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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

जंगलीजी का मिश्रित वन – एक अद्भुत प्रयोग, एक अनुकरणीय मिसाल

जंगल में मंगल रचाने की प्रेरक मुहिम

जंगल तो आपने बहुत देखे होंगे, एक खास तरह की प्रजाति के वृक्षों के या फिर बेतरतीब उगे वृक्षों से भरे बीहड़ वन। लेकिन उत्तराखण्ड के कोटमल्ला, रुद्रप्रयाग में स्थित जंगलीजी का मिश्रित वन इनसे हटकर जंगल की एक अलग ही दुनिया है, जहां लगभग साठ किस्म के डेढ़ लाख वृक्ष लगभग चार हैक्टेयर भूमि में फैले हैं। यह सब जंगलीजी के पिछले लगभग चालीस वर्षों से चल रहे भगीरथी प्रयास का फल है। चार दशक पूर्व बंजर भूमि का टुकड़ा आज मिश्रित वन की एक ऐसी अनुपम मिसाल बनकर सामने खड़ा है, जिसमें आज के पर्यावरण संकट से जुड़े तमाम सवालों के जवाब निहित हैं।

यहां पर हर ऊंचाई के वृक्ष उगाए जा रहे हैं। जिन्हें सीधे धूप की जरूरत होती है, वे भी हैं, इनकी छाया में पनप रहे छायादार पेड़ भी। और जमीं की गोद में या जमीं के अंदर पनपने वाले पौधे भी इस वन में शुमार हैं। इनमें 25 प्रकार की सदाबहार झाड़ियां व पेड़, 25 प्रकार की जड़ी-बूटियां व अन्य कैश क्रोप्स हैं। मिश्रित वन के इस प्रयोग ने जंगल में ऐसा वायुमंडल तैयार कर रखा है कि यहां 4500 फीट की ऊंचाई पर 7000 से 9000 फीट व इससे भी अधिक ऊंचाई वाले उच्च हिमालयन पौधे बखूबी पनप रहे हैं। बांज, काफल, देवदार से लेकर रिंगाल व रखाल (टेक्सस बटाटा) के पौधों को यहां विकसित होते देखा जा सकता है।

यहां ऐसी तमाम तरह की पौध व जड़ी-बूटियां उगाई जा रही हैं, जो आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। छोटी इलायची, बड़ी इलाचयी, चाय पत्ती, तेज पत्र जैसे उपयोगी मसाले व उत्पाद यहां बड़े वृक्षों की छाया तले पनप रहे हैं। जमीं पर हल्दी, अदरक जैसी नकदी फसलें क्विंटलों की तादाद में तैयार हो रही हैं, जो विशुद्ध रूप में ऑर्गेनिक होने की वजह से मार्केट में खासा दाम रखती हैं।

वन में स्टोन व वुड टेक्नोलॉजी के माध्यम से हवा में टंगे पत्थरों एवं बांस के पोले डंडों में मिट्टी व काई जमाकर तथा इन पर फर्न व ऑर्किड जैसे पौधों को हवा में उगाकर माइक्रो-क्लाइमेट तैयार किया जा रहा है। इनसे जो नमी व ठंडक पैदा होती है, इसे हवा के झौंके पूरे वायुमंडल में बिखेरते हैं। आश्चर्य नहीं कि मई-जून माह की यहां का हरा-भरा शांत एवं शीतल वातावरण प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है।

पशु-पक्षी इस वन के सूक्ष्म परिवेश की शांति व सकारात्मक ऊर्जा को अनुभव करते हैं और अपने रहने के लिए अनुकूल परिवेश पाते हैं। यहां डेढ़ सौ से अधिक पक्षियों का बसेरा है। फरवरी-मार्च माह में इनकी संख्या में विशेष इजाफा रहता है, जब दूरदराज से माइग्रेटरी पक्षी यहां आते हैं। जंगलीजी के पर्यावरण विज्ञान में स्नात्कोत्तर सुपुत्र देव राघवेंद्र इस दौरान पक्षी प्रेमियों के लिए वर्ड वाचिंग व फोटोग्राफी के सत्र भी चलाते हैं। यहां पधारे अनुभवीजनों का कहना है कि यहां के वन की नीरव शांति में स्वच्छंद भाव में विचरण कर रहे पक्षियों की मस्ती भरी चहचहाहट व कीट-पतंगों की झिंगुरी तान के बीच आंख बंद कर कुछ मिनटों का ध्यान किसी नाद योग से कम नहीं लगता।

जंगली जानवर भी यहां आते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से वन के चारों ओर कांटेदार झाड़ियों का बाड़ा लगाया गया है, जिसके कारण एक ओर वन्य जमीन का भू-अपरदन व स्खलन नहीं होता, साथ ही जंगली जानवरों से फसलों के अनावश्यक नुकसान से वचाव होता है। जंगलीजी का मानना है कि जितना अधिक हम वनों में फलदार वृक्ष लगाएंगे, उतने ही वन्यजीव वहां रहेंगे व मानवीय बस्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप की घटनाओं में कमी आएगी।

पहाड़ों में गर्मी के मौसम में आग की जो ज्वलंत समस्या हर वर्ष विकराल रूप ले रही है, इस त्रासदी का भी मिश्रित वन एक प्रभावी समाधान है। इसी मिश्रित वन के समानान्तर यहां सड़क के ऊपर वन विभाग का चीड़ का जंगल है, जो भू-अपरदन की समस्या से ग्रस्त है और गर्मी के मौसम में कब एक चिंगारी इस जंगल में दावानल का रूप ले ले, कुछ कह नहीं सकते। वहीं, सड़क के नीचे जंगलीजी का मिश्रित वन अपनी हरियाली व नमी के चलते ऐसी सम्भावनाओं से दूर है। जंगलीजी के अनुसार जब तक हमारी जैव-विविधता सुरक्षित व संरक्षित नहीं होगी, तब तक हिमालय और गंगा को बचाने की बातें दूर की कौड़ी बनी रहेंगी और जैव-विविधता का पुख्ता आधार मिश्रित वन ही हैं।

इस मिश्रित वन का एक महत्वपूर्ण वाइ-प्रोडक्ट है वन के बीच फूट रहा जल स्रोत्र, जिसका जल इतना स्वादिष्ट व शीतल है कि मिनरल वाटर इसके सामने फीका है। दशकों के पुरुषार्थ से पनपे इस जल स्रोत का जल अमृत-सा प्रतीत होता है। आज जब पहाड़ों में सूखते जलस्रोतों की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है, ऐसे में यह प्रयोग प्रत्यक्ष समाधान है, जिसका एक ही संदेश है उपयुक्त वृक्षों का अधिक से अधिक रोपण किया जाए। जल स्रोत व मिश्रित वन के रहते आज गांव की महिलाओं को पशुओं के लिए चारे व पानी के लिए दूरदराज के जंगलों में भटकना नहीं पड़ता।

1974
में जब बीएसएफ का एक जवान जगत सिंह चौधरी रुद्रप्रयाग स्थित कोटमल्ला गांव में अपने घर आया और गांव की महिला को घास व पानी के लिए जंगल में भटकते और पहाड़ से गिरकर चोटिल होते पाया तो युवा हृदय संवेदित व आंदोलित हो उठा था कि इस समस्या का कोई हल ढूंढ़ना है। यहीं से गांव की बंजर भूमि में पौधरोपण का क्रम शुरू होता है। 1980 में पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर जगत सिंह पूरी तरह से इस कार्य में जुट जाते हैं। शुरू में गांववासियों को जगत सिंह का यह जुनून पागलपन लगा, लेकिन दशकों के श्रम के बाद जब जंगल हरी घास व वृक्षों के साथ लहलहाने लगा तो गांववासियों की धारणा बदलने लगी। पहली बार 1993 में जब किसी पत्रकार की नजर जगत सिंह के जंगल पर पड़ती है तो यह प्रयोग अखबार की सुर्खी बनता है।

बंजर भूमि में पनपते हरे-भरे वन को देखकर गांववासियों को जंगली होने का महत्व समझ आया और जंगली नाम से इन्हें पुरस्कृत किया। आज जंगली उपनाम जगत सिंह चौधरी की पहचान हैै। पर्यावरण के क्षेत्र में अपने योगदान के चलते जंगलीजी आज उत्तराखण्ड के ग्रीन अम्बेसडर हैं, पर्यावरण से जुड़े तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं। पुरस्कार से प्राप्त राशि को जंगलीजी स्थानीय युवाओं को इसमें नियोजन करते हुए वन के विकास में लगा रहे हैं। उत्तराखण्ड सहित पड़ोसी पहाड़ी राज्यों व देश के विभिन्न क्षेत्रों में इनके प्रयोग को आजमाया जा रहा है। इनके पुत्र देव राघवेंद्र पिता के कार्य़ को वैज्ञानिक आधार पर आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।
इसी सप्ताह उत्तराखण्ड सरकार ने जंगलीजी को अपने वन विभाग का ब्रांड अम्बेसडर नियुक्त किया है, जिनके मार्गदर्शन में उत्तराखण्ड के हर जिले में मिश्रित वन का एक-एक मॉडल वन तैयार किया जाएगा।

पूछने पर कि ऐसे प्रयोग के लिए धन व साधन कैसे जुटते हैं, जंगलीजी का सरल-सा जवाब रहता हैप्रकृति से जुड़कर नि:स्वार्थ भाव से कार्य करो, बाकी प्रकृति पर छोड़ दो। नि:संदेह रूप में ऐसे संवेदनशील हृदयों से ही आज की पर्यावरणजनित समस्याओं के समाधान फूटने हैं, क्योंकि प्रकृति को अनुभव किए बिना पर्यावरण संरक्षण की बातें अधूरी रहेंगी। ऐसे में हम जड़ों का उपचार किए बिना महज पत्तियों व टहनियों को सींचने की कवायद कर रहे होंगे। (दैनिक ट्रिब्यून, चण्डीगढ़, 9 जूलाई,2018 को प्रकाशित)
 
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बुधवार, 20 जून 2018

यात्रा वृतांत – हरियाली माता के देश में, भाग-2



जंगलीजी का मिश्रित वन – एक अद्भुत प्रयोग, एक अनुकरणीय मिसाल

जगत सिंह जंगलीजी स्वयं स्वागत के लिए सड़क पर खड़े दिखे। उनकी व्यस्तता के बीच हमें उम्मीद नहीं थी कि आज मिल पाएंगे, लेकिन इन्हें प्रत्यक्ष देखकर व इनके आत्मीय स्पर्श को पाकर हम सब भावविभोर हुए। हाथ में देवदार व रिंगाल की ताजा हरि पत्तियों से इनका किया गया भावपूर्ण स्वागत ताउम्र याद रहेगा।
यहाँ सड़क के ऊपर और नीचे दो अलग-अलग संसार व विचार से अवगत हुए। सड़क के ऊपर था बन विभाग का चीड़ के वृक्षों से अटा जंगल और सड़क के नीचे था जंगली जी का लगभग 60 किस्मों के वृक्षों से जड़ा 4 हेक्टेयर में फैला मिश्रित बन। सड़क के ऊपर के जंगल गर्मी में किसी भी दिन एक चिंगारी दावानल का रुप लेकर पूरे जंगल, व वन्य जीवन को स्वाहा कर सकती थी, जबकि नीचे के हरे-भरे जंगल में ऐसी विभीषिका की संभावना न के बरावर थी।
सड़क से नीचे सीढ़ी दार ढलान से उतरते ही हम जंगलीजी के अद्भुत जंगल में प्रवेश कर चुके थे। जिसकी शीतल छाया, बह रही ठंड़ी हवा, रास्ते में स्वागत करते नन्हें से लेकर मध्यम व बड़े पेड़ और सबसे ऊपर बन प्रांतर की नीरव शांति – लग रहा था जैसे हम प्रकृति की गोद में किसी तीर्थ स्थल में आ गए हैं।
और इसमें अतिश्योक्ति भी कैसी, जिसमें एक व्यक्ति के चार दशकों से अधिक समय का तप लगा हो, उस जंगल का जर्रा-जर्रा प्रकृति प्रेम का एक संदेश देता प्रतीत हुआ। देखकर लग रहा था कि इंसान यदि ठान ले व प्रकृति के साथ जुड़कर निष्काम भाव से काम में जुट जाए तो कुछ भी असंभव नहीं। 
इस मिश्रित वन में जितनी तरह के प्रयोग चल रहे हैं, इसके जो  लाभ हैं, वे अद्भुत हैं, और यह प्रयोग एक अनुकरणीय मिसाल हैं, इसमें आज की पर्यावरण से जुड़ी तमाम समस्याओं के समाधान निहित हैं।
दुर्लभ पेड़ – लगभग 4500 फीट की ऊँचाई पर बसाए गए इस जंगल में ऐसा वायुमंडल तैयार किया गया है कि इसमें 7000 से लेकर 9000 फीट की ऊँचाई के पौधे व जड़ी-बूटियाँ भी बखूबी पनप रही हैं। देवदार, भोजपत्र, बाँज से लेकर थनूर या रखाल(टेक्सस बकाटा) के पौधे यहाँ बढ़े हो रहे हैं। पहाड़ी कुटीर उद्योग की रीढ़ रिंंगाल (जो प्रायः आठ हजार फीट की ऊँचाई का पौधा है) यहाँ बखूवी बढ़ रहे हैं। आकाश छूता चीन का वाँस का जंगल यहाँ अपनी अनुपम उपस्थिति के साथ यात्रियों कोकरता है। वाँस की पौधा अपने तमाम औषधीय एवं अन्य गुणों के साथ अपने लचीलेपन व मजबूती के विरल संगम के लिए जाना जाता है, जिनके इंसानी जीवन में महत्व को भलीभांति समझा जा सकता है।

कीमती जड़ी-बूटियाँ – जंगल की तली में जड़ी-बूटियों को उगाया गया है। ईलाइची, तेजपत्र से लेकर चाय पत्ति जैसी तमाम तरह की उपयोगी जड़ी-बूटियाँ व झाड़ियाँ यहाँ पनप रही हैं। अदरक, हल्दी तो यहाँ जमीं के नीचे क्विंटलों की तादाद में लगा रखी हैं, जो अगले दिनों अपने ऑर्गेनिक गुणों के कारण खासी आमदनी देने वाली हैं। कुल मिलाकर वन आर्थिक स्वाबलम्बन का स्रोत्र भी हो सकता है, यहाँ आकर बखूबी देखा व समझा जा सकता है।
तैयार हो रहा माइक्रो क्लाइमेट – इसके साथ स्टोन एवं वुड टेक्नोलॉजी के साथ झूलते पत्थरों व वाँस के डंड़ों में फर्न व आर्किड जैसे छोटे पौधे लगाए गए हैं, जो हवा के साथ नमीं को वायुमंडल में घोलते हैं। इससे जंगल के वायुमंडल में एक नमीं व ठंड़क बनी रहती है, जो बहती हवा के साथ जंगल व परिवेश में एक माइक्रो क्लाइमेट को तैयार करती है। ऊँचाई के पौधों का यहाँ पनप पाना ऐसे ही प्रयोगों के चलते संभव हो पा रहा है।

     आज जब हमारे शहर से लेकर कस्वे गर्मी से तप रहे हैं, दिल्ली जैसे शहर गैस चेंबर का भयावह रुप ले चुके हैं, ऐसे में मिश्रित वन का यह प्रयोग एक अनुकरणीय मिसाल है, जिसका अपने-अपने ढंग से हर स्तर पर प्रयोग किया जा सकता है। घरों की छत पर, आंगन में, बाल्कोनी में अपने मुहल्ले में, पार्क में हम छोटे से लेकर मध्यम पौंधों को लगाकर आवश्यक वायुमंडल निर्मित कर सकते हैं।
अमृत जल स्रोत – जंगली जी के प्रयोग का एक अद्भुत फल दिखा, वन के नीचे शुद्ध,  स्वादिष्ट व निर्मल जल का स्रोत, जो जंगल के बीचों बीच फूटा है। इसको पीकर लगा जैसे इस तीर्थ के अमृत प्रसाद का पान कर रहे हैं। इस शीतल जल के सामने मिनरल वाटर फीका है। सूखते जल स्रोतों के दौर में यह प्रयोग एक प्रेरक मिसाल है कि अधिक से अधिक संख्या में उपयुक्त पौधों व झाड़ियों का रोपण कर व मिश्रित वन को प्रश्रय देकर हम जल संकट की विभीषिका से लड़ सकते हैं।

जंगली जी के शब्दों में जितना हम मिश्रित वन लगाएंगे, उतनी ही हमारी जेैव-विविधता बचेगी व उतना ही हमारा प्रकृति-पर्यावरण संतुलन सधेगा। बिना इसके गंगा व हिमालय के संरक्षण की बातें बेमानी ही बनी रहेंगी।
इसके साथ यहां पिट्स टेक्नोलॉजी का प्रयोग दिखा, जिसके तहत बन के पत्तों व कचरे को गढ़ों में दबाकर आर्गेनिक खाद तैयार की जा रही है।
पशु-पक्षियों का आश्रय स्थल – वन में इतनी तरह के वृक्षों के साथ एक ऐसा वातावरण तैयार है, जहाँ पशु-पक्षी तक आश्रय पाने के लिए आतुर हैं। लगता है वो भी इसके सूक्ष्म वातावरण की शांति व सुकून को महसूस करना चाहते हैं। लगभग 150 से अधिक पक्षियों का यह जंगल बसेरा है, जिनमें कई माइग्रेटरी पक्षी भी हैं, जो एक खास सीजन में यहाँ आते हैं।
यहाँ वन की छाया में चाय-पकौड़ी के नाश्ते के साथ किया स्वागत हमें याद रहेगा। इसी बीच लम्बी पूँछ बाले पक्षी का विशेष ध्वनि के साथ आगमन एक अद्भुत दृश्य था। जो देव राघवेंद्रजी के अनुसार, दूसरे पक्षियों को निमंत्रण था कि यहाँ दावत चल रही है, आप भी आ जाइए।
पक्षियों की भाषा व व्यवहार पर भी यहाँ अनुसंधान चल रहा है। जंगली जी के सुयोग्य पुत्र देव राघवेंद्र स्वयं गढ़वाल विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान से स्नातकोत्तर हैं व वैज्ञानिक ढंग से पिता के भगीरथी प्रयास को आगे बढ़ा रहे हैं। देव के अनुसार फरवरी – मार्च के माह में इन पक्षियों का आगमन चरम पर रहता है। पक्षी प्रेमियों के लिए इस दौरान विशेष सत्र भी चलते हैं। स्वयं देव इनकी प्रकृति, स्वभाव व भाषा-व्यवहार पर अध्ययन कर रहे हैं व कैमरा लेकर घंटों इंतजार के साथ इनको शूट करते रहते हैं।

वृक्षारोपण – समूह की यात्रा की स्मृति के रुप में इस पावन वन में पइंया (पांजा) वृक्ष का रोपण किया गया। इसे कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। इसकी विशेषता है, जब सर्दी में सभी वृक्ष पतझड़ की मार झेल रहे होते हैं, उस समय यह खिलता है। और मधुमक्खियों से लेकर तितलियों व अन्य जीवों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है और परागण से लेकर शहद निर्माण में मदद करता है।

इसे यहाँ पावन पौधा माना जाता है व पूजा स्थलों में इसके पुष्पों का विशेष रुप में प्रयोग किया जाता है। इसके रोपण के साथ एक रीठा का पेड़ जंगलीजी की ओर से हमें उपहार स्वरुप मिला, जिसका रोपण देसंविवि, हरिद्वार के परिसर में हनुमान मंदिर के पास किया गया है। यह इस मुलाकात में लिए गए संकल्प की याद दिलाता रहेगा व प्रकृति-पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व को निभाने की प्रेरणा भी देता रहेगा।

ग्राम्य सहयोग – यह मिश्रित वन जंगलीजी के ऐक्ला संकल्प के साथ शुरु हुआ और आगे बढ़ा। 1974 में जब बीएसएक का जवान जगत सिंह चौधरी गाँव की एक महिला को चारा व पानी की तलाश में जंगल में भटकते व चोटिल होते देखता है तो उसके मन में प्रश्न उठा की हम देश की रक्षा के लिए इसलिए तैनात हैं कि घर में महिलाएं ईंधन व चारे के लिए जंगल में भटकती रहें। यहीं से समाधान की दिशा में बंजर भूमि में वन को खड़ा करने का प्रयोग शुरु होता है। 1980 में सेना से वोलंटीयर रिटार्यमेंट के बाद जगत सिंह पूरी तरह से इस प्रयोग में जुट जाते हैं। शुरु में गाँववासियों को फौजी जवान का यह जुनून पागलपन लगा, लेकिन जब दशकों के श्रम के बाद पेड़ बड़े होने लगे व हरियाली लहलहाने लगी तो उनकी सोच बदलने लगी। फिर 1993 में लगभग 20 वर्ष बाद किसी पत्रकार की नजर इस जंगल पर पड़ती है, तो यह प्रयोग अखबार की सुर्खी बनता है।
गाँववासियों को भी जंगली होने का महत्व समझा आता है औऱ गाँवसमिति ने जंगली उपाधि से इन्हें विभूषित किया। तब से जंगली उपनाम जगत सिंह चौधरी की पहचान बनती है, जिसपर उन्हें गर्व है। फिर कई स्तर पर पुरस्कारों का सिलसिला शुरु होता है, जो जारी है। आज जगत सिंह जंगली उत्तराखण्ड के ग्रीन एम्बेस्डर हैं औऱ तमाम पुरस्कार इनकी झोली में हैं। 

हाल ही में जगत सिंह जंगलीजी को उत्तराखण्ड प्रदेश के वन विभाग का ब्रांड अम्बेस्डर नियुक्त किया गया है। उनके मार्दगर्शन में प्रदेश के हर जिला में मिश्रित वन का एक-एक मॉडल वन तैयार किया जाना है, जो स्वयं में एक महत्वपूर्ण एवं अनुकरणीय पहल है। बिनम्र और प्रकृति से एकात्म जंगलीजी पुरस्कारों से मिली राशि को इसी जंगल के विकास में लगाते रहते हैं और स्थानीय युवाओं को इसमें रोजगार के साधन मुहैय्या करवाते हैं।

प्रकृति का उपहार – पूछने पर कि ऐसे प्रयोग के लिए इतना धन व साधन कैसे जुटते हैं। जंगलीजी बिनम्रतापूर्वक तमाम सहयोग के लिए आभार व कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि सारा खेल प्रकृति से जुड़कर अंतःप्रेरणा से काम करने का है। जरुरत प्रकृति को अनुभव कर निस्वार्थ भाव के साथ काम करने की है, बाकि प्रकृति खुद देख लेती है। इसमें प्रकृति पुत्र का मंत्रवत संदेश निहित है, जिसे लेकर हम जंगलीजी से भावभरी विदाई लेते हैं।

रास्ते में हरियाली माता – के सिद्ध पीठ के दर्शन करते हैं। सड़क से महज कुछ मीटर की दूरी पर यह भव्य मंदिर स्थित है। क्षेत्र में हरियाली देवी की विशेष मान्यता है। हरियाली माता के मंदिर में प्रवेश से लेकर इनके कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए सात्विक भाव व दिनचर्या पर विशेष बल दिया जाता है, जिसके अंतर्गत प्याज-लहसून व माँस-मदिरा जैसे तामसिक भोजन का त्याग करना पड़ता है।
ज्ञात हो की हरियाली माता वन क्षेत्र विश्व के शीर्ष वन क्षेत्रों में शुमार है। हरियाली माता का मूल स्थल पर्वत के शिखर पर है, जहाँ साल में विशिष्ट अवसरों पर विशेष पूजन किया जाता है। प्रकृति-पर्यावरण के तमाम नियम इस दौरान लागू होते हैं। नंगे पाँव चलने से लेकर किसी प्रकार के वृक्ष, वनस्पति व वन्य जीव को किसी तरह की क्षति न पहुँचाना, यह सब विशेष ध्यान रखा जाता है।
हरियाली माता के परिसर में सामने हिमाच्छादित पर्वतश्रृंखलाएं एक मनोरम दृश्य पेश करती हैं। और चारों ओर हरा-भरा वनक्षेेत्र व परिवेश हरियाला माता के प्रत्यक्ष प्रताप की झलक दिखाता है।
हरियाली माता के चरणों में अपना भाव निवेदन के साथ हम बापसी की यात्रा में अपने गन्तव्य स्थल की ओर कूच करते हैं।  
हिमालय की वादियों में व प्रकृति की गोद में यात्रा के दौरान भाव बनता रहा कि प्रकृति के माध्यम से परमेश्वर स्वयं झर रहे हैं। प्रकृति की आराधना स्वयं परमेश्वर की आराधना है और प्रकृति के विभिन्न घटकों के प्रति आत्मीयता पूर्ण भाव परमात्मा की प्रत्यक्ष सेवा एवं सान्निध्य जैसा पावन कार्य है।
 
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