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गुरुवार, 29 सितंबर 2022

यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच, भाग-2

बाबा शिव का बुलावा और मार्ग का रोमाँचक सफर

रास्ते में शिमला लॉयन क्लब द्वारा वृक्षारोपण का विज्ञापन पढ़कर अच्छा लगा। बाँज के वृक्षों के बीच देवदार के पौधों को बढ़े होते देखकर मन प्रमुदित हुआ। मन में भाव फूट रहे थे कि भगवान शिव इन समझदार व जिम्मेदार लोगों पर अपने अजस्र आशीर्वाद बरसाए। (गॉड शिवा ब्लैस दीज केयरिंग सॉउल)। सीधी उतराई में काफी नीचे उतरते गए। वन की सघनता, नीरवता और गहराती जा रही थी। लो आखिर मंदिर की झलक झाँकी मिल ही गई। थोड़ी की देर में हम इसके पास में थे। वाईं और पहाड़ी शैली में एक छोटा सा मकान, संभवतः जंगलात का है या पूजारीजी के रहने का ठिकाना। दाईं और मंदिर है, छोटा लेकिन कुछ फैला सा, एक मंजिला। लाल रंग से पुता, सीमेंटड़ पिरामिडाकार छत्त लिए हुए। चप्पल, गेट के जुत्ता स्टैंड पर उतारकर आगे बढ़े।

निर्देश पढ़कर बाउड़ी तक उतरे। निर्मल जल ताले में सुरक्षित दिखा। सिक्के पानी की तह में पड़े थे। इसके ऊपर लाल गुलाब स्थिर अवस्था में तैर रहे थे। बाउड़ी का यही जल नीचे पाइप से झर रहा था एक दूसरी बाउड़ी में। यहाँ बाउड़ी से जल कहाँ जाता है, नहीं दिखा, न ही समझ आया, न ही खोज की। संभवतः नीचे कहीं झरता होगा, जायरु (पहाड़ी स्प्रिंग वॉटर) बनकर। पास में रखे जग में झरते निर्मल-शीतल जल को भरकर अपनी तेज प्यास बुझाई। पैरों पर जल डालकर इनपर लगी धूल साफ की और थकान भी। और कुछ छींटे पवित्रिकरण के भाव के साथ छिड़ककर मंदिर में प्रवेश की तैयारी की। बग्ल में ब्रह्मलीन बाबा की अखण्ड धुनी भी थी। पहले मंदिर में पहुँचे। देवदर्शन किए, पूजारीजी से चरणामृत प्रसाद लिए। अनुमति लेकर नीचे धुनी में आ गए।

कमरे में प्रवेश किए। धुना सुलग रहा था। कमरे के कौने में लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठे पड़े थे। एक बड़ा सा लठ धुनी में सुलग रहा था। सामने चौकी पर बाबा का एक फोटो, दूसरा स्कैच चित्र रखा था। सामने चरणपादुकाएं। अखण्ड धुनी की राख को अनिष्ट निवारक, अलौकिक बताया गया था। इस तीर्थ स्थल की कुछ विभूति कागज की पुड़िया में रखकर हम बाहर निहारने लगे। हालाँकि हमारी सीधी सी स्पष्ट सोच है कि इस सृष्टि में कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता, सब अपनी पात्रता के अनुरुप रहता है। हमें यहाँ के एकांत-शांत परिसर, आध्यात्मिक ऊर्जा से आवेशित वातावरण, बाहर दो छोटी-छोटी खिड़कियों से घाटी, जंगल और शिमला के विहंगम दृश्य, अनुपम व अद्वितीय लग रहे थे। हम इन सबके बीच एक दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति कर रहे थे।

कुछ देर भोले बाबा का ध्यान किए, जीवन की नीरवता, आध्यात्मिक सत्य और जीवन लक्ष्य पर विचार केंद्रित किए। मन में भाव उठा कि किन्हीं फुर्सत के दिनों में, समय लेकर यहाँ बैठेंगे, साधना-अनुष्ठान करेंगे। जो भी हो, समय सीमा को ध्यान में रखते हुए बाबाजी से मिलने चले। प्रसाद में मिले मीठे दाने गिने, पूरे 22 थे। 2 को शिव शक्ति का रुप मान ग्रहण किए। भाव रहा कि दोनों जगतपिता, जगनमाता का कृपा प्रशाद धारण कर रहे हैं।

पूजारी भीमदास से अपना परिचय कराया। पूजारीजी कुछ रिजर्व प्रकृति के थे, मौन प्रधान लगे। उन्हें सहज करने, खोलने के लिए अपनी पूरी कथा-गाथा बताई। कहाँ से आए हैं, कैसे आए हैं, अकेले क्यों, आगे साधना-अनुष्ठान की मंशा भी जाहिए किए। घड़ी में शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। ऊपर माँ तारा का मंदिर दूर लग रहा था, मन में संशय था कि इस समय वहाँ से शिमला के लिए बस मिलेगी भी या नहीं।

हमारी दुविधा को देखते हुए पूजारीजी ने मार्गदर्शन करते हुए कहा - सीधा रास्ते पर आगे बढ़िए, एक घंटे में तारा देवी स्टेशन पहुँच जाओगे। ऊपर तारा देवी मंदिर से बस अब मिलने से रही। भीमदासजी को प्रणाम कर हम चल दिए। शिवालय मंदिर परिसर से चार सफेद पुष्प (शिव परिवार के प्रतिनिधि) पॉकेट में डालकर, बाँज के बीहड़ वन में प्रवेश कर गए।

वन की सघनता बढ़ती गई, बैसी ही नीरवता और गंभीरता भी। रास्ता पर्याप्त चौढ़ा था, सो गिरने फिसलने का कहीं कोई भय नहीं था। सीधा मार्ग धीरे-धीरे चढ़ाई में बदल गया। इस निर्जन प्रदेश में जंगली जानवरों का अज्ञात सा भय अचेतन मन पर छाना स्वाभाविक था। पूरे मार्ग भर शिव मंत्र का जप एवं सुमरण चलता रहा। अप्रत्याशित खतरे-हमले के लिए हाथ में पत्थर और ड़ंडा ले रखा था। इसी क्रम में जंगल पार हो चला था।

जंगल के लगभग अंतिम छोर पर विश्राम के लिए पत्थर का एक चबूतरा बना था। यहाँ पर कुछ देर विश्राम कर, पीछे मुड़कर तय किए गए मार्ग को निहारा। जंगल की विहंगम दृश्यावली मनोरम, आलौकिक, अद्वितीय और अनुपम थी। आश्चर्य हो रहा था कि इतने सुन्दर व घने जंगल से होकर यह पथिक अकेला सफर तय किया है। 


वन के ऊपर माता का मंदिर और ह्दय क्षेत्र में शिव का प्राचीन मंदिर। काश कैमरा होता। बैसे आँख के कैमरे से चित्त के पटल पर यह विहंगम दृश्य हर हमेशा के लिए अंकित हो गया था। (हालाँकि बाद की समूह यात्रा में अगले वर्ष यहाँ की फोटोग्राफी का संयोग बनता है।)

विश्राम के साथ कुछ दम भरने के बाद फिर मंजिल की ओर आगे बढ़ चले। आगे फिर जंगल आ गया, देवदार से भरा। इसको पार करते ही कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। इसकी मालकिन दो पहाड़ी महिलाएं ढलवां पहाडियों में नीचे घास काट रहीं थी। उनके बुलाने पर शेरु कुछ शांत हो गया, हमारे प्यार भरे उद्बोधन और हाथ में डंडे को देखकर भी वह मार्ग से हट चुका था।

आगे रास्ता धार या रिज से होकर आगे बढ़ रहा था। दाएं भी रास्ता और वाएं भी। दाएं का चुनाव किया, यह सोचकर कि शिमला दाएं ओर जो ठहरा। आगे जंगल औऱ घना होता जा रहा था। फिर दो राहें। यहाँ भी दाईं राह परर चल पड़ा। लेकिन थोड़ी दूर पर पत्थर-सीमेंट का गेट मिला। आगे बढ़ने पर समझ आया कि किसी की स्थापना है यह। सो वाएं रास्ते से चल पड़ा। ढलवाँ, संकरा और घने वृक्षों से आच्छादित पगडंडी से होकर अब गुजर रहा था। शीघ्र ही नीचे वाहनों की आवाजें आना शुरु हो गई थी, साथ ही स़ड़क भी दिख रही थी। लगा मंजिल के बहुत करीब हैं अब हम।

लो, सामने भवन दिख रहे हैं। मानवीय बस्ती आ गई है। कुछ देर में हम सड़क पर उतर आए। यह क्या, हम तारा देवी स्टेशन पहुँच चुके थे। यहीं पास के एक पहाडी ढावे में बैठते हैं, इतने लम्बे सफर के बाद शीतल जल। चाय भी बन रही है। एक कप और बना देना। इस तरह चाय की चुस्कियों के साथ पिछले घंटों की यादगार यात्रा की जुगाली के साथ आज के ट्रेकिंग एडवेंचर, शिवालय दर्शन की रोमाँचक यात्रा की पूर्णाहुति होती है।

तारादेवी स्टेशन से सीधे टुटीकंडी आइएसबीटी बस मिलती है। टुटीकंड़ी बस-स्टैंड से पुराने बस-स्टैंड पहुँचते हैं। बहाँ से बालुगंज, जहाँ प्रख्यात कृष्णा स्वीट्स में दूध-जलेबी की मन भावन डिश का आनन्द लेते हैं। यहाँ से एडवांस स्टडीज के शांत कैंपस में प्रवेश कर अपने कमरे में पहुँचते हैं। बिस्तर पर कमर सीधी करते हुए, कुछ पल विश्राम करते हैं। इस बीच दिन की यात्रा के रोँमाँचक अनुभवों को निहारते हुए गाढ़ा अहसास हो रहा था कि कैसे मन की गहरी चाहत या कहें बाबा के बुलावे पर आज की यादगार यात्रा का संयोग बना था और पग-पग पर उसका दिव्य संरक्षण व मार्गदर्शन मिला था।

इसके भाग-1 के लिए पढ़ें - यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच

बुधवार, 31 अगस्त 2022

यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच

 बाबा शिव का बुलावा और मार्ग का रोमाँचक सफर


 दोपहर के भोजन के बाद मन कुछ बोअर सा व अलसाया सा लग रहा था। बोअर कुछ इस तरह से कि एडवांस स्टडीज का कोई सेमिनार या प्रेजेंटेशन आदि का बंधन आज के दिन नहीं था, क्योंकि यहाँ के प्रवास का काल लगभग पूरा हो चुका था, सामूहिक भ्रमण का कार्यक्रम भी सम्पन्न हो चुका था। (संस्मरण वर्ष
2013 मई माह का है)

एक माह के दौरान शिमला के कई स्थलों को मिलकर एक्सप्लोअर किया था, लेकिन शिमला में शिव के धाम की खोज शेष थी। कल सुबह ही विक्रम ने सफाई के दौरान सुबह बीज डाल दिया था कि तारा देवी शिखर के नीचे शिव का बहुत सुंदर व शांत मंदिर है। आज दोपहर के खाली मन में एडवेंचर का कीड़ा जाग चुका था कि आज वहीं हो लिया जाए। कोई साथ चलने को तैयार न था, सो यायावरी एवं तीर्थाटन की मनमाफिक परिस्थितियों सामने थीं। कमरे में आकर विश्राम का विकल्प भी साथ में था, लेकिन परिस्थिति एवं मनःस्थिति का मेल कुछ ऐसे हो रहा था कि लगा जैसे बाबा का बुलावा आ रहा है और मन की पाल को हवा मिल गई, कि चलो शिवालय हो आएं।

एडवांस्ड स्टडी शिमला का ऐतिहासिक भवन एवं भव्य परिसर
 

एडवांस स्टडीज के गेट के बाहर बालूगंज से बस भी मिल गई थी। सीधा शिमला के पुराना बस अड्डा उत्तरे। यह क्या, यहाँ तो एक ही बस खड़ी नहीं थी तारा देवी मंदिर के लिए। रास्ते में शोधी या तारा देवी स्टेशन पर उतरने का कोई ईरादा न था। कौन चलेगा दूसरी बस में। जाएंगे तो सीधा माता के द्वार पर उतरेंगे, फिर देखेंगे आगे की शिव मंदिर यात्रा।

लगभग एक घंटा बीत गया बस के आगे पीछे भागते, ड्राइवर व सवारियों से बस का पता-ठिकाना पूछते..। इसी बीच अपने बी.टेक. लुधियाना के सहपाठी अवस्थीजी की कोचिंग अकादमी - विद्यापीठ के दर्शन भी हो गए। फुर्सत में मिल लेंगे इनसे बाद में। लो बस आ गई, शोघी तक। चलो वहां तक ही सही, वापस आ जाएंगे, यदि वहाँ से सीधे तारा देवी मंदिर के लिए बस न मिली तो। कुछ ऐसा ही हुआ भी। शोघी से स्कूल बच्चों से भरी एक लोक्ल बस में बैठ गए, कुछ मिनट खड़े खड़े यात्रा करते हुए स्कूली बच्चों के साथ बस ने हमें राह में उत्तार दिया। लेकिन तारा देवी का प्रवेश गेट और रास्ता तो पीछे है 300 मीटर लगभग। सवा 2 किलोमीटर ऊपर है मंदिर अभी।

कुछ देर बस-टैक्सी आदि की उम्मीद में खड़े रहे, लेकिन जल्द ही ना उम्मीद होकर अपनी सबसे विश्वस्त 11 नंबर की गाड़ी से चल दिए। सड़क को छोड़कर शॉर्टकट पगडंडी का सहारा लिए। पत्थरों पर बज्री नुमा पत्थरों पर ऊपर चढ़ने से आज की यात्रा की कठिन शुरुआत हो चुकी थी। ऊपर मुख्य मार्ग पर कुछ टैक्सी अभी चल रही थी। लेकिन इन्हें एक अजनबी पथिक से क्या लेना देना। 

शिमला का वैली व्यू (प्रतिनिधि फोटो)
 

ऊपर देखता, मंदिर का भवन काफी ऊपर था। राह में धूप सीधे बरस रही थी, साथ ही ठंडी हवा भी, नीचे गांव सड़क घाटी का हरा-भरा विहंगम दृश्य सुहावना लग रहा था। प्यास भी लग रही थी। पानी की कोई व्यवस्था साथ नहीं थी, क्योंकि सोचा नहीं था कि ऐसी ट्रैकिंग की भी नौबत आएगी। यह आज मेरी कौन सी परीक्षा ली जा रही थी,  व यह कौन सी शक्ति मुझे इन सुनसान राहों पर ऊपर बड़ा रही थी। यह तो भगवान शिव ही जाने, जिनके द्वार तक हम संकल्पित हो कर चल पड़े थे। अभी तो सीधे ऊपर तारा देवी का मंदिर था।  

शॉर्टकट पगडंडी से ऊपर चढ़ा ही था कि बड़ी सी पानी की सीमेंट टंकी दिखी। आवाज आ रही थी अंदर से पाइप में पानी के निकासी की, लेकिन नल कहीं ना दिखा। खाली हाथ ऊपर बढ़ चला। रास्ते में यह क्या, नीचे आवाज आ रही थी जानी पहचानी हॉर्न की और छुक-छुक की भी। तो यहीं नीचे सुरंग से होकर रेल्वे ट्रैक आगे बढ़ता है। कुल मिलाकर सामने एक रोमांचक दृश्य था। शिमला-कालका ट्रैन पहाडियों के बीच लुका-छिपा करती हुई सुरंगों के आर पार हो रही थी।

हम भी अपनी मंजिल तारा देवी शिखर की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ से हमें शिव मंदिर के लिए दूसरी ओर नीचे उतरना था। सड़क पार कर चोड़ी पगडंडी मिली, लगा पक्की सड़क बनने से पहले तीर्थ यात्री इसी राह से सामान के साथ घोड़ा आदि के साथ जाते रहे होंगे। आज भी हो सकता है श्रद्धालु पर्व त्योहारों में इसी राह से चढ़ते उतरते होंगे। 

रास्ता चीड़ की सूखी पत्तियों से ढका था, कुछ-कुछ फिसलन भरा। लेकिन इनके साथ अपनी बचपन की विरल यादें अचेतन की अतल गहराईयों से उभर कर आज ताजा हो रहीं थी। भूंतर के आगे मणिकर्ण घाटी में शड़शाड़ी से पुलपार कर ओल्ड़ जाते समय ऐसे ही चीड़ पत्तियों से भरे रास्ते बचपन में देखे थे, बुआजी की बड़ी बेटी की शादी में शरीक होने गए थे। आज वो पुरानी यादें ताजा हो रहीं थीं।

एक ओर याद ताजा हो उठी। यह जंगली झाड़ियों में खट्टी-मिठी आँछ (बुश बैरी) को बीन कर खाने का अनुभव था। कुछ-कुछ पानी की कमी इनसे पूरी होती अनुभव कर रहा था। बीयर ग्रिल के मैन वर्सेज वाइल्ड का एक पात्र खुद को अनुभव कर रहा था। सच में निपट अकेला, बिना किसी तैयारी के भोलेनाथ शिव के दर्शनार्थ उनके धाम की खोज में। बीहड़ वन के सन्नाटे को चीरते हुए हम अकेले बड़ रहे थे।

अब रास्ता मुख्य मार्ग से अलग हो गया था। ऊपर दूर मोड़ दिख रहा था। बीच का सफर अपने गाँव के पीछे (बनोगी गांव के ऊपर और रेऊंश के नीचे का वन क्षेत्र) बीहड़ बनों में बचपन के बिताए रोमाँचक पलों को तरोताजा कर रहे थे। रास्ते भर खट्टी मिठी बुश बैरी की हरी भरी झाडियां जहाँ भी मिलती गईं, उनसे दो-चार दाने तोड़कर सेवन करता रहा।

मार्ग में लेबर काम करते मिले। अपना रोल्लर आगे-पीछे कर रहे थे। एक थके हैरान-परेशान लेकिन लक्ष्य केंद्रित तीर्थ यात्री को वे कौतुक भरी निगाहों से देख रहे थे। बात-चीत करने का न समय था और न ही मनःस्थिति। राह में उतरता हुआ एक यात्री दुआ-सलाम कर कुछ मन हल्का व आश्वस्त करता प्रतीत हुआ। इस निर्जन राह में एक आस्थावान श्रद्धालु के दर्शन व उसका आत्मीय स्पर्श  निःसंदेह रुप में सकूनदायी लगे।

शिमला के ट्रेकिंग ट्रैल्ज - (प्रतिनिधि फोटो)

इनको पार कर आधे से अधिक मार्ग, लगभग डेढ़ किमी तय हो चुका था। आगे मुख्य मार्ग से पत्थर की सीढ़ियाँ और कछ घने वन से होकर रास्ता पार किया। मुख्य मार्ग पर आते ही – लो यह क्या। ऊपर माँ का मंदिर दिख रहा था, सहज विश्वास न हुआ कि पहुँच गए। अब एक मोड़ और बस...। कुछ पल बैठ दम भरा। प्यास लगी थी, लेकिन पानी न था। फिर आगे बढ़ चले। यह क्या मोड़ पर शिव मंदिर का बोर्ड लगा था। क्यों न सीधे इस मार्ग से बढ़ चलें, पहले शिव बाबा के दर्शन कर लें, वहीं तो आज की मूल मंजिल थी, फिर देखेंगे ऊपर माता का द्वार, जहाँ पिछले दो रविवार आ चुके थे वहाँ। तब शिवमंदिर का बोर्ड पढकर उतरने की इच्छा जगी थी, लेकिन साथी लोग तैयार नहीं थे। लगा, जो होता है, अच्छा ही होता है।

अब हम पगडंडी पर बढ़ चल रहे थे, जो बहुत ही संकरी थी। बाँज के पत्तों से भरी, फिसलन भरी थी। एक कदम दाएं कि सीधे नीचे गए गहरी घाटी में। हालाँकि बांज के घने पतले वृक्ष बीच में रोक सकते हैं, लेकिन चोट तो काफी गंभीर लग सकती है ऐसे में...। हम एकाकी आगे बढ़ रहे थे, पीछे ऊपर माता का मंदिर दिख रहा था। शनै-शनै हम जितना नीचे उतरते गए, मंदिर पीछे छूटता गया और अब दृष्टि से औझल हो चुका था व आगे जंगल और घना होता जा रहा था। बढ़ते बढ़ते दूर कुछ हलचल दिखी, बंदर कूद रहे होंगे, नहीं ये तो गाय जैसा पशु लगा। पास में वन विभाग का बोर्ड भी दिखा। यहाँ जंगल में लोगों के छोड़े हुए मवेशी चर रहे थे।

बीच राह में किसी तरह के अप्रत्याशित खतरे या हमले से निपटने के लिए एक हाथ में नुकीला पत्थर और दूसरे हाथ में एक ठूंठ का डंड़ा हम थाम चुके थे। (जारी....शेष भाग-2 व अंतिम किस्त अगली पोस्ट में - यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच, भाग-2)  

तारा देवी हिल्ज के बीहड़ बन और बांजवनों के मध्य शिवमंदिर

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

Indian Institute of Advanced Study (IIAS Shimla)

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

शिमला की पहाडियों की चोटी पर बसा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला का एक विशेष आकर्षण है, जो शोध-अध्ययन प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। उच्चस्तरीय शोध केंद्र के रुप में इसकी स्थापना 1964 में तत्काकलीन राष्ट्रपति डॉ.एस राधाकृष्णन ने की थी। इससे पूर्व यह राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता था और वर्ष में एक या दो बार पधारने वाले राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति का विश्रामगृह रहता था, साल के बाकि महीने यह मंत्रियों और बड़े अधिकारियों की आरामगाह रहता। डॉ. राधाकृष्णन का इसे शोध-अध्ययन केंद्र में तबदील करने का निर्णय उनकी दूरदर्शिता एवं महान शिक्षक होने का सूचक था।

 

आजादी से पहले यह संस्थान देश पर राज करने वाली अंग्रेजी हुकूमत की समर केपिटलका मुख्यालय था। सर्दी में कलकत्ता या दिल्लीतो गर्मिंयों में अंग्रेज यहाँ से राज करते थे और इसे वायसराय लॉज के नाम से जाना जाता था। अतः यह मूलतः अंग्रेजी वायसरायों की निवासभूमि के रुप में 1888 में तैयार होता है, जिसमें स्कॉटिश वास्तुशिल्प शैली को देखा जा सकता है। इसे शिमला की सात पहाड़ियों में से एक ऑबजरवेटरी हिल पर बसाया गया है।


मालूम हो कि शिमला में ऐसी सात प्रमुख पहाड़ियाँ हैं, जिन पर यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल बसे हैं। पश्चिमी शिमला का प्रोस्पेक्ट हिल, जिस पर कामना देवी मंदिर स्थित है। सम्मर हिल, जहाँ हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का कैंपस पड़ता है। ऑबजर्वेटरी हिल, जहाँ इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी स्थित है। इन्वेरार्रम हिल, जहाँ स्टेट म्यूजियम स्थित है। मध्य शिमला काबेंटोनी हिल जहाँ ग्राँड होटलपड़ता है। मध्य शिमला की जाखू हिल, जहाँ हनुमानजी का मंदिर स्थित है। यह शिमला की सबसे ऊँची पहाड़ी है, जहाँ हनुमानजी की 108 फीट ऊँची प्रतिमा लगी है, जिसके दर्शन शिमला के किसी भी कौने से किए जा सकते हैं, यहाँ तक कि रास्ते में सोलन से ही इसके दर्शन शुरु हो जाते हैं। और उत्तर-पश्चिम दिशा का इलायजियम हिल, जहाँ ऑकलैंड हाउस और लौंगवुड़ स्थित हैं।

शिमला की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक विशेषता, फ्लोरा-फोनासब मिलाकर इसको विशिष्ट हिल स्टेशन का दर्जा देते हैं। एडवांस्ड स्टडी के संरक्षित परिसर में इनके विशेष दिग्दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ देवदार के घने जंगल हैं। इनके बीच में बुराँश के सघन पेड़ लगे हैं, जो अप्रैल-मईके माह में सुर्ख लाल फूलों के साथ यहाँ के वातावरण की खुबसूरती में एक नया रंग घोलते हैं। इसके साथ जंगली चेस्टनेट के पेड़ बहुतायत में मिलेंगे, जिनके फूलों के गुच्छेसीजन में यात्रियों का स्वागत करते हैं। इनके बीच बाँज के वन तो यहाँ आम हैं। इन वृक्षों पर उछल-कूद करते बंदर लंगूरों के झुण्ड भी इस परिसर की विशेषता है। बंदर हालाँकि थोड़े खुराफाती जीव हैं, खाने पीने की चीजें देख छीना झपटी करना अपना अधिकार मानते हैं, जबकि लंगूर बहुत शर्मीला और शांत जीव है। जो झुँड में रहता है और किसी को अधिक परेशान नहीं करता। लम्बी पूँछ लिए इस जीव को एक पेड़ से दूसरे पेड़ में लम्बी छलाँग लगाते यहाँ देखा जा सकता है।

संस्थान प्रायः सर्दियों में दिसम्बर से फरवरी तक शोधार्थियों के लिए बन्द रहता है। बाकि समय इसके यहाँ कई तरह के शोध अध्ययन से जुड़े कार्यक्रम चलते रहते हैं। जिनमें एक माह का एशोसिएटशिप कार्यक्रम पीएचडी स्कोलर्ज के बीच लोकप्रिय है। इसके बाद एक से दो वर्ष का फैलोशिप प्रोग्राम, जिसमें यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्ज एवं अपने क्षेत्र के विद्वान लोग आते हैं। इसके साथ बौद्धिक गोष्ठियां, सेमीनार आदि यहाँ चलते रहते हैं, जिसमें अपनेक्षेत्र के चुडान्त विद्वान एवं विषय विशेषज्ञ यहाँ पधारते हैं, बौद्धिक विमर्श होते हैं और विचार मंथन के साथ समाज राष्ट्र को दिशा देने वाली नीतियाँ तय होती हैं।

यहाँ का पुस्तकालय संस्थान की शान है, जो प्रातः नौ बजे से रात्रि सात बजे तक शोधार्थियों केलिए खुला रहता है। इसमें लगभग दो लाख पुस्तकें हैं औरइसके साथ समृद्ध ई-लाइब्रेरी, जिसमें विश्वभर की पुस्तकों एवं शोधपत्रों को एक्सेस किया जा सकता है। जब पढ़ते-पढ़ते थक जाएं तो तरोताजा होने के लिए पास ही एक कैंटीन और एककैफिटेरिया की भी व्यवस्था है। प्रकृति की गोद में बसा परिसर स्वयं में ही एक प्रशांतक ऊर्जा लिए रहता है, जिसमें टहलने मात्र से व्यक्ति तरोताजा अनुभव करता है। संस्थान की अपनी शोध पत्रिका सम्मर हिल रिव्यू है। यहाँ का अपना प्रकाशन भी है, जिसके प्रकाशनों का किसी भी बड़े पुस्तक मेले में अवलोकन किया जा सकता है।


चिनार एवं बांज के ऐतिहािसिक वृक्षों से सजा संस्थान का परिसर

परिसर में लाइब्रेरी के पीछे विशाल बाँज का पेड़ लगा है, जहाँ कभी कामना देवी का मंदिर था, जिसे अब पास की पहाड़ी में विस्थापित किया गया है। इसी के साथ दो भव्यमैपल पेड़ हैं, जो शिमला में रिज पर एक कौने में भी स्थित हैं। मौसम साफ होने पर इसके पास ही एक स्थान से दूर हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का अवलोकन किया जा सकता है, जहाँ इनकी ऊँचाई व नाम भी अंकित है। इसी के नीचे बहुत बड़ा बगीचा और पार्क है।उसके पार खेलने का बंदोवस्त है, जहाँ एक इंडोर स्टेडियम है। उसके आगेअंडरग्राउण्ड जेल है, जहाँ गाँधीजी को कुछ दिन नजरबंद किया गया था।

इसके साथ यहाँ का अपना समृद्धबोटेनिक्ल गार्डन है, जिसमें तैयार किए जा रहे फूलों के गमलों से पूरा परिसर शोभायमान और सुवासित रहता है। संस्थान में जल संरक्षण की बेहतरीन व्यवस्था है। मुख्य भवन की छत से गिरता बारिश का पानी सीधे छनकर लॉन के नीचे बने स्टोरेज टैंक में जाता है और इसका उपयोग फूलों, पौधों व लॉन की सिंचाई में किया जाता है।


रहने के लिए यहाँ परिसर में भव्य भवन हैं, जिनमें वेहतरीन कमरों की व्यवस्था है। भोजन के लिए पहाड़ी पर मेस है, जिसमें उम्दा नाश्ता, लंच और डिन्नर परोसा जाता है। यहीं आगंतुकों के लिए अतिथि गृह भी है। फिल्म देखने के लिए छोटा सा ऑडिटोरियम भी है। जरुरत का सामान खरीदने के लिए परिसर के नीचे बालुगंज में तमाम दुकानें हैं। यहाँ का कृष्णा स्वीट्सदूध-जलेबी के लिए प्रख्यात है। थोड़ी ही दूरी पर शिमला यूनिवर्सिटी है, जहाँ बस व पैदल मार्ग दोनों तरीकों से जाया जा सकता है। दोनों मार्ग घने देवदार, बुराँश व बाँज के जंगल से होकर गुजरते हैं।

यहाँ पर रुकने व अध्ययन के इच्छुक शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन प्रवेश की सुविधा है। एक माह से लेकर दो साल तक इस सुंदर परिसर में गहन अध्ययन, चिंतन-मनन एवं सृजन के यादगार पल बिताए जा सकते हैं। हमें सौभाग्य मिला 2010,11 और 2013 में तीन वार एक-एक माह यहाँ रुकने का और अपने एसोशिएटशिप कार्य़क्रम पूरा करने का, जिसमें हमने अपने पीएचडी के विषय को गंभीरता एवं व्यापकता में एक्सप्लोअर किया। भारत भर से आए विद्वानों से चर्चा होती रही, फैलोज के साप्ताहिक सेमीनार में खुलकर भाग लिया और कई सारी नई चीजें सीखने को मिलीं। उस बक्त यहाँ के निर्देशक थे, प्रो. पीटर रोनाल्ड डसूजा, जिनके सज्जन एवं भव्य व्यक्तित्व, प्रखर विद्वता, बौद्धिक ईमानदारी, शोधधर्मिता एवं भावपूर्ण संवाद से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, जिसे समरण करने पर मन आज भी पुलकित हो उठता है।

तारा देवी मंदिर एवं ट्रेकिंग मार्ग की जानकारी के लिए पढ़ें,  शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच

तत्कालीन संस्थान के निर्देशक प्रो. पीटर रोनाल्ड डसूजा के साथ

रविवार, 24 जनवरी 2021

शिमला के ट्रेकिंग ट्रेल्ज एवं दर्शनीय स्थल

 

शिमला के बीहड़ वन (तारा देवी रेंज)

हिमाचल प्रदेश की राजधानी के साथ शिमला का हिल स्टेशन के रुप में सदा से एक विशेष स्थान रहा है। हालाँकि बढ़ती आबादी, मौसम की पलटवार और गर्मियों में पानी की कमी के चलते यहाँ नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियों के लिए इस हिल स्टेशन में बहुत कुछ है, जो इसके भीड़ भरे बाजारों से दूर एक अलग दुनियाँ की सैर साबित होता है। यहाँ पर ऐसे ही कम प्रचलित ऑफ-बीट किंतु दर्शनीय स्थलों की चर्चा की जा रही है।

        जब अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर इस इलाके से 1815 के आसपास गुजरे थे, तो देवदार से घिरे इस स्थल को देखकर उन्हें इँग्लैंड-स्कॉटलैंड के अपनी ठण्डी आवोहवा वाले क्षेत्रीय पहाड़ों की याद आई थी। और इसे अपने आवास स्थल के रुप में विकसित करने की योजना बनी। तब यहाँ चोटी पर मात्र जाखू मंदिर था और आस पास कुछ बस्तियाँ।सन 1830 तक यहाँ 50 घर आबाद हो चुके थे और आबादी मुश्किल से 600 से 800 की थी।धीरे-धीरे यह एक हिल स्टेशन और गर्मियों में समर केपिटल के नाम से प्रख्यात हुई। उस समय श्यामला माता (काली माता) के मंदिर के रुप में इस इलाके का नाम शिमला पड़ा। आज काली बाड़ी के रुप में इसके दर्शन रिज से थोड़ा नीचे किए जा सकते हैं, जहाँ से शिमला की घाटियों व सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं का विहंगावलोकन किया जा सकता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा भी दर्शनीय रहता है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), शिमला

ब्रिटिश काल में वायसराय के रहने के लिए शिमला की एक पहाड़ी पर वायसराय लॉज का निर्माण हआ, जिसमें सबसे पहले पानी व बिजली की व्यवस्था 1888 तक हो जाती है। इसे बाद में राष्ट्रपति भवन और आज भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS-इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी) के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उस समय के स्थापित प्रख्यात समारक भवन हैंकैनेडी हाउस,(ओवरोयसेसिल होटल,विधान सभा भवन, शिमला रेल्वे बोर्ड बिल्डिंगआदि। रिज के पास चर्च, गेयटी थिएटर, स्केंडल प्वाइंट, टाउन हॉल,जनरल पोस्ट ऑफिस आदि भवन एवं स्थल अंग्रेजों की विरासत की याद दिलाते हैं। राह में नीचे घाटी की तली में अन्नाडेल ग्राउण्ड भी इसका एक समारक है, जिसकी देखभाल अभी सेना कर रही है। इसी दौर मेंसन 1898 में 102 सुरंगों तथा 18 स्टेशनों के साथ भारत का ऐतिहासिक पहाडी नेरो गेज रेल्वे ट्रेक बनता है, जो आज सांस्कृतिक धरोहर के रुप में यूनेस्को हेरिटेज साइट में शामिल है।काल्का से शिमला तक पहाडियों के बीच लुका छिपी करता इसका सफर बेहद रोमाँचक और यादगार रहता है।


शिमला के दर्शनीय स्थलों में सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी पर जाखू मंदिर स्थित है, जिसके दर्शन शिमला के लगभग हर कौने से किए जा सकते हैं। रिज व माल रोड़ से तो इसके दर्शन एक दम प्रत्यक्ष ही रहते हैं। देवदार के गंगनचूम्बी वृक्षों से भी उँचे108 फीट ऊँचे हनुमानजी जैसे अपनी विराट उपस्थिति के साथ सबको अनुग्रहित करते प्रतीत होते हैं।


जाखू में बजरंगवली की 108 फीट ऊंची प्रतिमा

रिज से यहाँ तक पैदल भी जाया जा सकता है और टेक्सी से भी। शिमला के प्रवेश द्वार पर दायीं ओर संकटमोचन मंदिर है, जिसे उत्तर भारत के प्रख्यात हनुमान भक्त एवं महान संत नीम करौरी बाबा के आशीर्वाद स्वरुप बनाया गया था। शिमला के उस पार तारा देवी हिल्ज पर माता तारा देवी मंदिर भी अपनी उपस्थिति से श्रद्धालुओं को श्रद्धानत करता है, जिसका नजारा रात को टिमटिमाती रोशनी में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है।

बस से सीधा इसके प्राँगण तक शोघी से होकर जाया जा सकता है, लेकिन तारा देवी तक सीधे संकटमोचन मंदिर के पास से पैदल ट्रेकिंग मार्ग भी है। तारा देवी मंदिर से सामने अलग अलग दिशाओं में कसौली, चैयल तथा शिमला की पहाडियों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। हर रविवार को यहाँ वृहद भण्डारा लगता है, जिसमें स्वादिष्ट भोजन-प्रसाद का आनन्द लिया जा सकता है। प्रायः लोग तारा देवी से बापसी में नीचे उतर कर प्राचीन शिव मंदिर आते हैं, जो तारा देवी से महज 1-2 किमी नीचे बाँज के घने जंगल में एकाँत-शांत जगह पर स्थित है। यहाँशीतल जल का चश्मा इसके परिसर में है तथा साथ ही पास अखण्ड धुनी जलती रहती है, जहाँ कुछ पल गहन चिंतन-मनन एवं आंतरिक शांति-सुकून के बिताए जा सकते हैं। यहां से सीधे जंगल से होकर 4-5 किमी लम्बा ट्रेकिंग मार्ग सीधा संकट मोचन के पास मुख्य मार्ग तक आता है। रास्ता घने बांज, देवदार, चीड़ के वनों से होकर गुजरता है। बीहड़ रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है, अतः ग्रुप में ही इस मार्ग की ट्रेकिंग उचित रहती है।

बांज के वनों के बीच शिमला के पैदल मार्ग

शिमला विश्वविद्यालय का परिसर भी एक पहाड़ी के ऊपर बसा है, जहाँ बस अड्डे से बसें चलती रहती हैं। एडवांस्ड स्टडी से होकर भी यहाँ तक पैदल आया जा सकता है। इसका पक्का रास्ता देवदार, बाँज और बुराँश के घने जंगल से होकर गुजरता है, जिसमें पैदल या वाहन में सफर काफी रोमाँचक रहता है। सड़क के नीचे समानान्तर रेल्वे ट्रैक है, जिसमें छुकछुक करपहाड़ी की ओट में लुकाछिपी करती रेल का नजारा दर्शनीय रहता है, जो कभी जंगल के बीच सुरंग में गायब हो जाती है, तो कभी अगली सुरंग में प्रकट हो जाती है। विश्वविद्याल के आगे एक छोर पर पीटर हिल्ज पड़ती है। इस एकांत स्थल पर एक रेस्टोरेंट भी है, यहाँ ट्रेकिंग व नाइट हाल्ट आदि की व्यवस्था है। इस छोर से नीचे घाटी के दर्शन भी अवलोकनीय रहते हैं।

यूनिवर्सिटी के नीचे सम्मर हिल रेल्वे स्टेशन है। जहाँ से पैदल ट्रेकिंग करते हुए बालुगंज पहुँचा जा सकता है। देवदार की छाया में बने पैदल रास्तों में शीतल जल की बाबडियाँ पड़ती हैं। गर्मियों के जल संकट में शिमला के वन्यप्रदेश में फैली ऐसी बाबड़ियाँ निवासियों के लिए पर्याप्त राहत देती हैं। मुख्य मार्ग पर बालुगंज में जलेबी व पकौड़े का लुत्फ उठाया जा सकता है। यहीं से सीधे ऊपर कामना देवी मंदिर का रास्ता जाता है। लगभग 2 किमी पैदल ट्रेकिंग करते हुए यहाँ पहुंचा जा सकता है। रास्ते में कुछ सरकारी मकान हैं, तो कुछएडवांस्ड स्टडी के क्वार्टर भी। लेकिन पहाड़ी के ऊपर सिर्फ मंदिर पड़ता है, जहाँ से एक ओर शिमला का नजारा तो दूसरी ओर सोलन साइड की घाटियाँ व पहाड़ियों का अवलोकन किया जा सकता है।

बालुगंज से पुराना बस अड्डा होते हुए शिमला के दूसरे छोर पर पडती है पंथा घाटी, जो शिमला का ही विस्तार है। यहाँ से नीचे 4-5 किमी की दूरी पर एपीजी शिमला युनिवर्सिटी का कैंप्स है, जिसके बारे में यहाँ से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। यहीं से सड़क तारा देवी हिल की परिक्रमा करते हुए शोघी पहुँचती है, जिसे वाइपास रोड के रुप  में विकसित किया गया है। फलों के सीजन में अप्पर शिमला के फलों से लदे ट्रक प्रायः इसी रुट से चण्डीगढ़ व दिल्ली की सब्जी मंडियों तक जाते हैं।

पंथा घाटी से ही पहाड़ी के दक्षिण ओर साइँ मंदिर (पुजारली) का रास्ता जाता है, जिसे शिमला का छिपा हुआ नगीना कहा जा सकता है। एकाँत स्थल पर बसे इस पाँच मंजिले मंदिर के सामने बहुत बड़ा मैदान है, जहाँ से उस पार कुफरी, जुन्गा व चैयल की पहाडियों के दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ पर भी सनसेट का नजारा अलौकिक सौंदर्य़ लिए रहता है, जिसके प्रकाश में तारा देवी की पहाड़ियां विशेष रुप से आलोकित दिखती हैं।

पंथा घाटी का विहंगम दृश्य

फिर शिमला में खरीददारी के शौकीनों के लिए मालरोड़ और लक्कड़ बाजार में बेहतरीन व्यवस्था है। यहाँ हर तरह के सामान, पहाड़ी गिफ्ट मिलते हैं। साथ ही शिमला के आसपास उगने वाले मौसमी फल भी एक छोर पर सजे मिलेंगे। यहाँ का कॉफी हाउस मशहूर है। रिज पर आशियाना रेस्टोरेंट कैंडल लाइट डिन्नर के लिए सर्वथा उपयुक्त रहता है। बाकि रिज व लक्कड़ बाजार के आसपास स्ट्रीट फुड़ का स्वाद भी लिया जा सकता है। ड्राई फ्रूट्स व स्थानीय हैंडिक्राफ्ट की बेहतरीन दुकानें यहाँ मिल जाएंगी, जहाँ से कुछ यादगार गिफ्ट खरीदे जा सकते हैं। भुट्टिको बुनकरों के केंद्र सेअपने मनमाफिक पहाड़ी शाल, टोपी, मफ्फलर आदि उत्पाद देखे जा सकते हैं। लक्कड़ बाजार के नीचे देश का एकमात्र ऑपन-एअरस्केटिंग रिंग स्थित है, जहाँ सर्दियों में जमीं बर्फ पर कुछ शुल्क के साथआइस-स्केटिंग का आनन्द लिया जा सकता है।

ऐतिहासिक रिज़ मैदान, शिमला


रिज के मैदान को शिमला में शाम की चहल-पहल का केंद्र माना जा सकता है, जो पर्यटकों के बीच भी खासा लोकप्रिय रहता है। यहाँ बच्चों-बुढ़ों की घुड़सवारी, ऐतिहासिक समारकों की पृष्ठभूमि में यादगार फोटोग्राफी के नजारे सर्वसुलभ रहते हैं। रिज के पूर्व में ऊँचाई पर स्टेज है, जो ऐतिहासिक संबोधनों का साक्षी रहा है और प्राँत के बड़े आयोजन इसी रिज पर होते हैं। रिज के एक और इंदिरा गाँधी की प्रतिमा है तो दूसरी ओर डॉ. यशवन्त सिंह परमार की। मालूम हो कि डॉ. यशवन्त परमार हिंप्र के पहले मुख्यमंत्री रहे, जिनके कुशल एवं दूरदर्शी नेतृत्व के कारण उन्हें हिमाचल का निर्माता माना जाता है। हिमाचल को एक विकसित पहाड़ी राज्य के रुप में खड़ा करने में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

रिज के नीचे ही पानी के वृहद टैंक मौजूद हैं, जिनसे शिमला शहर के लिए पानी सप्लाई होता है। रिज के नीचे गेयटी थिएटर के सामने ही यहाँ का लेटेस्ट  पुस्तकों से समृद्ध मिनेरवा बुक हाऊस है, जहाँ पर पुस्तक प्रेमी अपने पसंद की पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं। इसी तरह लोअर बाजार में बंसल बुक डिपो, ज्ञान भण्डार तथा लक्कड़ बाजार में स्टुडेंट स्टोर आदि पुस्तक केंद्र हैं। पुस्तक प्रेमियों के लिए रिज पर चर्च के सामने स्टेट लाइब्रेरी की भी व्यवस्था है।

माल रोड़ से नीचे लोअर बाजार से होते हुए एक दम नीचे पुराना बस अड्डा पड़ता है, जहाँ से नए बस अड्डा आईएसबीटी टुटी कण्डी लिए कुछ मिनट परबसें चलती रहती हैं।

आईएसबीटी टुटीकण्डी बस स्टैंड, शिमला

यहाँ से अपने गन्तव्य के लिए ऑर्डिनरी से लेकर डिलक्स, ऐसी, एवं वोल्बो बसें ली जा सकती हैं। हिमाचल परिवहन की ऑनलाइन बुकिंग  की सुबिधा का भी घर बैठे लाभ लिया जा सकता है। रेल्वे सफर के लिए सम्मर हिल या पुराने बस अड्डे के पास के मुख्य रेल्वे स्टेशन से चढ़कर काल्का तक रेल यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा जुब्बड़हट्टी में है, जो शिमला से 22 किमी की दूरी पर है।

इस तरह दो-तीन दिनों में शिमला के मुख्य स्थलों की सैर की जा सकती है। सामान्य यात्रियों के लिए मार्च से जून तथा सितम्बर से नवम्बर माह उपयुक्त माने जाते हैं। गर्मियों में हालाँकि भीड़ अधिक रहती है, लेकिन शिमला का असली आनन्द तो बरसात में रहता है। अगस्त के माह में जब आसमान बादलों से घिरे रहते हैं, तो एक पहाड़ी से दूसरी पहाडी की ओर इसके फाहों के बीच सफर मनमोहक रहता है। कभी ये बादल पूरी तरह से यात्रियों को अपने आगोश में ले लेते हैं तो कभी पूरी घाटी इनसे पट जाती है। पहाडों की चोटी से इनका नजारा पैसा बसूल ट्रिप साबित होता है। (इस बर्ष 2023 की बरसात में हुई त्रास्दी के चलते, उपरोक्त धारणा में कुछ बदलाव आ गया है। जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ मानवीय छेड़खान के चलते, प्रकृति की गोद में आनन्द के मायने बदल रहे हैं, यह विचारणीय व चिंता का विषय है।) 

बर्फ के शौकीनों के लिए सर्दी भी कम रोमाँचक नहीं रहती।लेखकों, विचारकों एवं कवियों के लिए शिमला सृजन की ऊर्बर भूमि साबित होती है और कई लेखक तो यहाँ इसी उद्देश्य से डेरा जमाए रहते हैं।

यदि समय हो तो शिमला के आसपास घूमने के कई दर्शनीय स्थल हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश के साथ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक विशेषताओं से भी रुबरु हुआ जा सकता है। इसके लिए आप पढ़ सकते हैं, शिमला के आस-पास के दर्शनीय स्थल।

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