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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग 4

पितर : हमारे शुभचिन्तक सच्चे मार्गदर्शक

पितर आत्माएँ देव सत्ता का ही पर्याय कही जा सकती हैं। वे समय समय पर जीवित अवस्था की ही तरह सेवा सहायता कर अपना धर्म निबाहती रहती हैं। भले ही ऐसी परोक्ष सहायता को दैवी अनुदान नाम दे दिया जाय, पर एक तथ्य तो अटल है ही कि वे श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा सुपात्रों को ही मिलते हैं।

अनेक सिद्ध पुरुष अपने दूरस्थ शिष्यों को अपनी सूक्ष्म सत्ता से प्रत्यक्ष मदद पहुँचाते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी सन्त स्व० श्री आनन्द स्वामी के पुत्र लेखक-पत्रकार श्री रणवीर ने अपने संस्मरण-लेख में यह बताया था कि किसी प्रकार उनके पिता ने उन दिनों, जबकि वे जीवित थे और भारत में थे तथा रणवीर विदेश में प्रवास पर थे, एक बार भयानक खड्डे में गिर पड़ने से चेतावनी देकर उन्हें रोका था। अन्य कई अवसरों पर भी उनकी मदद व मार्गदर्शन का कार्य उनके पिता ने किया था। जबकि वे उस समय उनसे सैंकड़ों मील दूर हुआ करते थे।

विकसित आत्म सामर्थ्य के ये लाभ सिद्ध पुरुषों द्वारा आत्मीय जनों को अनायास ही पहुँचाए जाते रहते हैं। यही स्थिति पितरों की है। ऐसी शरीरी अशरीरी उच्च आत्माओं के प्रति श्रद्धा-भाव रखना उचित भी है और आवश्यक भी।

अधिक उच्चकोटि की पितर आत्माएँ तो जीवित महामानवों-महायोगियों की तरह ही उदात्त होती हैं। उनके लिए अपने-पराए जैसा कोई भेदभाव होता ही नहीं। जहाँ भी आवश्यकता एवं पात्रता दिखी, वहीं उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं। जरूरत उनके अनुकूल बनने, उत्कृष्ट जीवन और प्रगाढ़ श्रद्धा-भाव अपनाने से होती है।

मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है। परिपक्व मृत्यु होने पर चेतना कुछ समय के लिए विश्राम में चली जाती है। जिस प्रकार दिन भर का थका माँदा व्यक्ति प्रगाढ निद्रा में सो लेता है तो उसे फिर से नयी ताजगी मिल जाती है, उसी प्रखार मृत्यु के बाद जीवन की अवस्था के अनुरूप वह दो माह से दो वर्ष तक विश्राम ले लेने के फिर से नयी ताजगी मिल जाती है. उसी प्रकार मृत्यु के बाद जीव की पश्चात् नया जन्म धारण कर लेता है। पर कई बार नींद पूरी तरह नहीं आती। अफीमची और शराबी लोगों की नींद उखडी उखडी होती है। ऐसे लोगों को मृत्यु के समय भी पूरी नींद नहीं आती और वे नया जन्म लेने पर भी थके-थके से अस्त-व्यस्त होते है। जिन्हें नींद पूरी आ जाती है और जिनके मन शुद्ध और पवित्र होते हैं, वे अन्य जन्मों में बाल्यावस्था से ही पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ दोहराने लगते हैं।

जिनकी इन्द्रिय वासनाएँ प्रबल होती हैं या जिनकी मृत्यु हत्या या आत्महत्या जैसी होती है वे एक प्रकार से निचोड़े गये शहद की भाँति होते हैं। शहद का छत्ता काटकर रख दिया जाये तो उसका शहद अपने आप टपक आता है। वह नितान्त शुद्ध होता है पर निचोड़े जाने पर उसमें मोम आदि का अंश भी आ जाता है, उसी प्रकार ऐसी मृत्युओं में स्थूल अवयव भी बने रहते है। ऐसी ही आत्माएँ प्रेत, पिशाच, भूत, बैताल, किन्नर और यक्ष होते हैं। यह मरघट, अपने शवों तथा जिनके प्रति उनकी स्वाभाविक आसक्ति होती है, उनके पास घूमते आते जाते भी रहते हैं, पर जिनके शरीर में आग्नेय-अणु अधिक होते हैं, उनके पास इस तरह की गन्दी आत्मायें नहीं जा पाती हैं और जब नींद टूटती है तो वे अपनी आसक्ति के अनुरूप निम्न गामीयोनियों में चले जाते हैं।

विश्राम के बाद देव आत्मायें या जिनकी गति ऊर्ध्वमुखी-अच्छे कामों में रही होती है, जिनके शरीरों का आणविक विकास प्रकाश पूर्ण हो गया होता है, वे दिव्य लोगों को चली जाती हैं और जब तक वहाँ रहने की इच्छा होती है तब तक रहती हैं। पीछे इच्छानुसार अच्छे घरों में जन्म लेकर लोकसेवा पुण्य परमार्थ और नेतृत्व आदि उत्तरदायित्व सम्भालती हैं, पर जिनका मन अशुभ संस्कारों वाला रहा होता हैं, वे अधोगामी लोकों में रहकर निम्नगामी योनियों में चले जाते हैं। इस प्रकार संसार में गुण कर्म का यह प्रवाह, प्रकृति की जटिलता के समान स्वयं भी जटिल रूप में चलता रहता है।

पितर आत्माएँ वे हैं जिनकी ऊर्ध्वमुखी गति होती है। वे कई बार विश्राम की अवधि में कुछ लम्बे समय तक भी रही आती हैं। उस अवधि से वे स्वयं तो प्रकाशपूर्ण वातावरण में रहते ही हैं, दूसरे स्वजनों या जिनके प्रति उनके मन में आकर्षण होता है, उनको भी समय-समय पर प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन एवं अनुग्रह अनुदान देते रहते हैं।

पितरों की दैवी सहायता एवं ममत्व भरा मार्गदर्शन-

श्री लेडबीटर अपनी पुस्तक "इनविजिबल हेल्पर्स" में ऐसे अनेकों उदाहरण देते हैं, जिससे सावित होता है कि सत्संस्कार सम्पन्न पितर आत्माऐं भी आत्मीयों से सम्पर्क की इच्छुक रहती हैं। और सत्परामर्श एवं विवेकपूर्ण मार्गदर्शन देकर सच्चे सात्विक अनुराग का परिचय देती रहती हैं।

 थियोसाफी के जाने माने परोक्ष विद्या के अन्वेषणकर्त्ता सी० डब्ल्यू० लेडवीटर आजीवन मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधान में निरत रहे। अपने शोध ग्रंथों में उन्होंने लिखा है कि उच्चतर लोकों में क्रियाशील अशरीरी पितर-सत्ताएं सुपात्र लोगों को सहायता देने के लिए सदैव जागरुक रहती हैं। निर्दोष बच्चों तथा सज्जनवृत्ति के लोगों को संकट के समय में ये पितर-सत्ताएं आकस्मिक सहायता प्रदान करती हैं और विपत्तियों के पहाड़ के नीचे दबने पर भी बालबाँका नहीं होता। इस तरह पित्तरों की दैवीय सहायता एवं परोक्ष मार्गदर्शन सत्पात्रों को मिलता रहता है।

रविवार, 28 सितंबर 2014

दिल से चाह कर, दाम चुका कर तो देखो



ऐसा क्या जो तुम नहीं कर सकते

 
क्यों भिखारी बन भीख माँगते हो,

क्रीतदास बन हाथ पसारते हो,

जो चाहते हो उसे पहले दिल से चाह कर तो देखो,

फिर उसकी कीमत चुका कर तो देखो।1।


ऐसा क्या है, जो तुम नहीं कर सकते,

ऐसा क्या है जो तुम नहीं पा सकते,

दिल से चाहकर, दाम चुकाकर तो देखो,

आलस-प्रमाद, अकर्मण्यता की खुमारी को हटाकर तो देखो।2।



 
सारा जग है तुम्हारा, तुम इस जग के,

यदि पात्रता नहीं, तो विकसित करने में क्या बुराई,

कौन पूर्ण यहाँ, सभी की अपनी अधूरी सच्चाई,

हर कोई संघर्ष कर रहा, लड़ रहा अपनी लड़ाई।3।


शॉर्टकट भी जीवन में कई, कुछ बनने के, कुछ पाने के, 

लेकिन, बिना दाम चुकाए, बढ़प्पन कमाने में क्या संतोष, क्या अच्छाई,

मुफ्त में हासिल कर भी लिए, तो क्या मज़ा, 

शांति-सुकून बिना कितना खालीपन, अंजाम कितना दुःखदाई।4।



गुरुवार, 18 सितंबर 2014

परिवर्तन के साथ जीने की तैयारी

माना परिवर्तन नहीं पसंद जड़ मन को

 

माना परिवर्तन नहीं पसंद जड़ मन को,

ढर्रे पर चलने का यह आदी,

अपनी मूढ़ता में ही खोया डूबा यह,

चले चाल अपनी मनमानी।1।


लेकिन, जड़ता प्रतीक ठहराव का,

यह पशु जीवन की निशानी,

परिवर्तन नियम शाश्वत जीवन का,

चैतन्यता ही सफल जीवन की कहानी।2।


यदि परिवर्तन के संग सीख लिया चलना,

खुद को ढालना, बदलना, कदमताल करना,

तो समझो, बन चले कलाकार जीवन के,

जीवन बन चला एक मधुर तराना।3।




सो परिवर्तन का सामना करने में होशियारी,

इसकी हवा, नज़ाकत को पढ़ने में समझदारी,

तपन सुनिश्चित इसकी कष्टकारी,

लेकिन यही तो जीवन के रोमाँच की तैयारी।4।


परिवर्तन के लिए नहीं अगर कोई तैयार,

अपनी मूढ़ता की आँधी पर सवार,

तो मूर्ति को गढ़ता छैनी का हर प्रहार,

बन जाए जीवन का वरदान भी अभिशाप।5।


ऐसे में दे कोई मासूमियत की दुहाई

कालचक्र ने कब किसकी सुनी है सफाई,

राजा को रंक बना कर, कितनों को है धूल चटाई।

समझ कर तेवर इसके, बदलने, सुधरने में है भलाई।6।


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