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रविवार, 31 जनवरी 2021

Creative use of stress and emotions

 तनाव एवं भावनाओं का रचनात्मक प्रयोग

Stress  दैनिक जीवन में तनाव का आना स्वाभाविक है, यह जीवन का अंग है। जब व्यक्ति किसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति का सामना करता है तो फाईट या फ्लाइट (जुझो-लड़ो या भागो) की स्थिति में शरीर से ऐसे जैविक रसायन (Harmons) निकलते हैं, जो उसे इनका सामना करने के लिए तैयार करते हैं। व्यक्ति इनसे निपटने के लिए आवश्यक तत्परता, जुझारुपन और एकाग्रता से लैंस हो जाता है तथा इनके पार हो जाता है।

इस तरह तनाव जीवन का एक सहायक तत्व है, लेकिन जब यह तनाव किसी कारणवश लगातार लम्बे समय तक बना रहता है, तो यह तन-मन के लिए नुकसानदायक हो जाता है और यह व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। ऐसे में व्यक्ति की मानसिक एकाग्रता, यादाशत एवं कार्य करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है। व्यक्ति सही ढंग से भोजन नही कर पाता, नींद डिस्टर्ब हो जाती है। प्रायः तनाव में व्यक्ति या तो भूखे रहता है या अधिक खाने की समस्या से ग्रसित हो जाता है। उसे छोटी-छोटी बातों पर खीज व गुस्सा आने लगता है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। चुनौतियों से जूझने और सामना करने की क्षमता चूकने लगती है। व्यक्ति बहुत जल्द थक जाता है और हताश-निराश हो जाता है। 

और इसके बढ़ने पर व्यक्ति कई तरह के मनोविकारों, जैसे – चिंता, हताशा-निराशा, अवसाद, उद्गिनता, भय आदि से ग्रस्त हो जाता है। इनसे उबरने के चक्र में कई लोग तो शराब, नशे आदि के भी शिकार हो जाते हैं। शरीर व मन पर तनाव के पड़ने वाले दबाव समय के साथ कई तरह के मनोकायिक रोगों (Psychosomatic disorders) के रुप में प्रकट होने लगते हैं, जैसे – उच्च-रक्तचाप, हाईपरटेंशन, मोटापा, मधुमेह, ह्दयरोग, अस्थमा, सरदर्द आदि।

जीवन में तनाव के कई कारण हो सकते हैं। इनमें कई परिस्थितियाँ भी भारी तनाव का कारण बनती है, जैसे – किसी प्रिय का बिछुड़ना, मृत्यु, तलाक, रिटार्यमेंट, आर्थिक तंगी, गरीबी, बेरोजगारी, दीर्घकालीन बिमारी, पारिवारिक झगड़े, आपसी क्लह आदि। अचानक मिली कोई बड़ी उपलब्धि, धन-लाभ, लॉटरी, शादी, सफलता आदि भी परिस्थितिजन्य तनाव का कारण बनते हैं। ये तनाव समय के साथ स्वयं ही शांत होते जाते हैं। हालाँकि व्यक्ति अपनी सूझ, परिपक्वता एवं मनोबल के आधार पर इनसे बखूबी निपट लेता है व ये अधिक चिंता का कारण नहीं रहते।

परिस्थिति के अतिरिक्त अधिकाँश तनाव व्यक्ति की बिगड़ी जीवनचर्या, असंयमित आहार-विहार, नकारात्मक सोच एवं अवांछनीय व्यवहार के कारण पैदा होते हैं। नियमित आत्म-निरीक्षण के साथ जीवन में व्याप्त हो रहे ऐसे तनाव को इनके मूल में सक्रिय कारणों को खोजकर, रचनात्मक ढंग से निपटाया जा सकता है।

Steps for creative use of stress

·         तनाव के कारण खोजेंगे, तो अकसर पहले बाहर ही दिखने को मिलेंगे, इनके मूल को अपने अंदर (जीवन शैली, आहार-विहार, सोच, व्यवहार,) खोजने का प्रयास करें और फिर इनके उपचार का प्रय़ास करें।

·         अपनी जीवन शैली में आवश्यक सुधार करें। इसके लिए अपने आहार-विहार को अनुशासित करें। समय पर सोने-जागने का क्रम बनाएं। हर कार्य को प्राथमिकता के आधार पर निपटाएं।

   अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरुप रोज कुछ व्यायाम करें। गहरी सांस लें, प्राणायाम का अभ्यास करें। अपनी हॉवी व शौक को भी रोज कुछ समय दें। 

·         अपने विचार शैली में सुधार का प्रयास करें। इसको सकारात्मक बनाएं। इसके लिए श्रेष्ठ पुस्तकों को पढ़ें, आध्यात्मिक महापुरुषों का सत्संग करें। और हमेशा मन को लक्ष्य केंद्रित या फोक्सड रखें तथा श्रेष्ठ विचारों से ओत-प्रोत रखने का प्रयास करें।

·         अपने व्यवहार को दुरुस्त करें। बढ़ों को सम्मान दें, छोटों को स्नेह प्यार दें। अपने सहपाठियों के साथ मिलजुल कर रहें। सबके साथ बिनम्रता, शालीनता पूर्वक व्यवहार करें। कोई कैसा भी व्यवहार करें, अपना व्यवहार एवं वाणी को न बिगड़ने दें, अपनी गरिमा बनाए रखें।

·         अपने स्वभाव को ठीक करने का प्रयास करें, जो कि सबसे कठिन कार्य होता है। इसके लिए आध्यात्मिक उपचारों की मदद लें। उपासना, ध्यान, प्रार्थना आदि को जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। रोज इनके लिए कुछ समय निकालें, बल्कि हर पल इनसे ओत-प्रोत करने का अभ्यास करें।

·         यदि हम आध्यात्मिक जीवन दृष्टि एवं जीवन शैली को अपनाते हैं तो कठिन से कठिन तनावपूर्ण परिस्थिति का रचनात्मक उपयोग कर सकते हैं। महाभारत के रणक्षेत्र में अवसादग्रस्त अर्जुन इसी आधार पर भगवान श्रीकृष्ण के सान्निध्य में विषाद को योग में बदलते हैं।

·         नियमित रुप से गीता के कुछ सुत्रों का स्वाध्याय करे व इनका चिंतन-मनन करें और जीवन में धारण करने का प्रयास करें। कुलाधिपति महोदय की गीता-ध्यान कक्षाओं में इन सुत्रों की सरल एवं व्यवहारिक व्याख्याओं को समझा जा सकता है।

·         गलत लोगों के संग साथ से बचें। सही संगत न मिल पाने की स्थिति में बुरी संगत से अकेला भला (Better alone than bad company) एक आदर्श नीति हो सकती है। मोबाईल का संयमित एवं अनुशासित प्रयोग करें, क्योंकि इसका अधिक उपयोग तनाव का एक बड़ा कारण बनता है।

·         नियमित रुप से किया गया डायरी लेखन मन के तनाव को हल्का करने का रामवाण उपाय सावित हो सकता है, इसे अवश्य अपनाएं। प्रकृति की गोद में कुछ पल अवश्य बिताएं, आपका तनाव हल्का होगा।

·         एक समय में एक ही काम करें, इसके बाद ही दूसरे कार्य में हाथ लगाएं। एक साथ कई काम करने से बचें और छोटे-छोटे कदमों को बढ़ाते हुए बढ़ा लक्ष्य हासिल करें।

·         अति महत्वाकाँक्षा से बचें। अपने मौलिक लक्ष्य को पहचानें। अपनी क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे आगे बढ़ें। दूसरों से अनावश्यक कंपेटिशन से बचें। ईर्ष्या-द्वेष, निंदा-चुग्ली आदि से दूर ही रहें।

 


Emotions, what it is? ईमोश्न व्यक्ति के ह्दय से जुड़े भाव हैं। ये बहुत कुछ हमारी मान्यताओं, धारणाओं एवं स्व के भाव पर निर्भर करते हैं। संक्षेप में ये हमारी भावनाओं से जुड़ी शक्ति हैं, जो जीवन की प्रेरक शक्ति का काम करते हैं, जिसके मूल में होता है व्यक्ति का स्व का भाव, सेल्फ-एस्टीम व अपने प्रति धारणा। यदि यह सकारात्मक है तो व्यक्ति का संतुलित भावनात्मक विकास होता है और व्यक्ति आत्म-विश्वास, आत्म-गौरव के भाव से भरा होता है और अदक ये नकारात्मक हैं तो व्यक्ति हीनता या दंभ आदि से पीडित पाया जाता है। 

How negative emotions disturb life? प्रायः बचपन में लालन-पालन में उचित भावनात्मक पौषण, परिवार का बिगड़ा माहौल आदि इसके विकास में प्रारम्भिक अबरोध बनते हैं। कुछ जन्मजात या आनुवांशिक कारणों (genetic) से भी इसका नकारात्मक विकास होता है। जिस कारण भावनात्मक शुष्कता, न्यूनता या विकृतियां, जीवन भर व्यक्ति को परेशान करती हैं। और व्यक्ति या तो हीनता-कुण्ठा-अपराध बोध से पीड़ित रहता है या फिर दर्प-दंभ-अहंकार आदि से ग्रसित पाया जाता है। ऐसे भावदशा में व्यक्ति की रचनात्मक शक्ति या क्रिएटिविटी कुंद पड़ जाती है। अतः क्रिएटिव एक्सलैंस के लिए इस अवस्था से उबरना आवश्यक हो जाता है।

जो भी हो, व्यक्ति जहाँ खड़ा है, वहीं से आगे बढ़ते हुए अपने भावनात्मक विकास को रचनात्मक दिशा दे सकता है।

Creative use of emotions, steps

सबसे पहले अपनी भावनात्मक अवस्था को समझें और इसे स्वीकार करें।

·       दूसरों से अधिक आशा अपेक्षा न रखें। जिसके प्रति जो कर्तव्य बनता है, उसे निष्ठा के साथ पूरा करें। 

·        किसी के प्रति अधिक लगाव या मोह न पालें। अपनी भावनाओं के तार व्यक्ति की अपेक्षा अपने आदर्श, ईष्ट या सद्गुरु से जोड़ें। व्यक्ति से भी अपने भावनात्मक सम्बन्ध को भी इसी प्रकाश में रखने का प्रयास करें।

·        किसी चीज को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं। नम्र रहें। दूसरों की भी भावनात्मक स्थिति को समझें व उसी अनुरुप व्यवहार करें।

·        अत्यधित संवेदनशील या भावुक न बनें। जीवन को समग्रता में समझने की कोशिश करें, मजबूत बनें तथा संतुलित रहें।

  दूसरों की बात को पूरी तरह सुने-समझें, तभी जबाव या समाधान दें। 

   जरुरतमंदो की सहायता करें। रोज एक सेवा कार्य बिना किसी अपेक्षा या स्वार्थ के करें। निष्काम सेवा का यह प्रयोग चित्तशुद्धि का एक प्रयोग सावित होगा।

·   ·     संयम, सहिष्णुता, उदारता और सेवा-सहकार के व्यवहारिक सुत्रों का अभ्यास करें।

·        अपनी अंतर्वाणी को सुने व इसका अनुसरण करें।

    इसके साथ अपने भावों को गीत-संगीत, लेखन, चित्रकला या अन्य माध्यमों से प्रकट करें। इसमें आपके सकारात्मक भावों के साथ नकारात्मक भावों को भी रचनात्मक अभिव्यक्ति मिलेगी। डायरी लेखन इसमें बहुत सहायक सिद्ध होगा।

 

जीवन में सबसे अधिक तनाव, अवसाद और विषाद की स्थिति तब बनती है, जब व्यक्ति जन्मजात किसी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्माक, आर्थिक या आध्यात्मिक न्यूनता, अशक्तता या अपंगता से ग्रस्त होता है। लेकिन व्यक्ति अपनी इच्छा शक्ति, कल्पना शक्ति, विचार शक्ति एवं भावनात्मक शक्ति का रचनात्मक उपयोग करते हुए इन न्यूनताओं पर विजय पा सकता है और आगे बढ़ सकता है। यहाँ तक कि अपने चुने हुए क्षेत्र में शिखर तक पहुँच सकता है।

ऐसे ही संकल्प शक्ति के धनी और अपने क्षेत्र में क्रिएटिव एक्सलेंस के शिखर को छूने वाले लोगों के उदाहरणों को आप पढ़ सकते हैं, आगे दिए लिंक में मानवीय इच्छा शक्ति के कालजयी प्रेरक प्रसंग

जरा सोचें (Just Think & Ponder!!)

·         आपके जीवन में तनाव, अवसाद या विषाद की स्थिति बनने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रहती है?

·         आप इनके लिए कितना दूसरों को या परिस्थिति को दोषी मानते हैं तथा कितना इनकी जिम्मेदारी स्वयं पर लेते हैं?

·         उन परिस्थितियों को याद करें, जब आपने इन कठिन एवं विकट पलों का रचनात्मक प्रयोग किया हो? जबकि आप चाहते तो इसमें ध्वंसात्मक भी हो सकते थे।

·         आपकी जन्मजात या परिस्थितिजन्य न्यूनता, कमी, दुर्बलता या अपंगता क्या है, जिसे आप अपनी शक्ति बनाने के रचनात्मक प्रयास में लगे हैं?

·         क्या आपने अपने जीवन में कभी विषाद को योग में बदलते देखा है या प्रयास किया है? दुःख के पलों में स्वयं को समझने का प्रयास किया है?

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

रचनात्मक उत्कृष्टता (Creative excellence)

रचनात्मक उत्कृष्टता (Creative excellence)

अर्थ, उपकरण एवं प्रक्रिया (Meaning, its tools and process)

रचनात्मकता (Creativity) मनुष्य की एक ऐसी विशेषता है, जिसके आधार पर वह नित नूतन नया सृजन करता रहा है तथा समूची मानवीय सभ्यता-संस्कृति की विकास यात्रा आगे बढ़ी है। साहित्य, कला, मानविकी, धर्म-अध्यात्म, संस्कृति, दर्शन आदि इसी के परिणाम है, जो आज विज्ञान, टेक्नोलॉजी एवं संचार क्राँति के चरम पर विकास के वर्तमान मुकाम तक आ पहुँचा है।

रचनात्मकता (Creativity) का अर्थ कुछ नया सृजन करने की क्षमता से है, किसी कार्य को नए अंदाज से करने की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति की मौलिकता झलकती हो। इसमें किसी समस्या के रचनात्मक ढंग से समाधान की क्षमता भी शामिल है। सार रुप में, Creativity is to create something as if out of nothing…जो पहले था नहीं...। जैसे – कोई नई कविता, गीत, संगीत, चित्रकला, लेखन, विचार-पटकथा, फिल्म, अभिनय, शोध, फोटोग्राफी, खोज, आविष्कार आदि

रचनात्मक उत्कृष्टता (Creative excellence) किसी व्यक्ति की रचनात्मक क्षमता का अपने श्रेष्ठतम रुप में प्रदर्शन एवं अभिव्यक्ति है। जीवन प्रबन्धन के संदर्भ में, रचनात्मक उत्कृष्टता (Creative excellence) - स्वयं के व्यक्तित्व की कमियों, दुर्बलताओं और दुर्गुणों का परिमार्जन, परिष्कार तथा अपनी अंतर्निहित क्षमताओ, विशेषताओं एवं सद्गुणों का विकास, उभार है, जिससे कि व्यक्ति का Best version, श्रेष्ठतम स्वरुप  उभर कर सामने आ सके।

इसका आधार रहता है अपने व्यक्तित्व एवं जीवन की समग्र समझ (Holistic understanding of your personality and life), मौलिक लक्ष्य का निर्धारण (Goal setting) तथा उसे हासिल करने की प्रक्रिया, जिसके प्रधान उपकरण (Tools of creative excellence) हैं - कल्पना शक्ति (Imagination), इच्छा शक्ति (Will power), विचार शक्ति (Thought power), भावनात्मक शक्ति (Emotional power) आदि। रचनात्मकता को एक कला (Art) माना जाता रहा है, लेकिन यह स्वयं में एक बुद्धिमता (intelligence) भी है, जो उपलब्ध संसाधनों से कुछ नया एवं मौलिक सृजन को संभव बनाती है तथा जटिल समस्याओं के सरल समाधान प्रस्तुत करती है।

कल्पना के आधार पर व्यक्ति अपने मनचाहे वाँछित स्वरुप का निर्धारण करता है, विचार शक्ति के आधार पर कल्पनाओं को काटता तराशता है, अपने लक्ष्य को स्पष्ट करता है, इसको हासिल करने की रणनीति बनाता है तथा ईच्छा शक्ति के आधार पर लिए गए निर्णयों को क्रियान्वित करता है तथा अपने निर्धारित लक्ष्य को साकार करता है। भावनात्मक शक्ति इसमें आवश्यक ईँधन एवं प्रेरक शक्ति का काम करती है।

इस तरह रचनात्मक उत्कृष्टता वह प्रक्रिया है, जिसके आधार पर व्यक्ति जो चाहे कर सकता है, जैसा चाहे बन सकता है और अपनी मनचाही सृष्टि का सृजन कर सकता है। लेकिन यह अपनी मौलिक विशिष्टता के साथ तभी सम्भव हो पाता है, जब व्यक्ति इसके विज्ञान-विधान को समझता है तथा इसकी प्रक्रिया का अनुसरण करता है।

रचनात्मक उत्कृष्टता की व्यवहारिक प्रक्रिया (Process of Creative Excellence)

पहला चरण है अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारण – लक्ष्य ऐसा हो जो आपके व्यक्तित्व से मेल खाता हो, जिसमें आपकी इच्छा, आकाँक्षा, रुचि, पैशन (Passion) अभिव्यक्त होते हों, साथ ही यह आपकी क्षमताओं से भी जुडा हो। दूसरों की देखा देखी बिना स्वयं को समझे किया गया लक्ष्य का निर्धारण आगे चलकर एक बडी चूक हो सावित होता है, जिसके कारण व्यक्ति जीवन भर इसे भार की तरह ढोता फिरता है। जबकि अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुरुप चुना गया लक्ष्य व्यक्ति के लिए हर पग पर आनन्द का कारण बनता है, व्यक्ति इसको एन्जोय करते हुए आगे बढता है और धीरे धीरे अपने पूर्ण विकास को प्राप्त होता है। यदि आपका लक्ष्य आपकी मनपसंद का है तो रचनात्मक उत्कृष्टता स्वतः ही उभरने लगती है। आपके दैनिक कार्यों में मन की एकाग्रता सहज रुप से जुड़ती है तथा आप इसमें रोज प्रगति के नए आयाम छू रहे होते हैं।

दूसरा चरण है, जहाँ खड़े हैं वहीं से आगे बढ़ें। जीवन में आगे बढने के लिए किसी से तुलना-कटाक्ष में न उलझें। हर व्यक्ति की उपनी जीवन यात्रा है, वह आज जहाँ खड़ा है या खड़ी है, उसकी अपनी एक लम्बी विकास यात्रा का परिणाम है। आपकी अपनी जीवन यात्रा है, इसको समझने की कोशिश करें। सब एक विशेष मकसद के साथ धरती पर आए हैं। इसको जानने का प्रयास करें। अपना सही सही (सम्यक) मूल्याँकन आपको आगे बढ़ने का आधार देगा। यह जो भी है इसको ईमानदारीपूर्वक स्वीकार करें तथा यहाँ से आगे बढ़ना शुरु करें। आपको रोज अपने रिकॉर्ड तोड़ने हैं, अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन देना है। रात को सोते समय इस संतोष के साथ विस्तर पर जाना है कि जो बेहतरतम हम आज कर सकते थे वह हमने किया और कल हम इससे भी बेहतर करेंगे। प्रतिदिन पिछले कल से बेहतर करते हुए रचनात्मक उत्कृष्टता आपके जीवन का अंग बनती जाएगी। इस तरह परीक्षा की घड़ी के लिए आप हर रोज तैयार हो रहे होंगे न कि परीक्षा आने पर इसका आपात की तरह सामना करते हुए आपके हाथ पैर फूल रहे होंगे।

तीसरा चरण, रोज अपनी रचनात्मक प्रगति का लेखा जोखा करें – रोज रात को सोने से पूर्व स्थिर चित्त होकर बैठें। परमपूज्य गुरुदेव ने इसको तत्वबोध की साधना कहा है। इसमें दिन भर का लेखा जोखा करें। सुबह जो कार्य निर्धारित थे, उनमें से कितने काम संभव हुए और कहाँ पर चूक रह गई। अपने विचार, भाव एवं व्यवहार का क्रम दिन भर कैसा रहा, निर्धारित मानक से ये कहीं विचलित तो नहीं हुए। इसमें आहार-विहार, संग साथ की स्थिति को भी देख सकते हैं। इसके साथ आज की विशिष्ठ उपलब्धि क्या रही, क्या नए सबक मिले, दूसरों से क्या नया सीखा। इन सबका हिसाब किताब किया जा सकता है। समय कहाँ बर्वाद हुआ, इसका मूल्याँकन किया जा सकता है। अपनी भूल चूक के लिए प्रायश्चित का क्रम निर्धारित किया जा सकता है और संकल्प भी कि कल इससे बेहतर करेंगे। इस तरह हर रोज आप उत्कृष्टता के नए स्तर को छू रहे होंगे और आपका श्रेष्ठतम स्वरुप(Best version) उभर कर सामने आ रहा होगा।

चौथा चरण, डायरी लेखन को बनाए अपना साथी – इन अनुभवों को एक डायरी में कलमबद्ध करते जाएं। ये कुछ लाइन से लेकर कुछ पैरा में हो सकते हैं। यदि आप लगातार ऐसा करते गए तो, कुछ समय बाद आपके पास जीवन प्रबन्धन एवं व्यक्तित्व निर्माण से जुड़ी विचार सामग्री तैयार हो रही होगी। नियमित रुप से डायरी लेखन से आपकी लेखन शैली (Writing style) विकसित होगी, विचार-भाव और स्पष्ट होते जाएंगे, इनकी अभिव्यक्ति सटीक होती जाएगी। अपने व्यक्तित्व एवं स्वभाव का पैटर्न समझ आने लगेगा। जितना आप स्वयं को समझने लगेंगे, उतना ही दूसरों की समझ भी बढ़ेगी। धीर-धीरे जीवन का तत्व-दर्शन समझ आने लगेगा, जो स्वयं में एक बढ़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

इसके आधार पर एक संतुलित, सफल एवं सुखी जीवन संभव होता है, अन्यथा इस समझ के अभाव में व्यक्ति को इस बेशकीमती जीवन को यूँ ही बर्वाद करते देखा जाता है, जीवन उत्कृष्टता की वजाए निकृष्टता की सीढियों पर नीचे लुढ़क रहा होता है और घोर निराशा, अवसाद, विषाद एवं पश्चाताप के बीच जीने के लिए अभिशप्त होता है। नित्य स्व-मूल्याँकन (Self introspection) एवं डायरी लेखन इस त्रास्दी से व्यक्ति को उबारता है और एक सफल-सार्थक जीवन के साथ क्रिएटिव एक्सलैंस के पथ पर आगे बढाता है।

डायरी लेखन के लाभ को यदि और जानना हो तो आप दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं।

रोज तराशें व्यक्तित्व का हर आयाम – व्यक्तित्व को मोटे तौर पर चार आयामों में बाँट सकते हैं - शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक-व्यवहारिक एवं आध्यात्मिक। इनको नियमित रुप से तराशने का न्यूनतम कार्यक्रम निर्धारित किया जा सकता है।

अपनी पढाई लिखाई के साथ शारीरिक स्वास्थ्य का न्यूनतम कार्यक्रम बनाएं। जिसमें योग आसन, प्राणायाम, खेल कूद, टहल, जिम आदि को अपनी आवश्यकता एवं क्षमता के अनुरुप शामिल किया जा सकता है। आहार का अपने स्वास्थ्य, रुचि एवं स्वभाव के अनुकूल निर्धारण करें। पर्याप्त नींद और विश्राम का अनुपान रचनात्मकता में सहायक रहता है। कहावत भी प्रसिद्ध है कि Sound mind in a sound body अर्थात् स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है।

बौद्धिक विकास के लिए अपनी क्लास की पढ़ाई के साथ मोटिवेशनल एवं प्रेरक पुस्तकों के स्वाध्याय को शामिल करें। विश्व के श्रेष्ठतम साहित्य को पुस्तकालय में जाकर देखें व अपनी रुचि के अनुरुप अपने बौद्धिक आयाम को विस्तार दें। यह प्रयोग बौद्धिक उत्कृष्टता के लिए आहार का काम करेगा और आपका जीवन स्वतः ही श्रेष्ठ एवं महान कार्यों के लिए प्रेरित होगा।

भावनात्मक विकास के तहत किसी की भावनाओं को आहत न करें। दूसरों को सम्मान दें, बिनम्र रहें तथा यथायोग्य जरुरतमंदों की सहायता करें। एक अच्छा श्रोता बनें, दूसरों की बात को ध्यानपूर्वक समझ कर ही समाधान या परामर्श दें। शालीनता, सहकारिता, कृतज्ञता, उदारता, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों का अभ्यास करें। इससे आपसी सम्बन्ध बेहतरीन बनेंगे तथा आपके भावनात्मक स्तर पर उत्कृष्टता के द्वार खुलेंगे। दिन में एक कार्य बिना किसी आशा अपेक्षा के करें। निष्कार्म कर्म का ऐसा नन्हा सा प्रयोग मन को संतोष व आनन्द से भरेगा, जो रचनात्मक उत्कृष्टता का एक सबल आधार सावित होता है।

आध्यात्मिक विकास के तहत नित्य स्वाध्याय-सत्संग के साथ कुछ समय आत्मचिंतन मनन के लिए निकालें, जिसमें आत्म-सुधार से लेकर आत्म-निर्माण एवं विकास का खाका बनाया जा सकता है। कुछ मिनट ध्यान के लिए अवश्य निकालें। परिसर की आध्यात्मिक गतिविधियों में अपनी रुचि एवं समय के अनुरुप यथासंभव भाग लें। प्रातः आत्मबोध एवं सोते समय तत्वबोध को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

इसके अतिरिक्त अपने विषय एवं भावी प्रोफेशनल जीवन के अनुरुप आवश्यक कौशल (Skill) के विकास पर ध्यान दें। जहाँ कमजोर पड़ रहे हों, वहाँ नियमित रुप से एक निश्चित समय लगाएं एवं नित्य अभ्यास करें। इसमें अपनी भाषा, टेक्निक्ल स्किल या अन्य प्रोफेशनल या सॉफ्ट स्किल पर काम किया जा सकता है और अपने पेशे के अनुरुप व्यक्तित्व को तराशते हुए रचनात्मक उत्कृष्टता की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

इसके साथ जीवन के विद्यार्थी के रुप में अपने अनुभवों को अभिव्यक्त करते हुए रचनात्मक उत्कृष्टता के नए सोपान को छू सकते हैं। क्रिएटिव लेखन (Creative writing) इसका एक सशक्त माध्यम हो सकता है। अपने दैनिक अध्ययन, चिंतन, मनन, विचार मंथन, जीवन यात्रा के अवलोकन एवं अनुभव के आधार पर आप स्वयं के जीवन तथा चारों ओर की घटनाओं, स्थानों तथा तथ्यों को अपने अंदाज से देखते समझते हुए लिपिबद्ध करें। इसको डायरी लेखन का अगला चरण कह सकते हैं। नित्यप्रति अपने ऐसे अनुभवों एवं अवलोकन के आधार पर पक रही आपकी जीवन यात्रा एवं इसकी कहानी को आप चाहें तो जरुरतमंदों के साथ शेयर कर सकते हैं, जो किसी लेख, कविता, फीचर, यात्रा वृतांत, जीवन संस्मरण, कहानी, जीवन सार सुक्ति (Quotation) आदि के रुप में हो सकती है। यदि आपको उचित लगे तो इन्हें सोशल मीडिया के उचित प्लेटफार्म पर शेयर किया जा सकता है।

यदि आप रचनात्मक लेखन से अनभिज्ञ हैं तो आप लेखनकला के शुरुआती टिप्स को यहाँ पढ़ सकते हैं।

रचनात्मक उत्कृष्टता की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया (Psychological process of Creative Excellence) – यह इन चरणों में घटित होती है, जिसकी समझ आपके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है –

पूर्व-तैयारी (Preparation) - पहले हम उस विषय को लेते हैं जिस में कुछ नया सृजन करना होता है, या समस्या को लेते हैं, जिसका समाधान करना होता है या नया प्रकाश डालना होता है।

विचार-मंथन (Brainstorming) – अब उस विषय या समस्या पर हर तरह से विचार करते हैं, विषय या समस्या के हर पहलु पर चिंतन, मनन एवं विचार मंथन करते हैं।

विश्रांति काल (Incubation) – अब आगे की प्रक्रिया को अवचेतन मन के हिस्से में छोड़ देते हैं और दूसरे कार्यों में लग जाते हैं। एक तरह से समस्या को तकिए के नीचे डाल कर सो जाते हैं या दूसरी चीजों पर विचार करते हैं।

प्रकाशन (Illumination) – यह अगला चरण है जब चलते फिरते, टेबल पर बैठ या नींद में या स्वप्न में समाधान कौंधता है, नए विचार आते हैं। एक तरह से दिमाग की बत्ती जल जाती है।

क्रियान्वयन (Execution) – अब नए विचार या समाधान को लागू करते हैं।

बार बार इन मनोवैज्ञानिक चरणों से होकर गुजरते हुए जब तक कि आपके प्रश्न या समस्या का संतोषजनक उत्तर या समाधान न मिले। इस तरह आपकी क्रिएटिव एक्सलैंस की राह तय होती है, जो हर क्रिएटिव व्यक्ति के दैनिक जीवन का अनुभव रहता है।

आप अपने जीवन के हर क्षेत्र में इस प्रक्रिया को लागू करते हुए नित्य प्रति रचनात्मक उत्कृष्टता के नए आयामों को छू सकते हैं और हार्ड वर्क की वजाए स्मार्ट वर्क के साथ मनचाही सफलता की दिशा में ब़ढ़ सकते हैं।

जरा सोचें (Just Think & ponder!!)

·        आपका जीवन लक्ष्य क्या है? आप इसे कितना स्पष्ट मानते हैं? अर्थात् यह कितना अंतःप्रेरित है व कितना देखा देखी निर्धारित है?

·        आप अपने मूल्याँकन एवं विकास के लिए नित्य कितना समय दे पातें हैं?

·        क्या आप डायरी लेखन नियमित रुप से करते हैं? यदि नहीं, तो क्यों?

·        आप शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक-व्यवहारिक, आध्यात्मिक एवं प्रोफेशनल स्तर पर रचनात्मक उत्कृष्टता के पैमाने पर कहाँ खड़ा पाते हैं?

·        और इन क्षेत्रों में अपना श्रेष्ठतम स्वरुप (Best version) को कैसा देखते (visualize करते) हैं।

·        तथा इनके विकास के लिए आपका न्यूनतम दैनिक या साप्ताहिक कार्यक्रम क्या है?

·        आपकी रचनात्मक क्षमता की अभिव्यक्ति का सबसे सहज माध्यम एवं प्लेटफॉर्म क्या है?

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