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मंगलवार, 14 जुलाई 2015

फिल्म समीक्षा - बाहुबली, द बिगनिंग - विश्व सिनेमा की ओर भारतीय सिनेमा के बढ़ते कदम


फिल्म माध्यम की कालजयी सत्ता का अहसास कराता अभिनव प्रयोग


फिल्म बाहुवली ने व्यापत घोटालों के गमगीन माहौल के बीच रोमांच की एक ताजी ब्यार बहा दी है, जिसको लेकर चर्चा का बाजार गर्म है। महज दो दिन में 100 करोड़ का आंकडा पार करने बाली यह फिल्म भारत में एक-एक कर सारे रिकोर्ड तोड़ रही है और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर 9.5 आईएमडीबी रेटिंग के साथ भारतीय सिनेमा की सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। आश्चर्य नहीं कि क्रिटिक्स भी इसकी तारीफ करते दिख रहे हैं। 

जब मीडिया में इसकी चर्चा सुनी और इसका ट्रेलर देखा तो समझ में आ गया था कि थियेटर में जाकर ही देखना बेहतर होगा, लेप्टॉप या कम्पयूटर पर इसके साथ न्याय न हो सकेगा। फिल्म को लेकर अपने युवा मित्रों के साथ चाय पर चर्चा हो ही रही थी कि निर्णय हो गया कि शुभ कार्य में देर कैसी। बुकिंग हो गयी और दीवानों का टोला 10-15 किमी का सफर तय करता हुआ पेंटागन मल्टीप्लेक्स जा पहुंचा। हरिद्वार में रहते हुए यहांँ पर यह अपना पहला फिल्मी वाचन था। फिल्म देखकर लगा अपना निर्णय सही था और फिल्म अपनी चुनींदा चिर प्रेरक फिल्मों में शुमार हो गयी।
फिल्म रहस्य-रोमांच, एक्शन-थ्रिल, मानवीय संवेदनाओं-आदर्श एवं सर्वोपरि सशक्त प्रेरणा प्रवाह से भरी हुई है। उम्दा दृश्यों के बीच, नायक का कालजयी चरित्र इसे संभव बनाता है। फिल्म के पटकथा लेखक और डायरेक्टर एस.एस. राजमौली का क्रिएटिव जीनियस व उनकी पूरी टीम का अथक पुरुषार्थ इसके लिए साधुवाद का पात्र है। नायक जहाँ स्वाभाविक मानवीय दुर्बलताओं के बावजूद एक संवेदनशील एवं अजेय यौद्धा का चरित्र लिए हुए है, वहीं नारी पात्र अपने सशक्त चरित्र के साथ गहरी छाप छोड़ते हैं। फिल्म की शुरुआत ही नारीशक्ति की मरजीवड़ी राजनिष्ठा के साथ होती है, जिसमें नायिका खुद जलमग्न होकर भी शिशु (राजकुमार) की रक्षा करती है। इसी तरह धुर्त राजा की कैद में पड़ी रानी देवसेना अटल विश्वास को धारण किए अपने पुत्र का इंतजार कर रही है। राजमाता शिवगामी का चरित्र नीति, दृढ़ता, सूझ एवं साहस-शौर्य का पर्याय है। इस फिल्म यह केंद्रीय नारी चरित्र है। कमसिन नायिका अवंतिका भी अपने भव्यतम रुप में एक सशक्त किरदार लिए हुए है। नारी पात्रों का यह छवि चित्रण एवं सशक्त प्रस्तुतीकरण निश्चित रुप से इस फिल्म को नारी चरित्रों से खिलवाड़ करती आम भारतीय फिल्मों से अलग एक विशिष्ठ स्थान देता है।

फिल्म में उपयुक्त एनीमेशन तकनीक ने इसके दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस निमित सीजीआई और विजुअल इफेक्ट तकनीक का भरपूर प्रयोग हुआ है। दृश्य चाहे विराट झरने का हो, भव्य राजपरिसर का, वर्फीले पर्वतों से टुटते गलेशियर का या युद्धक्षेत्र का या अन्य, दर्शक सहज ही एक नयी दुनियां में विचरण की अनुभूति पाते हैं। दृश्य के साथ ध्वनि का इतना वेहतरीन एवं बारीकि के साथ संयोजन किया गया है कि दर्शक दृश्य का ही एक जीवंत किरदार बनकर फिल्म की कथा के साथ बह चलता है। पूरी फिल्म में लगता है हम किसी एक विशिष्ट कालखण्ड, भूखण्ड में एक स्वपनिल लोक में आ गए हैं जिसका जादू सर चढकर बोलता है, जैसा कि हम बचपन में इंद्रजाल या अमरचित्र कथा सरीखी कॉमिक्स पढ़कर अनुभव करते थे। फिल्म अपने विजुअल के माध्यम से ऐसा ही मोहक इंद्रजाल रचने में सफल हुई है। 
लड़ाई और युद्ध के दृश्यों से भरी होने के बावजूद फिल्म में इनके प्रति वितृष्णा का भाव नहीं पनपता। इन्हें बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, हालांकि सभी दृश्यों को देखना कमजोर दिलों के लिए संभव न हो। युद्ध दृश्यों के चित्रण में भी लगता है फिल्म नये मानक स्थापित कर गयी है। इस संदर्भ में यह गलेडियेटर, ट्रॉय, 300 जैसी हॉलीवुड फिल्मों को भी पीछ छोड़ती नजर आ रही है। आई.एम.डी.बी. रेटिंग पर 9.5 अकों के साथ बाहुबली इस बक्त अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। इसके साथ भारतीय सिनेमा के विश्व सिनेमा की ओर बढ़ते कदमों को देखा जा सकता है।

फिल्म के पात्रों की चर्चा करें तो इसमें सभी अपनी जगह परफेक्ट प्रतीत होते हैं। नायकों को टक्कर देते खलयनायक भी अपनी कुटिलता, धुर्तता, छल, बल में पीछे नहीं हैं। फिल्म के पात्र कुछ कुछ महाभारत के पात्रों की याद दिलाते हैं। बिजाला देव की कुटिल चालें महाभारत के शकुनी मामा की याद दिलाती हैं, इनका शक्तिपुंज बेटा भल्लला देवा, दुर्योधन सा लगता है। राज्यभक्त कट्टप्पा, भीष्म पितामह की याद दिलाते हैं, जो एक सेवक की भांति राजधर्म को निभाने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं और राजनिष्ठा एवं शौर्य की प्रतिमूर्ति हैं। जापान के समुराई यौद्धाओं की छवि सहज ही इनसे झरती दिखती है।  बाहुबली और शिवा में एक अचूक तीरंदाज के रुप में अर्जुन का अक्स झलकता है। वहीं भीम का बल, युधिष्ठिर की धर्मनीति एवं लोकसेवा का भाव भी इनमें मौजूद है। झरने को पार करते हुए कॉमिक चरित्र टार्जन की छवि भी सहज ही इनमें झलकती है। कुल मिलाकर नायक एक अंतःस्फुर्त एडवेंचर प्रेमी, साहसी, महाबली, संवेदनशील अपराजेय महायौद्धा का कालजयी चरित्र लिए हुए है, जिसके साथ दर्शक सहज ही रोमांचभरी विजयी यात्रा पर आगे बढ़ते हैं।

फिल्म की पटकथा इतनी कसी हुई है कि पूरी फिल्म दर्शकों का ध्यान बाँधे रखती है। पता ही नहीं चलता कि फिल्म कब खत्म हो गई। हालांकि फिल्म अभी अधूरी है, अगला भाग बाहुबली कन्कलूजन 2016 में रीलीज होगा, जिसका सभी को बेसव्री से इंतजार रहेगा।

कुल मिलाकर बाहुबली भारतीय सिनेमा में स्वस्थ एवं प्रेरक मनोरंजन की एक ताजी ब्यार की भांति है, जो अपने क्रांतिकारी प्रयोगों के साथ कई नए मानक स्थापित कर गई है। भारतीय फिल्मकारों को यहाँ तक पहुंचने के लिए गहन आत्म विश्लेषण करना होगा। इसमें भारतीय सिनेमा के विश्व सिनेमा की ओर बढ़ते कदमों को देखा जा सकता है। प्रकृति एवं रोमांचप्रेमी भावनाशील दर्शकों के लिए बाहुबली अंतर्क्रांति का शंखनाद है। इसके दृश्य दर्शकों के लिए विजुअल ट्रीट से कम नहीं हैं। यदि आपने फिल्म न देखी हो तो उमदा थियेटर में जाकर एक बार जरुर देखें क्योंकि ऐसी फिल्म युगों बाद ही बनती है।

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