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शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

देवसंस्कृति की गौरवमयी पावन धारा - गंगा मैया

 गंगा की पावनता को बनाए रखने की चुनौती

जब से होश संभाला घर के बुजुर्गों से गंगाजल का परिचय मिला। घर में एक सीलबंद लोटे में गंगाजल रहता, किन्हीं विशेष अवसरों पर इसका छिड़काव शुद्धि के लिए किया जाता। हमें याद है कि हमारे नानाजी इस गंगाजल के लोटे को हरिद्वार से लाए थे। जब भी घर-गाँव में कोई दिवंगत होता तो हरिद्वार में अस्थि-विसर्जन एवं तर्पण का संस्कार होता। कई दिनों की बस और ट्रेन यात्रा के बाद हरिद्वार से यह पवित्र जल घर पहुँचता।

नहीं मालूम था कि धर्मनगरी हरिद्वार ही आगे चलकर हमारी कर्मस्थली बनने वाली है। हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र में एक आश्रम के शोध संस्थान में कार्य करने का संयोग बना। यहाँ गंगाजी के किनारे सुबह-शाम भ्रमण का मौका मिलता। गंगाकिनारे बने घाटों पर कितनी शामें बीतीं, खासकर जब परेशान होते, इसके तट पर बैठ जाते, विक्षुब्ध मन शांत हो जाता। गंगाजी के तट पर, इसके जल प्रवाह में कुछ तो बात है, इसे गहराई से अनुभव करते।

सूक्ष्मदर्शी विज्ञजनों के श्रीमुख से सुनकर हमारी धारणा ओर बलवती हुई कि गंगाजल कोई सामान्य जल नहीं है। कितने तपस्वी, ऋषियों के तप तेज का दिव्य अंश इसमें मिला है, जो आज भी प्रवाहमान है। यह औषधीय गुणों से भरपूर दिव्य जल है। जब शास्त्रों को पढ़ा, तो महापुरुषों के वचनों में भी इसको पुष्ट होते पाया। आदि शंकराचार्यजी ने इसे ब्रह्मदव्य की संज्ञा दी। पौराणिक किवदंयितों के अनुसार ये ब्रह्माजी के कमंडल से प्रकट, विष्णुजी के चरणनख से निस्सृत और शिव की जटाओं से होकर धरती पर अवतरित दैवीय प्रवाह है। धरती पर मानव मात्र के कल्याण-त्राण के लिए भगीरथी तप ने इसे आगे बढ़ाया।

गंगाजी में डुबकी लगाते ही बर्फ की ठंडक लिए इसका शीतल जल हमें सीधे हिमालय से जोड़ता। भाव स्मरण होता कि कैसे यह जल हिमालय के तीर्थों को समेटे हुए हम तक पहुंच रहा है। हर डुबकी के साथ यह सिमरन हमें गंगाजी के उद्गम स्थल की ओर सोचने के लिए प्रेरित करता। और इस सुमरन के सम्मिलित भाव का फल कहेंगे, जो कालांतर में हमें हिमालय की गोद में तीर्थाटन के सुअबसर मिले। देवप्रयाग, केदारनाथ, तुंगनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब जैसे तीर्थ स्थलों की यात्राएं सम्पन्न हुईं और गंगाजी की धाराओं का इसके शुरुआती पड़ाव में अवलोकन का अबसर मिला। केदारनाथ में उस पार धौलीगंगा के ध्वल निर्मल जल को पहाडों से छलछलाते हुए नीचे गिरते देखकर चित्त आल्हादित हो जाता, लेकिन उसके पास जाकर किनारे पर इंसान को अपनी गंदगी से इसे अपवित्र करते देख कष्ट हुआ। लगा, इंसान में जलस्रोत्रों के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता का अभाव कितना बड़ा संकट है। शायद हमारे विचार में गंगाजी व अन्य किसी भी नदी में प्रदूषण का यही मुख्य कारण है।

हिमालय में गंगाजी की धाराएं अपने शुद्धतम रुप में प्रवाहित होती हैं, प्रायः आसमानी नीलवर्ण लिए, हालाँकि बीच-बीच में रंग मटमैला हो जाता है और वरसात में इसका स्वरुप एकदम बदल जाता है, जो स्वाभिवक भी है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी के संगम पर गंगाजी का पूर्ण स्वरुप प्रकट होता है। एक ओर से भगीरथी की नीलवर्णी धारा तो दूसरी ओर से अलकनंदा का कुछ मटमैला सा प्रवाह। संगम दृश्य दर्शनीय है। यहाँ गंगाजी को अपने भव्यतम निर्मल रुप में पाया और यहाँ के दिव्य संगम पर लगाई डुबकी हमारे चिरस्मरणीय पलों में शुमार है।

यहां से आगे फिर गंगाजी का प्रवाह शांत व गंभीर होता जाता है, ऋषिकेश तक आते-आते जैसे यह अपनी प्रौढ़ावस्था को पा जाती है। रास्ते में ही एडवेंचर स्पोर्ट्स के नाम पर राफ्टिंग क्लबों की भरमार के साथ मानवीय हस्तक्षेप की कहानी शुरु हो जाती है। इसके तटों पर पर्यटकों का रवैया गंगाजी के प्रति कितना संवेदनशील रहता है, यह शोध की विषय वस्तु है। हालांकि ऋषिकेश में लक्ष्मणझूला एवं रामझूला में गंगाजी पर्याप्त शुद्ध पायी गयी है, जो हरिद्वार तक बहुत कुछ बैसी ही रहती है। लेकिन राह में शहरों के अवशिष्ट पदार्थों के इसमें मिलते जाने से इसकी शुद्धता का प्रभावित होना शुरु हो जाता है।

गंगाजल की विलक्षणता की चर्चा जब विदेश तक पहुँची थी तो इसके जल का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ। इन परीक्षणों के आधार पर पाया गया था कि इसमें कुछ ऐसे तत्व हैं, जो इसे विशिष्ट बनाते हैं। इसमें जबर्दस्त कीटाणुनिरोधक क्षमता है, जिसके कारण इसका जल कितने ही वर्षों तक ताजा रहता है। समझ में आता है कि हिमालय की औषधियों से लेकर खनिज तत्वों का सत्व इसमें मिलकर इन औषधीय गुणों से युक्त बनाता होगा।

अपनी इन आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक विशेषताओं के साथ गंगाजी देश की सांस्कृतिक जीवन रेखा हैं। देश-विदेश के किसी भी कौने में रह रहा भारतवासी गंगाजी से जुड़ाव अनुभव करता है। और फिर एक बड़ी आवादी का तो सीधा गंगाजी के किनारे ही अस्तित्व टिका है। हिमालय में गोमुख से गंगासागर पर्यन्त 2525 किमी के सफर में गंगाजी के तट पर देश की 43 फीसदी आवादी पलती है। फिर ऋषिकेश, हरिद्वारसे लेकर प्रयागराज, बनारस एवं कोलकत्ता तक कितने नगर-महानगर इसके तट पर बसे हैं, जो न जाने कबसे देश की समृद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत संजोए हुए हैं। इन दिनों प्रयागराज में चल रहे विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समारोह कुंभ-2019 में इस सांस्कृतिक प्रवाह की झलक-झांकी को भली भांती देखा जा सकता है, जिसका दीदार करने के लिए विदेशों से तक सैंकड़ों शोधार्थी, पर्यटक एवं जिज्ञासु आए हुए हैं। हरिद्वार में भी कुंभ के ऐसे ही दो वृहद आयोजनों के हम साक्षी रहे हैं, जिसका विस्तार हरिद्वार से लेकर ऋषिकेश पर्यन्त था।

हमारा अनुभव हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र का विशेष रहा, क्योंकि यहीं अपने पिछले अढाई दशक गंगाजी के किनारे बीते। मान्यता है कि भगीरथ के आवाह्न पर जब हिमालय से उतर कर गंगाजी मैदानों में आती हैं, तो हरिद्वार के इस क्षेत्र में सत्पऋषि तप कर रहे थे। उनको कोई असुविधा न हो, गंगाजी सात भागों में विभक्त हो गयी। आज भी यहाँ के सात मंजिले भारतमाता मंदिर में चढ़कर देखें तो 4-5 धाराएं तो आज भी दिखती हैं। बीच में बाँध बनने के कारण बाकि धाराएं बिलुप्त हो गयी हैं, नहीं तो पहाड़ी के नीचे दायीं ओर उस छोर तक गंगाजी का प्रवाह था, जिसके बीच में आज गायत्री तीर्थ शांतिकुज बना हुआ है। वहाँ खोदने पर बालु और गोल-गोल पत्थर के साथ जल की प्रचुरता इसकी मौजूदगी के सबूत पेश करते हैं। मान्यता है कि यहाँ कभी गायत्री महामंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र की तपःस्थली थी। खैर सप्तसरोवर क्षेत्र में गंगाजी को साल भर निहारने का मौका मिलता रहा।

गंगाजी की मुख्य धारा का एक बड़ा अंश ऋषिकेश वैराज से चीला डैम (लघु विद्युत योजना) की ओर नीलधारा नहर के रुप में बहता है और शेष गंगाजल रायवाला सप्तसरोवर से होकर आगे नीलधारा से घाट नम्बर 10 पर मिलता है। इस तरह सप्तसरोवर की धारा में देहरादून से आ रही सोंग नदी का जल भी मिला होता है। लेकिन जो भी हो गंगाजी का जल सालभर के अधिकाँश समय हिमालयन टच लिए रहता है। जब यह फील नहीं आता तो हम आगे दस नम्बर घाट या इससे आगे एक नम्बर घाट तक जाते, जहाँ गंगाजी को समग्र रुपमें पाते। यहीं से एक धारा खड़खड़ी शमशान से होते हुए हरकी पौड़ी की ओर प्रवाहित होती है।

हमारे जितने भी मित्र हैं, अतिथि प्रवक्ता या बाहरी मेहमान, हम गंगाजी के इस घाट पर एक वार अवश्य स्नान कराते हैं। हरिद्वार के फक्कड़ जीवन में हमारे पास गंगाजी के अलावा ओर है भी क्या। गंगाजी का हिमालयन टच ही हमारा एक गिफ्ट रहता है, जो शायद दिल्ली या दूसरे शहरों से आए मित्रों के लिए एक दुर्लभ चीज रहती है। और ग्रुप में गंगाजी के किनारे दर्जनों नहीं अनगिन पिकनिकों की यादें ताजा है। कुछ तो देसंविवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी के साथ, कुछ विभाग के शिक्षकों के साथ, कुछ यार दोस्तों के साथ, कुछ परिवारजनों के साथ और कुछ निपट अकेले।

गंगाजी के उस पार धाराओं के बीच बसे टापूओं में कितने बाबाओं को कुटिया बना कर एकांत वास करते देखा। कुछ को तो वृक्षों पर मचान बनाकर रहते देखा। हालाँकि अब राजाजी नेशनल पार्क में इनको रुकने की मनाही है, लेकिन इनके अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। ब्रह्मवर्चस आरण्यक की स्थापना भी कुछ ऐसे ही उद्देश्य के साथ हुई थी। आचार्यश्री का मानना था कि नांव से गंगाजी को पार कर साधक टापू में दिन भर साधना करेंगे और फिर शाम को नाव से ही बापस अपने कक्ष में आएंगे। हालाँकि यह बात योजना बनकर ही रह गई। लेकिन गंगा की गोद व हिमालय की छाया में साधना का अपना महत्व तो है ही।

इन टापूओं में जंगली बेर फल की पर्याप्त झाडियाँ हैं, साथ ही जंगली बेल के वृक्ष भी, जिनका सीजन में पकने पर लुत्फ उठाया जा सकता है। सेमल के वृहद पेड़ तट पर फैले हैं, जो वसंत में फूलने पर सुर्ख लाल रंगत लिए टापुओं व गंगा तट की शोभा में चार चाँद लगा रहे होते हैं। हिरन, खरगोश, बंदर, मोर आदि वन्य पशु राजाजी नेशनल पार्क से यहाँ खुलेआम विचरण करते हैं। यदा-कदा हाथियों के दर्शन भी झुंडों में हो सकते हैं। बन क्षेत्र गांव वासियों के लिए सूखी लकड़ी का समृद्ध स्रोत हैं, गाँव की महिलाओं को यहाँ इनको बटोरते देखा जा सकता है। सीजन में बन गुर्जरों को अपनी भैंसों के साथ यहाँ के संरक्षित क्षेत्रों में रहते देखा जा सकता है। सर्दियों में गंगा की धाराओं में बने टापुओं में माईग्रेटरी पक्षियों के झुडों का जमाबड़ा, चहचाहट व क्रीडा-क्लोल सबका ध्यान आकर्षित करता है। शाम को घर की ओऱ बापिस उडान भरते पक्षियों का नजारा दर्शनीय रहता है।

फिर गंगाजी का किनारा सबके लिए अलग-अलग मतलब रखता है। अनास्थावान इसे अपराध का अड्ड़ा तक कहने से नहीं चूकते, जिसमें कुछ सच्चाई भी है। भीड़ भरे घाटों पर चोर-उच्चकों व जेबकतरों से साबधानी के बोर्ड मिलते हैं। मछली मारों के लिए गंगा तट मच्छली का स्रोत है, लेकिन धारा के उसपार ही छिपकर वे ऐसा कुछ कर पाते हैं। पियक्कड़ों के लिए यहाँ का एकांत नशे की बेहोशी में डुबने का सुरक्षित स्थल है। हालांकि यह सब चोरी छिपे ही होता है। लापरवाहों के लिए गंगाजी साक्षात कालस्वरुपा हैं। हर साल कितने लापरवाह पर्यटक-श्रद्धालु चेतावनी के बावजूद इसके उद्दाम प्रवाह में डूबते रहते हैं।

इसी के तट पर नित्य हवन, यज्ञ, जप तप भी होता है। नित्य आरती का क्रम कई घाटों पर चलता है। लोग सुबह-शाम इसके तट पर भ्रमण कर स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। विशिष्ट पर्व-त्यौहारों एवं अवसरों पर हजारों-लाख लोग यहाँ स्नान करते हैं। गंगा के तट के सात्विक प्रभामंडल को कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अनुभव कर सकता है। पिछले कुंभ के दौरान तमाम घोटालों के बीच भी घाटों का पर्याप्त जीर्णोंदार हो चुका है, जो तीर्थयात्रियों के लिए दिन के विश्राम स्थल तो सन्यासी बाबाओं के लिए रात्रि के आश्रयस्थल हैं।

सालभर गंगाजी के हर रुप को देखा जा सकता है। कभी एक दम पतली धारा, जिसे पैदल ही पार किया जा सकता है, तो कभी मध्यम आकार की, जिसे तैरकर ही पार किया जा सकता है। बरसात में गंगाजी विकराल रुप धारण करती हैं, जिसमें तैरने का दुस्साहस शायद ही कोई विरला कर सके। लेकिन हर रुप में जब भी गंगाजी में डुबकी लगाओ, इसका हिमालयन टच हमेशा व्यक्ति को तरोताजा करता है। शायद यही विशेषता श्रद्धालु भक्तों को इसमें नित्य स्नान के लिए प्रेरित करती है। इनके लिए गंगाजी का जल नीला है या मटमेला, वे इसकी परवाह नहीं करते। वे तो इस ब्रह्मद्रव में स्नान कर शुद्ध-बुद्ध एवं निर्मल होने का भाव रखते हैं और शायद बैसा फल भी पाते हैं।

हालांकि सभी इस भाव से डुबकी लगाते हों, ऐसी बात भी नहीं। कईयों के लिए यह महज नदी का जल है, जिसके किनारे ऐसे अभागों को ब्रश करते, कुल्ला करते, इसी में साबुन से रगड़कर कपडे धोते देखा जा सकता है। हालांकि गंगाजी के किनारे ये कृत्य वर्जित हैं, लेकिन सबको समझाना कठिन है। कितनी वार हम ऐसे तत्वों को प्यार से समझाए हैं, कभी हड़काए हैं, लेकिन हर बार कोई नया अनाढ़ी आ जाता। इस क्षेत्र में पिछले कुंभ के दौरान गंगाजी के निर्मल जल में बहुत दूर से आए एक पढ़े-लिखे सज्जन को साबुन लगाकर स्नान करते देखा तो हमसे रहा नहीं गया कि यदि साबुन लगाकर ही नहाना था तो घर के बाथरुम में स्नान कर लेते। कुंभ में इतना दूर आकर गंगाजल को दूषित कर पुण्य की वजाए पाप के भागीदार क्यों बन रहे हो। ऐसे तमाम अनगढ़ श्रद्धालु गंगाजी के तट पर मिलेंगे।

आश्चर्य ऐसे धार्मिक वर्ग को देखकर होता है, जो गंगा नदी को माँ कहता है, इसकी पूजा-अर्चना करता है, इसमें डुबकी लगाकर मोक्ष व त्राण की कामना करता है, लेकिन स्नान के बाद गंगाजी को कूड़दान की तरह उपयोग करता है और साथ लाया सारा कुड़ा-कचरा इसमें छोड़ कर चला जाता है। इसका प्रमाण हर वर्ष हरिद्वार गंगा क्लोजर के समय हरकी पौडी के आसपास पोलीथीन, कपडों, फूल-मालाओं व पूजन सामग्री के क्विंटलों कचरे के रुप में देखा जा सकता है। आश्चर्य होता है, जब धर्म-अध्यात्म के नाम पर स्थापित आश्रमों व मठ-मंदिरों का गंदा अवशिष्ट जल सीधे गंगाजी में प्रवाहित होता है। गंगाजल के प्रति न्यूतनम संवेदनशीलता से हीन यह आस्था समझ से परे है।

फिर कहने की जरुरत नहीं कि गंगाजी की सफाई को लेकर सरकार अब तक हजारों करोड़ रुपयों की धनराशि पानी की तरह बहा चुकी है। समझ नहीं आता कि यह सब धन किस ब्लैक होल में समा जाता है और गंगाजी बैसी की बैसी ही गंदी, बदरंग और प्रदूषित अपने अस्तित्व के लिए कराह रही है, विशेषरुप में हरिद्वार से आगे कानपुर जैसे महानगरों से होते हुए इसकी स्थिति ओर विकराल है, जहाँ कारखानों का विषैला द्रव सीधे गंगाजी में गिर रहा है, जो किसी अपराध से कम नहीं। महानगरों की बड़ी आबादी के अवशिष्ट द्रव्य का गंगाजी में गिरकर दूषित करना, गंभीर चिंता का विषय है। सरकारी एवं प्रशासनिक स्तर पर इस संदर्भ में की जा रही लापरवाही पर सख्त कार्य़वाही की जरुरत है, क्योंकि जब इसके लिए प्रचुर बजट की व्यवस्था है तो आवश्यक जलसंशोधन यंत्र क्यों नहीं स्थापित हो रहे।

इस पुनीत कार्य में कई स्वयंसेवी संगठन अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गंगाजी जैसी वृहद नदी के पुनरुद्धार का कार्य किसी एक संगठन के बूते की बात नहीं है। इसके लिए सबको साथ मिलकर काम करने की जरुरत है। सबसे महत्वपूर्ण है जनता की इसमें भागीदारी का। जब तक जनता इसको अपना काम नहीं मानेगी, उसके अंदर न्यूनतम संवेदनशीलता का भाव विकसित नहीं होगा, गंगा शुद्धि का कार्य अधूरा ही रहेगा।

.गंगाजी पर प्राचीन काल से लेकर मध्यकालीन एवं आधुनिक काल तक महापुरुषों, मनीषियों, कवियों, साहित्यकारों एवं विशेषज्ञों के उद्गार पढ़कर लगता है कि ऐसी उपमा तो शायद ही विश्व की किसी नदी को मिली हो, जो गंगाजी को मिली है। भारतीय ही नहीं मुगल सम्राट तक इसके जल का पान करते थे। भारत ही नहीं विदेशी विद्वानों को तक इसका मुरीद पाया। हेनरी डेविड थोरो वाल्डेन सरोवर के किनारे गंगाजी के पावन स्पर्श का अहसास करते। हमारे धर्म-अध्यात्म एवं संस्कृति के इस केंद्रीय प्रवाह को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना हमारा पावन दायित्व है।

संस्कृति की इस जीवन रेखा को अपने पावनतम रुप में संजोए रखने की जरुत है। गोमुख गंगोत्री से गंगा सागर पर्यन्त गंगाजी के स्वरुप को यथासंभव निर्मलतम रुप में बनाए रखने की जरुरत है। समय हर स्तर पर गहन आत्म-समीक्षा का एवं ईमानदार प्रय़ास का है। जरुरत अंधी आस्था और कौरी लफ्फाजी से बाहर निकलकर अपना नैष्ठिक योगदान देने की है। प्रश्न गंगाजी के अस्तित्व का नहीं, हमारे अपने बजूद का है, हमारी भावी पीढ़ियों के सुरक्षित एवं उज्जवल भविष्य का है, प्रश्न भारत की शाश्वत सनातन संस्कृति के गौरवपूर्ण अस्तित्व का है।

(साभार - पुस्तक - गंगा का समाज और संस्कृति, 2021, अनामिका प्रकाशन। संपादक - राजकुमार भारद्वाज। अध्याय - पावनता की चुनौती। लेखक - प्रो. सुखनन्दन सिंह, पृ.6-74)

बुधवार, 30 जून 2021

कुल्लू घाटी की देव परम्परा

आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत का भी रहे ध्यान

कुल्लू-मानाली हिमाचल का वह हिस्सा है, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक विशिष्ट स्थान रखता है। क्षेत्र की युवा पीढ़ी को शायद इसका सही-सही बोध भी नहीं है, लेकिन यदि एक बार उसे इसकी सही झलक मिल जाए, तो वह देवभूमि की देवसंस्कृति का संवाहक बनकर अपनी भूमिका निभाने के लिए  सचेष्ट हो जाए। और बाहर से यहाँ पधार रहे यात्री और पर्यटक भी इसमें स्नात होकर इसके रंग में रंग जाएं।

कुल्लू-मानाली हिमाचल की सबसे सुंदर घाटियों में से है, जिसके कारण मानाली सहित यहाँ के कई स्थल हिल स्टेशन के रुप में प्रकृति प्रेमी यात्रियों के बीच लोकप्रिय स्थान पा चुके हैं। हालाँकि बढ़ती आवादी और भीड़ के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी सुंदर घाटियाँ, दिलकश वादियाँ अपने अप्रतिम सौंदर्य के साथ प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियोँ तथा आस्थावानों का स्वागत करने के लिए सदा तत्पर रहती हैं।

60-70 किमी लम्बी और 2 से 4 किमी चौड़ी घाटी के बीचों-बीच में बहती ब्यास नदी की निर्मल धार, इसे विशिष्ट बनाती है। साथ ही भूमि की उर्बरता और जल की प्रचुरता इस घाटी के लिए प्रकृति का एक विशिष्ट उपहार है। इसी के आधार पर घाटी फल एवं सब्जी उत्पादन में अग्रणी स्थान रखती है। यहाँ सेब, नाशपाती, प्लम जैसे फल बहुतायत में उगाए जा रहे हैं। अंग्रेजों के समय में सेब उत्पादन के प्राथमिक प्रयोग की यह घाटी साक्षी रही है। इस संदर्भ में मंद्रोल, मानाली, सेऊबाग जैसे स्थान अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।

स्नो लाईन पास होने के कारण यहाँ का मौसम पहाड़ी प्राँतों के इसी ऊँचाई के क्षेत्रों की तुलना में अधिक ठण्डा रहता है। घाटी में बर्फ से ढ़की पहाडियाँ साल के अधिकाँश समय हिमालय टच का सुखद अहसास दिलाती रहती हैं, हालाँकि सर्दियों में तापमान के माइनस में जाने पर स्थिति थोड़ी विकट हो जाती है, लेकिन प्रकृति ने इसकी भी व्यवस्था कर रखी है। घाटी में गर्म जल के कई स्रोत हैं। शायद ही इतने गर्म चश्में हिमाचल के किसी और जिला या भारत के किसी पहाड़ी प्राँतों के हिस्से में हों। मणीकर्ण, क्लाथ, वशिष्ट, खीरगंगा, रामशिला जैसे स्थानों में ये सर्दियों में यात्रियों एवं क्षेत्रीय लोगों के लिए वरदान स्वरुप गर्मी का सुखद अहसास दिलाते हैं और इनमें से अधिकाँश तीर्थ का दर्जा प्राप्त हैं, जिनमें स्नान बहुत पावन एवं पापनाशक माना जाता है।

यह घाटी शिव-शक्ति की भी क्रीडा स्थली रही है। मणिकर्ण तीर्थ की कहानी इसी से जुड़ी हुई है। खीरगंगा को शिव-पार्वती पुत्र कार्तिकेय के साथ जोड़कर देखा जाता है। पहाड़ी की चोटी पर बिजलेश्वर महादेव इसकी बानगी पेश करते हैं, जिसके चरणों में पार्वती एवं ब्यास नदियाँ जैसे चरण पखारती प्रतीत होती हैं व इनके संगम को भी तीर्थ का दर्जा प्राप्त है, जहाँ स्थानीय देवी-देवता विशेष अवसरों पर पुण्य स्नान करते हैं। बिजलेश्वर महादेव से व्यास कुण्ड एवं मानतलाई के बीच एक दिव्य त्रिकोण बनता है, जिसका अपना महत्व है। अठारह करड़ु देवताओं की लीलाभूमि चंद्रखणी पास इसी के बीच में शिखर पर पड़ता है। इंद्रकील पर्वत का इस क्षेत्र में अपना विशिष्ट महत्व है।

यह भूमि महाभारत के यौद्धा अर्जुन की तपःस्थली भी रही है, जहाँ इन्हें दिव्य अस्त्र मिले थे। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर शवर रुप में भगवान शिव प्रकट हुए थे व युद्ध में परीक्षा के बाद प्रसन्न होकर वरदान दिए थे। मानाली के समीप लेफ्ट बैंक में जगतसुख के पास अर्जुन गुफा और शवरी माता का मंदिर आज भी इसकी गवाही देते हैं।

मानाली में हिडिम्बा माता का मंदिर महाभारत काल की याद दिलाता है, जब महाबली भीम नें राक्षस हिडिम्ब को मारकर हिडिम्बा से विवाह किया था। इनके पुत्र घटोत्कच का मंदिर भी पास में ही है। इसके आगे पुरानी मानाली में ऋषि मनु का मंदिर है, जिनके नाम पर इस स्थल का नाम मानाली पड़ा। मनु ऋषि से जुड़ा विश्व में संभवतः यह एक मात्र मंदिर है। इस आधार पर मानव सभ्यता की शुरुआत से इस स्थल का सम्बन्ध देखा जा सकता है, जिस पर और शोध-अनुसंधान की आवश्यकता है। सप्तऋषियों में अधिकाँश के तार इस घाटी से जुड़े मिलते हैं। व्यास, वशिष्ट, जमदग्नि, पराशर, गौतम, अत्रि, नारद जैसे ऋषि-मुनियों का इस घाटी में विशेष सम्बन्ध रहा है।

इस घाटी में हर गाँव का अपना देवता है, जो ठारा करड़ू के साथ अठारह नारायण, आठारह रुद्र, उठारह नाग आदि देवताओं ये युग्म के रुप में इस घाटी को देवभूमि के रुप में सार्थक करते हैं। विश्व विख्यात कुल्लू के दशहरे में ये सभी देवी-देवता अपने गाँवों से निकलकर भगवान रघुनाथ को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। कुल्लू के ढालपुर मैदान (ठारा करड़ू की सोह) में देवमिलन का यह पर्व अद्भुत नजारा पेश करता है।

इन सब विशेषताओं के साथ विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र मलाना इसी घाटी की दुर्गम वादियों में स्थित है, जहाँ आज भी इनके देवता जमलु का शासन चलता है। विश्व विजय का सपने लिए सम्राट सिकन्दर से लेकर बादशाह अकबर की कथा-गाथाएं इस गाँव से जुड़ी हुई हैं।

कुल्लू मानाली के ठीक बीचों-बीच लेफ्ट बैंक पर स्थित नग्गर एक विशिष्ट स्थल है, जो कभी कुल्लू की राजधानी रहा है। आज भी नग्गर में 500 वर्ष पुराने राजमहल को नग्गर कैसल के रुप में देखा जा सकता है। यहाँ का जगती पोट देवताओं की दिव्य-शक्तियों की गवाही देता है। रशियन चित्रकार, यायावर, पुरातत्ववेता, विचारक, दार्शनिक, कवि, भविष्यद्रष्टा और हिमालय के चितेरे निकोलाई रोरिक की समाधी के कारण भी घाटी अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर अपना विशेष स्थान रखती है। विश्व के ये महानतम कलाकार एवं शांतिदूत 1928 में आकर यहाँ बस गए थे, जो इनके अंतिम 20 वर्षों की सृजन स्थली रही। 

नग्गर शेरे कुल्लू के नाम से प्रख्यात लालचंद्र प्रार्थी की भी जन्मभूमि रही है। मानाली के समीप प्रीणी गाँव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी का लोकप्रिय आशियाना रहा, जिनके नाम से जुड़े पर्वतारोहण संस्थान और अटल टनल इस क्षेत्र से उनके आत्मिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। मानाली के आगे नेहरु कुण्ड जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा स्थल था, जहाँ के जल का वे यहाँ आने पर पान करते। आज भी कई हस्तियाँ इस घाटी से जुड़कर अपना गौरव अनुभव करती हैं।

एडवेंचर प्रेमी घुमक्कड़ों के बीच भी घाटी खासी लोकप्रिय है, जिसमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान, सर्दी में स्कीइंग से लेकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करता है, जो पर्वतारोहण एवं एडवेंचर स्पोर्टस के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान रखता है। सोलाँग घाटी में स्कीईंग के साथ अन्य एडवेंचर स्पोर्टस होते रहते हैं। इसके आगे कुल्लू घाटी को लाहौल घाटी के दुर्गम क्षेत्र से जोड़ती अटल टनल भी एक नया आकर्षण है, जिसका पिछले ही वर्ष उद्घाटन हुआ है।

इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के युग में घाटी की सांस्कृतिक विरासत एवं कला संगीत आदि के प्रति युवाओं व जनता में एक नया रुझान पैदा हुआ है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती एक सुखद घटना है। लेकिन नाच गाने व मनोरंजन तक ही सांस्कृतिक विरासत को सीमित मानना एक भूल होगी। फिर देवपरम्परा में बलि प्रथा से लेकर लोक जीवन में शराब व नशे का बढ़ता चलन चिंता का विषय है। इन विकृतियों के परिमार्जन के साथ समय देवसंस्कृति की उस आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरुक होने का है, जिसके आधार पर संस्कृति व्यक्ति के मन, बुद्धि एवं चित्त का परिष्कार करती है, जीवन के समग्र उत्थान का रास्ता खोलती है। और परिवार में श्रेष्ठ संस्कारों का रोपण करते हुए समाज, राष्ट्र तथा पूरे विश्व को एक सुत्र में बाँधने का मानवीय आधार देती है। समृद्ध आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को संजोए इस देवभूमि से इस आधार पर कुछ विशेष आशाएं तो की ही जा सकती हैं। 

शुक्रवार, 18 जून 2021

मेरा गाँव मेरा देश – मौसम गर्मी का

गर्मी के साथ पहाड़ों में बदलता जीवन का मिजाज

मैदानों में जहाँ मार्च-अप्रैल में बसन्त के बाद गर्मी के मौसम की शुरुआत हो जाती है। वहीं पहाड़ों की हिमालयन ऊँचाई में, जंगलों में बुराँश के फूल झरने लगते हैं, पहाड़ों में जमीं बर्फ पिघलने लगती है, बगीचों में सेब-प्लम-नाशपाती व अन्य फलों की सेटिंग शुरु हो जाती है और इनके पेड़ों व टहनियों में हरी कौंपलें विकसित होकर एक ताजगी भरा हरियाली का आच्छादन शुरु करती हैं। मैदानों में इसी समय आम की बौर से फल लगना शुरु हो जाते हैं। मैदानों में कोयल की कूकू, तो पहाड़ों में कुप्पु चिड़िया के मधुर बोल वसन्त के समाप्न तथा गर्मी के मौसम के आगमन की सूचना देने लगते हैं।

मई माह में शुरु यह दौर जून-जुलाई तक चलता है, जिसके चरम पर मौनसून की फुआर के साथ कुछ राहत अवश्य मिलती है, हालाँकि इसके बाद सीलन भरी गर्मी का एक नया दौर चलता है। ये माह पहाड़ों में अपनी ही रंगत, विशेषता व चुनौती लिए होते हैं। अपने विगत पाँच दशकों के अनुभवों के प्रकाश में इनका लेखा जोखा यहाँ कर रहा हूँ, कि किस तरह से पहाड़ों में गर्मी का मिजाज बदला है और किस तरह के परिवर्तनों के साथ पहाड़ों का विकास गति पकड़ रहा है।

हमें याद है वर्ष 2010 से 2013 के बीच मई माह में शिमला में बिताए एक-एक माह के दो स्पैल (दौर), जब हम जैकेट पहने एडवांस स्टडीज के परिसर में विचरण करते रहे। पहाड़ी की चोटी पर भोजनालय में दोपहर के भोजन के बाद जब 1 बजे के लगभग मैस से बाहर निकलते तो दोपहरी की कुनकुनी धूप बहुत सुहानी लगती। सभी एशोसिऐट्स बाहर मैदान में खुली धूप का आनन्द लेते। अर्थात यहाँ मई माह में भरी दोपहरी में भी ठण्डक का अहसास रहता।

इससे पहले हमें याद हैं वर्ष 1991 में मानाली में मई-जून माह में बिताए वो यादगार पल, जब पर्वतारोहण करते हुए, कुछ ऐसे ही अहसास हुए थे। यहाँ इस मौसम में भी ठीक-ठाक ठण्ड का अहसास हुआ था और गुलाबा फोरेस्ट में तो पीछे ढलान पर बर्फ की मोटी चादर मिली थी, जिसपर हमलोग स्कीईंग का अभ्यास किए थे।

हमारे गाँव में भी मई माह में गर्मी नाममात्र की रहती है, बल्कि यह सबसे हरा-भरा माह रहता है। इसी तरह की हरियाली वरसात के बाद सितम्बर माह में रहती है। इस तरह घर में मई माह अमूनन खुशनुमा ही रहा। गर्मी की शुरुआत जून माह में होती रही, जो मोनसून की बरसात के साथ सिमट जाती। इस तरह मुश्किल से 3 से 4 सप्ताह ही गर्मी रहती। इस गर्मी में तापमान 38 डिग्री से नीचे ही रहता। इसके चरम को लोकपरम्परा में मीर्गसाड़ी कहा जाता है, जो 16 दिनों का कालखण्ड रहता है, जिसमें 8 दिन ज्येष्ठ माह के तो शेष 8 दिन आषाढ़ माह के रहते। इस वर्ष 2021 में 6 जून से 22 जून तक यह दौर चल रहा है। इस दौर के बारे में बुजुर्गों की लोकमान्यता रहती कि जो इन दिनों खुमानी की गिरि की चटनी (चौपा) के साथ माश के बड़े का सेवन करेगा, उसमें साँड को तक हराने की ताक्कत आ जाएगी। हालाँकि यह प्रयोग हम कभी पूरी तरह नहीं कर पाए। कोई प्रयोगधर्मी चाहे तो इसको आजमा सकता है।

इस गर्मी के दौर के बाद जून अंत तक मौनसून का आगमन हो जाता और इसके साथ जुलाई में तपती धरती का संताप बहुत कुछ शाँत होता, लेकिन बीच बीच में बारिश के बाद तेज धूप में नमी युक्त गर्मी के बीच दोपहरी का समय पर्याप्त तपस्या कराता, विशेषकर यदि इस समय खेत या बगीचे में श्रम करना हो या चढाई में पैदल चलना हो।

अधिक ऊँचाई और स्नो लाईन की नजदीकी के कारण मानाली साईड तो यह समय भी ठण्ड का ही रहता है। यहाँ पूरी गर्मी ठण्ड में ही बीत जाती है। पहाड़ों की ऊँचाईयों में तो यहाँ तक कि स्नोफाल के नजारे भी पेश होते रहते। हमें याद है मई-जून माह में ट्रेकिंग का दौर, जिसमें नग्गर के पीछे पहाड़ों की चोटी पर चंद्रखणी पास में ट्रैकरों ने बर्फवारी का आनन्द लिया था और बर्फ के गलेशियर को पार करते हुए अपनी मंजिल तक पहुँचे थे।

जून में गर्मी के दिनों में भी यदि एक-दो दिन लगातार बारिश होती तो फिर ठण्ड पड़ जाती, क्योंकि नजदीक की पीर-पंजाल व शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं में बर्फवारी हो जाती। इस तरह गर्मी का मौसम कुछ सप्ताह तक सिमट जाता। हालाँकि बारिश न होने के कारण और लगातार सूखे के कारण हमनें बचपन में दो माह तक गर्मियों के दौर को भी देखा है, जब मक्की की छोटी पौध दिन में मुरझा जाती।

यदि फसलों (क्रॉपिंग पैटर्न) की बात करें, तो हमें याद है कि पहले गर्मी में जौ व गैंहूं की फसल तैयार होती। फलों में चैरी, खुमानी, पलम, नाशपती, आढ़ू सेब आदि फल एक-एक कर तैयार होते। जापानी व अखरोट का नम्बर इनके बाद आता। सब्जियों में पहले मटर, टमाटर, मूली, शल्जम आदि उगाए जाते। फिर बंद गोभी, फूल गोभी, शिमला मिर्च आदि का चलन शुरु हुआ और आज आईसवर्ग, ब्रौक्ली, स्पाईनेच, लिफी(लैट्यूस) जैसी इग्जोटिक सब्जियों को उगाया जा रहा है। इनको नकदी फसल के रुप में तैयार किए जाने का चलन बढ़ा है।

ये मौसमी सब्जियाँ यहाँ से पंजाब, राजस्थान जैसे मैदानी राज्यों में निर्यात होती हैं, जहाँ गर्मी के कारण इनका उत्पादन कठिन होता है और वहां से अन्न का आयात हमारे इलाके में होता है। क्योंकि हमारे इलाकों में अन्न उत्पादन का रिवाज समाप्त प्रायः हो चला है, क्योंकि अन्न से अधिक यहाँ फल व सब्जी की पैदावार होती है व किसानों को इसका उचित आर्थिक लाभ मिलता है। इस क्षेत्र में जितनी आमदनी पारम्परिक अन्न व दाल आदि से होती है, उससे चार गुणा दाम पारम्परिक सब्जियों से होता है और इग्जोटिक सब्जियाँ इससे भी अधिक लाभ देती हैं। वहीं फलों का उत्पादन सब्जियों से भी अधिक लाभदायक रहता है, हालाँकि इनके पेड़ को पूरी फसल देने में कुछ वर्ष लग जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अब किसानों ने अन्न उगाना बंद प्रायः कर दिया है तथा यहाँ बागवानी का चलन पिछले दो-तीन दशकों में तेजी से बढ़ा है और यह गर्मी में ही शुरु हो जाता है। सेब प्लम आदि की अर्ली वैरायटी जून में तैयार हो जाती हैं, हालाँकि इसकी पूरी फसल जुलाई-अगस्त में तैयार होती है।

जून माह में ही जुलाई की बरसात से पहले धान की बुआई, जिसे हम रुहणी कहते – एक अहम खेती का सीजन रहता, जिसका हम बचपन में बड़ी बेसब्री से इंतजार करते। हमारे लिए इसमें भाग लेना किसी उत्सव से कम नहीं होता था। काईस नाला से पानी के झल्कों (फल्ड इरिगेशन का किसानों की पारी के हिसाब से नियंत्रित प्रवाह) के साथ काईस सेरी में धान के खेतों की सिंचाई होती। घर के बड़े बुजुर्ग पुरुष जहाँ बैलों की जोडियों के साथ रोपे को जोतते, मिट्टी को समतल व मुलायम करते, हम लोग धान की पनीरी को बंड़ल में बाँधकर दूर से फैंकते और महिलाएं गीत गाते हुए पूरे आनन्द के साथ धान की पौध की रुपाई करती। खेत की मेड़ पर माष जैसी दालों के बीज बोए जाते, जो बाद में पकने पर दाल की उम्दा फसल देते।

गाँव भर की महिलाएं धान की रुपाई (रुहणी) में सहयोग करती। सहकारिता के आधार पर हर घर के खेतों में धान की रुपाई होती। दोपहर को बीच में थकने पर पतोहरी (दोपहर का भोजन) होती, जिसे घरों से किल्टों (जंगली वाँस की लम्बी पिट्ठू टोकरी) में नाना-प्रकार के बर्तनों में पैक कर ले जाया जाता। इसकी सुखद यादें जेहन में एक दर्दभरा रोमाँच पैदा करती हैं। आज इन रुहणियों के नायक कई बढ़े-बुजुर्ग पात्र घर में नहीं हैं, इस संसार से विदाई ले चुके हैं, लेकिन उनके साथ विताए रुहणी के पल चिर स्मृतियों में गहरे अंकित हैं। समय के फेर में हालाँकि रुहणी का चलन आज बिलुप्ति की कगार पर है, मात्र 5 से 10 प्रतिशत खेतों में ऐसा कुछ चलन शेष बचा है, लेकिन गर्मी का मौसम इसकी यादों को ताजा तो कर ही देता है।

गाँव-घर में गर्मियाँ की छुट्टियाँ भी 10 जुन से पड़ती, जो लगभग डेढ़-दो माह की रहती। ये अगस्त तक चलती। हालाँकि अब इन छुट्टियों के घटाकर क्रमशः कम कर दिया गया है, जो अभी महज 3 सप्ताह की रहती हैं। शेष छुट्टियों के सर्दी में देने का चलन शुरु हुआ है। इस दौरान जंगल में गाय व भेड़-बकरियों को चराने की ड्यूटी रहती। साथ में एक बैग में स्कूल का होम वर्क भी साथ रहता। मई, जून में ही गैर दूधारु पशुओं को जंगल में छोड़ने का चलन रहता, जिनकी फिर अक्टूबर में बापिसी होती। इनको छोड़ते समय एक-आध रात जंगल में बिताने का संयोग बनता, जिसकी यादें आज भी भय मिश्रित रोमाँच का भाव जगाती हैं।

हालाँकि गर्मी का मौसम घर में बिताए लम्बा अर्सा हो चुका है, लेकिन स्मरण मात्र करने से ये पल अंतःकरण को गुदगुदाते हुए भावुक सा बनाते हैं और दर्दभरी सुखद स्मृतियों को जगाते हैं। शायद जन्मभूमि से दूर रह रहे हर इंसान के मन में कुछ ऐसे ही भावों को समंदर उमड़ता होगा, खासकर तब, जब लोकडॉउन के बीच लम्बे अन्तराल से वहाँ जाने का संयोग न बन पा रहा हो।

रविवार, 24 जनवरी 2021

शिमला के ट्रेकिंग ट्रेल्ज एवं दर्शनीय स्थल

 


हिमाचल प्रदेश की राजधानी के साथ शिमला का हिल स्टेशन के रुप में सदा से एक विशेष स्थान रहा है। हालाँकि बढ़ती आबादी, मौसम की पलटवार और गर्मियों में पानी की कमी के चलते यहाँ नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन प्रकृति एवं रोमाँच प्रेमियों के लिए इस हिल स्टेशन में बहुत कुछ है, जो इसके भीड़ भरे बाजारों से दूर एक अलग दुनियाँ की सैर साबित होता है। यहाँ पर ऐसे ही कम प्रचलित ऑफ-बीट किंतु दर्शनीय स्थलों की चर्चा की जा रही है।

        जब अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर इस इलाके से 1815 के आसपास गुजरे थे, तो देवदार से घिरे इस स्थल को देखकर उन्हें इँग्लैंड-स्कॉटलैंड के अपनी ठण्डी आवोहवा वाले क्षेत्रीय पहाड़ों की याद आई थी। और इसे अपने आवास स्थल के रुप में विकसित करने की योजना बनी। तब यहाँ चोटी पर मात्र जाखू मंदिर था और आस पास कुछ बस्तियाँ।सन 1830 तक यहाँ 50 घर आबाद हो चुके थे और आबादी मुश्किल से 600 से 800 की थी।धीरे-धीरे यह एक हिल स्टेशन और गर्मियों में समर केपिटल के नाम से प्रख्यात हुई। उस समय श्यामला माता (काली माता) के मंदिर के रुप में इस इलाके का नाम शिमला पड़ा। आज काली बाड़ी के रुप में इसके दर्शन रिज से थोड़ा नीचे किए जा सकते हैं, जहाँ से शिमला की घाटियों व सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं का विहंगावलोकन किया जा सकता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा भी दर्शनीय रहता है।


ब्रिटिश काल में वायसराय के रहने के लिए शिमला की एक पहाड़ी पर वायसराय लॉज का निर्माण हआ, जिसमें सबसे पहले पानी व बिजली की व्यवस्था 1888 तक हो जाती है। इसे बाद में राष्ट्रपति भवन और आज भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS-इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी) के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उस समय के स्थापित प्रख्यात समारक भवन हैं– कैनेडी हाउस,(ओवरोय) सेसिल होटल,विधान सभा भवन, शिमला रेल्वे बोर्ड बिल्डिंगआदि। रिज के पास चर्च, गेयटी थिएटर, स्केंडल प्वाइंट, टाउन हॉल,जनरल पोस्ट ऑफिस आदि भवन एवं स्थल अंग्रेजों की विरासत की याद दिलाते हैं। राह में नीचे घाटी की तली में अन्नाडेल ग्राउण्ड भी इसका एक समारक है, जिसकी देखभाल अभी सेना कर रही है। इसी दौर मेंसन 1898 में 102 सुरंगों तथा 18 स्टेशनों के साथ भारत का ऐतिहासिक पहाडी नेरो गेज रेल्वे ट्रेक बनता है, जो आज सांस्कृतिक धरोहर के रुप में यूनेस्को हेरिटेज साइट में शामिल है।काल्का से शिमला तक पहाडियों के बीच लुका छिपी करता इसका सफर बेहद रोमाँचक और यादगार रहता है।

शिमला के दर्शनीय स्थलों में सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी पर जाखू मंदिर स्थित है, जिसके दर्शन शिमला के लगभग हर कौने से किए जा सकते हैं। रिज व माल रोड़ से तो इसके दर्शन एक दम प्रत्यक्ष ही रहते हैं। देवदार के गंगनचूम्बी वृक्षों से भी उँचे108 फीट ऊँचे हनुमानजी जैसे अपनी विराट उपस्थिति के साथ सबको अनुग्रहित करते प्रतीत होते हैं।



रिज से यहाँ तक पैदल भी जाया जा सकता है और टेक्सी से भी। शिमला के प्रवेश द्वार पर दायीं ओर संकटमोचन मंदिर है, जिसे उत्तर भारत के प्रख्यात हनुमान भक्त एवं महान संत नीम करौरी बाबा के आशीर्वाद स्वरुप बनाया गया था। शिमला के उस पार तारा देवी हिल्ज पर माता तारा देवी मंदिर भी अपनी उपस्थिति से श्रद्धालुओं को श्रद्धानत करता है, जिसका नजारा रात को टिमटिमाती रोशनी में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है।

बस से सीधा इसके प्राँगण तक शोघी से होकर जाया जा सकता है, लेकिन तारा देवी तक सीधे संकटमोचन मंदिर के पास से पैदल ट्रेकिंग मार्ग भी है। तारा देवी मंदिर से सामने अलग अलग दिशाओं में कसौली, चैयल तथा शिमला की पहाडियों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। हर रविवार को यहाँ वृहद भण्डारा लगता है, जिसमें स्वादिष्ट भोजन-प्रसाद का आनन्द लिया जा सकता है। प्रायः लोग तारा देवी से बापसी में नीचे उतर कर प्राचीन शिव मंदिर आते हैं, जो तारा देवी से महज 1-2 किमी नीचे बाँज के घने जंगल में एकाँत-शांत जगह पर स्थित है। यहाँशीतल जल का चश्मा इसके परिसर में है तथा साथ ही पास अखण्ड धुनी जलती रहती है, जहाँ कुछ पल गहन चिंतन-मनन एवं आंतरिक शांति-सुकून के बिताए जा सकते हैं। यहां से सीधे जंगल से होकर 4-5 किमी लम्बा ट्रेकिंग मार्ग सीधा संकट मोचन के पास मुख्य मार्ग तक आता है। रास्ता घने बांज, देवदार, चीड़ के वनों से होकर गुजरता है। बीहड़ रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है, अतः ग्रुप में ही इस मार्ग की ट्रेकिंग उचित रहती है।

शिमला विश्वविद्यालय का परिसर भी एक पहाड़ी के ऊपर बसा है, जहाँ बस अड्डे से बसें चलती रहती हैं। एडवांस्ड स्टडी से होकर भी यहाँ तक पैदल आया जा सकता है। इसका पक्का रास्ता देवदार, बाँज और बुराँश के घने जंगल से होकर गुजरता है, जिसमें पैदल या वाहन में सफर काफी रोमाँचक रहता है। सड़क के नीचे समानान्तर रेल्वे ट्रैक है, जिसमें छुकछुक करपहाड़ी की ओट में लुकाछिपी करती रेल का नजारा दर्शनीय रहता है, जो कभी जंगल के बीच सुरंग में गायब हो जाती है, तो कभी अगली सुरंग में प्रकट हो जाती है। विश्वविद्याल के आगे एक छोर पर पीटर हिल्ज पड़ती है। इस एकांत स्थल पर एक रेस्टोरेंट भी है, यहाँ ट्रेकिंग व नाइट हाल्ट आदि की व्यवस्था है। इस छोर से नीचे घाटी के दर्शन भी अवलोकनीय रहते हैं।

यूनिवर्सिटी के नीचे सम्मर हिल रेल्वे स्टेशन है। जहाँ से पैदल ट्रेकिंग करते हुए बालुगंज पहुँचा जा सकता है। देवदार की छाया में बने पैदल रास्तों में शीतल जल की बाबडियाँ पड़ती हैं, जिनके साथ एक दो जगह शिव व शक्ति के मंदिर भी हैं। गर्मियों के जल संकट में शिमला के वन्यप्रदेश में फैली ऐसी बाबड़ियाँ निवासियों के लिए पर्याप्त राहत देती हैं। मुख्य मार्ग पर बालुगंज में जलेबी व पकौड़े का लुत्फ उठाया जा सकता है। यहीं से सीधे ऊपर कामना देवी मंदिर का रास्ता जाता है। लगभग 2 किमी पैदल ट्रेकिंग करते हुए यहाँ पहुंचा जा सकता है। रास्ते में कुछ सरकारी मकान हैं, तो कुछएडवांस्ड स्टडी के क्वार्टर भी। लेकिन पहाड़ी के ऊपर सिर्फ मंदिर पड़ता है, जहाँ से एक ओर शिमला का नजारा तो दूसरी ओर सोलन साइड की घाटियाँ व पहाड़ियों का अवलोकन किया जा सकता है।

बालुगंज से पुराना बस अड्डा होते हुए शिमला के दूसरे छोर पर पडती है पंथा घाटी, जो शिमला का ही विस्तार है। यहाँ से नीचे 4-5 किमी की दूरी पर एपीजी शिमला युनिवर्सिटी का कैंप्स है, जिसके बारे में यहाँ से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। यहीं से सड़क तारा देवी हिल की परिक्रमा करते हुए शोघी पहुँचती है, जिसे वाइपास रोड के रुप  में विकसित किया गया है। फलों के सीजन में अप्पर शिमला के फलों से लदे ट्रक प्रायः इसी रुट से चण्डीगढ़ व दिल्ली की सब्जी मंडियों तक जाते हैं।

पंथा घाटी से ही पहाड़ी के दक्षिण ओर साइँ मंदिर (पुजारली) का रास्ता जाता है, जिसे शिमला का छिपा हुआ नगीना कहा जा सकता है। एकाँत स्थल पर बसे इस पाँच मंजिले मंदिर के सामने बहुत बड़ा मैदान है, जहाँ से उस पार कुफरी, जुन्गा व चैयल की पहाडियों के दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ पर भी सनसेट का नजारा अलौकिक सौंदर्य़ लिए रहता है, जिसके प्रकाश में तारा देवी की पहाड़ियां विशेष रुप से आलोकित दिखती हैं।

फिर शिमला में खरीददारी के शौकीनों के लिए मालरोड़ और लक्कड़ बाजार में बेहतरीन व्यवस्था है। यहाँ हर तरह के सामान, पहाड़ी गिफ्ट मिलते हैं। साथ ही शिमला के आसपास उगने वाले मौसमी फल भी एक छोर पर सजे मिलेंगे। यहाँ का कॉफी हाउस मशहूर है। रिज पर आशियाना रेस्टोरेंट कैंडल लाइट डिन्नर के लिए सर्वथा उपयुक्त रहता है। बाकि रिज व लक्कड़ बाजार के आसपास स्ट्रीट फुड़ का स्वाद भी लिया जा सकता है। ड्राई फ्रूट्स व स्थानीय हैंडिक्राफ्ट की बेहतरीन दुकानें यहाँ मिल जाएंगी, जहाँ से कुछ यादगार गिफ्ट खरीदे जा सकते हैं। भुट्टिको बुनकरों के केंद्र सेअपने मनमाफिक पहाड़ी शाल, टोपी, मफ्फलर आदि उत्पाद देखे जा सकते हैं। लक्कड़ बाजार के नीचे देश का एकमात्र ऑपन-एअरस्केटिंग रिंक स्थित है, जहाँ सर्दियों में जमीं बर्फ पर कुछ शुल्क के साथआइस-स्केटिंग का आनन्द लिया जा सकता है।


रिज के मैदान को शिमला में शाम की चहल-पहल का केंद्र माना जा सकता है, जो पर्यटकों के बीच भी खासा लोकप्रिय रहता है। यहाँ बच्चों-बुढ़ों की घुड़सवारी, ऐतिहासिक समारकों की पृष्ठभूमि में यादगार फोटोग्राफी के नजारे सर्वसुलभ रहते हैं। रिज के पूर्व में ऊँचाई पर स्टेज है, जो ऐतिहासिक संबोधनों का साक्षी रहा है और प्राँत के बड़े आयोजन इसी रिज पर होते हैं। रिज के एक और इंदिरा गाँधी की प्रतिमा है तो दूसरी ओर डॉ. यशवन्त सिंह परमार की। मालूम हो कि डॉ. यशवन्त परमार हिंप्र के पहले मुख्यमंत्री रहे, जिनके कुशल एवं दूरदर्शी नेतृत्व के कारण उन्हें हिमाचल का निर्माता माना जाता है। हिमाचल को एक विकसित पहाड़ी राज्य के रुप में खड़ा करने में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

रिज के नीचे ही पानी के वृहद टैंक मौजूद हैं, जिनसे शिमला शहर के लिए पानी सप्लाई होता है। रिज के नीचे गेयटी थिएटर के सामने ही यहाँ का लेटेस्ट  पुस्तकों से समृद्ध मिनेरवा बुक हाऊस है, जहाँ पर पुस्तक प्रेमी अपने पसंद की पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं। इसी तरह लोअर बाजार में बंसल बुक डिपो, ज्ञान भण्डार तथा लक्कड़ बाजार में स्टुडेंट स्टोर आदि पुस्तक केंद्र हैं। पुस्तक प्रेमियों के लिए रिज पर चर्च के सामने स्टेट लाइब्रेरी की भी व्यवस्था है।

माल रोड़ से नीचे लोअर बाजार से होते हुए एक दम नीचे पुराना बस अड्डा पड़ता है, जहाँ से नए बस अड्डा आईएसबीटी टुटी कण्डी लिए कुछ मिनट परबसें चलती रहती हैं।


यहाँ से अपने गन्तव्य के लिए ऑर्डिनरी से लेकर डिलक्स, ऐसी, एवं वोल्बो बसें ली जा सकती हैं। हिमाचल परिवहन की ऑनलाइन बुकिंग  की सुबिधा का भी घर बैठे लाभ लिया जा सकता है। रेल्वे सफर के लिए सम्मर हिल या पुराने बस अड्डे के पास के मुख्य रेल्वे स्टेशन से चढ़कर काल्का तक रेल यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा जुब्बड़हट्टी में है, जो शिमला से 22 किमी की दूरी पर है।

इस तरह दो-तीन दिनों में शिमला के मुख्य स्थलों की सैर की जा सकती है। सामान्य यात्रियों के लिए मार्च से जून तथा सितम्बर से नवम्बर माह उपयुक्त माने जाते हैं। गर्मियों में हालाँकि भीड़ अधिक रहती है, लेकिन शिमला का असली आनन्द तो बरसात में रहता है। अगस्त के माह में जब आसमान बादलों से घिरे रहते हैं, तो एक पहाड़ी से दूसरी पहाडी की ओर इसके फाहों के बीच सफर मनमोहक रहता है। कभी ये बादल पूरी तरह से यात्रियों को अपने आगोश में ले लेते हैं तो कभी पूरी घाटी इनसे पट जाती है। पहाडों की चोटी से इनका नजारा पैसा बसूल ट्रिप साबित होता है। हालाँकि बर्फ के शौकीनों के लिए सर्दी भी कम रोमाँचक नहीं रहती।लेखकों, विचारकों एवं कवियों के लिए शिमला सृजन की ऊर्बर भूमि साबित होती है और कई लेखक तो यहाँ इसी उद्देश्य से डेरा जमाए रहते हैं।

यदि समय हो तो शिमला के आसपास घूमने के कई दर्शनीय स्थल हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश के साथ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक विशेषताओं से भी रुबरु हुआ जा सकता है। इसके लिए आप पढ़ सकते हैं, शिमला के आस-पास के दर्शनीय स्थल।