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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-4



बनतौली से नानू चट्टी

मालूम हो कि मार्कंडगंगा बुढ़ा केदार की ओर से नीचे प्रवाहित होती हैं, जबकि मधुगंगा मदमहेश्वर की ओर से। संगम पर कुछ पल मधुगंगा और मार्कंडगंगा का आलौकिक दृश्य निहारते हुए विश्राम करते हैं। और फिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर बसे बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे।

यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे। रांसी से गौंदार व संगम तक पिछले 6 किमी की उतराई के बाद अब चढ़ाई के संग यात्रा का पहला अनुभव मिल रहा था। साथ ही रास्ते से नीचे संगम व दूर गौंदार साइड के दर्शन हो रहे थे। हम नीचे लगभग 5000 फीट की ऊँचाई से चढना आरम्भ किए थे व हर दो किमी पर औसतन एक हजार फीट ऊंचाई चढ़ रहे थे। अगले 10 किमी में हम लोग लगभग 5000 फीट से अधिक ऊंचाई चढ़ने वाले थे। इसीलिए इस ट्रेक को केदारनाथ ट्रेक से अधिक टफ माना जाता है।

बनतौली-2 में भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं, जहाँ परौंठा, अचार, घर की दहीं और चाय के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं। संयोग से बापिसी में अगले दिन भी यही हमारे रात के रुकने का ठिकाना बनने वाला था। पेटभराऊ नाश्ते के बाद बनतौली से हमारा मदमहेश्वर की ओर का सफर शुरु होता है।

प्रारम्भ में ही बनतोली से दूसरी लम्बी जिगजैग सड़क के  किनारे स्थान-स्थान पर लोगों को खड़े देखा। शुरु में लोगों का यह जमाबड़ा समझ नहीं आया। लेकिन थोड़ी देर में पता चला कि यहाँ से नेटवर्क ठीक-ठाक चल रहा था। निश्चित ही सभी अपने घर-परिवार को अपनी यात्रा की कुशल-क्षेम का संदेश साझा कर रहे थे, क्योंकि आगे नेटवर्क बाधित होने वाला था। यहीं पर महमहेश्वर से आ रहे पर्यटकों से अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने की कवायद भी शुरु हो गई थी।

इस छोर पर एक बड़ी सी चट्टान के बीच से रास्ते आगे खुलता है। इससे ठीक आगे दायीं ओर एक बालक बुराँश व कोल्ड ड्रिंक्स का ठेला लगाए था। संयोग से ठीक इसके सामने सड़क के दूसरी ओर बुराँश का एक युवा पेड़ दिखा, हालांकि अभी इसमें फूल नहीं थे। फूलों का सीजन समाप्त हो चुका था, जो अमूनन अप्रैल अंत से मई तक रहता है। बुराँश के पहले पेड़ के दर्शन के साथ मैं रोमाँचित था, क्योंकि इसके गहरे हरे लम्बे पत्तों के गुच्छ इसको विशेष बनाते हैं और इसके फूलों के साथ बचपन की गई यादें जुड़ी हुई हैं, सो इसको देखकर उन सुखद स्मृतियों का उभरना स्वाभाविक था। यह भी मालूम हो कि बुराँश बर्फिली ऊँचाईयों में ही उगता है, जिसके सुर्ख लाल रंग के फूल देखते ही बनते हैं। इनसे चटनी से लेकर जूस तैयार होते हैं, जिन्हें औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।

यहाँ एक कुर्सी पर बैठकर बुराँश का एक गिलास पीते हैं, जो पूरी तरह से स्वाद में लाजबाव और तृप्तिदायक रहा। आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे कितने जिज्ञासु यात्रियों को भी बुरांश के लाभ व इसके पेय के लिए प्रेरित करता रहा, लगा कि बापिसी में यहाँ से बुराँश की एक बोटल खरीद लूंगा।


यहाँ से तरोताजा होकर आगे बढ़ते हैं। इसके आगे रिंगाल का जंगल शुरु होता है। सड़क के दोनों ओर इनका हराभरा जंगल व संगसाथ अगले दो जिगजैग रास्ते तक मिलता रहा। इसके वाएं छोर पर अब मार्कंड गंगा के दर्शन हो रहे थे। जो ऊंचे पहाड़ों के होकर संकरी घाटी के संग पूरी गर्जन-तर्जन करती हुई मधुगंगा से मिलने उतर रही थी। अगले दो-तीन जिगजैग रास्तों तक वाईं ओर इसके दूरदर्शन व नैसर्गिक सांय-सांय करता निनाद हमारी यात्रा का सहचर बना रहा।

अब हम एक ऐसे मोड़ पर थे, जहाँ मार्कंडगंगा के दर्शन नहीं हो रहे थे, बल्कि दायीं ओर से मधुगंगा की गर्जन-तर्जन सुनाई दे रही थी। यहाँ हम एक ऐसे बिंदु पर थे जहाँ एक साथ देवदार, बुराँश, चीड़, रिंगाल, बाँज के वृक्षों व कुछ पहाड़ी लतादार झाडियों के दर्शन हो रहे थे। पृष्ठभूमि में मार्कण्ड गंगा की ओर के बादल से ढके बर्फ से ढके पहाड़ झाँक रहे थे।

यहाँ पास के एक सरकारी टीन शेड़ में विश्राम के लिए रुकते हैं। कई यात्री यहाँ विश्राम कर रहे थे व हल्की रिफ्रेशमेंट ले रहे थे। यहाँ वाएं कौने पर बाहर एक बड़ा सा हरा-भरा छायादार पेड़ हवा में अपने बड़े व चौड़े पत्तों को फहरा रहा था, जो हमारे लिए नया था व इसका नाम पता नहीं चल पाया। रिफ्रेश होकर हमलोग यहाँ से आगे चल देते हैं।

आगे की चढ़ाई को पार करने के बाद अगला स्टेशन था खट्टरा चट्टी पहुँचते हैं, जिसे हम अनजाने में रास्ते भर खटारा बोल रहे थे। यहाँ समतल मैदान पर दो-चार भवन बने थे। हाँ रास्ते में पिछले मोड़ पर कुछ तम्बू सड़क के ऊपर-नीचे सजे थे, जो राहगीरों के विश्राम-भोजन एवं रात को रुकने की उचित व्यवस्था किए थे। खट्टरा के गेस्ट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी। यात्रियों के लिए बाहर आंगन में तम्बु भी सजे थे।

बाहर थोड़ा आगे पानी के सिलेंडर आकार की सिमेंट टंकी दिखी, जिसमें एक लकड़ी से छेद बन्द कर रखा था और इसके खोलने पर पानी की धार बह निकलती। यहीं से अपनी प्यास बुझाकर और फिर पानी की बोतल को भर आगे बढ़ चलते हैं। यहीं छायादार पेड़ के नीचे कुछ लोग विश्राम कर रहे थे। मालूम हो कि बनतोली से लेकर महमहेश्वर तक रास्ते में कोई पानी का चश्मा नहीं मिला। ऊँचाई में किसी चश्मे के प्राकृतिक जल स्रोत से पाइप के सहारे पूरी लाइन में जल का वितरण हो रहा था, ऐसा समझ में आया।

खट्टरा से लेंडस्केप में कुछ नयापन दिखता है। एक तो भवनों के नीचे मधुगंगा की ओर ढलान पर छोटे-छोटे खेत दिखे, संभवतः यहाँ आलू व अन्य सब्जियों को उगाते होंगे। दूसरा यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने मधुगंगा के प्रवाह की रेखा और पूरी घाटी के दर्शन होते हैं, जिसका नज़ारा फिर कून चट्टी से थोड़ा पहले तक अलग-अलग एंग्ल से पथिकों के मन को लुभाता रहता है।

मधुगंगा के उस पार संकरी घाटियों में नदी से बना एक बड़ा सा झरना मधुगंगा में प्रवाहित हो रहा था, जिसकी शोर करती वृहद दुधिया जलराशि के दर्शन इस पार से ही हो रहे थे। और थोड़ा आगे बढ़ने पर इनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियों के दर्शन आल्हादित करते हैं।


महमहेश्वर की ओर के दर्शन अभी नदारद थे। अभी हम अगले स्टेशन नानू चट्टी के दर्शन के लिए वेताब थे, जो अभी दृष्टि से ओझल थी।

खट्टरा से नानू चट्टी मात्र दो किमी आगे बतायी गयी थी, लेकिन खड़ी चढ़ाई के संग चढ़ते-चढ़ते लगा कि 2 किमी खत्म ही नहीं हो रहे। रास्ते में दो-तीन चाय-नाश्ते के ठिकाने भी मिले, लेकिन नानू चट्टी दृष्टि से ओझल ही रही। नानू चट्टी कितनी दूर है, तो ऊपर से नीचे आ रहे यात्रियों का एक ही उत्तर रहता कि बस आने वाली है, थोड़ी दूर है। लेकिन नानू चट्टी के दर्शन ही नहीं हो रहे थे। थकान कुछ इस कदर हावी हो रही थी कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने विश्रामस्थलों पर बैठ जाते। चट्टानी आसन पर बैठ नीचे मधुगंगा की सांय-सांय ध्वनि व उधर से इसमें गिरते झरनों को निहारते रहते।

अगले पडाव में एक बड़े से बाँज वृक्ष के नीचे आराम करते हैं, जिसकी सघन छाया में कई लोग विश्राम कर रहे थे। नीचे तो सीधी मधुगंगा की खाई थी, लेकिन उस पार के नजारे खुबसूरत थे। अगले मोड़ पर सड़क टूट गई थी, इस पर स्थानीय मिस्त्रियों द्वारा काम चल रहा था।

इसके अगला मोड़ पार कर एक समतल स्थान पर बैठते हैं, जहाँ से नीचे पास के जंगल का नजारा दर्शनीय लग रहा था। थकान के बीच इन दृश्यों को निहारते हुए नई ऊर्जा पाते रहे और अगले पड़ाव पर देवदार का छोटा सा जंगल दिखा, जिसे देख मन प्रमुदित हुआ, क्योंकि ऐसा नजारा अभी तक नहीं दिखा था। नीचे से कुछ साहसी लोग शॉर्टकट की खड़ी चढ़ाई से भी आ रहे थे, लेकिन इनमें से कुछ लोगों की हालात देखकर लग रहा था कि एक  कदम की चूक कितनी भयंकर दुर्घटना में बदल सकती थी।

ऊप से नीचे गुजर रहे यात्रियों से आश्वासन मिला कि बस 80 मीटर आगे नानू चट्टी आने वाली है। सही कहें खट्टरा से नानू की 2 किमी की चढ़ाई में नानी याद आ रही थी। हालाँकि हमें लगा कि दूरी 2 किमी से अधिक थी। 3 किमी रही होगी। चढाई में 3 किमी पीठ में लदे बड़े बेग औऱ कंधे में टंगे दूसरे बैग के साथ हमारी उम्र के यात्री के लिए यह एक कठिन परीक्षा बन गई थी।

लगा कि इस रुट की माँग अधिक फिटनेस की माँग कर रही थी। हम अचानक बने इस प्रोग्राम में उठकर चल दिए थे, सोचा था कि अब तक का ट्रेकिंग अनुभव काम आएगा। जबकि इस रुट के लिए तीन-चार सप्ताह पहले आवश्यक फिजिक्ल फिटनेस की तैयारी की जानी थी। खैर अब आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे, आगे का रास्ता भी इसी तरह पार करना था।

रास्ते में कुछ संगीत प्रेमी लोग अलग-अलग संगीत यंत्रों में भजन से लेकर मनपसंदीदा फिल्मी गीतों की धुन के साथ आगे बढ़ रहे थे। हालाँकि वन विभाग का नोटिस खट्टरा के आसपास चस्पा था कि आप वन अभियारण क्षेत्र से गुजर रहे हैं और यहाँ किसी तरह का संगीत या शोर करना मना है, पकड़े जाने पर जुर्माना भी लिखा हुआ था। क्योंकि वन्य जीवन इससे परेशान हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके बारे में सचेत भी किया, वे मान भी गए। लेकिन आगे लगा कि भोले के भक्तों को हम इंसान क्या व कितना समझा सकते हैं, वे स्वयं ही समझा देंगे।

एक वस्ती के दर्शन होते ही लगा कि चिरप्रतिक्षित नानू चट्टी आ गई। लेकिन अभी भी वह थोडा दूर थी। हल्की बारिश शुरु हो गई थी। रास्ता थोड़ा फिस्लनभरा हो रहा था। यहाँ जल स्रोत के पास खच्चरों का झुण्ड अपनी प्यास बुझा रहा था।


हम भी ऊपर बने छत्तदार भवन में रुकते हैं। लेकिन वहाँ की भीड़ को देखकर लगा कि यहाँ किसी तरह की रिफ्रेशमेंट लेना काफी समय ले सकता है।

हमारी टीम के युवा साथी डॉ. सौरभजी तब तक पास में खच्चर वालों से मोलभाव कर रहे थे। पता चला कि एक खच्चर की कीमत हमारे बजन के व्यक्ति के लिए 5000 रुपए रहेगी। जो हमारी यात्रा के पूरे बजट से अधिक थी। लगा इससे तो बेहतर धीरे-धीरे चलते रहेंगे। अब आगे 2-3 किमी दूर कून चट्टी है और फिर 2-3 किमी पर मदमहेश्वर। बीच में डेढ़ किमी बाद एक अन्य चट्टी आने वाली थी। बैग का सामान आपस में एडजेस्ट करते हुए हमारा पीठ का बैग थोड़ा हल्का हो गया था। और हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे। (जारी...शेष अगले भाग-5, नानू से महमहेश्वर में)

सोमवार, 29 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-2

 

उखीमठ से रांसी

7 जून रविवार, 2026 - उखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर (4301 फुट) फीट की ऊँचाई पर बसा कस्बा है व यह सर्दियों के दौरान जब ऊंचाईयों में भारी बर्फवारी पड़ती है, तो उस दौरान भगवान केदारनाथ और भगवान मदम्हेश्वर के शीतकालीन प्रवास और पूजा स्थान के रुप में जाना जाता है। उखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर इसीलिए जाना जाता है। उखीमठ पौराणिक महत्व का स्थान भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। इसी कारण इस स्थान का नाम उषामठ पड़ा। मालूम हो कि उखीमठ ही चोपता, तुंगनाथ और देवरियाताल जैसे ट्रेकिंग, पर्यटन और तीर्थ स्थलों का मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

उखीमठ से आगे बढ़ते ही बाहर हवा में हिमालय टच वाला शीतल अहसास मिलना प्रारम्भ हो जाता है। हरी-भरी वादियों में प्रवेश के साथ लग रहा था कि हम एक नए परिवेश में आ गए हैं। रास्ते में गिरिया, मोनसुना मार्केट आते हैं। इस राह पर प्राकृतिक झरने स्वागत करते हैं।


रास्ते का प्राकृतिक दृश्य धीरे-धीरे अपने पूरे शबाव की ओर बढ़ता जा रहा था। सीढ़ीदार खेत, झरने, नाले और दूर पर्वतों की अंतहीन श्रृंखलाएं रास्ते को खुशनुमा बना रही थीं। मोनसुना मार्केट से बारिश से बचने के लिए एक रेनकोट खरीदते हैं।

आगे नीचे उतरते हुए एक पहाड़ी नदी पार करते हैं।


रास्ते में विराने में एक क्रिकेट मैदान ध्यान आकर्षित करता है। रांसी की ओर बढ़ता सफर एक नए प्रदेश में प्रवेश की सघन अनुभूति दे रहा था। सीढ़ीदार खेतों की अंतहीन श्रृंखला, घने जंगल, प्रकृति की गोद में बसे घर, आसमान छूते हरे-भरे पर्वत और सबसे ऊपर शहर के शौर-शराबे, किच-किच व प्रदूषण से रहित गाँव की शुद्ध आवोहवा और शांत एकांत परिवेश में स्वय को पाकर ऐसे लग रहा था कि कुछ दिन यहीं रुकें। एकांतिक रिट्रीट के लिए यह क्षेत्र एक आदर्श स्थल प्रतीत हो रहा था।

रास्ते में पहाड़ी कस्बे उनियाणा से होकर गुजरते हैं, जहाँ होमस्टे की बहुतायत दिखी। आगे खड़े पहाड़ को काटकर बनाए गई सड़क के साथ हम साढ़े चार बजे राँसी पहुंचते हैं।


यहां हल्के अभिसिंचन के साथ हमारा स्वागत होता है। पहले भवन पर ही हमारा वाहन खड़ा होता है, पास के ढावे के मालिक भट्ट साहब की सज्जनता और ईमानदारी को देखकर पहाड़ी मानुष का अक्स जेहन में कहीं गहरे छू जाता है। और यहीं चाय नाश्ते के लिए रुकते हैं।

थकान के चलते इसी ढावे में मैगी और चाय के लिए कहा, जिसका लाजबाव स्वाद देख हम लोग कायल हो गए। इनका पूरा परिवार इस कार्य़ में सहयोग दे रहा था। यहीं पर सामने कोमल टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग प्वाइंट में रुकने की भी व्यवस्था हो जाती है और यहीं रात के भोजन की भी बात पक्की कर लेते हैं।


साथ ही राँसी के बार में मोटा-मोटी जानकारी बटोर लेते हैं। पता चला कि राँसी की अधिष्ठाक्षी माता राकेशवरी देवी के दर्शन से आगे की यात्रा शुभ मानी जाती है। इन्हीं के दर्शन के बाद बाबा मदमहेश्वर के दर्शन फलित होते हैं। हो भी क्यों न, आखिर शिव-शक्ति के युग्ल से ही सृष्टि संचालित है और उन्हीं की कृपा से जीवन की पूर्णता सुनिश्चित होती है।

सो हम कमरे में सामान रखकर, फ्रेश होकर मंदिर में माता के दर्शन करने निकल पड़ते हैं। मुख्य मार्ग से मुश्किल से 300 मीटर ऊपर मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर के बाहर जूत्ता स्टैंड पर जुत्ते उतारते हैं, अंदर कौने में लगे वाश-वेसिन से हाथ धोकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।


मंदिर के पूजारी भट्ट साहब का सज्जनोचित्त एवं नेक व्यवहार प्रभावित करता है। मंदिर में विभिन्न विग्रहों से परिचय होता है। राकेश्वरी माता के साथ विष्णु भगवान, सत्यनारायण भगवान, मन्नणी माता, हनुमानजी, गणेशजी आदि के दर्शन होते हैं। पता चला कि मन्नणी माता का मूल स्थान यहाँ से 30 किमी ऊपर है, जो कठिन ट्रेक के बाद ही पूरा होता है। इसी स्थान पर भगवती ने महिषासुर का बध किया था।

राकेशवरी माता की पौराणिक कथा भी कम रोचक नहीं है। पता चला कि चंद्रदेव ने अपने दुराचार के पाप का प्रायश्चित यहीं पर किया था और माता की कृपा से अमृत तत्व की प्राप्ति हुई थी। इस तरह से प्रायश्चित तप की पौराणिक स्थली के रुप में इस मंदिर का महत्व स्वयं में महत्वपूर्ण है। नैष्ठिक साधक नौरात्रि में विशेषरुप से यहाँ आकर साधन-अनुष्ठान करते हैं।

राकेश्वरी माता के दर्शन के बाद हम बाहर परिसर में कुछ यादगार पलों को कैप्चर करते हैं। छोटे बच्चे परिसर में उछलकूद कर रहे थे। यहाँ से गाँव का नजारा देखने लायक था। प्रकृति की गोद में बसा एक पारंपरिक पहाड़ी गाँव स्वयं में परिपूर्ण प्रतीत हो रहा था। लोकल लोगों से बातचीत करने पर उनकी चिंता का अहसास भी हुआ। उनका मानना था कि गाँव का प्राकृतिक एवं पारम्परिक स्वरुप धीरे-धीरे खो रहा है। जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, व्यापार बढ रहा है, पारंपरिक सरलता तरलता धीरे-धीरे कम हो रही है।

रास्ते से मदमहेश्वर साइड का नज़ारा देखने लायक था। बर्फ से ढकी चोटियाँ, कुछ बादलों से ढकी व कुछ स्पष्ट।


जानकारों के अनुसार उन्हीं की गोद में नंदी कुंड है। मदहेश्वर बाबा यहाँ से नहीं दिखते। इनका क्षेत्र यहाँ से वाईं ओर पहाड़ों के पीछे पड़ता है। नीचे गहराई में पुष्पगंगा नदी और सीढ़ीदार खेत, सामने जंगलों से लदे पहाड़। लगा जैसे प्रकृति अपने सारे रुप दिखाने के लिए तत्पर थी।

पहले साफ मौसम, फिर अचानक नीचे घाटी से बादलों का उमड़ना गुब्बार और पूरा कस्बा इसमें समाहित। बादलों का गुब्बार हम सबको छूते हुए, आलिंग्न करते हुए पार हो जाता है। कुछ ही देर में उस पार पहाड़ी के शिखर से इंद्रधनुष के दर्शन। लगा जैसे प्रकृति अपनी सतरंगी छटा के साथ सारे रुपों का दर्शन करवाकर हमें कृतार्थ कर रही हो।  

अंत में यहां की मार्केट का अवलोकन करते हैं। रास्ते में बारिश से बचने के लिए जुत्तों की खोज करते हैं, लेकिन साइज के जुत्ते नहीं मिलते, सो मज़बूरी में प्लास्टिक की चप्पल खरीद लेते हैं, कि आपात में काम जाएगी। नहीं मालूम था कि यही आगे यात्रा का पासा पलटने वाली थी। यहीं से रिंगाल की मजबूत लाठी 50 रुपए में खरीदते हैं। फिर शहर के उस छोर पर आगे झरने तक जाते हैं।


बीच में टैंट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी।

खच्चरों पर रस्द सामग्री आगे जा रही थी। कुछ मिलाकर इस छोटे से पहाड़ी कसवे में यात्रियों की चहल-पहल देखने योग्य थी। जिनमें बंगाली ट्रेक्करों की बहुतायत दिखी। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर-प्रदेश, मध्य्-प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड व हिमाचल से भी यात्री दिखे। लोक्ल लोगों से बातचीत पर सुनने में आ रहा था कि अबकी बार मदमहेश्वर के लिए काफी पर्यटक व तीर्थयात्री आ रहे हैं। अगले साल से यह कहीं दूसरा केदार न बन जाए।

अपने होटल में आकर रात का भोजन करते हैं। रोटी, आलू की सब्जी, दाल और चाबल, साथ में आचार और पहाड़ी खीरे का सलाद।


भोजन से तृप्त होकर कमरे में रात को सो जाते हैं, सुबह तड़के जो आगे चलना था। रात को पुष्पगंगा के जल की सांय-सांय की ध्वनि नादयोग का अहसास दिला रही थी।

सुबह ब्रह्ममुहुर्त के अंधेरे में ही नींद खुल गई थीं। बाहर आकर देखते हैं कि अंधेरे में दूर व नीचे गाँव में रोशनी टिमटिमा रही थी।


सड़क में नीचे चहल-पहल थी। यात्री आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे। सुबह चार बजे ही जागरुक यात्री बढ़ निकलते हैं। हम भी टीम के साथ साढ़े पाँच बजे तक नहा धोकर, सन्ध्या वंदन कर टीम के साथ चल पड़ते हैं।

एक जीप प्रति व्यक्ति 30 रुपए के हिसाब से अगतोलिधार छोड़ती है, जो राँसी के आगे 2 किमी दूरी पर है। यही वाहनों का अंतिम पड़ाव है, यहाँ से आगे पैदल चलना पड़ता है। हाथ में छड़ी और पीठ में रक्सैक व कंधे पर बैग लिए कदम बढ़ रहे थे मदमहेश्वर की ओर। आज का पहला प़डाव था यहाँ से छः किमी दूर गौंडार गाँव। हम राँसी के 7000 फीट की ऊँचाई से गौंदार के 5000 फीट ऊंचाई तक उतरने वाले थे। और फिर यहाँ से 12,500 फीट की ऊँचाई तक 10 किमी चढ़ाई करने वाले थे। (जारी...शेष अगले खण्ड-3, रांसी से गौंदार में)

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-1


लुधियाना से उड़ीसा, तमिलमाड़ू

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना का मुख्य भवन

कॉलेज में बिताए स्वर्णिम दिनों में दक्षिण भारत की पहली यात्राएं उल्लेखनीय हैं। पहली उड़ीसा के कटक शहर की और दूसरी अन्नामलाई यूनिवर्सिटी की। कटक यात्रा में पहली बार महानदी और पुरी में सागर के दर्शन हुए थे। और अन्नामलाई की यात्रा में दक्षिण भारत के हिल स्टेशन ऊटी व कोडेक्नाल के साथ मैसूर, बैंगलोर व पाँडिचेरी की एक झलक पायी थी।

बाहरवीं के बाद हमें सौभाग्य मिला पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के कॉलेज ऑफ एग्रीक्चलचरल इंजीनियरिंग (COAE) में अध्ययन करने का। विश्वविद्यालय भारत के अग्रणी कृषि विश्विविद्यालयों में से एक है, जो कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार के लिए प्रसिद्ध है औऱ इसने भारत की हरित क्राँति में अहम भूमिका निभाई है। संयोग से हमारे पिताश्री भी इसे विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज के स्नातक रहे। विश्वविद्यालय लुधियाना में 494 एकड़ (और कुल 1793 एकड़) में फैला हुआ है।

उड़ीसा की पहली यात्रा संभवतः वर्ष 1988 के दौरान सम्पन्न हुई थी, जब हम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। यूनिवर्सिटी की वेटलिफ्टिंग टीम के सदस्य के रुप में हम इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता हेतु कटक विश्वविद्यालय गए थे। लगभग एक दर्जन युवा खिलाड़ियों की टीम कोच के साथ थी। इंजीनियरिंग कॉलेज से हम अकेले थे, कुछ वेटनरी कॉलेज से तथा अधिकाँश एग्रीक्लचर-हॉर्टिक्लचर कॉलेज से थे। सफर की यादें काफी धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन जेहन में अंकित स्मृतियों को कुरेदते हुए यहाँ कुछ रोचक एवं यादगार घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ।

हमारे साथ वेटलिफ्टिंग टीम में प्लस 110 किलो के सुपर हेवीवट केटेगरी में भाई दलजीत सिंह टीम में आकर्षण का विशेष केंद्र थे, जिन्हें हम प्यार से पहलवानजी कहते थे। दूर से ही उनका ढील-ढोल और चाल-ढाल देखकर पता चलता था कि पहलवानजी आ रहे हैं। उनकी डाइट भी उनके बजन के हिसाब से कुछ स्पेशियल थी। तीन दर्जन रोटियाँ, दर्जनों अण्डे व लीटरों के हिसाब से दूध उनकी खुराक रहती थी। उसी हिसाब से उनकी वेटलिफ्टिंग का अभ्यास रहता था।

याद है ट्रेन में केले बेचने वाला जब फल से भरी टोकरी लेकर आता है, तो रेट पूछने पर वह दर्जन के हिसाब से केले के दाम बताता है। लेकिन पहलवानजी अपने नाश्ते के हिसाब से पूरी टोकरी का रेट पूछ रहे थे। फेरी बाले ने जीवन में शायद पहली वार पूरी टोकरी को एक साथ बिकते देखा होगा। केले का साइज सामान्य से छोटा था, लेकिन विशेष स्वाद लिए थे। पहलवानजी एक बार में एक केला छील कर उदरस्थ करते और देखते-देखते पूरी टोकरी खाली कर गए। हमारे लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन फेरी वाले व ट्रेन में बैठे लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय था।

कटक पहुँचने पर महानदी के पुल के किनारे गुरुद्वारे में रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ से महानदी का विस्तार देखने योग्य था, जिसके ऊपर कई किमी लम्बा पुल बना था। यहाँ से स्टेडियम थोड़ी दूरी पर था। आसपास हर घर के साथ पानी का तलाब और साथ में नारियल के झुरमुट हमें बहुत दर्शनीय लगे। इनके साथ एक नए प्रारुप में ग्रामीण जीवन के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे। हालाँकि किसी के घर जाकर नजदीक से देखने का समय नहीं था, लेकिन इस नए प्रदेश के नए परिवेश व संस्कृति को देखकर कई प्रश्न उठ रहे थे कि क्या इन तालावों में मछलियाँ भी होती हैं। इनके जल का स्रोत क्या रहता है। इसकी शुद्धता कैसी रहती होगी व इसका उपयोग किन-किन रुपों में होता होगा। यह प्रश्न हमारे लिए अभी भी पूरी तरह उत्तरित नहीं हैं। समय मिलेगा तो एक बार इनको नजदीक से देखकर अवश्य जानना व समझना चाहूँगा।

वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में प्रतिभाग लेने के बाद हम सभी पुरी साइड के सी बीच (सागर तट) में भी भ्रमण किए, इसकी भी यादें धुधली सी हैं, जहाँ पर कुछ यादगार सामूहिक फोटोग्राफी होती है (इससे जुड़ी फोटो आज खो चुकी हैं, इन्हें इकट्ठा करने का प्रयास जारी है।) इस समय हमारा शारीरिक सौष्ठव अपने चरम पर था, क्योंकि इसी दौर में हम विश्वविद्यालय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में मिस्टर यूनिवर्सिटी बने थे।

उस दौर में शारीरिक फिटनेस के प्रति अपनी दिवानगी का जिक्र अवश्य करना चाहूँगा। खेल के प्रति हमारी निष्ठा अप्रतिम रही। कबड्डी से लेकर शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो जैसे पॉवर गेम्ज़ में हम प्रतिभाग करते रहे, लेकिन मुख्य खेल बॉडी बिल्डिंग ही चयनित था, साथ ही कोच के प्रोत्साहन में वेटलिफ्टिंग से भी जुड़ गया था। किशोरावस्था में स्वामी विवेकानन्द के युवाओं को संदेश में मुखरित मस्ल्ज़ ऑफ आयरन के आग्नेय वचन हमारे प्रेरक मंत्र बन चुके थे, जिसके अनुरुप पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एनएसओ (NSO-नेशनल स्पोर्टस ऑर्गेनाइजेशन) के अंतर्गत हमें अपने पैशन को पूरा करने का यहाँ स्वर्णिम अवसर मिला था।

खेल का मैदान व जिम हमारे लिए किसी मंदिर व तपःस्थली से कम नहीं था। क्या आँधी, क्या तुफान, क्या परीक्षा, क्या बारिश, हम शाम को ठीक साढ़े चार बजे ग्राउंड में पहुंच जाते थे। पहले बीस मिनट एथलेटिक ट्रेक पर राउंड के साथ वार्मअप करते और फिर जिम में प्रवेश करते। लगभग दो-अढ़ाई घंटे कोच के मार्गदर्शन में जिम में पसीना बहाते। इसके बाद योगासन के कुछ स्ट्रेचिंग आसन व शवासन आदि के साथ कूलडाउन करते। अंत में पसीने से तर-बतर वनियान को निचोड़ते, तो पसीने की धार झरने लगती।

इसके बाद यूनिवर्सिटी गेट के बाहर जेंटलमेन दी हट्टी में दूध का गिलास व गर्मागर्म जलेबी का सेवन होता। इसके साथ शारीरिक श्रम के साथ खर्च हुई ऊर्जा की कुछ भरपाई हो जाती। फिर हॉस्टल पहुँच कर स्नान-ध्यान के साथ अपनी सांयकालीन दिनचर्या आगे बढ़ती।

कॉलेज ऑफ एग्रीक्लचरल इँजीनियरिंग, PAU का प्रवेश द्वार

पढ़ाई के अंतिम वर्ष संभवतः सन 1989-90 के दौरान हमें फील्ड प्रोजेक्ट के तहत अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु भेजा गया, साथ में थे एग्रीक्लचरल इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक अंतिम वर्ष के लगभग एक दर्जन सहपाठी छात्र। हमें याद है कि लुधियाना से हम ट्रेन में चढते हैं और तमिलनाड़ू के चिदम्बरम स्टेशन पर उतरते हैं, जहाँ अन्नामलाइ विश्वविद्यालय सामने ही पड़ता है।

चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन प्रवेश द्वार

मालूम हो कि अन्नामलाई यूनिवर्सिटी तमिलनाड़ु के चिदंबरम में स्थित एक प्रमुख, सरकारी आवासीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना सन 1929 में हुई थी। 1000 एकड़ में फैला इसका परिसर कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व कला सहित विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करता है। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। 

यहीं एक होस्टल में हम लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ कर्मचारी हिंदी या पंजाबी अधिक नहीं समझते थे, अंग्रेजी भी कम ही समझ पाते थे। वे तमिल में ही अधिक बोलते थे। इसलिए अधिकांश संवाद इशारे में ही होते व किसी तरह काम चलाते। धीरे-धीरे हम पानी पीने से लेकर अभिवादन में उपयोग होने वाले दैनिक व्यवहार के कुछ शब्दों को सीख गए थे, जैसे वनक्कम, तन्नी कुडुङ्गा आदि। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों से तो अंग्रेजी में संवाद हो जाता था, हॉस्टल में थोड़ा कठिन रहता था।

बाहर दुकानदारों के साथ भी इशारों में अधिक बात होती थी। हमारे साथ पंजाब से आए सहपाठी अधिकाँशतः पंजाब से थे, जहाँ रोटी खाने का चलन अधिक है। वे चावल को अधिक पसन्द नहीं करते। होस्टल में उपलब्ध भोजन चाबल प्रधान ही रहता। इडली से लेकर डोसा, हर डिश में चाबल ही रहता। बड़ी मुश्किल से रोटी वाला ढाबा बाहर शहर में मिलता है और बीच-बीच में रोटी वाला भोजन करने वहाँ जाते। (...शेष अगली पोस्ट में)

अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु


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Stick to your heartfelt CONVICTION, rest assured!                   1.      Be aware of your Divine essence & Love yourse...