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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

लेखन कला, युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्यजी के संग

 लेखन प्रारम्भ करने से पूर्व मनन करने योग्य कुछ सुत्र

1 उत्कट आकांक्षा

महान लेखक बनने की उत्कट अभिलाषा लेखक की प्रमुख विशेषता होनी चाहिए। वह आकांक्षा नाम और यश की कामना से अभिप्रेरित न हो। वह तो साधना के परिपक्व होने पर अपने आप मिलती है, पर साहित्य के आराधक को इनके पीछे कभी नहीं दौड़ना चाहिए। आकांक्षा दृढ़ निश्चय से अभिप्रेरित हो। मुझे हर तरह की कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने ध्येय की ओर बढ़ना है, ऐसा दृढ़ निश्चय जो कर चुका है, वह इस दिशा में कदम उठाए। उत्कृष्ट लेखन वस्तुतः योगी मनोभूमि से युक्त व्यक्तियों का कार्य है। ऐसी मनोभूमी होती नहीं, बनानी पड़ती है। ध्येनिष्ठ साधक ही सफल रचनाकार बन सकते हैं।

 

2       एकाग्रता का अभ्यास

लेखन में साधक को विचारों की एकाग्रता का अभ्यास करना पड़ता है। एक निश्चित विषय के इर्द-गिर्द सोचना और लिखना पड़ता है। यह अभ्यास नियमित होना आवश्यक है। मन की चंचलता, एकाग्रता में सर्वाधिक बाधक बनती है। नियमित अभ्यास इस अवरोध को दूर करने का एकमात्र साधन है। व्यायाम की अनियमितता के बिना कोई पहलवान नहीं बन सकता। रियाज किए बिना कोई संगीतज्ञ कैसे बन सकता है? शिल्पकार प्रवीणता एक निष्ठ अभ्यास द्वारा ही प्राप्त करता है। लेखन कला के साथ भी यही नियम लागू होता है। न्यूनतम 5 अथवा 10 पन्ने बिना एक दिन भी नागा किए हर साहित्य साधक को लिखने का अभ्यास करना चाहिए। (यदि कोई नया लेखक है, तो शुभारम्भ एक पैरा या एक पन्ने से भी की जा सकती है।)

संभव है कि आरंभ में सफलता न मिले। विचार विश्रृंखलित हों, अस्त-व्यस्त अथवा हल्के स्तर के हों, पर इससे साधक को कभी निराश नहीं होना चाहिए। संसार में किसी को भी आरंभ में सफलता कहां मिली है? एक निश्चित समय के अभ्यास के उपरांत ही वे सफल हो सके। अपना नाम छपाने अथवा पैसा कमाने की ललक जिसे आरंभ से ही सवार हो गई, वह कभी भी महान लेखक नहीं बन सकता। भौतिक लालसाओं की पूर्ति की ओर ही उसका ध्यान केंद्रित रहता है। फलस्वरूप ऐसे मनोवृति के छात्र अभीष्ट स्तर का अध्यवसाय नहीं कर पाते। परिश्रम एवं अभ्यास के अभाव में लेखन के लिए आवश्यक एकाग्रता का संपादन नहीं हो पाता। ऐसे लेखक कोई हल्की-फुल्की चीजें भले ही लिख लें, विचारोत्तेजक रचनाएं करने में सर्वथा असमर्थ ही रहते हैं।

 

3       अध्ययनशीलता

अध्ययन के बिना लेखन कभी संभव नहीं है। जिसकी अभिरुचि प्रबल अध्ययन में नहीं है, उसे लेखन में कभी प्रवृत नहीं होना चाहिए। किसी विषय की गंभीरता में प्रवेश कर सकना बिना गहन स्वाध्याय के संभव नहीं। लेखक की रुचि पढ़ने के प्रति उस व्यसनी की तरह होना चाहिए जिसे बिना व्यसन के चैन नहीं पड़ता। प्रतिपाद्य विचारों के समर्थन के लिए अनेकों प्रकार के तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों का सहारा लेना पड़ता है। मात्र मौलिक सूझबूझ से इन आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकना किसी भी आरंभिक लेखक के लिए संभव नहीं। ऐसे विरले होते हैं जिनके विचार इतने सशक्त और पैने होते हैं कि उन्हें किसी अन्य प्रकार के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ती। यह स्थिति भी विशेष अध्ययन के उपरांत आती है। आरंभ में किसी भी लेखक को ऐसी मौलिकता के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए

इस संदर्भ में एक विचारक का कथन शत प्रतिशत सही है कि जितना लिखा जाए उससे 4 गुना पढ़ा जाए। पढ़ने से विचारों को दिशा मिलती और विषयों से संबंध उपयोगी तथ्य और प्रमाण मिलते रहते हैं। विचारों को पुष्ट करने, प्राणवान बनाने में इन तथ्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हिंदी रचनाओं में आजकल तथ्यों की कमी देखी जा सकती है। प्रायः अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में मौलिकता के नाम पर विचारों की पुनरावृति ही होती रहती है। तर्क, तथ्य और प्रमाण के बिना ऐसी रचनाएं नीरस और उबाऊ लगती है। विचारों में नवीनता एवं प्रखरता न रहने से कोई दिशा नहीं दे पाती, न ही वह प्रभाव दिखा पाती जो एक उत्कृष्ट रचना द्वारा दिखाई पड़ना चाहिए।

यह वस्तुतः अध्ययन की उपेक्षा का परिणाम है। मानसिक प्रमाद के कारण अधिकांश लेखक परिश्रम से कतराते रहते हैं। अभीष्ट स्तर का संकलन ना होने से एक ही विचारधारा को शब्दावली में बदल कर दोहराते रहते हैं। पश्चिमी जगत के लेखकों की इस संदर्भ में प्रशंसा करनी होगी। संकलन करने, तथ्य और प्रमाण जुटाने के लिए वे भरपूर मेहनत करते हैं। जितना लिखते हैं उसका कई गुना अधिक पढ़ते हैं। तथ्यों, तर्कों एवं साक्ष्यों की भरमार देखनी हो तो उनके लेखों में देखी जा सकती है। यह अनुकरण हिंदी भाषी लेखकों को भी करना चाहिए। जो लेखन की दिशा में प्रवृत्त हो रहे हैं उन्हें स्वाध्याय के प्रति बरती गई उपेक्षा के प्रति सावधान रहना चाहिए।

यह भी बात ध्यान रखने योग्य है कि विचारों का गांभीर्य विशद अध्ययन के उपरांत ही आता है। विचार भी विचारों को पढ़कर चलते तथा प्रखर बनते हैं। उन्हें नवीनता अध्ययन से पैदा होती है। अतएव अध्ययनशीलता लेखन की प्रमुख शर्त है।

एक सूत्र में कहा जाए तो इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है, लेखन बाद में, पहले अपने विषय का ज्ञान अर्जित करना। सबसे पहले लिखने की जिनमें सनक सवार होती है वह कलम घिसना भले ही सीख लें, विषय में गहरे प्रवेश कर प्रतिपादन करने की विधा में कभी निष्णात नहीं हो पाते। लिखना उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना कि तथ्यों का संकलन। विषय के कई पक्षों-विपक्षों की जानकारी लिए बिना सामग्री संकलन संभव नहीं। बिना सामग्री के जो भी लिखेगा आधा-अधूरा, नीरस ही होगा।

 

4       जागरूकता

हर नवीन रचना में त्रुटियों एवं भटकाव की गुंजाइश रहती है। त्रुटियाँ अनेकों प्रकार की हो सकती हैं। भाषा संबंधी और वाक्य विन्यास संबंधी भी। व्याकरण की गलतियां भी देखी जाती हैं। प्रतिपादन में कभी-कभी भटकाव भी हो सकता है। इन सबके पति लेखक-साधक को पूर्णरूपेण जागरूक होना चाहिए। हर त्रुटि में सुधार के लिए बिना किसी आग्रह के तैयार रहना चाहिए। इस क्षेत्र में जो विशेषज्ञ हैं, उनसे समय-समय पर अपनी रचनाओं को दिखाते रहने से अपनी भूल मालूम पड़ती है। विषयांतर हो जाने से भी लेखक अपने लक्ष्य से भटक जाता है। फलस्वरुप रचना में सहज प्रवाह नहीं आ पाता। इस खतरे से बचने का सर्वोत्तम तरीका यह है कि किसी समीक्षक की निकटता न प्राप्त हो तो स्वयं को आलोचक नियुक्त करें, जो लेखे लिखे जाएं, उन्हें कुछ दिनों के लिए अलग अलमारी अथवा फाइल में रख देना चाहिए तथा दो-तीन दिनों बाद पुनः अवलोकन करना चाहिए। ऐसा इसलिए करना उचित है कि तुरंत के लिखे लेखों में मस्तिष्क एक विशिष्ट ढर्रे में घूमता रहता है। इस चक्र से बाहर चिंतन नहीं निकलने पाता। फलस्वरुप स्वयं की गलतियां पकड़ में नहीं आती। समय बीतते ही चिंतन का यह ढर्रा टूट जाता है। फलतः बाद में पुनरावलोकन करने पर भूल-त्रुटियों का ज्ञान होता है, जिन्हें सुगमतापूर्वक ठीक किया जा सकता है।

जागरूकता का यह तो निषेधात्मक पक्ष हुआ। विधेयात्मक पक्ष में लेखक को लेखनी से संबद्ध हर विशेषताओं को धारण करने के लिए तत्पर रहना पड़ता है। शैली लेखन कला की प्राण है। वह जितनी अधिक जीवंत-माधुर्यपूर्ण होगी, उतना ही लेख प्रभावोत्त्पादक होगा। इस क्षमता के विकास के लिए लेखक को उन तत्वों को धारण करना पड़ता है जो किसी भी लेख को ओजपूर्ण बनाते हैं। शब्दों का उपयुक्त चयन भी इसी के अंतर्गत आता है। प्रभावोत्पादक शब्दों का चयन तथा वाक्यों में उचित स्थानों पर उनका गुंथन लेखन की एक विशिष्ट कला है जो हर लेखक की अपनी मौलिक हुआ करती है। इसके विकास के लिए प्रयत्नशील रहना सबका कर्तव्य है।

 

5       ज्ञान को पचाने की सामर्थ्य का होना

जो भी कार्य हाथ में लिया जाए उसके सीमाबंधन को भी जानना चाहिए। असीम विस्तार वाला विषय हाथ में लेकर कोई भी व्यक्ति अपने प्रतिपाद्य शोध कार्य से न्याय नहीं कर सकता। अपनी सामर्थ्य कितनी है तथा किस प्रकार सिनॉप्सिस बनाकर आगे बढ़ना है, इसका पूर्वानुमान लगा लेना सफलता का मूलभूत आधार है। यह ठीक उसी प्रकार हुआ जैसे रोगी को व्याधि एवं शरीर के भार नाप-तोल आदि के बाद उसकी औषधि का निर्धारण किया जाए। यदि प्रारंभिक निर्धारण न करके अपनी हवाई उड़ान आरंभ कर दी तो फिर शोधकार्य कभी पूरा नहीं हो सकता। अपनी विषयवस्तु के बारे में लेखक को बड़ा स्पष्ट एवं टू द प्वाइंट होना चाहिए। इसी से भटकाव से बचना संभव हो पाता है। सफल शोधार्थी व लेखक पहले अपनी सीमा-क्षमता देखते हैं, तदुपरांत कुछ करने का संकल्प लेते हैं। अधूरे शोधकार्यों की भरमार इस दिशा में एक अच्छा खासा शिक्षण है।

 

6       संवेदनशीलता

कल्पना की नींव पर ही लेख का महल तैयार होता है, किसी विद्वान का यह कथन अक्षरशः सत्य है। कविता जैसी रचनाओं में तो एक मात्र कल्पना शक्ति का ही सहारा लेना पड़ता है। भाव-संवेदनाओं का शब्दों के साथ नृत्य, कविता की प्रमुख विशेषता होती है। लेखों में भी विचारों के साथ भाव-संवेदनाओं का गुंथन रचना में प्राण डाल देता है। लेखन में दीर्घकालीन अभ्यास के बाद यह कला विकसित होती है। एक मनीषी का मत सारगर्भित जान पड़ता है कि जिसका हृदय अधिक संवेदनशील और विराट है उसमें उतनी ही सशक्त सृजनात्मक कल्पनाएं-प्रेरणाएं उद्भूत होती हैं। हृदयस्पर्शी मार्मिक संरचनाएं भाव संपन्न ह्दयों से ही उद्भूत होती हैं। ऐसी रचनाओं में रचनाकार के व्यक्तित्व की अमिट छाप प्रायः झलकती है। जो दूसरों की पीड़ा, वेदना को अनुभव करता है वह अपनी रचना में संवेदना को अधिक कुशलता से उभार सकने में सक्षम हो सकता है। वेदना-विहीन हृदय में वह संवेदन नहीं उभर सकता, जो रचना में प्रकट होकर दूसरों के अंतःकरणों को आंदोलित-तरंगित कर सके।

(साभार – श्रीराम शर्मा आचार्य, युगसृजन के संदर्भ में प्रगतिशील लेखन कला, पृ.64-69)

 

 

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युगऋषि पं. श्रीरामशर्मा आचार्य

युग के विश्वामित्र, जिसने दिया 21वीं सदी उज्जवल भविष्य का नारा
20 सितम्बर, 1911 को आंवलखेड़ा, आगरा में जन्में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भारतीय आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परम्परा के एक ऐसे प्रकाश स्तम्भ एवं दिव्य विभूति हैं, जिनका जीवन, दर्शन एवं कर्तृत्व समाज-राष्ट्र ही नहीं पूरी विश्व-मानवता के लिए वरदान से कम नहीं है। 80 वर्षों के जीवन काल में आचार्यश्री 800 वर्षों का काम कर गए, जिनका मूल्याँकन अभी पूरी तरह से नहीं हो पाया है।
पेश है विहंगावलोकन करते कुछ बिंदु जिनके प्रकाश में आचार्यजी के जीवन व कर्तृत्व की एक झलक पायी जा सकती है -
  •  आदर्श शिष्य, गुरु की आज्ञा के अनुसार, जीवन के हर क्रियाक्लाप का निर्धारण। गायत्री महापुरश्चरण से लेकर हिमालय यात्रा, गृहस्थ जीवन, साहित्य सृजन व वृहद संगठन युग निर्माण आंदोलन, अखिल विश्व गायत्री परिवार का निर्माण।
  •  नैष्ठिक साधक, तप के प्रतिमान, 15 वर्ष की आयु में गुरु के आदेश पर 24 वर्ष तक24 लाख के गायत्री महापुरश्चरण की कठोर तप-साधना। मात्र जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह। जीवन पर्यन्त तप में लीन। विनोवाजी से तपोनिष्ठ नाम मिला।
  •  जूझारु स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पुरश्चरण अनुष्ठान के बीच भी तीन वर्ष स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी। श्रीराममत के रुप में क्राँतिकारी रचनाओं का सृजन व राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में एक जुझारु कार्यकर्ता के रुप में अभूतपूर्व जीवट का परिचय।
  • पत्रकारिता को दिया नया आयाम, सैनिक अखबार में पत्रकार की भूमिका में प्राथमिक प्रशिक्षण। बाद में अखण्ड ज्योति पत्रिका के रुप में आध्यात्मिक पत्रकारिता का शुभारम्भ, जो आज भी जनमानस को आलोकित कर रही है। इसके साथ महिला जागृति अभियान, प्रज्ञा पाक्षिक जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन।
  • गायत्री के सिद्ध साधक, 24 लाख के 24 महापुरुश्चरण के साथ गायत्री के सिद्ध साधक का प्रादुर्भाव। गायत्री साधना से जुड़ी फलश्रृतियों के जीवंत प्रतिमान।गायत्री महाविज्ञान जैसे विश्वकोषीय ग्रंथ की रचना,गायत्री परिवार की स्थापना। गायत्री जयंती के दिन ही महाप्रयाण (2जून, 1990)।
  • गृहस्थ में अध्यात्म, ऐसे विरल संत, जिन्होंने ने केवल एक सद्गृहस्थ के रुप में अध्यात्म को जीवन में धारण किया, लोगों को गृहस्थ तपोवन की राह दिखी और इस विषय पर तमाम साहित्य का सृजन किया। गृहस्थ आश्रम को इसकी सनातन गरिमा में प्रतिष्ठित करने का अभूतपूर्व योगदान।
  • सादा जीवन, उच्च विचार, की प्रतिमूर्ति रहे। सामान्य चप्पल पहनकर, खादी का कुर्ता, सामान्य भोजन, रिक्शा में बाजार की यात्रा, ट्रेन की सामान्य श्रेणी में सफर। न्यूनतम संसाधनों के साथ निर्वाह। सादा जीवन, उच्च विचार की जीवंत प्रतिमूर्ति।
  • ज्ञानपिपासु, लेखक, नियमित रुप से स्वाध्याय और लेखन का क्रम। आश्चर्य नहीं कि जीवन काल में 3200 के लगभग पुस्तकों का सृजन। जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिस पर न लिखा हो। समस्त साहित्य का निचोड़ अंतिम वर्षों में क्राँतिधर्मी साहित्य के रुप में।
  • वैज्ञानिक प्रयोगधर्मी, जीवन एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रुप में, निष्कर्ष आत्म कथा, मेरी वसीयत और विरासत में। नियमित अखण्ड ज्योति के पन्नों पर शेयर करते रहे। अध्यात्म के वैज्ञानिक पक्ष की शोध हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना।
  • प्रखर वक्ता, आज भी जिनके स्वर सुधि श्रोताओं को झकझोरते हैं, आत्म कल्याण के पथ पर अग्रसर करते करते हैं और जीवन निर्माण और लोक कल्याण के राजमार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • संगठनकर्ता, नित्य परिजनों से मिलन, श्रेष्ठ विचारों व क्रियाक्लापों को आगे बढ़ाने का मार्गदर्शन। करोड़ों लोगों का गायत्री परिवार खड़ा, जो देश भर के 4000 से अधिक शक्तिपीठों में व बाहर 80 देशों में फैला है। गायत्री-यज्ञ प्रचार के साथ सप्तक्राँति आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय।
  • समाज सुधाकर, परम्परा की तुलना में विवेक को महत्व देंगे, आचार्यश्री का प्रेरक वाक्य रहा। युगों से शापित-कीलित गायत्री साधना को सर्वसुलभ बनाया। स्त्रियों को वेदमंत्रों के उच्चारण व यज्ञ का अधिकार दिया। समाज में जड़ जमाए बैठी कुरीतियों पर प्रहार किया। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, धर्म आदि पर आधारित भेदभाद को तिरोहित किया।
  • समर्थ गुरु, वेदमूर्ति के रुप में ज्ञान के पर्याय, गायत्री के सिद्ध साधक के रुप में एक समर्थ गुरु की भूमिका में लाखों-करोड़ों लोगों को आध्यात्मिक पथ पर प्रेरित व अग्रसर किया। 1953 में गायत्री महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के साथ तपोभूमि मथुरा में गायत्री मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा व गुरु दीक्षा का क्रम शुरु।
  •  जीवंत आचार्य, लोगों को खाली प्रवचन व उपदेशों के माध्यम से शिक्षण नहीं दिया, बल्कि आचरण में उताकर, जीकर उदाहरण पेश किया। एक जीवंत आचार्य के रुप में जीवन को एक खुली किताब की भांति जीया। आत्मसुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा का मंत्र दिया।
  • करुणा से भरा प्रेमी ह्दय, जो भी उनसे मिला, उनका होकर रह गया। उनके एक आवाह्न पर परिजन सबकुछ छोड़कर इनकी वृहद योजना का हिस्सा बनते गए। आचार्यश्री का ह्दय प्यार व करुणा से इस कदर भरा रहा कि जिस सिरफिरे ने सांघातिक हमला किया, उसे भी बचने का अवसर दिया।
  • युग विचारक, दार्शनिक के रुप में, गायत्री व यज्ञ को क्रमशः सद्बुद्धि और सत्कर्म के रुप में स्थापित किया। व्यक्ति व समाज के उत्कर्ष के लिए क्रमशः वैज्ञानिक अध्यात्म व आध्यात्मिक समाजवाद का प्रतिपादन किया। व्यक्ति से परिवार-समाज  व युग निर्माण के सुत्र दिए। बौद्धिक, नैतिक व सामाजिक क्राँति का दर्शन दिया।
  • युगद्रष्टा, भविष्यद्रष्टा, 20वीं सदी के विषम पलों में जब मानवता निराशा से भरी थी, 21वीं सदी उज्जवल भविष्य का नारा दिया। और उसे कैसे चरितार्थ किया जाए, इसकी पूरी रुपरेखा शतसुत्रीय कार्यक्रम व युग निर्माण सत्संकल्प के रुप में प्रस्तुत की।
  • सच्चे संत, आचार्यश्री ने साधु वाला चोला नहीं पहना, एक सामान्य गृहस्थ की तरह रहे। लेकिन वे अपने गुण, कर्म और स्वभाव में सच्चे संत थे, जिनके जीवन के मूलमंत्र रहे – मातृवत् परदारेषु, परद्रवलोष्टवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु।
  • वैदिक ऋषि,सारे वैदिक ऋषि जैसे आचार्यश्री में एकाकार हो गए थे। तमाम ऋषि परम्पराओं की स्थापना व पुनर्जागरण किया और भारतीय संस्कृति को नयी संजीवनी दी। इसके विश्व संस्कृति स्वरुप से परिचित करवाया। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय उन्हीं के दिव्य स्वप्न का मूर्त रुप है।
  • युगऋषि की भूमिका में, वैदिक ऋषि की परम्परा में आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को सर्वसुलभ बनाया, वहीं इसके सामयिक संदर्भ में उपयोग की राह दिखायी, जो उन्हें युगऋषि की भूमिका में स्थापित करता है। उनका ऋषि चिंतन आज भी युग मनीषा को झकझोरता है, प्रेरित करता है।
  • हिमालय प्रेमी, हिमालय से विशेष लगाव था। तीन वार प्रत्यक्ष हिमालय यात्राएं की व एक वार सूक्ष्म शरीर से। जिनका दिग्दर्शन सुनसान के सहचर व आत्मकथा पुस्तक में बखूवी किया जा सकता है। शांतिकुंज में हिमालय मंदिर की स्थापना की।
  •  महायोगी की भूमिका में, युग के विश्वामित्र, आचार्यश्री ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न महायोगी थे। आत्म कल्याण के आगे वे लोक कल्याण, विश्व-कल्याण की भूमिका में सक्रिय थे। जो कार्य कभी विश्वामित्र ने किया था, कुछ बैसा ही कार्य आचार्य़श्री ने 1984-87 के दौरान सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से किया।
  • एक आम इंसान, इतना सबकुछ होते हुए भी आचार्य़श्री किसी तरह के अहंकार, दर्प व दंभ से मुक्त थे। कोई पहली नजर में उन्हें एक आम इंसान की तरह पाता। सिद्ध महायोगी व इतने बड़े संगठन के संचालक होने के वावजूद सरलता, त्याग, ईमानदारी व विनम्रता की प्रतिमूर्ति रहे।
  • युग व्यास, आर्षबांड्मय का पुनरुद्धार। चारों वेद, षटदर्शन, स्मृतियाँ, पुराण आदि सबका नए सिरे से भाष्य-प्रतिपादन। प्रज्ञापुराण का सृजन। युगानुरुप नए साहित्य का सृजन।अकेले व्यक्ति द्वारा किया यह भगीरथी प्रयास आचार्य़श्री को युग व्यास की भूमिका में प्रतिष्ठित करता है।
  •  अवतारी सत्ता, महाकाल के अग्रदूत 80 साल में आचार्य़श्री जैसे 800 साल का काम कर गए। यह सब साधारण नहीं अतिमानवीय कार्य रहा। जिस प्रज्ञावतार की चर्चा आचार्य़श्री करते रहे, वे स्वयं उस चेतना के संवाहक थे, मूर्त रुप थे। हालाँकि उनकी विनम्रता रही, जो उन्होंने कभी खुद को अवतारी सत्ता घोषित नहीं किया। महाकाल के अग्रदूत के रुप में वे ईश्वरीय योजना को मूर्त रुप देने में सक्रिय रहे।

बुधवार, 30 नवंबर 2016

सुनसान के सहचर



युगऋषि पं. श्रीरामशर्मा आचार्य की हिमालय यात्रा के प्रेरक प्रसंग
युग निर्माण आंदोलन के प्रवर्तक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य गायत्री के सिद्ध साधक के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार, लोकसेवी, संगठनकर्ता, दार्शनिक एवं भविष्यद्रष्टा ऋषि भी थे। गहन तप साधना, साहित्य सृजन हेतु वे चार वार हिमालय यात्रा पर गए। 1958 में सम्पन्न दूसरी हिमालय यात्रा का सुंदर एवं प्रेरक वर्णन सुनसान के सहचर पुस्तक के रुप में संकलित है, जिन्हें शुरुआत में 1961 के दौर की अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रकाशित किया गया था
पुस्तक की विशेषता यह है कि आचार्यश्री का यात्रा वृताँत प्रकृति चित्रण के साथ इसमें निहित आध्यात्मिक प्रेरणा, जीवन दर्शन से ओत प्रोत है। प्रकृति के हर घटक में, राह की हर चुनौती, ऩए दृश्य व घटना में एक उच्चतर जीवन दर्शन प्रस्फुटित होता है। पाठक सहज ही आचार्यश्री के साथ हिमालय क दुर्गम, मनोरम एवं दिव्य भूमि में पहुंच जाता है और इसके प्रेरणा प्रवाह को आत्म सात करते हुए, जीवन के प्रति एक न अंतर्दृष्टि को पा जाता है। 

आचार्यश्री के अनुसार, सामान्य सड़क पर जहाँ पथिक आपस में हंसते बात करते हुए चलते रहे थे, वहीं संकरी घाटी को पार करते हुए, सब चुप हो जाते, सारा ध्यान पगड़ंडी पर पढ़ रहे अगले कदम पर रहता। नीचे गर्जन तजर्न करती भगीरथी के ऊपर दिवार का सहारा लेकर सुरक्षित पार होना पड़ता और इस बीच मन केंद्रित रहता। इसी तरह जीवन के संकरे मार्ग में कितनी सावधानी की जरुरत है। धर्म की दीवार का सहार लिए चलना पड़ता है, अन्यथा थोड़ी सी भी लापरवाही कितनी घातक हो सकती है। कर्म की एक चूक, कुकर्मों की कितनश्रृंखला को जन्म दे सकती है औऱ अन्ततः नागपाश की तरह असावधान पथिक को जकड़ लेती है।
भैंरों घाटी की तंग घाटी में भगीरथी नदी का प्रचण्ड वेग, तीस फीट ऊँची जल राशि के रुप में प्रकट होता है। जबकि अन्यत्र कई दिशाओं में बिखरी नदी की धारा सामान्य शांत रहती। आचार्य़श्री के शब्दों में इसी प्रकार कई दिशाओं में बिखरा मन कोई विशिष्ट उपलब्धि नहीं हासिल कर पाता है, जबकि सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केंद्रित करने पर आश्चर्यजनक, उत्साहबर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य को अपने कार्यक्षेत्र को बहुत फैलाने, अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिए एक विशेष कार्यक्षेत्र चुन ले तो, कितना उत्साहबर्धक रहे।
राह में चीड़, देवदारु के गगनचुम्बी वृक्ष यही संदेश दे रहे थे कि यदि शक्ति को एक ही दिशा में लगाए रखें तो ऊँच उठना स्वाभाविक है। जबकि तेवार, दादरा, पिनखु जैसे वृक्षों की टेढ़ी मेढी, इधर-उधर फैलती शाखाएं चंचल चित, अस्थिर मन की याद दिला रही थी, जो अभीष्ट ऊँचाईयों तक नहीं बढ़ पात और बीच में ही उलझ कर रह जाते हैं।
आचार्यश्री के अनुसार, यूँ तो बादलों को रोज ही आसमाँ में देखते, लेकिन आज हिमालय के संग हम दस हजार फीट की ऊँचाईयों में विचरण कर रहे थे, लगा जैसे बादल हमारे चरणों को चूम रहे हैं। कर्तव्य कर्म का हिमालय भी इतना ही ऊँचा है। अगर हम उस पर चलें तो साधारण भूमिका में विचरण करने वाले शिश्नोदर परायण जीवन की अपेक्षा बैसे ही अधिक ऊँचे उठ सकते हैं, जैसे कि निरंतर चढ़ते चढ़ते दस हजार फुट ऊँचाई पर पहुँचे।

गोमुख में गगाजी की पतली स धार आगे हरिद्वार, कानपुर, बनारस में आकर कितना वृहद रुप ले लेती है। विचार आया कि, परमार्थ के उद्देश्य से जब गंगा की शीतल धार आगे बढ़ती है तो कितने ही नाले व छोटी जल धाराएं अपना अस्तित्व मिटाकर इसमें मिलकर आगे बढ़ती हैं। अपना अलग अस्तित्व कायम रखने की व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा, कीर्ति स्थापित करने की लालसा का दमन कर सकें तो कितना लोक उपयोगी हो।..गंगा और नदी-नालों के सम्मिश्रण के महान् परिणाम सर्वसाधारण के नेता और अनुयायियों की समझ में आ जाएं ,लोग सामूहिकता-सामाजिकता के महत्व को ह्दयंगम कर सकें  एक ऐसी ही पवित्र पापनाशिनि,लोकतारिणी संघशक्ति का प्रादुर्भाव हो सकता है, जैसा गंगा का हुआ


तपोवन में पहुँच कर भागीरथ शिखर, सूमेरु पर्वत से घिरे स्थान पर शिवलिंग पर्वत से दर्शन, भावना की आँखों से ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे भुजंगधारी शिव साक्षात खड़े हों। तपोवन के इसी क्षेत्र को हिमालय का ह्दय कहा जाता है, यहीँ वाईं ओर भगीरथ पर्वत है। कहते हैं कि यहीं पर बैठकर भगीरथ जी ने तप किया था, जिससे गंगावरतण सम्भव हुआ।...इस तपोवन को स्वर्ग कहा जाता है, उसमें पहुँचकर मैंने यही अनुभव किया, मानो सचमुच स्वर्ग में ही खड़ा हूँ।

वन के नीरव एकांत में, आचार्यश्री के लिए झींगुरों की वेसुरी ध्वनि भी प्रेरक बनती है। इकतारे पर जैसा बीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिलजुलकर कोई निर्वाण का पद गा रही हो, वैसे ही यह झींगुर निर्विघ्न होकर गा रहे थे, किसी को सुनाने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय ही उनका यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया’ ‘...मनुष्य के साथ रहने के सुख की अनूभूति से बढ़कर अन्य प्राणियों के साथ भी वैसी ही अनुभूति करने की प्रक्रिया सीख ली। अब इस निर्जन वन मे भी कही सूनापन दिखाई नहीं देता। इस सुनसान नें सभी सहचर प्रतीत हो रहे थे।

भोजपत्र के दुर्लभ वृक्षों एवं गंगनचुंबी देवदारु के बीच आचार्यश्री चारों ओर सहचर दिखाई देने लगे। विशाल वृक्ष पिता औऱ पितामह जैसे दीखने लगे। कषाय बल्कलधारी भोज पत्र के पेड़ ऐसे लगते थे, मानो गेरुआ कपड़ा पहने कोई तपस्वी महात्मा खड़े होकर तप कर रहे हों। देवदारु और चीड़ के लम्बे-लम्बे पेड़ प्रहरी की तरह सावधान खड़े थे। इस भावभूमि में हिमाच्छादित पर्वत शिखर आचार्यश्री को आत्मीय सहचर प्रतीत होते हैं। वयोवृद्ध राजपुरुषों और लोकनायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर ऐसे बैठे थे, मानो किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्तचित्त होकर संलग्न हों। जिधर भी दृष्टि उठती, उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था।


हिमालय का स्वर्णिम सूर्योदय आचार्यश्री को आत्मजागरण का दिव्यबोध दे जाता है। सुनहरी धूप ऊँचे शिखरों से उतरकर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी, मानो अविद्याग्रस्त ह्दय में प्रसंगवश स्वल्प स्थाई ज्ञान उदय हो गया। ऊँचे पहाड़ों की आड़ में सूरज इधर-उधर ही छिपा रहता है, केवल मध्याह्न को ही कुछ घण्टों के लिए उनके दर्शन होते हैं। उनकी किरणें सभी सिकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती है। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्मज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना औऱ त्रिष्णा की चोटियों के पीछे छिपा रहता है। पर जब कभी, जहाँ कहीं वह उदय होगा, उसकी सुनहरी रश्मियाँ एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देंगी।