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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले नहीं जब कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर हर पल।12।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जीवन गीत

हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए

 


हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए,

धर्म-मर्यादा संग इंसानियत को स्थान मिलना चाहिए।1

आदर्श सिद्धान्तों की बातें अच्छी,

व्यवहारिक धरातल का भी अहसास होना चाहिए।2

 

काम बनें या बिगड़े, या थोड़ी देर में होते हैं पूरे,

आपसी प्यार-सद्भाव-भाईचारा बना रहना चाहिए।3

नहीं कोई परमहंस इस रंग बदलती दुनियाँ में,

मानवीय दुर्बलताओं के प्रति उदार भाव रहना चाहिए।4

 



       नहीं संत बनता यहाँ कोई एक दिन में इस धरा पर,

सुधरने का मौका सबको मिलता रहना चाहिए।5

अपनी मूढ़ता की आँधी में हो सवार कोई अगर,

तो उस लाइलाज मर्ज़ का उपचार होना चाहिए।6

 

नहीं समाधान मर्ज का अपने हाथ में को,

 इस सृष्टि के मालिक पर छोड़ देना चाहिए।7

हर व्यक्ति जिम्मेदार है अपने चिंतन व कर्म के लिए,

अपने कर्तव्य के प्रति सबको ईमानदार-जिम्मेदार रहना चाहिए।8

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

जीवन गीत - अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना

 

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा

 


अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना,

सोए बुझे अरमानों में जैसे नए पंख का लग जाना,

घनघोर रात के बाद जैसे भौर का उजाला छा जाना,

रेगिस्तान में भटक रहे प्यासे को जल का स्रोत मिल जाना।

 

लेकिन अभी तो क्षितिज के पार बहुत दूर है मंजिल,

अग्नि परीक्षा के कई दौर हैं अभी बाकि,

बाहरी छल-छद्म के खेलों का भी होगा राह में सामना,

थक जाओगे राह में पथिक, लेकिन तुम्हें है बस चलते जाना।

 


सबसे बड़ी चुनौती हो स्वयं, चित्त् शुद्धि का विकट कार्य,

बिगड़ैल मन की कुचालों को भी है पग-पग पर साधना,

बार-बार गिरोगे, फिसलोगे, लेकिन लक्ष्य सिद्धि तक

अनन्त काल तक बिना हारे तुम्हें है बस चलते जाना।

 

जहाँ अपनी शक्ति चूक जाए, हाथ खड़े हो जाएं,

वहाँ दैवीय शक्ति, गुरु अवलम्बन में क्या उदासीनता,

दो कदम बढ़ो उस ओर, वह दस कदम पास मिलेगा,

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा।

रविवार, 30 नवंबर 2025

कर्म की खेती, आस्था की उड़ान

ईष्ट के संग, जीवन का पथ संधान...


कर्म की खेती, विचारों के बीज,

भावनाओं का सिंचन, आस्था की उड़ान,

धर्म का पथ रुहानी, सत्य का संधान,

वाकि ईष्ट की इच्छा, ईश्वर का कृपा विधान ।1।

 

जो समझ आया, वो करते गए,

अंतरात्मा का थाम दामन, अंधड़ का सामना करते चले,

मंजिल का नहीं रहा अधिक ठौर ठिकाना,

अपने कर्तव्य पथ पर बस आगे बढ़ते चले ।2।

 

होती रही राह में भूल चूकें भी कई,

होश आते ही उनको सुधारते चले,

नहीं कभी सोचा किसी का बुरा,

जो बन पड़ा सबका भला करते रहे ।3।

 

नहीं रहा कोई बंधन स्वीकार,

न किसी को कभी बाँध कर रखे,

सब परमात्मा के भेजे अपने पराए,

उसी में रमकर सबको निभाते रहे ।4।

सुखी को देख होते रहे प्रमुदित,

दुःखी को देख ह्दय से हुए भावुक,

अनाधिकार चेष्टा अवश्य उलझाती रही राह में,

अपमान नहीं उपेक्षा का सुत्र अपनाते रहे ।5।

 

रहा अग्नि परीक्षाओं का दौर कुछ लम्बा,

रास्ते में करारे सबक झोली में गिरते रहे,

कर्मों की खेती लहलहाने को तैयार अब तो,

दूर मंजिल के दिग्दर्शन भी हो चले ।6।

 

रखना याद विधान ईश्वर का, जो अटल,

कर्म की गति सूक्ष्म अति गहन,

चाहे हो भगवान राम कृष्ण या सिद्ध पुरुष कोई,

कर्म के विधान से नहीं बच सका यहाँ कोई ।7।

 

एक ही मार्ग शांति, स्वतंत्रता का,

प्रकाश, आनन्द, सुकून का यहाँ,

अपने भीतर तलाश कर सुख की,

बाहर इसकी खोज में भटकना नादानी ।8।

 

सकल संभावनाएं भरकर जब भेजा है खुदा ने,

तो फिर कैसी भटकन, कब तक खुद से अनजान,

उम्दा विचार बीजों के संग कर लो अब कर्म की खेती,

करो ईष्ट के संग जीवन पथ का मौलिक संधान ।9।


सोमवार, 30 जून 2025

सत्य का संधान, स्थापना धर्म की


सत्य का संधान, स्थापना धर्म की,

किसने कहा कि है कार्य सरल-सहज, खेल बच्चों का,

स्वयं प्रभु आते हैं धरा पर इसको संभव बनाने।

 

लेकिन उनके साथी सहचर अंश होने के नाते,

हर संवेदनशील इंसान, जाग्रत जीवात्मा को उतरना पड़ता है मैदान में,

नहीं चुप रह सकती झूठ व असुरता का नग्न नृत्य को देख,

 करती है कुछ प्रयास इनसे जूझने, दूर करने के लिए,

 अपने स्तर पर, अपने ढंग से, अपनी क्षमता के अनुरुप।

 


अपने भोलेपन, मासूमियत में नहीं समझ पाती स्वरुप जगत का,

पहले सब अच्छे लगते हैं, उसे अपने जैसे, सरल-सहज,

सच्चे ईमानदार समझदार, गुरु के भक्त, वंदे सब प्रभु के।

 

लेकिन समय के साथ, कटु यथार्थ से पड़ता है जब वास्ता,

पता चलता है कि सबके अपने-अपने अर्थ, अपनी-2 परिभाषा,

 सत्य की, धर्म की, अच्छाई-बुराई और जीवन के मकसद की,

नहीं जीवन सरल इतना, शाश्वत वक्रता की यह विचित्र सृष्टि।

 

सूक्ष्म स्वार्थ-अहंकार, राग-द्वेष, महत्वाकाँक्षाएं सबकी अपनी-2,

ऐसे में सत्य-न्याय, धर्म-इमान, सही-गलत की बातें सापेक्ष,

सब अपनी-अपनी समझ, अनुभव, पूर्वाग्रह व समझ के चश्में से देख रहे।

 

जब अपने-परायों का भेद मुश्किल, तो बदल जाते हैं मायने धर्म स्थापना के,

ऐसे में जग के भोलेपन की भ्रम मारीचिका का टूटना है स्वाभाविक,

और अंधकार की शक्तियों का है वजूद अपना, सत्ता अपनी, संसार अपना।

 

नहीं चाहते ये परिवर्तन अभी वाँछित, अपनी शर्तों पर जीने के ये आदी,

नहीं औचित्य से मतलब इन्हें अधिक, बस अपने वर्चस्व की है इन्हें चिंता भारी,

इन पर न आए आँच तनिक भी, सत्य, न्याय, इंसानियत से नहीं इन्हें अधिक मतलव।

 

जाने-अनजाने में हैं ये हिस्सा समस्या के, शांति-समाधान में नहीं इनको अधिक रुचि,
आलोक सत्य का, प्रकाश धर्म का, तलवार न्याय की, हैं सीधे इनके वर्चस्व को चुनौती,

तिनका-2 जोड़ खड़ा मायावी महल, सत्य की एक चिंगारी से हो सकता है भस्म तत्क्षण।

 

अंधकार की इन शक्तियों का निकटतम संवाहक है बिगड़ैल मन अपना,

छिपे पड़े हैं, जिसके चित्त में महारिपु वासना-त्रिष्णा-अहंता, राग-द्वेष के अनगिन,

ये भी कहाँ बदलने के लिए हैं तैयार, आलस-प्रमाद में पड़े उनींदे, कम्फर्ट जोन के आदी।

 

इन्हीं से है समर पहला, बाहर के धर्मयुद्ध का मार्ग तभी खुलेगा,

इसलिए कठिन विकट मार्ग सत्य संधान का, धर्म स्थापना का,

स्वयं से है युद्ध जहाँ पहला, पहले साधना समर में उतरना होगा।

 

फिर अधर्म-अन्याय के विरुद्ध, सत्य-धर्म-औचित्य की दूधारी तलबार लेकर,

काल के तेवर को समझते हुए, महाकाल की इच्छा का अनुगमन करना होगा।

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

श्रेय का अधिकार तो सब चाहते हैं

 

कीमत चुकाने के लिए कितने हैं तैयार


आगे तो सब बढ़ना चाहते हैं मंजिल तक,

लेकिन पिछली खाई पाटने को कितने हैं तैयार।1

सफलता का सेहरा पहन सब चाहते हैं सजना संवरना,

अनवरत असफलता का दंश झेलने को कितने हैं तैयार।2

कंगूरे का क्लश तो हर कोई चाहता है बनना,

लेकिन गुमनामी में गलने को कितने हैं तैयार।3


श्रेय का तो हर कोई चाहता है अधिकारी बनना,

लेकिन पूरी कीमत चुकाने को कौन है तैयार।4

सिंहासन की चाहत भी रखता है हर कोई,

काँटे का ताज पहनने को कौन है तैयार।5

प्रकाश की चाहत भी है सभी के उर में,

लेकिन अंधकार से भिड़ने को कौन है तैयार।6


गुरुत्ता का श्रेय भी सभी चाहते हैं सहजता से,

शिष्यत्व की तपन में गलने को कितने तैयार।7

अमृत की चाह भी सब रखते हैं एक डुबकी में,

लेकिन विषपान के लिए कितने हैं तैयार।8

शिखर की चाहत तो हर कोई रखता है दिल में,

लेकिन पर्वत के आरोहण के लिए कितने हैं तैयार।9


मन का सुकून भी हर कोई चाहता है जीवन में,

लेकिन शांति के पथ पर चलने को कितने हैं तैयार।10

धर्म-अध्यात्म की अनुभूति भी हर इंसान चाहता है जेहन में,

लेकिन इँसानियत की नेक राह पर चलने को कितने सचेष्ट-तैयार।11

 संत सुधारक नायक का श्रेय भी सभी चाहते हैं सपने में,

आदर्श की खातिर शहीद होने के लिए कितने हैं तैयार।।12


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