आधुनिक मनोविज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आधुनिक मनोविज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

खेल जन्म-जन्मांतर का है ये प्यारे

 

जब न मिले चित्त को शांति, सुकून, सहारा और समाधान

जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं, ऐसी घटनाएं घटती हैं, ऐसी समस्याओं से जूझना पड़ता है, जिनका तात्कालिक कोई कारण समझ नहीं आता और न ही त्वरित कोई समाधान भी उपलब्ध हो पाता। ऐसे में जहाँ अपना अस्तित्व दूसरों के लिए प्रश्नों के घेरे में रहता है, वहीं स्वयं के लिए भी यह किसी पहेली से कम नहीं लगता।

यदि आप भी कुछ ऐसे जीवन के अनुभवों से गुजर रहे हैं, या उलझे हुए हैं, तो मानकर चलें कि यह कोई बड़ी बात नहीं। यह इस धरती पर जीवन का एक सर्वप्रचलित स्वरुप है, माया के अधीन जगत का एक कड़ुआ सच है। वास्तव में येही प्रश्न, ये ही समस्याएं, येही बातें जीवन को ओर गहराई में उतरकर अनुसंधान के लिए प्रेरित करती हैं, समाधान के लिए विवश-वाधित करती हैं।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक व्यवहार में व्यक्तित्व की परिभाषा खोजने वाला आधुनिक मनोविज्ञान मन की पहेलियों के समाधान खोजते-खोजते फ्रायड महोदय के साथ वीसवीं सदी के प्रारम्भ में मनोविश्लेषण की विधा को जन्म देता है। फ्रायड की काम-केंद्रित व्याख्याओं से असंतुष्ट एडलर, जुंग जैसे शिष्य मनोविश्लेषण कि विधा में नया आयाम जोड़ते हैं। इनके उत्तरों में अपने समाधान न पाने वाले मैस्लो मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं (Hierarchy of Needs) की एक श्रृंखला परिभाषित कर जाते हैं, जिनमें अध्यात्म को भी स्थान मिल जाता है।

इससे भी आगे जीवन को समग्रता में समझने की कोशिश में मनोवैज्ञानिक आध्यात्मिक मनोविज्ञान पर शोध-अनुसंधान कर रहे हैं। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व योग-मनोविज्ञान के रुप में अष्टांग योग का एक व्यवहारिक एवं व्यवस्थित राजमार्ग उद्घाटित किया था, जिसका अनुसरण करते हुए व्यक्ति अपने जीवन की पहेली को सुलझा सके। क्योंकि यह कोई बौद्धिक तर्क-वितर्क तक सीमित विधा नहीं, बल्कि जीवन साधक बनकर अस्तित्व के साथ एक होने व जीने की पद्वति का नाम है।

यहाँ हर घटना कार्य-कारण के सिद्धान्त पर कार्य कर रही है। हम जो आज हैं, वो हमारे पिछले कर्मों का फल है और जो आज हम कर रहे हैं, उसकी परिणति हमारा भावी जीवन होने वाला है। वह अच्छा है या बुरा, उत्कृष्ट है या निकृष्ट, भव्य है या घृणित, असफल है या सफल, अशांत-क्लांत है या प्रसन्न-शांत – सब हमारे विचार-भाव व कर्मों के सम्मिलित स्वरुप पर निर्धारित होना तय है।

यही ऋषि प्रणीत कर्मफल का अकाट्य सिद्धान्त ईश्वरीय विधान के रुप में जीवन का संचालन कर रहा है। यदि हम पुण्य कर्म करते हैं, तो इनके सुफल हमें मिलने तय हैं और यदि हम पाप कर्म करते हैं, तो इनके कुफल से भी हम बच नहीं सकते। देर-सबेर पककर ये हमारे दरबाजे पर दस्तक देते मिलेंगे। इसी के अनुरुप स्वर्ग व नरक की कल्पना की गई है, जिसे दैनिक स्तर पर मानसिक रुप से भोगे जा रहे स्वर्गतुल्य या नारकीय अनुभवों के रुप में हर कोई अनुभव करता है। मरने के बाद शास्त्रों में वर्णित स्वर्ग-नरक का स्वरुप कितना सत्य है, कुछ कह नहीं सकते, लेकिन जीते-जी शरीर छोड़ने तक इसके स्वर्गोपम एवं मरणात्क अनुभवों से गुजरते देख स्वर्ग-नरक के प्रत्यक्ष दर्शन किए जा सकते हैं।

दैनिक जीवन की परिस्थितियों, घटनाओं व मनःस्थिति में भी इन्हीं कर्मों की गुंज को सुन सकते हैं और गहराई में उतरने पर इनके बीजों को खोज सकते हैं। नियमित रुप से अपनाई गई आत्मचिंतन एवं विश्लेषण की प्रक्रिया इनके स्वरुप को स्पष्ट करती है। कई बार तो ये स्वप्न में भी अपनी झलक-झांकी दे जाते हैं। दूसरों के व्यवहार, प्रतिक्रिया व जीवन के अवलोकन के आधार पर भी इनका अनुमान लगाया जा सकता है। एक साधक व सत्य-अन्वेषक हर व्यक्ति व घटना के मध्य अपने अंतर सत्य को समझने-जानने व खोजने की कोशिश करता है।

जब कोई तत्कालिक कारण नहीं मिलते तो इसे पूर्व जन्मों के कर्मों से जोड़कर देखता है औऱ जन्म-जन्मांतर की कड़ियों को सुलझाने की कोशिश करता है। यह प्रक्रिया सरल-सहज भी हो सकती है औऱ कष्ट-साध्य, दुस्साध्य भी। यह जीवन के प्रति सजगता व बेहोशी पर निर्भर करता है। माया-मोह व अज्ञानता में डूबे व्यक्ति के जीवन में ऐसे अनुभव प्रायः भुकम्प बन कर आते हैं, शॉकिंग अनुभवों के आँधी-तुफां तथा सुनामी की तरह आते हैं तथा अस्तित्व को झकझोर कर जीवन व जगत के तत्व-बोध का उपहार दे जाते हैं।

इन्हीं के मध्य सजग साधक समाधान के बीजों को पाता है, जबकि लापरवाह व्यक्ति दूसरों पर या नियति या भगवान को दोषारोपण करता हुआ, इन समाधान से वंचित रह जाता है। वस्तुतः इसमें स्वाध्याय-सतसंग से प्राप्त जीवन दृष्टि व आत्म-श्रद्धा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। और इनके साथ गुरुकृपा व ईश्वर कृपा का अपना स्थान रहता है। अतः आत्म-निष्ठ, ईश्वर परायण व सत्य-उपासक साधक कभी निराश नहीं होते। गहन अंधकार के बीच भी वे भौर के प्रकाश की आश लिए आस्थावान ह्दय के साथ दैवीय कृपा के प्रसाद का इंतजार करते हैं और देर-सबेर उसे पा भी जाते हैं।

चुनींदी पोस्ट

प्रबुद्ध शिक्षक, जाग्रत आचार्य

            लोकतंत्र के सजग प्रहरी – भविष्य की आस सुनहरी    आज हम ऐसे विषम दौर से गुजर रहे हैं, जब लोकतंत्र के सभी स्तम्...