बुधवार, 20 मई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-2


पहाड़ों के बीहड़ बन की गहराईयों से पहला गाढ़ा परिचय
प्रातः चाय-नाश्ता कर हम बीहड़ वन की गहराईयों को एक्सप्लोअर करने के लिए आगे बढ़ते हैं। गेस्ट हाउस से पीछे शाड़ी नामक ढलानदार थोड़े खुले क्षेत्र से होकर गुजरते हैं, जहाँ जंगली पालक बहुतायत में लगी थी। जरुरत पड़ने पर इसका चाबल या रोटी के साथ भोजन में बेहतरीय प्रयोग किया जा सकता था। अब देवदार का जंगल घना होता जा रहा था। थोड़ी देर में एक पहाड़ी नाला आता है, इसको पार कर हम दूसरी ओर एक ढलानदार मैदान की ओर चढ़ाई करते हैं। यहाँ भांड पात्थर नामक स्थान पर एक बड़ी सी समतल चट्टान पर चढ़कर यहाँ का सुंदर नजारा लेते हैं। यहाँ देवदार से घिरे बुग्याल में चम्बा के खजियार और काश्मीर की घाटियों की झलक आ रही थी। यह बुग्याल भेड़-बकरियों के चरने के लिए एक आदर्श स्थल था।
यहीं पर सत्तु-गुड़ का हल्का नाश्ता लेते हैं। यहाँ ठण्ड इतनी थी कि हाथ की ऊँगलियाँ जैसे जम रही थी। नाश्ते के बाद हम वुग्याल के पार दाएं ऊपर की ओर जंगल में प्रवेश करते हैं। यह थोड़ा चट्टानी क्षेत्र था, जहाँ आगे देवदार के पेड़ के दो-तिहाई ऊँचाई को छूते दो समानान्तर चट्टानों को लेकर एक चूल्हानुमा आकृति हमें रोमांचित करती है, जो पाँडू चूल्हा नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि पाण्डव अज्ञातवास के दौरान यहाँ से गुजरे थे और यह उनका बनाया हुआ चूल्हा है, जिसको पीछे से जाकर चढ़कर इसकी समतल चट्टानों पर बैठकर इसका अनुभव लेते हैं। अनुमान लगाते रहे कि पाण्डव कितने ताकतवर रहे होंगे, साथ ही कितना ऊँचे भी। 
फिर हम नीचे उतरे और भांड़ पात्थर पहुँचे। यहाँ से तिरछी ऊँचाई पर ऊपर देऊधाणा स्थल पड़ता है, जो भेड-बकरियों के विश्राम के लिए अनुकूल स्थान माना जाता है, जहाँ फुआल (गड़रिए) अपने झुंडों के साथ रहते हैं। आज समय अभाव के कारण वहाँ पहुँचना संभव नहीं था। भाण्ड पात्थर से दक्षिण की ओर सीधा रास्ता माऊट नाग नामक बीहड़ एकाँत में स्थित तीर्थ स्थल एवं वन्य संरक्षित इलाके से होकर
आगे मुख्य मार्ग से मिलता है और सीधे घाटी के छोर पर पहाड़ की चोटी पर स्थित प्रख्यात बिजली महादेव मंदिर तक जाता है। हम इसके ठीक बिपरीत उत्तर दिशा की ओर सीधी पगडंडी के सहारे आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में यहाँ भालूओं के जमीन को खोदने के निशान दिखे। हालाँकि ये ताजा नहीं थे। मालूम हो कि भालू जड़ी बूटियों का भी शौकीन होता है और इनकी जड़ों को खोदकर खाता है। शहद उसका पसंदीदा भोजन माना जाता है। जंगल में उगने वाले कैंट, एक तरह के जंगली बागूकोशा के पक्के मीठे फलों को भालू पड़े चाव से खाता है। खैर हम बीहड़ बन में आगे बढ़ रहे थे, पूरी साबधानी के साथ, कुछ हल्ला व शौर करते हुए, जिससे कि यदि कोई भालू कहीं हो तो दूर भाग जाए।
रास्ते में उबल्दा स्थान आता है, जहाँ जमीं से फूटता पानी का चश्मा किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था।
यह शीतल एवं निर्मल जल उबाल के साथ बाहर निकल रहा था, जिस कारण इसका नाम ऐसा (उबल्दा) पड़ा। भादों की बीस (प्रायः सितम्बर माह का पहला सप्ताह, जब ये वुग्याल जंगली फूलों के सजे होते हैं) को लोग विशेषरुप में यहाँ पुण्य स्नान के लिए आते हैं। इसके जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है और दिव्य भी। यहाँ पर हल्का नाश्ता कर हम आगे बढ़ते हैं। ऐसे पहाड़ों में ट्रेकिंग करने वालों का यह आम अनुभव रहता है कि यहाँ का जल इतना सुपाच्य एवं औषधीय होता है कि भूख बहुत जल्द लगती है, जठाग्नि जैसे अपने चरम पर प्रदीप्त होती है और कुछ भी खाओ जैसे तुरन्त पच जाता हो।
आगे रास्ते में दूंअधड़ा थाच पड़ा, जहाँ लकड़ी व घास की झौंपड़ी में ग्वाले अपने मवेशियों के साथ रह रहे थे। थोड़ा नीचे आगे तंदला सोर (सरोवर या ताल) पड़ता है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसके तल पर कोई पत्ता तक नहीं गिरता। चिडिया गिरते पत्तों के तुरंत उठा लेती है। हम समय अभाव के कारण इसके भी दर्शन नहीं कर पाए।
हम सीधा आगे बढ़ रहे थे। आगे पटोऊल स्थान हमारा आज का गन्तव्य स्थल था, जहाँ नीचे फूटा सोर (सरोवर) पडता है।
मान्यता है कि भगवती दशमी वारदा (इलाके में मान्य दुर्गा माता का कन्या रुप) ने अपनी कनिष्ठिका उँगली से इसको फेर कर कभी भयंकर सूखे का निवारण किया था और यहाँ पर अधिकार जमाए असुर का बध किया था। यहाँ आज भी दलदली सरोवर बीच में टापू का आकार लिए हए है। यहाँ से हम पीछे पहाड़ के सबसे ऊचे बिंदु पर चढ़ जाते हैं, जहाँ से पीछे की मणिकर्ण घाटी के दर्शन प्रत्यक्ष थे। नीचे पार्वती नदी बह रही थी, और ऊपर घाटी में क्षाधा-बराधा और दूसरे गाँव उस पार दिख रहे थे। यह हमारे लिए एक अदभुत नजारा था, क्योंकि पहाड़ के शीर्ष से क्या दिखता होगा, यह आज समझ आ रहा था। आसमान तक जाने का तो कोई रास्ता संभव नहीं दिखा, लेकिन पीछे दूसरी अनेकों घाटियों के दर्शन और सुदूर हिमाच्छादित विराट पर्वतश्रृंखलाओं के मनोरम नजारे हमें रोमाँचित कर रहे थे।
यही हमारा आज का गन्तव्य स्थल था और आज तक बचपन की वाल जिज्ञासाओं का समाधान भी। इसके आगे रास्ता रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास पहुँचता है और आगे मलाना गाँव (विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र) पड़ता है। अब तक दोपहर हो चुकी थी। हम यहीं से बापिस हो जाते हैं, उबल्दा पहुँचते हैं और शॉर्ट कट से नीचे मुख्य मार्ग में पहुँचते हैं और कच्चे मोटर रुट के साथ नग्गर-बिजली महादेव कीसड़क पर आगे बढ़ते हैं। 
 रास्ते में रेउँश गेस्ट हाउस मिलता है, जहाँ हम रात को रुके थे तथा सुबह बीहड़ वन को एक्सप्लोअर करने का अभियान शुरु किए थे।
    इसके आगे रास्ते में चट्टानी पहाड़ को काटकर बनाए रास्ते को देखते हैं, जहाँ गुफानुमा स्थलों में नाईट हाल्ट की कामचलाऊ व्यवस्था दिखी। इस राह की खासियत देवदार के साथ रई-तोष के घने जंगल लगे एवं साथ में जल की प्रचुरता, जो सीधे नीचे सेऊबाग नाले को समृद्ध करते हैं, जिसका जिक्र हम पिछले कई ब्लॉग्ज में विस्तार से कर चुके हैं।
हाइणी थाच स्थान से हम मुख्य मार्ग से हटकर पगडंडी के सहारे नीचे की और बापसी के रास्ते चल देते हैं। सूर्य भगवान लगभग अस्त हो रहे थे। यहाँ हम सीधी धार (रिज) की उतराई भरी कच्ची पगडंडियों पर तेज कदमों के साथ नीचे उतर रहे थे। लक्ष्य अब एक ही था, अँधेरा होने से पहले घर पहुँचना। रास्ते में काली जोनी व मेंह स्थलों को पार करते हुए दाड़ू री धारा स्थान पर पहुँचते हैं। अभी भी यहाँ से नीचे गाँव-घर के दर्शन नदारद थे। यहाँ से हाका देने री धारा स्थल को पार कर नीचे छाऊँदर नाला के टॉप पर पहुँचते हैं, जहाँ से अब नीचे गाँव-घर के दर्शन हो रहे थे।
लग रहा था कि अब हम लोग घर पहुँच ही गए। कुछ मिनटों में सेऊबाग नाला के समानान्तर चट्टानी उतराई के साथ केक्टस के जंगल को पार करते हुए हनुमान मंदिर पहुँचते हैं। फिर सीधे रास्ते अपने-अपने घर की ओर कूच करते हैं। 
सफर हालाँकि थका देने वाला था, लेकिन आज जितने सवालों के जबाब मिल रहे थे, वे महत्वपूर्ण थे। मन की कई जिज्ञासाएं शांत हो गईं थीं। पहाड़ों के प्रति रूमानी भाव के साथ एक नयी समझ, एक व्यवहारिक अंतर्दृष्टि विकसित हो चुकी थी। 
    ऐसा ही बाद का एक ट्रैकिंग एडवेंचर अपने भाईयों व मित्रों के साथ हमें याद है, अप्रैल या मई माह के दिन थे, जब ऊँचाईयों में हल्की बर्फ जमीं थी। इस टूर में पांडू चूली के पास बर्फ में भालू के ताजा निशां दिखे थे। इस बार हमारा शेरु कुत्ता भी साथ में था। भालूओं के सामना होने पर इनसे भिड़ने की तैयारी हमारी अधूरी थी, अतः हम सब लोग दबे पाँव बापिस हट गए थे, जो हमारा समझदारी भरा कदम था।
आगे दूंअधड़ा के पास बर्फ इतना अधिक थी कि हम आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं थे, बार-बार ढलान में फिसलने का खतरा बढ़ रहा था और इसके साथ यहाँ भी भालूओं के पंजों के ताजा निशां मिल चुके थे और हम बापिस आ गए। लेकिन इस बार हम उबल्दा से मुख्य मार्ग में न उतर कर सीधा भाण्ड पात्थर से होकर माऊट नाग पहुंचते हैं,
इसके संरक्षित क्षेत्र में फूलों से सजे बुग्याल को पार करते हुए नग्गर-बिजली महादेव सड़क पर उतरने के बाद बिजली महादेव तक गए थे। बापसी में हाइणी थाच से होते हुए इस बार अपने पैतृक गाँव गाहर से होकर नीचे उतरे थे। यहाँ से गाँव के दर्शन तो नदारद थे, लेकिन कुल्लू-ढालपुर मैदान के विहंगम दर्शन हो रहे थे और पीछे लग वैली और मंडी साईड की पर्वतश्रृंखाएं दिख रही थीं। गाहर गाँव से हम फिर सेऊवाग गाँव तक पैदल आधा-पौन घंटे में पहुँचे थे। (आज पक्की सड़क बन चुकी है, जिसमें मात्र 10-15 मिनट में सेऊबाग से गाहर गाँव का रास्ता तय हो जाता है)
हर यात्रा हमें पहाड़ों के प्रति और गहराई में उतार रही थी। घरवालों, पड़ोसियों एवं गांव वालों के सवाल के चिरपुरातन प्रश्न का जबाब अब भी हमारे पास नहीं था कि इन पहाड़ों में ऐसा रखा क्या है, जो छुट्टियों में सीधे यहाँ घूमने चल देते हो। लेकिन नियति हमें किसी निर्धारित गन्तव्य की ओर ले जा रही थी। काल के गर्भ में पकती इस खिचड़ी का स्वरुप कुछ वर्षों बाद स्पष्ट होता है, जब अपनी बीटेक की पढ़ाई पूरा करने के बाद हमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान में प्रवेश मिलता है और यहाँ से अनुभवी प्रशिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सुअवसर मिलता है, जिसकी रोचक, रोमाँचक एवं कहीं-कहीं रोंग्टे खड़े करने वाली दास्ताँ हिमवीरु के अगली पोस्टों में शेयर होती रहेगी, जिसका पहला भाग आप नीचे की पोस्ट में पढ़ सकते हैं।
 
 
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