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शनिवार, 31 मार्च 2018

देहरादून –शैक्षणिक यात्रा, भाग-2


ऑर्गेनिक फार्मिंग, जैव विविधता संरक्षण की प्रयोगशाला - नवधान्या विद्यापीठ

हेस्को के बाद डेवकॉम के शैक्षणिक भ्रमण का अगला पड़ाव था प्रख्यात पर्यावरणविद, विदुषी एवं जैविक कृषि एक्टिविस्ट डॉ. वंदना शिवा की प्रयोगशाला – नवधान्या बीजपीठ, जो शिमला वाईपास के अंतिम छोर पर वायीं ओर स्थित है। प्रेमनगर से आगे मुख्यमार्ग से 4-5 किमी बढ़ने के बाद वांय मुड़ते हुए हिमगिरि जी यूनिवर्सिटी आती है, इसके आगे पुल पारकर आईएसबीटी की ओर लगभग 1 किमी दूरी परनवधान्या वीज विद्यापीठ का पट लगा है, जहाँ से अंदर मुड़ने पर थोड़ी देर बाद आम्रकुंज में प्रवेश होता है।
आम के बौर से लदे वृहद पेड़ जैसे हमारा स्वागत कर रहे थे। वाहन एक किनारे पर खड़ा कर हम पैदल ही बगीचे से होकर प्रवेश करते हैं। यहाँ का प्राकृतिक परिवेश, इसकी नीरव शांति, पक्षियों की चहचाहट यहाँ चल रहे प्रयोग की जीवंत प्रस्तुति दे रहे थे।विकाससंचार विशेषज्ञ श्री दिनेश सेमवाल अपनी चिरपरिचित मुस्कान व शालीनता के साथ ग्रुप का स्वागत करते हैं व विस्तार से नवधान्या में चल रहे प्रयोगों पर प्रकाश डालते हैं।

किन्हीं मीटिंग में व्यस्त होने के कारण संस्थान की संस्थापिका एवं मार्गदर्शक डॉ. वंदना शिवा से मुलाकात नहीं हो पायी। गेट के अंदर कुछ विदेशी प्रशिक्षु आंगन में फर्श पर बैठे फसल सुखा रहे थे, श्रमदान कर रहे थे। सेमवालजी से संस्था की पृष्ठभूमि को जानने के बाद छात्रों के दल के साथ यहाँ के ऑर्गेनिक फार्म में प्रवेश करते हैं, जिसमें गैंहूं, जौ, सरसों, राई व दूसरे तमाम अन्न व सब्जियों की किस्मों कोप्राकृतिक तरीकों से यहाँ विकसित होते देखा जा सकता है। इनमें किसी तरह के रसायन व कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता।यहाँ मिश्रित खेती पर बल दिया जाता है, जिसके कारण जमीं की उर्बरता बनी रहती है।
सेमवालजी के अनुसार मिश्रित खेती हमारी पारम्परिक खेती का तरीका रहा है, जो हमारे पूर्वजों द्वारासदियों से आजमाए गए पारम्परिक ज्ञान पर आधारित था। लेकिन आज हम जल्द से जल्द अधिक उत्पादन की दौड़ में एकल कृषि पर केंद्रित हो चले हैं। जीन संबर्धित बीजों का प्रयोग कर रहे हैं। परिणाम यह होता है की कुछ समय बाद मिट्टी की ऊर्बरता कुंद पड़ने लगती है। तमाम तरह के हानिकारक कीट-पतंगों का असर बढ़ने लगता है। लगातार रसायन व कीटनाशकों के प्रयोग से हानिकारक कीटों के साथ लाभदायक कीटों का भी सफाया हो जाता है। साथ ही हानिकारक कीटों की प्रतिरोध क्षमता बढ़ती जाती है और फसलों पर और जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ता है, जिसकी परिणति अंततः जमीं, फसल के साथ उपभोक्ता व किसान सभी पर घातक साबित होती है। किसानों द्वारा आत्महत्या को खेती के इस नकारात्मक एवं अप्राकृतिक तौर-तरीकों से जोड़कर देखा जा सकता है। शोध के आधार पर भी यह सत्य प्रामाणिकत हो चुका है। पंजाब में हरित क्राँति के बाद किसानों की दुर्दशा इसकी कथा व्यां करती है। कैंसर ट्रेन के रुप में यहाँ की कुख्यात रेल ऐसे ही रसायनिक खेती के घातक दुष्परिणामों को दर्शाती है। इसका समाधान यहाँ चल रहे ऑर्गेनिक खेती के प्रयोगों के आधार पर समझा जा सकता है। इस परिसर के प्राकृतिक परिवेश में तमाम तरह के पक्षियों की चहचाहट यहाँ पनप रही समृद्ध जैव-विविधता का प्रत्यक्ष प्रमाण पेश करती है। एक शोध के अनुसार यहाँ के परिसर में 78 प्रकार के पक्षी मौजूद हैं।

रास्ते में शहतूत के पेड़ में पक रहे खटे-मीठे जंगली फलों का आनन्द लेते हुए, बाँश के झुरमुटों के साय में हम खेत के दूसरे छोर पर बीजबैंक तक पहुँचते हैं, जो नवधान्या पीठ की एक अनूठी पहल है, जहाँ अन्न, शाक-सब्जी व फल की 1500 से अधिक प्रजातियों को संरक्षित होते देखा जा सकता है। यहाँ गैंहूं की 222,चावल की 735प्रजातियाँ संरक्षित हैं। इसी तरहबाजरा, जंघोड़ा, कोदा, काउनी(फोक्सटेल मिल्लेट) जैसे उपेक्षित मोटे अन्न की पारम्परिक फसलों की दर्जनों किस्में संरक्षित हैं। इस समय नवधान्या के 22 राज्यों में 122 सामुदायिक बीज बैंक सक्रिय हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक समय की विकास यात्रा में संस्था ने देशभर में 5000 से अधिक फसलों को संरक्षित किया है। और अब तक लाखों किसान यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं।

संस्थान की शुरुआत 1987 में चिप्को आंदोलन से प्रेरित होकर हुई थी, जब बीज बचाने की मुहिम उत्तराखण्ड में चली थी। ज्ञातव्य हो कि डॉ. वंदना शिवा के जूझारु प्रयासों का ही फल था कि क्रमशः 1994 से 2004 तक नीम, बासमती और गैंहूं जैसी पारम्परिक फसलों के बीजों के पेटेंट पर भारतीयोंकोहक मिलता है, जिन पर विदेशी ठग अपने नाम का ठप्पा लगा रहे थे। 
यहाँ का बीज बैंक एक अद्भुत प्रयोग है, जिसे देखकर लगता है कि हमें पारम्परिक बीजों के संरक्षण की कितनी जरुरत है। धन्य हैं वो किसान जो तात्कालिक मुनाफे के शॉर्टकट में न पड़कर अपनी जमीं का कुछ अंश पारम्परिक बीजों के संरक्षण में लगाए हुए हैं और जैविक खेती की दूरदर्शिताभरी साहसिक पहल कर रहे हैं।


बापसी में यहाँ के अनुभवी विशेषज्ञ डॉ.किमोठी जी से मुलाकात होती है। इनके दशकों के अनुभव को सार रुप में ग्रहण करते हैं। किस तरह से ऑर्गेनिक खेती के प्रयोग देश भर में सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। किस तरह से आर्गेनिक कीटनाशक तैयार किए जाते हैं, जमीं को ऊर्बर करने व बीजों के संरक्षण के देशी तौर-तरीकों पर चर्चा हुई। पता चला कि देश ही नहीं बल्कि विदेशों में कितनें केंद्रों में ऐसे प्रयोग चल रहे हैं।
मालूम हो कि संस्थान की संस्थापिका डॉ. वंदना शिवा अपनी बेस्टसेलर पुस्तकों के साथ यह ज्ञान साझा कर रही हैं। इसके साथ उनकी प्रेरक टेड़ टॉक के साथ तमाम विडियोज यू-ट्यूब पर अपलोड़ हैं, जिनसे जिज्ञासु लाभान्वित हो सकते हैं। 
प्रकृति की गोद में ऑर्गेनिक खेती के साथ जैव विविधता के संरक्षण के प्रयोग को देखकर लगा कि कितना कुछ किया जाना शेष है। कम से कम अपने क्षेत्रों, गांव-कस्वों व आंगन-गलियारों में ऐसे प्रयोग की पहल तो कर ही सकते है। पाठ्यक्रम में ऐसी पढ़ाई का भी समावेश कितना जरुरी हो गया है। विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट्स से लेकर शोधकार्यों में ऐसे शोध-अध्ययनों को प्रोत्साहित करने की जरुरत है। विनाश की ओर जा रही मानवता को सृजन की ओर मोड़ने के लिए हर स्तर पर भगीरथी प्रयास की जरुरत है। हर संवेदनशील इंसान अपने भाव भरे अकिंचन से प्रयास के कुछ ठोस पहल तो कर ही सकता है।
इन्हीं भावों के साथ हम बापिस अपनी अंजिल की ओर कूच करते हैं। शाम हो रही थी। लेकिन नींद के झौंके में पता ही नहीं चला कि कब आईएसबीटी के आगेफ्लाईओवर पर गाड़ी आगे बढ़ चुकी है। लगा यही ईश्वर की इच्छा है, सो सीधे गाड़ी को फ्लाईऑवर पार कर वायीं ओर मोड़ते हुए कुछ ही मिनटों की भटकन के बाद हम बुद्धाटेम्पल पहुंच जाते हैं। आज हम शायद तीसरी-चौथी बार आ रहे थे। मंदिर के क्पाट आज तक हमेशा बंद ही मिले। आज पहली बार कपाट खुले मिले।लगा जैसे आज पहली बार बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं। 
ऊपर की मंजिल में भगावन बुद्ध के अवलोकितेश्वर स्वरुप का दर्शनकर फिर नीचले तल परसामूहिक रुप में मंत्र जाप कर रहे लामाओं के कक्ष में प्रवेश किए। सैंकड़ों लामाओं के सस्वर मंत्र उच्चारण एवं पाठ का दृश्य एक अद्भुत अनुभव रहा।श्रद्धालु चारों ओर घेरा बनाकर इसमें भागीदरी कर रहे थे। बाहर मार्केट में आकर जड़ी-बूटी से बनी अग्रबती खरीदे, जो पता चला भूटान प्रदेश की दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बनी थी। घर-परिवार के लिए कुछ तिब्बती उत्पाद भी खरीदते हैं, जो प्रायः उच्च गुणवत्ता के व बेहतरीन रहते हैं।मैदान में विश ड्रम को रोल कर अपना भाव निवेदन किया। बाहर बैंच पर बैठे नन्हें-नन्हें लामाओं से लेकर किशोर एवं युवा लामाओं से संवाद की कोशिश की लेकिन समयाभाव के कारण कुछ अधिक बात नहीं हो पायी।

यात्रा की सुखद स्मृतियों के साथ काफिला देहरादून शहर को पार करते हुए देसंविवि की ओर चल पड़ता है। सार रुप में शैक्षणिक भ्रमण प्रकृति-पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, ऑर्गेनिक कृषि व समावेशी विकास को लेकर एक नई समझ दे गया। विश्वास है कि ऊर्वर अंतःकरणों में किन्हीं बीजों का रोपण इस शैक्षणिक भ्रमण के माध्यम से हुआ, जो भविष्य में समय आने पर अपने ढंग से अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित होकर अपने सत्परिणामों से समाज, देश व विश्व-वसुधा को कृतार्थ करेगा।
 
शैक्षणिक यात्रा के पहले भाग को आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं - पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण विकास की प्रयोगशाला, हैस्को
 

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