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प्रकृति से तालमेल में छिपे समाधान युग के

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कुदरत संग दोस्ती से हासिल मंज़िलें कहावत प्रसिद्ध है कि जितना हम प्रकृति से जुड़ते हैं उतना हम संस्कृति से जुड़ते हैं। जितना हम प्रकृति व संस्कृति से जुड़ते हैं उतना हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ते हैं। ऐसे में हमारा संवेदशनशीलता जाग्रत होती है, समाज सेवा सहज रुप में बन पड़ती है। चारों ओर सुख-समृद्धि व शांति का माहौल तैयार होता है, परिवेश में स्वर्गीय परिस्थितियाँ हिलौरें मारती हैं। आज अगर देश-समाज व विश्व में परिस्थितियाँ नारकीय बनी हुई हैं, वातावरण में अशांति, बिक्षुव्धता, दहश्त व घुटन फैली है तो कहीं न कहीं हम प्रकृति व संस्कृति से हमारा अलगाव कारण है। जिसके चलते अंतरात्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो चला है और समाज के प्रति संवेदशनशीलता कुंद पड़ चुकी है। ऐसे में प्रकृति के दौहन-शौषण का सिलसिला ब्दस्तूर जारी है, जिसके परिणाम हमारे सामने हैं। नदियाँ सूख रही हैं, जलस्रोत्र दूषित हो रहे हैं। गंगा नदी हजारों करोड़ रुपयों के खर्च के बाद भी मैली की मैली पड़ी है। जमुना का पानी गंदे नाले में तबदील हो चुका है। ऐसे ही कितनी ही नदियों का अस्तित्व खतरे में है, कितनी प्रदूषण की मार से दम त