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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

सिटी ब्यूटिफुल में बजट ट्रैब्ल के उपयोगी टिप्स

 टाउन प्लानिंग की मूक नसीहत देता यह सुंदर शहर


चण्डीगढ़ स्वयं में एक अद्भुत शहर है, भारत का पहला सुनियोजित ढंग से तैयार किया गया शहर, जिसे सिटी ब्यूटिफुल का दर्जा प्राप्त है। इस शहर के साथ हमारी किशोरावस्था की यादें जुड़ी हुई हैं, जब दसवीं के बाद दो वर्ष सेक्टर-10 के डीएवी कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला था। इसमें एक साल पास के 15 सेक्टर स्थित रामकृष्ण मिशन के विवेकानन्द स्टूडेंट होम में रुकने व इसके स्वामी लोगों से सत्संग का सौभाग्य मिला था।

आज पहली बार सपरिवार चण्डीगढ़ रुकने का संयोग बन रहा था। हरिद्वार से चण्डीगढ़ तक वाया हथिनीकुण्डबैराज के सफर का जिक्र हम पिछली ब्लॉग पोस्ट में कर चुके हैं। अब चण्डीगढ़ पहुँचकर यहाँ रात को रुकने की व्यवस्था करनी थी। एक बाहरी घुम्मकड़ के लिए इस शहर में बजट ट्रैब्ल के साथ रुकने के क्या ऑपशन हो सकते हैं, इसको एक्सप्लोअर करते रहे। उपलब्ध जानकारियों को पाठकों के साथ शेयर कर रहा हूँ, जो पहली बार चण्डीगढ़ घूमने के लिए आ रहे किसी पथिक को शायद कभी काम आ जाए।

चण्डीगढ़ में परिवार संग बजट में रुकने के लिए धर्मशालाएं सबसे उपयुक्त रहती हैं। हालाँकि आजकल तो ओयो होटेल की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, जिनका लाभ लिया जा सकता है। इनमें आधुनिक सुविधा के साथ सुरक्षा की उचित व्यवस्था रहती है, लेकिन दाम थोड़े अधिक रहते हैं। हमारे विचार से धर्मशालाएं बजट ट्रैब्लर के लिए अधिक उपयुक्त रहती हैं। सर्च करने पर हमें कुछ धर्मशालाएं मिली थीं, जैसे 28 सैक्टर में हिमाचल भवन और गुज्जर भवन, 15 सैक्टर में चनन राम धर्मशाला, 22 सेक्टर में सूद धर्मशाला आदि।


हरिद्वार से पंचकुला की ओर से चण्डीगढ़ में प्रवेश करते ही राह में सेक्टर 28 का हिमाचल भवन पहला पड़ाव था, लेकिन यहाँ कमरे फुल थे, फिर सेक्टर-15 में चननराम धर्मशाला पड़ती है, यहाँ भी कमरे फुल मिले। इन धर्मशालाओं की खासियत यह है कि इनमें वाहन के पार्किंग की सुविधाएं भी हैं, साथ ही भोजन की भी उत्तम व्यवस्था रहती है। परिवार के साथ यात्रा में ये काफी किफायती एवं उपयोगी रहती हैं।

अंत में हमें सेक्टर-22 की सूद धर्मशाला में जगह मिली। इसे चण्डीगढ़ की सबसे लोकप्रिय धर्मशाला माना जाता है, हमारा अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। साफ सूथरे कमरे। पूरा स्टाफ वेल बिहेवड़। अनुशासन व सुरक्षा की उचित व्यवस्था। इसमें रुकने के लिए हर सदस्य का आधार कार्ड अनिवार्य होता है। धर्मशाला में प्रवेश करते ही बाहर पीपल पेड़ के नीचे विघ्नविनाशक गणेशजी एवं बजरंगवली हनुमानजी के विग्रह धर्मशाला के साथ एक सात्विक भाव को जोड़ते हैं।

एक और बात जो इस धर्मशाला को खास बनाती है, वह है इसकी कैंटीन में खान-पान से जुड़ी उपलब्ध सुविधाएं। यह प्रातः साढ़े छः बजे से रात साढ़े दस बजे तक चालू रहती है। यहाँ ब्रैकफास्ट, लंच और डिन्नर की बेहतरीन व्यवस्था दिखी, वह भी बहुत ही किफायती दामों में। इसके रेट को देखकर लगा की धर्मशाला चैरिटेवल भाव से चल रही है, ग्राहकों को लुटने का भाव यहाँ नहीं दिखा। सामान्य भरपेट भोजन 45 रुपए में था, स्पेशल थाली 50 रुपए में और डिलक्स थाली मात्र 60 रुपए में। जिसका दाम सड़क के किनारे ढावों में या होटलों में 80-100 से 150-200 से कम न होगा।

अपने अनुभव के आधार हर हम चण्डीगढ़ आ रहे नए यात्रियों को इस धर्मशाला में रुकने का सुझाव दे सकते हैं। सदस्यों की संख्या के आधार पर एक से तीन बेड़ वाले कमरे यहाँ 200 से 800 रुपए के बीच मिल जाएंगे और डोरमेट्री के चार्ज तो ओर भी कम मिलेंगे। इस धर्मशाला की खास बात है कि यह 17 सैक्टर के बहुत पास है, बल्कि 17 सेक्टर के पुराने बस अड्डे के सामने वाली मार्केट के पीछे। बस अड्डे को पार करते ही 17 सैक्टर की मार्केट में प्रवेश हो जाता है, जो कि चण्डीगढ़ की मुख्य मार्केट है, जिसमें आपको हर तरह के सामान व सुविधाएं उपलब्ध मिलेंगी। कपड़े, जुत्ते, घर के सामान से लेकर खाना-पीना, बर्दी, लैप्टॉप, पुस्तकें एवं मेडिसिन, हेंडिक्राफ्ट्स, कार्पेट आदि। फिल्मं थिएटर भी इसके दोनों छौर पर मौजूद हैं।


पुस्तक प्रेमियों एवं विद्यार्थियों के लिए कई पुस्तक भण्डार हैं, जहाँ हर तरह की पुस्तकें, मैगजीन व स्टेशनरी उपलब्ध रहती हैं। पर्चेजिंग के अतिरिक्त खास बात है इसके बीचों बीच खुला स्पेस, जहाँ शाम के समय हवा से बातें करते, आसमानं को छूते रंग-बिरंगे फब्बारे, संगीत की धुन के साथ थिरकते नजर आएंगे। इसके आस पास जगह-जगह पर हरे-भरे वृक्षों की छाया में बने रुकने, बैठने के साफ-सुथरे, कलात्मक ठिकाने हैं। परिवार के साथ यहाँ शॉपिंग के साथ खाने-पीने का व मौज-मस्ती का पिकनिक जैसा अनुभव लिया जा सकता है।

सेक्टर 17 के सामने ही मुख्य सड़क के उस पार सामने रोज गार्डन पड़ता है, जिसमें रंग-विरंगे गुलाब फूलों के दर्शन किए जा सकते हैं। इसके बीचों बीच फब्बारों के दर्शन के साथ आस-पास बड़े-बड़े घास के मैदानों के बीच टहलने व विश्राम का आनन्द लिया जा सकता है। फिर मुख्य मार्ग के उत्तरी छोर पर सुखना लेक पड़ती है, जो मानव निर्मित झील है। इसमें बोटिंग का लुत्फ लिया जा सकता है। इसके किनारे पर बनी सड़क पर वॉकिंग एक बेहतरीन अनुभव रहता है। यहाँ भी एक छोर पर खाने-पीने व रिफ्रेश होने के बेहतरीन ठिकाने हैं।

इसी के पास है रॉक गार्डन, जो शहर की टुटी फूटी एवं बेकार चीजों को कलात्मक ढंग से सजाकर बनाया गया स्व. नेकचंद का एक अद्भुत सृजन संसार है। यहाँ से पंचकुला से आगे चंडी माजरा क्षेत्र के मिलिट्री एरिया में काली माता को समर्पित चण्डी मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं, जिसके नाम पर शहर का नाम चण्डीगढ़ पड़ा। आज समय अभाव के कारण हमारी यह इच्छा अधूरी रह गई थी, लगा उचित समय पर यह इच्छा अवश्य पूरी होगी।


इसके स्थान पर आज 15 सेक्टर में स्थित रामकृष्ण मिशन जाने का संयोग बन रहा था, जहाँ पिछले कई वर्षों से नहीं आ पाया था। हालाँकि रात को 7 बजे के बाद आश्रम बंद हो चुका था। इसके पास के विवेकानन्द स्टुडेंट होम में भी विद्यार्थी नहीं थे, कोरोना काल के बीच घरों में रह रहे हैं।  स्टुडेंट होम और मिशन के मुख्य भवन के बीच एक नया भवन खड़ा दिखा, जाकर पता चला कि यह 2018 में नवनिर्मित मेडिटेशन सेंटर है, अंदर प्रवेश कर विशाल हाल की मद्धम रोशनी एवं नीरव शांति के बीच ध्यान के कुछ यादगार पल विताए। यहाँ से गुजरते हुए यात्रीगणों को सुझाव दे सकता हूँ कि थोड़ा समय निकालकर इस आध्यात्मिक स्थल में कुछ पल के सात्विक अनुभव का लाभ लिया जा सकता है, जो यादगार पल सावित होंगे।

चण्डीगढ़ की खास बात यहाँ के सेक्टरों में बंटा होना है। इसके नक्शे को देखकर स्पष्ट होता है कि शुरु में 1 से 25 सेक्टर प्रारम्भिक चरण में बने होंगे, जिनमें मध्य मार्ग के दोनों और सेक्टरों का योग 26 बनता है। जैसे 12-14, 11-15, 10-16, 9-17, 8-18, 7-19 आदि। इस तरह इसमें 13 सेक्टर नहीं है। अगली पंक्ति में 26 से 30 सेक्टर पड़ते हैं और फिर 31 से 56 सेक्टर अगली तीन पंक्तियों में व्यवस्थित हैं। सेक्टर 57 के बाद के सेक्टर मोहाली में पड़ते हैं।


हर सेक्टर इस तरह से बनाया गया है कि आवासीय भवनों के साथ इन सबकी अपनी दुकानें, शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुविधाएं, पूजा स्थल, खुला स्पेस और हरियाली की व्यवस्था है। निसंदेह रुप में चण्डीगढ़ भारत का सबसे सुव्यवस्थित शहर है। फ्रेंच-स्विस आर्किटेक्स ली कार्बुजियर द्वारा डिजायन किया गया यह शहर निंसदेह रुप में भारत के अन्य शहरों के लिए एक मानक है। इसमें यात्रा के बाद इनकी दूरदर्शिता को देखकर मन अविभूत होता है और लगता है कि हम भारतीयों को शहरों व कस्वों की प्लानिंग के संदर्भ में कितना कुछ सीखना शेष है।


सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

यात्रा वृताँत - हरिद्वार से कुल्लू वाया देहरादून-चंडीगढ़



पहाड़ एवं घाटियों के बीच सफर का रोमाँच

कई वर्षों की अचेतन में दबी इच्छा संकल्प का रुप ले चुकी थी, कुछ गहन जिज्ञासा वश तो कुछ अतीत की सुखद स्मृतियों को गहराईयों से पुनः कुरेदने की दृष्टि से। दो-तीन माह पूर्व ही इस बार की बनोगी फागली में जाने का संकल्प ले चुके थे। यह एक नितांत व्यैक्तिक जिज्ञासा से उत्तर की खोज का हिस्सा थी, लेकिन इसकी परिणति सामाजिक एवं व्यापक होगी, ऐसा सुनिश्चित था। देवभूमि की देव-परम्परा को समझने की गहन जिज्ञासा हमें अपने जन्मभूमि की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।
सो हरिद्वार से फागली उत्सव के दो दिन पूर्व चल पड़ते हैं। गूगल गुरु में मौसम का मिजाज काफी चौंकाने वाला था। गृहक्षेत्र कुल्लू से भी उँच्चे हिलस्टेशन मानाली एवं शिमला में बारिश की भविष्यवाणी हो रही थी। लेकिन इनसे कम ऊँचाई पर स्थित कुल्लू क्षेत्र में बर्फवारी की भविष्यवाणी हो रही थी। हम इसे अपनी चिर इच्छा से जोड़कर देख रहे थे, औऱ कहावत याद आ रही थी कि नेचर नेवर डिड विट्रे द हर्ट, देट ट्रूअली लव्ड हर। हमें प्रकृति माँ के उपहार की पूरी आशा थी कि इस बार निराश नहीं करेगी, हालाँकि मूल प्रयोजन बनोगी फागली को नजदीक से देखने का था।
हरिद्वार से रात का सफर देहरादून, पौंटासाहिब, नाहन, चंडीगढ़, रोपड, कीर्तपुर साहिब, नालागढ़, बिलासपुर, सुन्दरनगर, मंडी, पंडोह, ऑउट से होते हुए कुल्लू घाटी में प्रवेश करता है। देहरादून से गुजरते हुए हमेशा ही महाभारतकालीन यादें जेहन में कौंधती हैं। यहाँ द्रोणाचार्य की तपःस्थली, अश्वत्थामा की जन्मस्थली आज भी सहस्रधारा, टपकेश्वर (तमसा नदी के किनारे) के रुप में विराजमान है। गुरु रामराय के डेरे से भी इसका नाम जोड़ा जाता है। देहरादून तमाम तरह के अकादमिक एवं राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के लिए प्रसिद्ध है। बस रूट में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, भारतीय वन संस्थान व इंडियन मिलिट्री अकादमी के दर्शन तो चलती बस में ही किए जा सकते हैं। हालांकि राजधानी बनने के बाद ट्रेफिक जाम एक बड़ी समस्या के रुप में ऊभर कर आया है, जिसके समाधान के लिए रास्ते में कई जगह फलाईओवर पर काम चल रहा है।



प्रेमनगर से आगे उत्तराखण्ड यूनिवर्सिटी, हिमगिरी जी-यूनिवर्सिटी आदि रास्ते में आते हैं। 
सघन बनों एवं हरे-भरे खेतों से होता हुआ रास्ता आगे पोंटा साहिब की ओर बढ़ता है। पोंटा साहिब में सिक्खों के दशमगुरु गोविंद सिंह के अंतिम वर्षों की सृजन साधना स्थली है। यह स्थल विद्वानों की आश्रयस्थली रही, जहाँ गुरु साहिबान ने तमाम तरह के ग्रँथों की रचना की थी। हमेशा ही यमुना नदी पर बने पुल से गुजरते हुए इस पावन गुरुद्वारे के दर्शन नतमस्तक कर देते हैं।

इसके बाद हिमाचल प्रदेश में प्रवेश होता है। हल्की चढाई के साथ जंगलों के बीच मोड़दार सड़क पर सफर नाहन शहर की ओर बढ़ता है। नाहन शिवालिक पहाड़ी की गोद में बसा शहर है। शहर से होती हुई बस आगे काला अम्ब स्थान पर रात्रि भोजन के लिए रुकती है। पूछने पर कि स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा, तो पता चला कि यहाँ कभी काले रंग के आम होते थे। और आज भी इसका पेड़ कहीं अंदर गाँव में की चर्चा होती है। इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो समय निकालकर जाँच-पड़ताल पर ही पता चलता। लेकिन आधी रात में आधे घंटे के बस स्टॉप की समय सीमा में यह सब कभी संभव नहीं हो पाया। यहाँ का काला आम अभी हमारे लिए जिज्ञासा एवं समाधान का विषय है।
चंडीगढ़ से प्रवेश करते ही हमेशा माँ दुर्गा के भगवती रुप चण्डी का सुमरण आना स्वाभाविक है, जिनके नाम से शहर का नाम पड़ा है। चंडीगढ़ में प्रवेश करते ही इसकी चोढ़ी सडकें, इसके दोनों ओर स्वागत करते सुंदर वृक्ष, वृताकार फूलों व सुंदर झाड़ियों से सजे चौराहे, व्यवस्थित भवन एवं साफ-सुथरा शहर - शायद यही सब मिलकर इसे सिटी बिऊटीफुल बनाते हैं। 

मालूम हो कि चंडीगढ़ देश का पहला योजनाबद्ध से बनाया गया शहर है जो फ्रांसिसी वास्तुकार ली.कार्बुजियर की देखरेख में बना था। मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर इसके कई आकर्षण हैं, जिनका अवलोकन किया जा सकता है, जैसे-रोज गार्डन, रॉक गार्डन, सुखना झील, चंड़ीगढ़ यूनिवर्सिटी, पीजी होस्पीटल, सेक्टर-17 आदि।
डीएवी कालेज भी यहाँ का एक जाना-माना शैक्षणिक संस्थान है, जिसमें दसवीं के बाद दो वर्ष पढ़ने का सौभाग्य हमें मिला। चंड़ीगढ़ से गुजरते हुए याद आते हैं यहाँ के बीटीसी हॉस्टल में विताए दिन, जहाँ ते जिम में जीवन में पहली बार मिस्टर पंजाब युनिवर्सिटी को तराशते देखकर बॉडी बिल्डिंग की चिंगारी किशोर ह्दय में स्पार्क कर गई थी। विभिन्न प्रादेशिक एवं भाषायी पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों से इंटरएक्शन उस समय अपने आप में एक अनूठा अनुभव था। 

और इससे भी गहन रुप में याद आता है विवेकानन्द स्टूडेंट होम का वह एक वर्ष जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के विचारों से परिचय हुआ और भावी जीवन की दिशाधारा का बीजारोपण हुआ। हॉस्टेल के वार्डन-अविभावक स्वामी तत्वारुपानन्दजी का बात्सल्यपूर्ण व्यवहार एवं मार्गदर्शन किशोर ह्दय के लिए चिरप्रेरक अनुभव रहे और उनकी भेंट की हुई पुस्तकें द काल टू द नेशन एवं मेडीटेशन एंड स्प्रीचुअल लाईफ मार्गदर्शक पाथेय की भाँति साथ देती रही।

चंड़ीगढ को पार करते हुए सफर आगे मोहाली रोपड़ से होते हुए कीरतपुर साहिब आता है, जो पुनः गुरु गोविंद सिंह की कुछ वर्षों की आश्रस्थली रही। व्यास-सतलुज नदी का जल भाखड़ा नंगल से होकर यहाँ नहर रुप में पंजाब से होकर बहता है। यहीं से पुनः हिमाचल में प्रवेश होता है। शिखर पर टिमटिमाती हुई रोशनी के रुप में भगवती नैनादेवी के दर्शन देवभूमि में सुरक्षित-संरक्षित प्रवेश का अहसास दिलाता है। यह प्रख्यात 52 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि माता सत्ती के नयन यहाँ गिरे थे। 

कीर्तपुर से चढ़ाईदार रास्ते से होते हुए आगे पहाड़ी के शिखर पर स्वारघाट स्टेशन आता है, जहाँ से एक ओर नीचे पंजाब के मैदानों में रात के अंधेरे में टिमटिमाते शहरों की रोशनी का विहंगावलोक किया जा सकता है, तो दूसरी ओर थोड़ा सा आगे बढ़ते ही बिलासपुर व सुदूर हिमाच्छादित धौलाधार पर्वत श्रृंखला के दूरदर्शन किए जा सकते हैं।। स्वारघाट से बिलासपुर शहर तक का सफर गोविंदसागर झील की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ता है। ज्ञातव्य हो कि सतलुज नदी पर बना भागड़ा बाँध की झील 90 किमी लम्बी है, जिसका 90 फीसदी हिस्सा बिलासपुर में आता है। रास्ते में सरोवर के विंहगम दर्शन यदा-कदा होतेे रहते हैं।

 बिलासपुर से आगे सलापड़ पुल से होकर सफर आगे बढ़ता है, जहाँ भूमिगत सुरंग से जल पहाड़ी से नीचे सतलुज नदी में मिलता है। यहीं राह में एसीसी सीमेंट का वृहद कारखाना यात्रियों का ध्यान आकर्षित करता है, जो रात की रोशनी में जगमगा रहा होता है। आगे के सफर में सुंदरनगर के पास ऊँचे शिखर पर भगवती मुरारी माता के शक्तिपीठ का दर्शन रोमाँचक रहता है। इसे देखकर मन ललचाता है कि यहाँ से चारों ओर का विहंगम दृश्य कितना अद्भुत रहता होगा। सुंदरनगर में व्यास नदी के जल को नहर के साथ एक बैराज के रुप में एकत्र किया गया है, जो भूमिगत टनल के माध्यम से पहाड से होकर सलापड़ स्थान पर उसपार सतलुज नदी में मिलता है।


प्रायः सुंदरनगर से मंडी के बीच सुबह हो जाती है। बीच में नैरचॉक स्टेशन पड़ता है। चारों ओर सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं से घिरी इस मैदानी एवं उर्बर घाटी के बीच का सफर एक ताजगी भरा अनुभव रहता है। व्यास नदी के किनारे बसे मंडी शहर को इसके प्रख्यात मंदिरों के कारण छोटी काशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ महान संत मांडव ने तप कर आलौकि शक्तियाँ अर्जित की थी व ग्रंथों की रचना की थी। अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण यह ऐतिहासिक नगर लम्बे समय से व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। जहाँ मार्च में महाशिवरात्रि का विश्वविख्यात मेला मनाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से आईआईटी की स्थापना से शैक्षणिक कारणों से भी यह शहर चर्चा में है। 

बस स्टैंड के सामने यहाँ का क्रिकेट स्टेडियम काफी बेहतरीन है, जहाँ बड़े मैच होते रहते हैं। यहीँ से पंडोह से होते हुए तंग घाटी में प्रवेश होता है। पंड़ोह डैम सदा से ही यात्रा के बीच का आकर्षण रहता है। रात को तो इसकी वृहद-शांत जलराशी में टिमटिमाटे बल्बों की रंगबिरंगी रोशनी एक अद्भुत नजारा पेश करती है। जलस्तर उच्च होने पर नीचे से बाहर बहता हुआ पानी का प्रवाह भी भयमिश्रित आश्चर्य के साथ दर्शनीय रहता है।

पंडोह से आगे मार्ग और भी तंग घाटी से होकर गुजरता है। आज तो सड़क काफी चौड़ी बन चुकी है। कभी सड़क बहुत तंग व नीचे बाँध की झील के किनारे से होकर गुजरती थी। यात्री दिल की धड़कनों को थाम कर इस तंग घाटी को पार करते थे। उस दौर में यह मार्ग कितनी ही लोमहर्षक दुर्घटनाओं का साक्षी रहा है। लेकिन अब सड़क काफी चौड़ी होने के कारण यात्रा सुरक्षित हो गई है। इस रास्ते में हनोगी माता का मंदिर दर्शनीय रहता है। हर वाहन यहाँ भगवती से सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ता है।

इसकी राह में आगे पर्वतों से झरते झरने यात्रियों का ध्यान आकर्षित करते हैं। आगे लगभग 1.5 किमी लम्बी सुरंग से होकर आउट पहुँचते हैं। यहाँ कुल्लू की बंजार घाटी के मौसमी फल उत्पादों को दुकानों के बाहर सजाया देखा जा सकता है, जो बाजिव दामों पर उपलब्ध रहते हैं। यहाँ से कुछ किमी के बाद नगवाईं आते ही खुली घाटी में प्रवेश होता है, जहाँ से दूर शिखर के मध्य बिजलेश्वर महादेव के दर्शन होते हैं। इसी राह से होते हुए पनारसा, बंजार एवं भुंतर आता है। बंजार में शिव का प्राचीन मंदिर है। राह में ही होर्टिक्लचर यूनिवर्सिटी,नौनी का क्षेत्रीय शोध अनुसंधान केंद्र मुख्य मार्ग के दाईं ओर पड़ता है। इसी के समानान्तर व्यास नदी के दूसरी ओर गढ़सा घाटी आती है, जो कम ऊँचाई के कारण अनार और जापानी फल के लिए जाना जाता है। भुंतर में हवाई पट्टी है, जहाँ चंडीगढ़ या केलांग से आने वाले छोटे यानों व हेलीकॉप्टरों के उतरने की व्यवस्था है।
यहाँ से जिया पुल से होकर कुल्लू की ओर लेफ्टबैंक में निर्माणाधीन फोरलेन सड़क से यात्रा आगे बढ़ती है। राह में मणिकर्ण घाटी से आ रही पार्वती नदी व कुल्लू-मानाली की ओर से आरही व्यास नदी का संगम स्थल पुल से दर्शनीय रहता है। घाटी के देवताओं के स्नान का यह पावन तीर्थ स्थल भी है। 

पुराना रास्ता गाँधीनगर ढालपुर मैदान से होकर कुल्लू पहुंचता है। ढालपुर मैदान कुल्लू शहर का प्रवेश द्वार है। विश्वविख्यात दशहरा मेला इसी मैदान मे मनाया जाता है, जब घाटी के सैंकड़ों देवी-देवता यहाँ एकत्र होते हैं। यहाँ प्रवेश द्वार पर देवदार के सघन बनों का आरोपण करने वाले निष्काम कर्मयोगी साधुवाद के पात्र हैं, जिनके पुण्य प्रयास से यात्रियों के चित्त पर देवभूमि में प्रवेश का एक पावन भाव जगता है। हमारे विचार में देवदार के वृक्षों को देखते ही पहाड़ी स्थल के साथ हिमालयन टच स्वतः ही जुड़ जाता है, जो यहाँ की भव्यता में एक दिव्यता का पावन भाव घोलता है।

ढालपुर के आगे डुग्गीलग बैली से आरही सरवरी नदी को पार कर इसके ही किनारे नया बस स्टैंड आता है, जिसका नवनिर्माण द्रुतगति से चल रहा है। यहाँ से मानाली महज 44 किमी की दूरी पर है। ब्यास नदी के दोनों ओर मोटर रोड़ बने हैं। जल्द ही यहाँ रेल्वे ट्रेक बनने की बात की जा रही है। बस स्टैंड के ऊपर टीले पर सुलतानपुर शहर बसा है, जहाँ घाटी के अधिपति कुल्लु के रघुनाथ(भगवान राम) का निवास स्थान है। कुल्लू से मानाली का पुराना रास्ता अखाड़ा बाजार से होकर गुजरता है, जिसके निचले छोर पर भूतनाथ(शिव) का मंदिर है तो उत्तरी छोर पर हनुमान(रामशीला), बीच में लक्ष्मीनारायण मंदिर है तो पुराने बस स्टैंड के पास पावन गुरुद्वारा श्री सिंह सभा। इस रुट में बढ़ती आवादी, ट्रैफिक और तंग सड़क के चलते बस रुट को लेफ्ट बैंक से डायवर्ट किया गया है, जो आगे चलकर रामशीला के आगे बने पुल से पुनः राइट बैंक से होकर आगे बढ़ता है। 



यहीं से व्सास नदी के किनारे सफर आगे मानाली की ओर बढ़ता है। रास्ते में वैष्णुमाता के मंदिर से होकर सफर आगे बढ़ता है। पुलिस एवं आईटीबीपी कैंप से होते हुए कुल्लू-मानाली सड़क पर कुछ किमी का सफर तय करते हुए सेऊबाग स्टेशन आता हैं और नदी को पार करते ही अपने गन्तव्य स्थल में प्रवेश हो जाता है। कभी घाटी में सेब के शुरुआती दौर की प्राथमिक प्रयोगशाला के रुप में यहाँ रोपे गए सेब के बागों के नाम से गाँव का नाम सेऊबाग पड़ा, जो आज यहाँ के प्रगतिशील किसानों व बागवानों के अथक प्रयास के साथ अपना नाम सार्थक करता प्रतीत हो रहा है।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-2

राधा स्वामी सत्संग डेरा ब्यास

अंतिम दिन दो विकल्प थे– वाघा बोर्डर और डेरा व्यास। ट्रेन शाम को थी। अभी कुछ घंटे थे। विकल्प डेरा व्यास को चुना। इसके वारे में भी बहुत कुछ सुना रखा था। बस स्टैंड से सीधा बस व्यास के लिए मिल चुकी थी। 40 किमी यहां से। रास्ते में हरे भरे खेतों व कुछ गांव कस्वों को पार करती हुई बस हमें मुख्य मार्ग में छोड़ चुकी थी। यहाँ से कुछ दूरी पर व्यास रेल्बे स्टेशन तक पैदल पहुँचे। स्टेशन पर सेमल का वृहद वृक्ष इतिहास की गवाही दे रहा था। स्टेशन के पुल को पार करते ही हम उस पार बस स्टेंड पर थे। कुछ ही मिनट में बस आ चुकी थी। बस कुछ देर में खुलने बाली थी। इस दौरान स्टेशन की हरियाली, स्वच्छता और शांति को अनुभव करते रहे। इतना साफ स्टेशन पहली बार देख रहे थे। बस के गेट खुल चुके थे। हम पीछे कंडक्टर के पास ही बैठ गए। कंडक्टर डेरे का ही सेवादार था। सवारियों का भावपूर्ण बिठाते हुए, इनके मुख से कुछ सतसंग के स्वर भी फूट रहे थे। जिनमें दो बातें हमें महत्वपूर्ण लगीं, बिन गुरु जीवन का वेड़ा पार नहीं हो सकता और बिन बुलाए कोई यहाँ आ नहीं सकता।
बस भरते ही चल पड़ी। रास्ते में हरे भरे गैंहूं के खेत, बौर से लदे आम के बगीचे एक सुंदर दृश्यावली को सृजन कर रहा था। कुछ ही मिनट में हम डेरे के मुख्य द्वार को पार कर चुके थे। मार्ग के दायीं और पार्किंग की वृहद व्यवस्था चकित करने वाली थी, शायद हजारों बाहन एक साथ यहाँ खड़े हो सकते होंगे। इसके अंतिम छोर पर हम बस स्टैंड पहुंच चुके थे। हल्की बारिश हो रही थी। आश्रम में प्रवेश करने के लिए मोबाइल कैमरा आदि बाहर ही जमा करना अनिवार्य है। अतः इस तकनीकी बोझे को बाहर ही छोड़कर हल्का होकर अंदर प्रवेश किए। हालाँकि रास्ते के सुंदर दृश्यों को कैमरे में कैद करने और मोवाइल में झांकने की आदत कुछ देर जरुर परेशान की। पहली बार लगा कि बिना मोबाइल किस तरह से जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है, जिसके बिना एक खालीपन सा कचोटने लगता है। 
अंदर पूछ ताछ कक्ष से आगे की जानकारी मिली। आश्रम का विस्तार कई 7 किमी की लम्बाई में है, सो पैदल तो इसे देखना सम्भव नहीं था। अंदर रिक्शा व कैव खड़े थे। दोपहर के दो बज चुके थे। स्थानीय परिजनों के सुझाव पर रिक्शा को चुना और लंगर की ओर चल पड़े। रास्ते में सफेद फूलों से लदे बागुकोशाव नाशपाती के बगीचे, आगे हवामहल और रास्ते के दोनों ओर की हरियाली प्रकृति की गोद में आने का सुखद अहसास दे रही थी। कुछ मिनटों के बाद रिक्शा रुक गया, उतर कर हम कुछ दूर पैदल चलते हुए लंगर स्थल पहुँचे। बहुत बड़ी छत के नीचे वृहद लंगर स्थल दिखा। पता चला यहाँ एक समय में 80,000 लोग भोजन कर सकते हैं। बाहर किनारे में प्लेट, गिलास आदि लेकर लंगर में बैठ गए। स्वादिष्ट पसादा लेकर पेट पूजा की। इसके बाद मौसम की ठंड़क को देखते हुए गिलास भरकर गर्म चाय ली। यहाँ बैठकर चाय की चुस्की के साथ भीड़ को देखकर कई विचार जेहन में कौंधते रहे। यहां युवा, महिलाएं, प्रौढ़, वृद्ध हर वर्ग के लोग दर्शनार्थी भीड़ का हिस्सा दिखे, लेकिन एक स्व अनुशासन दिख रहा था। लगा वातावरण का कितना असर हो सकता है। 
गिलास आदि धोकर वाहर निकले। रास्ते में एक युवक हमें मिला। हमें बैग टाँगे हुए उसकी जिज्ञासा थी कि हम कोई अजनवी बाहर से आए हैं। जल्दी ही हमारा परिचय हो गया। समयाभाव के कारण हमारे लिए सबकुछ देखना तो सम्भव न था, हमारा मुख्य मकसद यहाँ के साहित्य स्टाल तक पहुँचना था और इस आध्यात्मिक संस्था को जानने के भाव से कुछ मूल साहित्य खरीदना था। हमारी प्राथमिकता को देखते हुए वह उस ओर गाईड के रुप में साथ चलते रहे। रास्ते में डेरे के इतिहास व शिक्षाओं को सार संक्षेप से हमें परिचित कराते रहे।

यहाँ की साधना पद्वति में कर्मकाण्ड से मुक्त रखा गया है। सुमिरन, भजन प्रमुख आंतरिक साधन हैं और प्रेम व सेवा वाह्य साधन। यहाँ आश्रम की देखभाल सेवादार करते हैं, कोई नौकर नहीं है। छोटे बड़े काम का कोई भेद नहीं है। डेरा प्रमुखखुद को सबसे छोटा सेवादार मानते हैं। यहाँ परिसर के कूढ़े को गाढियों में लादते युवाओं को देखा, पता चला ये सेवाधारी हैं। आगे सड़क बन रही थी, यहाँ भी सेवादार सेवा दे रहे थे। आगे कैंटीन में भी सेवादारों को देखा। रास्ते में बज्री के पहाड़ों को देखा, जिनको सेवादार कूट कूट कर तैयार कर रहे थे। यहाँ की सारी सड़कें इंटे इन्हीं द्वारा तैयार की जाती हैं।

शीघ्र ही हम लाइब्रेरी में थे। एक बहुत बड़े हाल में यहाँ तमाम पत्र पत्रिकाएं रखी गयी हैं। एक सचित्र मोटी सी किताव हाथ लगी। 15-20 मिनट में इनके पेज पलटते हुए यहाँ के इतिहास से मोटा सा परिचय मिलता गया। समझ में आया कि इस युग में परिवार-गृहस्थी के बीच में आध्यात्मिक जीवन अधिक व्यवहारिक और प्रभावशाली हो सकता है। 

आश्रम व्यास नदी के किनारे है। हालाँकि अभी व्यास नदी यहां से काफी दूर जा चुकी हैं।कुल मिलाकर यहाँ संत परम्परा की एक अभिनव कढ़ी को सामूहिक मानव चेतना को उच्चतर आयाम तक पहुँचाने के प्रयोग को देखकर बहुत अच्छा लगा। आज के स्वार्थ, अहंकार से भरे मार काट बाले युग में खुद को गला ढलाकर कर गुरु, ईश्वर के पथ पर बढ़ाने के संत मार्ग को देखकर, सुखद अनुभूति हुई कि इंसानियत जिंदा है। मानवता का उज्जवल भविष्य ऐसे ही सम्मिलित प्रयासों का सत्परिणाम हो सकता है।


यहाँ से आटो में व्यास रेल्बे स्टेशन आए और ट्रेन से अमृतसर पहुँचे। जहाँ दून-अमृतसर एक्सप्रैस में बैठकर अपने गन्तव्य की ओर बापिस चल दिए। गोल्डन टेंपल और डेरा व्यास की स्वर्णिम और रुहानी यादों के साथ सुवह 8 बजे हरिद्वार पहुँचे। (समाप्त)
 
यात्रा का पहला खण्ड आप नीचे दिए लिंग में पढ़ सकते हैं -

रविवार, 20 मार्च 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-1


स्वर्ण मंदिर अमृतसर के दिव्य परिसर में
 
यह हमारी दिन के उजाले में अमृतसर की पहली यात्रा थी। सामुदायिक रेडियो की कार्यशाला के उद्देश्य से अमृतसर जाने का संयोग बना था। कार्यशाला के व्यस्त शेड्यूल के बीच अधिक घूमने की गुंजाइश न थी। सो तीन दिवसीय कार्यशाला में फुर्सत के पलों में दूसरे दिन स्वर्ण मंदिर जाने का सुयोग बना और अंतिम दिन विदाई समारोह के बाद, ट्रेन की वापसी के बीच के समय में डेरा व्यास दोनों यात्राएं एक वेजोड़ रुहानी अनुभव के रुप में स्मृति पटल पर अंकित रहेंगी।
11 मार्च को ही सुबह हम दून-अमृतसर एक्सप्रेस से 800 बजे अमृतसर पहुंच चुके थे। रास्ते में ही सुबह हो चुकी थी। सो बर्थ से उतरते ही बाहर ट्रेन के दोनों ओर हरे भरे गैंहूं से लहलहाते खेत हमारा स्वागत कर रहे थे, जिनका हरियाली भरा नजारा आंखों को शीतलता और मन को ठंडक दे रहा था। रास्ते में फलों के बगीचे भी दिख रहे थे, संभवतः फूलों को देखकर नाशपाती, बागुकोषा के लग रहे थे और कहीं कहीं आम के। लेकिन बहुतायत में गैंहूं के खेत ही मिले। अमृतसर शहर के बाहर ट्रेन किसी पुल के नीचे काफी देर खड़ी रही। संभवतः हम शहर में प्रवेश कर चुके थे। यहाँ से पुल से आवागमन करती गाड़ियों, पुल के पास सफेदा के ऊँचे ऊँचे पेड़, सामने से गुजरती दूसरी लोक्ल ट्रेन और इनमें भाग दौड़ करती लोक्ल सवारियों की कवायद, सब तमाशे की तरह हम देख रहे थे। इसी बीच चाय की चुस्की के बीच इंतजार के इन पलों को यादगार बनाते रहे।
रास्ता खुलते ही थोड़ी देर में ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी और कुछ ही मिनटों में हम अमृतसर स्टेशन पर थे। ओवरब्रिज को पार करते हुए हम स्टेशन के बाहर निकले। स्टेशन का प्रवेश द्वार अपने ऐतिहासिक वास्तुशिल्प के साथ अपनी विशिष्ट पहचान व परिचय दे रहा था। स्टेशन के पीछे पार्किंग के पार पीपल और वट के विशाल पेड़ यहाँ के पुरातन इतिहास की गवाही दे रहे थे। अपना गन्तवय अधिक दूर नहीं था। सो हमने रिक्शा में ही जाना उचित समझा, ताकि शहर का पूरा नजारा ले सकें। आसमान में बादल छाए हुए थे। काले काले बादल कभी भी बरसने की चेतावनी दे रहे थे। रात को शायद बारिश हो भी चुकी थी। जैसे ही हम आगे बढ़ते गए हल्की हल्की बारिश शुरु हो चुकी थी। हम इसको अपना स्वागत अभिसिंचन मानते हुए इसका आनन्द लेते रहे। रास्ते में सेमल के गगनचुम्बी वृक्षों पर लदे सुर्ख लाल फूल शहर में वसंत की वहार का परिचय दे रहे थे। आम के पेड़ों पर फूटे बौर भीनी-भीनी खुश्बू के साथ यात्रा का सुखद अहसास दे रह। झंडों से जड़े चौराहे को पार करते हुए हम आगे ऊँचे और भव्य भवनों के बीच बढ़ रहे थे। 
कुछ ही मिनटों में हम अपने गन्तव्य स्थल पर पहुँच चुके थे। अभी वर्कशॉप में आधा घंटा बाकि था, सो फ्रेश होकर हम सीधा कार्यशाला कक्ष पहुँचे। दिन भर कार्यशाला से सामुदायिक रेडियो की अवधारणा स्पष्ट हुई और समझ आया कि कैसे यह पब्लिक और प्राइवेट ब्रॉडकास्टिंग से भिन्न है। सफलतापूर्वक चल रहे सामुदायिक रेडियो के अनुभव बहुत प्रेरक और उत्साहबर्धक लगे। अगले दो दिनों में सामुदायिक रेडियो के विभिन्न पहलुओं से रुबरु होते रहे। सदस्यता पाने के लिए फार्म भरने की बारकियाँ समझ में आईं। बेसिल के प्रेजन्टेशन से आवश्यक तकनीकि जानकारियाँ मिली। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से आए डॉ. मुनीश जी का भागीदारों से सीधा संवाद बहुत ह्दयस्पर्शी लगा। सबसे ऊपर कैंपस रेडियो के पितामह एस श्रीधरण जी से सीधा संवाद इस कार्यशाला की जान रहा। अंत में सीआरए टीम द्वारा सक्रीनिंग ड्रिल के साथ हम कार्यशाला से सीखे ज्ञान को एक सार्थक अनुभव के रुप में समझने का मौका मिला। जम्मु-काश्मीर, पंजाव, हरियाणा, उत्तराखण्ड और हिमाचल से लगभग 40 भागीदार आए थे। मीडिया हाइप के इस युग में सामाजिक परिवर्तन के एक सार्थक माध्यम के रुप में सामुदायिक रेडियो की उपयोगिता समझ में आ गयी।



स्वर्ण मंदिर – दूसरे दिन शाम को फुर्सत के पलों में स्वर्णमंदिर जाने का कार्यक्रम बना। बिना स्वर्ण मंदिर के अमृसर की यात्रा को अधूरा ही मान जाएगकब से यहाँ आने की योजना बन रह थी। पिछले ही साल दिसम्बर माह में लुधियाना में अपने 1986 बी.टेक. बैच की 25वीं साल गिरह पर अपने सहपाठी कंवलजीत आनन्द के साथ रात को 2 बजे ही यहाँ चल दिए थे और सुबह पाँच बजे से इसके दर्शन लाभ का सुअवसर मिला था। यह दर्शन एक अमिट सी छाप रुह पर छोड़ चुका था। स दिन एक झलक ही ले पाए थे। आज उसका अगला कदम बढ़ाने का सुयोग बन रहा था। हल्की बारिश के बीच रास्ते की तमाम बाधाओं को पार करते हुए हम गुरुद्वारा गेट पहुँचे। बहाँ से परिसर की भव्यता देखते ही बनती है। जुता स्टैंड पर जुता उतारकर हम अंदर प्रवेश किए। जुता स्टैंड पर सेवादारों का सेवाभाव दिल को छूने वाला रहता है। आगे जल बावड़ी को पार करते हुए मुख्य गेट पर पहुँचे। यहाँ प्रवेश करते ही सामने स्वर्ण मंदिर का विहंगम दृश्य एक आलौकिक अनुभव रहता है। आकाश में चाँद, सरोवर के जल में झिलमिलाती स्वर्णिम व रंगविरंगी आभा, एक दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति देते हैं। 

ज्ञातव्य हो कि यहाँ के पवित्र सरोवर के नाम से शहर का नाम अमृतसर पड़ा है। मान्यता है कि यहाँ कभी घना जंगल था और इनके बीच में झील। यह शांत-एकांत स्थल साधु संतों की साधना स्थली, आश्रय स्थली थ बुद्ध भगवान ने भी यहाँ ध्यान तप किया था। श्री गुरु नानक देव जी ने इस स्थल में ास किया था। सिक्खों के चौथे गुरु राम दास ने इसकी नींव रखी और पांचवे गुरु अर्जुनदेव के समय में यह 1604 ईंस्वी में बनकर तैयार हुआ। सरोवर के मध्य रमंदिर साहिव में गुरुग्रंथ साहब की पूजा-अर्चना व पाठ प्रातः भौर से लेकर देर रात तक चलता रहता है, और इनकी पावन धुन से तीर्थ परिसर गुंजायमान रहता है।

दर्शनार्थ आयी भीड़ में एक अनुशासन, दर्शन का भाव, एक सकारात्मक लय, गुंज रहे शब्दकीर्तन की दिव्य ध्वनियाँ एक जीवंत जाग्रत तीर्थ का गाढ़ा अहसास देते हैं। इसके साथ ही सरोवर में निश्चिंत भाव से तैर रही मच्छलियाँ, संसार सागर में भटक रहे मनुष्य जीवन के गुढ़ रहस्य को प्रकट करती हैं, कि गुरु शरण में आया जीव संसार सागर में इन मच्छलियों सा निर्दन्द-निश्चिंत भाव से तैर सकता है, जीवन का सही आनन्द उठा सकता है। गुरुभाव से कटा जीव सामान्य मछलिों की भांति तमाम असुरक्षा भाव के बीच एक एक दुःखी-संतप्त जीव जीने के लिए अभिशप्त होता है।

सरोवर के किनारे परिक्रमा मार्ग पर दायीं ओर से आगे बढ़ते हुए मुख्य द्वार आता है, जहाँ से सीधे हरमंदिर साहब में प्रवेश होता है। दर्शनार्थियों के साथ हम आगे बढ़ते हुए धीरे धीरे मुख्य मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। शब्द कीर्तन की धुन अंतःकरण में दिव्य भावों का संचार कर रही थी। संगत बीच बाले पथ पर पाठ करते हुए आगे बढ़ रही थी। मुख्य द्वार के पार अंदर गुरु ग्रंथ साहिव को माथा टेककर हम बाहर निकले। पीछे सरोवर के अमृत जल से अभिसिंचन करते हुए आगे बढ़े, प्रसाद लेकर परिक्रमा पथ पर आगे बढ़े। लगभग एक-ढेड़ घंटे खडे खड़े पैर थककर चूर हो चुके थे, सो कुछ पल किनारे में बिछी दरियों पर पाल्थी मारकर...ध्यान चिंतन में कुछ पल निमग्न रहे।

इसके बाद लंगर हाल में आए। यहाँ तीन मंजिलों में प्रसाद का वृहद आयोजन देखने लायक था। हजारों लोग एक साथ प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। पता चला कि रोज लगभग एक लाख दर्शनार्थी इस लंगर में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं। यहाँ की अनुशासन, व्यवस्था देखने लायक थी कि किस तरह व्यवस्थित ढंग से सबको प्रेम पूर्वक प्रसाद का वितरण हो रहा था। सदा से ही गुरुद्वारे की लंगर व्वस्था के हम मुरीद रहे हैं। किसी भी गुरुद्वारे में यह पारमार्थिक व्यवस्था अनुकरणीय लगी है। भोजन-प्रसाद के बाद बाहर हम आए तो स्वयं सेवक जूझे बर्तनों को हाथ से लेते गए। गिलास, प्लेट व वर्तनों को साफ करने की स्वयंसेवक व्यवस्था लाजबाव दिखी। सैंकड़ों नहीं हजारों सेवादार यहाँ सफाई कर रहे थे। एक प्लेट कई चरणों में साफ होकर चकाचक साफ होकर बाहर निकल रही थी। अपनी सेवा में कोई छोटे बढ़े का भाव नहीं। सब अपनी पहचान, पद, जाति, धर्म, रुत्वा भूल कर गुरुकाज में एक भक्त की भांति मग्न – शायद यही तो आध्यात्मिक समाजवाद है, जिसके आधार पर युगऋषि सतयुग की कल्पना करते रहे हैं।
परिसर के परिक्रमा पथ पर बापिस आते हुए, हम स्वर्ण मंदिर को प्रमाण कर, बाहर जुता घर की ओर आएयहाँ से ऑटो से बापिस गन्तव्य की ओर कूच किए, चित्त पर स्वर्ण मंदिर की एक भाव भरी अमिट छाप लिए हुए, कि अगली वार थोड़ा अधिक समय लेकर इसके दर्शन करेंगे, यहाँ के भावसागर में ओर गहरी डुबकी लगाएंगे
    अमृतसर यात्रा का अगला भाव आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं -