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शनिवार, 29 नवंबर 2025

हिमालय कुछ कह रहा है...

 

2025 मौनसून के प्रकृति ताँडव में छिपे संकेत-संदेश


हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और अपनी विशिष्टताओं के कारण सभी का ध्यान आकर्षित करता है। इसका प्राकृतिक सौंदर्य, गगनचुम्बी हिमशिखर, ताल-सरोवर और हिमनदियाँ, सब इसे विशिष्ट बनाते हैं और सबसे अधिक महत्वपूर्ण है इनसे जुड़ा आध्यात्मिक भाव। जहाँ गंगाजी का पतितपावनी स्वरुप सभी हिमनदियों में पावनता का संचार करता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं, हिमालय के रुप में अपने स्वरुप की व्याख्या करते हैं। शिव-शक्ति से जुड़े तमाम शक्तिपीठ, सिद्धपीठ एवं तीर्थस्थल इसमें बसे हैं और सर्वोपर स्वयं शिव-शक्ति का निवास स्थान भी तो हिमालय ही है, तमाम ऋषि आज भी इसके दुर्गम क्षेत्रों में तप साधना कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि हिमालय अध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र है, जिसे देवात्मा हिमालय की संज्ञा दी गई है।

लेकिन हिमालय आज रुष्ट दिख रहा है, अपनी विप्लवी हलचलों के माध्यम से कुछ कह रहा है। पावनता के प्रतीक हिमालय के साथ अल्पबुद्धि नादान इंसान ने जो खिलवाड़ किया है व कर रहा है, वह दारुण है, क्षोभ उत्पन्न करता है, चिंता का विषय है। जिस तरह से इसकी तलहटियों, शिखरों, गर्भ व गोद में विकास के नाम पर बेतरतीव अनियोजित योजनाएं क्रियान्वित हुई हैं और हो रही हैं, उनमें से अधिकाँश किसी भी रुप में हिमालय की प्रकृति से मेल नहीं खाती, इसके प्रति न्यूनतम संवेदना से हीन कृत्य प्रतीत होती हैं, जिनमें व्यक्ति की अदूरदर्शिता, क्षुद्र लोभ, अहंकार एवं महत्वाकाँक्षाएं ही अधिक झलकती हैं।

वर्ष 2025 में जिस प्रकार का ताँड्व प्रकृति ने हिमालय के हिमाचल, उत्तराखण्ड और जम्मु-काश्मीर प्रांतों में किया है और इसके भयावह दुष्परिणाम इसकी तलहटी में बसे पंजाब, दिल्ली तक देखने को मिले हैं और जिसका विस्तार प्रयागराज से लेकर बनारस तक हुआ है, वह उपरोक्त धारणा को पुष्ट करता है और समय रहते हिमालय के संकेत को ह्दयंगम करने व आवश्यक सवक सीखने का संदेश दे रहा है। हिमालय अब तक पर्याप्त वार्निंग दे चुका है और ऐसा प्रतीत होता है कि अब सीधे कार्यवाही पर उतर गया है और यदि नहीं सुधरे तो इसके ओर विकराल लोमहर्षक दृश्यों को हम किश्तों में आगे भी देखने व झेलने के साक्षी व भुगतभोगी होंगे।

माना कि इन घटनाओं में ग्लोबल वार्मिंग, वैश्विक मौसम परिवर्तन आदि के कारण भी सक्रिय हैं, जिनमें प्रभावित लोगों का सीधा हाथ नहीं रहता, लेकिन इनके नाम पर हम अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते, अपनी बेवकुफ़ियों को नहीं ढक सकते, अपनी अदूरदर्शिता को बेदस्तूर जारी नहीं रख सकते, अपनी प्रकृति विरोधी योजनाओं को विकास का जामा नहीं पहना सकते। समय गहन आत्मचिंतन, समीक्षा और ठोस सुधार का है। प्रकृति व हिमालय के प्रति न्यूतम संवेदना के साथ व्यवहार समय की माँग है। नहीं तो भविष्य में ट्रेलर के आगे की विध्वंसक पिक्चर के लिए सभी को मिलजुलकर तैयार रहना होगा। कुपित प्रकृति के सामूहिक दण्ड विधान से कोई बच नहीं सकता।

इस प्राकृतिक आपदा में हताहत हुई सभी दिवंगत आत्माओं के प्रति पूरी संवेदना व्यक्त करते हुए, इनसे जुड़े परिजनों के प्रति हार्दिक सांत्वना का भाव रखते हुए, सभी निवासियों एवं परिजनों से भाव भरा निवेदन एक ही है कि प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलें। भारतीय चिंतन में प्रकृति को माँ का दर्जा दिया गया है, जो अपनी संतानों का आवश्यक पौषण, संवर्धन और संरक्षण करती है। इस माँ के प्रति अगाध कृतज्ञता का भाव रखते हुए तालमेल के साथ काम करें, उसकी कृपा पग-पग पर अनुभव होगी। और यदि हम इसे भोग्या मानकर उसका दोहन-शौषण करेंगे, उस पर अत्याचार जारी रखेंगे, अपने लोभ व मूढ़ता की अंधी दौड़ में मनमाना आचरण करते रहेंगे, तो फिर इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

गौर करें, वर्ष 2025 में हिमालय क्षेत्र में शिव-शक्ति से जुड़े तीर्थस्थलों के आसपास ही प्राकृतिक आपदाएं अधिक आई हैं। स्पष्ट संकेत है कि प्रकृति रुष्ट है, प्रकृति की अधिष्ठात्री माँ जगदम्बा रुष्ट हैं, प्रकृति के अधिपति भगवान शिव रुष्ट हैं और महाकाल-महाकाली अपना ताण्डव नर्तन करने के लिए विवश हैं। वे सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक विध्वंस करने के लिए वाध्य हैं।

जिस तरह से तीर्थ स्थलों को भोगलिप्त इंसान ने पिकनिक स्पॉट बना रखा है, तीर्थयात्रियों को लूटने का व्यापार केंद्र बना दिया है, वह किसी भी रुप में तीर्थ की गरिमा के अनुरुप नहीं है। और फिर बिना जीवन तो तपाए, सुधार किए, पात्रता का विकास किए, सस्ते में, मुफ्त में भगवान की कृपा के लिए भीड़ का हिस्सा बनकर तीर्थस्थलों में जमघट लगाना, सारा कचरा, गंदगी वहीं तीर्थ क्षेत्र में फैंकना समझदारी के कदम नहीं हैं। ऐसे तीर्थाटन की चिन्हपूजा के साथ भगवान की कृपा की आशा लगाना नादानी है, नासमझी है, जो जीवन के सुत्रों के प्रति न्यूनतम समझ का भी अभाव दर्शाती है। ईश्वर कृपा के लिए न्यूनतम पात्रता का अर्जन करना होता है, जो अंतर की ईमानदारी, जिम्मेदारी और समझदारी के अनुपात में होता है। गैरजिम्मेदार आचरण, बेईमानी, धूर्तता, चालाकी, होशियारी, अदूरदर्शिता, निष्ठुरता, निपट स्वार्थता, दर्प-दंभ-अहंकार से इसका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं।

फिर सीधे इन तीर्थ स्थलों के ह्दयक्षेत्र तक राह की प्रकृति को तहस-नहस करते हुए सड़क से लेकर रोपवे व रिजोर्टों का निर्माण कितना उचित है। प्रकृति की गोद में सुरम्य स्थल पर एकांतिक वातावरण में तीर्थस्थल की पावन स्थिति ही आदर्श रही है। वहाँ तक पहुँचने के लिए थोड़ा श्रम तो तप का हिस्सा माना जाता रहा है और जो अशक्त हैं, उनके लिए कंडी से लेकर तमाम सेवाएं उपलब्ध रहती हैं, जो स्थानीय लोगों के रोजगार का भी माध्यम बनते हैं।

वर्ष 2025 के प्रकृति ताँडव ने एक बात ओर स्पष्ट कर दी है कि नदियों व जल स्रोत्रों के साथ खिलवाड़ न किया जाए व इनको हल्के से लेने की भूल न की जाए। इनकी राह में वसावट बसाने, मकान-दुकान, होटल व रिजॉर्ट सजाने की कुचेष्टा न करें। यहाँ अंग्रेजों की तारीफ करनी पडेगी, जो अपने समय में जिस भी हिल स्टेशन में रहे, उनके द्वारा प्रकृति के साथ संयोजन में खड़ी की गई रचनाएं आज भी सुरक्षित-संरक्षित हैं, जबकि उनके जाने के बाद जिस तरह से हमने पहाड़ों की ढलानों पर जंगल का सफाया करते हुए वेतरतीव बहुमंजिला भवनों की कतार, कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं, वे हमारी सोच के दिवालिएपन को ही दर्शाते हैं, जिसके साथ हम जैसे अपने ही विनाश की पटकथा लिख बैठे हैं। यदि किसी भी मौनसून के सीजन में बारिश कुछ दिन ओर रहती है, तो होने वाले नुकसान का अनुमान लगाया जा सकता है। और भूकंप जोन में तो यह खामियाजा अकल्पनीय हो सकता है।

सार रुप में हिमालयी प्राँतों में विकास के कर्णधार नेताओं, अधिकारियों, इँजीनियरों और बुद्धिजीविओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अब सजग सचेत हो जाएं और आम इंसान भी जागरुक हो जाएं और विकास के नाम पर अपने अस्तित्व के लिए खतरा बनने वाली योजनाओं में समय रहते परिमार्जन करें, सुधार करें। नहीं तो आने वाला समय बहुत विकट, विप्लवी एवं विध्वंसक होने वाला है। थोड़ी सी समझदारी, थोड़ी सी ईमानदारी व प्रकृति के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता के आधार पर हम इस तरह की त्रास्दी के दुष्प्रभावों को एक सीमा तक नियंत्रित करते हुए अपने भविष्य को संरक्षित कर सकते हैं।

बुधवार, 31 अगस्त 2022

यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच

 बाबा शिव का बुलावा और मार्ग का रोमाँचक सफर


 दोपहर के भोजन के बाद मन कुछ बोअर सा व अलसाया सा लग रहा था। बोअर कुछ इस तरह से कि एडवांस स्टडीज का कोई सेमिनार या प्रेजेंटेशन आदि का बंधन आज के दिन नहीं था, क्योंकि यहाँ के प्रवास का काल लगभग पूरा हो चुका था, सामूहिक भ्रमण का कार्यक्रम भी सम्पन्न हो चुका था। (संस्मरण वर्ष
2013 मई माह का है)

एक माह के दौरान शिमला के कई स्थलों को मिलकर एक्सप्लोअर किया था, लेकिन शिमला में शिव के धाम की खोज शेष थी। कल सुबह ही विक्रम ने सफाई के दौरान सुबह बीज डाल दिया था कि तारा देवी शिखर के नीचे शिव का बहुत सुंदर व शांत मंदिर है। आज दोपहर के खाली मन में एडवेंचर का कीड़ा जाग चुका था कि आज वहीं हो लिया जाए। कोई साथ चलने को तैयार न था, सो यायावरी एवं तीर्थाटन की मनमाफिक परिस्थितियों सामने थीं। कमरे में आकर विश्राम का विकल्प भी साथ में था, लेकिन परिस्थिति एवं मनःस्थिति का मेल कुछ ऐसे हो रहा था कि लगा जैसे बाबा का बुलावा आ रहा है और मन की पाल को हवा मिल गई, कि चलो शिवालय हो आएं।

एडवांस्ड स्टडी शिमला का ऐतिहासिक भवन एवं भव्य परिसर
 

एडवांस स्टडीज के गेट के बाहर बालूगंज से बस भी मिल गई थी। सीधा शिमला के पुराना बस अड्डा उत्तरे। यह क्या, यहाँ तो एक ही बस खड़ी नहीं थी तारा देवी मंदिर के लिए। रास्ते में शोधी या तारा देवी स्टेशन पर उतरने का कोई ईरादा न था। कौन चलेगा दूसरी बस में। जाएंगे तो सीधा माता के द्वार पर उतरेंगे, फिर देखेंगे आगे की शिव मंदिर यात्रा।

लगभग एक घंटा बीत गया बस के आगे पीछे भागते, ड्राइवर व सवारियों से बस का पता-ठिकाना पूछते..। इसी बीच अपने बी.टेक. लुधियाना के सहपाठी अवस्थीजी की कोचिंग अकादमी - विद्यापीठ के दर्शन भी हो गए। फुर्सत में मिल लेंगे इनसे बाद में। लो बस आ गई, शोघी तक। चलो वहां तक ही सही, वापस आ जाएंगे, यदि वहाँ से सीधे तारा देवी मंदिर के लिए बस न मिली तो। कुछ ऐसा ही हुआ भी। शोघी से स्कूल बच्चों से भरी एक लोक्ल बस में बैठ गए, कुछ मिनट खड़े खड़े यात्रा करते हुए स्कूली बच्चों के साथ बस ने हमें राह में उत्तार दिया। लेकिन तारा देवी का प्रवेश गेट और रास्ता तो पीछे है 300 मीटर लगभग। सवा 2 किलोमीटर ऊपर है मंदिर अभी।

कुछ देर बस-टैक्सी आदि की उम्मीद में खड़े रहे, लेकिन जल्द ही ना उम्मीद होकर अपनी सबसे विश्वस्त 11 नंबर की गाड़ी से चल दिए। सड़क को छोड़कर शॉर्टकट पगडंडी का सहारा लिए। पत्थरों पर बज्री नुमा पत्थरों पर ऊपर चढ़ने से आज की यात्रा की कठिन शुरुआत हो चुकी थी। ऊपर मुख्य मार्ग पर कुछ टैक्सी अभी चल रही थी। लेकिन इन्हें एक अजनबी पथिक से क्या लेना देना। 

शिमला का वैली व्यू (प्रतिनिधि फोटो)
 

ऊपर देखता, मंदिर का भवन काफी ऊपर था। राह में धूप सीधे बरस रही थी, साथ ही ठंडी हवा भी, नीचे गांव सड़क घाटी का हरा-भरा विहंगम दृश्य सुहावना लग रहा था। प्यास भी लग रही थी। पानी की कोई व्यवस्था साथ नहीं थी, क्योंकि सोचा नहीं था कि ऐसी ट्रैकिंग की भी नौबत आएगी। यह आज मेरी कौन सी परीक्षा ली जा रही थी,  व यह कौन सी शक्ति मुझे इन सुनसान राहों पर ऊपर बड़ा रही थी। यह तो भगवान शिव ही जाने, जिनके द्वार तक हम संकल्पित हो कर चल पड़े थे। अभी तो सीधे ऊपर तारा देवी का मंदिर था।  

शॉर्टकट पगडंडी से ऊपर चढ़ा ही था कि बड़ी सी पानी की सीमेंट टंकी दिखी। आवाज आ रही थी अंदर से पाइप में पानी के निकासी की, लेकिन नल कहीं ना दिखा। खाली हाथ ऊपर बढ़ चला। रास्ते में यह क्या, नीचे आवाज आ रही थी जानी पहचानी हॉर्न की और छुक-छुक की भी। तो यहीं नीचे सुरंग से होकर रेल्वे ट्रैक आगे बढ़ता है। कुल मिलाकर सामने एक रोमांचक दृश्य था। शिमला-कालका ट्रैन पहाडियों के बीच लुका-छिपा करती हुई सुरंगों के आर पार हो रही थी।

हम भी अपनी मंजिल तारा देवी शिखर की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ से हमें शिव मंदिर के लिए दूसरी ओर नीचे उतरना था। सड़क पार कर चोड़ी पगडंडी मिली, लगा पक्की सड़क बनने से पहले तीर्थ यात्री इसी राह से सामान के साथ घोड़ा आदि के साथ जाते रहे होंगे। आज भी हो सकता है श्रद्धालु पर्व त्योहारों में इसी राह से चढ़ते उतरते होंगे। 

रास्ता चीड़ की सूखी पत्तियों से ढका था, कुछ-कुछ फिसलन भरा। लेकिन इनके साथ अपनी बचपन की विरल यादें अचेतन की अतल गहराईयों से उभर कर आज ताजा हो रहीं थी। भूंतर के आगे मणिकर्ण घाटी में शड़शाड़ी से पुलपार कर ओल्ड़ जाते समय ऐसे ही चीड़ पत्तियों से भरे रास्ते बचपन में देखे थे, बुआजी की बड़ी बेटी की शादी में शरीक होने गए थे। आज वो पुरानी यादें ताजा हो रहीं थीं।

एक ओर याद ताजा हो उठी। यह जंगली झाड़ियों में खट्टी-मिठी आँछ (बुश बैरी) को बीन कर खाने का अनुभव था। कुछ-कुछ पानी की कमी इनसे पूरी होती अनुभव कर रहा था। बीयर ग्रिल के मैन वर्सेज वाइल्ड का एक पात्र खुद को अनुभव कर रहा था। सच में निपट अकेला, बिना किसी तैयारी के भोलेनाथ शिव के दर्शनार्थ उनके धाम की खोज में। बीहड़ वन के सन्नाटे को चीरते हुए हम अकेले बड़ रहे थे।

अब रास्ता मुख्य मार्ग से अलग हो गया था। ऊपर दूर मोड़ दिख रहा था। बीच का सफर अपने गाँव के पीछे (बनोगी गांव के ऊपर और रेऊंश के नीचे का वन क्षेत्र) बीहड़ बनों में बचपन के बिताए रोमाँचक पलों को तरोताजा कर रहे थे। रास्ते भर खट्टी मिठी बुश बैरी की हरी भरी झाडियां जहाँ भी मिलती गईं, उनसे दो-चार दाने तोड़कर सेवन करता रहा।

मार्ग में लेबर काम करते मिले। अपना रोल्लर आगे-पीछे कर रहे थे। एक थके हैरान-परेशान लेकिन लक्ष्य केंद्रित तीर्थ यात्री को वे कौतुक भरी निगाहों से देख रहे थे। बात-चीत करने का न समय था और न ही मनःस्थिति। राह में उतरता हुआ एक यात्री दुआ-सलाम कर कुछ मन हल्का व आश्वस्त करता प्रतीत हुआ। इस निर्जन राह में एक आस्थावान श्रद्धालु के दर्शन व उसका आत्मीय स्पर्श  निःसंदेह रुप में सकूनदायी लगे।

शिमला के ट्रेकिंग ट्रैल्ज - (प्रतिनिधि फोटो)

इनको पार कर आधे से अधिक मार्ग, लगभग डेढ़ किमी तय हो चुका था। आगे मुख्य मार्ग से पत्थर की सीढ़ियाँ और कछ घने वन से होकर रास्ता पार किया। मुख्य मार्ग पर आते ही – लो यह क्या। ऊपर माँ का मंदिर दिख रहा था, सहज विश्वास न हुआ कि पहुँच गए। अब एक मोड़ और बस...। कुछ पल बैठ दम भरा। प्यास लगी थी, लेकिन पानी न था। फिर आगे बढ़ चले। यह क्या मोड़ पर शिव मंदिर का बोर्ड लगा था। क्यों न सीधे इस मार्ग से बढ़ चलें, पहले शिव बाबा के दर्शन कर लें, वहीं तो आज की मूल मंजिल थी, फिर देखेंगे ऊपर माता का द्वार, जहाँ पिछले दो रविवार आ चुके थे वहाँ। तब शिवमंदिर का बोर्ड पढकर उतरने की इच्छा जगी थी, लेकिन साथी लोग तैयार नहीं थे। लगा, जो होता है, अच्छा ही होता है।

अब हम पगडंडी पर बढ़ चल रहे थे, जो बहुत ही संकरी थी। बाँज के पत्तों से भरी, फिसलन भरी थी। एक कदम दाएं कि सीधे नीचे गए गहरी घाटी में। हालाँकि बांज के घने पतले वृक्ष बीच में रोक सकते हैं, लेकिन चोट तो काफी गंभीर लग सकती है ऐसे में...। हम एकाकी आगे बढ़ रहे थे, पीछे ऊपर माता का मंदिर दिख रहा था। शनै-शनै हम जितना नीचे उतरते गए, मंदिर पीछे छूटता गया और अब दृष्टि से औझल हो चुका था व आगे जंगल और घना होता जा रहा था। बढ़ते बढ़ते दूर कुछ हलचल दिखी, बंदर कूद रहे होंगे, नहीं ये तो गाय जैसा पशु लगा। पास में वन विभाग का बोर्ड भी दिखा। यहाँ जंगल में लोगों के छोड़े हुए मवेशी चर रहे थे।

बीच राह में किसी तरह के अप्रत्याशित खतरे या हमले से निपटने के लिए एक हाथ में नुकीला पत्थर और दूसरे हाथ में एक ठूंठ का डंड़ा हम थाम चुके थे। (जारी....शेष भाग-2 व अंतिम किस्त अगली पोस्ट में - यात्रा डायरी - शिमला के बीहड़ वनों में एकाकी सफर का रोमांच, भाग-2)  

तारा देवी हिल्ज के बीहड़ बन और बांजवनों के मध्य शिवमंदिर

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

देवसंस्कृति की गौरवमयी पावन धारा - गंगा मैया

 गंगा की पावनता को बनाए रखने की चुनौती

जब से होश संभाला घर के बुजुर्गों से गंगाजल का परिचय मिला। घर में एक सीलबंद लोटे में गंगाजल रहता, किन्हीं विशेष अवसरों पर इसका छिड़काव शुद्धि के लिए किया जाता। हमें याद है कि हमारे नानाजी इस गंगाजल के लोटे को हरिद्वार से लाए थे। जब भी घर-गाँव में कोई दिवंगत होता तो हरिद्वार में अस्थि-विसर्जन एवं तर्पण का संस्कार होता। कई दिनों की बस और ट्रेन यात्रा के बाद हरिद्वार से यह पवित्र जल घर पहुँचता।

नहीं मालूम था कि धर्मनगरी हरिद्वार ही आगे चलकर हमारी कर्मस्थली बनने वाली है। हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र में एक आश्रम के शोध संस्थान में कार्य करने का संयोग बना। यहाँ गंगाजी के किनारे सुबह-शाम भ्रमण का मौका मिलता। गंगाकिनारे बने घाटों पर कितनी शामें बीतीं, खासकर जब परेशान होते, इसके तट पर बैठ जाते, विक्षुब्ध मन शांत हो जाता। गंगाजी के तट पर, इसके जल प्रवाह में कुछ तो बात है, इसे गहराई से अनुभव करते।

सूक्ष्मदर्शी विज्ञजनों के श्रीमुख से सुनकर हमारी धारणा ओर बलवती हुई कि गंगाजल कोई सामान्य जल नहीं है। कितने तपस्वी, ऋषियों के तप तेज का दिव्य अंश इसमें मिला है, जो आज भी प्रवाहमान है। यह औषधीय गुणों से भरपूर दिव्य जल है। जब शास्त्रों को पढ़ा, तो महापुरुषों के वचनों में भी इसको पुष्ट होते पाया। आदि शंकराचार्यजी ने इसे ब्रह्मदव्य की संज्ञा दी। पौराणिक किवदंयितों के अनुसार ये ब्रह्माजी के कमंडल से प्रकट, विष्णुजी के चरणनख से निस्सृत और शिव की जटाओं से होकर धरती पर अवतरित दैवीय प्रवाह है। धरती पर मानव मात्र के कल्याण-त्राण के लिए भगीरथी तप ने इसे आगे बढ़ाया।

गंगाजी में डुबकी लगाते ही बर्फ की ठंडक लिए इसका शीतल जल हमें सीधे हिमालय से जोड़ता। भाव स्मरण होता कि कैसे यह जल हिमालय के तीर्थों को समेटे हुए हम तक पहुंच रहा है। हर डुबकी के साथ यह सिमरन हमें गंगाजी के उद्गम स्थल की ओर सोचने के लिए प्रेरित करता। और इस सुमरन के सम्मिलित भाव का फल कहेंगे, जो कालांतर में हमें हिमालय की गोद में तीर्थाटन के सुअबसर मिले। देवप्रयाग, केदारनाथ, तुंगनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब जैसे तीर्थ स्थलों की यात्राएं सम्पन्न हुईं और गंगाजी की धाराओं का इसके शुरुआती पड़ाव में अवलोकन का अबसर मिला। केदारनाथ में उस पार धौलीगंगा के ध्वल निर्मल जल को पहाडों से छलछलाते हुए नीचे गिरते देखकर चित्त आल्हादित हो जाता, लेकिन उसके पास जाकर किनारे पर इंसान को अपनी गंदगी से इसे अपवित्र करते देख कष्ट हुआ। लगा, इंसान में जलस्रोत्रों के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता का अभाव कितना बड़ा संकट है। शायद हमारे विचार में गंगाजी व अन्य किसी भी नदी में प्रदूषण का यही मुख्य कारण है।

हिमालय में गंगाजी की धाराएं अपने शुद्धतम रुप में प्रवाहित होती हैं, प्रायः आसमानी नीलवर्ण लिए, हालाँकि बीच-बीच में रंग मटमैला हो जाता है और वरसात में इसका स्वरुप एकदम बदल जाता है, जो स्वाभिवक भी है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी के संगम पर गंगाजी का पूर्ण स्वरुप प्रकट होता है। एक ओर से भगीरथी की नीलवर्णी धारा तो दूसरी ओर से अलकनंदा का कुछ मटमैला सा प्रवाह। संगम दृश्य दर्शनीय है। यहाँ गंगाजी को अपने भव्यतम निर्मल रुप में पाया और यहाँ के दिव्य संगम पर लगाई डुबकी हमारे चिरस्मरणीय पलों में शुमार है।

यहां से आगे फिर गंगाजी का प्रवाह शांत व गंभीर होता जाता है, ऋषिकेश तक आते-आते जैसे यह अपनी प्रौढ़ावस्था को पा जाती है। रास्ते में ही एडवेंचर स्पोर्ट्स के नाम पर राफ्टिंग क्लबों की भरमार के साथ मानवीय हस्तक्षेप की कहानी शुरु हो जाती है। इसके तटों पर पर्यटकों का रवैया गंगाजी के प्रति कितना संवेदनशील रहता है, यह शोध की विषय वस्तु है। हालांकि ऋषिकेश में लक्ष्मणझूला एवं रामझूला में गंगाजी पर्याप्त शुद्ध पायी गयी है, जो हरिद्वार तक बहुत कुछ बैसी ही रहती है। लेकिन राह में शहरों के अवशिष्ट पदार्थों के इसमें मिलते जाने से इसकी शुद्धता का प्रभावित होना शुरु हो जाता है।

गंगाजल की विलक्षणता की चर्चा जब विदेश तक पहुँची थी तो इसके जल का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ। इन परीक्षणों के आधार पर पाया गया था कि इसमें कुछ ऐसे तत्व हैं, जो इसे विशिष्ट बनाते हैं। इसमें जबर्दस्त कीटाणुनिरोधक क्षमता है, जिसके कारण इसका जल कितने ही वर्षों तक ताजा रहता है। समझ में आता है कि हिमालय की औषधियों से लेकर खनिज तत्वों का सत्व इसमें मिलकर इन औषधीय गुणों से युक्त बनाता होगा।

अपनी इन आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक विशेषताओं के साथ गंगाजी देश की सांस्कृतिक जीवन रेखा हैं। देश-विदेश के किसी भी कौने में रह रहा भारतवासी गंगाजी से जुड़ाव अनुभव करता है। और फिर एक बड़ी आवादी का तो सीधा गंगाजी के किनारे ही अस्तित्व टिका है। हिमालय में गोमुख से गंगासागर पर्यन्त 2525 किमी के सफर में गंगाजी के तट पर देश की 43 फीसदी आवादी पलती है। फिर ऋषिकेश, हरिद्वारसे लेकर प्रयागराज, बनारस एवं कोलकत्ता तक कितने नगर-महानगर इसके तट पर बसे हैं, जो न जाने कबसे देश की समृद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत संजोए हुए हैं। इन दिनों प्रयागराज में चल रहे विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समारोह कुंभ-2019 में इस सांस्कृतिक प्रवाह की झलक-झांकी को भली भांती देखा जा सकता है, जिसका दीदार करने के लिए विदेशों से तक सैंकड़ों शोधार्थी, पर्यटक एवं जिज्ञासु आए हुए हैं। हरिद्वार में भी कुंभ के ऐसे ही दो वृहद आयोजनों के हम साक्षी रहे हैं, जिसका विस्तार हरिद्वार से लेकर ऋषिकेश पर्यन्त था।

हमारा अनुभव हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र का विशेष रहा, क्योंकि यहीं अपने पिछले अढाई दशक गंगाजी के किनारे बीते। मान्यता है कि भगीरथ के आवाह्न पर जब हिमालय से उतर कर गंगाजी मैदानों में आती हैं, तो हरिद्वार के इस क्षेत्र में सत्पऋषि तप कर रहे थे। उनको कोई असुविधा न हो, गंगाजी सात भागों में विभक्त हो गयी। आज भी यहाँ के सात मंजिले भारतमाता मंदिर में चढ़कर देखें तो 4-5 धाराएं तो आज भी दिखती हैं। बीच में बाँध बनने के कारण बाकि धाराएं बिलुप्त हो गयी हैं, नहीं तो पहाड़ी के नीचे दायीं ओर उस छोर तक गंगाजी का प्रवाह था, जिसके बीच में आज गायत्री तीर्थ शांतिकुज बना हुआ है। वहाँ खोदने पर बालु और गोल-गोल पत्थर के साथ जल की प्रचुरता इसकी मौजूदगी के सबूत पेश करते हैं। मान्यता है कि यहाँ कभी गायत्री महामंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र की तपःस्थली थी। खैर सप्तसरोवर क्षेत्र में गंगाजी को साल भर निहारने का मौका मिलता रहा।

गंगाजी की मुख्य धारा का एक बड़ा अंश ऋषिकेश वैराज से चीला डैम (लघु विद्युत योजना) की ओर नीलधारा नहर के रुप में बहता है और शेष गंगाजल रायवाला सप्तसरोवर से होकर आगे नीलधारा से घाट नम्बर 10 पर मिलता है। इस तरह सप्तसरोवर की धारा में देहरादून से आ रही सोंग नदी का जल भी मिला होता है। लेकिन जो भी हो गंगाजी का जल सालभर के अधिकाँश समय हिमालयन टच लिए रहता है। जब यह फील नहीं आता तो हम आगे दस नम्बर घाट या इससे आगे एक नम्बर घाट तक जाते, जहाँ गंगाजी को समग्र रुपमें पाते। यहीं से एक धारा खड़खड़ी शमशान से होते हुए हरकी पौड़ी की ओर प्रवाहित होती है।

हमारे जितने भी मित्र हैं, अतिथि प्रवक्ता या बाहरी मेहमान, हम गंगाजी के इस घाट पर एक वार अवश्य स्नान कराते हैं। हरिद्वार के फक्कड़ जीवन में हमारे पास गंगाजी के अलावा ओर है भी क्या। गंगाजी का हिमालयन टच ही हमारा एक गिफ्ट रहता है, जो शायद दिल्ली या दूसरे शहरों से आए मित्रों के लिए एक दुर्लभ चीज रहती है। और ग्रुप में गंगाजी के किनारे दर्जनों नहीं अनगिन पिकनिकों की यादें ताजा है। कुछ तो देसंविवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी के साथ, कुछ विभाग के शिक्षकों के साथ, कुछ यार दोस्तों के साथ, कुछ परिवारजनों के साथ और कुछ निपट अकेले।

गंगाजी के उस पार धाराओं के बीच बसे टापूओं में कितने बाबाओं को कुटिया बना कर एकांत वास करते देखा। कुछ को तो वृक्षों पर मचान बनाकर रहते देखा। हालाँकि अब राजाजी नेशनल पार्क में इनको रुकने की मनाही है, लेकिन इनके अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। ब्रह्मवर्चस आरण्यक की स्थापना भी कुछ ऐसे ही उद्देश्य के साथ हुई थी। आचार्यश्री का मानना था कि नांव से गंगाजी को पार कर साधक टापू में दिन भर साधना करेंगे और फिर शाम को नाव से ही बापस अपने कक्ष में आएंगे। हालाँकि यह बात योजना बनकर ही रह गई। लेकिन गंगा की गोद व हिमालय की छाया में साधना का अपना महत्व तो है ही।

इन टापूओं में जंगली बेर फल की पर्याप्त झाडियाँ हैं, साथ ही जंगली बेल के वृक्ष भी, जिनका सीजन में पकने पर लुत्फ उठाया जा सकता है। सेमल के वृहद पेड़ तट पर फैले हैं, जो वसंत में फूलने पर सुर्ख लाल रंगत लिए टापुओं व गंगा तट की शोभा में चार चाँद लगा रहे होते हैं। हिरन, खरगोश, बंदर, मोर आदि वन्य पशु राजाजी नेशनल पार्क से यहाँ खुलेआम विचरण करते हैं। यदा-कदा हाथियों के दर्शन भी झुंडों में हो सकते हैं। बन क्षेत्र गांव वासियों के लिए सूखी लकड़ी का समृद्ध स्रोत हैं, गाँव की महिलाओं को यहाँ इनको बटोरते देखा जा सकता है। सीजन में बन गुर्जरों को अपनी भैंसों के साथ यहाँ के संरक्षित क्षेत्रों में रहते देखा जा सकता है। सर्दियों में गंगा की धाराओं में बने टापुओं में माईग्रेटरी पक्षियों के झुडों का जमाबड़ा, चहचाहट व क्रीडा-क्लोल सबका ध्यान आकर्षित करता है। शाम को घर की ओऱ बापिस उडान भरते पक्षियों का नजारा दर्शनीय रहता है।

फिर गंगाजी का किनारा सबके लिए अलग-अलग मतलब रखता है। अनास्थावान इसे अपराध का अड्ड़ा तक कहने से नहीं चूकते, जिसमें कुछ सच्चाई भी है। भीड़ भरे घाटों पर चोर-उच्चकों व जेबकतरों से साबधानी के बोर्ड मिलते हैं। मछली मारों के लिए गंगा तट मच्छली का स्रोत है, लेकिन धारा के उसपार ही छिपकर वे ऐसा कुछ कर पाते हैं। पियक्कड़ों के लिए यहाँ का एकांत नशे की बेहोशी में डुबने का सुरक्षित स्थल है। हालांकि यह सब चोरी छिपे ही होता है। लापरवाहों के लिए गंगाजी साक्षात कालस्वरुपा हैं। हर साल कितने लापरवाह पर्यटक-श्रद्धालु चेतावनी के बावजूद इसके उद्दाम प्रवाह में डूबते रहते हैं।

इसी के तट पर नित्य हवन, यज्ञ, जप तप भी होता है। नित्य आरती का क्रम कई घाटों पर चलता है। लोग सुबह-शाम इसके तट पर भ्रमण कर स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। विशिष्ट पर्व-त्यौहारों एवं अवसरों पर हजारों-लाख लोग यहाँ स्नान करते हैं। गंगा के तट के सात्विक प्रभामंडल को कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अनुभव कर सकता है। पिछले कुंभ के दौरान तमाम घोटालों के बीच भी घाटों का पर्याप्त जीर्णोंदार हो चुका है, जो तीर्थयात्रियों के लिए दिन के विश्राम स्थल तो सन्यासी बाबाओं के लिए रात्रि के आश्रयस्थल हैं।

सालभर गंगाजी के हर रुप को देखा जा सकता है। कभी एक दम पतली धारा, जिसे पैदल ही पार किया जा सकता है, तो कभी मध्यम आकार की, जिसे तैरकर ही पार किया जा सकता है। बरसात में गंगाजी विकराल रुप धारण करती हैं, जिसमें तैरने का दुस्साहस शायद ही कोई विरला कर सके। लेकिन हर रुप में जब भी गंगाजी में डुबकी लगाओ, इसका हिमालयन टच हमेशा व्यक्ति को तरोताजा करता है। शायद यही विशेषता श्रद्धालु भक्तों को इसमें नित्य स्नान के लिए प्रेरित करती है। इनके लिए गंगाजी का जल नीला है या मटमेला, वे इसकी परवाह नहीं करते। वे तो इस ब्रह्मद्रव में स्नान कर शुद्ध-बुद्ध एवं निर्मल होने का भाव रखते हैं और शायद बैसा फल भी पाते हैं।

हालांकि सभी इस भाव से डुबकी लगाते हों, ऐसी बात भी नहीं। कईयों के लिए यह महज नदी का जल है, जिसके किनारे ऐसे अभागों को ब्रश करते, कुल्ला करते, इसी में साबुन से रगड़कर कपडे धोते देखा जा सकता है। हालांकि गंगाजी के किनारे ये कृत्य वर्जित हैं, लेकिन सबको समझाना कठिन है। कितनी वार हम ऐसे तत्वों को प्यार से समझाए हैं, कभी हड़काए हैं, लेकिन हर बार कोई नया अनाढ़ी आ जाता। इस क्षेत्र में पिछले कुंभ के दौरान गंगाजी के निर्मल जल में बहुत दूर से आए एक पढ़े-लिखे सज्जन को साबुन लगाकर स्नान करते देखा तो हमसे रहा नहीं गया कि यदि साबुन लगाकर ही नहाना था तो घर के बाथरुम में स्नान कर लेते। कुंभ में इतना दूर आकर गंगाजल को दूषित कर पुण्य की वजाए पाप के भागीदार क्यों बन रहे हो। ऐसे तमाम अनगढ़ श्रद्धालु गंगाजी के तट पर मिलेंगे।

आश्चर्य ऐसे धार्मिक वर्ग को देखकर होता है, जो गंगा नदी को माँ कहता है, इसकी पूजा-अर्चना करता है, इसमें डुबकी लगाकर मोक्ष व त्राण की कामना करता है, लेकिन स्नान के बाद गंगाजी को कूड़दान की तरह उपयोग करता है और साथ लाया सारा कुड़ा-कचरा इसमें छोड़ कर चला जाता है। इसका प्रमाण हर वर्ष हरिद्वार गंगा क्लोजर के समय हरकी पौडी के आसपास पोलीथीन, कपडों, फूल-मालाओं व पूजन सामग्री के क्विंटलों कचरे के रुप में देखा जा सकता है। आश्चर्य होता है, जब धर्म-अध्यात्म के नाम पर स्थापित आश्रमों व मठ-मंदिरों का गंदा अवशिष्ट जल सीधे गंगाजी में प्रवाहित होता है। गंगाजल के प्रति न्यूतनम संवेदनशीलता से हीन यह आस्था समझ से परे है।

फिर कहने की जरुरत नहीं कि गंगाजी की सफाई को लेकर सरकार अब तक हजारों करोड़ रुपयों की धनराशि पानी की तरह बहा चुकी है। समझ नहीं आता कि यह सब धन किस ब्लैक होल में समा जाता है और गंगाजी बैसी की बैसी ही गंदी, बदरंग और प्रदूषित अपने अस्तित्व के लिए कराह रही है, विशेषरुप में हरिद्वार से आगे कानपुर जैसे महानगरों से होते हुए इसकी स्थिति ओर विकराल है, जहाँ कारखानों का विषैला द्रव सीधे गंगाजी में गिर रहा है, जो किसी अपराध से कम नहीं। महानगरों की बड़ी आबादी के अवशिष्ट द्रव्य का गंगाजी में गिरकर दूषित करना, गंभीर चिंता का विषय है। सरकारी एवं प्रशासनिक स्तर पर इस संदर्भ में की जा रही लापरवाही पर सख्त कार्य़वाही की जरुरत है, क्योंकि जब इसके लिए प्रचुर बजट की व्यवस्था है तो आवश्यक जलसंशोधन यंत्र क्यों नहीं स्थापित हो रहे।

इस पुनीत कार्य में कई स्वयंसेवी संगठन अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गंगाजी जैसी वृहद नदी के पुनरुद्धार का कार्य किसी एक संगठन के बूते की बात नहीं है। इसके लिए सबको साथ मिलकर काम करने की जरुरत है। सबसे महत्वपूर्ण है जनता की इसमें भागीदारी का। जब तक जनता इसको अपना काम नहीं मानेगी, उसके अंदर न्यूनतम संवेदनशीलता का भाव विकसित नहीं होगा, गंगा शुद्धि का कार्य अधूरा ही रहेगा।

.गंगाजी पर प्राचीन काल से लेकर मध्यकालीन एवं आधुनिक काल तक महापुरुषों, मनीषियों, कवियों, साहित्यकारों एवं विशेषज्ञों के उद्गार पढ़कर लगता है कि ऐसी उपमा तो शायद ही विश्व की किसी नदी को मिली हो, जो गंगाजी को मिली है। भारतीय ही नहीं मुगल सम्राट तक इसके जल का पान करते थे। भारत ही नहीं विदेशी विद्वानों को तक इसका मुरीद पाया। हेनरी डेविड थोरो वाल्डेन सरोवर के किनारे गंगाजी के पावन स्पर्श का अहसास करते। हमारे धर्म-अध्यात्म एवं संस्कृति के इस केंद्रीय प्रवाह को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना हमारा पावन दायित्व है।

संस्कृति की इस जीवन रेखा को अपने पावनतम रुप में संजोए रखने की जरुत है। गोमुख गंगोत्री से गंगा सागर पर्यन्त गंगाजी के स्वरुप को यथासंभव निर्मलतम रुप में बनाए रखने की जरुरत है। समय हर स्तर पर गहन आत्म-समीक्षा का एवं ईमानदार प्रय़ास का है। जरुरत अंधी आस्था और कौरी लफ्फाजी से बाहर निकलकर अपना नैष्ठिक योगदान देने की है। प्रश्न गंगाजी के अस्तित्व का नहीं, हमारे अपने बजूद का है, हमारी भावी पीढ़ियों के सुरक्षित एवं उज्जवल भविष्य का है, प्रश्न भारत की शाश्वत सनातन संस्कृति के गौरवपूर्ण अस्तित्व का है।

(साभार - पुस्तक - गंगा का समाज और संस्कृति, 2021, अनामिका प्रकाशन। संपादक - राजकुमार भारद्वाज। अध्याय - पावनता की चुनौती। लेखक - प्रो. सुखनन्दन सिंह, पृ.6-74)

बुधवार, 30 जून 2021

कुल्लू घाटी की देव परम्परा

आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत का भी रहे ध्यान

कुल्लू-मानाली हिमाचल का वह हिस्सा है, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक विशिष्ट स्थान रखता है। क्षेत्र की युवा पीढ़ी को शायद इसका सही-सही बोध भी नहीं है, लेकिन यदि एक बार उसे इसकी सही झलक मिल जाए, तो वह देवभूमि की देवसंस्कृति का संवाहक बनकर अपनी भूमिका निभाने के लिए  सचेष्ट हो जाए। और बाहर से यहाँ पधार रहे यात्री और पर्यटक भी इसमें स्नात होकर इसके रंग में रंग जाएं।

कुल्लू-मानाली हिमाचल की सबसे सुंदर घाटियों में से है, जिसके कारण मानाली सहित यहाँ के कई स्थल हिल स्टेशन के रुप में प्रकृति प्रेमी यात्रियों के बीच लोकप्रिय स्थान पा चुके हैं। हालाँकि बढ़ती आवादी और भीड़ के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी सुंदर घाटियाँ, दिलकश वादियाँ अपने अप्रतिम सौंदर्य के साथ प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियोँ तथा आस्थावानों का स्वागत करने के लिए सदा तत्पर रहती हैं।

60-70 किमी लम्बी और 2 से 4 किमी चौड़ी घाटी के बीचों-बीच में बहती ब्यास नदी की निर्मल धार, इसे विशिष्ट बनाती है। साथ ही भूमि की उर्बरता और जल की प्रचुरता इस घाटी के लिए प्रकृति का एक विशिष्ट उपहार है। इसी के आधार पर घाटी फल एवं सब्जी उत्पादन में अग्रणी स्थान रखती है। यहाँ सेब, नाशपाती, प्लम जैसे फल बहुतायत में उगाए जा रहे हैं। अंग्रेजों के समय में सेब उत्पादन के प्राथमिक प्रयोग की यह घाटी साक्षी रही है। इस संदर्भ में मंद्रोल, मानाली, सेऊबाग जैसे स्थान अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।

स्नो लाईन पास होने के कारण यहाँ का मौसम पहाड़ी प्राँतों के इसी ऊँचाई के क्षेत्रों की तुलना में अधिक ठण्डा रहता है। घाटी में बर्फ से ढ़की पहाडियाँ साल के अधिकाँश समय हिमालय टच का सुखद अहसास दिलाती रहती हैं, हालाँकि सर्दियों में तापमान के माइनस में जाने पर स्थिति थोड़ी विकट हो जाती है, लेकिन प्रकृति ने इसकी भी व्यवस्था कर रखी है। घाटी में गर्म जल के कई स्रोत हैं। शायद ही इतने गर्म चश्में हिमाचल के किसी और जिला या भारत के किसी पहाड़ी प्राँतों के हिस्से में हों। मणीकर्ण, क्लाथ, वशिष्ट, खीरगंगा, रामशिला जैसे स्थानों में ये सर्दियों में यात्रियों एवं क्षेत्रीय लोगों के लिए वरदान स्वरुप गर्मी का सुखद अहसास दिलाते हैं और इनमें से अधिकाँश तीर्थ का दर्जा प्राप्त हैं, जिनमें स्नान बहुत पावन एवं पापनाशक माना जाता है।

यह घाटी शिव-शक्ति की भी क्रीडा स्थली रही है। मणिकर्ण तीर्थ की कहानी इसी से जुड़ी हुई है। खीरगंगा को शिव-पार्वती पुत्र कार्तिकेय के साथ जोड़कर देखा जाता है। पहाड़ी की चोटी पर बिजलेश्वर महादेव इसकी बानगी पेश करते हैं, जिसके चरणों में पार्वती एवं ब्यास नदियाँ जैसे चरण पखारती प्रतीत होती हैं व इनके संगम को भी तीर्थ का दर्जा प्राप्त है, जहाँ स्थानीय देवी-देवता विशेष अवसरों पर पुण्य स्नान करते हैं। बिजलेश्वर महादेव से व्यास कुण्ड एवं मानतलाई के बीच एक दिव्य त्रिकोण बनता है, जिसका अपना महत्व है। अठारह करड़ु देवताओं की लीलाभूमि चंद्रखणी पास इसी के बीच में शिखर पर पड़ता है। इंद्रकील पर्वत का इस क्षेत्र में अपना विशिष्ट महत्व है।

यह भूमि महाभारत के यौद्धा अर्जुन की तपःस्थली भी रही है, जहाँ इन्हें दिव्य अस्त्र मिले थे। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर शवर रुप में भगवान शिव प्रकट हुए थे व युद्ध में परीक्षा के बाद प्रसन्न होकर वरदान दिए थे। मानाली के समीप लेफ्ट बैंक में जगतसुख के पास अर्जुन गुफा और शवरी माता का मंदिर आज भी इसकी गवाही देते हैं।

मानाली में हिडिम्बा माता का मंदिर महाभारत काल की याद दिलाता है, जब महाबली भीम नें राक्षस हिडिम्ब को मारकर हिडिम्बा से विवाह किया था। इनके पुत्र घटोत्कच का मंदिर भी पास में ही है। इसके आगे पुरानी मानाली में ऋषि मनु का मंदिर है, जिनके नाम पर इस स्थल का नाम मानाली पड़ा। मनु ऋषि से जुड़ा विश्व में संभवतः यह एक मात्र मंदिर है। इस आधार पर मानव सभ्यता की शुरुआत से इस स्थल का सम्बन्ध देखा जा सकता है, जिस पर और शोध-अनुसंधान की आवश्यकता है। सप्तऋषियों में अधिकाँश के तार इस घाटी से जुड़े मिलते हैं। व्यास, वशिष्ट, जमदग्नि, पराशर, गौतम, अत्रि, नारद जैसे ऋषि-मुनियों का इस घाटी में विशेष सम्बन्ध रहा है।

इस घाटी में हर गाँव का अपना देवता है, जो ठारा करड़ू के साथ अठारह नारायण, आठारह रुद्र, उठारह नाग आदि देवताओं ये युग्म के रुप में इस घाटी को देवभूमि के रुप में सार्थक करते हैं। विश्व विख्यात कुल्लू के दशहरे में ये सभी देवी-देवता अपने गाँवों से निकलकर भगवान रघुनाथ को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। कुल्लू के ढालपुर मैदान (ठारा करड़ू की सोह) में देवमिलन का यह पर्व अद्भुत नजारा पेश करता है।

इन सब विशेषताओं के साथ विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र मलाना इसी घाटी की दुर्गम वादियों में स्थित है, जहाँ आज भी इनके देवता जमलु का शासन चलता है। विश्व विजय का सपने लिए सम्राट सिकन्दर से लेकर बादशाह अकबर की कथा-गाथाएं इस गाँव से जुड़ी हुई हैं।

कुल्लू मानाली के ठीक बीचों-बीच लेफ्ट बैंक पर स्थित नग्गर एक विशिष्ट स्थल है, जो कभी कुल्लू की राजधानी रहा है। आज भी नग्गर में 500 वर्ष पुराने राजमहल को नग्गर कैसल के रुप में देखा जा सकता है। यहाँ का जगती पोट देवताओं की दिव्य-शक्तियों की गवाही देता है। रशियन चित्रकार, यायावर, पुरातत्ववेता, विचारक, दार्शनिक, कवि, भविष्यद्रष्टा और हिमालय के चितेरे निकोलाई रोरिक की समाधी के कारण भी घाटी अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर अपना विशेष स्थान रखती है। विश्व के ये महानतम कलाकार एवं शांतिदूत 1928 में आकर यहाँ बस गए थे, जो इनके अंतिम 20 वर्षों की सृजन स्थली रही। 

नग्गर शेरे कुल्लू के नाम से प्रख्यात लालचंद्र प्रार्थी की भी जन्मभूमि रही है। मानाली के समीप प्रीणी गाँव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी का लोकप्रिय आशियाना रहा, जिनके नाम से जुड़े पर्वतारोहण संस्थान और अटल टनल इस क्षेत्र से उनके आत्मिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। मानाली के आगे नेहरु कुण्ड जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा स्थल था, जहाँ के जल का वे यहाँ आने पर पान करते। आज भी कई हस्तियाँ इस घाटी से जुड़कर अपना गौरव अनुभव करती हैं।

एडवेंचर प्रेमी घुमक्कड़ों के बीच भी घाटी खासी लोकप्रिय है, जिसमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान, सर्दी में स्कीइंग से लेकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता है, जो पर्वतारोहण एवं एडवेंचर स्पोर्टस के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान रखता है। सोलाँग घाटी में स्कीईंग के साथ अन्य एडवेंचर स्पोर्टस होते रहते हैं। इसके आगे कुल्लू घाटी को लाहौल घाटी के दुर्गम क्षेत्र से जोड़ती अटल टनल भी एक नया आकर्षण है, जिसका पिछले ही वर्ष उद्घाटन हुआ है।

इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के युग में घाटी की सांस्कृतिक विरासत एवं कला संगीत आदि के प्रति युवाओं व जनता में एक नया रुझान पैदा हुआ है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती एक सुखद घटना है। लेकिन नाच गाने व मनोरंजन तक ही सांस्कृतिक विरासत को सीमित मानना एक भूल होगी। फिर देवपरम्परा में बलि प्रथा से लेकर लोक जीवन में शराब व नशे का बढ़ता चलन चिंता का विषय है। इन विकृतियों के परिमार्जन के साथ समय देवसंस्कृति की उस आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरुक होने का है, जिसके आधार पर संस्कृति व्यक्ति के मन, बुद्धि एवं चित्त का परिष्कार करती है, जीवन के समग्र उत्थान का रास्ता खोलती है। और परिवार में श्रेष्ठ संस्कारों का रोपण करते हुए समाज, राष्ट्र तथा पूरे विश्व को एक सुत्र में बाँधने का मानवीय आधार देती है। समृद्ध आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को संजोए इस देवभूमि से इस आधार पर कुछ विशेष आशाएं तो की ही जा सकती हैं। 

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