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फ़रवरी 28, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

In Search of Peace, Freedom and Bliss

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In the company of the One I ever miss Long have I wondered,   In search of the Peace, Freedom and Bliss, Far away from the native home, Near and dear ones do I miss. Mother with unconditional love and eternal care, Father at the altar of duty, outwardly stern inside ever fare, Source of Strength in this life, a legacy so rare. Brothers also so loving far away I could hardly care, Sisters playing hide and seek, Which life’s curse, don’t know this meek. Friends I’ve got a few, Full of gratitude to all, shall leave nothing undue, Heart filled with devotion to all Mentors-Masters & Mams, Who forged me in one way or the other , what I am today by name, All the blessings & support from my near and dear ones,   Full of gratitude, I’ll pay in my own way. In search of the Imperishable, I’ve traveled so far, In search of Freedom, in the lap of Mother Nature & meditating trees In search of Peace, at the altar of the One

मत खोना अपनी ध्येय-दृष्टि

आँधी-तुफाँ-ओलों की बारिश, लो इनका भी मजा यह संसार काँटे की बाड़ी, यहाँ कितने खिलाड़ी,  एक तू मूर्ख, गंवार, अनाड़ी। ऊँची सोच, अलग होने की सजा, आँधी-तुफाँ-ओलों की बारिश,  लो इनका भी मजा। साधना में रही चूक कहीँ,  कहीं नाव में छल-छिद्र बाकि, मर्म पर प्रहार होते आए सदा,  भूल गए तुम संसार की रीत पुरानी। फिर, संसार एक महान जिम-अखाड़ा,  देना होगा यहाँ रहने का भाड़ा, सीख लो तुम भी दाँव इस दंगल के,  असल काम तो अभी पड़े अधूरे। परिवर्तन का यह प्रवाह शाश्वत,  सभी अपनी चाल चलेंगे, नहीं कोई परमहंस भगवान यहाँ,  सभी इंसान, यही करेंगे। फिर वजूद , शाश्वत बक्रता संग  प्रसुप्त देवत्व की विचित्र सृष्टि, झूठ-सच, गफलत, प्रपंच-विवाद सब यहाँ,  मत खोना अपनी ध्येय-दृष्टि। संग स्वल्प भी सत्य-ईमान गर अंतर में,  तो नहीं दूर दैवीकृपा वृष्टि, हर दुख को बना तप, हर सुख को योग,  गढ़ता चल अपनी संकल्प-सृष्टि।