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थक गए पथिक, माना पथ पत्थरीला

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                                 बढ़ता चल मंजिल की ओर...                                 थक गए पथिक माना राह कठिन पथ पत्थरीला पाँवों में पड़ गए छाले कोई बात नहीं पथिक यह तो कहानी हर ढगर की।।   वह राह ही क्या जिसमें न कोई खाई खंदक , न कोई मोड़ चढाई यात्रा का रोमाँच तो इन्हीं बीहड़ विकट व्यावानों में इन्हें यात्रा का हिस्सा मान , मंजिल की ओर बढ़ता चल।।  चलते चलते थक गए , कुछ टूट गए कोई बात नहीं पथिक थोड़ा विश्राम कर दम भर यह बाजिव चल जाएगा।। फिर दूने उत्साह के साथ बढ़ चल आगे अपने ध्येय , अपनी मंजिल की ओर बस दृष्टि लक्ष्य से औझल मत होने देना।।   लेकिन हार गए हिम्मत अगर पथिक कोशिश ही छोड़ दिए बीच राह में , और मुड़ चले पीछे तो फिर ये ठीक नहीं , मंजूर नहीं।।  ऐसे में पहचान खो बैठोगे अपनी छिन जाएंगे जीवन के , सुख चैन और आजादी इससे बड़ी फिर , जीवन की क्या बर्वादी।।  ऐसे में अंदर की चिंगारी का बुझ जाना अपनी नज़रों में गिर जाना इससे बड़ी क्या दुर्घटना , क्या गम जीवन का।। हिम्मत हार जाना  जीते जी मर जाना नहीं इससे बड़ी हार जीवन की ऐसी त्रास्दी , ऐसी हार से तो मर

प्रकृति के आंचल में, जीवन का शाश्वत विजयी गान

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एडवेंचर भरी मस्ती का एक जाम अँधकार रहा सघन घनेरा , दुःस्वप्न भरी रात बीत चली , आशा की भौर के संग , जीवन की नई सुबह आ चली , क्षितिज पर मंजिल की एक झलक क्या मिली , आ चला हाथ में जैसे , जीवन पहेली का एक छोर। अँधेरे के बीच गूँज उठी एक तान , गमों के बीच एक दैवी मुस्कान , क्षितिज पर उठ रहा जैसे एक तुफान , शांति , स्वतंत्रता , स्वाभिमान भरा यह जाम , खुद से शुरु , खुदी में खत्म , प्रकृति के आंचल में , जीवन का शाश्वत विजयी गान। खोद रहा कीचड़ के बीच , निर्मल जल की एक धार , राह में चढ़ाई भरे थकाऊ पड़ाव , लेकिन , मंजिल से पहले अब कैसा विश्राम , शोहरत मिले , प्रताड़ना-उपेक्षा या रहें गुमनाम , अपने ढंग से , अपने रंग में , चल पड़ा सफर , आत्मबोध से शुरु दिवस , ईष्ट की ओर प्रवाहित हर शाम। पी ले संग मेरे आज, तू भी सृजन का , संघर्ष का ,   प्रेम का , एडवेंचर का , यह मस्ती भरा जाम , एक से शुरु , एक में खत्म , खुद को खोकर खुद को पाने की कवायद अविराम । तन अपने कर्तव्य-धर्म में मग्न , मन खोया निज धाम ,