रविवार, 30 अगस्त 2015

तेरे मन मोतियों के संग



जीवन को सृजन का नया आयाम देंगे


मन के ये मोती, अमृत बूंदें ये आसुंओं की(रुद्राक्ष मोती)
दिल को छू गई, मन पर छा गई,
प्राणों में समाकर, जड़-बुद्धि को हिलाकर,
चैतन्य होश का एक नूतन वरदान दे गई।1

 ऐसे में रहें हम अपनों संग घर-परिवार में,
या किसी पद पर आसीन राज-दरवार में,
रहें हम निर्जन बन-प्रांतर, गुफा-झील के किनारे,
या इस संसार के भवसागर में डूबते-इतराते।2

तुम्हारे संग विताए अनमोल पलों को सुमिरन कर,
 भावों के अमृत सागर में डूबकी लगाकर,
तेरी अमृत सी अश्रु बूँदों के संग,
विनाश के मुहाने पर खड़े जीवन को सृजन का नया आयाम देंगे।3

दशकों से उजड़े चमन को सजाकर,
खंडहर पड़े मन-मंदिर को नया रंग, नया रुप देकर,
तेरी दिव्य स्मृतियों की शाश्वत ज्योति के संग,
दुनियां को नयी आश, नयी सुवास, जीने का नया अंदाज देंगे।4


रविवार, 23 अगस्त 2015

यात्रा वृतांत - सावन में नीलकंठ महादेव - प्रकृति की गोद में श्रद्धा-रोमांच का अनूठा संगम



मिले मन को शांति, हरे चित्त का संताप 

नैक से जुड़ी लम्बी तैयारी, थकाउ पारी और काल की छलना पलटवारी के बीच जीवन का ताप कुछ बढ़ चला था, सो प्रकृति की गोद में चित्त को हल्का करने का मन बन गया था। ऐसे में स्वाभाविक ही कालकूट का शमन करने बाली नीलकंठ महादेव की मनोरम वादी की याद आ गई और लगा कि बुलावा आ गया। सावन में कांवर लिए यात्रा की इच्छा अधूरी थी, सो वह भी आज अनायास ही पूरी हो रही थी। कुछ ऐसी ही इच्छा लिए राह को प्रकाशित करते दीपक हमारे सारथी बने। और हम अपनी स्कूटी सफारी में नीलकंठ महादेव के औचक सफर पर निकल पड़े।

दोपहर को अचानक प्रोग्राम बन गया था और तीन बजे हम चल दिए और लगभग दो घंटे बाद शाम पाँच बजे तक हम नीलकंठ महादेव पहुंच गए। रास्ते का सफर प्रकृति के सुरम्य आंचल में रोमाँच से भरा रहा, जितना गहरा हम इसके प्राकृतिक परिवेश में प्रवेश करते गए, उतना ही हम इसके आगोश में खोते गऐ और सहज ही मन शांत होता गया और संतप्त चित्त को एक हीलिंग टच मिलता गया।

देसंविवि से यात्रा रेल्वे फाटक पार करते हए निर्मित हो रहे फोर लेन हाइवे से होती हुई नेपाली फॉर्म, श्यामपुर फाटक से आगे बढ़ी। वीरभद्र-आइडीपीएल से रास्ता दाईं ओर मुड़ता है, यहाँ से बढ़ते हुए आगे बैराज पहुँचे। रास्ते में सामने नीलकंठ की पहाडियां मंजिल का सुमरण करा रही थी। आज तो इन पहाडियों पर बादल भी छाए थे, सो यह निमंत्रण कुछ अधिक ही मनमोहक लग रहा था। बैराज से गंगाजी की एक धारा नहर से होते हुए चीला डैम की ओर मोड़ी गई है, जिससे बिजली तैयार की जाती है। बाकि जल बैराज से सीधा गंगा जी की मुख्य धारा में गिरता है। यही जल आगे हरिद्वार में सप्तसरोवर क्षेत्र से बढ़ता हुआ घाट नं.10 पर नीलधारा में मिलकर हरकीपौड़ी की ओर बढ़ता है। गर्मी में बैराज का सारा जल नहर में ही सिमट जाता है, कुछ बुंदे ही मुख्यधारा में बचती हैं। अतः तब सप्तसरोवर का जल मुख्यता देहरादून से गंगाजी में मिलने वाली टोंस नदी का रहता है। इस सीजन में गंगा जी को पूरे बेग के साथ मुख्यधारा में बहते हुए देखकर एक सुखद अनुभूति हुई।

बैराज से एक सड़क मार्ग सीधा नीलकंठ के लिए जाता है, जो घने जंगल से होकर गुजरता है और आगे सीधी खड़ी चढ़ाई लिए हुए है। यह राजाजी नेशनल पार्क का हिस्सा है और इसे खतरनाक माना जाता है। अतः इसके प्रवेश में ही बन विभाग द्वारा जंगली जानवरों के खतरे से सचेत किया गया है। सड़क आगे गंगा जी के वाईं ओर से रामझूला की ओर बढ़ती है। सघन बनों के बीच टेड़ी-मेड़ी सड़क वाहन चालकों की अच्छी-खासी कसरत कराती है। रास्ते में हर दस कदम पर बरसाती नाले बहते मिले और साथ साथ छोटे-बढ़े झरने। इनका कलकल निनाद पूरे रास्ते भर बन से गुंजता मिला, जिसे सुनकर लगता कि जैसे की प्रकृति के गर्भ से अनहद-नाद गूंज रहा हो।

इसी रास्ते में आगे हमें बंदर बहुतायत में मिले। इंसान व वाहनों से वेखौफ ये रास्ते में आराम से बैठे थे, जैसे यह इनका अपना ही घर परिवार हो। यात्री कुछ ब्रेड बिस्कुट श्रद्धावश फैंकते रहते हैं, वही इनका प्रमुख प्रलोभन रहता है। मार्ग में हर मोड़ पर कोई वाहन आता जाता मिल रहा था, लगा सावन का सैर सपाटा अभी थमा नहीं है। ज्ञातव्य हो कि नीलकंठ कांवड़धारियों का एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। जिसमें सावन के दौरान रोज लाखों लोग गंगाजल चढ़ाते हैं। सिलसिला अभी तक थमा नहीं दिखा। कुछ वाइक्स में तो कुछ जीप-टैक्सियों व अन्य वाहनों में जाते दिखे। रास्ते में ही रामझूले से आता पैदल मार्ग मिला, जिसमें तीर्थयात्री पर्याप्त संख्या में अपने इष्टधाम की ओर बढ़ रहे थे व कुछ बापिस लौट रहे थे।

रास्ते में ही गुजरों की वस्ती मिली। गौलतलब हो कि गुजर खानावदोश लोग हैं, जो भैंस पालते हैं और इनके दूध-घी से अपनी गुजर बसर करते हैं। सर्दियों में ये निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं। इनकी बस्ती आबाद दिखी। रास्ते में मोर पक्षियों का दल मिला। पहली वार इतनी संख्या में इन्हें देख मन प्रफुल्लित हुआ। थोड़ी ही देर में हम थोड़ी उँचाई में थे व सामने लक्ष्मण झूले की ओर से गंगाजी व नीचे ऋषिकेश के दर्शन हो रहे थे। दृष्य बहुत ही विहंगम व अवलोकनीय था। काफी दूर तक इस सुंदर नजारे का आनंद लेते रहे। पृष्ठभूमि में बादलों से ढकी हिमालय की पर्वतश्रृंखला व इनमें सबसे ऊँची चोटी पर कुंजा देवी के दर्शन हमें यहाँ से प्रत्यक्ष थे। रास्ते भर दनदनाते नाले व झरने बहुतायत में कदम-कदम पर स्वागत करते मिले व यात्रा को खुशनुमा बनाते रहे। आश्चर्य नहीं की यात्रीगण इनके किनारे अपने वाहन खड़ा कर इनमें स्नान से लेकर जल क्रीडा-क्लोल का पूरा आनन्द ले रहे थे।

थोड़ी ही देर में हम लक्ष्मणझूला से गुजरे। यहाँ खड़ी टेक्सियां यात्रियों को जीप सफारी के लिए आमंत्रण दे रही थी। यहाँ के कई मंजिला मंदिरों को पार करते हुए जल्द ही हम गंगाजी के एकदम किनारे आगे बढ़ रहे थे। गंगाजी पूरे बेग में हिमालय से उतरी भगीरथी, मंदाकिनी और अल्कनंदा की बरसाती धाराओं को समेटे महाबेग के साथ बढ़ती भयमिश्रित श्रद्धा का नजारा पेश कर रही थी। रास्ते में सड़क अपना असली परिचय देना शुरु कर चुकी थी। हर दस कदम पर गढ़ों की भरमार चालक की परीक्षा ले रही थी और सवारी को भी संभलकर बैठने का मौन-मुखर संदेश दे रही थी।

रास्ते में वाइं ओर से उसपार के नेशनल हाइवे से जोड़ता पुल मिला। आगे सड़क के किनारे योगा केंद्रों की भरमार मिली। पता चला कि यहाँ विदेशी पर्यटक शांति की खोज में यहाँ पर एकांत में स्थित योगा संस्थानों मेंं आते रहते हैं। कुछ किमी तक गंगाजी के किनारे आगे बढ़ते रहे, उसपार समांनांतर सडक पर देवप्रयोग की ओर बाहन बढ़ रहे थे, और इस ओर हम गंगाजी की धारा के विपरीत नीलकंठ की ओर। थोड़ी ही देर में रास्ता गंगाजी की धारा से मुडते हुए दाईं ओर से ऊपर चढ़ रहा था। वाईँ ओर से हिम्बल नदी का निर्मल नीला जल बहुत शांति सकून दे रहा था। इसके किनारे बसे धान के हरे खेत और गांव बहुत ही सुंदर  लग रहे थे, जिन्हें हम यथासंभव कैमरे में कैद कर रहे थे।

बारिश की हल्की बुंदे लगा हमारा स्वागत अभिसिंचन कर रही थीं। लेकिन जब बारिश और तेज हो चली, तो हम अपना-अपना रेनकोट, विंडचीटर आदि पहन कर आगे की चढ़ाई पार करते चले। रास्ते भर हर दिलकश नजारों को कैद करता कैमरा अब बंद हो चुका था। अब तक की यात्रा का सुहाना सफर अब तेज हो रही बारिश के साथ चुनौतीपूर्ण रोमांच में बदल चुका था। सड़कों में गढ़े रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। हर मोड़ पर दनदनाते नाले स्वागत कर रहे थे, बढ़ती बारिश के कारण इनका वेग चरम पर था और पानी का रंग कहीं लाल, कहीं काला, कहीं गेरुआ रंग लिए था। कहीं-कहीं नालों के कारण बने गढ़े इतने खतरनाक थे की थोडी सी भी चालक की असावधानी और नौसिखियापन एडवेंचर को मिस-एडवेंचर में बदल सकता था। साथ ही भूस्खलन के कारण मार्ग में फैली चिकनी मिट्टी ड्राइविंग स्किल का पूरा इम्तिहान ले रही थी।

बारिश का सिलसिला कहीं थमता, फिर शुरु होता। इस बीच रास्ते में आसमान छूती पहाडियां, इन पर छाई धुंध, दूर इनको कवर करती दूसरी कई पहाडियां बरबस ही ध्यान खींच रही थी। कैमरा बंद होने के कारण मोबाइल कैमरे से ही इनको यथासंभव केप्चर करते रहे। बारिश तेज हो चुकी थी। और हम नीलकंठ के स्वागत गेट को पार कर चुके थे। अब महज 6 किमी बाकि थे। लगभग 3 किमी के बाद गाडियों की भीड़ दिखी और पुलिस का दल। हम बारिश से बचने के लिए स्कूटी को मंदिर के समीप तक ले जाने की सोचे थे किंतु यातायात के पुलिस नियमों का पालन करते हुए वाहन यहीं रोकना पड़ा।

आगे का 3 किमी पैदल सफर धुंआधार बारिश के बीच पूरा हुआ। रुकने का कोई बिकल्प नहीं था, क्योंकि आज ही एक घंटे के अंदर अंधेरे से पहले नीचे उतरना था। इसलिए पुलिस की रोक टोक व यातायात के अमानवीय नियमों पर पर्याप्त आक्रोश उबल रहा था, और नीलकंठ महादेव की इच्छा अभी समझ से परे थी। अब बारिश से बचने का विचार त्याग चुके थे और पूरी तरह भीगते हुए बारिश का आनन्द लेते हुए मंजिल की ओर बढ़ते रहे। रास्ते भर खाली सड़क को देखकर मन के तर्क को ओर बल मिल रहा था कि स्कूटी जैसे दुपहिया वाहन को तो कहीं भी खड़ा किया जा सकता था, इसमें ट्रेफिक जाम जैसी कोई बात ही कहां थी। फिर मंदिर गेट पर ही कई दुपहिया वाहनों को खड़ा देख तर्क ओर पुष्ट हुआ।

जाने पहचाने मार्ग से हम मंदिर परिसर में प्रवेश किए। विष्णुकूट, ब्रह्मकूट और मणिकूट पर्वत से झरती मधुमता और पंकजा नदियां बरसाती बेग के साथ झर रहीं थी, दोनों संगम स्थल पर मिलकर नीचे कोलाहल करती हुई बढ़ रही थी। मंदिर गेट पर जूता उतार, दुकान से गंगाजल प्रसाद आदि लिए। स्थानीय दुकानदार को अपनी पार्किंग और भीगने की कथा-व्यथा वताई। जबाव तुरंत हाजिर था कि भोले के दरवार में 1-2 किमी पैदल चलकर आना तो अच्छी बात है, तप-पुण्य का कार्य है, इससे उनका सुमरण भक्ति ओर प्रगाढ़ होती है। दुकानदार का यह आस्थापूरित विचार हमें देववाणी जैसा लगा और हमारे मन का गुबार आधा शांत हो चुका था। अब तक की घटना को प्रभु इच्छा मान शांत मन से मंदिर में प्रवेश किए। पूर्जा अर्चना कर संगम को पार कर चाए की दुकान में ठौर ठिकाना बनाए।

भीगने की ठंड़क को गर्म चाय की चुस्की के साथ दूर करते रहे। इसके साथ ही कुछ पल आत्म चिंतन-मनन के बीते। जीवन दर्शन इस सफर के साथ कुछ ओर स्पष्ट हो चला। अपना चाय नाश्ता कर हम बापिस अपने वाहन की ओर चल दिए। समय का अभाव था सो आज यहींं से बापिस लौटना था। ज्ञातव्य हो कि यहीं से लगभग 2 किमी की दूरी पर पहाड़ी पर बसा माँं पार्वती का, भुवनेश्वरी मंदिर है। उसके लगभग 2 किमी आगे कार्तिकेय की तपःस्थली झिलमिल गुफा है, जो स्वयं में दर्शनीय स्थल है। मान्यता है कि गुरुगोरखनाथ जी ने यहीं शावर मंत्रों को सिद्ध किया था। यहीं से लगभग 1 किमी आगे गणेश गुफा है। इस तरह पूरा शिव परिवार यहाँ 5 किमी के दायरे में बसा है। इसी रास्ते में गंगा दर्शन ढावा है, जहाँ से नीचे गंगा जी व हरिद्वार पर्यन्त दृश्यों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। यदि 1-2 घंटे और होते तो इनको भी अवश्य घूम लेते। समयाभाव के कारण इस इच्छा को अगली यात्रा के लिए छोड़ आए।

अब तक भीगे कपड़े सूख रहे थे। मौसम देखकर आश्चर्यचकित थे की अब बारिश का नामोनिशान नहीं था, बारिश थम चुकी थी। मौसम बहुत ही सुहावना लग रहा था। सामने गांव, संग हरे भरे खेत ओऱ पीछे पहाडियों में छाई धुंध व बादल के उड़ते फाहे एक आलौकिक एवं स्वर्गोपम दृश्य का सृजन कर रहे थे। रास्ते भरे इनको निहारते हुए आगे बढ़ते रहे व इनके साथ कुछ यागदार फोटो लिए। अबतक बारिश में भीगने का गम छूमंतर हो चुका था। स्कूटी को 3 किमी पहले खड़ा करने का आक्रोश शांत हो चुका था। तीर्थ स्थल का चित्त प्रशांतक प्रताप प्रत्यक्ष था और भोले बाबा की लीला कुछ समझ में आ रही थी। लगा सब एक सबक भरी परीक्षा थी, जो हमें सकारात्मक सोच व तर्क-आस्था के अंतर का पाठ सिखा गई। 3 किमी उतराई के बाद हम पार्किंग पहुँचे। 


स्कूटी में चढ़कर रास्ते भर फोटो खींचते हुए नीचे उतरे। चढ़ाई में बारिश के कारण जहाँ फोटो नहीं खेंच पाए थे वह कमी पूरी हो रही थी। प्रकृति का न्याय साफ दिख रहा था। आधा-पौना घंटे बाद अंधेरा गहरा हो रहा था। गढ़ों से भरी सड़क को पार करते हुए शीघ्र ही हम गंगाजी के किनारे पहुंच चुके थे। और थोड़ी ही देर में पुल पार करते हुए दाईं ओर बद्रीनाथ-हरिद्वार नेशनल हाइवे पर थे। रात के 8 बज चुके थे। लक्ष्मणझूला रामझूला पार करते हुए हम ऋषिकेश पहुंचे। आगे हरिद्वार तक भारी ट्रेफिक के बीच रात के 9 बजे देसंविवि पहुंचे।  
  
इस तरह 6 घंटे का यह श्रद्धा और रोमांच से भरा सफर पूरा हुआ। थकान तन पर अवश्य हावी थी, लेकिन मन संताप से हल्का मस्त मग्न था और सफर के एडवेंचर भरी सुखद समृतियों की जुगाली कर रहा था। इन्हीं को सुमरण करते हुए कलमबद्ध यात्रा वृतांत आपके सामने प्रस्तुत है। 
(अगर आपका कोई सुझाव या फीडबैक हो तो अवश्य सूचित करें, जानकार प्रसन्नता होगी व आवश्यक सुधार कर सकेंगे।)
    यदि नीलकंठ महादेव के संदर्भ में और अधिक जानकारी लेनी हो व इसके सभी ट्रैकिंग मार्ग को जानना हो तो हमारी पिछली ब्लॉग पोस्ट श्रद्धा और रोमाँच का अद्भुत संगम को पढ़ सकते हैं।

चुनींदी पोस्ट

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