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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

साधु संग


अन्तरात्मा की आवाज सुनें

अन्तरात्मा के जिज्ञासु को चाहिये कि वह मन के कोलाहल की ओऱ से कान बन्द कर अन्तरात्मा का निर्देश सुनने और पालन करने लगे, निश्चय ही उस दिन से यथार्थ सुख-शांति का अधिकारी बन जायेगा। जिज्ञासा की प्रबलता से मनुष्य के कान उस तन्मयता को सरलता से सिद्ध कर सकता है। आत्मा मनुष्य का सच्चा मित्र है। वह सदैव ही मनुष्य को सत् पथ पर चलने और कुमार्ग से सावधान करने की चेतावनी देता रहता है, किन्तु खेद है कि मनुष्य मन के कोलाहल में खोकर उसकी आवाज नहीं सुन पाता। किन्तु यदि मनुष्य वास्तव में उसकी आवाज सुनना चाहे तो ध्यान देने से उसी प्रकार सुन सकता है, जिस प्रकार बहुत सी आवाजों के बीच भी उत्सुक शिशु अपनी माँ की आवाज सुनकर पहचान लेता है।                      - पं.श्रीराम शर्मा आचार्य


                                समाधि के सोपान

वत्स, प्रभु को पुकारो! सदैव प्रभु को पुकारो!! उनके और केवल उनके विषय में ही विचार करो और वह असीम शक्ति तुम्हारे चारों ओर एकत्र हो जायेगी तथा अनन्त प्रेम तुम्हारा आलिंगन करेगा। तथा प्रभु तुम्हारी आत्मा में अनुभव की वाणी बोलेंगे।

भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी कठिनाइयों को दूर कर देती है। व्यक्ति-निर्माण की सच्ची प्रक्रिया परम प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में है, यह अबाध ध्यान में प्रगट होती है। जब जीवन मिथ्या प्रतीत होता है, जब मृत्यु उपस्थित होती है, जब पीड़ा से हृदय ऐंठता है, तथा मनुष्य का संताप चूड़ान्त हो उठता है, तुम स्मरण रखने की चेष्टा करो, स्मरण रखो कि यह सब बातें शरीर की हैं; तुम आत्मा हो। प्रत्येक दिन को इस प्रकार ग्रहण करो मानो यह जीवन का अंतिम दिन है। जीवन के प्रत्येक क्षण में जप करो। प्रतिदिन अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उनकी इच्छा की सर्वज्ञता को देखो, और तब बाघ के मुँह में भी, मृत्यु की उपस्थिति में भी, नरकद्वार में भी तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे।

और यदि प्रभु का स्मरण ही तुम्हारा जीवन-श्रम हो तो एक महान् आनंद तथा निर्विकार शांति तुम्हें प्राप्त होगी; तथा जो बीभत्स लगता था, वह सुन्दर प्रतीत होगा और जो भयंकर लगता था वह सर्वप्रेममय प्रतीत होगा। और तब उस सन्त के साथ जिसने नाग द्वारा डसे जाने पर कहा था देखो, देखो, मेरे प्रीतम का संदेशवाहक आया है, तुम भी वही कहोगे; या उस सन्त के समान जिसने बाघ के मुँह में भी कहा था, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! तुम भी कहोगे, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! यही आत्मा की शक्ति है। यही वास्तव में उसका प्रगटीकरण है। यही दिव्यता का भाव है क्योंकि यही दिव्यता का दर्शन है।

मातृभूमि की रक्षा के लिए योद्धा तोप के मुँह में दौड़ जाता है। माँ अपने बच्चे की प्राणरक्षा के लिए अग्नि में दौड़ जाती है, गहरे जल में कूद पड़ती है, बाघ के मुँह में समा जाती है। मित्र अपने मित्र के लिए प्राण दे देता है। संन्यासी अपने आदर्श के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहता है। तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो, आदर्श का जीवन जीओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। तुम मेरे पुत्र हो। जीवन या मृत्यु में, पुण्य या पाप में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में, जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। क्योंकि मैं तुमसे बँधा हुआ हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स ! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। (पृ.16-17)

अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलिनताओं को निकाल फेंको। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है। यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय-लिप्साओं में व्यस्त रहो और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।

तुम्हारे लिए मेरा केवल एक ही सन्देश हैः- स्मरण रखो कि तुम आत्मा हो। तुम्हारे पीछे शक्ति है। निष्ठावान होना मुक्त होना है। अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकार के प्रति प्रमाणिक रहो, क्योंकि प्रमाणिक होना मुक्त होने के समान है। तुम्हारा प्रत्येक पद आगे बढ़ने की दिशा में ही हो तथा जैसे जैसे तुम जीवन के राजपथ में बढ़ते जाओगे, वैसे वैसे ही तुम अधिकाधिक अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करते जाओगे। यदि तुम्हारे पीछे प्रामाणिकता है तो तुम सभी व्यक्तियों का सामना कर सकते हो। स्वयं के प्रति ईमानदार बनो तब तुम्हारे शब्द सत्य की ध्वनि से गुंजित होंगे, तुम अनुभूति की भाषा बोलोगे तथा तुम वह शक्ति प्राप्त करोगे, जो दूसरों को भी पूर्ण बना देगी। (पृ.32)

शनिवार, 27 सितंबर 2025

स्वाध्याय-सतसंग : जीवन साधना पाथेय

 

श्रीमाँ के संग

सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

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सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सहिष्णुता का सबसे स्थूल रुप है अध्यवसाय। जब तक तुम यह निश्चय नहीं कर लेते कि यदि आवश्यकता पड़े तो तुम एक ही चीज को हजार बार फिर से शुरु करोगे, तब तक तुम कहीं नहीं पहुँच सकते। लोग हताश होकर मेरे पास आते हैं और कहते हैं – किंतु मैंने तो सोचा था कि यह काम हो चुका है, और मुझे फिर से शुरु करना पड़ रहा है। और यदि उनसे यह कहा जाता है कि पर यह तो कुछ भी नहीं है, तुम्हें शायद सौ बार, दो सौ बार, हजार बार शुरु करना होगा, तो वे सारा साहस गंवा देते हैं।

तुम एक ढग आगे बढ़ते हो और मान लेते हो कि तुम मजबूत हो गये, परंतु सदा ही कोई-न-कोई ऐसी चीज रहेगी, जो थोड़ा आगे जाने पर वही कठिनाई ले आयेगी। तुम मान लेते हो कि तुमने समस्या हल कर ली है, किंतु, नहीं, वह समस्या तुम्हें फिर से हल करनी होगी, वह जिस रुप में आकर खड़ी होगी, वह देखने में थोड़ा-सा भिन्न होगी, किंतु समस्या ठीक वही-की-वही होगी।

अतएव, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनको एक सुन्दर अनुभव होता है औऱ वे चिल्ला उठते हैं – अब यह पूरा हो गया। फिर चीजें धीरे-धीरे स्थिर होती हैं, धीमी होने लगती हैं, पर्दे के पीछे चली जाती हैं और अकस्मात कोई बिल्कुल अप्रत्याशित चीज, बिल्कुल ही सामान्य चीज, जो जरा भी दिलचस्प नहीं मालूम होती, उन लोगों के सामने आ खड़ी होती है औऱ मार्ग बंद कर देती है। तब वे रोने-धोने लगते और कहने लगते हैं, मैंने जो प्रगति की, वह किस काम की हुई, यदि मुझे फिर से शुरु करना पड़े, ऐसा क्यों हुआ?  मैंने प्रयास किया, मैं सफल भी हुआ, मैंने कुछ पाया, और अब ऐसा लग रहा है मानो मैंने कुछ भी न किया हो। यह सब बेकार है। इसका कारण यह है कि मैं अभी तक वर्तमान है और इस मैं में सहिष्णुता नहीं है। 

यदि तुममें सहिष्णुता हो तो तुम कहोगे, ठीक है, जब तक आवश्यक होगा, तब तक मैं बार-बार आरंभ करुँगा, आवश्यकता हुई तो हजार बार, दस हजार बार, लाख बार भी आरंभ करुंगा, पर अंत तक जाऊँगा और कोई चीज मुझे मार्ग में रोक नहीं सकती। यह (अध्यवसाय) बहुत ही आवश्यक है।

सहिष्णुता का एक और रुप होता है निष्ठा। निष्ठावान होना। तुमने एक निश्चय किया है और तुम उस निश्चय के प्रति एकनिष्ठ बने रहते हो, यही है सहिष्णुता। यदि तुममें लगन हो तो एक क्षण आयेगा, जब तुम्हें विजय प्राप्त हो जायेगी।

विजय उन्हें ही मिलती है, जिनमें सबसे अधिक लगन होती है।

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

सच्ची बात यह है कि जब तक तुम्हारे अंदर अहं है, तब तक प्रयत्न करने पर भी तुम पूर्णतया सत्यनिष्ठ नहीं बन सकोगे। तुम्हें अहं को पार कर जाना होगा, अपने-आपको पूर्णतः भागवत इच्छा के हाथों में डालना होगा और दे डालना होगा, बिना कुछ बचाये या हिसाब-किताब लगाये, केवल तभी तुम पूर्णतः सत्यनिष्ठ हो सकते हो, उससे पहले नहीं।

सत्यनिष्ठा ही है सारी सच्ची सिद्धि का आधार। यही साधन है, यही मार्ग है और यही लक्ष्य भी है। तुम निश्चित जानो कि सच्चाई के बिना तुम अनगिनत गलत डग भरोगे और अपने-आपको तथा दूसरों को जो क्षति पहुँचाओगे, उसकी पूर्ति में ही निरंतर तुम्हें लगे रहना होगा।

फिर, सत्यनिष्ठ होने का एक अद्भुत आनन्द होता है, सत्यनिष्ठा की प्रत्येक क्रिया अपना पुरस्कार अपने अंदर लिये रहती है, वह पवित्रता, उत्थान और मुक्ति का भाव जिसे मिथ्यात्व का, चाहे वह एक क्षण ही क्यों न हो, परित्याग करने पर मनुष्य अनुभव करता है। सत्यनिष्ठा ही है निरापदता और संरक्षण, वही है पथ-प्रदर्शिका। अंतिम रुप में फिर वही बन जाती है रुपांतरकारिणी शक्ति।

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

प्रेम एक परम शक्ति है, जिसे शाश्वत चेतना ने स्वयं अपने अंदर से इस धूमिल और अंधकारच्छन्न जगत् में इसलिये भेजा है कि यह इस जगत और इसकी सत्ताओं को भगवान तक बापिस ले जाए। भौतिक जगत अपने अंधकार और अज्ञान के कारण भगवान् को भूल गया था। प्रेम अंधकार के अंदर उतर आया; वहां जो कुछ सोया पड़ा था सबको जगा दिया; उसने बंद कानों को खोलकर यह संदेश फूंका, “एक ऐसी चीज है, जिसके प्रति जागृत होना चाहिए, जिसके लिए जीना चाहिए, और वह है प्रेम!” और प्रेम के प्रति जागृत होने के साथ-साथ जगत् में प्रविष्ट हुई भगवान की ओर लौट जाने की संभावना। सृष्टि प्रेम के द्वारा भगवान की ओर जाती है और उसके उत्तर में उससे मिलने के लिए नीचे झुक आते हैं भागवत प्रेम औऱ करुणा। जब तक यह आदान-प्रदान नहीं होता, पृथिवी और परात्पर के बीच यह गाढ़ मिलन नहीं होता, भगवान् की ओऱ से सृष्टि के प्रति और सृष्टि की ओर से भगवान् के प्रति यह प्रेम की क्रिया नहीं होती, तब तक प्रेम अपने विशुद्ध सौंदर्य के साथ नहीं विद्यमान रहता, वह अपनी परिपूर्णता की स्वभावगत शक्ति और तीव्र उल्लास को नहीं धारण कर सकता।

प्रेम की यह मानवोचित क्रिया किसी ऐसी चीज को खोजती है, जो उसकी अभी प्राप्त की हुई चीज से भिन्न है, परंतु यह नहीं जानती कि उसे कहां पाया जा सकता है, वह यह भी नहीं जानती कि वह क्या चीज है। जिस क्षण मनुष्य की चेतना भागवत प्रेम के प्रति, जो प्रेम की मानवीय आकारों में होने वाली समस्त अभिव्यक्ति से स्वतंत्र और शुद्ध होता है, जागृत होती है, उस क्षण वह जान जाता है कि उसका ह्दय सब समय वास्तव में किस चीज के लिए लालायित रहा है। यही है आत्मा की अभीप्सा का प्रारम्भ, जिससे चेतना का जागरण होता है और भगवान के साथ एकत्व प्राप्त करने की लालसा उसमें उत्पन्न होती है।

भक्ति

भक्ति मानवीय प्रेम से बहुत ऊँची चीज है, यह आत्मदान का पहला पग है। * भक्ति है प्रेम और आदर-भाव और फिर उसके साथ जुड़ा हुआ है आत्मदान। * एक मात्र भगवान को चाहो। * एकमात्र भगवान को खोजो। * एकमात्र भगवान के साथ आसक्त होओ। * एकमात्र भगवान की पूजा करो। * एकमात्र भगवान की सेवा करो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ भी हो, जिसे तुम प्यार करते हो, उसी के पास तुम रहते हो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ कहीं भी क्यों न हो, यदि तुम अपने ह्दय में परम प्रभु के ऊपर एकाग्र होओ तो वह बस तुम्हारे साथ ही विद्यमान रहेंगे। * प्रेम संसार का मूलबिंदु है और प्रेम ही उसका लक्ष्य है। * कृतज्ञ होने का अर्थ है भगवान् की इस अद्भुत कृपा-शक्ति को कभी न भूलना, जो प्रत्येक व्यक्ति को, खुद उसके बावजूद, उसके अज्ञान तथा गलतफहमियों के बावजूद, उसके अहंकार तथा उस अहंकार के विरोधों और विद्रोहों के बावजूद, छोटे-से-छोटे रास्ते से उसके दिव्य लक्ष्य तक ले जाती है। * प्रेम ही है गुप्त रहस्य और प्रेम ही है साधन, प्रेम सर्वोच्च विजेता है। * भगवान् उन सबके साथ हैं जो सत्य को प्यार करते हैं और उनकी शक्ति उन्हें विजयी होने में सहायता कर रही है।

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

साधु संगत, भाग-3, अध्यात्म पथ

मार्ग कठिन, लेकिन सत्य की विजय सुनिश्चित

 

मनुष्यमात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य - आत्मज्ञान

महापुरुषों के जीवन को फूल के समान खिला हुआ, सिंह की तरह अभय, सद्गुणों से ओत-प्रोत देखते हैं, तो स्वयं भी वैसा होने की आकांक्षा जागती है। आत्मा की यह आध्यात्मिक माँग है, उसे अपनी विशेषतायें प्राप्त किये बिना सुख नहीं होता। लौकिक कामनाओं में डूबे रह कर हम इस मूल आकाँक्षा पर पर्दा डाले हुए पड़े रहते हैं, इससे किसी भी तरह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।

श्रेष्ठता मनुष्य की आत्मा है। इसलिए जहाँ कहीं भी उसे श्रेष्ठता के दर्शन मिलते हैं, वहीं आकुलता पैदा होती है।...यह अभिलाषायें जागती तो हैं किन्तु यह विचार नहीं करते कि यह आकांक्षा आ कहाँ से रही है। आत्म-केन्द्र की ओर आपकी रुचि जागृत हो तो आपको भी अपनी महानता जगाने का श्रेय मिल सकता है, क्योंकि लौकिक पदार्थों में जो आकर्षण दिखाई देता है, वह आत्मा के प्रभाव के कारण ही है। आत्मा की समीपता प्राप्त कर लेने पर वह सारी विशेषताएं स्वतः मिल जाती हैं, जिनके लिये मनुष्य जीवन में इतनी सारी तड़पन मची रहती है। सत्य, प्रेम, धर्म, न्याय, शील, साहस, स्नेह, दृढ़ता-उत्साह, स्फूर्ति, विद्वता, योग्यता, त्याग, तप और अन्य नैतिक सद्गुणों की चारित्रिक विशेषताओं के समाचार और दृश्य हमें रोमाँचित करते हैं क्योंकि ये अपनी मूल-भूत आवश्यकताएं हैं। इन्हीं का अभ्यास डालने से आत्म-तत्व की अनुभूति होती है।

आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म-केंद्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र विकास से मिलता है। अपनी बुराईयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीवमात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ, तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

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तुम्हारी एक मात्र संरक्षिका - सत्यनिष्ठा

सत्यनिष्ठ बनो। दिव्य शांति की ओर जाने का यह प्रथम और अपरिहार्य पग है।...पूर्ण सत्यनिष्ठा का तात्पर्य है – जीवन में पूर्णता की उपलब्धि, निरंतर अधिकाधिक पूर्णता की उपलब्धि करते जाना। पूर्णता की उपलब्धि का दावा कभी नहीं करना चाहिए, बल्कि स्वाभाविक गति से उसे प्राप्त करते रहना चाहि। यही है सत्यनिष्ठा।

सच्चाई प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है, पर यह सब चीजों से अधिक अमोघ भी है। अगर तुममें सच्चाई है, तो तुम्हारी विजय सुनिश्चित है। ...

सबसे पहले तुम्हें इस बात पर ध्यान रखना होगा कि तुम्हारे जीवन में एक भी दिन, एक भी घंटा, यहाँ तक कि एक भी मिनट ऐसा नहीं है, जब कि तुम्हें अपनी सच्चाई को सुधारने या तीव्र बनाने की आवश्यकता न हो। मैं यह नहीं कहती कि तुम भगवान को धोखा देते हो, कोई भी आदमी भगवान को धोखा नहीं दे सकता, यहाँ तक कि बडे-से-बडे असुर भी नहीं दे सकते। जब तुम यह समझ गए हो तब भी तुम अपने दैनंदिन जीवन में ऐसे क्षण बराबर पाओगे, जब कि तुम अपने-आपको धोखा देने की कोशिश करते हो। प्रायः स्वाभाविक रुप में ही तुम जो कुछ करते हो, उसके पक्ष में युक्तियाँ पेश करते हो।

सच्चाई की सच्ची कसौटी, यथार्थ सच्चाई की एकदम कम-से-कम मात्रा बस यही है, एक दी हुई परिस्थिति में होने वाली तुम्हारी प्रतिक्रिया के अंदर, तुम सहज भाव से यथार्थ मनोभाव ग्रहण करते हो या नहीं, और जो कार्य करना है, ठीक उसी कार्य को करते हो या नहीं। उदाहरणार्थ, जब कोई क्रोध में तुमसे बोलता है, तब क्या तुम्हें भी उसकी छूत लग जाती है और तुम भी क्रोधित हो जाते हो या तुम एक अटल शांति और पवित्रता बनाए रखने, दूसरे व्यक्ति की युक्ति को देखने या समुचित रुप में आचरण करने में समर्थ होते हो?

बस, यही है, मेरी राय में, सच्चाई का एकदम आरम्भ, उसका प्राथमिक तत्व। अगर तुम अधिक पैनी आँखों से अपने अंदर ताको, तो तुम वहाँ हजारों अ-सच्चाईयों को पाओगे, जो अधिक सूक्ष्म हैं, पर जो इसी कारण पकड़ी जाने योग्य न हों ऐसी बात नही। सच्चे बनने की कोशिश करो और ऐसे अवसर बढ़ते ही जायेंगे, जब तुम अपने को सच्चा नहीं पाओगे, जब तुम समझ जाओगे की सच्चा बनना कितना कठिन कार्य है।

सच्चाई दिव्य द्वारों की चाबी है। सच्चाई में ही है विजय की सुनिश्चितता। पूर्ण रुप से सच्चे बनो, फिर ऐसी कोई विजय नहीं जो तुम्हें न दी जाए।...सत्यनिष्ठा ही तुम्हारी एक मात्र संरक्षिका है।

-    श्रीमाँ, आत्म-परिपूर्णता

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चरित्र निर्माण अर्थात् सत्य का समना और ज्ञान को अपना बनाना

संसार के दुःख सीधे इच्छाओं के अनुपात में ही हैं। इसलिए अंध आसक्ति न रखो। स्वयं को किसी से बाँध न लो। परिग्रह की इच्छा न करो, वरन् स्वयं में अवस्थित होने की दृढ़ इच्छा करो। क्या कोई भी संग्रह तुम्हारे सत्यस्वरुप को संतुष्ट कर सकेगा? क्या तुम वस्तुओं से बद्ध हो जाओगे? नग्न हो इस संसार में तुम आते हो तथा जब मृत्यु का बुलावा आता हो, जब नग्न हो चले जाते हो। तब फिर तुम किस बात का मिथ्या अभिमान करते हो? उन वस्तुओं का संग्रह करो, जिनका कभी नाश नहीं होता। अन्तर्दृष्टि का विकास अपने आप में एक उपलब्धि है। अपने चरित्र को तुम जितना अधिक पूर्ण करोगे, उतना ही अधिक तुम उन शाश्वत वस्तुओं का संग्रह कर पाओगे, जिनके द्वारा यथासमय तुम आत्मा के राज्य के अधिकारी हो जाओगे।

अतः जाओ, इसी क्षण से आंतरिक विकास में लगो, बाह्य नहीं। अनुभूति के क्रम को अन्तर्मुखी करो। इन्द्रियासक्त जीवन से विरत होओ। प्रत्येक वस्तु का आध्यात्मीकरण करो। शरीर को आत्मा का मंदिर बना लो तथा आत्मा को दिन-दिन अधिकाधिक अभिव्यक्त होने दो। और तब अज्ञानरुपी अंधकार धीरे-धीरे दूर हो जाएगा तथा आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे फैल उठेगा। यदि तुम सत्य का सामना करो, तो विश्व की सारी शक्तियाँ तुम्हारे पीछे रहेंगी तथा समन्वित रुप से तुम्हारे विकास के लिए कार्य करेंगी। शिक्षक केवल ज्ञान दे सकते हैं। शिष्य को उसे आत्मसात करना होगा और इस आत्मसात करने का तात्पर्य है – चरित्र निर्माण, ज्ञान को अपना बना लेना है। स्वयं अपने द्वारा ही अपना उद्धार होना है, दूसरे किसी के द्वारा नहीं।

उपनिषदों के आदेश की तर्ज में, उठो, सचेष्ट हो जाओ। और जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो, तब तक न रुको।

-    एफजे अलेक्जेंडर, समाधि के सोपान

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कमर कसकर धैर्य के साथ लक्ष्य की ओर बढे चलो

उद्बुद्ध होओ, जाग उठो, जीवन के महत्तम दायित्व, श्रेष्ठतम कर्तव्य साधन के लिए दृढ़संकल्पबद्ध होओ। सर्वप्रकार के क्लैव्य-दौर्वल्य का विसर्जन दे कर, मलिनता और पंकिलता का परित्याग कर, मोह और आत्मविस्मृति को दूर हटा कर वीर के समान खड़े हो जाओ। जीवन का पथ बड़ा ही कंटकों से परिपूर्ण, बड़ा ही विपदा से पूर्ण, घात संघात, अवस्था विपर्य्यय इस पथ के नित्य साथी एवं दुःख-दैन्य, असुख-अशांति, विषाद-अवसाद इस पथ के नित्य सहचर हैं। बाधा-विघ्न पथ को रोके खड़े रहते हैं। संशय, सन्देह, अविश्वास और आदर्श के प्रति अनास्था उत्पन्न हो कर साधन की नींव का चूरमार कर देती है। कुत्सित कामना, वासना एवं विषय-भोग की आकांक्षा आकर शक्ति-सामर्थ्य बलवीर्य का अपहरण करती है। और मनुष्य की निर्जीव बना डालती है, विभ्रम-विभ्राँति एवं विस्मृति आकर उसे आदर्शभ्रष्ट और लक्ष्यच्युत करके विपथ पर भुला ले जाती हैं। जीवन के इस द्वन्द-संघर्षमय कठिन दुर्योग तथा आत्मविस्मृति एवं आदर्श विभ्राट् के इस विषमय संकट के समय, हे मुमुक्षु साधक। तुम अपने प्रज्ञाबल के द्वारा आत्मबोध और आत्मशक्ति को जाग्रत कर नवीन उत्साह से कमर कस कर धैर्य के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होओ। नैराश्य और निश्चेष्टता को दूर हटाकर पुरुषार्थ का अवलम्बन लो।

आत्मन। दुर्दिन की घन घोर विभीषिका से भयभीत न होना। संग्राम के भय से भाग न जाना। चरम श्रेयः पथ में अभियान कर शान्ति लाभ करो और उत्कर्ण होकर सुनो, श्रुति की वही बज्र गम्भीर चिर जागरण वाणीउत्तिष्ठ, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत्।

स्वामी आत्मानन्द, जीवन साधना के पथ पर

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साधक की परिभाषा

साधक वस्तुतः एक एकाकी पक्षी की तरह होता है।

एकाकी पक्षी की स्थिति पाँच प्रकार से परिभाषित होती है।

§  पहली कि वह अधिकतम ऊँचाई तक उड़ता है।

§  दूसरी यह कि वह किसी साहचर्य और साथ के बिना व्यथित नहीं होता।

§  तीसरी स्थिति यह कि अपनी चंचु का लक्ष्यबिंदु आकाश की ओर ही रहता है।

§  चौथी यह कि उसका कोई निश्चित रंग नहीं होता।

§  पाँचवी स्थिति यह कि वह बहुत मृदु स्वर में गाता है।

 

-    श्रीमाँ, साधक सावधान।।

साधु सगत के पूर्व संकलन

साधु संगत के भाग -2, चित्त् का भ्रम-बन्धन और अपना विशुद्ध आत्म स्वरुप

साधु सगत भाग -1 आत्म कल्याण की भी चिंता की जाए

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

महापुरुषों की साधु संगत


चित्त् का भ्रम-बन्धन और अपना विशुद्ध आत्म स्वरुप
चेतना(आत्मा) विशुद्ध तत्व है। चित्त उसका एक गुण है। इच्छाएं, कामनायें यह चित्त हैं, प्रवत्तियाँ हैं, किंतु आत्मा नहीं, इसलिए जो लोग शारीरिक प्रवृत्तियों काम, भोग, सौंदर्य सुख को ही जीवन मान लेते हैं, वह अपने जीवन धारण करने के उद्देश्य से भटक जाते हैं। चेतना का जन्म यद्यपि आनन्द, परम आनन्द, असीम आनन्द की प्राप्ति के लिए ही हुआ है, तथापि यह चित्तवृत्तियाँ उसे क्षणिक सुखों में आकर्षित कर पथ-भ्रष्ट करती हैं, मनुष्य इसी सांसारिक काम-क्रीड़ा में व्यस्त बना रहता है, तब तक चेतना अवधि समाप्त हो जाती है और वह इस संसार से दुःख, प्रारब्ध और संस्कारों का बोझ लिए हुए विदा हो जाता है। चित्त की मलीनता के कारण ही वह अविनाशी तत्व, आप आत्मा बार-बार जन्म लेने के लिए विवश होते हैं और परमानन्द से वंचित होते हैं। सुखों में भ्रम पैदा करने वाला यह चित्त ही आत्मा का, चेतना का बन्धन है।                  
                               – युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

अपने जीवन को सरल बनाइए, सरल

मानवीय योनि मिलने पर भी हमारा जीवन छोटी-छोटी बातों में ही नष्ट हो जाता है। मैं कहता हूँ कि सैंकड़ों-हजारों कामों में उलझने के बजाय दो-तीन काम हाथ में ले लीजिए। इस सभ्य जीवन के सागर में अनगिनत बादल और तुफान होते हैं और जबर्दस्त दलदल हैं। इसमें ऐसी हजारों चीजें हैं कि यदि आदमी रसातल को नहीं जाना चाहता तो उसे बड़े हिसाब से रहना पड़ता है। अपने जीवन को सरल बनाइए, सरल। दिन में तीन चार खाने की जगह, आवश्यक हो तो एक ही बार खाईए। सौ पकवानों की जगह पाँच ही रखिए और इसी अनुपात में और सभी चीजों की संख्या घटाइए। 
                                - हेनरी डेविड थोरो

जगत के ऐश्वर्य में ही न खोएं, इसके मालिक की भी सुध लें
ईश्वर और उनका ऐश्वर्य। यह जगत उनका ऐश्वर्य़ है। लेकिन ऐश्वर्य़ देखकर ही लोग भूल जाते हैं, जिनका ऐश्वर्य है, उनकी खोज नहीं करते। कामिनी-काँचन का भोग करने सभी जाते हैं। परन्तु उसमें दुःख और अशांति ही अधिक है। संसार मानो विशालाक्षी नदी का भँवर है। नाव भँवर में पड़ने पर फिर उसका बचना कठिन है। गुखरु काँटे की तरह एक छूटता है, तो दूसरा जकड़ जाता है। गोरखधन्धे में एक बार घुसने पर फिर निकलना कठिन है। मनुष्य मानो जल सा जाता है।

उपाय - साधुसंग और प्रार्थना।

वैद्य के पास गए बिना रोग ठीक नहीं होता। साधुसंग एक ही दिन करने से कुछ नहीं होता। सदा ही आवश्यक है। रोग लगा ही है। फिर वैद्य के पास बिना रहे नाड़ीज्ञान नहीं होता। साथ साथ घूमना पड़ता है, तब समझ में आता है कि कौन कफ नाड़ी है और कौन पित्त की नाड़ी।.साधु संग से ईश्वर पर अनुराग होता है। उनसे प्रेम होता है। व्याकुलता न आने से कुछ नहीं होता। साधुसंग करते करते ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होता है – जिस प्रकार घर में कोई अस्वस्थ होने पर मन सदा ही चिन्तित रहता है और यदि  किसी की नौकरी छूट जाती है तो वह जिस प्रकार आफिस आफिस में घुमता रहता है, व्याकुल होता रहता है, उसी प्रकार।

एक ओर उपाय है – व्याकुल होकर प्रार्थना करना। ईश्वर अपने हैं, उनसे कहना पड़ता है, तुम कैसे हो, दर्शन दो-दर्शन देना ही होगा-तुमने मुझे पैदा क्यों किया? सिक्खों ने कहा था, ईश्वर दयामय है। मैने उनसे कहा था, दयामय क्यों कहूँ? उन्होंने हमें पैदा किया है, यदि वे ऐसा करें जिससे हमारा मंगल हो, तो इसमें आश्चर्य क्या है? माँ-बाप बच्चों का पालन करेंगे ही, इसमें फिर दया की क्या बात है? यह तो करना ही होगा। इसीलिए उन पर जबरदस्ती करके उनसे प्रार्थना स्वीकार करानी होगी।
साधुसंग करने का एक और उपकार होता है – सत् और असत् का विचार। सत् नित्यपदार्थ अर्थात् ईश्वर, असत् अर्थात् अनित्य। असत् पथ पर मन जाते ही विचार करना पड़ता है। हाथी जब दूसरों के केले के पेड़ खाने के लिए सूँड़ उठाता है तो उसी समय महावत उसे अंकुश मारता है।                - श्री रामकृष्ण परमहंस
 
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