बुधवार, 31 जुलाई 2019

यात्रा वृतांत, मेरी पौलेंड यात्रा, भाग-3


बिडगोश शहर के ह्दयक्षेत्र में पहली शाम

संयोग से आज शनिवार था, बुद्धपूर्णिमा का पावन दिन था। अगले दिनों प्रस्तुत होने वाली पीपीटी की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं। फिनिशिंग टच व अभ्यास शेष था। पहली शाम विश्राम के बाद आज दूसरी शाम बिडगोस्ट शहर के भ्रमण के नाम थी। विश्वविद्यालय की ओर से नामित मनोविज्ञान की छात्रा डोमिनिका के साथ यह सम्पन्न होता है। विवि परिसर के साथ सटे प्रकृति की गोद में बसे पार्क से गुजरना एक भव्य अनुभव रहा। क्रिसमस ट्री पार्क की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। पता चला कि यहाँ इसकी कई तरह की किस्में पायी जाती हैं। यहाँ रास्ते भर सड़क के दोनों ओर तथा पार्क में झाड़ियां एवं वृक्ष फूलों से लदी हुईं थी। हमें जानकर अचरज हुआ कि यहाँ इस समय बसन्त का सीजन चल रहा है और गर्मी यहाँ जुलाई में शुरु होती है, जिसमें तापमान मुश्किल से 30 डिग्री पार होता है। (हालाँकि इस बार यूरोप में तापमान के पिछले रिकॉर्ड टूटने की खबरें पढ़ने को मिली हैं) यहाँ शहर के भवन, गलियाँ व सड़कें पूर्वचर्चित अंदाज में साफ, सुव्यवस्थित एवं भव्य उपस्थिति दर्ज करा रही थी।
शनिवार यहाँ, विकेंड का पहला दिन था। लोग परिवार के साथ बाजार एवं पार्क में आनन्द ले रहे थे। रास्ते में पहला फब्बारा मिला, जो शेर, इंसान, सर्प आदि के चित्र के बीच एक अद्भुत सृष्टि का सृजन कर रहा था, ऐसा दृश्य हमारे लिए एकदम नया और कौतुक का विषय था। पता करने पर स्पष्ट हुआ कि यह शिल्प बाईबिल की कथा पर आधारित है, जिसमें सृष्टि के प्रलय एवं नई सृष्टि की रचना के समय की कथा अंकित थी, जिसमें जल प्रलय व नाव की बात की गई है। लगा कि थोड़े-बहुत पात्रों की भिन्नता के साथ कथा का मूल एक जैसा है, जैसा हम सृष्टि प्रलय के समय मनु, सप्तऋषि एवं नाव की बात अपने धर्मग्रँथों में पाते हैं। लगा कि यह भी एक शोध का विषय हो सकता है, कि विभिन्न धर्मों के तार किस तरह से एकसमान सार्वभौम सत्य एवं तथ्यों से जुड़े हुए हैं।
चेस्टनेट के फूलों से लदे वृहद वृक्षों की छाया के तले बढ़ते हुए हम शहर के बीच सड़क पर पहुँचते हैं, जहाँ बस सर्विस के साथ ट्राम भी चल रही थी। बसें यहाँ की भारत की तुलना में काफी लम्बी होती हैं। पूर्व चर्चित ट्रैफिक अनुशासन के साथ यहाँ स्पीड़िग की समस्या कहीं-कहीं दिख रही थी। कुछ जोशीले युवा बाईक व कारों में स्पीड़ के थ्रिल को आजमाते दिख रहे थे, जो भारतीय शहरों में भी एक आम दृश्य रहता है।
रास्ते भर हम हरे-भरे ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के बीच सुंदर भव्य शहर को निहारते हुए आगे बढ़ते रहे। ट्राम के ट्रेक को पार कर हम बर्दा नदी के ऊपर बने पुल पर थे। पुल के नीचे बहती नदी, इस पर चल रहे मोटरवोट नुमा जहाज, हल्की धूप के बीच शीतल हवा के झौंके व उत्साह से भरे लोगों की चहल-पहल सब मिलाकर अद्भुत एवं दिलकश नजारा पेश कर रहे थे। सामने दूर पहाड़ियों पर भव्य संरचनाएं बहुत सुंदर लग रही थी, जो यूनिवर्सिटी के विस्तारित परिसर के भवन थे।
सामने नीचे की ओर नदी पर एक तार पर संतुलन साधे एक नग्न पुरुष, एक हाथ में तीर तो दूसरे में लाठी लिए नदी पार कर रहे थे। यह बिडगोस्ट का एक महत्वपूर्ण लैंडमार्क है। लगा जैसे यह पथिक को जीवन का संदेश दे रहा हो। लक्ष्य भेदन के लिए निकले पथिक को, पतली रस्सी पर नदी की मझधार जैसी विकट स्थिति में फंसे होने के बावजूद लक्ष्यभेदन की तत्परता एवं एकाग्रता का संदेश दे रहा था। पता चला कि यह बूत 2004 में बना है। पतली तार पर इसका संतुलन कैसे बना है, यह अभी तक हमारे लिए एक राज था।
इस क्षेत्र को शहर का ह्दय क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि आदिकाल से नदी के किनारे का यह क्षेत्र व्यापार का मुख्य केंद्र रहा है। साथ ही इसके चारों ओर कई पुरातन भव्य चर्च, कई म्यूजियम और कलाकेंद स्थित हैं, जो शहर के इतिहास को समेटे पेंटिंग, मूर्तियों व दस्तावेजों के साथ समृद्ध हैं। इनकी परिक्रमा आपको यहाँ के सांस्कृतिक पक्ष को समझने में मदद करती है और विकेंड में यहाँ लोगों की विशेष भीड़ रहती है। यह सब देखते हुए यहाँ के लोगों में अपनी कला एवं संस्कृति के प्रति पर्याप्त जागरुकता प्रतीत हुई। शहर की स्थापना एवं विकास का श्रेय सम्राट काजिमिर महान को जाता है, जिन्होंने सन 1343 में इसकी नींव  रखी थी, यहाँ के सामाजिक कानून दिए थे और पत्थरों की जगह ईँटों के प्रयोग की विधि खोजी थी। स्टेच्यू के बग्ल के संग्राहलय में यहाँ के लोकजीवन, युद्ध, स्वतंत्रता संघर्ष, दासता एवं पुनः आजादी का रोचक एवं रोमाँचक इतिहास दर्ज है।
शहर 245 किमी लम्बी बर्दा नदी के किनारे पर बसा है, जो आगे विस्तुला नदी में मिलती है, जो पौलैंड की सबसे बड़ी नदी(लगभग 1500 किमी) है, जो आगे चलकर बाल्टिक सागर में समा जाती है।
यहाँ के पुल को पारकर हम यहाँ की साफ-सुथरी पारम्परिक गलियों से होते हुए पुराने टापू शहर की परिक्रमा करते हुए ओपेरा हाउस से होते हुए पुनः पुल तक बापिस पहुंचते हैं। हर गली, मोहल्ले, दुकान, पार्क एवं रेस्टोरेंट में लोगों को परिवार के संग जीवन को उत्सव की तरह मनाते देखा। विकेंड का यह उत्सवनुमा माहौल हमें दिलचस्प लगा। पता चला कि यहाँ लोग सप्ताह के पांच दिन जमकर काम करते हैं, मेहनत करते हैं, कमाते हैं और विकेंड में अपने परिवार के साथ, बच्चों के साथ पूरा आनन्द मनाते हैं। अपने देश में सप्ताह भर काम के बोझ में दबे अधिकाँश भारतीयों के लिए यह एक अनुकरणीय पहलु लगा। रास्ते में ही हमें शहर के एकमात्र भारतीय रेस्टोरेंट रुबरु के दर्शन हुए, जहाँ हम अगले दिन पधारने वाले थे।

इसी टापू पर दो अन्य म्यूजियम में भ्रमण का मौका मिला। विकेंड में यहाँ निशुल्क प्रवेश रहता है। एक एव्सट्रैक्ट कला पर आधारित था, जिसे समझना व ह्दयंगम करना हमारे लिए सदा ही कठिन रहता है। माड्रन आर्ट के नाम पर ऐसी विचित्र कलाकृतियां व चित्र हमारे लिए सदा ही पहेली रहते हैं, लेकिन दर्शकों का खासी संख्या देख लगा कि इसको समझने वाले लोगों की भी कमी नहीं, हालांकि वे क्या समझ पा रहे थे, मिलकर रोचक चर्चा हो सकती थी, लेकिन यह आज संभव नहीं था। दूसरा म्यूजियम हमें अपने अनुकूल लगा, जिसमें यहाँ की प्रकृति, ग्राम्य-शहरी जीवन, यहाँ के कलाकार, महापुरुषों एवं विभूतियों का संग्रह था। म्यूजियम के बाहर लोग हरे-भरे वृहद वृक्षों की छाया तले चर्चा करते हुए मिले।
फिर हम बर्दा नदी से निकली नहरनुमा धारा के संग टापू पर पहुँचे। पार्क में बच्चे, बुढ़े, जवान सब मखमली लॉन पर पूरा एन्जॉय कर रहे थे। बड़े-बुजूर्ग बैठे गुप्तगुह कर रहे थे, तो बच्चे-किशोर खेल रहे थे। यहाँ की मौज-मस्ती एवं उत्सवनुमा माहौल का आलम ह्दयस्पर्शी था। फूलों से लदे वृक्ष, हरे भरे पेड़, यहाँ के सुंदर भवन सब मनोरम नजारा पेश कर रहे थे। डोमिनिका से पता चला कि टापू पौलेंड के सबसे बड़े पार्क का खिताब लिए हुए है।
फिर हम बर्दा नदी पर बने लबर्ज पुल को पार करते हैं, जिसमें ताले बाँधे दिखे, जिन्हें प्यार की मन्नत का प्रतीक माना जाता है। इस पुल से जुड़ी किवदंतियां भी सुनने को मिली कि एक बार तो यहाँ इतने लोग इकट्ठा हो गए थे कि पूरा पुल ही ध्वस्त हो गया था। सामने ऑपेरा हॉउस था, जिसमें यहाँ के लोकप्रिय सांस्कृतिक कार्यक्रम का अवलोकन हम अगले दिन करने जा रहे थे।
इस तरह पूरी परिक्रमा के बाद हम पुनः बर्दा नदी पर बने स्टेच्यू पुल पर थे। शाम का धुंधलना छा रहा था, यहाँ से बापस ट्राम रेल्वे को पार करते हुए हम पुनः पैदल वॉक करते हैं। आवश्यक समान खरीदने के लिए रास्ते में हम एक बड़े स्टोर में प्रवेश करते हैं, यहाँ के दूध, चीनी, फल आदि से परिचित होते हैं। स्टोर से ज्बेल्को(सेब), और मलेको(दूध) व शक्कर आदि लेते हैं। ग्राऊजी(हमारा पैसा) व ज्लोटी(वहाँ का रुपया) में अंतर आज समझ आ रहा था, जब हम नामसमझी में ग्राऊजी को ज्लोटी मान दुकानदार से सामान खरीद रहे थे।
रास्ते में शहर के रेडियो स्टेशन के दर्शन हुए। सड़क के दोनों ओर सफेद फूल से लदे पेड़ बहुत सुंदर लग रहे थे। इन्हीं के बीच चलते हुए बापस पार्क से होकर विश्राम स्थल तक आते हैं। पूरे रास्ते भर हमारे साथ मौसम की विशेष कृपा रही। सुबह से बादल छाए थे, दिन में बरसे, लेकिन शाम को मौसम साफ रहा। यह आज का ही नहीं अगले पूरे सप्ताह भर की कहानी रही। सभी कहते रहे कि आप मौसम के बारे में सौभाग्यशाली हो, क्योंकि पिछले सप्ताह यहाँ खतरनाक ढंग से आँधी-तुफान के साथ बारिश हुई थी। मौसम विभाग की भविष्यवाणी के हिसाब से, यहाँ दिन में 60 से 90 फीसदी बारिश की भविष्यवाणी घोषित थी, लेकिन पहले दिन विश्वविद्यालय से लिया छाता अंतिम दिन तक कभी काम नहीं आया।
इस तरह दूसरे दिन शनिवार की बुद्ध पूर्णिमा का समाप्न होता है। यहाँ के शहर, इसकी मार्केट, विश्वविद्यालय परिसर व ह्दयक्षेत्र मिल्स टापू आदि से मोटा-मोटा परिचय होता है। यहाँ के समाज, संस्कृति, जीवन शैली, इतिहास भूगोल से हल्का सा परिचय होता है। एक अजनवी देश में अपने अनुकूल वातावरण का निर्माण होता देख उस सूक्ष्म गुरुसत्ता की उपस्थिति का तीव्र भान हो रहा था, जिसके हाथों जीवन की वागड़ोर एक कठपुतली की तरह सौंप हम आगे बढ़ रहे थे। (जारी...)
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