शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

सेब उत्पादन में क्राँति के नायक, प्रगतिशील बागवान


माटी में सोना उगाने वाले अग्रदूत
सेब एक लोकप्रिय स्वादिष्ट फल है, जिससे जुड़ी कहावत ऐन एप्पल ए डे, कीप्स द डॉक्टर अवे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। सेब को मूलतः मध्य एशिया का फल माना जाता है, जो यहां से पहले यूरोप के ठंडे प्रदेशों में व फिर कालान्तर में अमेरिका तक पहुंचा। भारत में सेब का पहला बगीचा शौकिया तौर पर 1870 में कुल्लू घाटी के बंदरोल स्थान पर अंग्रेज कैप्टन आरसी ली द्वारा रोपा गया था। लेकिन भारत में सेब की व्यावसायिक खेती का श्रेय अमेरिकन मिशनरी सेमुअल स्टोक्स को जाता है जो भारतीय रंग में इस कदर रंग जाते हैं कि शिमला की पहाड़ियों में बस जाते हैं।
 1916 में सत्यानन्द स्टोक्स यहां के थानेधार क्षेत्र, कोटगढ़ में सेब की किस्मों को उगाते हैं, जिनका आगे चलकर पूरे हिमाचल व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रसार होता है।
इस समय भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड सेब उत्पादन करने वाले मुख्य प्रांत हैं। इसके साथ पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में सेब उत्पादन शुरू हो चुका है। सेब की उम्दा फसल के लिए औसतन 1200 घंटे के चिलिंग ऑवर्ज (हाड़कंपाती ठंड) की जरूरत होती है। इनमें पारम्परिक रूप में रेड, रॉयल, गोल्डन जैसी किस्मों को उगाया जाता रहा है, जिनके फलदार वृक्ष को तैयार होने में औसतन दस से बारह साल लग जाते हैं।
 लेकिन प्रगतिशील किसानों की खोजी दृष्टि एवं अथक श्रम का परिणाम है कि नजारा पूरी तरह से बदल रहा है। आज हाई डेंसिटी (सघन घनत्व) और स्पर वैरायटी के सेब की पौध उगाई जा रही है, जो महज 3-4 साल में ही फल देना शुरू कर देती है। इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार भी अधिक हो रही है और इनके दाम भी पारम्परिक सेब की तुलना में लगभग दोगुना मिल रहे हैं। 
सेब के साथ नाशपाती जैसे अन्य फलों में भी इस तरह के प्रयोग शुरू हो चुके हैं, जो फल उत्पाद में किसी क्रांति की बयार से कम नहीं हैं। इसकी तुलना अन्न उत्पादन के क्षेत्र में किसी दौर की हरित क्रांति से की जा सकती है, जिसमें अन्न की उम्दा किस्मों के साथ पैदावार कई गुणा बढ़ गई थी। आज जब किसानों की आय को दोगुना करने की बात चल रही है तो बागवानी को लेकर चल रहे ऐसे प्रयोग महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सेब उत्पादन के क्षेत्र में इस क्रांति के अगुआ रहे हैं शिमला की कोटखाई तहसील के ढांगवी गांव के प्रगतिशील बागवान रामलाल चौहान। यात्रा की शुरुआत इतनी सरल नहीं थी, जितनी यह आज प्रतीत होती है। शुरुआती दौर में होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद फाइवस्टार होटल की नौकरी को छोड़ जब रामलाल चौहान दिल्ली आजादपुर मंडी में फल कंपनी के साथ काम करते हैं तो देशभर में भ्रमण के दौरान फल की पैकिंग से लेकर मार्केटिंग व उन्नत बागवानी के तौर-तरीकों को नजदीक से देखते व समझते हैं। इन प्रयोगों को अपने गांव में सेब उत्पादन के क्षेत्र में लागू करते हैं।
शुरुआत में स्थानीय सरकारी नर्सरी में उपलब्ध उन्नत विदेशी किस्मों को ट्रायल के रूप में आजमाते हैं, जब प्रयोग सफल होता दिखता है तो तत्काल 7-8 साल के 300 रॉयल सेब के पौधों को टॉप वर्क कर नया बगीचा तैयार करने का साहसिक कदम उठाते हैं।
यह खबर अन्य बागवानों तक पहुंचती है तो सभी इन पर हंसते हैं। लेकिन अगले ही दो-तीन वर्षों में जब नई किस्म के उन्नत सेब उगने शुरू होते हैं व मार्केट में रिकोर्डतोड़ दाम पर बिकने लगते हैं तो वही बागवान इस पहल के अनुगामी बन जाते हैं। 
आज रामलाल चौहान के बाग में सेब व नाशपाती की विदेशी किस्मों की अधिकांश उन्नत किस्में फल-फूल रही हैं। इस प्रयोग में नौनी स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार होर्टिक्लचर यूनिवर्सिटी के उपकुलपति से लेकर वैज्ञानिकों के सहयोग व प्रोत्साहन को रामलाल चौहान कृतज्ञभाव से स्वीकार करते हैं।

आज देश ही नहीं, विदेश के वैज्ञानिक, किसान एवं शोध छात्र इनके बगीचे को देखने आते हैं। हिमाचल सहित कश्मीर, उत्तराखण्ड एवं पूर्वोत्तर के बागवान इस प्रयोग का लाभ ले रहे हैं। बागवानी में तकनीकी के प्रयोग को लेकर रामलाल चौहान को राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं। इनको आठवां राष्ट्रीय पुरस्कार 2017 में हाईटेक हॉर्टिक्लचर के लिए मिला है।
इसी क्रम में शिमला, कोटखाई के ही बखोल गांव के युवा बागवान संजीव चौहान प्रति हेक्टेयर 52 मीट्रिक टन सेब का रिकॉर्ड उत्पादन कर चुके हैं जो अमेरिका एवं चीन में हो रहे 35-40 मीट्रिक टन से कहीं अधिक है। यह सब सेब की स्पर वैरायटी एवं हाई-डेंसिटी बागवानी के बल पर संभव हुआ है।
कानून, इतिहास एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर संजीव चौहान सरकारी नौकरी की बजाय बागवानी के जुनून को पिछले लगभग एक दशक से अपने ढंग से अंजाम दे रहे हैं व बागवानी को पत्रकारिता के साथ जोड़कर दूसरों को भी लाभान्वित कर रहे हैं। ऑर्चड बलूम के नाम से इनकी त्रैमासिक पत्रिका और वेबसाइट/फेसबुक पेज रिकॉर्ड पाठक संख्या और हिट्स के साथ इसकी लोकप्रियता एवं सफलता को दर्शाती है। 
 इसके अतिरिक्त फ्री ट्रेनिंग कैंप्स के माध्यम से प्रदेश भर में अपने अनुभव को साझा करते हैं व प्रशिक्षण दे रहे हैं।
वृक्ष के साथ परिवार के सदस्य-सा आत्मीयता भरा इनका संवेदनशील रवैया एक अनुकरणीय पहलु है, जिसके लिए इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। संजीव चौहान के अनुसार सबसे बड़ा पुरस्कार हमें तब मिलता अनुभव होता है जब हमारी तकनीक से आम किसान लाभान्वित होता है औऱ उसके चेहरे पर मुस्कान आती है।

इन पहलों के बीच एक अभिनव प्रयोग की चर्चा के बिना बात अधूरी रहेगी। यह हैं हिमाचल के ही बिलासपुर जिला में पनियाला गांव के प्रगतिशील बागवान हरिमन शर्मा।
 जिनकी अद्भुत प्रयोगधर्मिता ने सेब की उम्दा किस्म को कम ऊंचाई के गर्म मैदानी इलाकों के लिए एक हकीकत बना दिया है जहां पहले सपने में भी किसान सेब उत्पादन की नहीं सोच सकते थे। इनके बाग में 1800 फीट की ऊंचाई में सफलतापूर्वक फल दे रही सेब की किस्म को इनके नाम से हरमन 1999 नाम दिया गया है, जिसे किसी चिलिंग हॉवर की जरूरत नहीं रहती। इसके सात साल के पौधे में एक क्विंटल तक सेब तैयार हो रहे हैं व जून की शुरुआत में ही फसल तैयार हो जाती है। इस सेब का रंग कुछ लालिमा लिए सुनहरा तथा स्वाद खट्टा-मीठा है।
नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के सहयोग से इस प्रजाति का ट्रायल देश भर के 31 राज्यों में चल रहा है। कर्नाटक, पंजाब व हरियाणा जैसे प्रांतों में इसका सफल ट्रायल हो चुका है। इस प्रयोग के लिए इनको बिलासपुर में एप्पलमैन के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा इनको पुरस्कार मिल चुका है। राष्ट्रपति भवन में हरमन 1999 सेब की पौध लगा चुके हैं।
प्रांतीय स्तर पर इनको मुख्यमंत्री द्वारा प्रेरणा स्रोत के रूप में नवाजा गया है। इनके प्रयोगों का परिणाम है कि हिमाचल के कांगड़ा, हमीरपुर जैसे गर्म मैदानी इलाकों में बागवान सेब उगा रहे हैं। यही चलन प्रदेश व अन्य गर्म मैदानी इलाकों में शुरू हो चला है।
ऐसे और भी अभिनव प्रयोग चल रहे हैं जो साबित करते हैं कि इनसान अपनी लगन, अथक श्रम, प्रयोगधर्मिता व साहसिक पहल के आधार पर इसी माटी से सोना उगल सकता है। (दैनिक ट्रिब्यून चण्डीगढ़,7मई,2018 को प्रकाशित)

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