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सोमवार, 29 नवंबर 2021

हरिद्वार दर्शन - गंगा तट पर घाट-घाट का पानी

 

घाट 1 से 20 तक गंगा मैया के संग

गंगा तीरे, उत्तरीय हरिद्वार

हर-की-पौड़ी के आगे स्वामी सर्वानंद घाट के पुल को पार करते ही, हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे से दायीं ओर का लिंक रोड़ घाट न. 1 की ओर जाता है। पीपल के बड़े से पेड़ के नीचे शिव मंदिर और फिर आम, आँबला व अन्य पेड़ों के समूहों का हरा-भरा झुरमुट। इसके आगे नीचे गंगा नदी का विस्तार, जो नीचे भीमगौड़ा बैराज तक, तो सामने राजाजी नेशनल पार्क तक फैला है। गंगाजी यहाँ एक दम शांत दिखती हैं, गहराई भी काफी रहती है और जल भी निर्मल। लगता है जैसे पहाड़ों की उछल-कूद के बाद गंगा मैया कुछ पल विश्राम के, विश्राँति भरी चैन के यहाँ बिता रही हैं – आगे तो फिर एक ओर हर-की-पौड़ी, गंग नहर और दूसरी ओर मैदानों के शहरों व महानगरों का नरक...।

यहीं से गंगाजी की एक धारा थोड़ा आगे दायीं ओर मोडी गई है, जो खड़खड़ी शमशान घाट से होकर हर-की-पौड़ी की ओर बढ़ती हैं।

यह घाट नम्बर-1 2010 के पिछले महाकुंभ मेले में ही तैयार हुआ है, जहाँ रात व दिन को बाबाओँ व साधुओं के जमावड़े को विश्राम करते देखा जा सकता है। और यह घाट पुण्य स्नान के लिए आए तीर्थयात्री व पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। बाँध के दूसरी ओर पार्किंग की सुविधा है, जहाँ वाहन खड़ा कर पूरा दलवल यहाँ स्नान कर सकता है। विशेष अवसरों पर तो यहाँ सामूहिक हवन व पूजा आदि भी होते देखे जा सकते हैं। साथ में गाय-बछड़ों के झुण्ड आदि भी यहाँ सहज रुप में चरते व भ्रमण करते मिलेंगे।

घाट न.1 से जब आगे बढ़ते हैं, तो बीच में थोड़ी दूरी पर 2,3,4,5,6,7,8,9 घाट पड़ते हैं। जो सार्वजनिक न होकर थोड़े अलग-थलग हैं। यहाँ प्रायः शात एकांत स्थल की तलाश में घूम रहे यात्री, साधु व स्थानीय लोग जाते हैं, गंगाजी का सान्निध्य लाभ लेते हैं और ध्यान के कुछ पल बिताते हैं। घाट नं 6,7 से नील धारा की ओर से बहकर आती गंगाजी की वृहद निर्मल धारा के भव्य दर्शन होते हैं, जहाँ गंगाजी बहुत सुंदर नजारा पेश करती हैं। वसन्त के मौसम में यहाँ विदेशों से आए माइग्रेटरी पक्षियों के झुण्डों को जल क्रीड़ा करते देखा जा सकता है। इनके झुण्डों का नजारा वेहदर खूवसूरत व दर्शनीय रहता है।

गंगा तीरे, उत्तरीय हरिद्वार
 

घाट 10 – बाबाओं की जल समाधि के लिए बना है, जिसमें अब जन-जागरुकता एवं पर्यावरणीय संवेदना के चलते धीरे-धीरे यह चलन कम हो रहा है। यहाँ से सामने नीलधारा का दृश्य प्रत्यक्ष रहता है और इसके ऊपर घाट 11 – 12 पड़ते हैं, जहाँ साधु-बाबाओं की कुटियाएं सजी हैं। बंधे के पार भूमा निकेतन आश्रम है, जिसके संरक्षण में घाट के मार्ग में बनी कुटियानुमा विश्राम स्थल व नदी के तट पर कलात्मक दृश्यों का अवलोकन किया जा सकता है। यहाँ भी शाम को दर्शनार्थियों की काफी भीड़ रहती है। इसके आगे घाट 13 निर्जन स्थान पर पड़ता है। बहुत कम ही लोग यहाँ तक आ पाते हैं।

फिर घाट 14 – धर्मगंगा घाट के रुप से जाना जाता है, जो तीर्थयात्रिंयों के बीच खासा लोकप्रिय है। यहाँ की एक विशेषता है सामने आ रही गंगा की निर्मल धार, जिसका नजारा देखने लायक रहता है व इसमें पक्षियों का क्रीडा क्लोल बहुत सुंदर नजारा पेश करता है। यह लोकेशन फोटोग्राफी के लिए भी बहुत उपयुक्त रहती है। आश्चर्य नहीं कि दिनभर यहाँ यात्रियों का जमावड़ा लगा रहता है, जिसमें जल का स्तर स्वल्प होने के कारण यह गंगा स्नान के लिए सर्वथा उचित रहता है। पानी का जल स्तर बढ़ने पर यहाँ स्नान के दौरान सावधानी अपेक्षित रहती है। इसमें  परमार्थ आश्रम द्वारा संचालित इस घाट में शाम को गंगा आरती होती है, जिसमें पर्याप्त लोगों की भीड़ रहती है।

घाट 15 – संत पथिक घाट के रुप में जाना जाता है। इसके मार्ग में संत पथिक की समाधि मंदिर है। यह भी साधु भक्तों व साधकों के लिए विश्राम व ध्यान का लोकप्रिय ठिकाना है। भारतमाता मंदिर और शांतिकुंज का ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी इसी की सीध में पड़ता है। इसी के आगे है घाट 16, जो बालाजी घाट के नाम से जाना जाता है। इसमें हनुमानजी एवं शिवपरिवार के विग्रह गंगा स्नान के लिए आए दर्शनार्थियों के लिए वंदनीय रहते हैं। यहाँ भी शाम को लोगों को ध्यान विश्राम से लेकर स्नान करते देखा जा सकता है। यहाँ भी गाय-बछडों व पक्षियों का जमावड़ा देखा जा सकता है, जिन्हें श्रद्धालु कुछ न कुछ खिलाते रहते हैं।

इसके आगे आता है, घाट 17 – पाण्डव घाट, जहाँ पंचमुखी हनुमानजी एवं सप्तऋषियों की प्रतिमाएं स्थापित है। पाण्डवों के स्वर्गारोहण के भी यहाँ पार्क में विग्रह स्थापित हैं। इसे सप्तसरोवर घाट के नाम से भी जाना जाता है। यह भी दर्शनार्थियों के बीच लोकप्रिय घाट है, जिसमें आरती पूजा से लेकर धार्मिक कार्यक्रम पास के शिवमंदिर में चलते रहते हैं। यहाँ के प्रशिक्षित पुजारी से विधि विधान से पूजापाठ व कर्मकाण्ड की सेवा उपलब्ध रहती है।

इसके आगे घाट 18 – गंगा कुटीर घाट है, इसके सामने का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है। यह स्नान-विश्राम का एक लोकप्रिय स्थल है। इसके आगे आता है घाट 19 - विरला घाट। जिसके सामने थोड़ी आगे गंगाजी की धारा में लोगों को खेलते देखा जा सकता है और यहीं से वे उस पार टापूओं में भी आगे बढ़ते हैं। और अंत में इसके आगे आता है, घाट 20 जिसे व्यास मंदिर घाट के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत की शैली में बने व्यास मंदिर का निकास यहाँ होता है। इसके किनारे गंगाजी की पतली धारा बहती है, जिसमें यात्रियों को पूजा पाठ से लेकर स्नान करने की सुविधा है। घाट की कुर्सियों व बेंचों पर बैठकर सामने के टापू का सुन्दर नजारा निहारा जा सकता है। दूर पहाड़ व इनकी गोद में बसे गाँवों का विहंगम दर्शन भी यहाँ सुलभ रहता है।

इस तरह गंगा किनारे 1 से लेकर 20 नम्बर तक के घाट यात्रियों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों व स्थानीय नागरिकों के दैनिक जीवन का अहं हिस्सा हैं। सुबह-शाम इनके किनारे बनें बाँध पर टहलने का आनन्द लिया जा सकता है और इनके किनारे गंगातट पर कुछ पल ध्यान, आत्म चिंतन व मनन के बिताए जा सकते हैं। प्रकृति की मनोरम गोद में बसे ये घाट व इनके किनारे बाँध का रुट भ्रमण के लिए आदर्श है। इन घाटों के किनारे गंगाजी के सात्विक प्रवाह के साथ दिव्य वातावरण में कुछ पल बिताकर पुण्य लाभ से लेकर आत्म-शांति सहज रुप में पायी जा सकती है।

गंगा किनारे बाँध के ऊपर भ्रमण-टहल पथ, उत्तरी हरिद्वार

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

हरिद्वार से चण्डीगढ़ वाया हथिनीकुँड

गाँव-खेत-फ्लाइऑवरों व नहरों के संग सफर का रोमाँच


हरिद्वार से चण्डीगढ़ लगभग दो सवा दो सौ किमी पड़ता है, जिसके कई रूट हैं। सबसे लम्बा रुट देहरादून-पोंटा साहिब एवं नाहन से होकर गुजरता है। दूसरा बड़ी बसों का प्रचलित रुट वाया रुढ़की-सहारनपुर-यमुनानगर-अम्बाला से होकर जाता है। छोटे चौपहिया वाहनों के लिए शोर्टकट रुट वाया हथिनीकुंड वैराज से होकर है, जिस पर दिन के उजाले में सफर का संयोग पिछले दिनों बना। फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में सम्पन्न यात्रा कई मायनों में यादगार रही, जिसे यदि आप चाहें तो इस रुट का चुनाव करते हुए अपने स्तर पर अनुभव कर सकते हैं।

इस रुट की खासियत है, गाँव-खेतों, छोटे कस्वों एवं गंगा-यमुना नदी की नहरों के किनारे सफर, जिसमें कितनी तरह की फसलों, फल-फूलों व वन-बगानों से गुलजार रंग-बिरंगे अनुभव कदम-कदम पर जुड़ते जाते हैं। साथ में मिलते हैं लोकजीवन के अपने विविधतापूर्ण मौलिक रंग-ढंग, जो अपनी खास कहानी कहते प्रतीत होते हैं।



हरिद्वार से बाहर निकलते ही गंगनहर के किनारे सफर आगे बढ़ता है। महाकुंभ 2021 के लिए बने नए फलाई-ऑवर के संग सफर एकदम नया अनुभव रहा, क्योंकि सड़क पहले से अधिक चौड़ी, सपाट, सुंदर और सुव्यवस्थित हो गई हैं, साथ ही एक तरफे ट्रैफिक के चलते काफी सुरक्षित एवं आरामदायक भी। फिर फ्लाई-ऑवर के टॉप से नीचे शहर, गंगा नदी इसके मंदिर-आश्रमों एवं चारों ओर दूर पहाड़ियों के दृश्यों के नजारे स्वयं में दर्शनीय लगे।

गुरुकुल कांगड़ी विवि से होकर ज्वालापुर को पार करते ही सफर शहर के बाहर गंगाजी की छोटी सी धारा (नहर-कुल्ह) के संग आगे बढ़ता है और फिर आता है उत्तराखण्ड संस्कृत विवि और थोड़ी देर में बहादरावाद, जहाँ वाईं ओर सड़क रुढ़की के लिए मुड़ जाती है, लेकिन हमारा रुट दायीं ओर से होकर गंग नहर के संग आगे बढ़ता है, कुछ देर में नहर को पार कर हम भगवानपुर की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में खेत-खलिहानों के दर्शन शुरु हो जाते हैं। बीच-बीच में छोटे कस्बे आते रहे, नाम तो सही ढंग सें याद नहीं, हाँ बीच में बोर्ड देख पता चला कि पिरान कलियर से दो किमी दूरी पर आगे बढ़ रहे थे। मालूम हो कि पिरान कलियर शरीफ, सूफी संत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर को समर्पित दरगाह है, जो हिन्दु और मुस्लिम दोनों के लिए महान आध्यात्मिक ऊर्जा का स्थान माना जाता है।

आगे मार्ग में मुस्लिम बहुल आवादी के दर्शन मिले। खेतों में गैंहूं की फसल तैयार हो रही थी, बीच में जौ की खेती भी दिखी। इसके साथ कहीं-कहीं सरसों के खेत कहीं खालिस पीला रंग लिए हुए थे, तो कहीं गैंहूं के बीच हरा पीला रंग लिए अपनी खास उपस्थिति दर्शा रहे थे। 


गन्ने की खेती भी रास्ते भर होती दिखी, कहीं ट्रैक्टरों में गन्ने को लादकर फेक्ट्री में ले जाया जा रहा था तो कहीं सड़क के किनारे गन्ने से ताजा गुढ़ बनते कई ठिकाने दिखे, जो अपनी धुँआ उगलती भट्टियों के साथ बिखरती मिट्ठी खुशबू के साथ अपना परिचय दे रहे थे।

बीच-बीच में आम के बगीचे मिले। इस सीजन में भी आम के फलों को देखकर आश्चर्य हो रहा था, जो सड़क के किनारे दुकानों पर सजे थे। इस बेमौसमी फल के साथ कुछ स्थानों पर अखरोटों से सज्जे ठेले भी दिखे, जिन्हें टोकरियों में सजाया गया था व इन पर काश्मीर के कागजी अखरोट होने के लेबल लगे थे।


सफेदे के पेड़ तो खेत की बाउँडरी पर बहुतायत में दिखे, लेकिन इनके साथ जो अधिक सुंदर लग रहे थे, वे थे पॉपलर के पेड़, जिन्हें खेतों के बीच कतारबद्ध उगाया गया था। आसमान को छूते इनके सीधे खडे पेड़ कौतुहल जगा रहे थे कि इनका क्या मकसद रहता होगा। पता चला कि इन्हें माचिस की तिल्लियों से लेकर प्लाईवुड व पैंसिल के लिए उपयोग किया जाता है, इससे कागज भी तैयार होता है और इनकी फसल किसानों के लिए आमदनी का बेहतरीन स्रोत्र रहती है। यह बहुत तेजी से बढ़ने वाला पौधा है, जो 50 से 165 फीट तक ऊँचाई लिए होता है, जो 5 से 7 साल में 85 फीट व इससे अधिक ऊँचाई पा लेता है। रास्ते में इनकी लकड़ी के लट्ठों से लद्दे ट्रैक्टर एवं ट्रकों को देखकर इसके व्यापार की झलक भी मिलती गई।

इस तरह कई खेत, कस्वे व गाँवों को पार करते हुए सफर आगे बढ़ता रहा। एक दूसरी नहर रास्ते में मिलती है, जिसका जल आसमानी नीला रंग लिए काफी निर्मल दिख रहा था। रास्ते में मिली गंग नहर जहाँ काफी गहरी थी, वहीं यह नई नहर उथली थी, लेकिन अपने दोनों ओर की दृश्यावलियों के साथ अधिक सुंदर एवं भव्य लग रही थी।


अगले लगभग आध-पौन घंटे तक इसके किनारे सुखद सफर आगे बढ़ता रहा, यथासंभव इसके सुंदर नजारों को कैप्चर करते रहे और उस पार बसे गाँव, घर, खेत, बगीचों को निहारते हुए सफर का आनन्द लेते रहे।

अब तक हम इसके उद्गम स्रोत्र की ओर पहुँच चुके थे, आवादी विरल हो चुकी थी, नदी के तट व नहरों के निकास मार्ग दिखे, जिनमें कुछ सूखे प़ड़े थे, तो कुछ में पानी बह रहा था। हम हथिनीकुंड बैराज की ओर बढ़ रहे थे। इसके उत्तर में जल सरोवर के रुप में एकत्र था, लेकिन जालीदार दिवार के कारण इसकी पूरी झलक नहीं मिल पा रही थी। वायीं ओर जल ना के बराबर था, ऐसा लग रहा था कि बाढ़ की स्थिति में ही इससे जल छोड़ा जाता होगा। अगले मुहाने पर जल नीचे एक नहर के रुप में बाहर छोडा गया था, जो आसमानी रंग लिए अपनी निर्मलता का सुखद अहसास दिला रहा था। बाँध के छोर पर एक ऊँट के दर्शन हमें थोड़ा चकित किए। अब हम इसके किनारे दायीं ओर से नीचे बढ़ रहे थे। लगभग आधा किमी तक हम नहर के किनारे दायीं ओर से बढ़ते गए, सुंदर नजारों का शीतल व सुखद अहसास लेते रहे। आश्चर्य़ हुआ कि दिल्ली में गंदे नाले का रुप लिए यमुनाजी यहाँ कितनी साफ व निर्मल थी।



मालूम हो कि हथिनी कुंड बैराज पोंटा साहिब की ओर से आ रही यमुना नदी पर बनी हुई है। इसका जल यमुना नदी के अतिरिक्त पूर्वी और पश्चिमी दो नहरों के माध्यम से निचले इलाकों में खेती के लिए सिंचाई के काम आता है। साथ ही बारिश में बाढ़ की स्थिति में यहाँ से जल को नियंत्रित करके आगे छोड़ा जाता है, हालाँकि पानी के बढ़ने पर इसके फाटकों के खुलने पर नीचे दिल्ली सहित मैदानी इलाकों में स्थिति विकराल हो जाती है, जिस कारण हथिनी बैराज का नाम एक वरदान के साथ एक खतरनाक संरचना के रुप में भी जोड़कर देखा जाता है। लेकिन आज तो हम इसके शांत-सौम्य स्वरुप के दर्शन कर रहे थे।

अब हम नीचे जंगल व खेतों के बीच आगे बढ़ रहे थे। दायीं ओर पीछे उत्तराखण्ड की छोटी शिवालिक पहाड़ियाँ दिख रही थीं और इसकी गोद में दूर तक फैले खेत-खलिहान एवं गाँव। रास्ते में ही एक ढावे में दोपहर के भोजन के लिए रुकते हैं। हम हरियाण में प्रवेश कर चुके थे और यहाँ भोजन में हरियाण्वी तड़का चख्न्ने को मिला। यहाँ मात्र तंदूरी रोटी और दाल-सब्जियाँ ही उपलब्ध थीं। चाबल का अभाव दिखा। बापसी के सफर में भी हथिनीकुँड के पास के वैष्णों ढावे में भोजन का यही अनुभव रहा। यहाँ सब्जी में मिर्च पर्याप्त मिली, जिसका दही के साथ संतुलन बिठाते रहे, हालाँकि लाल मिर्च पाउडर की वजाए यहाँ हरी मिर्च काटकर भोजन में उपयुक्त होती दिखी।


इसी रास्ते में सड़क के किनारे सेंट की दुकानें सजी मिली। फलों की दुकानें तो पूरे मार्ग में कदम-कदम पर आवादी बाले इलाकों में दिखती रही, जहाँ मुख्यता कीनूं, अमरुद, केला, अंगूर जैसे मौसमी फल बहुतायत में दिखे।

आगे का सफर जगाधरी से होकर गुजरा, जो यमुनानगर से पहले ही वाईपास रुट से मुड़ जाता है, जिसमें हम प्रचलित अम्बाला रुट से दूर ही रहे। यह सफर भी नए रुट पर था, जिस पर किसान आन्दोलन का असर साफ दिखा। मार्ग के टोल प्लाजा विरान पड़े थे, कहीं भी पैसा बसूली होती नहीं मिली। सड़क पर्याप्त चौड़ी और फ्लाई ऑवर से लैंस मिली। पंचकुला तक यह चौडी, स्पाट सड़कें हमारे सफर को सुकूनदायी बनाए रही।


 
इस रुट में भी खेत खलिहान, गाँव मिले, लेकिन पिछले रुट से कुछ चीजें नई दिखीं। यहाँ स्ट्रा बैरी की फसल अधिक मिली, जिनको सड़क के किनारे डब्बों में सजाकर बेचा जा रहा था। इनके खेत भी रास्ते में मिले, जिनको कतारबद्ध सुखी तरपाली की छाया में उगाया जाता है। इस राह में आम-अमरुद आदि के बगीचे कम दिखे, फूलगोभी, पत्तोगोभी, मटर जैसी सब्जियों के प्रयोग अधिक दिखे। लगा पास की शहरी आबादी की खपत के लिए इन्हें कैश क्रोप के रुप में तैयार किया जाता होगा। पोपलर के पेड़ इस रुट में भी खेतों में बीच-बीच में अपनी भव्य उपस्थिति दर्शा रहे थे।

साथ ही इस राह में एक नयी चीज दिखी, जो थी ईंट के भट्टे, जहाँ ईंटें तैयार की जा रही थी। शायद जहाँ जमीन अधिक उपजाई नहीं होती, एक खास किस्म की मिट्टी पाई जाती है, वहाँ ऐसे प्रयोग किए जाते होंगे। पंचकुला में प्रवेश करने से पूर्व हिमाचल प्रदेश की नाहन साईड़ की पहाडियाँ मिलती हैं, जिनमें कीकर के जंगल बहुतायत में दिखे और साथ ही बहुमंजिली ईमारतों के दर्शन भी शुरु हो गए थे, जिनमें शहर की फूलती आबादी को समेटने के प्रयास दिखे।

इसी के साथ थोडी देर में पंचकुला से चण्डीगढ़ शहर में प्रवेश होता है। इसके प्लानिंग के तहत बनाए गए सेक्टर, सुंदर गोल चौराहे, सड़कों के किनारे पर्याप्त स्पेस में सजे भव्य एवं सुंदर घर, सड़क के दोनों किनारों पर हरे-भरे सुंदर वृक्षों की कतारें, सिटी ब्यूटीफुल में प्रवेश का सुखद अहसास दिला रहे थे और सफर मंजिल की ओर बढ़ रहा था। इस तरह कई सुंदर चौराहों को पार कर हम अपने ठिकाने पर पहुँचते हैं। आज की शाम आस-पास चण्डीगढ़ में कुछ विशिष्ट स्थलों के नाम थी। धर्मशाला में फ्रेश होकर हम इनके दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं, जिनका जिक्र अगली ब्लॉग पोस्ट में पढ़ सकते हैं।

अगले दिन बापसी का सफर एक और शॉर्टकट रुट से होकर रहा, इसमें पंचकुला के थोड़ा आगे से बायीं ओर मुड़ जाते हैं, जिसकी राह में नरायणगढ़ और बिलासपुर जैसे कस्बे पड़े। हिमाचल प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के बाद आज हम हरियाणा के बिलासपुर से परिचित हुए। इस मार्ग में सिक्खों के तीर्थ स्थल बहुतायत में दिखे। रास्ते में काफी दूर तक गुरुगोविंद सिंह मार्ग एवं इस पर बंदा बहादुर सिंह चौक एवं कुछ गुरुद्वारे मिले। बापसी में फिर हथिनीकुंड बैराज पहुँचते हैं, जहाँ बापसी में इससे निस्सृत नहर के किनारे ढलती शाम के साथ एक यादगार सफर पूरा होता है। आगे गंग नहर और फिर हर-की-पौड़ी को पार करते हुए अपने गन्तव्य स्थल पहुँचते हैं। इस तरह दिन के उजाले में हरिद्वार से चण्डीगढ़ वाया हथिनीकुंड का सफर एक यादगार अनुभव के रुप में अंकित होता है।


रविवार, 29 नवंबर 2020

गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा देहरादून

 हिमालय के आँचल में बसा देहरादून

Dehradun Valley from Landour, By Paul Hamilton, Wiki

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून गढ़वाल हिमालय की तराई में बसा एक महत्वपूर्ण शहर है, जो राष्ट्रीय महत्व के कई शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों के लिए जाना जाता है। शहर बहुत पुरातन है। द्रोण नगरी के नाम से माना जाने वाला देहरादून अपना पौराणिक इतिहास लिए हुए है। सहस्रधारा की गुफा में स्थित द्रोणाचार्य की गुफा व उनका विग्रह आज भी इसकी गवाही देते हैं।

द्रोणाचार्य गुफा मंदिर, सहस्रधारा

टपकेश्वर में स्थित गुफा में माना जाता है कि द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ था। आज भी यहाँ की गुफा से गिरता जल शिवलिंग का अभिषेक करता है। इसी परम्परा में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA - इंडियन मिलिट्री एकादमी) की स्थापना देहरादून में की गई, जहाँ से भारतीय सेना के लिए कमिशन्ड अफसर तैयार किए जाते हैं। इसके साथ यहाँ कई मिलिट्री स्कूल और कालेज भी हैं। गढ़ी कैंट में पूरी आर्मी की छावनी यहाँ स्थित है।

देहरादून का नाम सिखों के गुरु राम राय से भी जुडा हुआ है। जब वे पंजाब से आकर इस क्षेत्र में बसे तो उनके डेरों के नाम पर यहाँ का नाम देहरादून पड़ा। आज भी गुरु रामराय के आश्रम के साथ इनकी स्थापित शैक्षणिक संस्थाओं की भरमार है। जिसमें स्कूल, कालेज, युनिवर्सिटी से लेकर मेडिक्ल संस्थान एवं अस्पताल यहाँ मौजूद हैं।

गढ़वाल तथा शिवालिक पहाड़ों की तराई पर बसे होने के कारण यहाँ की आवोहवा न अधिक गर्म है और न अधिक ठण्डी। साथ ही घने वनों के बीच बसे होने के कारण प्रारम्भ में इस जगह को स्वास्थ्यबर्धक एवं बेहतरीन माना गया। हालाँकि राजधानी बनने के बाद यहाँ आबादी का दबाव बढ़  गया है तथा प्रदूषण से लेकर घिच-पिच आबादी और ट्रैफिक समस्याएं आए दिन सरदर्द बनती रहती हैं। हालाँकि कई फ्लाईओवर और वाईपास बनने से इससे निजात पाने के प्रयास जोरों से चल रहे हैं।

इसके बावजूद देहरादून में कई दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें व्यक्ति दो-तीन दिन में देख सकता है। सहस्रधारा का जिक्र पहले हो चुका, जो शहर के बाहर मसूरी बाईपास पर रायपुर से लगभग 8 किमी दूरी पर स्थित है। यहाँ गुफा व मंदिरों के अतिरिक्त सहस्रों धाराओं में बह रहे झरनों का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक रहता है, जिसके आधार पर इसका नाम सहस्रधारा पड़ा है।

सहस्रधारा

झरनों के बीच कुछ गुफाएं भी हैं, जिनमें फिसलने से बचते हए आनन्द लिया जा सकता है। नीचे नाला बहता है, जिसको रोककर स्नान योग्य छोटी-छोटी झीलें बनाई गई हैं, जिसमें डूबकी का लुत्फ गर्मियों में उठाया जा सकता है। इसके तट पर गंधक का जलस्रोत भी है, जिसका जल चर्म रोगों के लिए उपयोगी माना जाता है।

यहीं से बापसी में मसूरी बाईपास से होकर सीधे साईं मंदिर आता है, जहाँ के शांत-एकांत वातावरण में कुछ भक्तिमय पल बिताए जा सकते हैं। इसके साथ ही बौद्ध गोम्पा के दर्शन किए जा सकते हैं, जिसमें कालेज भी है। सांईं मंदिर के आगे श्रीअरविंद आश्रम भी है, जहाँ ध्यान के कुछ पल विताए जा सकते हैं। इसके आगे माता आनन्दमयी का आश्रम है, माना जाता है कि माता आनन्दमयी ने उत्तराखण्ड में सबसे पहले इस स्थल पर पदार्पण किया था, जो उनकी कई लीलाओं का साक्षी रहा है। इस मार्ग पर नीचे किशनपुर चौराहे के आगे रामकृष्ण मिशन पड़ता है। यहाँ के आध्यात्मिक ऊर्जा से चार्ज शाँत परिसर में मंदिर दर्शन के बाद पुस्तकों का अवलोकन किया जा सकता है, जिसमें रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं। यहाँ पुस्तकाय भी है, जिसमें बैठकर स्वाध्याय का लाभ लिया जा सकता है।

रामकृष्ण मंदिर

यहाँ से थोड़ा नीचे दायीं ओर लिंक रोड़ से टपकेश्वर पहुंचा जा सकता है जो तमसा नदी पर बसा है। इसी के पीछे कुछ किमी पर गुच्चु पानी पड़ता है, जिसे रोबर्ज केव भी कहा जाता है। अंग्रेजों के समय यह सुल्ताना डाकू के छिपने का ठिकाना था। ऊपर से खुले गुफनुमा मार्ग से इसके अंदर प्रवेश होता है। प्रायः घुटनों तक पानी के बीच इसमें चलना पड़ता है, जो बरसात में बढ़ जाता है। अंदर बैठने के कई ठिकाने हैं और जल-पान की व्यवस्था भी। कुछ स्टुडेंटस यहाँ के एकांत स्थल में परीक्षा की तैयारी करते देखे जा सकते हैं और साथ ही प्रेमी जोड़ों के लिए भी यह मिलने का एक आदर्श स्थल रहता है। अंदर 2-3 किमी तक पैदल चलते हुए दूसरी ओर से बाहर निकलने का रास्ता है। लेकिन इस एडवेंचर को ग्रुप में ही करना उचित रहता है, अकेले में व्यक्ति भटक सकता है और घबराहट में परेशान भी हो सकता है।

गुच्चु पानी गुफा प्रवेश

यहीं से वाहन से आर्मी केंटोनमेंट को पार करते हुए बन अनुसंधान संस्थान (FIR-द फोरेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट) आता है, जिसे अब डीम्ड-यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया है। वन से सम्बन्धित यह भारत का सबसे बड़ा प्रशिक्षण संस्थान है और अधिकाँश फोरेस्ट अफसर यहाँ से तैयार किए गए हैं। इसका परिसर 450 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। ग्रीको रोमन शैली में बना इसका भवन बास्तुशिल्प का एक उत्कृष्ट नमूना है, जो बहुत भव्य लगता है। इसमें वनों का बेहतरीन म्यूजियम बना हुआ है, जिसमें 700 साल पुराने वृक्ष के तने को तक संरक्षित रखा गया है। कुछ फीस के साथ यहाँ के हरे-भरे परिसर में यादगार पल बिताए जा सकते हैं। इसी के आगे आईएमए (इंडियन मिलिट्री एकेडमी) है, जिसके बाहर से दर्शन किए जा सकते हैं।

भारतीय सैन्य संस्थान (IMA)

इसके साथ देहरादून में तमाम राष्ट्रीय महत्व के संस्थान मौजूद हैं, जिन्हें अपनी रुचि के अनुसार भ्रमण किया जा सकता है। जैसे यूकोस्ट, सर्वे ऑफ इंडिया, वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया, वाडिया इंस्टीच्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, ओएनजीसी, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग, नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ विजुअली हैंडिकेप (एनआईवीएच), बोटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, सेंट्रल सोइल एण्ड वाटर कंजर्वेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट आदि। इसके साथ कई सरकारी तथा प्राईवेट विश्वविद्यालय एवं कॉलेज यहाँ स्थापित हैं, जैसे – दून विश्वविद्यालय, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पैट्रोलियम, उत्तराँचल यूनिवर्सिटी, उत्तराँचल टेक्निकल यूनिवर्सिटी, ग्राफिक ईरा यूनिवर्सिटी, आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी, डीआईटी, जी हिमगिरि यूनिवर्सिटी, पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी, द राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कालेज (आरआईएमसी), बीएफआईटी, डीएवी कालेज आदि।

घंटाघर - देहरादून का केंद्रिय स्थल


खरीददारी के लिए पलटन बाजार यहाँ की प्रमुख मार्केट हैं, जहाँ वीक-एंड में काफी भीड़ और हलचल रहती है। यहाँ पर घरेलु उपयोग की लगभग हर बस्तु उपलब्ध हो जाती है। यदि समय बिताना हो तो गाँधी पार्क में पेड़ों की छाया तले आराम से समय बिताया जा सकता है, जिसके बग्ल में पैरेड ग्राउंड है, जहाँ आए दिन कई तरह के मेले, उत्सब चलते रहते हैं। यहीं पर प्रेस क्लब के साथ एक बड़ी लाइब्रेरी भी है, जहाँ पुस्तक प्रेमी सदस्य बनकर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। इसके आस पास खाने-पीने के तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। रेड़ी से लेकर ढावे एवं रेस्टोरेंट में आपके खानी-पीने की हर जरुरत पूरी हो जाती है।

बुद्धा टेम्पल, क्लेमेंटाउन

देहरादून का एक विशेष आकर्षण है बुद्धा टेम्पल, जिसका जिक्र किए बिना शायद देहरादून की यात्रा अधूरी मानी जाएगी। यह देहरादून के दक्षिणी छोर में क्लेमेंनटाउन में स्थित है, जहाँ बुद्ध भगवान का भव्य मंदिर है और एक तिबतन मार्केट भी। इसके पीछे साल का घना जंगल है। यहाँ कुछ पल शांति के साथ बिताए जा सकते हैं।

आईएसबीटी देहदरादून में बसों की बेहतरीन सर्विस रहती है, जहाँ से उत्तराखण्ड के किसी भी कौने तथा दूसरे प्राँतों के लिए बस उपलब्ध रहती हैं। यहाँ से मसूरी की पहाड़ियों के दर्शन सहज ही किए जा सकते हैं। रात को इसकी टिमटिमाटी रोशनी बहुत खूबसूरत लगती है। बर्फ पड़ने पर देहरादून से इसके सुन्दर नजारे देखे जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त देहरादून के थोड़ा बाहर हरिद्वार सड़क पर लक्ष्मण सिद्धबली मंदिर, आगे लच्छीवाला पिकनिक स्थल दर्शनीय हैं।

लच्छीवाला

मसूरी रोड़ पर माल्सी डीयर पार्क, क्रिश्चियन रिट्रीट सेंटर पड़ते हैं। ट्रैकिंग प्रेमी यहाँ से थोड़ी आगे शेखर फॉल की पैदल यात्रा कर सकते हैं, जो देहरादून में जल का एक प्रमुख स्रोत है। रायपुर साईड में मालदेवता भी दर्शनीय स्थल है। सांतला माता का मंदिर भी ट्रेकिंग व तीर्थाटन के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

देहरादून में पुस्तक प्रेमियों के लिए कई बुक शॉप्स भी हैं, जैसे – बुक वर्ल्ड, इंग्लिश बुक डिपो, रमेश बुक डिपो आदि। लेखकों के लिए विंसर पब्लिकेशन, समय साक्ष्य जैसे प्रकाशन भी यहाँ उपलब्ध हैं। इसके साथ कई एनजीओ यहाँ के परिसर में हैं, जैसे नवधानिया, हेस्को आदि। जो जैविक खेती, बीज एवं जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, जिनकी ज्ञानबर्धक जानकारी आप आगे दिए गए लिंक्स में पढ़ सकते हैं।

नवधान्या विद्यापीठ

हेस्को - प्रकृति-पर्यावरण एवं ग्रामीण विकास की अभिवन प्रयोगशाला

ऑर्गेनिक फार्मिंग, जैव विविधता संरक्षण की प्रयोगशाला - नवधान्या विद्यापीठ 

बुधवार, 25 नवंबर 2020

कुम्भनगरी हरिद्वार - कुछ दर्शनीय स्थल

हिमालय के द्वार पर बसी धर्मनगरी - हरिद्वार 

धर्मनगरी के नाम से प्रख्यात हरिद्वार में शायद ही किसी व्यक्ति का वास्ता न पड़ता हो। 6 और 12 साल के अंतराल में महाकुंभ का आयोजन इसकी एक विशेषता है। फिर जीवन के अंतिम पड़ाव के बाद शरीर के अवसान की पूर्णाहुति अस्थि विसर्जन और श्राद्ध-तर्पण आदि के रुप में प्रायः हरिद्वार तीर्थ में ही सम्पन्न होती है। हिमालय में स्थित चारों धामों की यात्रा यहीं से आगे बढ़ती है, जिस कारण इसे हरद्वार या हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। निसंदेह रुप में भारतीय संस्कृति व इसके इतिहास की चिरन्तन धारा को समेटे यहाँ के तीर्थ स्थल स्वयं में अनुपम हैं, जिनकी विहंगम यात्रा यहाँ की जा रही है।

इनमें निसंदेह रुप में कनखल सबसे प्राचीन और पौराणिक स्थल है, जहाँ माता सती ने अपने पिता दक्षप्रजापति द्वारा अपने पति शिव के अपमान होने पर हवन कुण्ड में स्वयं को आहुत किया था और फिर शिव के गणों एवं वीरभद्र ने यज्ञ को ध्वंस कर दक्ष प्रजापति का सर कलम कर दिया था और फिर भगवान शिव ने इनके धड़ पर बकरे का सर लगा दिया था। सती माता के जले शरीर को कंधे पर लिए शिव विक्षिप्तावस्था में ताण्डव नर्तन करते हुए पृथ्वी में विचरण करते हैं, चारों ओर प्रलय की स्थिति आ जाती है। तब विष्णु भगवान सुदर्शन चक्र से सत्ती के शरीर को कई खण्डों में अलग करते हैं। जहाँ माता सती के ये अंग गिरते हैं, इन्हें शक्तिपीठ का दर्जा दिया गया। भारतीय परम्परा में ऐसे 51 या 52 शक्तिपीठों की मान्यता है। कनखल दक्षप्रजापति मंदिर गंगाजी की धारा के किनारे शक्तिपीठों के आदि उद्भव स्रोत के रुप में हमें पौराणिक इतिहास का स्मरण कराते हैं, जो हरिद्वार बस स्टैंड से लगभग 4 किमी की दूरी पर स्थित हैं।

कनखल में ही रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम पधारने योग्य स्थल है, जिसे स्वामी विवेकानन्द एवं अनके गुरु भाईयों ने साधु, अनाथ एवं गरीब जनता की सेवा-सुश्रुणा के लिए एक आश्रम और चिकित्सालय स्थापित किया था। आज यहाँ पूरा हॉस्पिटल है और साथ ही एक समृद्ध पुस्तकालय के साथ रामकृष्ण आश्रम का मंदिर एवं मठ भी। इससे जुड़े कई रोचक एवं रोमाँचक संस्मरणों को विवेकानन्द साहित्य में पढ़ा जा सकता है। कनखल में ही माँ आनन्दमयी का आश्रम भी स्थित है। माँ आनन्दमयी बंगाल में पैदा हुई एक महान संत थी, जो योग विभूतियों से सम्पन्न थी। देश भर में कई स्थानों पर इनके मंदिर हैं, लेकिन कनखल, हरिद्वार में इनकी समाधि है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

 इसके आगे सिंहद्वार से नीचे हरिद्वार-दिल्ली मार्ग पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय पड़ता है, जिसको आर्यसमाज के महान संत एवं सुधारक स्वामी श्रद्धानन्दजी ने स्थापित किया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तथा बाद में यह विश्वविद्यालय मूर्धन्य साहित्यकारों, पत्रकारों, विचारकों, शिक्षाविदों एवं समाजसेवियों को तैयार करने की उर्बर भूमि रहा है। इसके आगे बहादरावाद सड़क पर गंगनहर के किनारे नवोदित उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित है, जो संस्कृत एवं आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन, अध्यापन एवं शोध पर केंद्रित है।

सिंहद्वार के पास गंगनहर के उस पार श्रीअरविंद आश्रम स्थित है। यह इतने शाँत एकांत स्थल पर है कि बाहर सड़क के कोलाहल के बीच इसका अंदाजा नहीं लगता, जहाँ इसका छोटा सा पुस्तक विक्रय स्टाल लगा हुआ है। लेकिन अन्दर एक भव्य, बहुत ही सुंदर आश्रम है, जहाँ आश्रम के साधकों के सान्निध्य में बेहतरीन आध्यात्मिक सत्संग एवं मार्गदर्शन पाया जा सकता है।

यही मार्ग उत्तर की ओर सीधा बस स्टैंड तथा रेल्वे स्टेशन की ओर आता है, दोनों लगभग आमने-सामने पास-पास स्थित हैं। यहाँ से उत्तर की ओर 3 किमी की दूरी पर हर-की-पौड़ी पड़ती है, जहाँ तक ऑटो-रिक्शा से आया जा सकता है। यही श्राद्ध-तर्पण, अस्थि विसर्जन का मुख्य स्थल है। मान्यता है कि यहीं पर समुद्र मंथन के बाद अमृत की बूँदे छलकी थीं, जिसके आधार पर यहाँ क्रमशः छः और बारह वर्ष के अन्तराल में अर्ध-कुम्भ और महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है। वर्ष 2021 में यहाँ महाकुम्भ का आयोजन प्रस्तावित है। इसके घाट का निर्माण सर्वप्रथम 57 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अपने भाई भर्तृहरि की याद में किया गया माना जाता है, जिन्होंने यहाँ गंगा तट पर जीवन का उत्तरार्ध ध्यान-साधना में बिताया था।

हरकी पौड़ी की सांयकालीन गंगा आरती सुप्रसिद्ध है। शाम को सन्ध्या वेला के समय घंटे, घडियाल और शंख ध्वनियों के बीच प्रज्जवलित दीपों से सजे थालों की श्रृंखला दर्शनीय रहती है। इस भक्तिमय दृश्य के साक्षी बनने व इसमें भाग लेने के लिए नित्यप्रति श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। हरिद्वार पधारा शायद ही कोई दर्शनार्थी इसके दर्शनलाभ से वंचित रहता हो।

हर-की-पौड़ी के आसपास खाने पीने के कुछ बेहतरीन ठिकाने हैं, जिनका जिक्र करना उचित होगा। हर-की-पौड़ी के पास ही मोहन पूरी बाले की दुकान है, जो गर्मागर्म हल्वा, पूरी, कचौड़ी आदि के लिए प्रख्यात है। इसके अंदर मोती बाजार में प्रकाश लोक नाम से लाजवाब लस्सी की दुकान है, जिसका गर्मी के मौसम में विशेष रुप से लुत्फ उठाया जा सकता है। बस स्टैंड के पास त्रिमूर्ति के अंदर गली में गुजराती ढावा भी उल्लेखनीय है, जिसमें महज 50 रुपए में 15-20 व्यंजनों के साथ स्वादिष्ट एवं पौष्टिक गुजराती थाली परोसी जाती है। इसके आस-पास मोतीबाजार में तमाम दुकानें हैं, जहाँ से घर के लिए रुद्राक्ष, शंख, कंठी, मालाएं जैसी धार्मिक बस्तुएं प्रतीक एवं उपहार स्वरुप खरीदी जा सकती हैं।

हर-की-पौड़ी के दोनों और 2-3 किमी के फासले पर दो पहाड़ियाँ हैं, बीच में गंगाजी बहती हैं। दायीं ओर की पहाड़ी पर मनसा देवी का मंदिर है तो वायीं ओर की पहाड़ी पर चण्डी देवी का। दोनों मंदिरों तक उड़न खटोलों की सुविधा है। चण्डी देवी के प्रवेश द्वारा पर महाकाली का सिद्धपीठ है, जिसकी स्थापना महान तंत्र सम्राट कामराज महाराज ने की थी। इसी के आगे चण्डीघाट बना है, जो संभवतः हरिद्वार के भव्यतम घाटों में से एक है। यहीं पर कुष्ठाश्रम है, जो निष्काम सेवा का एक विरल उदाहरण है।

दोनों के मध्य पुलिस चौकी के पास मायादेवी का मंदिर है, जो यहाँ की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, इन्हीं के नाम से हरिद्वार का एक नाम मायापुरी भी है। इसकी गणना 52 शक्तिपीठों में भी होती है। मान्यता है कि सती माता का ह्दय एवं नाभी स्थल यहाँ गिरा था। यहीं से थोड़ी दूरी पर ललिताराव पुल के आगे शिवालिक बाईपास के दायीं ओर बिल्केश्वर महादेव एवं गौरी कुण्ड पड़ते हैं। मान्यता है कि माँ पार्वती ने इसी स्थल पर बेल के पत्ते खाकर शिव की आराधना की थी और गौरी कुण्ड में वे स्नान किया करती थीं। यहीं से होकर शिवालिक पहाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं।

यहाँ से उत्तर दिशा में सप्तसरोवर क्षेत्र के पास भारतमाता का सात मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यामित्रानन्दजी ने स्थापित किया था। इसमें भारत भर के हर प्राँत की संस्कृति, मातृशक्तियों, संतों-सुधारकों-यौद्धाओं, देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों एवं प्रस्तुतिओं को अलग-अलग मंजिलों में देखा जा सकता है। संक्षेप में भारतभूमि की युग-युगीन आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परम्परा के दिग्दर्शन यहाँ किए जा सकते हैं। इसकी सातवीं मंजिल से गंगाजी की धाराओं के विहंगम दर्शन किए जा सकते हैं, जो हरिद्वार में अन्यत्र दुर्लभ हैं।

इसके पास ही ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान है, जहाँ आद्यशक्ति गायत्री की 24 शक्तिधाराओं के भव्य मंदिर है, साथ ही विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करती प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय है।


यहाँ से थोड़ी आगे अजरअँध आश्रम पड़ता है, जिसमें अंधें बच्चों की निशुल्क शिक्षा व्यवस्था है। इसके थोड़ी आगे गोस्वामी गणेशदत्तजी द्वारा स्थापित सप्तसरोवर आश्रम और संस्कृत विद्यालय है। सप्तसरोवर क्षेत्र के वारे में मान्यता है कि जब गंगा मैया हिमालय से मैदानों की ओर प्रवाहित हो रही थी, तो इस क्षेत्र में सप्तऋषि तप कर रहे थे। इनकी तपस्या में विघ्न न पड़े, इसलिए गंगा मैया यहाँ सात भागों में विभक्त हुईं थी। इसके थोड़ी आगे शांतिकुंज आश्रम आता है, जिसे विश्वामित्र की तपःस्थली पर स्थापित माना जाता है। पं. श्रीरामशर्मा आचार्य द्वारा 1970 में गायत्री तीर्थ के रुप में स्थापित इस आश्रम में गायत्री-यज्ञ, संस्कार के अतिरिक्त कई तरह की रचनात्मक गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।

यहाँ नौ दिन के साधना सत्र चलते हैं, कोई भी गायत्री साधक इनमें शामिल हो सकता है। इसी तरह एक मासीय युग शिल्पी सत्र तथा तीन माह के परिव्राजक प्रशिक्षण सत्र चलते हैं। नैष्ठिक साधकों के लिए पाँच दिवसीय अंतःऊर्जा सत्र भी चलते हैं। यहाँ युगऋषि द्वारा 1926 से प्रज्जवलित अखण्ड दीपक के दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ देवात्मा हिमालय मंदिर भी है। 


आगंतुकों के लिए लंगर जैसी निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है। ऋषि परम्परा पर आधारित सप्तऋषि मंदिर एवं प्रदर्शनी भी है, जहाँ शांतिकुंज एवं युग निर्माण आंदोलन से सम्बन्धित गतिविधियों की जानकारी पाई जा सकती है। गेट नं. 4 से प्रवेश करते ही गाईड विभाग से सहज मार्गदर्शक उपलब्ध रहता है। श्राद्ध तर्पण, संस्कार और आदर्श विवाह संस्कार यहाँ की अन्य निःशुल्क सेवाएं हैं। यहाँ के बुक स्टॉल पर आचार्यजी द्वारा लिखित 3200 से अधिक पुस्तकों तथा अखण्ड ज्योति पत्रिका को अपनी रुचि एवं आवश्यकतानुसार खरीदा जा सकता है। साथ ही विभिन्न जड़ी-बूटियाँ व इनके उत्पाद भी यहाँ उपलब्ध रहते हैं।

इसी के सामने दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित ब्यास मंदिर है, तो गंगाजी के किनारे बने घाट नं. 20 के तट तक फैला है। यहाँ से नीचे गंगाजी के किनारे घाट नम्बर एक तक घाटों की श्रृंखला फैली है। ये घाट गंगाजी के किनारे बने तटबंधों पर स्थित हैं। गंगाजी का जल बरसात में बाढ़ के कारण उफनने पर किसी तरह की त्रास्दी का कारण न बने, इसके लिए गंगाजी के किनारे हर-की-पौड़ी तक तटबंध बने हुए हैं। इस बाँध पर लोगों को सुबह-शाम भ्रमण करते देखा जा सकता है और शाम को घाट के किनारे साधक यहाँ स्नान-ध्यान करते हैं। यहाँ के सात्विक, शाँत, एकाँत एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से चार्ज वातावरण से आगंतुक लाभान्वित होते हैं।

गंगाजी के उस पार प्राकृतिक रुप से टापू बने हुए हैं, जहाँ घने जंगल हैं। 


पहले यहाँ साधु-सन्यासी लोग कुटिया बनाकर रहते थे, लेकिन अब वन विभाग के नियमानुसार यहाँ किसी तरह का निर्माण अबैध ठहराया गया है, अतः यहाँ कोई स्थायी निवास नहीं है। लेकिन यात्रीगण गंगाजी की धाराओं को पार कर वहाँ पिकनिक मना सकते हैं, कुछ पल गंभीर चिंतन-मनन व ध्यान के बिता सकते हैं।

 कुम्भ के दौरान ये टापू आबाद रहते हैं, जब इसमें संत महात्मा अपनी शिष्य एवं भक्त मण्डली के साथ यहाँ डेरा जमा कर महीनों रहते हैं।

शांतिकुंज के आगे हरिद्वार के उत्तरी छोर पर है देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, जो 2002 में स्थापित हुआ था। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विजन पर आधारित यह विश्वविद्यालय शिक्षा के साथ विद्या के लिए समर्पित है। 


यहाँ पर मूल्य आधारित शिक्षा के अभिनव प्रयोग चल रहे हैं। छात्रों को स्वाबलम्बी बनाने के लिए तकनीकी कौशल एवं बौद्धिक ज्ञान देने के साथ ही जीवन जीने की विद्या का भी कुशल प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वे जीवन के हर क्षेत्र में एक जिम्मेदार नागरिक के रुप में समाज, राष्ट्र एवं विश्वमानव के कुछ काम आ सकें। संक्षेप में यहाँ उच्च शिक्षा के साथ संस्कार की उत्तम व्यवस्था है।

हरिद्वार के उत्तर में जहाँ देवसंस्कृति विश्वविद्यालय है तो दक्षिण में बाहरी छोर पर पातंजलि योग पीठ एवं विश्वविद्यालय, जिन्हें योगगुरु बाबा रामदेव के अभिनव प्रयोगों के लिए जाना जाता है। योग को टीवी माध्यम से घर-घर पहुँचाने में इनका योगदान स्तुत्य रहा है। आचार्य बालकृष्ण के साथ मिलकर इनका आयुर्वेद एवं दैनन्दिन उपयोग के देशी उत्पादों को घर-घर पहुँचाना एक बड़ा योगदान है। इनके साथ योग आयुर्वेद के क्षेत्र में हो रहे शोध अनुसन्धान, बच्चों के लिए वैदिक शिक्षा पर आधारित गुरुकुलम् की अभिनव पहल आदि के दर्शन यहाँ किए जा सकते हैं।

 उत्तरी छोर के उस पार रायवाला क्षेत्र में तथा हरिपुर कलाँ के आगे नदी के पार गंगा के निकट एक अद्भुत आश्रम है, जिसका शांति व अध्यात्म की तलाश में भटक रहे अभीप्सु एक बार अवश्य अवलोकन कर सकते हैं। हालाँकि यहाँ तक पहुँचने का कोई बोर्ड या विज्ञापन कहीं नहीं मिलेगा, लेकिन किसी को साथ लेकर एक बार इसके परिसर में जीवंत नीरव-शांति को अनुभव किया जा सकता है। स्वामी ब्रह्मदेव 1985 से यहाँ एक तरह से धुनी रमाकर बैठे हैं। श्रीअरविंद एवं श्रीमाँ की अध्यात्म विद्या के आधार पर यहाँ आश्रम की गतिविधियों को देखा जा सकता है। यहाँ बहुत समृद्ध पुस्तकालय है, ध्यान कक्ष है, भोजनालय है, एक गौशाला है, स्कूली बच्चों के लिए स्कूल है। साथ ही एक सर्वधर्म समभाव एवं विश्व एकता को लेकर विश्व मंदिर है। पूरा आश्रम आम के बाग तथा हरियाली से आच्छादित है। अभीप्सु यहाँ स्वामीजी के सान्निध्य में सत्संग लाभ ले सकते हैं।

इस तरह हरिद्वार में एक-दो दिन के प्रवास में इन स्थलों के दर्शन किए जा सकते हैं। अपनी आध्यात्मिक सांस्कृतिक विरासत से परिचय के साथ अध्यात्म लाभ लेते हुए कुछ पल शांति, सुकून एवं आत्म-चिंतन मनन के बिताए जा सकते हैं। बस या आटो को किराए पर लेकर आसानी से ये दर्शन लाभ लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त और भी तमाम मंदिर, आश्रम एवं शिक्षा केंद्र यहाँ स्थित हैं, जिनका जिक्र यहाँ नहीं हो पाया है।