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छेड़ चला मैं तान झिंगुरी

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ब्लॉग सृजन प्रेरणा      कितनी बा र आया मन में , मैं भी एक ब्लॉग बनाउं , दिल की बातें शेयर कर , अपनी कुलबुलाहट जग को सुनाउं। लेकिन हर बार संशय, प्रमाद ने घेरा, कभी हीनता, संकोच ने हाथ फेरा, छाया रहा जड़ता का सघन अंधेरा , लंबी रात बाद आया सृजन सवेरा। ढलती शाम थी, वह वन प्रांतर की, सुनसान जंगल में था रैन बसेरा, रात के सन्नाटे को चीरती, गुंज रही थी तान झिंगुरी , बनी  यही तान मेरी ब्लॉग प्रेरणा, जब झींगुर मुझसे कुछ यूँ बोला। क्या फर्क पड़ता है तान, बेसुरी है या सुरमय मेरी , प्रकृति की गोद में रहता हूँ अलमस्त , गाता हूँ जीवन के तराने , दिल खोलकर सुनाता हूं गीत जीवन के , हैं हम अपनी धुन के दीवाने। तुम इसे झींगुरी तान कहो या संगीत या फिर, एक प्राणी का अलाप-प्रलाप या कुछ और, लेकिन मेरे दिल की आवाज़ है यह, अनुभूतियों से सजा अपना साज़ है यह, और शायद अकेले राहगीरों का साथ है यह। नहीं समझ आ रहा हो तो , निकल पड़ना कभी पथिक बनकर, निर्जन बन में शिखर की ओर अकेले , कचोटते सूनेपन में राह का साथ बनूंगा , सुनसान अंधेरी रात में