सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

यात्रा वृताँत - हरिद्वार से कुल्लू वाया देहरादून-चंडीगढ़



पहाड़ एवं घाटियों के बीच सफर का रोमाँच

कई वर्षों की अचेतन में दबी इच्छा संकल्प का रुप ले चुकी थी, कुछ गहन जिज्ञासा वश तो कुछ अतीत की सुखद स्मृतियों को गहराईयों से पुनः कुरेदने की दृष्टि से। दो-तीन माह पूर्व ही इस बार की बनोगी फागली में जाने का संकल्प ले चुके थे। यह एक नितांत व्यैक्तिक जिज्ञासा से उत्तर की खोज का हिस्सा थी, लेकिन इसकी परिणति सामाजिक एवं व्यापक होगी, ऐसा सुनिश्चित था। देवभूमि की देव-परम्परा को समझने की गहन जिज्ञासा हमें अपने जन्मभूमि की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।
सो हरिद्वार से फागली उत्सव के दो दिन पूर्व चल पड़ते हैं। गूगल गुरु में मौसम का मिजाज काफी चौंकाने वाला था। गृहक्षेत्र कुल्लू से भी उँच्चे हिलस्टेशन मानाली एवं शिमला में बारिश की भविष्यवाणी हो रही थी। लेकिन इनसे कम ऊँचाई पर स्थित कुल्लू क्षेत्र में बर्फवारी की भविष्यवाणी हो रही थी। हम इसे अपनी चिर इच्छा से जोड़कर देख रहे थे, औऱ कहावत याद आ रही थी कि नेचर नेवर डिड विट्रे द हर्ट, देट ट्रूअली लव्ड हर। हमें प्रकृति माँ के उपहार की पूरी आशा थी कि इस बार निराश नहीं करेगी, हालाँकि मूल प्रयोजन बनोगी फागली को नजदीक से देखने का था।
हरिद्वार से रात का सफर देहरादून, पौंटासाहिब, नाहन, चंडीगढ़, रोपड, कीर्तपुर साहिब, नालागढ़, बिलासपुर, सुन्दरनगर, मंडी, पंडोह, ऑउट से होते हुए कुल्लू घाटी में प्रवेश करता है। देहरादून से गुजरते हुए हमेशा ही महाभारतकालीन यादें जेहन में कौंधती हैं। यहाँ द्रोणाचार्य की तपःस्थली, अश्वत्थामा की जन्मस्थली आज भी सहस्रधारा, टपकेश्वर (तमसा नदी के किनारे) के रुप में विराजमान है। गुरु रामराय के डेरे से भी इसका नाम जोड़ा जाता है। देहरादून तमाम तरह के अकादमिक एवं राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के लिए प्रसिद्ध है। बस रूट में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, भारतीय वन संस्थान व इंडियन मिलिट्री अकादमी के दर्शन तो चलती बस में ही किए जा सकते हैं। हालांकि राजधानी बनने के बाद ट्रेफिक जाम एक बड़ी समस्या के रुप में ऊभर कर आया है, जिसके समाधान के लिए रास्ते में कई जगह फलाईओवर पर काम चल रहा है।



प्रेमनगर से आगे उत्तराखण्ड यूनिवर्सिटी, हिमगिरी जी-यूनिवर्सिटी आदि रास्ते में आते हैं। 
सघन बनों एवं हरे-भरे खेतों से होता हुआ रास्ता आगे पोंटा साहिब की ओर बढ़ता है। पोंटा साहिब में सिक्खों के दशमगुरु गोविंद सिंह के अंतिम वर्षों की सृजन साधना स्थली है। यह स्थल विद्वानों की आश्रयस्थली रही, जहाँ गुरु साहिबान ने तमाम तरह के ग्रँथों की रचना की थी। हमेशा ही यमुना नदी पर बने पुल से गुजरते हुए इस पावन गुरुद्वारे के दर्शन नतमस्तक कर देते हैं।

इसके बाद हिमाचल प्रदेश में प्रवेश होता है। हल्की चढाई के साथ जंगलों के बीच मोड़दार सड़क पर सफर नाहन शहर की ओर बढ़ता है। नाहन शिवालिक पहाड़ी की गोद में बसा शहर है। शहर से होती हुई बस आगे काला अम्ब स्थान पर रात्रि भोजन के लिए रुकती है। पूछने पर कि स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा, तो पता चला कि यहाँ कभी काले रंग के आम होते थे। और आज भी इसका पेड़ कहीं अंदर गाँव में की चर्चा होती है। इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो समय निकालकर जाँच-पड़ताल पर ही पता चलता। लेकिन आधी रात में आधे घंटे के बस स्टॉप की समय सीमा में यह सब कभी संभव नहीं हो पाया। यहाँ का काला आम अभी हमारे लिए जिज्ञासा एवं समाधान का विषय है।
चंडीगढ़ से प्रवेश करते ही हमेशा माँ दुर्गा के भगवती रुप चण्डी का सुमरण आना स्वाभाविक है, जिनके नाम से शहर का नाम पड़ा है। चंडीगढ़ में प्रवेश करते ही इसकी चोढ़ी सडकें, इसके दोनों ओर स्वागत करते सुंदर वृक्ष, वृताकार फूलों व सुंदर झाड़ियों से सजे चौराहे, व्यवस्थित भवन एवं साफ-सुथरा शहर - शायद यही सब मिलकर इसे सिटी बिऊटीफुल बनाते हैं। 

मालूम हो कि चंडीगढ़ देश का पहला योजनाबद्ध से बनाया गया शहर है जो फ्रांसिसी वास्तुकार ली.कार्बुजियर की देखरेख में बना था। मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर इसके कई आकर्षण हैं, जिनका अवलोकन किया जा सकता है, जैसे-रोज गार्डन, रॉक गार्डन, सुखना झील, चंड़ीगढ़ यूनिवर्सिटी, पीजी होस्पीटल, सेक्टर-17 आदि।
डीएवी कालेज भी यहाँ का एक जाना-माना शैक्षणिक संस्थान है, जिसमें दसवीं के बाद दो वर्ष पढ़ने का सौभाग्य हमें मिला। चंड़ीगढ़ से गुजरते हुए याद आते हैं यहाँ के बीटीसी हॉस्टल में विताए दिन, जहाँ ते जिम में जीवन में पहली बार मिस्टर पंजाब युनिवर्सिटी को तराशते देखकर बॉडी बिल्डिंग की चिंगारी किशोर ह्दय में स्पार्क कर गई थी। विभिन्न प्रादेशिक एवं भाषायी पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों से इंटरएक्शन उस समय अपने आप में एक अनूठा अनुभव था। 

और इससे भी गहन रुप में याद आता है विवेकानन्द स्टूडेंट होम का वह एक वर्ष जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के विचारों से परिचय हुआ और भावी जीवन की दिशाधारा का बीजारोपण हुआ। हॉस्टेल के वार्डन-अविभावक स्वामी तत्वारुपानन्दजी का बात्सल्यपूर्ण व्यवहार एवं मार्गदर्शन किशोर ह्दय के लिए चिरप्रेरक अनुभव रहे और उनकी भेंट की हुई पुस्तकें द काल टू द नेशन एवं मेडीटेशन एंड स्प्रीचुअल लाईफ मार्गदर्शक पाथेय की भाँति साथ देती रही।

चंड़ीगढ को पार करते हुए सफर आगे मोहाली रोपड़ से होते हुए कीरतपुर साहिब आता है, जो पुनः गुरु गोविंद सिंह की कुछ वर्षों की आश्रस्थली रही। व्यास-सतलुज नदी का जल भाखड़ा नंगल से होकर यहाँ नहर रुप में पंजाब से होकर बहता है। यहीं से पुनः हिमाचल में प्रवेश होता है। शिखर पर टिमटिमाती हुई रोशनी के रुप में भगवती नैनादेवी के दर्शन देवभूमि में सुरक्षित-संरक्षित प्रवेश का अहसास दिलाता है। यह प्रख्यात 52 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि माता सत्ती के नयन यहाँ गिरे थे। 

कीर्तपुर से चढ़ाईदार रास्ते से होते हुए आगे पहाड़ी के शिखर पर स्वारघाट स्टेशन आता है, जहाँ से एक ओर नीचे पंजाब के मैदानों में रात के अंधेरे में टिमटिमाते शहरों की रोशनी का विहंगावलोक किया जा सकता है, तो दूसरी ओर थोड़ा सा आगे बढ़ते ही बिलासपुर व सुदूर हिमाच्छादित धौलाधार पर्वत श्रृंखला के दूरदर्शन किए जा सकते हैं।। स्वारघाट से बिलासपुर शहर तक का सफर गोविंदसागर झील की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ता है। ज्ञातव्य हो कि सतलुज नदी पर बना भागड़ा बाँध की झील 90 किमी लम्बी है, जिसका 90 फीसदी हिस्सा बिलासपुर में आता है। रास्ते में सरोवर के विंहगम दर्शन यदा-कदा होतेे रहते हैं।

 बिलासपुर से आगे सलापड़ पुल से होकर सफर आगे बढ़ता है, जहाँ भूमिगत सुरंग से जल पहाड़ी से नीचे सतलुज नदी में मिलता है। यहीं राह में एसीसी सीमेंट का वृहद कारखाना यात्रियों का ध्यान आकर्षित करता है, जो रात की रोशनी में जगमगा रहा होता है। आगे के सफर में सुंदरनगर के पास ऊँचे शिखर पर भगवती मुरारी माता के शक्तिपीठ का दर्शन रोमाँचक रहता है। इसे देखकर मन ललचाता है कि यहाँ से चारों ओर का विहंगम दृश्य कितना अद्भुत रहता होगा। सुंदरनगर में व्यास नदी के जल को नहर के साथ एक बैराज के रुप में एकत्र किया गया है, जो भूमिगत टनल के माध्यम से पहाड से होकर सलापड़ स्थान पर उसपार सतलुज नदी में मिलता है।


प्रायः सुंदरनगर से मंडी के बीच सुबह हो जाती है। बीच में नैरचॉक स्टेशन पड़ता है। चारों ओर सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं से घिरी इस मैदानी एवं उर्बर घाटी के बीच का सफर एक ताजगी भरा अनुभव रहता है। व्यास नदी के किनारे बसे मंडी शहर को इसके प्रख्यात मंदिरों के कारण छोटी काशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ महान संत मांडव ने तप कर आलौकि शक्तियाँ अर्जित की थी व ग्रंथों की रचना की थी। अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण यह ऐतिहासिक नगर लम्बे समय से व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। जहाँ मार्च में महाशिवरात्रि का विश्वविख्यात मेला मनाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से आईआईटी की स्थापना से शैक्षणिक कारणों से भी यह शहर चर्चा में है। 

बस स्टैंड के सामने यहाँ का क्रिकेट स्टेडियम काफी बेहतरीन है, जहाँ बड़े मैच होते रहते हैं। यहीँ से पंडोह से होते हुए तंग घाटी में प्रवेश होता है। पंड़ोह डैम सदा से ही यात्रा के बीच का आकर्षण रहता है। रात को तो इसकी वृहद-शांत जलराशी में टिमटिमाटे बल्बों की रंगबिरंगी रोशनी एक अद्भुत नजारा पेश करती है। जलस्तर उच्च होने पर नीचे से बाहर बहता हुआ पानी का प्रवाह भी भयमिश्रित आश्चर्य के साथ दर्शनीय रहता है।

पंडोह से आगे मार्ग और भी तंग घाटी से होकर गुजरता है। आज तो सड़क काफी चौड़ी बन चुकी है। कभी सड़क बहुत तंग व नीचे बाँध की झील के किनारे से होकर गुजरती थी। यात्री दिल की धड़कनों को थाम कर इस तंग घाटी को पार करते थे। उस दौर में यह मार्ग कितनी ही लोमहर्षक दुर्घटनाओं का साक्षी रहा है। लेकिन अब सड़क काफी चौड़ी होने के कारण यात्रा सुरक्षित हो गई है। इस रास्ते में हनोगी माता का मंदिर दर्शनीय रहता है। हर वाहन यहाँ भगवती से सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ता है।

इसकी राह में आगे पर्वतों से झरते झरने यात्रियों का ध्यान आकर्षित करते हैं। आगे लगभग 1.5 किमी लम्बी सुरंग से होकर आउट पहुँचते हैं। यहाँ कुल्लू की बंजार घाटी के मौसमी फल उत्पादों को दुकानों के बाहर सजाया देखा जा सकता है, जो बाजिव दामों पर उपलब्ध रहते हैं। यहाँ से कुछ किमी के बाद नगवाईं आते ही खुली घाटी में प्रवेश होता है, जहाँ से दूर शिखर के मध्य बिजलेश्वर महादेव के दर्शन होते हैं। इसी राह से होते हुए पनारसा, बंजार एवं भुंतर आता है। बंजार में शिव का प्राचीन मंदिर है। राह में ही होर्टिक्लचर यूनिवर्सिटी,नौनी का क्षेत्रीय शोध अनुसंधान केंद्र मुख्य मार्ग के दाईं ओर पड़ता है। इसी के समानान्तर व्यास नदी के दूसरी ओर गढ़सा घाटी आती है, जो कम ऊँचाई के कारण अनार और जापानी फल के लिए जाना जाता है। भुंतर में हवाई पट्टी है, जहाँ चंडीगढ़ या केलांग से आने वाले छोटे यानों व हेलीकॉप्टरों के उतरने की व्यवस्था है।
यहाँ से जिया पुल से होकर कुल्लू की ओर लेफ्टबैंक में निर्माणाधीन फोरलेन सड़क से यात्रा आगे बढ़ती है। राह में मणिकर्ण घाटी से आ रही पार्वती नदी व कुल्लू-मानाली की ओर से आरही व्यास नदी का संगम स्थल पुल से दर्शनीय रहता है। घाटी के देवताओं के स्नान का यह पावन तीर्थ स्थल भी है। 

पुराना रास्ता गाँधीनगर ढालपुर मैदान से होकर कुल्लू पहुंचता है। ढालपुर मैदान कुल्लू शहर का प्रवेश द्वार है। विश्वविख्यात दशहरा मेला इसी मैदान मे मनाया जाता है, जब घाटी के सैंकड़ों देवी-देवता यहाँ एकत्र होते हैं। यहाँ प्रवेश द्वार पर देवदार के सघन बनों का आरोपण करने वाले निष्काम कर्मयोगी साधुवाद के पात्र हैं, जिनके पुण्य प्रयास से यात्रियों के चित्त पर देवभूमि में प्रवेश का एक पावन भाव जगता है। हमारे विचार में देवदार के वृक्षों को देखते ही पहाड़ी स्थल के साथ हिमालयन टच स्वतः ही जुड़ जाता है, जो यहाँ की भव्यता में एक दिव्यता का पावन भाव घोलता है।

ढालपुर के आगे डुग्गीलग बैली से आरही सरवरी नदी को पार कर इसके ही किनारे नया बस स्टैंड आता है, जिसका नवनिर्माण द्रुतगति से चल रहा है। यहाँ से मानाली महज 44 किमी की दूरी पर है। ब्यास नदी के दोनों ओर मोटर रोड़ बने हैं। जल्द ही यहाँ रेल्वे ट्रेक बनने की बात की जा रही है। बस स्टैंड के ऊपर टीले पर सुलतानपुर शहर बसा है, जहाँ घाटी के अधिपति कुल्लु के रघुनाथ(भगवान राम) का निवास स्थान है। कुल्लू से मानाली का पुराना रास्ता अखाड़ा बाजार से होकर गुजरता है, जिसके निचले छोर पर भूतनाथ(शिव) का मंदिर है तो उत्तरी छोर पर हनुमान(रामशीला), बीच में लक्ष्मीनारायण मंदिर है तो पुराने बस स्टैंड के पास पावन गुरुद्वारा श्री सिंह सभा। इस रुट में बढ़ती आवादी, ट्रैफिक और तंग सड़क के चलते बस रुट को लेफ्ट बैंक से डायवर्ट किया गया है, जो आगे चलकर रामशीला के आगे बने पुल से पुनः राइट बैंक से होकर आगे बढ़ता है। 



यहीं से व्सास नदी के किनारे सफर आगे मानाली की ओर बढ़ता है। रास्ते में वैष्णुमाता के मंदिर से होकर सफर आगे बढ़ता है। पुलिस एवं आईटीबीपी कैंप से होते हुए कुल्लू-मानाली सड़क पर कुछ किमी का सफर तय करते हुए सेऊबाग स्टेशन आता हैं और नदी को पार करते ही अपने गन्तव्य स्थल में प्रवेश हो जाता है। कभी घाटी में सेब के शुरुआती दौर की प्राथमिक प्रयोगशाला के रुप में यहाँ रोपे गए सेब के बागों के नाम से गाँव का नाम सेऊबाग पड़ा, जो आज यहाँ के प्रगतिशील किसानों व बागवानों के अथक प्रयास के साथ अपना नाम सार्थक करता प्रतीत हो रहा है।