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मेरा गाँव मेरा देश - हिमालय की गोद में बचपन की यादों को कुरेदती एक यात्रा

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कुल्लू से रायसन वाया व्यासर-माछिंग बादलों के संग कुल्लू-मानाली घाटी का मनोरम दृश्य 2011 के नवम्बर माह में सर्दी का दौर शुरु हो चुका था। कितने वसन्त विताए होंगे , सामने पश्चिम की ओर की घाटी को घर से निहारते हुए। पर्वत शिखरों पर सुबह का स्वर्णिम सूर्योदय, फिर धीरे-धीरे धूप का पहाड़ की चोटी से घाटी में नीचे उतरना , घरों में लगे सीसों से टकराकर झिलमिलाना। फिर नीचे ब्यास नदी को छूकर हमारी घाटी में प्रवेश और धीरे-धीरे खेत-खलियान , बगीचों से होते हुए सूर्योदय का आलौकिक नजारा। पूर्व की ओर से पहाड़ियों के शिखर पर आसमान को छूते देवदार के वृक्षों के पीछे से सूर्य भगवान का प्रकट होकर पूरी घाटी को अपने आगोश में लेना। सामने पहाड़ की गोद में बसी घाटी को बचपन से निहारते आए थे , हर मौसम में इसके अलग-अलग रुप-रंग , मिजाज व स्वरुप को देख चुके थे , लेकिन सब दूर से , घाटी के इस ओर से। चाहते हुए भी संयोग नहीं बन पाया था उस पार जाने का। मन था कि कभी उस पार गाँवों को पार करते हुए उस पहाड़ी के शिखर तक जाएंगे , वहाँ से चारों ओर क्या नजारा रहता है , इस रहस्य को निहारेंगे। लेकिन यह सब खुआब ही बना रहा। तब उस पार