पितर : हमारे शुभचिन्तक सच्चे मार्गदर्शक
पितर आत्माएँ देव सत्ता का ही पर्याय कही जा सकती हैं। वे समय समय पर जीवित अवस्था की ही तरह सेवा सहायता कर अपना धर्म निबाहती रहती हैं। भले ही ऐसी परोक्ष सहायता को दैवी अनुदान नाम दे दिया जाय, पर एक तथ्य तो अटल है ही कि वे श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा सुपात्रों को ही मिलते हैं।
अनेक सिद्ध पुरुष अपने दूरस्थ शिष्यों को अपनी सूक्ष्म सत्ता से प्रत्यक्ष
मदद पहुँचाते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी सन्त स्व० श्री आनन्द स्वामी के पुत्र लेखक-पत्रकार
श्री रणवीर ने अपने
संस्मरण-लेख में यह बताया था कि किसी प्रकार उनके पिता ने उन दिनों, जबकि वे जीवित थे और भारत में थे तथा
रणवीर विदेश में प्रवास पर थे, एक बार भयानक खड्डे में गिर पड़ने से चेतावनी देकर उन्हें रोका था। अन्य कई
अवसरों पर भी उनकी मदद व मार्गदर्शन का कार्य उनके पिता ने किया था। जबकि वे उस
समय उनसे सैंकड़ों मील दूर हुआ करते थे।
विकसित आत्म सामर्थ्य के ये लाभ सिद्ध पुरुषों द्वारा आत्मीय जनों को अनायास ही पहुँचाए जाते रहते हैं। यही स्थिति पितरों की है। ऐसी शरीरी अशरीरी उच्च आत्माओं के प्रति श्रद्धा-भाव रखना उचित भी है और आवश्यक भी।
अधिक उच्चकोटि की पितर आत्माएँ तो जीवित महामानवों-महायोगियों की तरह ही
उदात्त होती हैं। उनके लिए अपने-पराए जैसा कोई भेदभाव होता ही नहीं। जहाँ भी
आवश्यकता एवं पात्रता दिखी, वहीं उनके
अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं। जरूरत उनके अनुकूल बनने, उत्कृष्ट
जीवन और प्रगाढ़ श्रद्धा-भाव अपनाने से होती है।
मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है। परिपक्व मृत्यु होने पर चेतना कुछ समय के लिए विश्राम में चली जाती है। जिस प्रकार दिन भर का थका माँदा व्यक्ति प्रगाढ निद्रा में सो लेता है तो उसे फिर से नयी ताजगी मिल जाती है, उसी प्रखार मृत्यु के बाद जीवन की अवस्था के अनुरूप वह दो माह से दो वर्ष तक विश्राम ले लेने के फिर से नयी ताजगी मिल जाती है. उसी प्रकार मृत्यु के बाद जीव की पश्चात् नया जन्म धारण कर लेता है। पर कई बार नींद पूरी तरह नहीं आती। अफीमची और शराबी लोगों की नींद उखडी उखडी होती है। ऐसे लोगों को मृत्यु के समय भी पूरी नींद नहीं आती और वे नया जन्म लेने पर भी थके-थके से अस्त-व्यस्त होते है। जिन्हें नींद पूरी आ जाती है और जिनके मन शुद्ध और पवित्र होते हैं, वे अन्य जन्मों में बाल्यावस्था से ही पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ दोहराने लगते हैं।
जिनकी इन्द्रिय वासनाएँ प्रबल होती हैं या जिनकी मृत्यु हत्या या आत्महत्या
जैसी होती है वे एक प्रकार से निचोड़े गये शहद की भाँति होते हैं। शहद का छत्ता
काटकर रख दिया जाये तो उसका शहद अपने आप टपक आता है। वह नितान्त शुद्ध होता है पर
निचोड़े जाने पर उसमें मोम आदि का अंश भी आ जाता है, उसी प्रकार ऐसी मृत्युओं में स्थूल
अवयव भी बने रहते है। ऐसी ही आत्माएँ प्रेत, पिशाच, भूत, बैताल, किन्नर और यक्ष होते हैं। यह मरघट,
अपने शवों तथा जिनके प्रति उनकी स्वाभाविक आसक्ति होती है, उनके पास घूमते आते जाते भी रहते हैं, पर जिनके शरीर में आग्नेय-अणु अधिक
होते हैं, उनके पास इस तरह की गन्दी आत्मायें नहीं जा पाती हैं और जब नींद टूटती
है तो वे अपनी आसक्ति के अनुरूप निम्न गामीयोनियों में चले जाते हैं।
विश्राम के बाद देव आत्मायें या जिनकी गति ऊर्ध्वमुखी-अच्छे कामों में रही होती है, जिनके शरीरों का आणविक विकास प्रकाश पूर्ण हो गया होता है, वे दिव्य लोगों को चली जाती हैं और जब तक वहाँ रहने की इच्छा होती है तब तक रहती हैं। पीछे इच्छानुसार अच्छे घरों में जन्म लेकर लोकसेवा पुण्य परमार्थ और नेतृत्व आदि उत्तरदायित्व सम्भालती हैं, पर जिनका मन अशुभ संस्कारों वाला रहा होता हैं, वे अधोगामी लोकों में रहकर निम्नगामी योनियों में चले जाते हैं। इस प्रकार संसार में गुण कर्म का यह प्रवाह, प्रकृति की जटिलता के समान स्वयं भी जटिल रूप में चलता रहता है।
पितर आत्माएँ वे हैं जिनकी ऊर्ध्वमुखी गति होती है। वे कई बार विश्राम की अवधि में कुछ लम्बे समय तक भी रही आती हैं। उस अवधि से वे स्वयं तो प्रकाशपूर्ण वातावरण में रहते ही हैं, दूसरे स्वजनों या जिनके प्रति उनके मन में आकर्षण होता है, उनको भी समय-समय पर प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन एवं अनुग्रह अनुदान देते रहते हैं।
पितरों की दैवी सहायता एवं ममत्व भरा मार्गदर्शन-
श्री लेडबीटर अपनी पुस्तक "इनविजिबल हेल्पर्स" में ऐसे अनेकों
उदाहरण देते हैं, जिससे सावित होता है कि सत्संस्कार सम्पन्न पितर आत्माऐं भी
आत्मीयों से सम्पर्क की इच्छुक रहती हैं। और सत्परामर्श एवं विवेकपूर्ण मार्गदर्शन देकर सच्चे सात्विक अनुराग का
परिचय देती रहती हैं।





