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शनिवार, 25 जनवरी 2020

स्वागत 2020 – निर्णायक दशक का यह प्रवेश द्वार



परिवर्तन के ये पल निर्णायक महान
2020 नहीं महज वर्ष नया,
निर्णायक दशक का यह प्रवेश द्वार,
तीव्र से तीव्रतम हो चुका काल चक्र परिवर्तन का,
महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, ऐतिहासिक महान।।
शुरुआती हफ्तों में ही मिल चुके ट्रेलर कई,
न रहें काल के तेवर से अनजान,
सभी कुछ निर्णायक दौर से गुजर रहा,
जड़ता, प्रतिगामिता नहीं अब काल को स्वीकार।।

 न भूलें सत्य, ईमान और विधान ईश्वर का, 
नवयुग की चौखट पर खड़ा इंसान,
देवासुर संग्राम के पेश होंगे लोमहर्षक नजारे,
कुछ रहेगा आधा-अधूरा, होगा सब आर-पार।।


धड़ाशयी होंगे दर्प-दंभ, झूठ के किले मायावी,  
नवसृजन का यह प्रवेश द्वार,
जनता की अदालत में होंगे निर्णय ऐतिहासिक,
 धर्मयुद्ध के युगान्तरीय पल दुर्घर्ष-रोमाँचक-विकराल।।

 अग्नि परीक्षाओं की आएंगी घड़ियाँ अनगिन,
 गुजरेंगे जिनसे हर राष्ट्र, समाज और इंसान,
2020 नहीं महज वर्ष नया,
निर्णायक दशक का यह प्रवेश द्वार।।

 महाकाल के हाथोंं स्वयं कमान युग की,

नवयुग की चौखट पर खड़ा इंसान,
परिवर्तन के ये पल ऐतिहासिक रोमाँचक,
स्वागत के लिए हम कितना हैं तैयार।।

शनिवार, 12 अक्तूबर 2019

दौर-ए-ठहराव जिंदगी का


लगे जब जिंदगी बन गई खेल-तमाशा
यह भी गजब कारवाँ जिंदगी का,
जहाँ से चले थे, आज वहीं खडा पा रहे।।

चले थे आदर्शों के शिखर नापने,
घाटी, कंदरा, बीहड़ व्यावन पार करते-करते,
छोटे-मोटे शिखरों को नापते,
यह क्या, आज वहीं खड़े, जहाँ से थे चल पड़े।।

मिला साथ, कारवाँ बनता गया,
लेकिन सबकी अपनी-2 मंजिल, अपना-2 रास्ता,
साथ चलते-चलते कितने बिछुड़ते गए,
यह क्या, जहाँ से चले थे, आज वहीं खड़ा पा रहे।।


ईष्ट-आराध्य-सद्गुरु सब अपनी जगह,
उन्हीं की कृपा जो आज भी चल रहे,
लेकिन दृष्टि से औझल जब प्रत्यक्ष उपस्थिति,
श्रद्धा की ज्योति टिमटिमाने की कोशिश कर रहे।।


इस तन का क्या भरोसा, ढलता सूरज यह तो,
मन कल्पना लोक में विचरण का आदी,
चित्त शाश्वत बक्रता संग अज्ञात अचेतन से संचालित,
आदर्शों के शिखर अविजित, मैदान पड़े हैं खाली।।
ये भी गजब दौर-ए-ठहराव जिंदगी के,
जब लगे जीवन बन गया एक खेल तमाशा।
येही पल निर्णायक साधना समर के,
बन खिलाड़ी गढ़ जीवन की नई परिभाषा।


धारण कर धैर्य अनन्त, परापुरुषार्थ, आशा अपार,
  बढ़ता चल परम लक्ष्य की ओर, जो अंध अचेतन के उस पार।।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

जानता हूँ अँधेरा बहुत


मिल कर रहेगा समाधान

जानता हूँ अंधेरा बहुत,
लेकिन अंधेरा पीटने के मिटने वाला कहाँ,
जानता हूँ कीचड़-गंदगी बहुत,
लेकिन उछालने से यह हटने वाली कहाँ।।

अच्छा हो एक दिए का करलें इंतजाम,
या खुद ही बन जाएं प्रकाश की जलती मशाल,
अच्छा हो कर लें निर्मल जल-साबुन की व्यवस्था,
या एक बहते नद या सरोवर का इंतजाम।।

लेकिन यदि नहीं तो, फिर छोड़ दें कुछ काल पर, करें कुछ इंतजार,
शाश्वत बक्रता संग विचित्र सा है यह मानव प्रकृति का मायाजाल,
नहीं समाधान जब हाथ में, तो बेहतर मौन रह करें उपाय-उपचार,
समस्या को उलझाकर, क्यों करें इसे और विकराल।।

इसका मतलब नहीं कि हार गए हम, या,
मन की शातिर चाल या इसकी मनमानी से अनजान,
आजादी के हैं शाश्वत चितेरे,
मानते हैं अपना जन्मसिद्ध अधिकार।।

लेकिन क्या करेँ जब पूर्व कर्मों से आबद्ध, अभी,
गुलामी को मान बैठे हैं श्रृँगार,
लेकिन नहीं सो रहे, न ही पूरी बेहोशी में,
चिंगारी धधक रही, चल रहे तिमिर के उस पार।।

कड़ियाँ जुड़ी हैं कई जन्मों की,
नहीं एक झटके में कोई समाधान,
धीरे-धीरे कट रहे कर्म-बन्धन,
मुक्त गगन में गूँजेगा एक दिन शाश्वत गान।।

छिटक चुके होंगे बन्धन सारे,
छलक रहा होगा शांति, स्वतंत्रता, स्वाभिमान भरा जाम,
लेकिन जानता हूँ, मानता हूँ अभी अँधेरा बहुत,
पर, मिलकर रहेगा पूर्ण समाधान।।

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

हे सृजन साधक, हर दिन भरो कुछ रंग ऐसे


मिले जीवन को नया अर्थ और समाधान
हर दिवस, एक नूतन सृजन संभावना,
प्रकट होने के लिए जहाँ कुलबुला रहा कुछ विशेष,
एक खाली पट कर रहा जैसे इंतजार,
रचना है जिसमें अपने सपनों का सतरंगी संसार।1।

आपकी खूबियां और हुनर हैं रंग जिसके,
अभिव्यक्त होने का जो कर रहे हैं इंतजार,
 अनुपम छटा बिखरती है जीवन की या होता है यह बदरंग,
तुम्हारे ऊपर है सारा दारोमदार।2।


शब्द शिल्पी, युग साधक बन, हो सकता है सृजन कुछ मौलिक,
जिसे प्रकट होने का है बेसव्री से इंतजार,
आपके शब्द और आचरण से मिलेगी जिसे अभिव्यक्ति,
झरेगा जिनसे आपका चिंतन, चरित्र और संस्कार।3।

अतः हे पथिक, बन सृजन साधक,
भरो जीवन में हर दिन रंग कुछ ऐसे,
 झरता हो जिनमें जीवन का भव्यतम सत्य,
मिलता हो जहाँ जीवन को नया अर्थ और समाधान।4।