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स्वाध्याय-सत्संग, परमपूज्य गुरुदेव युगऋषि पं. श्रीरामशर्मा आचार्य

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अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा अध्यात्म-विद्या का प्रथम सुत्र यह है कि प्रत्येक बुरी परिस्थिति का उत्तरदायी हम अपने आपको मानें। बाह्य समस्याओं का बीज अपने में ढूंढें और जिस प्रकार का सुधार बाहरी घटनाओं , व्यक्तियों एवं परिस्थितियों में चाहते हैं उसी के अनुरुप अपने गुण-कर्म-स्वभाव में हेर फेर प्रारम्भ कर दें। भीतरी सुधार बाहरी समस्याओं को सुधारने को सबसे बड़ा , सबसे प्रभावशाली उपाय सिद्ध होता है। माना की दूसरों की गलतियाँ और बुराईयाँ भी हमें परेशान करती हैं और अनेक प्रकार की बाधाएं खड़ी करके प्रगति का द्वारा रोकती हैं। संसार में बुरे लोग हैं और बुराईयाँ भी कम नहीं हैं इस बात से कोई इनकार नहीं किया जा सकता , पर साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई बस्तु सजातीय एवं अनुकूल परिस्थितियों से ही बढ़ती है एवं पनपती है। बुराई को अपना रुप प्रकट करने का अवसर तभी मिलेगा , जब बैसी ही बुराई अपने अन्दर भी हो। अपना स्वभाव उत्कृष्ट हो तो बुरे लोगों को भी झक मारकर निरस्त होना पड़ता है। (पृ.3)   कोई अध्यात्मवादी यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसे ग्रहदशा ने , परिस्थितियों ने या दूसरों ने सताया

यात्रा - हरिद्वार से श्रीनगर वाया देवप्रयाग

  गढ़वाल हिमालय की गोद में गंगा मैया के संग हरिद्वार से ऋषिकेश और श्रीनगर शहर केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुण्ड आदि की तीर्थयात्रा के कॉमन पड़ाव हैं। कितनी बार इनकी यात्राओं का संयोग बना। इस लेख में इस मार्ग की कुछ विशेषताओं पर प्रकाश डाल रहा हूँ, जो नए पाठकों व यात्रियों के सफर को और रोचक एवं ज्ञानबर्धक बना सकते हैं और कुछ स्वाभाविक प्रश्नों के जबाव मिल सकते हैं। यह सब अपने सीमित ज्ञान के दायर में है, लेकिन कुछ तो इसका प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा हमें विश्वास है। हरिद्वार को हरि या हर का द्वार कहा जाता है, अर्थात केदारनाथ हो या बद्रीनाथ, चारों धामों की यात्रा यहीं से होकर आगे बढ़ती है। हरकी पौड़ी को पार करते ही विशाल शिव प्रतिमा यही अहसास दिलाती है और पुल पार करते ही आगे वायीं ओर शिवालिक तथा दायीं ओर गढ़वाल हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं इस अहसास को और गाढ़ा करती है। हरिद्वार से ऋषिकेश की आधे घण्टे की यात्रा के दौरान हिमालय अधिक समीप आता है और ऋषिकेश को पार करते ही जैसे हम इसकी गोदी में प्रवेश कर जाते हैं। बग्ल में गंगाजी की धीर गंभीर आसमानी नीले रंग की गहरी धारा जैसे पहाड़ों में उतरने के उ

चरित्र निर्माण, कालजयी व्यक्तित्व का आधार

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"Character has to be established trough a thousand stumbles. Swami Vivekananda"  चरित्र, अर्थात्, काल के भाल पर व्यक्तित्व की अमिट छाप      चरित्र, सबसे मूल्यवान सम्पदा -    कहावत प्रसिद्ध है कि , यदि धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया, यदि स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और यदि चरित्र गया, तो समझो सब कुछ गया। निसंदेह चरित्र, व्यक्तित्व क ी सबसे मूल्यवान पूँजी है, जो जीवन की दशा दिशा- और नियति को तय करत ी है। व्यक्ति की सफलता कितनी टिकाऊ है, बाह्य पहचान के साथ आंतरिक शांति-सुकून भी मिल पा रहे हैं या नहीं, सब चरित्र निर्माण के आधार पर निर्धारित होते हैं। व्यवहार तो व्यक्तित्व का मुखौटा भर है, जो एक पहचान देता है, जिससे एक छवि बनती है, लेकिन यदि व्यक्ति का चरित्र दुर्बल है तो यह छवि, पहचान दूर तक नहीं बनीं रह सकती। प्रलोभन और विषमताओं के प्रहार के सामने व्यवहार की कलई उतरते देर नही लगती, असली चेहरा सामने आ जाता है। चरित्र निर्माण इस संकट से व्यक्ति को उबारता है, उसकी पहचान, छवि को   बनाए रखने में मदद करता है, सुख के साथ आनन्द का मार्ग प्रशस्त करता है।