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मुट्ठी से दरकता रेत सा जीवन

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कभी न होगी जैसे अंधेरी शाम जी रहे इस घर-आंगन में ऐसे , जैसे हम यहाँ अजर-अमर-अविनाशी , रहेगा हमेशा संग हमारे यह संसार , घर-परिवार , संग कितने साथी सहचर शुभचिंतक , न होगा जैसे कभी अवसान। इसी संग आज के राग-रंग , कल के सपने बुन रहे , कभी न होगा वियोग-विछोह , जी रहे ऐसे जैसे रहेंगे यहाँ हर हमेशा , नहीं होगा अंत हमारा , न आएगी कभी अंधेरी शाम।  संसार की चकाचौंध में मश्गूल कुछ ऐसे, जैसे यही जीवन का आदि-अंत-सर्वस्व सार, बुलंदियों के शिखर पर मदमस्त ऐसे, चरणों की धूल जैसे यह सकल संसार। लेकिन काल ने कब इंतजार किया किसी का , लो आगया क्षण , भ्रम मारिचिका की जडों पर प्रहार , क्षण में काफुर सकल खुमारी, फूट पड़ा भ्रम का गु्ब्बार , उतरा कुछ बुखार मोह-ममता का, समझ में आया क्षणभंगुर संसार। रहा होश कुछ दिन , शमशान वैराग्य कुछ पल , फिर आगोश में लेता राग-रंग का खुमार , मुट्ठी से दरकता फिर रेत सा जीवन ,                      होश के लिए अब अगले प्रहार का इंतजार।