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गुरुवार, 31 मार्च 2022

गल्तियों से सीखें व बढ़ते रहें मंजिल की ओर...

 असीम धैर्य, अनवरत प्रयास

कहते हैं कि इंसान गल्तियों का पुतला है। अतः आश्चर्य़ नहीं कि गल्तियाँ इंसान से ही होती हैं। यदि उससे गल्तियाँ नहीं हो रही हैं, तो मानकर चलें कि या तो वह भगवान है या फिर पत्थर, पौध या जड़ इंसान। लेकिन इंसान अभी इन दो चरम छोर के बीच की कढ़ी है। विकास यात्रा में वह वृक्ष-वनस्पति व पशु से आगे मानव योनि की संक्रमणशील अवस्था में है, जहाँ वह एक ओर पशुता, पैशाचिकता के निम्न स्तर तक गिर सकता है, तो दूसरी ओर महामानव, देवमानव भी बन सकता है, यहाँ तक कि भगवान जैसी पूर्ण अवस्था को तक पा सकता है।

लेकिन सामान्य इंसानी जीवन इन सभी संभावनाओं व यथार्थ का मिलाजुला स्वरुप है और फिर उसकी विकास यात्रा बहुत कुछ उसके चित्त में निहित संस्कारों द्वारा संचालित है, जो आदतों के रुप में व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करती है। इसी चित्त को मनोविज्ञान की भाषा में अवचेतन व अचेतन मन कहा जाता है, जो वैज्ञानिकों के अनुसार 90-95 फीसदी सुप्तावस्था में है। साथ ही व्यक्ति के जीवन की असीम संभावनाएं चित्त के इस जखीरे में समाहित हैं, जिसमें जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कार बीज रुप में मौजूद हैं। व्यक्तित्व का इतना बड़ा हिस्सा अचेतन से संचालित होने के कारण बहुत कुछ उसके नियन्त्रण में नहीं है। यही अचेतन गल्तियोँ का जन्मस्थल है, जिनके कारण व्यक्ति तमाम सजगता के बावजूद कुछ पल बेहोशी में जीने के लिए विवश-बाध्य अनुभव करता है।

इसलिए इंसान से यदि कोई गलती हो जाती है तो कोई बड़ी बात नहीं। यह उसकी आंतरिक संचरना में मौलिक त्रुटि होने के कारण एक स्वाभाविक सी चीज है। इसको लेकर बहुत अधिक गंभीर होने, बहुत चिंता व निराशा-हताशा के अंधेरे में डुबने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता, मन की प्रकृति को समझने की है, अपनी यथास्थिति के सम्यक मूल्याँकन की है तथा गलती के मूल तक जाने की है। इसको समझकर फिर इसके परिमार्जन के लिए ईमानदार प्रयास, बस इतना ही व्यक्ति के हाथ में है। चित्त में जड़ जमाकर बैठे संस्कारों का परिमार्जन धीरे-धीरे सचेतन प्रयास के संग गति पकड़ता है। यह कोई दो-चार दिन या माह का कार्य नहीं, बल्कि जीवन पर्यन्त चलने वाला महापुरुषार्थ है, जो तब तक चलना है, जब तक कि इसकी जड़ों तक हम नहीं पहुँच पाते व इसके रुपाँतरण की चाबी हाथ नहीं लगती।

आश्चर्य नहीं कि जीवन के मर्मज्ञ ऋषि-मनीषियों ने स्वयं को गढ़ने व तराशने की प्रक्रिया को विश्व का सबसे कठिन कार्य बताया है। यह समय साध्य कार्य है, कठिन प्रयोजन है, लेकिन असंभव नहीं। अपनी गलतियों पर नियमित रुप से कार्य करते हुए, हर गलती से सबक लेते हुए, अगला कदम अधिक होशोहवाश के साथ उठाते हुए हम आत्म-सुधार व निर्माण की सचेतन प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं। क्रमिक रुप में व्यक्ति अपनी नैसर्गिक सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों से बाहर आता जाता है, इनसे ऊपर उठता है और एक दिन समझ आता है कि ये गल्तियाँ, ये असफलताएं उसकी मंजिल की आवश्यक सीढ़ियाँ थीं। निसंदेह रुप में यह बोध असीम धैर्य एवं अनवरत प्रयास के साथ फलित होता है।

अतः अपने ईमानदार प्रय़ास के बावजूद जीवन में होने वाली गल्तियों, भूल-चूकों को अपनी सीढ़ियाँ मानें, प्रगति पथ के आवश्यक सोपान मानें, जो मंजिल तक पहुँचाने में मदद करने वाली हैं। इन्हें अपना शिक्षक मानें, सच्चा मित्र-हितैषी मानें, जो अभीष्ट सत्य तक हमें पथ प्रदर्शित करने वाली हैं। इनको लेकर अनावश्यक तनाव, विक्षोभ, अपराध बोध व कुण्ठा पालने की आवश्यकता नहीं। ऐसा करने पर चित्त में गाँठें पड़ती हैं, जो मानसिक ऊर्जा को अवरुद्ध कर जीवन के सृजन, संतोष व प्रसन्नता के मार्ग को बाधित करती हैं। अतः समझदारी गल्तियों से सबक लेते हुए आगे बढ़ने की है, जिससे धीरे-धीरे इनकी आवृत्ति कम होती जाए व जीवन अधिक दक्षता के साथ पूर्णता की मंजिल तक पहुंच सके।

अपने साथ दूसरों की गल्तियों के प्रति भी ऐसा ही दिलेर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। अचेतन से संचालित इंसान के रुप में गल्तियाँ होनी तय हैं। उनको उदारतापूर्वक स्वीकार करें। उनको समझने व सुधारने का अवसर दें। ऐसे में परिवार, समूह या समाज में स्वाभाविक रुप में एक विश्वास, शांति एवं आत्मीयता का वातावरण बनेगा। परिवार व संस्था के सदस्यों की कार्यक्षमता समान्य से अधिक रहेगी, उनके व्यक्तित्व का भावनात्मक विकास अधिक गहराईयों से होगा तथा वे समाज के लिए अधिक उत्पादक होकर कार्य कर सकेंगे तथा उनका सृजनात्मक योगदान अधिक बेहतर होगा। जबकि एक दूसरे की छोटी-छोटी गल्तियों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण, कटु व्यवहार एवं असहिष्णु रवैया हर दृष्टि से घातक ही रहता है।

अतः गल्तियों के प्रति समझदारी भरा लचीला वर्ताव वाँछित रहता है, तभी इनका सही ढंग से सुधार हो पाता है। बिगड़ैल मन को बहुत समझदारी के साथ संभालना होता है, तभी यह काबू में आता है। निसंदेह रुप में गल्तियों का सही उपयोग एक कला है, एक विज्ञान है, जिसमें मन की प्रकृति को समझते हुए कार्य करना होता है। और किसी महापुरुष ने सही ही कहा है कि जीवन का निर्माण हजारों ठोकरें खाने के बाद होता है। अतः मार्ग की गल्तियों व अबरोधों को जीवन निर्माण की स्वभाविक प्रक्रिया मानते हुए, अपने निर्माण के कार्य में सजगता के साथ जुटे रहें, ताकि परिवार व समाज निर्माण के कार्य में हम सकारात्मक योगदान दे सकें।

याद रखें, गल्तियाँ जीवन में आगे बढ़ाने वाली शिक्षिकाएं हैं और असफलताएं सफलता की मंजिल की आवश्यक सीढ़ियाँ हैं। इनके प्रति सकारात्मक भाव रखते हुए पूरी चुस्ती एवं मुस्तैदी के साथ आगे बढ़ें। बाह्य सफलता एवं आंतरिक संतुष्टि व आनन्द के साथ गन्तव्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है। असीम धैर्य, अनन्त सजगता एवं सतत प्रयास का दाम थामे हम जीवन का हर पल इसकी पूर्णता में जीने का प्रय़ास करें।

बुधवार, 1 जुलाई 2015

आदर्शों का यह पथ रुमानी




जीवन में आदर्श को होना जरुरी है। आदर्श एक दिशासूचक का कार्य करता है, जो जीवन की नाव को संसार-सागर के बीच अनावश्यक वहकाव-भटकाव एवं दुर्घटनाओं से बचाता है। आदर्श क्या हो, एक शब्द में व्यक्त करना कठिन है। यह हर व्यक्ति की प्रकृति, रुचि-रुझान एवं स्वभाव के अनुरुप कुछ भी हो सकता है। सार इतना ही है कि आदर्श कुछ ऐसा हो, जिसे हम दिल से अनुभव कर सकें, जो हमारी रुह को गहराई से छू जाए, जो हमें जहाँ खड़े हैं वहाँ से आगे बढ़ने, ऊपर उठने के लिए प्रेरित कर सके। जो हमारी समूची चेतना को समेटकर सर्वांगीण विकास, चरमोत्कर्ष के जीवन ध्येय की ओर अग्रसर कर सके। आदर्श एक व्यक्ति भी हो सकता है, एक विचार-भाव भी और एक विशिष्ट कार्य भी।

अगर आदर्श का चयन हो गया और हम आदर्श पथ पर बढ़ चले, तो समझो आधा काम हो गया। फिर फर्क नहीं पड़ता की हम इस पर आज सफल होते हैं या कल, क्योंकि अब हम उस मार्ग पर अग्रसर हैं, जो हमें अपनी सारी सीमाओं के पार ले जाने वाला है। अब यह भी फर्क नहीं पड़ता कि आदर्श आज संभव होता है या कल। क्योंकि दीवानी रुत इस संभव-असंभव के गुणा-भाग में नहीं पड़ती। वह तो इसे हर पल, हर हाल में साकार करने की जिद्द पर अढ़ी रहती है और इसके निमित सचेष्ट प्रयास करती है और अपनी हिम्मत नहीं हारती।

अब यह भी फर्क नहीं पड़ता कि आदर्श इस जन्म में संभव होता है या फिर अगले जन्म में। क्योंकि आदर्श आब जीवन का ध्रुब लक्ष्य बन जाता है, जीवन का शाश्वत ध्येय, जिसके बिना जीवन की पूर्णता अधूरी दिखती है। इस हाल में जीवन की स्वाभाविक दुर्बलताएं, मानवीय सीमाएं भी गौण हो जाती हैं, क्योंकि आदर्शों की ओर बढ़ता हर ढग इन सीमाओं को चटका रहा होता है, दुर्बलताएं मार्ग में एक-एक कर तिरोहित हो रही होती हैं। इस भाव में आवेशित रुत अंधकार से प्रकाश, जड़ता से चैतन्यता और चैतन्यता से प्रकाश-शांति की ओर बढ़ रही होती है। पथिक का हर पग अपनी तमाम भूल-चूक व गल्तियों के बावजूद अपने बजूद के केंद्र की ओर कहें या अपनी चेतना के शिखर की ओर बढ़ रहा होता है। पथ के विचलन, फिसलन और अबरोध भी विजय अभियान की शोभा बनते हैं, और अपने प्रगति पथ में इनका सृजनात्मक उपयोग करना पथिक बखूबी जानता है। 

 

राह की तमाम विषमता, दुरुहता, कष्ट-पीड़ा, बिरोध, विकरालता के बावजूद रुह का अद्म्य भाव पथिक की संकल्प शिखा को प्रदीप्त रखता है। राह में रुहानियत से ईश्क का भाव पथिक के अस्तित्व को अपनी लपेट में ले लेता है। मानवीय सम्बन्ध इस लपट में पावनतम भावों से मंडित हो जाते हैं, राग-द्वेष के किनारे पीछे छूटने लगते हैं। स्वार्थ क्रमशः क्षीण होने लगता है, परमार्थ में स्वार्थ दिखने लगता है और यह धुन जोर पकड़ने लगती है कि अपनों को देकर भी और क्या दें। प्रतिदान की यहां अधिक आशा-अपेक्षा नहीं रहती।  

यहाँ इतना ही कहना है अपनों से, राह के साथी-सहचरों से कि शरीर की अपनी सीमाएं हैं, परिस्थितियों की अपनी मार हैं, मन की अपनी दुर्बलताएं, चित्त के अपने वृत्तियां-संस्कार हैं, लेकिन अपने बजूद के अंदर मौजूद आदर्शनिष्ठा, सत्य प्रेम, सृजनशीलता, इंसानी संवेदना की कालजयी सत्ता के समक्ष इन सबका कोई टिकाऊ आधार नहीं है। अतः अपने ह्दय का सारा साहस, उत्साह और लग्न को बटोर कर आदर्श पथ पर बढ़े चलें। इसके जाज्वाल्यमान स्वरुप के सामने अंधकार, संदेह, तमस के साय को बिगलित होेने दें। बस अपनी धुन का पक्का बनने की देर है, आदर्श की लग्न में मग्न होने की देर है, बाकि सब स्वतः ही क्रमशः अनुसरित होता चलेगा। अपनी अंतर्निहित शक्तियों में विश्वास रखें, अपने सपनों की सच्चाई में आस्था रखें, इनके मूर्त होते कल के सच को अपनी मन की आंखों से निहारें।




इतना समझ में आ जाए तो फिर शिखर की बुलंदियों को छूते, आसमां के अनन्त विस्तार को पार करते, दिव्यता को स्पर्श करते, शाश्वत की ओर उन्मुख सपनों की उड़ान भरने में कैसा संकोच, कैसी कंजूसी। अपनी दिल्ली तमन्ना, मौलिक प्रतिभा, नैसर्गिक रुझान के अनुरुप जीवन का महानतम्, उद्धाततम, भव्यतम, दिव्यतम आदर्श चुनने में कैसी झिझक, कैसा प्रमाद। इस प्रक्रिया में तथाकथ व्यवहारिक बुद्धि के बिरोध भरे स्वरों का सामना होगा, जो बार-बार रोकेगी, टोकेगी, चुग्ली करेगी और नसीयत देगी कि ऐसा तो संभव ही नहीं है क्योंकि ऐसा तो अभी तक हुआ ही नहीं है। इन व्यंग, उपेक्षा एवं कटाक्ष भरे चुनौतीपूर्ण स्वरों को अपनी मंजिल की सीढियां बना लें और अपने अरमानों की दिशा में बढ़े चलें।

विश्वास रखना, आज की ये उद्धात कल्पनाएं कल का मूर्त सच बनेंगी। यदि सूरज तक निशाना साधोगे, तो चांद तक तो पहुंच ही जाओगे। यदि माउंट एवरेस्ट तक जाने की ठानोगे, तो कई हिमशिखरों पर विचरण का आनन्द सहज ही हिस्से में आएगा। नहीं तो ऐ.सी. कमरों में बंद, बाहनों में ही सफर के लिए बाध्य-विवश बदनसीवों की संख्या भी कम नहीं है। छोटे मन से कभी बडे काम संभव नहीं हुए, बौने उद्देश्यों से कभी महान कार्य सिद्ध नहीं हुए। बढ़े कार्य हमेशी ही बड़ी सोच, बड़े दिल, बढ़ी कल्पना और साहसिक प्रयासों के परिणाम रहे हैं।



तो फिर देर किस बात की। अपने जीवन को मनमाफिक भव्यता, दिव्यता और पूर्णता की ओर ले चलने वाले दिल को संवेदित-आंदोलित करते, अंतर में रोमांच भरते आदर्श से भर लें। इन्हें जीवन की राह, पाथेय और मंजिल बना लें। अपनी रुचि, रुझान और ह्दय की पुकार के अनुरुप इस दिशा में बह चलें, बढ़ चलें। शुरुआत स्वाभाविक रुप में नदी के जल स्रोत की भांति नन्हीं सी हो सकती है, लेकिन सागर पर्यन्त आगे बढ़ने की इच्छा के अनुरुप राह का आवश्यक सहयोग, समर्थन एवं संसाधन अवश्य जुटेंगे, यह प्रकृति का अटल विधान है, सृष्टि का शाश्वत प्रावधान है। आवश्यकता बस अपने आदर्श के निर्धारण व इस दिशा में साहसिक कदम उठाने भर की है।


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