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बुधवार, 8 मई 2024

भावयात्रा - गिरमल देवता संग तीर्थ-स्नान यात्रा का रोमाँच, भाग-1


बनोगी से मणीकर्ण तीर्थ एवं बापसी वाया मलाना

तीर्थयात्रा का सबसे रोमाँचक एवं यादगार पड़ाव - दिव्य लोक में विचरण की अनुभूति

25 अप्रैल से 2 मई 2024

भाग-1

दिन 1 – पनाणी शिला से हाअंणीथाच,

दिन 2 – हाअंणीथाच से सूमा रोपा, मणिकर्ण घाटी

दिन 3 – सूमारोपा से मणिकर्ण तीर्थ,

भाग-2

दिन 4 – मणिकर्ण तीर्थ से रसोल टॉप की ओर,

दिन 5 – रसोल टॉप के नीचे से मलाणा गाँव,

भाग-3

दिन 6 – मलाणा गाँव से दोहरा नाला

दिन 7 – दोहरा नाला से नरेंइंडी

दिन 8 – नरेंइंडी से बनोगी एवं घर

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भाग - 1 

बनोगी से मणीकर्ण तीर्थ वाया पीणी-कसोल

देवभूमि कुल्लू-मणीकर्ण हिमालय की दिलकश वादियों में

दिन 1 – पनाणी शिला से हाअंणीथाच

दिन 2 – हाअंणीथाच से सूमा रोपा, मणिकर्ण घाटी

दिन 3 – सूमारोपा से मणिकर्ण तीर्थ

कुल्लू घाटी में ठारा करड़ु देवी-देवताओं का विशेष महत्व है, जिन्हें कुल्लू घाटी के मूल या आदि देवता माना जाता है। इनकी कहानी जमलू देवता (ऋषि जमदग्नि) के साथ प्रारम्भ होती है, जिनका केंद्रीय स्थल मलाना है। इन देवताओं की तीर्थयात्रा एवं स्नान की धार्मिक परम्परा उल्लेखनीय है। कुछ हर वर्ष जलतीर्थों में जाकर स्नान करते हैं, जो कुछ नियत अन्तराल पर। बनोगी गाँव में पर्वत शिखर के आंचल में विराजमान गिरमल देवता की तीर्थयात्रा इस बार 25 वर्षों के उपरान्त हो रही थी, अतः यह स्वयं में एक ऐतिहासिक घटना थी। साथ में शामिल कुछ लोगों की यह पहली यात्रा थी और अधिकाँश लोगों की संभवतः यह इस जीवन की अंतिम यात्रा थी।

मालूम हो कि कुल्लू घाटी में संभवतः गिरमल ऐसे एकमात्र देवता हैं, जिनका सम्बन्ध भगवान गौतम बुद्ध से भी माना जाता है। गांववासी तो इन्हें गौतम बुद्ध ही मानते हैं। करड़ु में रखी गई देवप्रतिमाओं में मुख्य प्रतिमा बुद्ध भगवान की ही है। कुछ छोटी प्रतिमाएं भी इन्हीं की प्रतीत होती हैं। इनकी भारथा (देववाणी) में भी इसी के संकेत मिलते हैं, जो गंभीर शोध-अनुसंधान का विषय है।

इससे पूर्व जब गिरमल देवता का मंदिर जल कर राख हो गया था, तो नए मंदिर की प्रतिष्ठा होने पर वर्ष 1986 में मणिकर्ण स्नान यात्रा सम्पन्न हुई थी। फिर वर्ष 1999 में जब देवता का नया गुर बना था, तो अगली स्नान यात्रा सम्पन्न हुई थी। इनसे पूर्व हमारे छोटे दादाजी गिरमल देवता के गुर की भूमिका निभा चुके थे। वर्ष 1999 के बाद इस वर्ष नया मंदिर बनने व यहाँ देव स्थापना के बाद 25 वर्ष के अन्तराल में मणिकर्ण तीर्थ की स्नान यात्रा का दिव्य संयोग बन रहा था।

गहरी घाटी के विहड़ मार्ग

25 अप्रैल 2024 को बनोगी गाँव से गिरमल देवता के साथ देउड़ू (जिनमें लगभग 50-60 लोग देवता की टीम के सदस्य थे, जैसे - काइस भगवती दशमी वारदा, वरिंडु देवता, थान देवता, पनाणु देवता, भगवती भागासिद्ध के गुर-पजियारे (पुजारी), वजंतरि (बाजा बजाने वाले) बारी (काम करने वाले) देवता के मेम्बर (सदस्य), कठियाला (भोजन व्यवस्था संभालने वाले), पाल्सरा (कैशियर) और कारदार (देवता के प्रबन्धक) इत्यादि। इनके साथ देवता के गांववासी परिजन अर्थात् हारियान (जिनमें चार बेड़ु और तराई ग्रांइं (तीन गाँवों के निवासी) शामिल थे। कुलमिलाकर देवता के साथ आगे-पीछे लगभग 250 लोगों का देव काफिला शामिल था। इतने बड़े दलबल के साथ पर्वत शिखरों को पार करते हुए यह आठ दिवसीय यात्रा स्वयं में दुर्लभ सौभाग्य तथा एक विरल अवसर थी प्रकृति एवं रोमाँचप्रेमी घुमक्कड़ आस्थावानों के लिए।

बीहड़ जंगल में विचरण करती भेड़ों एवं फुआलों (चरवाहों) के संग

पहला पड़ाव था बनोगी गाँव के पास नीचे घाटी में पनाणी शिला का पावन मैदान, जो पनाणु देवता के साथ जोगनियों का निवास स्थान है। गगनचुंबी मोहरु और वृहदाकार माहुनि के वृक्षों के नीचे मैदान में श्रद्धालुजन सुबह 10 बजे से एकत्र होना शुरु होते हैं। आस-पास व दूर-दराज के क्षेत्रों के हर घर का एक व्यक्ति इसमें शामिल था। अपवाद रुप में ही किसी एमरजेंसी के कारण किसी घर से कोई व्यक्ति इसमें शामिल न पाया हो। आखिर घाटी की देवशक्तियों के संग तीर्थ यात्रा के ऐसे परमसौभाग्य से कौन अभागा वंचित रहना चाहेगा।  

देवशक्तियों के संग देव-काफिला

दिन 1 – पनाणी शिला से हाअंणीथाच,

दोपहर 2.30 बजे सभी एकत्र लोग यहाँ से कूच करते हैं और चढ़ाईदार रास्ते से होते हुए आगे बढ़ते हैं।

घाटी-पहाड़ों को लांघती तीर्थ यात्रियों की बलखाती लम्बी रेल

रास्ते में खाकरी टोल (चट्टान) (जिसमें भोटी भाषा में अंकित शब्द हैं, क्या लिखा है अभी तक ज्ञात नहीं) के पीछे से होकर खड़ी चढ़ाई को पार करते हुए हाअंणीथाच पहुँचते हैं। पनाणी नाला के कभी दाएं तो कभी वाएं ऊपर चढते हुए यहाँ रई-तोस के आकाश चूमते वृक्षों के बीच काफिला 5 बजे हाअंणीथाच पहुँचता है, जो ग्रीष्मकाल में भेड़-बकरियों व मवेशियों के पालक फुआलों व गवालों के रुकने का अस्थायी ठिकाना रहता है। 

रास्ते में कुम्हार-री-वाई स्थान पर थोड़ा विश्राम होता है, जहाँ से गाहर गाँव के लिए पानी की स्पलाई की जाती है।

हाइंणीथाच में नग्गर बिजलीमहादेव की कच्ची सड़क के संग व ऊपर-नीचे समतल स्थान पर तम्बूओं की कतार बिछ जाती है। देउलू देवता की सांयकालीन पूजा करते हैं और इसके बाद सभी अपना भोजन तैयार करते हैं।

यहाँ रात्रि को भोजन के बाद सभी अपने-अपने समूह में एकत्र हो, गुफ्तगू का आनन्द लेते हैं।

विहड़ जंगल की नीरव शांति के मध्य बिताए कुछ यादगार पल

जंगल की नीरव शांति के बीच एकांतिक प्राकृतिक जीवन के संग ऐसी रात कोई सामान्य अनुभव नहीं था, जो अगले कुछ दिनों तक नित्य का क्रम बनने वाला था। रात्रि निद्रा-विश्राम के बाद देव काफिला प्रातः कूच करता है, जिसका पड़ाव था मणिकर्ण घाटी का सूमा रोपा जो वाया सूरजडूगा, पीणी होकर कवर होता है।

दिन 2 – हाअंणीथाच से सूमा रोपा, मणिकर्ण घाटी

दूसरे दिन इस तीर्थयात्रा का सबसे लम्बा ट्रैक सावित होने वाला था।

सुबह 6.15 बजे देव काफिला गिरमल देवता संग कूच करता हैं। बिल्कुल खड़ी चढाई के साथ देवदार, रई-तौस के जंगलों के बीच 1.5 घंटे बाद दल सूरजडुगा टॉप पहुँचता है, जहाँ से दूसरी ओर मणीकर्ण घाटी का विहंगम दृश्य आंशिक रुप में प्रत्यक्ष था, जहां से उस पार ढलानदार घाटी में धारा, शॉट व जलुग्राँ जैसे इलाके दिख रहे थे। आधा घंटा नीचे उतरने के बाद काफिला 8.30 तक सूरजडूगा पहुँचता है।

सूरजडूगा के बुग्याल मध्य विश्राम पड़ाव

खुले बुग्याल में बीचों-बीच एक जल स्रोत के पास सभी रुकते हैं और खाना बनाने की तैयारी करते हैं, सुबह की पूजा अर्चना होती है। इसके बाद सभी अपना लंच कर समान समेटते हुए 11.45 तक आगे कूच करते हैं।

इसके बाद हल्की उतराई के साथ टेढ़े-मेढ़े रास्ते से नीचे उतरते हुए दल पीणी की तरफ नीचे उतरता है। और 1.30 बजे तक पीणी से होकर गुजरता है।

थकाउ सफऱ के बीच विश्राम के कुछ पल

यहाँ गाँव के पीछे हल्का विश्राम होता है। मालूम हो कि पीणी गाँव भगवती भागासिद्ध का ठिकाना है, जिसे ठारा करड़ु देवताओं की बहन माना जाता है।
पहाड़ों की गोद में बसे पीणी गाँव का विहंगम दृश्य

साथ ही किवदंतियों के अनुसार ये काईस भगवती दशमी वारदा की छोटी बहन मानी जाती हैं। यहाँ के सामने से जरी साईड की मणीकर्ण घाटी का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है। ढलानदार कच्ची पगडंडियों के संग काफिला नीचे पार्वती नदी तक पहुँचता है।

सीधी उतराई के संग यात्रा का कठिन दौर

पार्वती नदी पर बने ब्लादी पुल को पार करना काफिले को भय मिश्रित रोमाँच के साथ तरंगित करता है, क्योंकि लकड़ी से बना यह पुल खूब झूलता है। काफिला लेफ्ट बैंक में जरी के नीचे से होते हुए आगे चोउखी, ढुंखरा को पार करते हुए रात 8.30 तक दूसरे दिन के पड़ाव सूमा रोपा पहुँचता है। आज का ट्रैक बहुत ही थकाऊ रहा। लगा कि ब्लादी पुल के पास रुकते तो बेहतर होता। हालाँकि रुकने का पारम्परिक ठिकाना ढुंखरा है, लेकिन पर्य़टकों की भीड़ और बढ़ती आवादी के कारण अब यहाँ रुकने का खुला स्थान नहीं बचा है। शमशान के पास तो पर्याप्त जगह थी, लेकिन यहाँ रुकने का कोई औचित्य नहीं लगा। सो काफिला आगे बढ़ता है और सूमा रोपा के खुले मैदान में रात का ठिकाना बनता है, जहाँ कुछ वन विभाग, तो कुछ प्राइवेट जगह थी, जिसका कैंपिंग साइट के रुप में उपयोग किया जाता है।

सूमा रोपा में रात्रि विश्राम का विहंगम दृश्य

अंधेरे में रात का भोजन तैयार होता है। आज थकावट इतनी थी कि लोगों के पास पिछली रात की तरह आपसी गुफ्तगू की हिम्मत नहीं थी। पेटपूजा के बाद सभी निद्रा देवी की गोद में चले जाते हैं। कुछ पिछले दिन भर की थकान, तो कुछ आज की मंजिल के समीप होने की निश्चिंतता – काफिला प्रातः उठकर आराम से सुबह 11.35 तक दिन का स्नान ध्यान और भोजन-प्रसाद ग्रहण करता है, फिर आगे बढ़कर कसोल वन विभाग के गेस्ट हाउस में थोड़ा विश्राम करता है तथा आज की मंजिल मणिकर्ण तीर्थ की ओर बढ़ता है, जो यहाँ से लगभग 6 किमी दूर पड़ता है।

अगले पड़ाव मणिकर्ण की ओर देव-काफिला

दिन 3 – सूमारोपा से मणिकर्ण तीर्थ,

देव काफिला कसोल, गुज जैसे पडावों को पार करते हुए शाम 4 बजे मणीकर्ण पहुँचता है। कसाेल इस घाटी का एक प्रमुख कस्वा है, जिसमें वहुतायत में विदेशी सैलानी (इस्रायल से) आते हैं। आजकल तो भारत के शहरी सैलानी भी गर्मियों में यहाँ काफी मात्रा में आ रहे हैं। देवदार के घने वनों के बीच बसा यह पहाड़ी कस्बा गर्मी में भी ठण्डी आवोहवा लिए रहता है, जो इसके आकर्षण का एक प्रमुख कारण बनता है।

कसोल से होकर देव काफिला जैसे ही मणिकर्ण के प्रवेश, तंग गलू के पास पहुँचता है, बारिश शुरु होती है। लगा कि जैसे देवशक्तियाँ गिरमल देवता सहित पूरे दल का स्वागत अभिसिंचन कर रही हों। इस अभिसिंचन के बीच पार्वती नदी को पार कर मणिकर्ण में प्रवेश होता है, जो देवता का पारम्परिक प्रवेश मार्ग है। मालूम हो कि यहाँ दो बड़ी चट्टानों के बीच पार्वती नदी गर्जन-तर्जन करती हुए बहुत ही संकरे मार्ग (गलु) से नीचे की ओर प्रवाहित होती है।

गिरे पेड़ पर बने पुल को पार करता हुआ देव-काफिला

इस पर बने पक्के पुल को पार कर दल राइट बैंक में पहुँचता है और बरसात में खाई पर गिरे एक वृहद पेड़ के अस्थायी पुल के ऊपर धीरे-धीरे बढ़ते हुए पार होता है, जिसे पार करने में ठीक-ठाक समय लग जाता है और इसके बाद गुरुद्वारा को पार करते हुए काफिला मणीकर्ण पहुँचता है।

पावन तप्त कुण्ड से झरती अखण्ड जल राशि

शाम को सभी तीर्थ यात्री यहाँ के गर्मकुण्डों में स्नान करते हैं। पिछले दो-तीन दिनों से लगातार सफर की थकान गर्म कुण्ड में डूबकी लगाते ही जैसे छूमंतर हो जाती है और सभी देउलू तरोताजा हो जाते हैं। इस तीर्थस्थल में लगाई गई भावभरी डुबकी भक्तों को समाधि सुख सा आनन्द देती है, जिसमें जीवन के सकल भय, चिंता, शोक, द्वन्द और विक्षोभ शांत हो जाते हैं। खासकर सर्दी में तो कोई भी आस्थावान यात्री इस अनुभव का साक्षी बन सकता है।

स्नान के बाद सभी अपने-अपने ठिकानों पर कुछ मंदिर परिसर में तो कुछ होटल में और कुछ परिचित लोगों के घर में रुकते हैं। देवता का स्नान निर्धारित स्थान पर नियमानुसार प्रातः होता है, जबकि बाकि लोगों के लिए कई कुंड बने हुए हैं। कुछ रघुनाथ परिसर में, तो कुछ इसके पास बाहर। देवता के साथ पहाड़ लाँघ कर पैदल आए 250 लोगों के अतिरिक्त गाँव-फाटी के लगभग 4-500 श्रद्धालु भी वाया रोड़ बस व अपने वाहनों में यहाँ पहुँचे थे, जिनमें अधिकाँश महिलाएं, बुजुर्ग तथा नौकरी-पेश वाले लोग थे। सभी पूजन में शामिल होते हैं।


विधि विधान से देवता के स्नान व पूजा-पाठ के बाद बड़ा भण्डारा दिया जाता है, जिसमें सभी भोजन-प्रसाद ग्रहण कर अपने-अपने घर लौटते हैं और देव काफिला भी नए रुट पर बापिसी का सफर तय करता है। मालूम हो कि घाटी के स्थानीय लोग मणिकर्ण के पवित्र जल को गंगाजल की तरह पावन मानते हैं, जिसे वर्तनों व लोटों में भरकर घर ले जाया जाता है और विशेष अवसरों पर मंगल कार्यों में इसका उपयोग होता है। आस्थावान को इस पावन जल के लिए पैदल पहाड़ों को लांघते हुए आते हैं और बापिस पैदल ही अकेले तथा एक-दो दोस्तों के साथ यहाँ आते हैं। मनुष्य तो क्या, घाटी के देवी-देवता तक यहाँ के पुण्य स्नान के अवसर को नहीं चूकते और रोमाँचक यात्रा पूरी करते हुए इस पावन तीर्थ में स्नान करते हैं। (जारी, भाग-2, मणीकर्ण से मलाना वाया रसोल टॉप)
आगामी राह में हाड़ जमाती ठंड के बीच प्रज्जवलित अग्नि के संग


शुरुआती पड़ाव के कुछ यादगार पल

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

पार्वती नदी के तट पर बसा पावन मणिकर्ण तीर्थ

सर्दी में भी गर्म अहसास देता यह पावन धाम

गर्म पानी के प्राकृतिक स्रोत तो कई जगह हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में, पार्वती घाटी में बसे मणीकर्ण स्थान पर गर्म पानी के स्रोतों का जो नज़ारा है, वह स्वयं में अद्भुत है। पार्वती नदी के किनारे बसे और समुद्र तल से लगभग 6000 फुट की ऊँचाई पर स्थित इस तीर्थ में गर्म पानी के इतने स्रोत हैं कि किसी घर को पानी गर्म करने की जरुरत नहीं पड़ती। यहां तक कि खाना भी इसी में पकाया जा सकता है।


सर्दी के मौसम में यदि कोई यहाँ जाने का साहस कर सके तो, यात्रा एक यादगार अनुभव साबित हो सकती है। मणीकर्ण पावनतम् तीर्थ स्थलों में एक है। आश्चर्य नहीं कि घाटी के देवी-देवता नियत समय पर यहाँ दर्शन-स्नान करने आते रहते हैं। और आस्थावान तीर्थयात्री भी यहाँ स्नान-डुबकी के साथ अपने पाप-ताप एवं संताप से हल्का होने का गहरा अहसास लेकर जाते हैं।

कुल्लू से लगभग 10 कि.मी. पहले भुंतर नामक स्थान से मोटर मार्ग पार्वती घाटी में प्रवेश करता है। नीचे से घाटी बहुत संकरी प्रतीत होती है, लेकिन पीछे मुख्य मार्ग से जुड़ी सड़कें खुली एवं मनोरम घाटियों में ले जाती हैं। ये घाटियां अपने बेहतरीन सेब के बगीचों के लिए प्रख्यात हैं। शाट नाले से ऊपर चौंग व धारा गाँव आते हैं तो आगे जरी से ऊपर क्षाधा और बराधा गाँव। इनकी विरल घाटियों का प्राकृतिक सौंदर्य मनोरम और स्वर्गोपम है।


रास्ते में जरी पहुँचते ही देवदार के घने बन शुरु हो जाते हैं। जरी के सामने ही मलाना नाला पार्वती नदी में मिलता है। इसके पीछे पहाड़ों की गोद में मलाना गाँव बसा है, जिसे विश्व का सबसे प्राचीन लोकतन्त्र होने का गौरव प्राप्त है। माना जाता है कि सिकन्दर महान के कुछ सिपाही जो भारत में छूट गए थे, वे इस दुर्गम इलाके में बस गए थे। इनके पहरावे और भाषा की बारीकियों को देखकर कुछ हद तक ये बातें पुष्ट होती प्रतीत होती हैं।

जरी के आगे कसोल घाटी से मणीकर्ण तक का नजारा देवदार के घने जंगलों के बीच सही मायने में हिमालय की गोद में विचरण की दिव्य अनुभूति देता है। कसोल विदेशी पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। शुद्ध आबोहवा, शांत प्रदेश, सीधे-सादे लोग, गर्म पानी के स्रोत, सस्ते संसाधन और भांग की प्रचुरता इस क्षेत्र को विदेशी पर्यटकों के लिए लुभावना बनाती है। इसका आर्थिक महत्व एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान जहाँ अपनी जगह है, इसके साथ युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृति और अपसंस्कृति के संक्रमण की मार एक चिंता का विषय है।

इसके आगे दो चट्टानों के बीच से प्रकट होती पार्वती नदी को पार करते ही मणिकर्ण तीर्थ के दर्शन होते हैं। वातावरण में गर्म पानी से उठती भाप दूर से ही इसकी प्रतीती देती है। चारों ओर गगनचूम्बी पर्वतों के बीच बसा यह तीर्थ भौगोलिक रुप में भी एक अलग ही संसार दिखता है। एक ओर देवदार से जड़े घने जंगल और दूसरी ओर हिमाच्छादित चट्टानी पहाड़ियाँ और बीच में तीव्र वेग के साथ बहती पार्वती नदी, जिसके तटों पर गर्म पानी की भाप उड़ती देखी जा सकती है। बस स्टैंड के आगे पुल पार करते ही लोक्ल गिफ्ट की दुकानें आती हैं, इनको पार करते ही दायीं ओर रघुनाथजी का भव्य मंदिर आता है, जिसके परिसर में अंदर गर्म जल के कुण्ड हैं, स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग।

 भगवान राम के साथ हनुमानजी, भगवान शिव की स्थापना मंदिर परिसर में हैं। मंदिर के पीछे परिक्रमा पथ में ही पावन जलकुण्ड है, जहाँ से पूजा के लिए जल संग्रहित किया जाता है। यहाँ रुकने व भोजनादि की निशुल्क एवं बेहतरीन व्यवस्था भी है।

यहाँ से बाहर निकलते ही लकड़ी का रथ मिलेगा, जो कुल्लू के ढालपुर मैदान जैसा है। बताया जाता है कि भगवान राम की प्रतिमा सबसे पहले यहीं रखी गईं थी। मालूम हो कि 1651 में भगवान रघुनाथ, सीता माता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास लाए थे। इन्हें राजा के आदेश पर मणिकर्ण में रखा गया था। दशहरे की शुरुआत राजा जगत सिंह ने 1653 में मणिकर्ण में की थी। तब से यहाँ दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है। राजा के स्वस्थ होने पर कालांतर में यह परम्परा कुल्लु में बड़े स्तर पर आरम्भ होती है और कुल्लू का दशहरा अंतर्ऱाष्टीय स्तर पर मनाया जाता है।


रथ के थोडी आगे नयनादेवी का मंदिर है, जिसे शिव के तृतीय नेत्र से अद्भूत शक्ति या उनकी सहचरी माँ पार्वती का रुप माना जा सकता है। मंदिर के सामने खौलते जल का कुण्ड है, जहाँ लोग आलू, चाबल आदि पोटली में बाँधकर रखते हैं और पकने पर प्रसाद रुप में साथ ले जाते हैं। यहाँ भी बग्ल में गर्म पानी के कुण्ड बने हुए हैं। बिना धार्मिक उद्देश्य के आए लोग प्रायः यहाँ स्नान करते हैं।

इसके आगे बाजार से होते हुए मार्ग गुरुद्वारे तक जाता है। वास्तव में मणिकर्ण हिंदु और सिक्ख दोनों का पावन तीर्थ स्थल है। हिंदु मान्यता के अनुसार यह शिव-शक्ति की क्रीड़ा भूमि और शिव की तपःस्थली माना जाता है। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार भगवान शिव ने यहाँ 11,000 वर्ष तप किया था। सिक्ख मान्यता के अनुसार प्रथम गुरु नानक देव यहां अपने शिष्य मरदाना के साथ आए थे। अतः यह उनका भी दिव्य स्पर्श लिए सिक्खो का एक पावन तीर्थ माना जाता है। 

गुरुद्वारे परिसर में प्रवेश करते ही पुनः खोलते पानी के कुण्ड हैं, जिनमें पोटलियों में आटे के सिड्डू से लेकर चाबल-आलू आदि पकाकर प्रसाद के रुप में लिए जाते हैं तथा साथ ही यहाँ चाय भी तैयार की जाती है, जिसे अन्दर दर्शनार्थियों को पिलाया जाता है। यहाँ सामने शिवमंदिर है तो इसके वायीं ओर गुरुद्वारा के स्नान कुण्ड तथा लंगर स्थल। साथ ही यहाँ भी ठहरने की समुचित व्यवस्था है। गुरुद्वारा साईड से पुल को पार करते हुए उस पार बाहर निकला जा सकता है।

इस तरह यहाँ ठहरने व भोजनादि की निःशुल्क व्यवस्था मंदिर और गुरुद्वारे में उपलब्ध है। यदि कोई चाहे तो होटलों में भी ठहर सकता है, जिनकी यहाँ समुचित व्यवस्था है। घरों की तरह होटलों में भी गर्म पानी की व्यवस्था देखी जा सकती है। पाइपों से पूरे गांव में गर्म पानी की सप्लाई होती है।

यहाँ बारह महीनों स्नान का लुत्फ लिया जा सकता है, लेकिन सर्दी का अलग ही आनन्द है। इस समय पर्यटकों की भीड़ बहुत कम होती है। इस शांत वातावरण में गर्म कुण्डों में डुबकी लगाना और इनके बीच ध्यानस्थ होकर बैठना एक आलौकिक अनुभव रहता है। आस्था से पूरित श्रद्धालु अपने ईष्ट का सुमरण करते हुए, तीर्थ स्नान के साथ आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तापों से मुक्ति का लाभ सहज ही उठा सकते हैं। इस पावन तीर्थ के बारे में धार्मिक मान्यता तो यहाँ तक है कि इसमें स्नान के बाद काशी जाने की भी जरुरत नहीं रहती।

यदि समय हो तो मणिकर्ण घाटी में आगे कुछ दर्शनीय स्थलों की यात्रा भी की जा सकती है। आगे लगभग 11 किमी की दूरी पर बरशेणी स्थल आता है, जहाँ पुल पार करते हुए आगे लगभग 10-12 किमी पैदल ट्रेक करते हुए खीरगंगा की यात्रा की जा सकती है, जहाँ खुले आसमान के नीचे गर्म पानी का कुण्ड है।


इस स्थल को कार्तिकेय की तपःस्थली माना जाता है, पीछे पहाड़ी के नीचे जिनकी गुफा एवं मंदिर है तथा कुण्ड के पास ही शिव मंदिर है, जहाँ साईड से दुधिया जल सीधे बहते हुए खुले स्नान कुण्ड में गिरता है। बाहरी पर्यटकों के बीच खीरगंगा का ट्रैक काफी लोकप्रिय है, जो हिमालय की गोदी में विचरण का रोमाँचक अनुभव सावित होता है।

यहाँ से आगे 40 किमी की दूरी पर पार्वती नदी का उद्गम स्थल मानतलाई सरोवर (13500 फीट) पड़ता है, जो 2-3 दिन का ट्रैकिंग मार्ग है। लेकिन यह मात्र स्वस्थ, रफ-टफ व जीवट वाले लोगों के लिए ही उचित रहता है। इसे एक पावन तीर्थ माना जाता है। बरशेणी के पार 3 किमी की दूरी पर तोश गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य़ व एकाँत-शांत वातावरण के कारण पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। समय हो तो बापसी में इसका भी अवलोकन किया जा सकता है।


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