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सिटी ब्यूटिफुल में बजट ट्रैब्ल के उपयोगी टिप्स

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  टाउन प्लानिंग की मूक नसीहत देता यह सुंदर शहर चण्डीगढ़ स्वयं में एक अद्भुत शहर है, भारत का पहला सुनियोजित ढंग से तैयार किया गया शहर, जिसे सिटी ब्यूटिफुल का दर्जा प्राप्त है। इस शहर के साथ हमारी किशोरावस्था की यादें जुड़ी हुई हैं, जब दसवीं के बाद दो वर्ष सेक्टर-10 के डीएवी कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला था। इसमें एक साल पास के 15 सेक्टर स्थित रामकृष्ण मिशन के विवेकानन्द स्टूडेंट होम में रुकने व इसके स्वामी लोगों से सत्संग का सौभाग्य मिला था। आज पहली बार सपरिवार चण्डीगढ़ रुकने का संयोग बन रहा था। हरिद्वार से चण्डीगढ़ तक वाया हथिनीकुण्डबैराज के सफर का जिक्र हम पिछली ब्लॉग पोस्ट में कर चुके हैं। अब चण्डीगढ़ पहुँचकर यहाँ रात को रुकने की व्यवस्था करनी थी। एक बाहरी घुम्मकड़ के लिए इस शहर में बजट ट्रैब्ल के साथ रुकने के क्या ऑपशन हो सकते हैं, इसको एक्सप्लोअर करते रहे। उपलब्ध जानकारियों को पाठकों के साथ शेयर कर रहा हूँ, जो पहली बार चण्डीगढ़ घूमने के लिए आ रहे किसी पथिक को शायद कभी काम आ जाए। चण्डीगढ़ में परिवार संग बजट में रुकने के लिए धर्मशालाएं सबसे उपयुक्त रहती हैं। हालाँकि आजकल तो ओयो

यात्रा वृताँत - हरिद्वार से कुल्लू वाया देहरादून-चंडीगढ़

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कुल्लू घाटी का प्रवेश द्वारा - ढालपुर मैदान (ठारा करड़ू री सोह) पहाड़ एवं घाटियों के बीच सफर का रोमाँच कई वर्षों की अचेतन में दबी इच्छा संकल्प का रुप ले चुकी थी, कुछ गहन जिज्ञासा वश तो कुछ अतीत की सुखद स्मृतियों को गहराईयों से पुनः कुरेदने की दृष्टि से। दो-तीन माह पूर्व ही इस बार की बनोगी फागली में जाने का संकल्प ले चुके थे। यह एक नितांत व्यैक्तिक जिज्ञासा से उत्तर की खोज का हिस्सा थी, लेकिन इसकी परिणति सामाजिक एवं व्यापक होगी, ऐसा सुनिश्चित था। देवभूमि की देव-परम्परा को समझने की गहन जिज्ञासा हमें अपने जन्मभूमि की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी। कुल्लू-मानाली घाटी, मनोरम विहंगम दृश्य सो हरिद्वार से फागली उत्सव के दो दिन पूर्व चल पड़ते हैं। गूगल गुरु में मौसम का मिजाज काफी चौंकाने वाला था। गृहक्षेत्र कुल्लू से भी उँच्चे हिलस्टेशन मानाली एवं शिमला में बारिश की भविष्यवाणी हो रही थी। लेकिन इनसे कम ऊँचाई पर स्थित कुल्लू क्षेत्र में बर्फवारी की भविष्यवाणी हो रही थी। हम इसे अपनी चिर इच्छा से जोड़कर देख रहे थे, औऱ कहावत याद आ रही थी कि नेचर नेवर डिड विट्रे द हर्ट, देट ट

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-2

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राधा स्वामी सत्संग डेरा ब्यास अंतिम दिन दो विकल्प थे – वाघा बोर्डर और डेरा व्यास। ट्रेन शाम को थी। अभी कुछ घंटे थे। विकल्प डेरा व्यास को चुना। इसके वारे में भी बहुत कुछ सुना रखा था। बस स्टैंड से सीधा बस व्यास के लिए मिल चुकी थी। 40 किमी यहां से। रास्ते में हरे भरे खेतों व कुछ गांव कस्वों को पार करती हुई बस हमें मुख्य मार्ग में छोड़ चुकी थी। यहाँ से कुछ दूरी पर व्यास रेल्बे स्टेशन तक पैदल पहुँचे। स्टेशन पर सेमल का वृहद वृक्ष इतिहास की गवाही दे रहा था। स्टेशन के पुल को पार करते ही हम उस पार बस स्टेंड पर थे। कुछ ही मिनट में बस आ चुकी थी। बस कुछ देर में खुलने बाली थी। इस दौरान स्टेशन की हरियाली, स्वच्छता और शांति को अनुभव करते रहे। इतना साफ स्टेशन पहली बार देख रहे थे। बस के गेट खुल चुके थे। हम पीछे कंडक्टर के पास ही बैठ गए। कंडक्टर डेरे का ही सेवादार था। सवारियों का भावपूर्ण बिठाते हुए, इनके मुख से कुछ सतसंग के स्वर भी फूट रहे थे। जिनमें दो बातें हमें महत्वपूर्ण लगीं, बिन गुरु जीवन का वेड़ा पार नहीं हो सकता और बिन बुलाए कोई यहाँ आ नहीं सकता। बस भरते ही चल पड़ी। रास्ते में