँ एक मैदान में भोजन के लिए गाड़ी रुकती है।

पहले हम पास ही स्थिति भगवान विश्वनाथ के दर्शन करते हैं। इसके भव्य परिसर में दिव्य दर्शन का लाभ लेकर इससे जुड़े इतिहास, पौराणिक मान्यताओं एवं भविष्य कथन को पढ़कर अविभूत होते हैं, हालाँकि आज का दर्शन परिचयात्मक भर था। अगली बार अधिक समय लेकर उत्तरकाशी को एक्सप्लोअर करेंगे, ऐसा भाव प्रवल हो रहा था।

पेट पूजा कर पूरा दल बस में चढ़ता है और कमान्द से होकर चम्बा से पहले उस ठिकाने पर रुकता है, जहाँ जाते समय हम लोग रुके थे। यहाँ चाय-नाश्ता कर रोचार्ज होते हैं और किबी के पैकेट खरीदते हैं।

बापिसी में चम्बा पार करते-करते अंधेरा हो चुका था और आल बेदर रोड़ के संग सरपट दौड़ती हुई गाड़ी आगराखाल को पार करते हुए नरेंद्रनगर और फिर ऋषिकेश पहुँचती है तथा अगले आधा घंटे में 9 बजे तक देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रांगण में पहुंचते हैं।

इस तरह गंगा मैया की कृपा से तीन दिन में सम्पन्न गंगोत्री धाम की यह सकुशल यात्रा एक अमिट छाप छोड़ जाती है, जिसमें कई प्रश्नों के उत्तर मिले, कई जिज्ञासाओं को शाँत किया और जिज्ञासाओं की कुछ नई कौंपलें भी फूंटी, जो अगली यात्राओं के लिए प्रेरक ईँधन का काम करती रहेंगी।

शनिवार, 30 नवंबर 2024

मेरी पहली गंगोत्री धाम यात्रा, भाग-4

 

उत्तराखण्ड का स्विटजरलैंड हर्षिल और बगोरी गाँव


गंगोत्री धाम से आने के बाद हम सभी कल्प-केदार होटल में विश्राम करते हैं और फ्रेश होकर दोपहर बाद हर्षिल के लिए निकल पड़ते हैं। इस रास्ते में झरने व नाले बहुतायत में मिले। कारण पीछे चोटियों में ग्लेशियर की मौजूदगी, जो पिघल कर इस क्षेत्र को जलराशि की प्रचुरता का वरदान दे जाती हैं। इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य में इनका अपना महत्व है और सेब की उत्कृष्ट फसल का भी यह एक कारण है।

दो-तीन किमी बाद बस मुख्य मार्ग से दायीं ओर मुडती है, एक बड़ा सा सुसज्जित प्रवेश द्वार आपका स्वागत करता है। लगा कि हम कुछ दूर तक किसी मिलिट्री क्षेत्र से गुजर रहे हैं। इसके बाद भगीरथी नदी पर बने एक पुल को पार कर हम हर्षिल कस्बे में प्रवेश करते हैं, जो 9006 फीट (2745 मीटर) ऊँचाई पर बसा हिल स्टेशन है। हर्षिल मार्केट में पर्यटकों की वहुतायत के चलते ट्रैफिक से गाडी को निकालने में थोड़ा समय लगा।

यहाँ के छोटे-छोटे पहाड़ी घर व होटल यहाँ की पहचान करवा रहे थे। मार्केट की अगली साइड पार्किंग में गाड़ी को खड़ा कह हम पैदल चलते हैं। मोड के बाद एक पुलिया पर चढ़ते हैं। दायीं ओर से एक सड़क मुखबा गाँव (गंगा मैया का शीतकालीन आवास) की ओर जा रही थी। ऊपर पुल पर तेज हवा वह रही थी। पहाड़ी नाला कहें या छोटी नदी में जल बहुत तेज गति से बह रहा था। पुल पर फोटोशूट करने वालों का तांता लगा हुआ था, हर कोई गगनचूंबी देवदार, संग बह रहे झरनों व पहाड़ों की पृष्ठभूमि के सुंदर दश्य को कैप्चर करना चाह रहा था। मालूम पड़ा कि राम तेरी गंगा मैली फिल्म की शूटिंग यहीं की लोकेशन्ज में हुई थी।

इस पुल से आगे दायीं ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। कुछ दुकानें, कुछ होटल व बगीचे पार करते हुए रास्ते में वाइं ओर लक्ष्मी नारायण मंदिर का बोर्ड मिला, जिसे हम बापिसी के लिए छोड़ देते हैं। रास्ते में ही दायीं और एक मैदान में बिल्सन की कोठी मिली, जिसे अब एक होटल में कन्वर्ट किया गया है। माना जाता है कि हर्षिल को हिल स्टेशन का रुप देने में इन ब्रिटिश सैन्य अधिकारी का विशेष योगदान रहा है। कुछ इन्हें नायक तो कुछ खलनायक का दर्जा देते हैं।

थोड़ी देर बाद दुबारा एक पुल आता है, जिसके नीचे से बहुत तीव्र वेग से एक नदी का निर्मल जल बह रहा था, लगा पीछे किसी घाटी से यह नदी आ रही है। यहाँ पर भी पुल के ऊपर लोगों को फोटोशूट में मश्गूल देखा। हमारे दल के युवा फनकार भी इसमें शामिल हो जाते हैं। यहाँ से पार होते ही हम थोड़ी ढलान के साथ नीचे उतर रहे थे। नीचे खुली घाटी से तेज हवा जैसे हमारी गति को थाम रही थी।

और एक बड़े गेट के साथ बगोरी गाँव में प्रवेश होता है, जिसमें यहाँ का संक्षिप्त परिचय, इतिहास व विशेषताएं लिखी थीं। प्रवेश करते ही दाइँ ओर इनके कुलदेवी-देवता के मंदिर दिखे। और आगे सड़क के दोनों ओर घर में ही दुकानें सजी दिखीं। कुछ ने घरों को होम स्टे के रुप में सुसज्जित कर रखा था औऱ कुछ ने होटल के रुप में।

घर आँगन रंग-बिरंगे फूलों से सज्जे थे। छोटे-छोटे लकड़ी के पारम्परिक घर बहुतायत में दिखे, कुछ एक ही सीमेंट लेंटर के दिखे। घर के बाहर काली व सफेद ऊन को सुखाते देखा। कुछ बुजुर्ग इनको कात रहे थे, तो कुछ इन से बुनाई कर रहे थे। इनकी दुकानों पर इनसे तैयार स्वाटर, टोपे, मफलर, जुराबें, गलब्ज आदि बिक्री के लिए रखे गए थे। अधिकाँश पुरुष व महिलाएं इन उत्पादों को तैयार करने में व्यस्त दिखे।

कुल मिलाकर गाँव के मेहनतकश लोगों को स्वरोजगार के संसाधनों को तैयार करते देखा। जो हर ठंडे इलाके के लोगों की फितरत रहती है। ठंड में एक तो यह सक्रियता कुछ गर्माहट देती है और कुटीर उद्योग के ये छोटे-बड़े प्रयोग रोजगार एवं आर्थिक स्बाबलम्वन का साधन बनते हैं।

घरों के बाहर सेब की पेटियाँ भी बिक्री के लिए दिखीं, जो घर के साथ जुड़े बगीचों से तोड़े गए थे। बगीचों में जाकर फार्म फ्रेश सेवों की भी व्यवस्था थी। कुछ केफिटेरिया भी सेब के बगीचों में सजे दिख रहे थे।

गंगोत्री की राह का यह क्षेत्र सेब के साथ राजमाह की फसल के लिए प्रख्यात है। यहाँ भी गाँव के घर आंगनों व खेतों में राजमाह की फसल को पकते व सूखते देखा। जो ऑर्गेनिक होने के कारण स्वाद व पौष्टिकता के हिसाब से लाजबाव माने जाते हैं।

रास्ते में गाय बैल व बछड़े मिले, जो काफी छोटे आकार के थे। मानकर चल रहे थे कि इनका दूध बहुत पौष्टिक, सात्विक व स्वादिष्ट होगा, जैसा कि इस क्षेत्र में विचरण किए कई साधकों व योगियों से सुन रखा है।

गाँव में छोटा सा बौद्ध गोंपा भी मिला, जो आजक रविवार के चलते बंद था। गांव के छोर पर पहुँचकर हम बाहर एक मैदान में पहुँच जाते हैं, जहाँ नीचे मैदान के पार तट पर भगीरथी नदी बह रही थी। सभी यहाँ के किनारे कुछ यादगार पल बिताते हैं।

छात्र-छात्राएं अपने मन माफिक फोटो खींचते हैं, क्योंकि पृष्ठभूमि में घाटी व पर्वतों का विहंगम दृश्य देखते ही बन रहा था। चारों और उत्तर औऱ दक्षिण में आसमान छूते बर्फीले शिखर दिख रहे थे और सामने गंगोत्री से हर्षिल की ओर जा रहा मोटर मार्ग। सामने ही देवदार के जंगल के बीच सेब से लदे बगीचे व स्थानीय ग्रामीण परिवेश भी मन को मोहित कर रहा था।

इस पृष्ठभूमि में ग्रुप फोटो भी होता है। और छात्र-छात्राओं के साथ यहाँ के विकास पत्रकारिता से जुड़े प्रश्नों व मुद्दों पर भी कुछ चर्चा होती है।

बापिसी में एक होम स्टे में नूडल व चाय का आनन्द लेते हैं और यहाँ की भाव भरी मेहमानवाजी (हॉस्पिटेलिटी) को अनुभव करते हैं। समूह के कुछ छात्र-छात्राएं इनके किचन में हाथ बंटाते हैं। स्वभाव से यहाँ के लोग ईमानदार, मेहनतकश और भावनाशील लगे।

बापिसी में सड़क मार्ग से लगभग 200 मीटर नीचे लक्ष्मी नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं औऱ साथ ही थोड़ी दूरी पर बहती भगीरथी मैया को भी प्रणाम कर आते हैं। ध्यान साधना के लिए यहाँ का एकांतिक वातावरण आदर्श लगा, जिसका वर्णन हम यू-ट्यूब में भी किसी बाबाजी के वीडियों में कभी देख चुके थे।

इस तरह हमारी आज की हर्षिल का विहंगावलोकन करती संक्षिप्त यात्रा पूरी होती है। तीन-चार घंटों में ही उत्तरकाशी से 78 किमी और गंगोत्री धाम से 26 किमी दूर हर्षिल की वादियाँ जेहन में एक अमिट छाप छोड़ जाती हैं। यहाँ भगीरथी और जालंधरी नदीं के संगम पर बसे उस घाटी में प्राकृतिक सौंदर्य़, आध्यात्मिक प्रवाह, शाँति एवं रोमाँच का अद्भूत स्पर्श मिलता है।

बस तक पहुँचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका था और सभी बस में बैठकर बापिस धराली आते हैं। और रात्रि भोजन के बाद 9 बजे तक कल की तैयारी के साथ निद्रा देवी की गोद में चले जाते हैं, क्योंकि कल सुबह 6 बजे बापिस हरिद्वार के लिए कूच करना था।

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