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सोमवार, 6 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-3

रांसी से गौंदार

8जून2026, सोमवार - रांसी से 2 किमी आगे अगतोलीधार पड़ता है, जहाँ गाड़ियों की कतारें सड़क के साथ खड़ी थीं और उसके आगे बाइक्स की कतारें लगीं थी। सभी यात्री अपने बाहन यहीं छोड़कर मदमहेश्वर ट्रेक के लिए निकले थे। सुरक्षा की दृष्टि से हम अपना वाहन कोमल होमस्टे के पास खड़ा कर दिए थे।

अगतोलिधार से लगभग दो अढाई सौ मीटर के बाद बैरिकेट लगा मिला, जहाँ से आगे किसी भी प्रकार के वाहनों का प्रवेश निषिद्ध था। वैरिकेट को पार कर हम सभी पैदल चलते हैं। यहीं से सूर्योदय का दृश्य देखकर हम थोड़ा ठिठक जाते हैं और इसको कैप्चर करने का प्रय़ास करते हैं। लेकिन यहाँ का सूर्योदय समय ले रहा था, लगा कई पहाड़ियों के पीछे से जैसे उसका उदय हो रहा है, सो हम चलते रहे।

अगतोलीधार, सूर्योदय का अलौकिक दृश्य

फिर कुछ मिनट बाद रास्ते में सूर्य भगवान के दर्शन होते हैं, उनको प्रणाम कर अपना यात्रा अभियान जारी रखते हैं। बीच में दायीं ओर नीचे उतरता एक पैदल रास्ता दिखा, जो रांसी-मदमहेश्वर के पुराने रुट का एक लिंक रोड़ था।

रास्ते का प्राकृतिक परिवेश – हम हरे-भरे पहाड़ की गोद में आगे बढ़ रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों का दीदार हो रहा था, साथ में ऊतीश, जंगली झाडियां व हरे-भरे पेड़ सफर का खुशनुमा अहसास दे रहे थें। पक्षियों की चहचाहट इस अहसास में मस्ती और शांति का एक नया रंग घोल रही थी।

हरे भरे वृक्षों के संग निर्माणाधीन ट्रेक

रास्ते में छोटे झरने व जलस्रोत मार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। ट्रेकरों व तीर्थयात्रियों के समूह आगे-पीछे पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे थे। इस रुट पर युवाओं की संख्या अधिक देखकर सुखद आश्चर्य़ हुआ कि वे अपने समय का सार्थक नियोजन कर रहे हैं, क्योंकि ऐसी यात्राएं जीवन में वो अनुदान-वरदान दे जाती हैं, जो घर बैठे संभव नहीं। घर में व्यक्ति परिवार और समाज की मोह माया में ही उलझा रहता है, जबकि इससे बाहर निकलकर प्रकृति की गोद में विताए कुछ पल जीवन में सार्थकता का गहरा बोध देने वाले सावित होते हैं।
रास्ते के जल स्रोत

रास्ते में नीचे मधुगंगा के दर्शन बीच-बीच में हो रहे थे और उसके पार दूसरी ओर गगनचुम्वी हरे-भरे पर्वतों के साथ संकरी घाटियों से निकलते झरने ध्यान आकर्षित कर रहे थे। लगा जून में जब इतने झरने रास्ते में दिख रहे हैं, तो जुलाई-अगस्त के मोनसून सीजन में तो यहाँ इनकी भरमार रहती होगी। और इसके साथ भूस्खलन की कल्पना का भय भी आशंकित कर रहा था।

रांसी से गौंदार के शुरुआती पड़ाव पर गगनचुंबी चीड़ वृक्षों के संग

मार्ग में एक बड़ा नाला दूर से ही अपने कल-कल निनाद के साथ रोमांचित करता है, इसी पर एक छोटी सी झील बनी थी।

पहाड़ी झरने से बना शांत ताल

आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते के इस विशिष्ट आकर्षण के संग यात्रियों का जमाबड़ा इसके किनारे सेल्फी के साथ ग्रुप फोटो लेने में मश्गूल था। हम लोग भी इसका लोभ संवरण नहीं कर पाए और कुछ यादगार फोटो खींचते हैं। इसके साथ ही थोड़ी दूर पर चाय-नाश्ते का एक ढावा मिला, जहां कुछ यात्री विश्राम के साथ पेट-पूजा कर रहे थे।

यहाँ के हरे-भरे परिवेश के आगे का मार्ग चट्टान काट कर बना है,

गौंदार की ओर बढ़ता निर्माणाधीन चट्टानी ट्रेक

रास्ते में इन चट्टानों पर पहाड़ी छिपकली के दर्शन होते हैं, जो मटमेले या घूसर रंग की होती है, हम तो इसे स्थानीय भाषा में चपाड़ कहते हैं। छिपकली से अधिक इसे गोह परिवार का छुठभई सदस्य मान सकते हैं। स्वयं में मस्त-मगन यह जीव किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। यह सामान्य छिपकली की तरह घरों में नहीं पाया जाता। रास्ते भर चट्टानों पर, स्लेट वाले घर की छतों पर इसके दर्शन होते रहे। यह इन चट्टानी आवास में क्या खाता-पीता होगा, एक शोध का विषय लगा।

गौंदार की ओर की महमहेश्वर घाटी

चट्टानी रास्ते को पार कर सामने दूर गोंडार के दर्शन शुरु हो जाते हैं, साथ ही नीचे मधुगंगा के दर्शन व सांय-सांय निनाद बीच-बीच में सुनने को मिल रहा था।   और थोड़ी देर में पास ही ऊँचाई में विरान स्थल पर एक पहाड़ी गाँव दिखता है। कल्पना करता रहा कि यहाँ लोग प्रकृति की गोद में कितनी शांति-सुकून से रहते होंगे। रास्ते में सड़क के चौड़ीकरण का काम चल रहा था, कुछ सिविल इंजीनियर धागे व यंत्रों से नाप ले रहे थे।

गौंदार की ओर बढ़ते खच्चर सवार

जिगजैग सड़क के साथ हम आधे घंटे में ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ रास्ता काटने वाली जेसीबी मशीन खड़ी थी। अर्थात इसके आगे अभी रास्ता कटना शेष था।

यहीं से पतली पगडंडी के सहारे नीचे उतरते हैं। बीच में 20 मीटर का खड़ी ढलान वाला छोटी सीढ़ियाँ काटकर बनाया रास्ता मार्ग की पहली चुनौती लगा। यहाँ एक कदम की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती थी। दिन के उजाले में ही जब यह इतना चुनौतीपूर्ण लग रहा था, तो रात को तो किसी नौसिखिए या बिना गाइड़ के यात्री को इस रास्ते पर चलने की सलाह नहीं दी जा सकती। किसी तरह हम सब व शेष यात्री सही सलामत यहाँ से नीचे उतरते हैं। नीचे कुछ दूरी पर हमारी पगडंडी पुराने समतल रास्ते से मिलती है, जो रांसी-महमहेश्वर का पारम्परिक रास्ता भी रहा है। यहाँ से आगे का मार्ग चौड़ा व सीधा गौंडार की ओर बढ़ता है।

पहाड़ी झरने का खुबसूरत दृश्य

बीच में एक झरना व नाला पड़ता है, जिस पर लौहे का पुल बना है।

लोहे की पुलिया और गौंदार की ओर बढ़ता समतल ट्रेक

इसके दाएं किनारे पर एक ढावा कहें या चट्टी में यात्रियों के चाय-नाश्ते की उचित व्यवस्था दिखी। पानी के स्रोत के पास ऊतीश के हरे चमकीले पत्तों वाले पेड़ वहुतायत में दिखे, जो इसके लिए आदर्श स्थल रहते हैं। झरने के बाद थोडी देर में एक मोड़ पर भगवती का छोटा सा मंदिर पड़ता है, जहाँ माथा नवाकर हम आगे बढ़ते हैं। यहाँ से गौंडार अगले मोड़ के पार पड़ता है। नीचे मधुगंगा का दुधिया जल पूरी गर्जन-तर्जन के साथ आगे बढ़ रहा था। अगले मोड़ के पास पहुँचते ही गौंडार गांव सामने प्रत्यक्ष दिखता है।


थोड़ी देर में हम गौंडार गाँव में प्रवेश कर रहे थे। यहाँ पर्यटकों की पूरी चहल पहल थी। कुछ यहाँ से राँसी की ओर बापिस चल रहे थे और अधिकाँश महमहेश्वर की ओर, कुछ यहाँ के होम-स्टे व ढावों में नाश्ता के लिए रुके थे। हम भी यहीं सड़क के साथ लगे एक ढावे में विश्राम करते हैं, चाय-बिस्कुट की हल्की रिफ्रेशमेंट लेते हैं।

गौंडार में कुछ पल विश्राम के

यहीं के नल से बोटल में पहाड़ी चश्में का जल भरते हैं। और यहाँ पर एक पालतु सफेद कुतिया को बिस्कुट खिलाते हैं, जो अनजान लोगों के साथ घुलमिल कर अपना काम चलाने की अभ्यस्त दिखी। यहाँ आठ बज चुके थे। अर्थात दो घंटे में हम अगतोलीधार से, व अढ़ाई घंटे में रांसी से यहाँ पहुंच चुके थे। पांच किमी हम तय कर चुके थे और एक किमी आगे संगम तक शेष था। 7000 फीट से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई तक उतर चुके थे।

आगे का रास्ता पहले सीधा, फिर ढलानदार, फिर सीधा व अंत में झुले के पास सीधे नीचे उतरता है।
पहली ढलान वाला रास्ता संकरा और लैंडस्लाइड जोन में बना है। दाईं ओर गहरी खाई सीधे मधुगंगा तक जा रही थी। मार्ग के अंत में संगम के ठीक ऊपर झूला अभी नहीं चल रहा था, जो सीधे बनतोली से जोड़ता है। पहले यहाँ पुल था, जो पिछले वर्षों बाढ़ में बह गया। इसलिए अब संगम तक नीचे उतराई वाला रास्ता तय करना पड़ा, और इसका अंतिम छोर दो समांनांतर पत्थऱ सीमेंट की मेढ़ से होकर पुरा किया।

रास्ते की दूसरी चुनौती - पहले आसान मानकर इसके बीच के मिट्टी वाले रास्ते पर चल दिए, आगे पता चला कि ये तो खच्चरों का मार्ग है, जो उनकी लीद से भरा था। जिस पर चलना लीद की दुर्गंध के साथ जुत्तों को पूरा कीचड़ में डुबो रहा था। किसी तरह डंडे के सहारे सहयात्री का हाथ पकड़ ऊपर मेड़ पर चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं। यहां से निकलने के बाद फिर मिट्टी व पत्थरों में झटककर जुत्ता साफ करने की कवायद चलती रही।

यात्रियों को रात को व अंधेरे में इस रुट पर न चलने का सुझाव दिया जाता है। एक तो इसमें पहले ढलान वाले रास्ते व फिर रिज वाले बिंदु पर अंधेरे में फिसल कर चोटिल होने का खतरा है। इसी कारण अगले दिन मदमहेश्वर की ओर जा रहा एक दल रात को यहीं से गौंदार बापिस हो गया था। रांसी से बनतोली तक यह दूसरा चुनौतीपूर्ण बिंदु है, जो अंधेरे में अकेले चलने लायक नहीं है। आगे यदि यह दुरुस्त हो जाता है, तो बात दूसरी है।

पचास मीटर उतराई के बाद हम संगम से थोड़ा ऊपर बनी लकड़ी की पुलिया के पास थे, जहाँ मदमहेश्वर के दायीं ओर से आ रही मार्कंड गंगा अपने दुधिया जल राशि को लिए पूरे वेग के साथ जैसे हर-हर महादेव का गुंजार करती हुई नीचे मधुगंगा से मिलन के लिए आगे बढ़ रही थी।

मार्कण्ड गंगा का दुधिया जल

पुलिया से इसका दृश्य एक अलौकिक अनुभव दे रहा था, जो इस रूट का एक विलक्षण पल था। लगभग सभी यात्री यहाँ कुछ पल रुककर इस अद्भुत दृश्य व इसके दिव्य निनाद को आत्मसात करते हुए किसी दूसरे लोक में विचरण करते नज़र आ रहे थे। इसको पार कर कुछ साहसी लोग मधुगंगा के बर्फीले जल में डुबकी लगा रहे थे। निश्चित रुप से इसका ग्लेशियरों से निकला जल अपने हिमालयन टच के साथ उनको रिफ्रेश और रिचार्ज कर रहा था।
बनतोली संगम का दृश्य

यहाँ से गौंड़ार पीछे दिख रहा था और आगे सामने ऊँचा पर्वत जिसकी गोद में बनतौली गाँव बसे हैं, जिनको पार करते हुए हमें मदमहेश्वर की ओर बढ़ना था। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे। यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे, यहां भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं। यहाँ परौंठा, चाय, अचार और घर की दहीं के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं, संयोग से बापिसी में अगले दिन यहीं हमारे रात को रुकने का भी ठिकाना बनता है। (जारी, शेष अगले भाग-4, वनतौली से नानू चट्टी में)


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

पुस्तक समीक्षा, हिमालय की वादियों में


 

यायावरी का तिलिस्म

प्रो. शंकर शरण, राष्ट्रीय अध्येता,

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), शिमला, हिं.प्र.



 मात्र पचास-साठ वर्ष पहले तक यात्रा और भ्रमण साहित्य अच्छे प्रकाशन संस्थानों का एक विशिष्ट भाग होता था। केवल बनारसी दास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन, और कवि अज्ञेय जैसे ख्यातनाम, अपितु सामान्य व्यक्तियों द्वारा लिखे यात्रा-वृत्तांत भी प्रकाशक सहर्ष छापते थे यहाँ तक कि बड़े लोग उस की भूमिकाएँ तक लिखते थे। कदाचित कारण यही रहा हो कि तब यात्राएँ उतनी सुलभ और प्रचलित नहीं थीं। इसलिए जो लोग यात्राएँ और भ्रमण करते थे, उनके विवरणों से सहृदय पाठक उसका घर बैठे आनंद, कल्पना और जानकारी प्राप्त कर लियाकरते थे। अब यातायात, संचार और पर्यटन उद्योग का ही भारी विस्तार हो चुका है। संभवतः इसीलिए अब इस विधा का महत्त्व कम हो गया 

इसीलिए प्रो. सुखनन्दन सिंह जैसे जन्मजात घुमक्कड के प्रथम यात्रा वृत्तांत को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला है। वह देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में पत्रकारिता के प्राध्यापक तथा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के यू.जी.सी.-एसोसियट भी हैं। यद्यपि उनकी यह पुस्तक 'हिमालय की वादियों में' (बिलासपुरः एविन्सपब, 2021) काफी समृद्ध है, और बड़े मनोयोग से लिखी गयी है। यह किसी बाहरी पर्यटक द्वारा या ऊपरी दृष्टि से हिमालय के रमणीक और महत्त्वपूर्ण स्थलों को देखने का वर्णन बिलकुल नहीं है। बल्कि स्वयं एक हिमालय पुत्र द्वारा गहरी संवेदनशील दृष्टि से अनेकानेक स्थानों के विस्तृत यात्रा-वृत्तांत हैं।

जिनमें कुछ स्थलों पर वह अनेक बार गया है। इस तरह, एक तुलनात्मक दृष्टि के साथ-साथ, केवल भौगोलिक, जिनमें कहीं-कहीं नदियों, झीलों, वनस्पतियों और वन्य जीव-जंतुओं तक के बारे में सूक्ष्म अवलोकन है, बल्कि संबंधित क्षेत्रों के सामाजिक, सांस्कृतिक तत्त्वों का भी मुजायका मिलता है। विवरणों के अतिरिक्त इस में 57 तस्वीरें भी हैं। इस रूप में यह पुस्तक एक रोचक यात्रा-विवरण के साथ-साथ, एक अच्छा पथवृत्त-मार्गदर्शक तथा पर्यावरणीय एवं सामाजिक शिक्षा की सामग्री भी प्रदान करती है।



पुस्तक के समर्पण से भी लेखक की भावना की झलक मिलती है। स्वयं हिमालय को इसे अर्पित करते हुए उन्होंने लिखा है, “उस देवात्मा हिमालय को जिसकी गोदी में बचपन बीता, जिसकी वादियों में युवावस्था के स्वर्णिम पल देखे, जो जीवन की ढलती शाम में, मौन तपस्वी-सा आत्मस्थ, अंतस्थ एवं अडिग खड़ा, आंतरिक हिमालय के आरोहण की सतत् प्रेरणा देता रहता है।" लेखक का दिल बचपन से ही पहाड़ों के लिए धड़कता रहा है, जिनमें हिमालय  को बाद में उन्होंने गुरुजनों से 'देवात्मा' के रूप में जाना जो मिट्टी और पत्थर के विग्रह मात्र नहीं, अपितु आध्यात्मिक चेतना के मूर्तिमान संवाहक हैं। इस कारण ही संपूर्ण हिमालयी परिवेश को देवभूमि भी कहा जाता है।

यद्यपि यह लेखक का पहला यात्रा-संकलन है, जिसमें हिमाचल और उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के वर्णन हैं। किंतु उन्होंने इसे अत्यंत समृद्ध आकलनों और अवलोकनों से भर दिया है। नोट करने की बात है कि लेखक विगत तीन दशकों से हिमालयी प्रदेशों की यात्राएँ करते रहे हैं। इससे भी कुछ अनुमान किया जा सकता है कि हिमालय के संपूर्ण परिदृश्य को आँकने की उनकी दृष्टि कितनी पैनी और अनुभव-समृद्ध हो चुकी होगी। वे पेड़-पौधों ही नहीं, विविध वन्य जीव-जंतुओं, घास-लताओं और चट्टानों में लगी काई तक की विशेषताएँ पहचानते हैं। यह भी कि बंदर किन पत्तें, या फलों को खाते हैं, किस घास से किस जीव-जंतु का क्या संबंध है, अथवा किस वृक्ष की क्या विशेषता है। ऋषिकेश में रामझूला से नीलकंठ जाने के मार्ग में लंगूरों का उल्लेख मिलता है, “ये शांत एवं सज्जन जंगली जीव यात्रियों के हाथों से चना खाने के अभ्यस्त हैं। ये झुंडों में रहते हैं। इनसे यदि भय खाया जाए, तो इनकी संगत का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।” (पृ.33)


यद्यपि सिद्ध पाठकों को इस पुस्तक के विवरण-शैली में एक अनगढ़ता लग सकती है, किंतु वह कोई कमी होने के बदले गुण ही है क्योंकि उसमें लेखक के हृदय की अनुभूति है, जो संपादन की कमी को खलने नहीं देती। यायावर को इसकी चेतना भी बनी रही है कि उन हिमालयी मार्गों, क्षेत्रों में पहले गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी सत्यानन्द, आदि जैसे महान गुरु और मनीषी भ्रमण करते रहे हैं। जो अपनी बारी में स्वयं हजारों वर्ष पहले की हिमालय साधना परंपरा का ही अनुकरण कर रहे थे। अतः कोई सचेत, निष्ठावान यायावर आज भी वह अनुभूति कर ही सकता है, जो उन मनीषियों को हुई होगी।

कुल मिलाकर इस संकलन में छत्तीस विभिन्न यात्राओं के विवरण हैं। इनमें कुमाऊँ, गढ़वाल, शिमला, मंडी, कुल्लू घाटी, मनाली हिमालय और लाहौल घाटियों में अलग-अलग स्थानों की यात्राओं के वर्णन मिलते हैं। इसे पढ़ते हुए संपूर्ण हिमालय क्षेत्र के असंख्य मंदिरों, गाँवों, कस्बों, घाटियों, नदियों, ताल-तलैयों, आदि की स्थिति, विशेषताएँ, तथा चित्र एवं शब्दचित्रों के भी दर्शन होते हैं। जैसे, मालिनी नदी का परिदृश्य बताते हुए, “कहीं किसान इसके किनारे खेती कर रहे हैं, तो कहीं मछुआरे मछली पकड़ रहे, कहीं कपड़े धुल रहे हैं तो कहीं इसके किनारे भेड़-बकरियाँ-गाय-घोड़े आदि चर रहे हैं, तो कहीं इसके किनारे तंबू लगे हैं, रिजॉर्ट बने हैं, टूरिस्ट कैंप चल रहे हैं। कहीं इसके किनारे पूरे गाँव आबाद हैं।” (पृ.18) इसी नदी के बाएँ तट पर हनुमान का सिद्धबली मंदिर है, जहाँ भंडारा कराया जाता है। इस मंदिर की महत्ता इसी से समझ सकते हैं कि लेखक को अपनी यात्रा के समय पता चला कि वहाँ भंडारा करवाने के लिए अगले दस वर्ष तक की बुकिंग हो चुकी है!



कई वर्णनों में अनायास अनेक तकनीकी जानकारियाँ भी मिल जाती हैं, जो नये यायावरों के लिए बड़े काम की साबित होंगी। जैसे कि कहाँ पर कौनसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, और कहाँ पर कैसी विशेष कठिनाइयाँ उपस्थित हो सकती हैं। इस रूप में, यह पुस्तक युवा यायावरों के लिए एक मूल्यवान गाइड, मार्गदर्शिका का काम भी करेगी, जो उन स्थलों की यात्राएँ करने की योजना या हौसला रखते हैं। यथा, लैंसडाउन का वर्णन पढ़ते हुए यह मिलता है, "टिप-एन-टॉप यहाँ से ऊपर चोटी पर दर्शनीय बिंदु है, जहाँ से दूर घाटी का अदभुत नजारा देखा जा सकता है इसके नीचे किनारे बाँज, बुराँश देवदार के घने जंगल बसे हैं, जिनके बीच का सफर पैसा-वसूल ट्रिप साबित होता है। रास्ते में चर्च के पास ही गाड़ी खड़ी कर पैदल यात्रा का आनंद लिया जा सकता है देवदार-बुराँश के जंगल के बीच स्थित चर्च में शांतचित्त होकर दो पल प्रार्थना के बिताये जा सकते हैं।” (पृ. 19) या फिर, हरिद्वार में चलते-चलाते मोहन पूरीवाले, प्रकाशलोक नामक लाजबाव लस्सी की दुकान, त्रिमूर्ति के पास बेहतरीन गुजराती ढाबे की सूचना भी दी गयी है। इसी तरह शिमला की आकर्षक पैदल चढ़ाइयों (ट्रैकिंग ट्रेल्स) की विस्तृत जानकारियाँ इस में विस्तार से दी गयी हैं (पृ. 144-48)

आध्यात्मिक और पर्यटकीय विवरणों के साथ-साथ हर स्थान की सामाजिक, आर्थिक, कृषि संबंधी, आदि स्थितियों की ऊँच-नीच पर भी लेखक की अनायास नजर रही है कि कहाँ कौन-से सामाजिक रोग, या व्यसन समाज को कमजोर कर रहे हैं। विभिन्न पर्वतीय स्थानों की तुलनात्मक विशेषताएँ भी दिखायी गयी हैं। फिर एक ही स्थान की तुलनात्मक स्थिति को भी नोट किया गया है, कि पहले वह कैसी थी तथा अब उसमें क्या परिवर्तन आये हैं। उदाहरण के लिए, अल्मोड़ा से आगे के इलाकों पर, “सड़क के साथ जल-स्रोत के होते हुए भी लोग सामान्य खेती तक ही सीमित दिखे। उर्वर जमीन के साथ पहाड़ी क्षेत्र होते हुए यहाँ फल और सब्जी की अपार संभावनाएँ हमारे बागवानी भाई को दिख रही थी। इस ऊँचाई पर नाशपाती, पलन, आडू, अनार, जापानी फल की शानदार खेती हो सकती है। सेब की भी विशिष्ट किस्में यहाँ आजमाई जा सकती हैं। सब्जियों में मटर, टमाटर, शिमलामिर्च से लेकर औषधीय पौधे, फूल, लहसुन, प्याज, गोभी जैसी नकदी फसलें उग सकती हैं। यदि क्षेत्रीय युवा इस पर ध्यान केंद्रित कर दें, तो उनके गाँव-घर छोड़ कर दूर रहने, पलायन की नौबत ही आये।” (पृ. 3) यद्यपि लेखक अपनी बुद्धि कोछटाँक भर की' मानते हैं, फिर भी उनके कई अवलोकन बड़े वजनी और दूरगामी महत्त्व के प्रतीत होते हैं। यथा, “गाँव वालों का कहना था कि कितनी भी गमी हो यहाँ का पानी कभी सूखता नहीं। वास्तव में बाँज के पेड़ की जड़ें नमी को छोड़ती हैं इसे संरक्षित रखती हैं। हमारे मन में आया कि यदि गाँव वाले इस जंगल में बाँज के पेड़ों के साथ मिश्रित वनों को बहुतायत से लगा लें तो शायद यहाँ के सूखे पड़ते जल-स्रोत फिर रिचार्ज हो जाएँ।” (पृ. 4)

शिमला और आस-पास के स्थलों का विस्तार से वर्णन (पृृृृ. 136-61) लगभग सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियों से भरा हुआ है जिसमें सुंदर स्थानों, मंदिरों, प्रसिद्ध शैक्षिक संस्थानों, एवं विशेष पैदल-पथों, ट्रैकिंग-ट्रेल्स के विवरण और तस्वीरें हैं। ऐसे विवरणों से किसी इच्छुक को अपनी भावी यात्रा की सही योजना बनाने में सहायता सकती है। इस पुस्तक में वर्णित यात्राओं में कुछ टीम-यात्राएँ भी हैं, जिनमें लेखक अपने शिक्षण संस्थान के छात्रों के दल लेकर भ्रमण और पर्वतारोहण प्रशिक्षण पर गये थे।

पुस्तक में कहीं से भी दस-बीस पन्ने पढ़कर भी लेखक की संवेदनशील दृष्टि, सजग अवलोकन, या हिमालयी प्रदेश की संपूर्ण थाती और संबंधित धर्म-समाज के प्रति हार्दिक चिंता की झलक मिल जाती है। कहीं-कहीं अनुभवजन्य दार्शनिक टिप्पणियाँ भी हैं। जैसेयदि ध्यान सारा रास्ते लक्ष्य पर केंद्रित हो तो फिर भय को घुसने का प्रवेश द्वार ही मिले।" यह बात किसी खतरनाक रास्ते को पार करते समय की स्थिति पर कही गयी है, किंतु यह मनुष्य के जीवन के कठिन, चुनौतीपूर्ण कार्यों को साधने के लिए भी यथावत सच है।

अतः कई रूपों में यह पुस्तक पारंपरिक यात्रा-वृत्तांतों से अधिक मूल्यवान प्रतीत होती है। इसे किसी सुयोग्य संपादक द्वारा यथोचित संपादित कर, संभव हो तो सभी यात्राओं का काल आदि जोड़कर, कहीं-कहीं दुहरावों तथा सामान्य वैयक्तिक तस्वीरों को हटा कर, इसका एक लघुतर संस्करण विद्यार्थियों एवं सामान्य पाठकों के लिए भी  बहुत उपयोगी, पठनीय हो सकता है। उन्हें इससे अपने देश के हिमालयी क्षेत्र के प्रति सार्थक जानकारी पाने के साथ-साथ अपनी संवेदना और कल्पनाशीलता भी विकसित करने में सहायता मिलेगी। 


(महात्मा गाँघी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विशिवद्यालय, बर्धा की त्रैमासिक पत्रिक - पुस्तक वार्ता, जुलाई-सितंबर 2020 अंक के पृष्ठ 106-108)

पुस्तक - हिमालय की वादियों में, लेखक - प्रो. सुखनन्दन सिंह

प्रकाशक - एविंन्सपव बिलासपुर, छत्तीसगढ़, वर्ष - 2021, पृष्ठ - 243, मूल्य -399 रु.




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