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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-1


लुधियाना से उड़ीसा, तमिलमाड़ू

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना का मुख्य भवन

कॉलेज में बिताए स्वर्णिम दिनों में दक्षिण भारत की पहली यात्राएं उल्लेखनीय हैं। पहली उड़ीसा के कटक शहर की और दूसरी अन्नामलाई यूनिवर्सिटी की। कटक यात्रा में पहली बार महानदी और पुरी में सागर के दर्शन हुए थे। और अन्नामलाई की यात्रा में दक्षिण भारत के हिल स्टेशन ऊटी व कोडेक्नाल के साथ मैसूर, बैंगलोर व पाँडिचेरी की एक झलक पायी थी।

बाहरवीं के बाद हमें सौभाग्य मिला पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के कॉलेज ऑफ एग्रीक्चलचरल इंजीनियरिंग (COAE) में अध्ययन करने का। विश्वविद्यालय भारत के अग्रणी कृषि विश्विविद्यालयों में से एक है, जो कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार के लिए प्रसिद्ध है औऱ इसने भारत की हरित क्राँति में अहम भूमिका निभाई है। संयोग से हमारे पिताश्री भी इसे विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज के स्नातक रहे। विश्वविद्यालय लुधियाना में 494 एकड़ (और कुल 1793 एकड़) में फैला हुआ है।

उड़ीसा की पहली यात्रा संभवतः वर्ष 1988 के दौरान सम्पन्न हुई थी, जब हम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। यूनिवर्सिटी की वेटलिफ्टिंग टीम के सदस्य के रुप में हम इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता हेतु कटक विश्वविद्यालय गए थे। लगभग एक दर्जन युवा खिलाड़ियों की टीम कोच के साथ थी। इंजीनियरिंग कॉलेज से हम अकेले थे, कुछ वेटनरी कॉलेज से तथा अधिकाँश एग्रीक्लचर-हॉर्टिक्लचर कॉलेज से थे। सफर की यादें काफी धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन जेहन में अंकित स्मृतियों को कुरेदते हुए यहाँ कुछ रोचक एवं यादगार घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ।

हमारे साथ वेटलिफ्टिंग टीम में प्लस 110 किलो के सुपर हेवीवट केटेगरी में भाई दलजीत सिंह टीम में आकर्षण का विशेष केंद्र थे, जिन्हें हम प्यार से पहलवानजी कहते थे। दूर से ही उनका ढील-ढोल और चाल-ढाल देखकर पता चलता था कि पहलवानजी आ रहे हैं। उनकी डाइट भी उनके बजन के हिसाब से कुछ स्पेशियल थी। तीन दर्जन रोटियाँ, दर्जनों अण्डे व लीटरों के हिसाब से दूध उनकी खुराक रहती थी। उसी हिसाब से उनकी वेटलिफ्टिंग का अभ्यास रहता था।

याद है ट्रेन में केले बेचने वाला जब फल से भरी टोकरी लेकर आता है, तो रेट पूछने पर वह दर्जन के हिसाब से केले के दाम बताता है। लेकिन पहलवानजी अपने नाश्ते के हिसाब से पूरी टोकरी का रेट पूछ रहे थे। फेरी बाले ने जीवन में शायद पहली वार पूरी टोकरी को एक साथ बिकते देखा होगा। केले का साइज सामान्य से छोटा था, लेकिन विशेष स्वाद लिए थे। पहलवानजी एक बार में एक केला छील कर उदरस्थ करते और देखते-देखते पूरी टोकरी खाली कर गए। हमारे लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन फेरी वाले व ट्रेन में बैठे लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय था।

कटक पहुँचने पर महानदी के पुल के किनारे गुरुद्वारे में रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ से महानदी का विस्तार देखने योग्य था, जिसके ऊपर कई किमी लम्बा पुल बना था। यहाँ से स्टेडियम थोड़ी दूरी पर था। आसपास हर घर के साथ पानी का तलाब और साथ में नारियल के झुरमुट हमें बहुत दर्शनीय लगे। इनके साथ एक नए प्रारुप में ग्रामीण जीवन के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे। हालाँकि किसी के घर जाकर नजदीक से देखने का समय नहीं था, लेकिन इस नए प्रदेश के नए परिवेश व संस्कृति को देखकर कई प्रश्न उठ रहे थे कि क्या इन तालावों में मछलियाँ भी होती हैं। इनके जल का स्रोत क्या रहता है। इसकी शुद्धता कैसी रहती होगी व इसका उपयोग किन-किन रुपों में होता होगा। यह प्रश्न हमारे लिए अभी भी पूरी तरह उत्तरित नहीं हैं। समय मिलेगा तो एक बार इनको नजदीक से देखकर अवश्य जानना व समझना चाहूँगा।

वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में प्रतिभाग लेने के बाद हम सभी पुरी साइड के सी बीच (सागर तट) में भी भ्रमण किए, इसकी भी यादें धुधली सी हैं, जहाँ पर कुछ यादगार सामूहिक फोटोग्राफी होती है (इससे जुड़ी फोटो आज खो चुकी हैं, इन्हें इकट्ठा करने का प्रयास जारी है।) इस समय हमारा शारीरिक सौष्ठव अपने चरम पर था, क्योंकि इसी दौर में हम विश्वविद्यालय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में मिस्टर यूनिवर्सिटी बने थे।

उस दौर में शारीरिक फिटनेस के प्रति अपनी दिवानगी का जिक्र अवश्य करना चाहूँगा। खेल के प्रति हमारी निष्ठा अप्रतिम रही। कबड्डी से लेकर शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो जैसे पॉवर गेम्ज़ में हम प्रतिभाग करते रहे, लेकिन मुख्य खेल बॉडी बिल्डिंग ही चयनित था, साथ ही कोच के प्रोत्साहन में वेटलिफ्टिंग से भी जुड़ गया था। किशोरावस्था में स्वामी विवेकानन्द के युवाओं को संदेश में मुखरित मस्ल्ज़ ऑफ आयरन के आग्नेय वचन हमारे प्रेरक मंत्र बन चुके थे, जिसके अनुरुप पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एनएसओ (NSO-नेशनल स्पोर्टस ऑर्गेनाइजेशन) के अंतर्गत हमें अपने पैशन को पूरा करने का यहाँ स्वर्णिम अवसर मिला था।

खेल का मैदान व जिम हमारे लिए किसी मंदिर व तपःस्थली से कम नहीं था। क्या आँधी, क्या तुफान, क्या परीक्षा, क्या बारिश, हम शाम को ठीक साढ़े चार बजे ग्राउंड में पहुंच जाते थे। पहले बीस मिनट एथलेटिक ट्रेक पर राउंड के साथ वार्मअप करते और फिर जिम में प्रवेश करते। लगभग दो-अढ़ाई घंटे कोच के मार्गदर्शन में जिम में पसीना बहाते। इसके बाद योगासन के कुछ स्ट्रेचिंग आसन व शवासन आदि के साथ कूलडाउन करते। अंत में पसीने से तर-बतर वनियान को निचोड़ते, तो पसीने की धार झरने लगती।

इसके बाद यूनिवर्सिटी गेट के बाहर जेंटलमेन दी हट्टी में दूध का गिलास व गर्मागर्म जलेबी का सेवन होता। इसके साथ शारीरिक श्रम के साथ खर्च हुई ऊर्जा की कुछ भरपाई हो जाती। फिर हॉस्टल पहुँच कर स्नान-ध्यान के साथ अपनी सांयकालीन दिनचर्या आगे बढ़ती।

कॉलेज ऑफ एग्रीक्लचरल इँजीनियरिंग, PAU का प्रवेश द्वार

पढ़ाई के अंतिम वर्ष संभवतः सन 1989-90 के दौरान हमें फील्ड प्रोजेक्ट के तहत अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु भेजा गया, साथ में थे एग्रीक्लचरल इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक अंतिम वर्ष के लगभग एक दर्जन सहपाठी छात्र। हमें याद है कि लुधियाना से हम ट्रेन में चढते हैं और तमिलनाड़ू के चिदम्बरम स्टेशन पर उतरते हैं, जहाँ अन्नामलाइ विश्वविद्यालय सामने ही पड़ता है।

चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन प्रवेश द्वार

मालूम हो कि अन्नामलाई यूनिवर्सिटी तमिलनाड़ु के चिदंबरम में स्थित एक प्रमुख, सरकारी आवासीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना सन 1929 में हुई थी। 1000 एकड़ में फैला इसका परिसर कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व कला सहित विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करता है। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। 

यहीं एक होस्टल में हम लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ कर्मचारी हिंदी या पंजाबी अधिक नहीं समझते थे, अंग्रेजी भी कम ही समझ पाते थे। वे तमिल में ही अधिक बोलते थे। इसलिए अधिकांश संवाद इशारे में ही होते व किसी तरह काम चलाते। धीरे-धीरे हम पानी पीने से लेकर अभिवादन में उपयोग होने वाले दैनिक व्यवहार के कुछ शब्दों को सीख गए थे, जैसे वनक्कम, तन्नी कुडुङ्गा आदि। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों से तो अंग्रेजी में संवाद हो जाता था, हॉस्टल में थोड़ा कठिन रहता था।

बाहर दुकानदारों के साथ भी इशारों में अधिक बात होती थी। हमारे साथ पंजाब से आए सहपाठी अधिकाँशतः पंजाब से थे, जहाँ रोटी खाने का चलन अधिक है। वे चावल को अधिक पसन्द नहीं करते। होस्टल में उपलब्ध भोजन चाबल प्रधान ही रहता। इडली से लेकर डोसा, हर डिश में चाबल ही रहता। बड़ी मुश्किल से रोटी वाला ढाबा बाहर शहर में मिलता है और बीच-बीच में रोटी वाला भोजन करने वहाँ जाते। (...शेष अगली पोस्ट में)

अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु


शनिवार, 30 अगस्त 2025

जब आया बुलावा अयोध्या धाम का, भाग-4

गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या में कुछ यादगार पल


राममंदिर से बाहर निकलकर वाईं ओर मुढ़ते हुए हम हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ते हैं। समय बचाने व नया अनुभव लेने के लिए हम विशेष रिक्शा-वाहन में सवार हो जाते हैं, जो कुछ ही मिनट में हमें हनुमान गढ़ी के बाहर सड़क पर उतार देता है। रास्ते भर दोनों ओर बाजार की सजावट देखने लायक थी और तीर्थयात्रियों की चहचाहट पीछे जैसी ही थी। संकरी गलियों को पार करते हुए हम हनुमान गढ़ी मंदिर के सामने पहुँचते हैं। यह एक पहाड़ी टीले की चोटी पर स्थिति मंदिर है, जिसमें प्रवेश के लिए 58 सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता है।

हम भी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पंक्ति में लग जाते हैं, अधिक भीड़ नहीं थी। लेकिन लाइन बीच में ठहरी हुई थी। अभी दोपहर के सवा तीन बजे थे। पता चला कि दर्शन चार बजे से होंगे। सो हम वहीं से भाव निवेदन करते हुए बापिस मुड़ जाते हैं, क्योंकि आज का ही दिन हमारे पास शेष था, कुछ घंटे बचे थे, जिसमें इस धर्म नगरी का आवलोकन करना था।

रास्ते में माथे में चंदन व तिलक छाप लगाने वालों की भीड़ लगी थी। इनका चिपकू रवैया थोड़ा असहज करता है, चित्त की शांति व भक्ति भाव की लौ को बिखेर देता है। तीर्थ स्थलों पर इनका जमावड़ा एक तरह से भक्ति दर्शन में व्यवधान ही रहता है। ऊपर से जब माथा पसीने से तर-बतर हो और चेहरे पर गंगा-जमुना बह रही हो तो, तिलक छापा लगाने का कोई औचित्य नहीं लगता। लेकिन इनका अपना धंधा जो ठहरा, सो ये अपनी निष्ठा के साथ लगे रहते हैं, भक्तों की भाव-संवेदना का संदोहन करने। लगा कि इनके उचित नियोजन की आवश्यकता है। मंदिर प्रबन्धन इस दिशा में कुछ कर सकता है। राममंदिर में इस तरह का कोई व्यवधान नहीं था।

यहाँ से आगे बढ़ते हैं, अगला पड़ाव कनक भवन था। यह कितनी दूरी पर स्थित है, पूछने पर स्थानीय लोगों का एक ही उत्तर रहता – बस दो सौ मीटर। कितने दो सौ मीटर निकल गए, लेकिन हर जगह पूछने पर दौ सौ मीटर की ही हौंसला फजाई मिलती रही। यहाँ सड़कें काफी चौड़ी की गई हैं और साफ सूथरी भी। एक तरह से तीर्थ कोरिडोर के तहत लगा पर्याप्त कार्य हुआ है। बीच में साइड में रुकने के उचित स्थल भी दिख रहे थे। पूजन सामग्री से लेकर खान-पान की तमाम दुकानों के साथ मार्केट पूरी तरह से सज्जी हुई थीं। हर दुकान में पेढ़ों के ढेर लगे थे। विविध आकार में, गोल से लेकर चपटे व सिलेंडर आकार के, जो काफी मशहूर माने जाते हैं।

इसी क्रम में कनक महल के गेट से दर्शन होते हैं। यह पिछला गेट था, जहाँ से प्रवेश निशिद्ध था, अतः बाहर से ही दर्शन कर आगे बढ़ते हैं। हम गायत्री शक्तिपीठ की खोज में भी थे, जो पता चला कि ठीक इसके पिछली साइड पड़ता है, सो पीछे मूड़कर एक गली से होकर आगे बढ़ते हैं। कनक भवन के दूसरी ओर के गेट के बाहर भोजन प्रसाद की उत्तम व्यवस्था के विज्ञापन लगे थे। अभी तो सेवा बंद थी। 70 रुपए से 120 रुपए में थाली की व्यवस्था दिख रही थी।

निर्माणाधीन, गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या

कनक भवन से ठीक आगे किनारे पर गायत्री शक्तिपीठ का प्रवेश द्वार दिखा। इसके व्यवस्थापक बाबा राम केवल यादव से मुलाकात होती है। जिनकी लम्बी-लम्बी शुभ्रवर्णी दाढ़ी और केशों से सजा भव्य व्यक्तित्व विशेष ध्यान आकर्षित कर रहा था। इनके संवाद पर थोड़ी ही देर में अहसास हुआ कि एक गायत्री साधक से संवाद हो रहा है। संवाद के तार कहीं गहरे जुड़ रहे थे। इसी बीच हमारी सेवा में चाय-बिस्कुट आ जाते हैं। पास में ही तीन वरिष्ठ स्वयंसेवक पदाधिकारी अपने आसनों में शोभायमान थे और सभी अपने ऑफिशयल कार्यों में व्यस्त थे।

फिर हम ऊपर कक्ष में आकर थोड़ा विश्राम करते हैं। यहीं व्यवस्थापक महोदय से उनकी व शक्तिपीठ की कहानी का श्रवण करते हैं। जो रोचक ही नहीं रोमाँचक भी थी। हमारे लिए ज्ञानबर्धक भी। स्वयंसेवक माताजी बीच में बेल का शर्वत लेकर आती हैं। संवाद पर बाबाजी एक अद्भुत व्यक्तित्व के व्यक्ति निकले। 1981 से आचार्य़ श्रीरामशर्माजी से इनकी पहली मुलाकात होती है और तभी से मात्र आलू व चना पर निर्वहन कर रहे हैं।

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा वर्ष 1981 में यहाँ अयोध्या आगमन हुआ था और उन्हीं के करकमलों द्वारा शक्तिपीठ की नींव पड़ी थी। इस भूमि की कई विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया और वर्तमान गतिविधिय़ों के प्रति हमारी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इसे गायत्री तीर्थ शांतिकुंज का ही एक प्रतिरुप कह सकते हैं, जहाँ नाना प्रकार की गतिविधियाँ संचालित होती हैं। नियमित गायत्री साधना, यज्ञ, संस्कार के साथ यहाँ विभिन्न साधना सत्र, स्वावलम्बन, योग, संगीत, प्राकृतिक चिकित्सा, धर्म विज्ञान, आपदा प्रबन्ध, आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी जैसे लोकोपयोगी कार्यक्रमों की भी व्यवस्था है।

इनके संचालन हेतु पांच मंजिला भवन तैयार हो रहा है। इसकी छत से अयोध्या नगरी का विहंगम दृश्य देखने लायक था।

सभी तीर्थ स्थल यहाँ से दिख रहे थे। श्रीराममंदिर से लेकर हनुमानगढ़ा और दूर सरयू नदी। जिसका अवलोकन नीचे दिए वीडियो में कर सकते हैं।

शक्तिपीठ परिसर में ही निचले तल पर गायत्री मंदिर, सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा, भटका हुआ देवता और यज्ञशाला स्थापित हैं। बाहर बारिश शुरु हो चुकी थी, लग रहा था जैसे देव अभिसिंचन हमारे ऊपर हो रहा है। बाबा रामकेवलजी से विदाई लेकर हम लोग इस अभिसिंचन का आनन्द लेते हुए हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ते हैं। बारिश ओर तेज हो रही थी। सो आज दर्शन की संभावना नहीं थी। मंदिर के बाहर एक दुकान से यहाँ के स्पेशन खुरचन वाले पेढ़े का प्रसाद लेते हैं।

फिर पतली गलियों से बाहर निकलते हुए मुख्य मार्ग पर आते हैं, स्पेशन रिक्शा वाहन में ऑटो स्टेंड पहुँचते हैं। बापिसी में मार्केट का नज़ारा देखने लायक था, शाम के धुंधले अंधेरे में रौशनी की जगमग जैसे उत्सव का अहसास करा रही थी। 


ऑटो स्टैंड पहुंचने पर हम दूसरे ऑटो में बैठकर घनौरा चौक पहुँचते हैं। वहाँ से पैदल चलते हुए बापिस अतिथि गृह में पहुँचते हैं। इस तरह आज के अयोध्या धाम में तीर्थस्थलों के यथासंभव दर्शन का क्रम पूरा होता है। कल अवध विश्वविद्यालय में क्राँफ्रेंस में प्रतिभाग लेना था, जिसका हमें बेसव्री से इंतजार था। (इसे भाग2, लखनऊ से अयोध्या और अवध विश्वविद्यालय कैंपस पढ़ सकते हैं)

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

जब आया बुलावा अयोध्या धाम का, भाग-1

                                           मेरी पहली वंदे भारत एक्सप्रेस रेल यात्रा

हरिद्वार स्टेशन पर वंदे भारत एक्सप्रेस का आगमन

पहली बार अयोध्या जाने का अवसर बन रहा था, वह भी एक नई रेल में। वहाना एक काँफ्रेंस का था, लेकिन अहसास हो रहा था कि जैसे अयोध्या धाम से राम लल्ला, भगवान रघुनाथ का बुलावा आया हो। अयोध्या धाम के साथ रामलल्ला के चिरप्रतिक्षित दर्शन करेंगे। साथ में जा रहे थे डॉ. दिलिप सराह, जिनके साथ यात्रा का संयोग मई माह की केंद्रीय संस्कृत विवि, देवप्रयाग क्रांफ्रेंस में भी बना था। टिकट से लेकर रुकने आदि की व्यवस्था में इनका सहयोग काविले ताऱीफ रहा।

वन्दे भारत एक्सप्रेस, मालूम हो कि प्रधानमंत्री मोदीजी की एक महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है और इसे एक सफल प्रयोग कह सकते हैं। मेक इन इंडिया के तहत यह लगभग पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से बनी रेल हैं। यह अपनी हाइ-स्पीड़, स्वच्छता व किफायती दरों पर सुविधाओं के लिए जानी जाती है। बाहर से देखने पर कुछ-कुछ बुलेट ट्रेन का फील दे जाती है। एयरोडाइनमिक के सिद्धान्तों पर इसकी संरचना हुई है, जिससे यह हवा के प्रतिरोध को सक्षमता के साथ चीरते हुए गति पकड़ने व अपने मंजिल की ओर गतिशील होने में सक्षम है।

वंदे भारत एक्सप्रेस में डब्बे के अंदर का नज़ारा

इसमें मेट्रो की तरह स्वचालित दरबाजे हैं, जिनसे प्रवेश होता है, जो स्वतः ही यात्रियों के अंदर-बाहर निकलने पर खुल जाते हैं। अंदर जाने पर एकदम हवाई जहाज का लुक दिखता है। बस इसमें ऊपर लगेज बॉक्स खुले रहते हैं। सीट आरामदायक थी, सामने सीट के पीछे जालीदार बक्से में हल्का सामान रख सकते थे। इसमें लगी पट्टी फोल्ड होकर टेबल का काम कर रही थी। एक अखबार भी रो में पढ़ने के लिए उपलब्ध था। पानी की बोटल को रखने के लिए नीचे गोल खाँचा बना हुआ था और मोबाइल चार्ज के लिए हर सीट के नीचे चार्जिंग प्वाइंट था।

हवाई यात्रा का फील देती बंदे भारत एक्सप्रेस में एयर हॉस्टेस की जगह पुरुष हॉस्ट थे, जो यात्रियों की खाने-पीने की सुविधाओं का पूरा ध्यान रख रहे थे। पूरी मुस्तैदी से मिल रहे निर्देशों का पालन कर रहे थे। देहरादून से चलने के कारण स्वाभाविक रुप से उत्तराखण्ड के परिधान व टोपी को पहने हुए थे। ज्वालापुर को पार करते ही आगे के मार्ग में हरे-भरे खेत-खलिहान, गन्ने के नन्हें पौध, पोपलर के वृक्षों की कतारें स्वागत करती रहीं। कहीं-कहीं गाँव व कस्वों के दर्शन होते रहे और साथ छोटे पुल मिलते रहे।

इनके बीच विशेष ध्यान आकर्षित करता है एक विशाल नदी पर बना पुल, जो पूछने पर पता चला कि हम गंगा नदीं के ऊपर से गुजर रहे हैं। यह बालावाली का क्षेत्र था, जिसे उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश का सीमा विभाजक (बोर्डर रेखा) पुल माना जाता है। बरसाती जल में उफनती, वृहद जलराशि से समृद्ध गंगा नदी के विस्तार को हम यथासंभव कैमरे में केप्चर करते रहे, जिसकी एक झलक आप नीचे वीडियो में देख सकते हैं।

रास्ते में सफर के लगभग आधा-पौन घंटा बाद ही चाय-नाश्ता सर्व किया जाता है। एक प्लेट में चॉक्लेटी फ्लेवर का पॉपकार्न पैकेट, एक छोटा हल्दीराम का नमकीन पैकेट और गर्मागर्म कचौरी, साथ में टोमेटो सोस और कॉफी पाउच, इस किट में थे। रेलनीर पानी की बोटल भी रास्ते में सभी यात्रियों को थमा दी गई थी। इस तरह यात्रा की शुरुआत नाश्ते के एक बेहतरीन अनुभव के साथ होती है। परिचारक चॉक्लेट, मैगी आदि लेकर घूम रहे थे। साथ ही चाय व कोल्ड ड्रिंक्स भी। हमें लगा शायद सब मुफ्त में बाँटा जा रहा हो, लेकिन चाय का ऑर्डर देने के बाद पता चला कि इनकी कीमत बसूली जा रही थी। इस तरह सफर के साथ नाश्ता और रात का भोजन ही फ्री में था, जो कि टिकट बुकिंग के समय दिए विकल्प के चयन के आधार पर तय था। जिनका टिकट बुकिंग के दौरान यह ऑपशन छूट गया हो, वे उचित दाम चुका कर नाश्ता, डिन्नर आदि कर सकते हैं।

नई ट्रेन के नए अनुभव के साथ सफर आगे बढ़ता जा रहा था। दोनों ओर गाँव, खेत-बगीचों के वही हरे-भरे दृश्य स्वागत कर रहे थे। कहीं बरसात के जल से बने तालाब भी दिख रहे थे। जब रेल थोड़ा धीरे होती तो, यथा संभव बाहर के मनोरम दृश्यों को कैप्चर करने का प्रय़ास कर रहे थे। इस तरह शाम का अंधेरा छा रहा था और लो रात का भोजन भी आ गया। इसमें दो रोटी, पुलाव, दाल, पनीर सब्जी, सलाद व रसगुल्ला आदि थे। कुल मिलाकर भोजन पेटभराउ था, न अधिक न कम। साथ ही स्वादिष्ट और पौष्टिक भी।

रात का भोजन (Dinner)

वंदे भारत रेल की साफ-सफाई व्यवस्था काविले तारीफ लगी। प्रसाधन सुविधा में हवाई जहाज की तरह बायोवैक्यूम शौचालय बनाए गए हैं, जिनके साथ साफ-सफाई, की उचित व्यवस्था सुनिश्चित हो रही थी। जल और सोप सोल्यूशन की उचित व्यवस्था थी, जो प्रायः दूसरी रेलों में बहुत खस्ता हालत में रहते हैं। बाकि यात्रियों की भी जिम्मेदारी बनती है, कि सरकार द्वारा उपलब्ध सुविधाओं का सावधानी व जिम्मेदारी से उपयोग करते हुए इन्हें दुरुस्त रखने में मदद करें। यात्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से प्रत्येक डिब्बे में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

वंदे भारत रेल में जीपीएस सिस्टम लगा हुआ है, जो आने वाले स्टेशनों की जानकारी देता है। देहरादून से लखनऊ जंक्शन पर चलने वाली वंदे भारत रेल रास्ते में चार स्टेशन पर ही रुकती है – हरिद्वार, नजीबाबाद, मुरादाबाद और बरैली। बरैली और लखनऊ की राह में शाहजहाँपुर, हरदोई जैसे स्टेशन आते हैं, लेकिन रेल यहाँ नहीं रुकती। देहरादून से 2:25 PM पर छूटने वाली वंदे भारत का रास्ते में पहुँचने व छूटने का मानक समय कुछ इस तरह से है – हरिद्वार (3:26-3:31 PM), नजीबाबाद जन्कशन (4:17-4:19  PM) मुरादाबाद जन्कशन (5:40-5:45 PM), बरैली जन्कशन (7:00-7:02) और लखनऊ जन्कशन (10:40 PM)। इस तरह देहरादून से लखनऊ की कुल दूरी 544 किमी रहती है, जबकि हरिद्वार से कुल 492 किमी का रेल सफर तय कर हम मंजिल पर पहुँचते हैं।  

हरे भरे खेत बागानों से गुजरता रेल सफर

इस तरह हमारी वंदे भारत एक्सप्रेस औसतन 70 किमी प्रति घंटे के साथ मंजिल पर पहुँचती है। जबकि दावा किया जाता है कि यह ट्रेन 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के साथ यात्रा कर सकती है। जो भी हो इस रेल में यात्रा बहुत ही स्थिर व सुखद रही, कहीं झटकने लगने की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। फिर बड़े-बड़े सीसों की खिड़कियों से बाहर के नजारे दिन के उजाले में यात्रियों को मश्गूल रखते हैं और रात की टिमटिमाती रोशनियाँ भी एक नया अनुभव देती हैं।

इस तरह हम सात घंटे के सफर के बाद रात साढ़े दस बजे लखनऊ पहुँचते हैं। नई ट्रेन में यह यात्रा हमारे जीवन के सबसे सुखद और यादगार अनुभवों में से एक रही। हम अपने अनुभव के आधार पर यात्रियों को भारतीय रेल्वे की वंदे भारत सेवा में एक बार सफर का सुझाव दे सकते हैं, जो आपके जीवन का एक वेहतरीन अनुभव सावित होगा तथा किसी भी रुप में घाटे का सौदा नहीं लगेगा।
बाहर से वंदे भारत एकस्प्रेेस का नज़ारा

सोमवार, 30 जून 2025

हरिद्वार से कुल्लू, वाया बस, जून 2025 का एक यादगार सफर

 

हरिद्वार से कुल्लू, वाया बस, जून 2025 का एक यादगार सफर

प्रश्नों के चक्रव्यूह से बाहर निकालता एक यादगार सफर

हरिद्वार से कुल्लू का सफर कई बार कर चुका हूँ, लेकिन इस वार का सफर एक नई ताजगी व रोमाँच से भरा हुआ था। अमूमन हरिद्वार से हमारा लोकप्रिय सफर हिमधारा सेमी डिलक्स में सांय 4 बजे प्रारम्भ होता रहा है, जो चण्डीगढ़ से लेकर हिमाचल के मंडी तक रात के अंधेरे में ही तय होता रहा है और प्रातः नौ बजे तक अपने गन्तव्य तक पहुँचाता है। इस बार हम ट्रैब्ल प्लान का शीर्षासन करते हुए 14 जून 2025 के दिन प्रातः पौने पाँच बजे की बस में हरिद्वार से चढ़ते हैं, बस सामान्य श्रेणी की थी, लेकिन सीटें किसी भी रुप में सेमी डिलक्स से कम नहीं थी, बस में एसी की सुविधा नहीं थी, जिसकी पूर्ति रास्ते का हवादार सफर करता रहा।

बल्कि हरिद्वार से देहरादून तक के एक घंटे के सफर में तो ठंड़क अहसास होता रहा, लगा टोपा या मफलर साथ लिए होते, तो बेहतर रहता। आगे तो अपने टॉउल को सर पर लपेट पर काम चलाते रहे। ठीक सात बजे देहरादून से बस आगे बढ़ती है। राह के कई पड़ावों व खेत-खलिहानों को पार करते हुए हम पौंटा साहिव पहुँचते हैं। यहाँ यमुना नदी पर बना पुल और इसके वाईं ओर राइट बैंक पर दशम गुरुगोविंद सिंह जी के स्वर्णिम काल का साक्षी गुरुद्वारा पौंटा साहिब सदैव ही गहनतम भाव-श्रद्धा के साथ नतमस्तक करता है।

इसके आगे कुछ देर तक मैदानी क्षेत्र को पार करने के बाद क्रमिक रुप से पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश होता है और घाटी के शिखर पर नाहन की ओर बढ़ता सफर नीचे के विहंगम दृश्य से आल्हादित करता है। नीचे दूर-दूर तक फैली हरी-भरी घाटी और मार्ग की मनोरम दृश्यावली निश्चित रुप से सफर में नया रस घोल रही थी।

नाहन बस स्टैंड पर कुछ देर रुकने के बाद पहाड़ से नीचे उतरते हुए वाया अम्ब, नारायण गढ़ा आदि स्थानों से होते पंचकुला से चण्डीगढ़ शहर में प्रवेश होता है। सिटी ब्यूटीफुल के दर्शन निश्चित रुप में सदैव ही सुखद अनुभव रहता है। माँ चण्डी देवी के नाम से चण्डीगढ़ का शहर पड़ा है। जिसका मंदिर पास के चण्डीमाजरा स्थान पर है। यहाँ से गुजरते हुए आदिशक्ति का भाव सुमरण के साथ ही शहर में प्रवेश होता है।

रास्ते में आम के बगीचों के बीच काफी देर तक सफर एक नया अनुभव रहता है। इस बगीचे की कहानी तो मालूम नहीं, लेकिन इसके बीच सफर एक सुखद अहसास दिलाता है। मेहनतकश बागवानों की किसानी संघर्ष की याद दिलाता है।

थोड़ी देर में चण्डीगढ़ 43 सेक्टर पहुँचते हैं, जहाँ नया आइएसबीटी स्टेशन है। कुछ देर रिफ्रेश होने के बाद यहाँ से सफर आगे बढ़ता है। इस तरह आज दिन के उजाले में चण्डीगढ़ शहर के दर्शन करते हुए पंचकुला साइड से एंटर होते हैं और मोहाली साईड से बाहर निकलते हैं। चण्डीगढ़ को सिटी ब्यूटीफुल क्यों कहा जाता है, राह के प्राकृतिक नज़ारों, सुव्यवस्थित टॉउन प्लानिंग को देखकर स्पष्ट होता है। रास्ते में चौराहे पर बस के जाम में खड़ा रहने के चलते थोड़ा गर्मी का अहसास भी हो रहा था। बस स्टैंड पर पहुंच कर कोल्ड कॉफी के साथ इसकी कुछ भरपाई करते हैं।

दिन के उजाले में मोहाली से गुजरते हुए रुपनगर (रोपड़) को पार करते हैं, बीच में ब्यास-सतलुज नदी के सम्मिलित जल की नीली धारा वाली नहर को पार करते हैं और हमारी बस रुकती है, कीरतपुर के लगभग 4 किमी पहले....स्थान पर, जो पंजाबी जायके वाले ढावों के लिए प्रख्यात है। हमारी बस भी शुद्ध वैष्णों ढावे के सामने खड़ी होती है। यहाँ की पंजाबी थाली व अन्त में लस्सी के गिलास के साथ पूर्णाहुति करते हैं और यहाँ बाहर काउंटर पर खड़े बंधु से बात कर अपनी सहज जिज्ञासाओं को शांत करते हैं।

स्थान की विशेषता पूछने पर पता चला कि यह इलाका अन्न उत्पादन के लिए प्रख्यात है, क्योंकि यहाँ की उर्बर भूमि और जल की प्रचुरता के कारण ऐसा संभव रहा है। अतः यहाँ लोगों का प्रमुख पेशा अन्न उत्पादन के साथ ढावों के माध्यम से अपने उत्पादों का व्यवसाय है। अपनी गाय-भैंसों के साथ यहाँ दूर-दही व घी की भी प्रचुरता रहती है। अपने खेतों से साग-सब्जी व दाल आदि शुद्ध रुप में सहजता से उपलब्ध रहती है। जलस्रोत के रुप में पास बहती नहर व नदी है। इस प्राकृतिक जल व खाद्य उत्पादन के कारण संभवतः यहाँ के भोजन में एक विशेष स्वाद रहता है।

ढावे के परिसर में ही पास ग्रामीण परिवेश के मध्य खड़ी गाय, बछड़े के बूत राहगीरों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे। जहाँ सेल्फी के लिए लोगों की भीड़ लगी थी। खासकर महिलाएं बाल्टी हाथ में लेकर गाय को दुहने का अभिनय कर रही थी और रील बनाकर जीवन को धन्य अनुभव कर रही थी। बच्चे भी इसका पूरा आनन्द लेते दिख रहे थे। उनके लिए खेलने के लिए झूले से लेकर स्लाइडिंग स्लोप्स की मिनी पार्क जैसी सुविधा पास में थी। हालांकि यहाँ पर्याप्त गर्मी का अहसास हो रहा था, लेकिन ठंडी लस्सी के साथ इसको बैलेंस करते हैं।

भोजन से तृप्त होकर सभी बस में चढ़ते हैं और कुछ ही देर में कीरतपुर साहिब पार करते हैं। हमारे दिन में सफर करने का वास्तविक मकसद अगले कुछ मिनटों में पूरा होने वाला था। मालूम हो कि पुराना रुट वाया पहाड़ी के टॉप पर स्वारघाट, फिर कई घाटी-मोड़ व पुलों को पारकर बिलासपुर शहर, आगे घाघस तथा सतलुज नदी के उपर स्लापड़ पुल पार कर पूरा होता था। नया रुट पहाड़ों को खोदकर बनाई गई लगभग आधा दर्जन सुरंगों के कारण वाइपास वाला है, इससे सफर लगभग दो घंटे कम हो गया है। इस रुट पर पुराने कोई स्टेशन नहीं आते। बल्कि सतलुज नदी व इसके भाखडा बाँध पर रोकने से बनी गोविंद सागर झील (हालाँकि इस समय जल सामान्य स्तर पर था, सो झील का स्वरुप महज नदी के प्रवाह तक सीमित था)  की परिक्रमा करता हुआ एक नया अनुभव रहा।

रास्ते में पड़ते नए गाँव, खेत-खलिहान, पुल आदि हमारी पहली दृष्टि के लिए कौतुक का विषय थे, जानने की कोशिश कर रहा था कि पुराने रुट से हम कितना पास या दूर सफर कर रहे हैं। क्योकि बीच में एक तिराहें पर शिमला जाने का भी साइनबोर्ड लगा था। और आगे पुल को पार करते ही बिलासपुर शहर के भी दूरदर्शन हो रहे थे। इसके साथ स्पष्ट था कि हम बिलासपुर के एक दम दूसरी ओर सतलुज नदी के किनारे समानान्तर मार्ग से आगे बढ़ रहे थे।

जो पहाडियों के आंचल में बसे गाँवों-कसवों के मध्य आगे बढ़ता हुआ आगे एक टलस से गुजरता है। अब सामने घाघस की सीमेंट फैक्ट्री के दूरदर्शन हो रहे थे। अतः स्पष्ट था कि हम घाघस और सलापड़ के समानान्तर चल रहे थे। आगे पुनः एक सुरंग से गुजरते हुए हम हरावाग के पास कहीं पहुंचते हैं, जहाँ थोड़ी देर में आगे सुन्दरनगर शहर आता है। आगे का सफर पुराने मार्ग से होकर था। हालाँकि पता चला कि इसमें भी सुरंगे बन रहीं हैं और भविष्य में और शॉर्टकट वाइपास बनने बाले हैं।

आज हमारा सफर सुंदरनगर से नैर चॉक और फिर मंडी पहुंचता है। शाम हो चली थी। यहाँ से पंडोह की ओर बढ़ते हैं। फिर डैम को पाकर आगे सुरंग के रास्ते बाहर थलौट के पास निकलते हैं, अंत में एक सुरंग को पार कर आउट आता है, जिसका जिक्र हम एक अन्य ब्लॉग व वीडियो में कर चुके हैं। शाम का अंधेरा छा चुका था। आगे पनारसा, नगवाईं, बजौरा और भुंतर पार करते हुए ढालपुर मैदान और फिर कुल्लू आता है। बस मानाली जा रही थी, जो सेऊबाग राइट बैंक पौने नौ बजे पहुंचती है। वहाँ अपने भाई संग बाहन में नौ बजे घर पहुंचता हूँ। इस तरह सौलह-सत्रह घंटे का थकाउ किंतु यादगार बस का सफर पूरा होता है।

घर के सदस्यों को मिलने के बाद गर्मजल में स्नान के साथ सफर की थकान दूर होती है। और आज के सफर में नए रुट को दिन के उजाले में प्रत्यक्ष अनुभव कर रोमाँचित हो रहा था कि आज रुट का नक्शा मेरे दिमाग में क्लीयर हो गया है। जो पिछले कई वर्षों से मेरे लिए प्रश्नों से भरा हुआ एक चक्रव्यूह बना हुआ था।    

शुक्रवार, 30 मई 2025

देवप्रयाग की एक यादगार और रोमाँचक यात्रा

 

शिक्षा, संस्कार और उत्कृष्टता की त्रिवेणी

आज बहुत समय बाद देवप्रयाग तक जाने का संयोग बन रहा था। संयोग कहें, या की संगम का बुलावा। जॉलिग्रांट अस्तपताल में पारिवारिक उपचार के लिए गया था, ऑनलाइन संगोष्ठी में प्रतिभाग की योजना थी, लेकिन गोष्ठी के संयोजक डॉ. स्नेहीजी से संवाद के बाद परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि लगा ऑफलाइन ही इसमें प्रतिभाग करना बेहतर रहेगा और परिस्थितियाँ भी अनुकूल बनती गई। यह सब दैव कृपा व संगम तीर्थ का आवाह्न मान हम दोपहरी में सफर पर निकल पड़ते हैं।

साथ में युवा शिक्षक डॉ. दिलीप सराह थे। हरिद्वार से देवप्रय़ाग तक काफी अर्से बाद जा रहे थे, सो रास्ते में सड़कों पर हुए कार्य को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सड़कें काफी चौड़ी हो चुकी हैं, फोरलेन पर कार्य जोरों से चल रहा है। ऋषिकेश के पास वीकेंड के कारण थोड़ा जाम रहा, लेकिन आगे का सफर एक दम सपाट एवं सुखद रहा। एक-दो स्थान पर भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों पर चल रहे कार्य के कारण थोड़ा अबरोध अवश्य मिला। कुल मिलाकर हम सवा तीन घंटे में, साढ़े पाँच बजे तक देवप्रयाग पहुँच जाते हैं।

रास्ते में व्यासी, कोडियाला जैसे चिरपरिचित स्टेशन आते हैं, जहाँ यात्री चाय-नाश्ता के लिए रुकते हैं। फिर शिवपुरी आता है, जहाँ चम्बा की ओर से सुरकुंडा पहाड़ियों से निस्सृत हेम्वल नदी गुजरती है और गंगाजी में समा जाती है। इन्हीं के बीच बजी जंपिंग के कुछ प्रयोग चलते हैं, जो शाम की चमचमाती रोशनियों में एक अलग ही नज़ारा पेश करते हैं। यहीं से रिवर केंपिंग साइट्स तथा राफ्टिग की भी शुरुआत होती, जो बाहर से आए पर्यटकों के बीच साहसिक रोमाँच का एक लोकप्रिय शग्ल रहता है।

रास्ते में तीन पानी स्थान भी उल्लेखनीय हैं, जहाँ कभी जल के तीन स्रोत थे। हम भी एक स्रोत से जल भरते हैं, जल एकदम ठण्डा व स्वाद में भी बेहतरीन निकला। आगे रास्ते में रेलमार्ग के कार्य का भी दर्शन होता है, जहाँ स्टेशन के लिए वृहद संरचना जुटाई जा रही है और गंगाजी के पार सुरंग से रास्ता बनने की तैयारी दिखी।

रास्ते भर पहाड़ों के शिखर व आंचल में बसे घर-गाँव हमेशा की तरह हमे रोमाँचित करते रहे। प्रश्न एक ही उठता रहा कि बिमार होने पर यहाँ के लोग किस तरह अस्तपाल पहुँचते होंगे। और बच्चों के पढ़ाई की व्यवस्था कैसे होती होगी। हालाँकि अधिकांश गाँव तक सड़कों का जाल बिछा दिख रहा था, कुछ ही घर सड़कों से काफी दूर दिख रहे थे।

देवप्रयाग पहुँचते ही संगम के दूरदर्शन होते हैं, देवप्रयाग बस स्टेंड से पहले ही हमारा वाहन दायीं ओर मुड़ जाता है, सामने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का विहंगम परिसर ध्यान आकर्षित कर रहा था। हर यात्री यहाँ से गुजरते हुए इस नवनिर्मित विश्वविद्यालय के भव्य परिसर को देखते ही कुछ पल के लिए आश्चर्यचकित होकर स्तम्भित हुए बिना नहीं रह सकता।

थोड़ी देर में नीचे गंगा नदी पर पुल पार कर हम कुछ मिनट में विश्वविद्याल के गेस्ट हाउस के सामने पहुँचते हैं, जो संभवतः परिसर का पहला भवन भी है। यहाँ फ्रेश होकर हम बाहर कैंपस के दर्शन के लिए निकलते हैं। शहर के प्रदूषण से दूर यहाँ के एकांतिक परिसर की शुद्ध आवोहवा किसी वरदान से कम नहीं लग रही थी। कैंपस की लोकेशन ऐसी जगह है, जहाँ हर पल हवा के तेज झौंके बहते रहते हैं। इस गर्मी के मौसम में तो यह बहुत सुकूनदायी लग रहा था लेकिन हम कल्पना सर्दी के मौसम की कर रहे थे, जब यहाँ विचरण करना काफी चुनौतीपूर्ण रहता होगा।

सड़क के नीचे अकादमिक ब्लॉक के भव्य भवन दिखे, सड़क के ऊपर पहाड़ी के आंचल में हॉस्टल के दर्शनीय भवनों की श्रृंखला तथा बीच में खेल का चौड़ा मैदान। साईड़ में नीचे दक्षिण की ओर स्टाफ क्वार्टर। शाम हो चुकी थी, कैंपस की कैंटीन व स्टोर बंद हो चुके थे। सो हम कैंपस के बाहर निकल कर थोड़ा नीचे मार्केट में पहुँचते हैं। साबुन सर्फ आदि दैनिक आवश्यकताओं के कुछ सामान खरीदते हैं। थोड़ा नीचे अलकनंदा नदी पर एक पुराना पुल दिख रहा था, उस तक पहुँचने का भी दुस्साहस कर बैठते हैं, लेकिन पुल के बीच से नीचे संगम काफी दूर लगा, सो दूर से ही प्रणाम कर उलटे पाँव बापिस होते हैं और राह की खड़ी चढ़ाई के संग कैंपस तक पहुँचते हैं।

ऐसे में कपड़े पसीने से तर हो चुके थे। फ्रेश होकर गर्मागर्म चाय पीते हैं। गेस्ट हाउस में किचन, दूध, चाय पत्ती, व चीनी आदि की उम्दा व्यस्था थी। साथ में आए डॉ. दिलीपजी की चाय बनाने की विशेषज्ञता से आज परिचित हुए। एकाउटेंसी से जुड़े होने के कारण वे चाय के अभ्यस्त हैं और चाय बनाने में भी एक्सपर्ट। थके होने पर उम्दा चाय की प्याली निसंदेह रुप से सदैव एक तरोताजा करने वाला अनुभव रहती है। सो दो दिन इसका भरपूर लाभ लेते रहे। हम यहाँ चाय की वकालत नहीं कर रहे, इसके अन्य स्वस्थ विकल्प भी आजमाए जा सकते हैं, लेकिन देश, काल परिस्थिति के अनुरुप अपने यथार्थ का यहाँ वर्णन कर रहे हैं।

सांय एक सत्र फेकल्टी डेवेल्पमेंट पर होता है, विषय था – शिक्षकों का सर्वांगीण विकास एवं गुणवत्तापरक शिक्षा। लेक्चर से अधिक यह अपने अनुभवों को साझा करने का उपक्रम था, जिसे लगा सभी प्रतिभागियों ने बेहतरीन ढंग से ह्दयंगम किया।

रात को भोजनोपरान्त गेस्ट हाउस में शयन का क्रम बनता है। गेस्ट हाउस की वाल्कनी से नीचे वालगंगा के दर्शन प्रत्यक्ष थे। थोड़ी ही दूरी में भगीरथी और अलकनन्दा के संगम होता है, जो हॉस्टल से दृश्य नहीं था, लेकिन यहाँ गंगा मैया का बालरुप हमारे सामने से कुछ दूरी पर प्रत्यक्ष प्रवाहमान था। हम वाल्कनी में इसका दर्शन कर धन्य अनुभव कर रहे थे। और संगम की तीर्थ चेतना की ऊर्जा यहाँ तक जैसे हमारी रुह को स्पर्श कर रही थी। सामने पहाड़ों में बसे गाँवों की टिमटिमाती रोशनी हमें अपने गृह प्रदेश में बचपन की यादों को ताजा कर रही थी। ऐसा ही दृश्य पिछले वर्ष गंगोत्री धाम यात्रा के दौरान धराली (कल्प केदार) से सामने मुखबा गाँव के हुए थे।

इन्हीं भावों के सागर में गोते लगाते हुए रात बीती। कल की तैयारियाँ भी चल रही थी, सो रात को शयन में थोड़ा विलम्ब हो जाता है, लेकिन नींद में उपरोक्त भाव हॉवी रहे। औऱ प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में ही उठने का क्रम बनता है। स्नान, ध्यान व अपनी अकादमिक तैयारी के साथ फिर थोड़ा विश्राम करते हैं। छः बजे चाय की चुस्की के साथ बाहर मोर्निंग वाक होती है। पहाड़ियों से घिरे विश्वविद्याल के कैंपस और नीचे देवप्रयाग के संगम, उस पार तमाम पहाड़ी गाँव, सबका मनोरम दृश्य निहारते हुए आज की प्रातः हमारे लिए एक अद्वितीय एवं यादगार अनुभव थी, जो चिरकाल तक अंकित रहेगी।

इसी क्रम में नाश्ता के बाद दिन की बाकि प्रस्तुतियाँ होती हैं। एक एनईपी-2020 के अनुरुप पाठ्यक्रम निर्माण और आउटकम आधारित शिक्षा पर तथा दूसरी मूल्यपर शिक्षा, स्व-नेतृत्व व अकादमिक-प्रशासनिक उत्कृष्टता पर थी। ब्लॉग लेखन पर भी एक रोचक सत्र चला, जिसमें लगभग सभी प्रतिभागियों के ब्लॉग तैयार हो गए थे। सत्र समाप्ति के बाद सबसे विदा लेते हुए हम हॉस्टल आते हैं। लगा कि परिसर में जैसे हम शिक्षा, संस्कार और उत्कृष्टता की त्रिवेणीं में डुबकी लगा रहे हैं। हालाँकि ये एक बीजारोपण जैसा संयोग लगा, जिसकी सुखद परिणतियाँ तो काल के गर्भ में छिपी हुई हैं।

यहाँ पिछले आगमन का भी संक्षिप्त चर्चा करना चाहूँगा, जब हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रविंद्र बर्तवालजी के निमन्त्रण पर भारतीय संदर्भ में शोध-अनुसंधान एवं भाषाई विमर्श (हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी एवं लोक भाषा के संदर्भ में) विषय पर एक गोष्ठी के अंतर्गत 30 जनवरी, 2017 के दिन यहाँ आए थे। हालाँकि तब यह परिसर निर्माणाधीन था और उस पार ही सड़क के किनारे एक होटल में कार्यक्रम हुआ था।

शाम को ही आज बापिसी का क्रम था। सो अपने वाहन से नीचे पुल से होते हुए गंगा नदी के किनारे इसे रोकते हैं। दो पुल पार कर संगम तक पहुँचते हैं। राह के परिक्रमा पथ का वीडियो आप नीचे देख सकते हैं और रास्ते के मनोरम दृश्य को अनुभव कर सकते हैं, जहाँ एक ओर श्रीनगर की ओर से आ रही अलकन्दा नदी को पार करते हुए नीचे देवप्रयाग संगम का विहंगम दृश्य दर्शनीय है तो ऊपर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का भव्य परिसर।

संगम का दृश्य को स्वयं में मनोहारी था, तीर्थ चेतना की ऊर्जा से आवेशित। इसमें डुबकी लगा कर लोग धन्य अनुभव कर रहे थे। हम तीर्थ का पावन जल साथ लाते हैं। यहाँ सूर्य और चंद्र गुफा के भी दर्शन किए और बापिस वाहन में आते हैं। रास्ते में ही भगवान राम का मंदिर पड़ता है। मान्यता है कि रावण के बध के पश्चात प्रायश्चित स्वरुप वे यहाँ रुक कर प्रायश्चित तप किए थे। देवप्रयाग और ऋषिकेश के मध्य वशिष्ट गुफा पड़ती है। लक्ष्मण झूला के पास लक्ष्मण तथा ऋषिकेश में भरत व शत्रुधन की तपःस्थली मानी जाती है।  

बापिसी में पुल को पार करते हुए केंदीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर के विहंगम दर्शन होते हैं। इसको विदा करते हुए, यादगार स्मृतियों के साथ अपने गन्तव्य की ओर कूच करते हैं। रास्ते भर गढ़वाल हिमालय की पहाडियों के मध्य सफर का रोमाँचक अनुभव लेते रहे। आप भी नीचे के वीडियो को देखकर इसमें भागीदार बन सकते हैं। कहीं नीचे घाटी में गंगाजी के दर्शन होते हैं, तो कहीं लंगूर सड़क के किनारे दिन भर की थकान मिटा रहे थे।

रास्ते में हमारे चालक रवि राह में पड़ने वाले पर्यटक स्थलों के प्रति हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करते रहे, जिनका जिक्र हम यात्रा के प्रारम्भ में भी कर चुके हैं। इस तरह शिवपुरी के पास के बजी जंपिग साइट, राफ्टिंग जोन, कोडियाला-ब्यासी, दुगढ़ा (नीरझरना) आदि से होकर ऋषिकेश पहुँचते हैं, जहाँ शहर की टिमटिमाती रोशनियाँ गंगाजी में एक अद्भुत दृश्य पेश कर रही थी। ऋषिकेश के ट्रेफिक को पार कर हम रात सवा नौ तक विश्वविद्याल परिसर पहुंचते हैं।

सफर का सार यह रहा कि सरकार जिस तरह से सड़कों पर कार्य कर रही है वह सराहनीय है। इससे सफर का समय कम हो रहा है और अधिक सुकूनदायी भी बन रहा है, बस ध्यान साबधानी पूर्वक ड्राइविंग का है। रेल्वे ट्रेक खुलने से पर्यटन का नया अध्याय शुरु होने वाला है। गंगा में राफ्टिंग व अन्य पर्यटन को थोड़ा इकोफ्रेंडली बनाने की आवश्यकता है। जिम्मेदार पर्यटन समय की माँग है। बाकि अकादमिक कार्यक्रम एवं आदान-प्रदान होते रहने चाहिए, जिससे हमारे शिक्षक श्रेष्ठतम शिक्षा के साथ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्टता की ओर बढ़ते हुए एक सशक्त भारत, समृद्ध प्रदेश एवं संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण की परिकल्पना को साकार कर सके। पूरा विश्व आशाभरी निगाहों से भारत की ओऱ देख रहा है।

देवप्रयाग से ऋषिकेश तक का वीडियो नीचे देख सकते हैं -

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