मंगलवार, 29 मार्च 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-2

राधा स्वामी सत्संग डेरा ब्यास

अंतिम दिन दो विकल्प थे– वाघा बोर्डर और डेरा व्यास। ट्रेन शाम को थी। अभी कुछ घंटे थे। विकल्प डेरा व्यास को चुना। इसके वारे में भी बहुत कुछ सुना रखा था। बस स्टैंड से सीधा बस व्यास के लिए मिल चुकी थी। 40 किमी यहां से। रास्ते में हरे भरे खेतों व कुछ गांव कस्वों को पार करती हुई बस हमें मुख्य मार्ग में छोड़ चुकी थी। यहाँ से कुछ दूरी पर व्यास रेल्बे स्टेशन तक पैदल पहुँचे। स्टेशन पर सेमल का वृहद वृक्ष इतिहास की गवाही दे रहा था। स्टेशन के पुल को पार करते ही हम उस पार बस स्टेंड पर थे। कुछ ही मिनट में बस आ चुकी थी। बस कुछ देर में खुलने बाली थी। इस दौरान स्टेशन की हरियाली, स्वच्छता और शांति को अनुभव करते रहे। इतना साफ स्टेशन पहली बार देख रहे थे। बस के गेट खुल चुके थे। हम पीछे कंडक्टर के पास ही बैठ गए। कंडक्टर डेरे का ही सेवादार था। सवारियों का भावपूर्ण बिठाते हुए, इनके मुख से कुछ सतसंग के स्वर भी फूट रहे थे। जिनमें दो बातें हमें महत्वपूर्ण लगीं, बिन गुरु जीवन का वेड़ा पार नहीं हो सकता और बिन बुलाए कोई यहाँ आ नहीं सकता।
बस भरते ही चल पड़ी। रास्ते में हरे भरे गैंहूं के खेत, बौर से लदे आम के बगीचे एक सुंदर दृश्यावली को सृजन कर रहा था। कुछ ही मिनट में हम डेरे के मुख्य द्वार को पार कर चुके थे। मार्ग के दायीं और पार्किंग की वृहद व्यवस्था चकित करने वाली थी, शायद हजारों बाहन एक साथ यहाँ खड़े हो सकते होंगे। इसके अंतिम छोर पर हम बस स्टैंड पहुंच चुके थे। हल्की बारिश हो रही थी। आश्रम में प्रवेश करने के लिए मोबाइल कैमरा आदि बाहर ही जमा करना अनिवार्य है। अतः इस तकनीकी बोझे को बाहर ही छोड़कर हल्का होकर अंदर प्रवेश किए। हालाँकि रास्ते के सुंदर दृश्यों को कैमरे में कैद करने और मोवाइल में झांकने की आदत कुछ देर जरुर परेशान की। पहली बार लगा कि बिना मोबाइल किस तरह से जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है, जिसके बिना एक खालीपन सा कचोटने लगता है। 
अंदर पूछ ताछ कक्ष से आगे की जानकारी मिली। आश्रम का विस्तार कई 7 किमी की लम्बाई में है, सो पैदल तो इसे देखना सम्भव नहीं था। अंदर रिक्शा व कैव खड़े थे। दोपहर के दो बज चुके थे। स्थानीय परिजनों के सुझाव पर रिक्शा को चुना और लंगर की ओर चल पड़े। रास्ते में सफेद फूलों से लदे बागुकोशाव नाशपाती के बगीचे, आगे हवामहल और रास्ते के दोनों ओर की हरियाली प्रकृति की गोद में आने का सुखद अहसास दे रही थी। कुछ मिनटों के बाद रिक्शा रुक गया, उतर कर हम कुछ दूर पैदल चलते हुए लंगर स्थल पहुँचे। बहुत बड़ी छत के नीचे वृहद लंगर स्थल दिखा। पता चला यहाँ एक समय में 80,000 लोग भोजन कर सकते हैं। बाहर किनारे में प्लेट, गिलास आदि लेकर लंगर में बैठ गए। स्वादिष्ट पसादा लेकर पेट पूजा की। इसके बाद मौसम की ठंड़क को देखते हुए गिलास भरकर गर्म चाय ली। यहाँ बैठकर चाय की चुस्की के साथ भीड़ को देखकर कई विचार जेहन में कौंधते रहे। यहां युवा, महिलाएं, प्रौढ़, वृद्ध हर वर्ग के लोग दर्शनार्थी भीड़ का हिस्सा दिखे, लेकिन एक स्व अनुशासन दिख रहा था। लगा वातावरण का कितना असर हो सकता है। 
गिलास आदि धोकर वाहर निकले। रास्ते में एक युवक हमें मिला। हमें बैग टाँगे हुए उसकी जिज्ञासा थी कि हम कोई अजनवी बाहर से आए हैं। जल्दी ही हमारा परिचय हो गया। समयाभाव के कारण हमारे लिए सबकुछ देखना तो सम्भव न था, हमारा मुख्य मकसद यहाँ के साहित्य स्टाल तक पहुँचना था और इस आध्यात्मिक संस्था को जानने के भाव से कुछ मूल साहित्य खरीदना था। हमारी प्राथमिकता को देखते हुए वह उस ओर गाईड के रुप में साथ चलते रहे। रास्ते में डेरे के इतिहास व शिक्षाओं को सार संक्षेप से हमें परिचित कराते रहे।

यहाँ की साधना पद्वति में कर्मकाण्ड से मुक्त रखा गया है। सुमिरन, भजन प्रमुख आंतरिक साधन हैं और प्रेम व सेवा वाह्य साधन। यहाँ आश्रम की देखभाल सेवादार करते हैं, कोई नौकर नहीं है। छोटे बड़े काम का कोई भेद नहीं है। डेरा प्रमुखखुद को सबसे छोटा सेवादार मानते हैं। यहाँ परिसर के कूढ़े को गाढियों में लादते युवाओं को देखा, पता चला ये सेवाधारी हैं। आगे सड़क बन रही थी, यहाँ भी सेवादार सेवा दे रहे थे। आगे कैंटीन में भी सेवादारों को देखा। रास्ते में बज्री के पहाड़ों को देखा, जिनको सेवादार कूट कूट कर तैयार कर रहे थे। यहाँ की सारी सड़कें इंटे इन्हीं द्वारा तैयार की जाती हैं।

शीघ्र ही हम लाइब्रेरी में थे। एक बहुत बड़े हाल में यहाँ तमाम पत्र पत्रिकाएं रखी गयी हैं। एक सचित्र मोटी सी किताव हाथ लगी। 15-20 मिनट में इनके पेज पलटते हुए यहाँ के इतिहास से मोटा सा परिचय मिलता गया। समझ में आया कि इस युग में परिवार-गृहस्थी के बीच में आध्यात्मिक जीवन अधिक व्यवहारिक और प्रभावशाली हो सकता है। 

आश्रम व्यास नदी के किनारे है। हालाँकि अभी व्यास नदी यहां से काफी दूर जा चुकी हैं।कुल मिलाकर यहाँ संत परम्परा की एक अभिनव कढ़ी को सामूहिक मानव चेतना को उच्चतर आयाम तक पहुँचाने के प्रयोग को देखकर बहुत अच्छा लगा। आज के स्वार्थ, अहंकार से भरे मार काट बाले युग में खुद को गला ढलाकर कर गुरु, ईश्वर के पथ पर बढ़ाने के संत मार्ग को देखकर, सुखद अनुभूति हुई कि इंसानियत जिंदा है। मानवता का उज्जवल भविष्य ऐसे ही सम्मिलित प्रयासों का सत्परिणाम हो सकता है।


यहाँ से आटो में व्यास रेल्बे स्टेशन आए और ट्रेन से अमृतसर पहुँचे। जहाँ दून-अमृतसर एक्सप्रैस में बैठकर अपने गन्तव्य की ओर बापिस चल दिए। गोल्डन टेंपल और डेरा व्यास की स्वर्णिम और रुहानी यादों के साथ सुवह 8 बजे हरिद्वार पहुँचे। (समाप्त)
 
यात्रा का पहला खण्ड आप नीचे दिए लिंग में पढ़ सकते हैं -