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मंगलवार, 2 जून 2015

मेरी पहली कुमाऊँ यात्रा, भाग-3 (अंतिम किश्त)

                                     एडवेंचर भरी मस्ती का रोमाँच

        
    मुनस्यारी से अल्मोड़ा की ओर बापसी - सुबह तड़के छः बजे हम मुनस्यारी से बापस अल्मोड़ा की ओर चल पड़े। जीप टैक्सी थोड़ा लेट होने के कारण हम पैदल ही कुछ दूर तक चलते रहे। रास्ते के दोनों ओर जंगली बांस के झुरमुट बहुत सुंदर लग रहे थे। इनमे से एक वांस की डंडी को काटकर हम निशानी के बतौर साथ ले लिए। क्षेत्रीय लोग इससे कई तरह की टोकरी, किल्टे, घरेलू उपयोग के सामान तैयार करते हैं। इसी से बांसुरी भी तैयार की जाती है। जीप टेक्सी आ चुकी थी। यहाँ से पहाड़ की चोटी तक का रास्ता बहुत ही सुंदर है। रास्ते की हरियाली भरे सुंदर मार्ग का अबलोकन करते रहे। काली मंदिर से ही खलिया टॉप का ट्रेकिंग रास्ता है, जहाँ से चारों ओर का विहंगम नजारा दर्शनीय रहता है, समय के अभाव के कारण इसे अगली यात्रा के लिए छोड़ आए।



काला मुनि टॉप के बाद पहाड़ी की दूसरी ओर खतरनाक उतराई भरा रास्ता तय किया। रास्ते में चुने की चट्टानों से होकर रास्ता गुजरा। राह में निर्मल जल से भरा झरता झरना राहगीरों को ताजगी का अहसास बाँट रहा था। घाटी की शोभा बढ़ाते पाजा के फूल से लदे पेड़ घाटी में स्वागत कर रहे थे। ये एकमात्र फूल से लदे पेड़ हैं जो सर्दी में भी खिलते हैं। संभवतः सर्दी में भी मधुमक्खियों के लिए यह प्रकृति की आहार व्यवस्था थी और इंसान के लिए शहद। फिर रतापानी से होते हुए आगे गिरगांव घाटी की घुमावदार यादगार रोमाँचक यात्रा। रास्ते में एक बहुत बड़ी झरना लुकाझिपी करता हुआ दर्शन देता रहा। आगे रामगंगा की निर्मल नीली जलधार आ चुकी थी, इसके किनारे होते हुए थल पहुँचे। थल में भोजन ब्रेक रहा। यहाँ मच्छी भात का चलन काफी दिखा। पास में ही पुल के नीचे तैरती मछलियाँ को देख समझ आ रहा था। आगे नदी के किनारे खेत, चढाई दार मोड, चीड के जंगलों को पार करते हुए हम मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। पहाड़ी गीतों की मधुर धुनें और दूर पीछे छूटती पंचाचूली की पर्वत श्रृंखलाएं सब यात्रा का आनन्द और विदाई के भाव दे रही थी। कुछ घंटों की यात्रा के बाद हम अल्मोड़ा के द्वार पर चित्तई पहुंच चुके थे। यहाँ गायत्री केंद्र में कुछ पल रुकने के बाद हम अल्मोड़ा की ओर चल दिए। 

अल्मोड़ा शहर की चढाई पार कर हम इसके दूसरी ओर थे, जहाँ से हमें सीधे रानीखेत के लिए मिनी बस मिल गई थी। अब बस रानीखेत की ओर बढ रही थी। रास्ते में सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहे थे। सूर्य की चमक से प्रकाशित नंदादेवी एवं त्रिशूल पर्वत श्रृंखला हमें दूर से ही पास आने का आमंत्रण दे रही थी। मार्ग में ही शोध छात्र का गाँव तो नहीं दिख रहा था, हाँ चोटी पर बसा मंदिर व घाटी के दर्शन हो रहे थे। शाम तेजी से ढल रही थी। हम रात को रानीखेत पहुँचे। 

सुबह यहाँ से सामने हिमश्रृंखला के दिव्य दर्शन हुए। फिर हम यहाँ से मिलट्री एरिया के नीचे से बर्फीली पर्वत श्रृंखलाओं का विहंगावलोकन करते रहे। शहर की ऊँचाई 6000 फीट से अधिक होने के कारण यह सेब के लिए आदर्श है, लेकि हमें कहीं सेब के बाग नहीं दिखे। पता चला की वे शहरे के बाहर सामने घाटी में हैं और रानीखेत के टॉप पर अंग्रेजों द्वारा स्थापित चौखटिया एप्पल गार्डन दर्शनीय है। अब तक की कुमाऊँ यात्रा का यह पहला सेब बगान हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था। सघन जंगल से होते हुए हम इसके छोर पर पहुँचे। देवदार, बांज, बुरांश से लदा यहां का जंगल यात्रा को मनोरम बना रहा था। बाहन अपने स्टॉप पर छोड़ आगे बढ़ा चला। यहाँ से आगे हमें पैदल चलना था। 

अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह सेब का बगीचा अब बागवानी विभाग द्वारा संभाला जा रहा है। यहाँ से दूर घाटी, सामने हिमाच्छादित पर्वत मालाओं का दृश्य देखते ही बन रहा था। प्रकृति के आगोश में यह सबसे रोमांचक पलों में एक पल था। प्रकृति के माध्यम से झरते परमेश्वर की झलक यहाँ हमने देखी। सेब की देशी विदेशी कई प्रकार की किस्में इस बगीचे में लगी हैं। अन्य फल की किस्में भी एक बोर्ड में आंकडों के साथ सजी हैं। यहीं का बुराँश, माल्टा, सेब का जूस बहुत अच्छा लगा। मन तो यहीं रुकने और गहराई में इसे एक्सप्लोअर करने का हो रहा था, लेकिन समय की सीमा इसकी इजाजत नहीं दे रही थी। सो हम बापिस चल पड़े।


बापसी में वाहन की बजाए हमने पैदल मार्ग पकडा, जिसके आगे के रोमाँच का हमें अंदाजा नहीं था। रास्ता एक दम निर्जन और सुनसान था। स्थानीय परिजनों से हमें पता चल चुका था कि इस जंगल में जंगली जानवरों के साथ भालू, टाइगर भी रहते हैं। जंगली जानवरों के शिकार की घटनाएं यदा-कदा होती रहती हैं, हालाँकि इंसान के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है। मार्ग में जगह-जगह मिट्टी खुदी मिली। ऐसी खुदाई तो भालू ही कर सकता है, जड़ी बूटी के रुप में भोजन की तलाश में अकसर वह जमीं खोदता है। अब हमारी हालत देखते ही बन रही थी। रास्ते में कहीं भी भालू का सामना हो सकता था। सो हाथ में एक बड़ा से लठ्ठा हम संभाल चुके थे, किसी औचक मुठभेड़ में भालू से निपटने की पूरी तैयारी के साथ। पूरे मार्ग की हम शूटिंग भी कर रहे थे। लगा जैसे बीयर ग्रिल का मैन वर्सिस वाइल्ड का लाइव टेलीकास्ट चल रहा हो।

लगा खुदा कह रहा हो, बहुत देख लिए टीवी का आभासी रोमाँच, आज हकीकत में उस अनुभव से गुजारते हैं। रास्ते में जब दो महिलाएं चढाई चढ़ती मिली तो थोडी राहत मिली। पता चला की भालू नहीं जंगली सुअर यहाँ ज्यादा सक्रिय हैं। सुनकर कुछ राहत मिली। थोडी ही देर में हम मानवी वस्ती के समीप थे, लोगों का आवागम दूर से दिख रहा था। कच्ची सड़के से हम पक्की सड़क तक पहुँचे और दूसरी ओर बस स्टेंड पास ही था। यहाँ से अपना बोरिया विस्तर गोल कर हम नैनीताल की ओर चल पड़े।

रानीखेत से नैनीताल का सफर - रानीखेत से हम भराड़ी तक की बस में बैठ कर नैनीताल की ओर बढ़े। मोड़दार सड़कों के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। सीढीदार खेतों के बीच कई सुंदर दृश्य राह में मिले। रास्ते में कैंची धाम से होकर गुजरे। नीम करौली बाबा की इस लीला भूमि को नमन किए। बस की नियत सारणी के कारण रुकने का सबाल ही नहीं था। इसी राह में आगे व्यवासायिक तौर पर कुछ फल सब्जी के प्रयोग दिखे, इससे आम किसान कितना लाभान्वित हो रहा है, यहा शोध का विषय था। इनको नजदीक से जानने देखने का समय नहीं था। संकरी घाटी को पार करते हुए हम नैनीताल की ओर बढ़ रहे थे।


बस भराड़ी में हमें उतार गयी। यहाँ से जीप में चढ़े। स्थानीय लोगों से यहां के बारे में चर्चा का मौका मिला। पता चला कि राजनैतिक अस्थिरता विकास न होने का एक बड़ा कारण है। दूसरा युवा पढ़ लिखकर आरामतलब नौकरी ज्यादा पसंद करते हैं, खेतों में मेहनत मश्कत करना चाहता है। फिर उत्पाद के लिए मार्केटिंग मंडी का भी कोई तंत्र नहीं है। शोध केंद्र हैं, लेकिन इनका काम कागजों में अधिक होता है, धरातल पर कम। और कुछ एनजीओ सक्रिय हैं, लेकिन इनकी पहुँच व्यापक नहीं है। कुल मिलाकर समझ आ रहा था कि यहाँ सरकारी, जनता और प्रशासन के स्तर पर साहसिक और ईमानदार पहल की जरुरत है, तभी कहीं यह ऊर्वर पर्वतीय आंचल विकास की धारा से जुड़ सकेगा और खाली होते गांव फिर आवाद हो सकेंगे। चर्चा करते पता ही नहीं चला कि हम नैनीताल पहुँच चुके थे। यह हमारी नैनीताल की दूसरी यात्रा थी। पहली बार बस स्टैंड से ही झील व शहर का विहंगावलोकन कर बापिस हो लिए थे। आज झील की पूरी परिक्रमा करने व शहर का फौरी अवलोकन का सुअवसार पास था।
  
 नैनीताल – झील के किनारे परिक्रमा में सबसे पहले यहाँ की मच्छलियों ने ध्यान आकर्षित किया। पर्यटक कुछ आटा गोली पानी में डाल रहे थे। झील से मछलियों के झुंड इन पर टूट रहे थे। आगे चट्टाने दिखी, जिन पर बैठने के आसन बने थे। नवरात्रि के दिन होने के कारण सहज ही हमें शैलपुत्री का ध्यान आया, और ये चट्टानें ईष्ट की खातिर ब्रज संकल्प की याद दिला रहे थे। झील के किनारे आगे बढ़ते हुए झील केदूसरे छौर पर नैना मंदिर पहुंचे।
भगवती के दर्शन की दीर्घकालीन इच्छा आज पूरी हुई।  शहर का नाम नैनामाता के नाम पर ही नैनीताल रखा गया है। यह नाम हमें शिव के तृतीय नेत्र से उद्भुत शक्ति का सुमरण करा रहा था। यह शहर सर्वधर्म सम्भाव का भी एक सुंदर नमूना है। यहाँ भव्य गुरुद्वारा, मस्जिद और चर्च भी आस पास ही मौजूद हैं। तिब्बतन मार्केट पर्यटकों को खरीददारी के लिए लुभाती रही थी। पुरानी मार्केट में भी कपड़े से लेकर मिठाई की दुकानें यात्रियों को जेव ढीला करने के लिए बाध्य कर रही थी। झील के बापसी मार्ग में कई नई दुकानें बहुत ही सुंदर लग रहीं थी। इन्हीं में से एक दुकान से हम उत्तराखण्ड की हिमालयन पर्वत श्रृंखलाओं का एक सुंदर पोस्टर खरीदे।


मुख्य मैदान में आज सांस्कृतिक महोत्सव चल रहा था। मुख्यमंत्री महोदय आज के विशिष्ट अतिथि थे। स्वभावतः ही आज भीड़ कुछ ज्यादा थी। नैनीताल का एक आकर्षण यहाँ झील के किनारे चिनार के पेड़ लगे। ये पेड़ काश्मीर की शोभा हैं। शिमला में महज इसके दो या तीन पेड़ हैं। लेकिन यहाँ इसकी पूरी कतार झील के किनारे दिखी, रंग-बिरंगी लडियों के साथ जो शहर की सुंदरता में चार चांद लगा रही थी। 

झील में झिलमिलाती इनकी रोशनी एक स्वर्गीय दृश्य पेश कर रही थी। कुछ देर हम इसे निहारते रहे, किसी दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति पाते रहे। हमारी आठ बजे रात की बस बुकिंग हो चुकी थी। सो झील की परिक्रमा पूरी करने के बाद हम बस में बैठ गए और रास्ते भर पिछले सफर की सुखद यादों की जुगाली करते रहे। हालाँकि सफर की थकान हावी हो रही थी, रास्ते में ही बस में नींद आ गई, पता ही नहीं सुबह कब हो गई सुबह तक हम अपने घर पहुँच चुके थे।

इस तरह कुमाउँ की यह पहली यात्रा कई मायने में ऐतिहासिक रही। यहाँ की प्रकृति, संस्कृति, यहाँ के गांव-शहर, लोक जीवन, यहाँ की समस्याओं, चुनौतियों व संभावनाओं को जानने समझने का नजदीक से मौका मिला। अपनी चटांक भर बुद्धि से इन पर विचार करता रहा, कई बातें स्पष्ट हुई और कई प्रश्न अभी बाकि हैं, जिनपर अभी शोध अध्ययन बाकि है। इस दौरान साफ दिखा कि अपार संभावनाएं होते हुए इस देवभूमि को और वेहतर होना चाहिए था। जो प्रय़ास हो रहे हैं उन्हें और व्यापक, समग्र व तीव्र होना चाहिए सरकारी स्तर पर भी और लोक स्तर पर भी। जिससे की प्रदेश का स्वरुप अपने प्राकृतिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक वैभव के साथ प्रकट हो। पलायन कर रहे देवपुत्र अपनी मातृभूमि में ही रहने का सुकूनु अनुभव कर सकें। इसके निमित इस भूमि के कई विकास पुत्रों के नैष्ठिक प्रयास की जरुरत है, जो इसके कायाकल्प की साहसिक पहल कर सकें।

इस यात्रा के पूर्व भागों को आप नीचे दिए लिंक्स पर पढ़ सकते हैं -

 


गुरुवार, 28 मई 2015

मेरी पहली कुमाऊँ यात्रा-भाग 2



अल्मोड़ा से मुनस्यारी, मदकोट




दौलताघट से अल्मोड़ा की ओर दौलताघट से हम लोक्ल बस से होते हुए अल्मोड़ा की ओर चल दिए। हालांकि हम रानीखेत के विपरीत चल रहे थे, लेकिन मोड़ पर रानीखेत की ओर की हिमध्वल पर्वत श्रृंखलाएं घाटी के पार एक मनोरम
नजारा पेश कर रही थी।


कोसी नदी के किनारे, चीड़ के जंगलों के बीच हम कुछ ही मिनटों में अल्मोड़ा पहुँचे। यहाँ से जीप टेक्सी में मुनस्यारी के लिए चल पड़े। रास्ते में चित्तई के गोलू देवता और गायत्री शक्तिपीठ को प्रणाम करते हुए आगे बढ़े। गोलू देवता यहाँ के लोकप्रिय स्थानीय देवता हैं। आगे रास्ते में चीड़ के जंगल बहुतायत में मिले। हालांकि दृश्यावली सुंदर थी, लेकिन ये सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं थे। क्योंकि जितना अल्पज्ञान हमें है, उसके अनुसार, चीड़ के बन पहाडों में आग का प्रमुख कारण हैं। इनसे बिरोजा का लाभ जरुर मिलता है, लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से ये आदर्श नहीं हैं। फिर ये पानी का बहुत अवशोषण करते हैं। एक बिरोजा के लाभ के लिए पूरे पहाड़ों को चीड़ के जंगलों से पाटना कौन सी दूरदर्शिता का काम है, यह हमारी समझ से परे रहा। चीड़ के जंगलों के बीच सफर करते हुए इसके कर्णधारों के बौद्धिक दिवालिएपन पर तरस आता रहा और कुछ आक्रोश का भाव भी पनपता रहा। इनकी जगह बान, देवदार से युक्त अन्य मिश्रित बनों को यहाँ लगाया जा सकता था, जिससे यहाँ के सौंदर्य में चार चांद लगते, जल संरक्षण होता, मिट्टी पर पकड़ बनती, क्षेत्रीय लोगों के लिए चारा, इंधन के विकल्प मिलते और प्राँत के सर्वाँगीण विकास की एक नयी धारा बहती।
 

राह में घाटियों और कई पर्वतों के पार सुदूर पंचाचूली पर्वत श्रृंखला की झलक भी मिल चुकी थी, इन हिमध्वल श्रृंखलाओं में एक सुई की तरह तीखी चोटी, जो सबसे बड़ी भी थी, एक श्रद्धा मिश्रित रोमाँच का भाव जगा रही थी। रास्ते में मोड व पहाड़ियों के बीच इसके लुकाछिपी भरे दर्शन कुछ दूर तक होते रहे, जिसको निहार कर हम रोमाँचित होते रहे। लगा जब इतनी दूर से इतने शानदार दर्शन हो रहे हैं, पास से, मुनस्यारी पहुँचने पर कैसा नजारा दिखेगा। इसके दूरदर्शन के साथ नागाधिराज हिमालय से सहज ही ये प्रार्थना के भाव फूट रहे थे कि इस देवभूमि के लिए एक विकास पुरुष का इंतजार कब तक करना पड़ेगा, जो बिजनरी हो, जिसके पास यहाँ के बहुमुखी विकास की समग्र समझ हो और जो यहाँ के पलायन को रोक कर, विकास की नयी धारा बहा सके। हालाँकि कई विकास पुत्रों का भावभरा सहयोग इस देवभूमि के कायाकल्प के निमित अपेक्षित है।

जीप में पहाड़ी गीतों और हिंदी फिल्मी गीतों की धुन के साथ रास्ते का सफर खुशनुमा रहा। टेडे-मेढ़े रास्तों के साथ घाटियों की उतराई-चढाई का क्रम काफी एडवेंचर भरा लगा, जिसके लिए रफ-टफ तन-मन की जरुरत महसूस हुई। नाजुक यात्रियों के लिए यह सफर कष्टप्रद ही साबित होगा, ऐसा स्पष्ट था। इसी तरह हम नदी के किनारे किनारे थल नामक स्थान पर पहुँचे। यहाँ रामगंगा नदी की निर्मल जल की नीली धार को देख मन निर्मल हो गया। इतना साफ जल, ऐसा लग रहा था कि जैसे सीधे गलेशियर से निकलकर यह जल आ रहा हो। पानी इतना साफ था कि नीचे पत्थर स्पष्ट दिख रहे थे और इसमें तैरती मछलियां भी। किराए के बाहन की मजबूरी थी कि इस जल का पान करने और इसमें डूबकी के अरमान अधूरे ही रह गए।

इस नदी के किनारे सफर आगे बढ रहा था। रास्ते में ऊर्बर खेत मिले। लेकिन वही विडम्बना दिखने को मिली जिसकी चर्चा मैं कर चुका हूँ। आर्थिक स्वावलम्बन देने वाले फल सब्जी के व्यापक प्रयोग से यह उर्बर क्षेत्र बंचित दिखा।
रास्ते में ऊंचे-ऊँचे पहाड़ों के दर्शन शुरु हो चुके थे और घाटी संकरी होती जा रही थी। लग रहा था अब हम उच्चतर हिमालय की गोद में प्रवेश करने जा रहे हैं। रास्ते में ही शिवलिंग जैसे पर्वत शिखर के दर्शन हुए। इनकी गोद में ऊँचाई में बसे गाँव एक रूमानी भाव जगा रहे कि वहाँ का एकांतिक जीवन कितना शांति-सुकून भरा होता होगा। 

इस घाटी के मार्ग में भूस्खलन के कारण रामगंगा में एक झील बनी मिली। आगे बढ़ते हुए हम एक गिरगांव घाटी में प्रवेश कर चुके थे, जिसके पीछे ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिख रहे थे। पता चला की हमें इनको पार कर उस पार जाना है। घाटी के छोर पर टैक्सी अब मुड़कर मोढ़दार, घूमाबदार सड़क के संग ऊपर चढ़ रही थी। इस घाटी में एक नयी चीज ध्यान आकर्षित कर रही थी, वह थी फूलों से लदे पाजा के पेड़। पूरी घाटी इनसे गुलजार थी। गाँव में इनके गुलाबी पेड़ यहाँ की सुंदरता को चार चाँद लगा रहे थे। बागवान भाई से  पता चला कि ये चैरी की जंगली बेरायटी है। इस पर चैरी की कलम कर चैरी फल को उगाया जा सकता है। लेकिन इस क्षेत्र के लोगों को इस तरह की कोई जानकारी नहीं थी। यहाँ के कृषि एवं वागवानी शोध केंद्र से यह जानकारी क्यों नहीं पहुँच रही, यह आश्चर्य करने वाली बात थी। 

आगे हम पहाड़ी नाले को पार कर पहाड़ पर उपर चढ़ रहे थे। नीचे सीधी ढलान और गहरी खाई एक खत्तरनाक दृश्य थी। अगर गल्ती से गाड़ी एक भी इंच इधऱ ऊधऱ खिसकी तो क्या होगा, कल्पना भी रोंगटे खडे करने वाली थी। लेकिन यहाँ के पहाड़ी चालक बहुत ही कुशलता से हर मोड़, भूस्खलन से बिगड़ी ऊबड़ खाबड़ तंग सड़क को बडी कुशलता से पार कर रहे थे। इनको देख एक सबक मिल रहा था कि यदि ध्यान सारा रास्ते, लक्ष्य पर केंद्रित हो तो फिर भय को घुसने का प्रवेश द्वार ही न मिले। मार्ग से ध्यान हटाकर भय के ही चिंतन करने पर यह हम पर हावी हो जाता है और हम भय के वशीभूत हो जाते हैं।

अब हम उच्चतर हिमालय में पहुँच चुके थे। गगनचुम्बी देवदार के बृक्ष इसका आभास दे रहे थे। ऊँचाई बढ़ती जा रही थी। अब देवदार के वृक्ष भी बिरल हो रहे थे। रई तोस जैसी देवदार की कोनीफर वृक्षों की प्रजातियाँ और इस ऊँचाई की स्वच्छ-विरल हवा एक नए प्रदेश में विचरण की दिव्य अनुभूति दे रही थी। इनके जंगलों के बीच यात्रा का सुखद अहसास वर्णनातीत है। साथ में पहाड़ी नालों व झरनों का शुद्ध निर्मल औऱ शीतल जल एक ताजगी का अहसास दे रहा था। यह क्षेत्र बहुत ही सुंदर है। आगे सब वृक्ष समाप्त हो चुके थे। केबल भोज वृक्ष शेष थे। यह यहाँ की ऊँचाई को दर्शा रहे थे। भोजपत्र के वृक्ष कोनीफर बनों के बाद ही उगते हैं। अब हम लगभग पहाड़ के शिखर पर थे। उसको पार करने वाला द्वार साफ दिख रहा था। यह लो अंतिम मोड़ और हम शिखर पर थे। दायीं और माँ काली का मंदिर था। कई बसें, बाहन खड़े थे।
हमारी जीप भी यहाँ रुकी। इस प्वाइंट पर काली मंदिर का तत्वदर्शन स्पष्ट हो चला। साक्षात मौत के दर्शन करते हुए सुरक्षित सफर के बाद महाकाली को धन्यवाद करने हम भी मंदिर में पहुंचे व माथा टेके। यहीं बाहर आंगन में बाबाजी के भी दर्शन हुए। 
  
यहाँ से उस पार पंचाचूली शिखर साफ दिख रहे थे और इतना पास, जिनका विहंगम दृश्य अवलोकनीय था। यहाँ कुछ यादगार फोटो भी लिए। ढाबे में गर्मागर्म चाय के साथ सर्दी का उपचार किया। शाम ढल रही थी। ढलती शाम के साथ हमारा सफर भी पूरा होने वाला था। अब मुनस्यारी शहर कुछ ही कि.मी. की दूरी पर था। उस पहाड़ के पार हमे जाना था। जीप देवदार के घने जंगलों के बीच उस पहाड़ को भी पार कर गयी। अब हम नीचे उतर रहे थे, घने जंगल के बीच। अब तक की सबसे सुंदर प्राकृतिक दृश्यावली के बीच सफर मंजिल की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में मिश्रित बनों से जड़ा जंगल इस क्षेत्र के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का सुखद अहसास दे रहा था।


यहाँ का बन विभाग काफी सक्रिय दिखा, क्योंकि देवदार के नये जंगल बीच में पनप रहे थे। जलस्रोत इतने समृद्ध थे कि निश्चित ही पानी की इस क्षेत्र में किसी तरह की समस्या नहीं दिखी। रास्ते में केंपिंग साइट्स भी मिले, जहाँ तम्बूओं के बीच एडवेंचर प्रेमी रुके हुए थे। बांस के जंगल यहाँ की सुंदरता में इजाफा कर रहे थे। बांज के घने जंगलों के साथ देवदार, मोहरू, बुराँश के पेड़ यहाँ की समृद्ध बन संपदा की झलक दे रहे थे। प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के लिए यहाँ का सफर पैसा बसूल सफल साबित हो रहा था।
सामने पंचाचूली पर्वतमाला, नीचे मुनस्यारी घाटी का विंहगम दृश्य उस पार पहाड़ों में बसे गाँव, सब एक आलौकिक सृष्टि का दर्शन करा रहे थे। लो हम घाटी के पहले मंदिर, गायत्री चेतना केंद्र के द्वार पर खड़े थे। शाम हो चुकी थी। और हम अपने गन्तव्य पर पहुँच चुके थे। कल मुनस्यारी को एक्सप्लोर करना था।


मुनस्यारी – यहाँ ठंड बहुत थी। हम ठंड में कुड़कुडा रहे थे। गर्म पेय के बाद कुछ राहत अवश्य मिली। रजाई में घुसकर किसी तरह खुद को गर्म करते रहे। ठंड के कारण रात को नींद खुल चुकी थी, सुबह के तीन बजे थे। बाहर बरामदे में आकर कुर्सी पर बैठ गए। अंधेरी रात में सामने पंचाचूली के दर्शन हो रहे थे। इनके सान्निध्य में जीवन के तत्वदर्शन पर विचार करते रहे। फिर विस्तर में घुस गए और सुबह पाँच बजे पर्वत श्रृंखला पर सूर्योदय का इंतजार करते रहे। धीरे-धीरे क्षितिज प्रकाशित हो रहे थे। पर्वत जैसे गहरी योग निद्रा से उठकर ध्यानस्थ हो अपना प्रकाशपूर्ण दर्शन दे रहे थे। दर्शन के बाद मोर्निंग वॉक के लिए पीछे सड़क पर आ गए। थोड़ी ही दूरी पर पहाड़ी नाला दनदना कर बह रहा था। इसमें निर्मल जल की छलछलाती तेज धार पहाड़ों में ऊपर जमी बर्फ की समृद्ध जलराशि का संकेत दे रही थी। फिर रास्ते के मिश्रित बन भी इसके जल स्रोत को पुष्ट कर रहे थे।

कुछ पहाड़ी गाँव सूर्य की रोशनी में जगमगा रहे थे। पहाड़ों मे सामने की घाटी में बने सीसे की खिड़कियों का जगमगाना हमें बचपन से ही अविभूत करता रहा है, ऐसा ही दृश्य यहाँ भी दिखा। पूरी मुनस्यारी शहर और घाटी धीरे धीरे जाग रही थी। घरों से उठता धुँआ इसका संदेश दे रहा था। सुबह के गर्म स्नान के बाद चाय नाश्ता के बाद हम अगली मंजिल की ओर चल पड़े, जो यहाँ से 20 की.मी. दूरी पर स्थित गर्मपानी का स्रोत मदकोट था। 


जीप में स्थानीय यात्रियों के साथ यात्रा आगे बढ़ती है। कर्णप्रिय गीत सफर को खुशनुमा बना रहे थे। यहाँ भी आगे मुनस्यारी घाटी के विहंगम दर्शन मिले। यहाँ भी वेमौसमी फूलों से लदे पाजा के वृक्ष आकर्षण का केंद्र थे। पता चला की यहाँ लोग इसे बहुत पवित्र फूल मानते हैं और मंदिर में चढाते हैं। यहाँ भी इस पर  चैरी फल लगाने की जानकारी का अभाव दिखा। स्थानीय लोगों से पता चला की आगे पहाडों के बीच संकरी घाटी को पार करते हुए जौहार घाटी आती है, जो कि तिब्बत के साथ व्यापार का एक ऐतिहासिक केंद्र रहा है। यहाँ का मिलम ग्लेशियर भी प्रसिद्द है, जो पर्वतारोही व ट्रैकिंग प्रेमियों को आकर्षित करता रहता है। इसी ग्लेशियर से निसृत गौरी गंगा के किनारे मुनस्यारी शहर वसा है। यहाँ मूलतः भोटिया लोग निवास करते हैं, नंदा देवी इनकी ईष्ट आराध्य हैं। 7200 फीट की ऊँचाई पर वसा मुनस्यारी आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। सामने की गगनचुम्बी पंचचूली पर्वतश्रृंखलाएं, वाईं ओर नंदा देवी और त्रिशूल पर्वत, दाईं और अन्य पर्वत यहाँ के नजारे को चिताकर्षक और सुकूनदायी बनाते हैं। लोकमान्यता है कि पाँचों पाण्डव स्वर्गारोहण इसी स्थान से किए थे, इन्हीं के प्रतीक बिम्ब के रुप में पंचचुली शिखर आज भी विराजमान हैं।
मुनस्यारी के पार घाटी में कई पहाड़ी गांंव दिखाई देते हैं। यहाँ तक यातायात के कोई साधन नहीं हैं। पैदल ही पहाड़ों की चढाई करनी पड़ती है। जीप में सामने पहाड़ों पर बसे गाँव का एक युवक भी बैठा था। बातचीत करने पर पता चला की वह यहीं इंटर पढ़ रहा है। डेली अपडाउन करता है। इनका मोबाईल इंटरनेट सुबिधा से लैंस था। देखकर अहसास हो रहा था कि इस क्षेत्र में तकनीकी विकास गाँव तक पहुँच चुका है। लेकिन विकास की समग्र धारा से अभी यह क्षेत्र वंचित है, क्योंकि पढ़ा लिखा युवा नौकरी की तलाश में मैदानों या शहरों की ओर कूच कर रहा है। बाहर स्थापित लोग फिर बापिस गाँव की ओर मुड़ने को तैयार नहीं हैं। इस पर्वतीय क्षेत्र को विकास की पटड़ी पर लाने के लिए अभी कितना कुछ किया जाना शेष, यह समझ आ रहा था।
मार्ग में जीप अब मुड़ चुकी थी, हम गौरीगंगा नदी के किनारे आगे बढ़ रहे थे पिथौड़ागढ़ की ओर जिसकी राह पर मदकोट आता है। गलेशियर से निकला इसका निर्मल जल मन को ताजगी का अहसास दे रहा था। रास्ते में इसके रौद्र रुप के भी दर्शन हुए। पता चला की पिछली बरसात में यह कई कि.मी. मालटा के बगीचे के साथ पूरी बस्ती को यह उखाड़कर बहा ले गई थी। इसकी तबाही के निशान अभी ताजा थे। अभी नया रास्ता बन ही रहा था। रास्ते में सफेद चुना की खदाने मिली। कुछ ही देर में पुल पार करते ही हम मदकोट कस्बे में थे। पहाहियों के बीच बसा यह पहाड़ी कस्वा जनजीवन से सक्रिय दिखा। हर तरह की आधुनिक सुविधाएं यहाँ पहुंच चुकी हैं। स्थानीय इंटरकॉलेज के प्रिंसिपल महोदय से भेंट हुई तो पता चला की इस क्षेत्र में भी अभी पहाड़ी संस्कृति की कई विकृतियाँ शेष हैं। देवता के नाम पर बलि प्रथा और फिर शराब का शगल यहाँ गहराईयों में घुसा है। परमार्थ कार्यों में लोगों की रुचि कम है। यहाँ के विकास में लोगों की जड़ता भी एक अहम् कारण प्रतीत हुई।

खैर हम यहाँ से मदकोट के गर्म जल स्रोत की ओर चल पडे। पुल पारकरते ही महज एक कि.मी. दूरी पर इसके दर्शन हुए। पुल से पंचाचुली की सबसे ऊँची चोटी के दर्शन हो रहे थे। स्थानीय परिजन से पता चला की यहाँ से होकर इस चोटी के तल तक जाने का रास्ता है, जो 2-3 दिन में पूरा हो जाता है। थोड़ी ही देर में हम गौरी गंगा के तट पर गर्म पानी के स्रोत पहुँच चुके थे। इसके दुधिया गर्म जल में स्नान का पूरा आनन्द लिए। साथ ही गौरी गंगा के हाड़ जमाने बाले हिमालय टच भरे जल में भी डूबकी लगाए। कुछ पल हिमालय पिता और माँ गौरी की गोद में ध्यानस्थ विताए और तरोताजा होकर बापिस मदकोट और फिर जीप से मुनस्यारी की ओर चल पड़े।
रात को चर्चा के दौरान पता चला की यहाँ कभी सेब के बगान हुआ करते थे और यहां जंगली भालू सेब खाने आया करते थे। इसी के चलते एक व्यक्ति की जान गई। तबसे यहाँ के लोगों ने सारे पेड़ ही काट डाले और फिर यहाँ सेब के फल या बगीचे नहीं दिखे। गायत्री चेतना केंद्र में सेब के पेड़ लगा कर एक पहल हुई है, जो कुछ ही वर्षों में इस क्षेत्र में सेब की समृद्ध संभावनाओं को साकार करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा सकता है।
रात हो चुकी थी। भोजन के बाद शयन के लिए चले गए और सुबह उठकर अगले पड़ाव की तैयारी करनी थी, जो था अल्मोड़ा से होते हुए रानीखेत की यात्रा। (जारी..भाग-3) 
यात्रा के अंतिम भाग को आप पढ़ सकते हैं, आगे दिए लिंक पर - मेरी पहली कुमाऊँ यात्रा, भाग-3, एडवेंचर भरी मस्ती का रोमाँच।

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