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सवाल आस्था के

तीर्थ स्थलों पर सडाँध मारती गंदगी कब तक होगी बर्दाश्त  तीर्थ हमारी आस्था के केंद्र पावन स्थल हैं। जीवन से थके-हारे , संतप्त , बिक्षुब्ध जीवन के लिए शांति , सुकून , सुरक्षा , सद्गति के आश्रय स्थल। जहाँ हम माथा टेककर , अपना भाव निवेदन कर , चित्त का भार हल्का करते हैं , कुछ शांति-सुकून के पल बिताते हैं और समाधान की आशा के साथ घर बापिस लौटते हैं। लेकिन जब इन तीर्थ स्थलों पर गंदगी का अम्बार दिखता है , इसके जल स्रोतों में कूड़ा-कचरा , प्लास्टिक व सबसे ऊपर सड़ांध मारती बदबू पाते हैं तो सर चकरा जाता है कि हम यह कहाँ पहुँच गए। सारी आस्था छूमंतर हो जाती है। जिस स्वच्छता को परमात्मा तक पहुँचने की पहली सीढ़ी कही गई है उसी का क्रियाकर्म होते देख आस्थावानों की समझदारी पर प्रश्न चिन्ह खड़े होते हैं। लगता है हम किसी तरह इस सड़ांध से बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेने के लिए निकल आएं। अगर हमारे तीर्थ स्थल ऐसी दमघोंटूं सड़ाँध मारती बदबू से ग्रसित हैं तो कहीं न कहीं मानना पड़ेगा कि हमारा समूह मन गहराई में विषाक्त है। क्योंकि जो बाहर प्रकट होता है कहीं न कहीं वह हमारे अंतर्मन का ह